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Part 6: उलटी गूँज
Piyashi Atma · Ghost Stories · 18 मिनट
"और तुम? तुम कहाँ हो?"
इरा ने headphones उतारे और उन्हें मेज़ पर रख दिया, बहुत धीरे से, जैसे वे किसी ज़िंदा चीज़ के बने हों।
सुबह के आठ बजे थे। लाइब्रेरी में सारी battery lamps जल रही थीं, जबकि खिड़कियों से दिन की फीकी रोशनी आ रही थी। विक्रांत ने उन्हें खुद जलाया था। वह अब किसी कमरे में एक भी कोना अंधेरा नहीं छोड़ना चाहता था।
इरा कुछ देर चुप बैठी रही। उसकी उँगलियाँ मेज़ की लकड़ी पर एक अदृश्य लकीर खींच रही थीं, बार-बार।
"फिर से चलाइए," उसने कहा। "पहले वाला हिस्सा।"
विक्रांत ने चलाया। हाँ, यहीं हूँ। लाइब्रेरी में। इस बार speaker पर, धीमे volume में।
इरा ने आँखें बंद करके सुना। फिर खोलीं।
"वो मैं हूँ," उसने कहा। उसकी आवाज़ सपाट थी, बिना काँपे। "मेरी आवाज़। मेरा लहजा। 'यहीं' पर जो मैं हल्का-सा खींचती हूँ, मेरी अम्मी कहती हैं वो मेरी नानी से आया है।" उसने साँस ली। "पर मैंने ये कभी नहीं कहा।"
"मुझे पता है।"
"आपको पता है?" उसने उसकी तरफ़ देखा। "आप forensic expert हैं। आप अदालत में खड़े होकर कहेंगे कि ये मेरी आवाज़ है।"
"हाँ।"
"तो आपको कैसे पता कि मैंने नहीं कहा?"
विक्रांत ने laptop उसकी तरफ़ घुमाया। Spectrogram पर दोनों samples, एक के ऊपर एक, उसकी असली आवाज़ हाट वाले दिन की, और कल रात वाली। उसने उसे दिखाया: साँस की वह छोटी, धुँधली लकीर जो हर असली वाक्य से पहले थी। Mouth noise के बारीक, बिखरे धब्बे। और फिर कल रात वाली file, जिसमें आवाज़ अपने आसपास एक खाली, साफ़ सन्नाटे में तैर रही थी।
"क्योंकि आप साँस लेती हैं," उसने कहा।
इरा ने screen को बहुत देर तक देखा।
"और ये?" उसने आख़िरकार पूछा। "ये सवाल? '...और तुम कहाँ हो?'"
"वो मैंने live नहीं सुना था। Recording में है, बहुत धीमा। अगर सुन लेता..."
"तो जवाब दे देते।"
"हाँ।"
इरा उठी और खिड़की तक गई। बाहर का कोहरा सलेटी था, उसमें पीपल की एक शाखा किसी हड्डी की तरह उभरी हुई।
"हमें कुछ तय करना होगा," उसने बिना मुड़े कहा। "आपके और मेरे बीच। अगर अंधेरे में आवाज़ पर भरोसा नहीं किया जा सकता, तो किसी और चीज़ पर करना पड़ेगा।"
"जैसे?"
इरा मुड़ी, मेज़ तक आई, और लकड़ी पर अपनी उँगलियों के जोड़ से खटखटाया। तीन बार, जल्दी-जल्दी। एक पल रुकी। फिर एक बार।
ठक-ठक-ठक। ... ठक।
"ये," उसने कहा। "अगर मैं आपको ढूँढूँ, तो ऐसे खटखटाऊँगी। आप भी। अगर कोई आवाज़ आए और खटखटाहट न हो, तो जवाब मत दीजिएगा। चाहे वो आवाज़ किसी की भी हो।"
विक्रांत ने उसे देखा। "आप इसके बारे में बहुत जल्दी सोच लेती हैं।"
"Archivist हूँ।" वह मुस्कुराई नहीं। "हम हर चीज़ का backup रखते हैं।"
वह मेज़ के पास रुकी, और फिर, जैसे यूँ ही, पूछा: "ये file आप मुझे दे सकते हैं? एक copy?"
"क्यों?"
"मैं इसे... मैं इसे सुनना चाहती हूँ। अकेले में। अपनी आवाज़।" उसने कंधे उचकाए। "शायद पागलपन है।"
विक्रांत ने एक pen drive निकालकर file copy की और उसे दे दी। इरा ने उसे अपने bag में रखा, उसी जेब में जहाँ उसने बचपन वाली photo रखी थी।
उसने इस बात पर ध्यान दिया। उसने उसे उस ढेर में रखा जहाँ बाकी बातें रखी थीं।
कबीर ने file सुनने से इनकार कर दिया।
विक्रांत ने उसे headphones दिए, और उसने उन्हें लगा भी लिया। पहला हिस्सा, "इरा?" और फिर जवाब, उसने बिना कुछ कहे सुना। उसका चेहरा कुछ नहीं बोल रहा था।
फिर, जब विक्रांत ने gain बढ़ाकर वह आख़िरी हिस्सा चलाया, और तुम? तुम कहाँ हो?, कबीर ने headphones कान से ऐसे खींचे जैसे उनमें आग लगी हो। वे फ़र्श पर गिरे।
"मत चला।" उसकी आवाज़ फटी हुई थी। "ये मत चला, यार।"
"क्यों?"
कबीर ने उसकी तरफ़ नहीं देखा। उसका हाथ अपनी jacket की जेब में घुसा, फिर निकला, फिर घुसा। Cigarette का पैकेट निकाला, एक cigarette होंठों में लगाई, जलाई नहीं।
"क्योंकि ये बकवास है," उसने कहा। "कोई audio का glitch है। कोई echo। तू खुद ही बोलता है न, हर आवाज़ का source होता है। तो ढूँढ source। मुझे मत सुना।"
वह कमरे से निकल गया।
विक्रांत ने headphones फ़र्श से उठाए। उनकी तार अब भी हल्के-हल्के हिल रही थी।
उसने कबीर की आवाज़ के उस आख़िरी हिस्से को अपने दिमाग़ में दोबारा सुना। ये मत चला। उसमें वह झुँझलाहट नहीं थी जो किसी अंधविश्वास को नकारने वाले की होती है। उसमें कुछ और था।
पहचान।
कबीर ने यह आवाज़ पहली बार नहीं सुनी थी।
ढूँढ source।
यह बात दिन भर विक्रांत के दिमाग़ में बजती रही, और दोपहर तक वह एक योजना में बदल गई।
अगर वह इस कोठी में कुछ सुन रहा था जो नहीं होना चाहिए, तो वह इस कोठी को सुनेगा। हर कमरा। हर दीवार। वैसे ही जैसे वह किसी recording studio या किसी अदालत के कमरे को नापता था, यह तय करने के लिए कि वहाँ recorded आवाज़ असली है या नहीं।
Acoustic mapping।
हर कमरे की एक आवाज़ होती है। जब तुम उसमें कोई तेज़, छोटी आवाज़ पैदा करते हो, ताली, गुब्बारा फटना, लकड़ी के दो टुकड़ों का टकराना, तो वह आवाज़ दीवारों, छत, फ़र्श से टकराकर लौटती है। सैकड़ों छोटी-छोटी गूँजें, एक के पीछे एक, धीरे-धीरे धुँधली होती हुई। उस लौटने के pattern को impulse response कहते हैं। वह किसी कमरे का fingerprint होता है। उससे तुम कमरे का आकार बता सकते हो, उसकी दीवारें किस चीज़ की हैं, उसमें कितना सामान है।
और यह physics था। गणित। इसमें कोई जगह नहीं थी डर के लिए, या उम्मीद के लिए, या किसी बूढ़ी औरत की स्लेट के लिए।
उसके bag में एक छोटा, battery वाला speaker था और उसके दोनों recorders। Impulse के लिए उसने रसोई से लकड़ी के दो चकले-बेलन जैसे टुकड़े लिए, जिन्हें टकराने पर एक तीखी, साफ़ चटाक निकलती थी। रघु काका ने उसे देखा, पर कुछ पूछा नहीं।
उसने ऊपर से शुरू किया।
कबीर का कमरा, जब कबीर नीचे था। Speaker एक कोने में, recorder बीच में, tripod पर। एक sine sweep, नीची गुर्राहट से ऊँची सीटी तक, दस सेकंड लंबी, जिसने कमरे की हर खिड़की के शीशे को हल्का-सा झनझना दिया। फिर लकड़ी की चटाक। फिर अगला कोना।
Laptop पर, impulse response एक नुकीली चोटी की तरह आया, फिर उसके पीछे छोटी-छोटी चोटियों की एक घटती हुई कतार। सामान्य। RT60, यानी आवाज़ को साठ decibel गिरने में लगने वाला समय: शून्य दशमलव सात सेकंड। प्लास्टर की दीवारें, लकड़ी का फ़र्श, पलंग, अलमारी, पर्दे। जैसा होना चाहिए था, वैसा।
इरा का कमरा, लाइब्रेरी के बगल में। उसकी इजाज़त से। शून्य दशमलव छह। मोटी दीवारें, बहुत सारी किताबें।
लाइब्रेरी। शून्य दशमलव पाँच। लकड़ी और काग़ज़ आवाज़ को निगल जाते हैं।
सामने का गलियारा। रसोई। ऊपर के बंद कमरे, जिनकी चाबियाँ रघु काका ने अनमने मन से दीं।
हर कमरे के बाद वह एक काग़ज़ पर कोठी का नक़्शा बनाता गया, अपने हाथ से, और हर कमरे में उसका नंबर लिखता गया। शाम चार बजे तक, उसके सामने पूरी कोठी की एक तस्वीर थी, संख्याओं में।
फिर वह नीचे उतरा, पीछे के गलियारे की तरफ़।
पीछे का गलियारा, वह लंबा, सँकरा रास्ता जो बावड़ी वाले आँगन की तरफ़ जाता था, उसकी दोनों तरफ़ छोटे-छोटे कमरे थे। कोठरियाँ। पुराने ज़माने में शायद भंडार, अनाज, बर्तन, लकड़ी रखने के लिए। अब ज़्यादातर ख़ाली, ताले लगे, कुछ के दरवाज़ों के कब्ज़े टूटे हुए।
विक्रांत ने पहली कोठरी खोली, गलियारे के बीच वाली।
अंदर एक छोटा, चौकोर कमरा था। चार बाई पाँच मीटर, शायद। नीची छत, कच्ची, मिट्टी की पुताई वाली दीवारें, एक कोने में टूटे हुए बोरों का ढेर। कोई खिड़की नहीं। हवा बासी और सूखी, धूल की, पुरानी जूट की।
उसने speaker रखा, recorder लगाया, sweep चलाई।
Sweep की गुर्राहट कमरे में भरी और फिर ऊँची होती गई, और विक्रांत, जो उसे हज़ार बार सुन चुका था, ने महसूस किया कि उसकी आवाज़ में कुछ अलग था। जब sweep ख़त्म हुई, उसकी आख़िरी सीटी हवा में रुकी नहीं। वह खिंची। लंबी। पतली होती गई, पर जाने से इनकार करती रही, जैसे कमरा उसे छोड़ना नहीं चाहता हो।
उसने लकड़ी की चटाक की।
और गूँज लौटी।
उसे सुनने के लिए laptop की ज़रूरत नहीं थी। उसने उसे अपने कानों से सुना। तीखी चटाक, और फिर उसके पीछे एक धीमी, गहरी, लौटती हुई लहर, जो उस छोटी, बंद, कच्ची दीवारों वाली कोठरी में बिल्कुल नहीं होनी चाहिए थी। एक ऐसी गूँज जो किसी गिरजाघर में होती है। किसी गुफ़ा में।
किसी कुएँ में।
उसने laptop खोला। Impulse response।
सीधी आवाज़ की नुकीली चोटी। उसके तुरंत बाद दीवारों की छोटी चोटियाँ, जैसी होनी चाहिए थीं, चार-पाँच मीटर दूर की दीवारों से, कुछ milliseconds में। सामान्य।
फिर लगभग दो सौ milliseconds बाद, एक और चोटी। बड़ी। साफ़।
विक्रांत ने उसका समय पढ़ा: एक सौ अट्ठानवे milliseconds।
उसने हिसाब लगाया, कागज़ पर, जैसे पहले साल का student लगाता है, ताकि कोई गलती न हो। आवाज़ हवा में तीन सौ तैंतालीस मीटर प्रति सेकंड चलती है। एक सौ अट्ठानवे milliseconds में वह लगभग अड़सठ मीटर जाती है। और गूँज आने-जाने का रास्ता होती है, जाना और लौटना। तो जो सतह इस गूँज को लौटा रही थी, वह चौंतीस मीटर दूर थी।
चौंतीस मीटर।
एक ऐसे कमरे में, जिसकी सबसे दूर की दीवार पाँच मीटर पर थी।
उसने गूँज की दिशा देखने के लिए दूसरे recorder के दोनों mics का इस्तेमाल किया, उनके बीच के छोटे से समय-अंतर को नापकर। ऊपर से नहीं। बगल से नहीं।
नीचे से।
चौंतीस मीटर नीचे। सीधे उसके पैरों के नीचे, ज़मीन के अंदर, जैसे इस कोठरी का कच्चा फ़र्श फ़र्श नहीं, किसी बहुत गहरे गड्ढे का ढक्कन हो।
उसे इरा का नक़्शा याद आया। सात तल। एक सौ आठ सीढ़ियाँ। उसने हर सीढ़ी को तीस सेंटीमीटर ऊँचा माना, जैसा पुरानी बावड़ियों में होता है। बत्तीस मीटर से थोड़ा ज़्यादा। तली की मोटाई जोड़ो, ऊपर का चबूतरा जोड़ो।
चौंतीस।
बावड़ी इस कमरे के नीचे नहीं थी। नक़्शे के हिसाब से वह पीछे के आँगन में थी, यहाँ से पंद्रह-बीस मीटर दूर। पर यह कमरा ऐसे गूँज रहा था जैसे वह उसके ठीक ऊपर बना हो।
उसने एक बार और चटाक की। फिर एक बार। हर बार वही। एक सौ अट्ठानवे milliseconds।
तीसरी बार, impulse response को zoom करते हुए, उसकी नज़र सीधी आवाज़ की चोटी से पहले वाले हिस्से पर पड़ी। वहाँ, जहाँ कुछ नहीं होना चाहिए था। जहाँ सिर्फ़ खामोशी होनी चाहिए थी, क्योंकि आवाज़ अभी पैदा ही नहीं हुई थी।
वहाँ एक छोटी चोटी थी।
धीमी, पतली, पर साफ़। सीधी आवाज़ से साठ milliseconds पहले।
विक्रांत ने उसे घूरा।
Physics में इसके लिए कोई जगह नहीं थी। कोई गूँज आवाज़ से पहले नहीं आ सकती। गूँज आवाज़ का बच्चा होती है। वह उसके बाद पैदा होती है, उसके पीछे-पीछे। यह बुनियादी नियम था, causality। कारण पहले, परिणाम बाद में। इसके बिना पूरी दुनिया का कोई मतलब नहीं बचता।
पर उसकी screen पर, लकड़ी की हर चटाक से साठ milliseconds पहले, कमरा उस चटाक को लौटा रहा था। धीमे से। पहले से। जैसे उसे पता हो कि क्या आने वाला है।
उसे calibration walk याद आई। उसके कदम, जो हर बार आधा सेकंड पहले आए थे।
उलटी गूँज।
उसने यह शब्द अपने मन में बनाया, और उसे लगा कि यह शब्द उसने बनाया नहीं, कहीं से याद किया है।
उसने बाकी कोठरियाँ भी नापीं। एक-एक करके, गलियारे के दोनों तरफ़, आँगन वाले दरवाज़े की तरफ़ बढ़ते हुए।
हर कमरे में वह गहरी, नीचे से आती गूँज थी। और जितना वह बावड़ी के पास पहुँचता गया, वह उतनी तेज़ होती गई। जैसे किसी तालाब में फेंके गए पत्थर की लहरें, बावड़ी उनका केंद्र।
उसने अपने हाथ के बनाए नक़्शे पर संख्याएँ लिखीं। फिर, उन्हें जोड़ते हुए, लकीरें खींचीं। Contours, जैसे पहाड़ों के नक़्शों पर होते हैं, जहाँ एक जैसी ऊँचाई वाली जगहें एक लकीर से जुड़ती हैं।
लकीरें बावड़ी के चारों तरफ़ घेरे बनाती थीं। पहला घेरा आँगन। दूसरा पीछे का गलियारा और उसकी कोठरियाँ। तीसरा, धुँधला, रसोई तक पहुँचता। उसके बाद, सामने के हिस्से में, लाइब्रेरी में, इरा के कमरे में, कबीर के कमरे में, कुछ नहीं। सामान्य कमरे। सामान्य गूँज।
एक कीप की तरह। एक भँवर की तरह, जिसका मुँह बावड़ी में था।
विक्रांत ने नक़्शे को देखा, और उसके अंदर का वैज्ञानिक, जो पिछले पाँच दिनों से लगातार पीछे हट रहा था, एक पल के लिए संतुष्ट हुआ। यह एक pattern था। एक source। एक केंद्र। अजीब, असंभव, पर एक केंद्र।
फिर उसने नक़्शे के ऊपरी हिस्से पर नज़र डाली। पहली मंज़िल।
उसने अपने कमरे को नहीं नापा था।
यह भूल नहीं थी। शायद थी। शायद उसका दिमाग़ उसे वहाँ ले जाने से बच रहा था। अपना कमरा। वह जगह जहाँ वह सोता था।
उसने उपकरण उठाए और ऊपर गया।
उसका कमरा, पूर्वी कोना, पहली मंज़िल पर। बावड़ी से, उसके नक़्शे के हिसाब से, कोठी का सबसे दूर का हिस्सा। वह जगह जहाँ, उसके बनाए घेरों के हिसाब से, कुछ नहीं होना चाहिए था।
उसने speaker पलंग के पास रखा। Recorder बीच में। Sweep।
Sweep ख़त्म हुई, और खिंची।
विक्रांत ने अपनी आँखें बंद कर लीं। उसे laptop देखने की ज़रूरत नहीं थी। उसने चटाक की, और उसने उसे सुना। वह धीमी, गहरी, नीचे से लौटती हुई लहर। ठीक उसके पलंग के नीचे से।
Laptop पर: एक सौ अट्ठानवे milliseconds। चौंतीस मीटर। नीचे।
और सीधी आवाज़ से साठ milliseconds पहले, वह छोटी, असंभव चोटी।
उसने नक़्शे पर, अपने कमरे की जगह, संख्या लिखी। और फिर उसे देखता रहा।
बावड़ी के चारों तरफ़ घेरे थे। फिर सामान्य कमरे। सामान्य संख्याएँ। एक खाली, साफ़ बीच का हिस्सा।
और फिर, उस खाली हिस्से के पार, कोठी के सबसे दूर के कोने में, एक अकेला, छोटा, गहरा घेरा। किसी दूसरे केंद्र जैसा। किसी ऐसी चीज़ की तरह जो बावड़ी से अलग होकर यहाँ आ बैठी हो।
उसका कमरा।
विक्रांत ने अपने पलंग को देखा। उसकी रज़ाइयों को, उसके तकिए को, जिस पर उसके सिर का गड्ढा अब भी बना था। फ़र्श पर, दरवाज़े के ठीक बाहर, रघु काका की नई कीलें।
वह पूरी रात अंदर ही था।
रात को उसने रघु काका को रसोई में पकड़ा।
बूढ़ा अँगीठी के पास बैठा था, लोई में लिपटा, आग में कुछ नहीं देख रहा था। विक्रांत उसके सामने बैठ गया।
"कल रात आपने कहा था, 'ऐसा नहीं होता।'"
रघु काका ने जवाब नहीं दिया।
"क्या नहीं होता, काका? मुझे बताइए। मैं समझना चाहता हूँ।"
बहुत देर तक आग की चटचटाहट के अलावा कुछ नहीं था। फिर बूढ़े ने बिना सिर उठाए कहा:
"हमें बचपन से एक बात सिखाई गई थी। मुझे मेरी अम्मा ने। अम्मा को उनकी सास ने। रात में कोई तुम्हें नाम लेकर बुलाए, तो जवाब मत देना। चाहे आवाज़ किसी की भी हो। तुम्हारी माँ की। तुम्हारे भाई की। पहले देख लो। हाथ से छूकर देख लो। पर मुँह से जवाब मत देना।"
"क्योंकि?"
"क्योंकि जो जवाब देता है, वो..." रघु काका रुका। उसका गला हिला। "...वो चला जाता है।"
"चला जाता है कहाँ?"
बूढ़े ने ज़मीन की तरफ़ इशारा नहीं किया। उसने बस आँखें नीची रखीं, और यह जवाब काफ़ी था।
"और कल रात?" विक्रांत ने धीरे से पूछा।
"कल रात आपने बुलाया।" रघु काका ने अब ऊपर देखा। उसकी आँखें आग की रोशनी में नम और लाल थीं। "आपने किसी को बुलाया, और जवाब आया। उसकी आवाज़ में।" उसने सिर हिलाया, धीरे-धीरे, जैसे किसी ऐसी चीज़ को झटक रहा हो जो उसके दिमाग़ में घुसने की कोशिश कर रही हो। "पचास साल में मैंने ऐसा नहीं सुना। किसी ने नहीं बताया कि वो..." वह रुका। "...कि वो जवाब भी देता है।"
"वो कौन, काका?"
रघु काका उठ खड़ा हुआ। उसके घुटने चटके।
"अंधेरे में किसी को नाम लेकर मत बुलाइए," उसने कहा। "बस। और अपने कमरे का दरवाज़ा बंद रखिए।" वह दरवाज़े तक गया, फिर रुका, पीठ उसकी तरफ़। "और अगर रात को कहीं से गिनती सुनाई दे, तो उसके साथ मत गिनिएगा। मन में भी नहीं।"
"गिनती? कैसी गिनती?"
पर वह जा चुका था।
उस रात विक्रांत ने अपने recorders रात भर के लिए लगाए। Long-term ambient recording। उसके mapping का आख़िरी हिस्सा: यह देखना कि रात के घंटों में, जब कोठी ख़ाली और शांत होती है, इन कमरों में क्या होता है।
एक recorder उसने अपने कमरे में रखा, पलंग के नीचे, mic ऊपर की तरफ़।
दूसरा, बड़ा वाला, उसने नीचे, पीछे के गलियारे की बीच वाली कोठरी में रखा। वह छोटा, कच्चा, खिड़की-रहित कमरा जहाँ उसने पहली बार चौंतीस मीटर की गूँज नापी थी। Mic कमरे के बीच में, tripod पर। फिर उसने बाहर निकलकर कोठरी के दरवाज़े पर ताला लगाया, रघु काका से ली हुई पुरानी पीतल की चाबी से, और चाबी अपनी जेब में रख ली। अगर सुबह recording में कुछ हो, तो कोई ये नहीं कह पाएगा कि कोई अंदर गया था।
उसने अपने कमरे का दरवाज़ा बंद किया। कुंडी लगाई। और फिर, बिना ज़्यादा सोचे, लालटेन जलाकर उसे पलंग के पास फ़र्श पर रखा, ताकि रात में उसकी लौ उसे दिखती रहे।
उसे नींद आई, अजीब तरह से, जल्दी और गहरी। बिना सपनों की।
सुबह छह बजे, अभी अंधेरा ही था, वह ताला खोलकर कोठरी में गया।
अंदर सब वैसा ही था। Tripod, recorder, उसकी लाल बत्ती जलती हुई, battery का निशान आधा। फ़र्श पर धूल, अछूती, सिर्फ़ उसके कल शाम के पैरों के निशान। बोरों का ढेर कोने में। कुछ नहीं हिला था।
उसने recorder उठाया और ऊपर ले आया।
Laptop पर file खोली। सात घंटे चालीस मिनट। Waveform की एक लंबी, पतली, लगभग सपाट लकीर, सिर्फ़ noise floor की हल्की-सी काँपती धारा।
उसने उसे तेज़ी से scroll किया, किसी उभार को ढूँढते हुए। Waveform पर किसी भी आवाज़ का एक निशान बनता है, एक छोटी पहाड़ी जैसा। ग्यारह बजे के आसपास, एक छोटी पहाड़ी, शायद किसी चूहे की खरखराहट। साढ़े बारह, कुछ नहीं। एक बजे, कुछ नहीं।
दो बजकर चौदह मिनट पर, लकीर बदली।
वह मोटी हुई। कोई ऊँची पहाड़ी नहीं, बल्कि एक लगातार, हल्की, मोटी पट्टी, जैसे कोई बहुत धीमी आवाज़ बहुत देर तक चलती रही हो। लगभग सत्रह मिनट।
विक्रांत ने headphones लगाए और वहाँ से play दबाया।
पहले उसने पानी सुना।
टप।
उस सूखी, धूल भरी, खिड़की-रहित कोठरी में। धीमा, दूर का, गूँज में लिपटा हुआ।
टप।
फिर, उस टपकन के बीच, कुछ और। एक लय। धीमी, बराबर, जैसे कोई चल रहा हो। नहीं, चल नहीं रहा, उतर रहा। पत्थर पर नंगे पैरों की बहुत हल्की, बहुत धीमी आहट। एक। रुकना। एक। रुकना। जैसे कोई सीढ़ियाँ उतर रहा हो, सावधानी से, एक-एक करके।
और हर आहट के साथ, एक फुसफुसाहट।
विक्रांत ने volume बढ़ाया। Noise reduction लगाया। फुसफुसाहट उभरी, अब भी धीमी, पर शब्दों में बदलती हुई।
गिनती।
"...बयासी..."
आहट।
"...तिरासी..."
आहट।
"...चौरासी..."
उसने फुसफुसाहट को सुना, और उसकी उँगलियाँ touchpad से हट गईं।
वह आवाज़ उसे पहचान में आई। उसके हर कोने में, हर उतार में, हर अक्षर के आख़िर में उस हल्के से खिंचाव में। वह उस आवाज़ को किसी भी और आवाज़ से बेहतर जानता था, क्योंकि उसने उसे बारह साल तक हर रोज़ अपने ही recordings में, अपने ही test files में, अपने ही "check, check, one two" में सुना था।
वह उसकी अपनी आवाज़ थी।
"...नब्बे... इक्यानबे..."
उसकी आवाज़। फुसफुसाती, धीमी, गिनती में डूबी हुई, जैसे कोई नींद में बोल रहा हो। या जैसे कोई ऐसी जगह से बोल रहा हो जहाँ ज़ोर से बोलना मना हो।
उसके दिमाग़ में तुरंत सवाल बने, एक के बाद एक, उसी ठंडी, professional स्पष्टता के साथ। क्या मैं वहाँ था? रात को? नींद में? पर दरवाज़े पर ताला था, और चाबी मेरी जेब में। पर क्या चाबी मेरी जेब में थी? सारी रात? मुझे कैसे पता?
उसे याद आया कि वह कितनी जल्दी, कितनी गहरी नींद में सोया था। बिना सपनों के।
"...निन्यानबे... सौ..."
उसने अपने पैरों को देखा, पलंग के नीचे। वे साफ़ थे। सूखे।
"...एक सौ एक... एक सौ दो..."
हर संख्या के साथ फुसफुसाहट थोड़ी दूर होती जा रही थी, थोड़ी और गहरी, जैसे बोलने वाला हर कदम के साथ किसी बड़ी, नीची जगह में उतर रहा हो। गूँज लंबी होती जा रही थी। ढाई सेकंड। तीन।
"...एक सौ छह..."
विक्रांत ने अपने हाथ अपनी जाँघों पर दबा दिए ताकि वे काँपना बंद करें।
"...एक सौ सात..."
उसे रघु काका की आवाज़ याद आई। अगर रात को कहीं से गिनती सुनाई दे, तो उसके साथ मत गिनिएगा। मन में भी नहीं।
और उसने महसूस किया कि वह गिन रहा था। मन में। फुसफुसाहट के साथ। हर संख्या उसके होंठों तक आ रही थी, उससे ठीक पहले, जैसे वह आवाज़ उसके अंदर से निकलकर recording में जा रही हो।
"...एक सौ आठ।"
आहट। फिर ठहराव। लंबा, बहुत लंबा, दस सेकंड, पंद्रह। टपकता पानी। और कुछ नहीं।
विक्रांत की साँस धीरे से छूटी। एक सौ आठ। नक़्शे जितनी। बावड़ी की आख़िरी सीढ़ी। गिनती ख़त्म।
फिर, उस लंबे ठहराव के बाद, एक और आहट।
पत्थर पर एक नंगा पैर। धीरे से। सावधानी से। एक ऐसी सीढ़ी पर जो वहाँ होनी ही नहीं चाहिए थी। उस जगह, जहाँ नक़्शे में सिर्फ़ एक मोटी लकीर थी, एक दरवाज़ा, जो अंदर से बंद होता है।
और उसकी अपनी आवाज़ ने, बहुत पास से, बहुत संतुष्ट होकर, जैसे कोई बहुत लंबे सफ़र के बाद घर पहुँचा हो, फुसफुसाकर कहा:
"...एक सौ नौ।"
[Part 6 समाप्त]
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- जवाब मत देना
- Chapter
- 6 of 30
- Category
- Ghost Stories
- Reading time
- 18 min
- Words
- 3443
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
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