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Part 5: पहली पुकार
Piyashi Atma · Ghost Stories · 19 मिनट
विक्रांत ने सबसे पहले photos खींचीं।
उसका दिमाग़ चीख रहा था, उसके हाथ काँप रहे थे, पर बारह साल की आदत डर से पुरानी थी। Evidence पहले। डर बाद में।
उसने अपने दरवाज़े के बाहर वाले गीले निशान की photo ली, फिर पास जाकर, फिर flash के साथ, फिर बिना flash के। फिर वह सीढ़ियाँ उतरा, हर धब्बे की photo लेते हुए, और फिर गलियारे में। उसके bag में एक छोटा measuring tape था, recording rooms नापने वाला। उसने उसे एक निशान के बगल में रखा और फिर photo ली। एड़ी से अँगूठे तक: सोलह सेंटीमीटर। दो कदमों के बीच की दूरी: बत्तीस।
जब वह पीछे के दरवाज़े पर पहुँचा, कोहरा उठने लगा था। आँगन की ओस पतली हो रही थी, सफ़ेद परत धीरे-धीरे गीले, काले पत्थर में बदल रही थी। उसने जल्दी-जल्दी photos लीं, जाली तक जाती लकीर की, उन आख़िरी दो निशानों की जो अगल-बगल रुके थे। आख़िरी photo लेते-लेते वे पिघल चुके थे। ओस के साथ घुलकर गीले पत्थर का हिस्सा बन गए थे, जैसे कभी थे ही नहीं।
वह अंदर भागा। गलियारे के लकड़ी के फ़र्श पर धब्बे सूख रहे थे, किनारों से अंदर की तरफ़, हल्के होते हुए। सीढ़ियों पर बस धुँधली छाप रह गई थी। और जब वह ऊपर पहुँचा, अपने दरवाज़े के बाहर, तो वह गड्ढा, वह दो छोटे पैरों के आकार का पानी, बस लकड़ी पर एक गहरा, नम दाग़ था। फिर वह भी नहीं।
दस मिनट। सब ख़त्म होने में दस मिनट लगे थे।
उसके हाथ में बस मोबाइल था। सैंतीस photos।
"गाँव का कोई बच्चा," कबीर ने कहा।
वह पलंग पर बैठा था, मोबाइल हाथ में, photos पलटते हुए। उसकी आँखें नींद और कल रात की शराब से भारी थीं, पर उँगलियाँ, विक्रांत ने देखा, बहुत तेज़ चल रही थीं, जैसे वह हर photo को बहुत जल्दी पार कर जाना चाहता हो।
"चोरी करने आया होगा। या शरारत। इन गाँवों के बच्चे..."
"दरवाज़ा अंदर से बंद था। मैंने खुद बंद किया था।"
"तो कोई और खिड़की। छत। ये कोठी है, विक्रांत, इसमें सौ रास्ते हैं।"
"और वो सीधा मेरे कमरे तक आया? अंधेरे में? पैर भिगोकर? और फिर बावड़ी में घुस गया, उस जाली के बीच से जिसमें तेरा हाथ नहीं जा सकता?"
कबीर ने मोबाइल नीचे रखा। उसने विक्रांत की तरफ़ नहीं देखा।
"तू मुझसे क्या सुनना चाहता है?" उसने धीरे से पूछा। "कि भूत है? ठीक है। भूत है। अब?"
"मैं सुनना चाहता हूँ कि चौदह सितंबर की रात ग्यारह बावन पर तू कहाँ था।"
कबीर उठा और खिड़की तक गया। बाहर का कोहरा अब सलेटी था, धूप की एक पतली, बीमार चमक उसमें घुसने की कोशिश कर रही थी।
"Bahraich," उसने कहा। "Hotel में।"
वह ठहराव। वह माइक्रो-सेकंड।
विक्रांत ने कुछ नहीं कहा। उसने मोबाइल उठाया और कमरे से निकल गया।
सीढ़ियों पर उसे रघु काका मिला, नीचे से ऊपर आता हुआ, हथौड़ा हाथ में। विक्रांत ने उसे photos दिखाईं, बिना कुछ कहे।
बूढ़े ने पहली photo देखी। फिर दूसरी। उसका अँगूठा स्क्रीन पर रुक गया। उसने उस photo को देखा जिसमें measuring tape निशान के बगल में था। सोलह सेंटीमीटर।
विक्रांत ने देखा कि उसके होंठ हिले। बिना आवाज़ के। एक शब्द। शायद दो।
फिर से।
"क्या, काका?"
रघु काका ने मोबाइल लौटाया। फिर वह ऊपर चढ़ा, विक्रांत के कमरे के दरवाज़े तक, और चौखट पर, ठीक उस जगह जहाँ फ़र्श पर गीला निशान रहा था, एक मोटी, काली कील ठोकी। ठक। ठक। ठक। फिर एक और। फिर एक और।
विक्रांत ने उसे नहीं रोका।
उसने दोपहर अपने कमरे में बिताई, laptop पर, photos को बड़ा करते हुए।
यह वह काम था जो वह करता था। मापना। गणना करना। अनिश्चितता को संख्याओं में बदलना, क्योंकि संख्याओं से डर नहीं लगता।
सोलह सेंटीमीटर का पैर। Pediatric charts के हिसाब से, पाँच से सात साल का बच्चा। बत्तीस सेंटीमीटर की चाल, धीमी, सधी हुई, दौड़ती नहीं। एक बच्चा जो डरा हुआ नहीं था। एक बच्चा जो उस रास्ते को जानता था।
पाँच से सात साल।
उसने laptop बंद किया और छत की तरफ़ देखा। पंखा अपने डंडे पर रुका हुआ था।
अंशु छह साल का था।
वह इस विचार से भागा नहीं। उसने उसे आने दिया, क्योंकि वह जानता था कि वह आएगा ही। तीन दिन से वह उसके किनारे पर खड़ा था, और अब वह अंदर आ गया था, पूरा, भारी, ठंडा।
उसने आँखें बंद कीं और वह याद बुलाई। वह एक याद जो उसके पास उस रात की थी। वह जिसे उसने कभी किसी को नहीं बताया था। न माँ को, न पापा को, न उस therapist को जिसके पास वह कॉलेज में छह महीने गया था।
जनवरी की रात। ठंड। एक लालटेन, उसके हाथ में। और अंशु, अपनी छोटी, लाल ऊनी टोपी में, बावड़ी की सीढ़ियों के ऊपर खड़ा, नीचे अंधेरे में झाँकता हुआ।
डरपोक, उसने कहा था। उसे यह शब्द याद था, उसका पूरा स्वाद, बड़े भाई की वह क्रूर, मज़ेदार हँसी। डरपोक है तू। नीचे जा के दिखा। सातवीं सीढ़ी तक। फिर मानूँगा।
और अंशु गया था। एक-एक सीढ़ी, धीरे-धीरे, अंधेरे में। और फिर नीचे से कुछ आया था, कोई आवाज़, और वह...
वह भागा था। लालटेन छोड़कर। पीछे मुड़े बिना।
यही याद थी। इतनी ही। बाकी सब अंधेरा।
विक्रांत ने उसे फिर से देखा, धीरे-धीरे, जैसे किसी पुराने tape को frame-by-frame देख रहा हो। और पहली बार, शायद इसलिए कि वह थका हुआ था, शायद इसलिए कि वह उसी कोठी में बैठा था जहाँ यह हुआ था, उसे उस याद में कुछ अजीब दिखा।
लालटेन उसके हाथ में थी। वह ऊपर खड़ा था। अंशु नीचे जा रहा था।
पर याद में रोशनी ऊपर से आ रही थी।
याद में वह नीचे से ऊपर देख रहा था। लालटेन की पीली रोशनी ऊपर की सीढ़ी पर थी, और उस रोशनी के बीच एक आकृति खड़ी थी, बड़ी, काली परछाई जैसी, और वह उसे नीचे से देख रहा था, गर्दन ऊपर उठाए।
विक्रांत ने आँखें खोलीं।
यादें ऐसे ही होती हैं, उसने खुद से कहा। Reconstructed। दिमाग़ हर बार उन्हें दोबारा बनाता है, और हर बार कुछ बदल देता है। Perspective खिसक जाता है। ये neuroscience है। इसमें कुछ नहीं है।
उसने इस बात को एक तरफ़ रख दिया, जहाँ वह बाकी चीज़ें रख रहा था। कबीर का ठहराव। इरा का "ज़ोर से मत पढ़िए"। रघु काका का "फिर से"।
वह ढेर बड़ा होता जा रहा था।
शाम को इरा ने उसे लाइब्रेरी में बुलाया। फिर से खटखटाकर। फिर से बिना नाम लिए।
मेज़ पर एक बड़ा, पीला पड़ चुका काग़ज़ फैला था, चार कोनों पर किताबें रखकर दबाया हुआ। एक नक़्शा। स्याही की बारीक लकीरों से बना, किसी ऐसे हाथ का जो नापना जानता था।
"ये बावड़ी है," इरा ने कहा। "Cross-section। अठारह सौ नब्बे के आसपास का। किसी ने बनवाया था, शायद मरम्मत के लिए।"
विक्रांत झुका।
नक़्शे में बावड़ी एक उलटे पिरामिड की तरह थी, ऊपर चौड़ी, नीचे सँकरी। सात तल, एक के नीचे एक, हर तल एक चबूतरा, मेहराबों से घिरा, और उन्हें जोड़ती सीढ़ियाँ। हर तल के बगल में उर्दू में कुछ लिखा था, और एक अंक।
"पहला तल। दूसरा। तीसरा..." इरा की उँगली, gloves में, नीचे उतरती गई। "हर तल पर लिखा है कितनी सीढ़ियाँ। कुल एक सौ आठ।"
"एक सौ आठ," विक्रांत ने दोहराया।
"माला के मनकों की तरह। शायद जानबूझकर।"
उसकी उँगली सबसे नीचे, सातवें तल पर रुकी। बाकी तलों से अलग, यहाँ कोई चबूतरा नहीं था। बस एक छोटा, चौकोर कमरा, पत्थर का, और उसके सामने एक मोटी लकीर, जो किसी दरवाज़े का निशान लगती थी।
उसके बगल में एक शब्द लिखा था, बाकी लिखावट से थोड़ा बड़ा।
"ख़ज़ाना," इरा ने पढ़ा।
"ख़ज़ाना? बावड़ी में?"
"Treasury। तिजोरी।" इरा ने कंधे उचकाए। "पुराने ज़माने में कुछ बावड़ियों में तहख़ाने होते थे, जहाँ अनाज या कीमती चीज़ें रखी जाती थीं। ठंडी जगह, सुरक्षित।"
"पर?"
इरा ने नक़्शे के किनारे की तरफ़ इशारा किया। हाशिए पर, मुख्य लिखावट से अलग, एक दूसरी, पतली, ज़्यादा काँपती हुई लिखावट में, शायद बाद में जोड़ी गई, एक पंक्ति थी।
"इसमें लिखा है," इरा ने धीरे से कहा, "सातवें तल का दरवाज़ा अंदर से बंद होता है।"
विक्रांत ने उस पंक्ति को देखा, उन अजनबी अक्षरों को जो उसके लिए बस घुमावदार लकीरें थे।
"अंदर से," उसने दोहराया। "तिजोरी अंदर से बंद होती है? किसके लिए?"
इरा ने जवाब नहीं दिया। उसने नक़्शे के कोनों से किताबें हटाईं और उसे बहुत सावधानी से लपेटने लगी।
"मैं कल नूर बानो के घर गई थी," उसने बिना ऊपर देखे कहा।
"और?"
"दरवाज़ा नहीं खुला। मैंने खटखटाया, बहुत देर तक। पड़ोसन ने बताया कि वो किसी से नहीं मिलतीं। रात को दिया भी नहीं जलातीं, बरसों से।" इरा ने नक़्शे पर रबर बैंड चढ़ाया। "पर मैं जब मुड़ी, तो दरवाज़े के नीचे से कुछ खिसककर बाहर आया।"
उसने अपनी diary खोली और उसमें से स्लेट का एक टुकड़ा निकाला। टूटा हुआ, हथेली जितना, किसी पुरानी स्लेट का कोना। उस पर चॉक से तीन शब्द लिखे थे।
उसे मत पुकारना
विक्रांत ने उसे देखा। "किसे?"
"मुझे नहीं पता," इरा ने कहा। "मैंने भी यही पूछा। दरवाज़े से। कोई जवाब नहीं आया।"
बिजली रात नौ बजकर बीस मिनट पर गई।
विक्रांत अपने कमरे में था, laptop पर, उन photos को फिर से देखते हुए। बल्ब ने एक बार ज़ोर से टिमटिमाया, जैसे किसी ने उसका गला दबाया हो, फिर एक पतली नारंगी लकीर बनकर बुझ गया। Laptop की स्क्रीन जलती रही, battery पर, और उसकी नीली-सफ़ेद रोशनी कमरे में अकेली रह गई।
बाहर, गाँव में भी, अंधेरा था। खिड़की से कुछ नहीं दिख रहा था। न कोई ढिबरी, न कोई लालटेन। जैसे पूरी दुनिया एक साथ आँख बंद कर ले।
विक्रांत ने लालटेन ढूँढी। वह कोने में थी, पर उसमें तेल नहीं था। कल रात उसने उसे पूरा जला दिया था। Matchbox भी नहीं था।
उसे नीचे जाना होगा। रसोई में रघु काका रखता होगा। या लाइब्रेरी में, जहाँ इरा की battery lamps थीं।
उसने अपना मोबाइल उठाया और torch जलाई। उसकी battery सोलह प्रतिशत थी। फिर, बिना सोचे, बस आदत से, उसने जेब में recorder को छुआ, उसका बटन दबाया। लाल बत्ती जली।
गलियारा पूरी तरह अंधेरा था। Torch की किरण उसमें एक सँकरा, सफ़ेद रास्ता काटती थी, और उस रास्ते के बाहर कुछ नहीं था। न दीवारें, न दरवाज़े, बस एक ठोस, काली खामोशी। विक्रांत ने महसूस किया कि उसका शरीर उस अंधेरे में अपनी जगह खो रहा है। जैसे वह किसी कमरे में नहीं, किसी खुले मैदान में खड़ा हो, बिना किनारे का।
उसने सीढ़ियाँ उतरीं। एक-एक करके, torch नीचे झुकाए, अपने पैरों को देखते हुए। उसने उन्हें नहीं गिना। उसने जानबूझकर अपने दिमाग़ को किसी और तरफ़ लगाया। रसोई। माचिस। तेल।
नीचे का गलियारा। लंबा, सँकरा, ठंडा। उसके एक सिरे पर पीछे का दरवाज़ा, कीलों भरा। दूसरे सिरे पर, पश्चिम की तरफ़, लाइब्रेरी।
वहाँ भी अंधेरा था। लाइब्रेरी के दरवाज़े के नीचे से कोई रोशनी नहीं आ रही थी।
विक्रांत रुका।
इरा की lamps battery वाली थीं। बिजली जाने से उन्हें फ़र्क नहीं पड़ता। अगर वह लाइब्रेरी में होती, तो रोशनी होती।
शायद वह अपने कमरे में थी। लाइब्रेरी के बगल में।
अंधेरा उसके चारों तरफ़ दबाव डाल रहा था। Torch की किरण काँप रही थी, क्योंकि उसका हाथ काँप रहा था। और उस खामोशी में, उस ठोस, पूरी खामोशी में, उसे एक इंसानी आवाज़ सुनने की ज़रूरत महसूस हुई। कोई भी आवाज़। कोई जो उसे बताए कि वह अकेला नहीं है।
उसे नूर बानो की स्लेट याद आई। उसे मत पुकारना। उसे रघु काका का हाथ याद आया, इमरान के मुँह पर।
पर वह विक्रांत सहगल था। Forensic audio analyst। वह आदमी जो हर आवाज़ का source ढूँढता था। और वह इस अंधेरे गलियारे में खड़ा होकर एक बूढ़ी, पागल औरत की स्लेट से डरकर एक इंसान को उसका नाम लेकर नहीं बुला सकता, यह बात उसे अचानक इतनी हास्यास्पद लगी कि उसके अंदर एक तरह का गुस्सा उठा। खुद पर।
उसने गला साफ़ किया।
"इरा?"
उसकी आवाज़ गलियारे में गई। उसने उसे जाते सुना, दीवारों से टकराते, अंधेरे में फैलते। फिर लौटते, थोड़ा देर से, थोड़ा धुँधला।
एक पल की खामोशी।
फिर, लाइब्रेरी की तरफ़ से, अंधेरे से, एक आवाज़ आई। शांत, साफ़, थोड़ी दूर से, जैसे कोई किसी काम में लगा हो और बिना सिर उठाए जवाब दे रहा हो।
"हाँ, यहीं हूँ। लाइब्रेरी में।"
इरा की आवाज़। उसका लखनवी लहजा, उसकी धीमी, नपी-तुली बोली।
विक्रांत की साँस निकल गई। राहत की एक गर्म लहर उसके सीने में फैली, और उसे खुद पर हँसी आई। देखा? कुछ नहीं। इंसान है, आवाज़ दी, जवाब मिला। बस।
"Lamp नहीं जलाई?" उसने पूछा, लाइब्रेरी की तरफ़ बढ़ते हुए।
कोई जवाब नहीं।
उसने दरवाज़ा धकेला। वह खुला, धीरे से, बिना चरमराए।
Torch की किरण अंदर गई। अलमारियाँ, उनकी लंबी, काली परछाइयाँ, जो torch के हिलने से छत पर नाचने लगीं। बीच की लंबी मेज़, उस पर काग़ज़ों के ढेर, अपनी-अपनी पर्चियों के साथ। मेज़ के किनारे कुर्सी।
ख़ाली।
उसने torch घुमाई। बाईं तरफ़ की अलमारियाँ। दाईं तरफ़। सीढ़ी, जो ऊपर के खानों तक लगी थी। कोने, जहाँ battery lamps रखी थीं, बुझी हुई।
कोई नहीं।
"इरा?"
इस बार उसकी आवाज़ में वह विश्वास नहीं था। लाइब्रेरी ने उसे लौटाया, और उसकी गूँज में कोई और आवाज़ नहीं थी।
उसने मेज़ के पास जाकर कुर्सी को छुआ। लकड़ी ठंडी थी। मेज़ पर एक कप रखा था, चाय का, आधा भरा। उसने उसके किनारे को उँगली से छुआ। बर्फ़ जैसा ठंडा, ऊपर एक पतली, सिकुड़ी हुई मलाई की परत। घंटों से वहीं पड़ा।
कोई यहाँ नहीं था। कोई यहाँ बहुत देर से नहीं था।
उसके पीछे, गलियारे में, कदमों की आहट हुई।
विक्रांत पलटा, torch उठाई।
कदम ऊपर से आ रहे थे, नीचे की तरफ़। सीढ़ियों से नहीं, गलियारे के दूसरे सिरे की एक सँकरी लकड़ी की सीढ़ी से, जो छत की तरफ़ जाती थी। एक हल्की, नीली-सफ़ेद रोशनी काँपती हुई उतर रही थी।
इरा उतरी। शॉल में लिपटी, मोबाइल की torch हाथ में, उसके बाल हवा से बिखरे, गाल ठंड से लाल। उसने उसे लाइब्रेरी के दरवाज़े पर देखा और रुक गई।
"आप यहाँ अंधेरे में क्या कर रहे हैं?"
विक्रांत ने उसे देखा। उसका दिमाग़ इस दृश्य को किसी ऐसी चीज़ में बदलने की कोशिश कर रहा था जो समझ में आए, और नहीं कर पा रहा था।
"आप कहाँ थीं?"
"छत पर।" उसने मोबाइल उठाकर दिखाया। "Lucknow फ़ोन करना था, अम्मी को। छत के उस कोने पर थोड़ा signal आता है। रघु काका ने बताया था।" वह उसके पास आई। "बिजली गई तो मैं वहीं थी। आधे घंटे से ऊपर थी, शायद ज़्यादा।"
"आधे घंटे से।"
"हाँ। क्यों?"
विक्रांत ने लाइब्रेरी के अंदर देखा। ख़ाली मेज़। ठंडा कप।
"आपने अभी जवाब दिया था," उसने कहा। उसकी आवाज़ उसे खुद अजनबी लगी, सपाट और दूर की। "दो मिनट पहले। मैंने आपको आवाज़ दी, और आपने कहा, 'हाँ, यहीं हूँ, लाइब्रेरी में।'"
इरा का चेहरा, torch की नीली रोशनी में, एक पल के लिए कुछ नहीं कह रहा था। फिर धीरे-धीरे, बहुत धीरे, उसका रंग उतरने लगा। उसके गालों की लाली, उसके होंठों का रंग, जैसे कोई तस्वीर पानी में धुल रही हो।
"मैंने कुछ नहीं कहा," उसने फुसफुसाया। "मैं छत पर थी। मैंने कुछ सुना भी नहीं। वहाँ से नीचे की कोई आवाज़ नहीं आती।"
"मैंने सुना। आपकी आवाज़। साफ़।"
इरा ने उसकी बाँह पकड़ ली। उसकी उँगलियाँ बर्फ़ जैसी ठंडी थीं, और वह उन्हें कसकर दबा रही थी।
"आपने..." उसकी आवाज़ में कुछ था जो विक्रांत ने उसमें पहले नहीं सुना था। डर नहीं, उससे ज़्यादा। एक तरह का पहचानता हुआ डर। जैसे किसी ने कोई ऐसी चीज़ देखी हो जिसके बारे में उसने सिर्फ़ पढ़ा था। "आपने मुझे पुकारा था? नाम लेकर? अंधेरे में?"
"हाँ। तो?"
इरा ने जवाब नहीं दिया। उसने उसकी बाँह छोड़ी, और अपनी हथेली अपने मुँह पर रख ली, जैसे हाट में उस छोटी लड़की ने रखी थी।
गलियारे के दूसरे सिरे पर एक पीली रोशनी हिली। रघु काका, लालटेन लिए, नंगे पैर, लोई कंधे पर अधूरी लिपटी, जैसे सोते से उठकर भागा हो। उसने दोनों को देखा। लाइब्रेरी का खुला दरवाज़ा। इरा का चेहरा।
"क्या हुआ?" उसकी आवाज़ फटी हुई थी। "किसने आवाज़ दी? मैंने सुना कोई..."
"मैंने," विक्रांत ने कहा। "इरा को।"
रघु काका की लालटेन उसके हाथ में काँपी। "आपने जवाब दिया? किसी को? किसी ने आपका नाम लिया और आपने..."
"नहीं।" विक्रांत ने सिर हिलाया। "उल्टा। मैंने पुकारा। और मुझे जवाब मिला। इरा की आवाज़ में। पर इरा छत पर थी।"
रघु काका ने उसे देखा।
और विक्रांत ने उसकी आँखों में कुछ ऐसा देखा जो पिछले चार दिनों में कभी नहीं देखा था। डर नहीं। वह तो हमेशा वहाँ था। यह कुछ और था।
उलझन।
बूढ़े का मुँह खुला, जैसे कुछ कहने वाला हो, और फिर बंद हो गया। उसकी नज़र इरा पर गई, फिर विक्रांत पर, फिर गलियारे के अंधेरे पर। जैसे वह किसी ऐसे नक़्शे को पढ़ रहा हो जिसे वह पचास साल से जानता था, और उसमें एक ऐसा रास्ता मिल गया हो जो उस पर कभी बना ही नहीं था।
"ऐसा..." उसने फुसफुसाया। "ऐसा नहीं होता।"
"क्या नहीं होता, काका?"
पर रघु काका मुड़ चुका था। धीरे-धीरे, लालटेन नीचे झुकाए, जैसे उसका वज़न बहुत बढ़ गया हो, वह रसोई की तरफ़ चला गया। उसके कदम अंधेरे में खो गए।
बिजली पौने ग्यारह बजे लौटी।
तब तक विक्रांत अपने कमरे में था, दरवाज़ा बंद, laptop चार्जिंग पर, और recorder की file उसकी timeline पर खुली।
उसने इरा की आवाज़ के samples निकाले। हाट वाले दिन की recording से, जब वे साथ चल रहे थे और उसकी जेब में recorder चल रहा था। लगभग चालीस मिनट की बातचीत। उसकी दादी के बारे में, दीवारों के बारे में, पुरानी चीज़ों के बारे में। उसकी असली आवाज़। उसकी साँस, उसकी हँसी, उसके रुकने के तरीके।
फिर उसने आज की file खोली।
उसके कदम, सीढ़ियों पर। गलियारे का अंधेरा, जो recording में भी महसूस होता था, एक भारी, दबाव भरी खामोशी। फिर उसकी अपनी आवाज़:
"इरा?"
गूँज। फिर खामोशी। फिर:
"हाँ, यहीं हूँ। लाइब्रेरी में।"
उसने उसे loop पर रखा।
फिर उसने वह किया जो वह अदालतों के लिए करता था। Voice comparison। दोनों samples, एक के ऊपर एक। Pitch contour। Formants, यानी आवाज़ के वे गूँजते हुए हिस्से जो हर इंसान के गले, मुँह और नाक की बनावट से तय होते हैं, उतने ही अनोखे जितनी उँगलियों की छाप।
उसका दिल धीमा हुआ।
वे मिलते थे।
Pitch: एक सौ चौरासी hertz के आसपास, दोनों में। पहला formant, दूसरा, तीसरा। उनका pattern, "हाँ" के "आ" में, "लाइब्रेरी" के "ई" में। "यहीं" पर लहजे का वह हल्का-सा उतार, लखनवी, जो इरा की आवाज़ में हर बार आता था।
किसी अदालत में, विक्रांत इस पर अपना नाम लिखकर कहता: same speaker। यह इरा की आवाज़ थी।
उसने इसे फिर सुना। फिर से। और इस बार उसने आवाज़ नहीं सुनी। उसने वह सुना जो आवाज़ के आसपास था।
और उसकी उँगलियाँ touchpad पर जम गईं।
हर इंसान बोलने से पहले साँस लेता है। यह अनिवार्य है, शरीर की बनावट है। फेफड़े हवा भरते हैं, और वह हवा आवाज़ बनकर बाहर निकलती है। Recording में यह साँस हमेशा होती है। एक हल्की, छोटी सिसकी जैसी आवाज़, वाक्य से ठीक पहले। फिर शब्दों के बीच, छोटे-छोटे विरामों में, होंठों का खुलना, जीभ का तालु से अलग होना, थूक की एक हल्की चटक। Mouth noise। Studio engineers इन्हें घंटों बैठकर हटाते हैं, क्योंकि ये हर जगह होते हैं। हर इंसानी आवाज़ में।
हाट वाली recording में, इरा की आवाज़ में, ये सब था। हर वाक्य से पहले एक छोटी साँस। "दादी" कहने से पहले होंठों की एक हल्की चट।
आज वाली recording में कुछ नहीं था।
"हाँ, यहीं हूँ। लाइब्रेरी में।" से पहले कोई साँस नहीं। शब्दों के बीच कोई mouth noise नहीं। कोई होंठ नहीं खुले, कोई जीभ नहीं हिली। बस आवाज़। साफ़, पूरी, एक खाली, बेजान सफ़ाई के साथ, जैसे किसी ने इरा की आवाज़ को उसके शरीर से निकालकर अकेले हवा में रख दिया हो।
और उसके पीछे की गूँज गलत थी।
विक्रांत ने reverb का माप लिया, बस यह साबित करने के लिए कि वह गलत है। लाइब्रेरी, ऊँची छत, लकड़ी की अलमारियाँ, किताबें जो आवाज़ सोख लेती हैं। वहाँ का reverb time आधा सेकंड से कम होना चाहिए था।
इस आवाज़ के पीछे की गूँज ढाई सेकंड लंबी थी।
वही गूँज जो उसने पहली रात उस फ़ोन पर सुनी थी। पत्थर की। गहरी। नीचे की तरफ़ फैली हुई। जैसे इरा लाइब्रेरी से नहीं, किसी बहुत बड़ी, बंद, अंधेरी जगह से बोल रही हो।
किसी कुएँ से।
विक्रांत ने laptop को अपने से थोड़ा दूर खिसकाया, जैसे वह गर्म हो। उसके दिमाग़ में कई बातें एक साथ, ठंडी स्पष्टता के साथ, अपनी जगह बैठ रही थीं।
उसने पुकारा था।
किसी ने जवाब दिया था। उस इंसान की आवाज़ में, जिसे उसने पुकारा था।
और वह इंसान वहाँ था ही नहीं।
वह file बंद करने वाला था, जब उसकी नज़र timeline के आगे के हिस्से पर पड़ी। Waveform पर, "लाइब्रेरी में" के बाद, कुछ सेकंड की खामोशी थी, जिसमें उसके अपने कदम थे, लाइब्रेरी की तरफ़ बढ़ते हुए, और उसकी अपनी आवाज़: "Lamp नहीं जलाई?"
उसके बाद, लगभग चार सेकंड आगे, waveform पर एक बहुत छोटी, बहुत पतली लहर थी। इतनी धीमी कि वह उसे देखते हुए भी लगभग चूक गया।
उसे याद था कि उस वक़्त उसने कुछ नहीं सुना था। कुछ भी नहीं। वह लाइब्रेरी के दरवाज़े तक चला था, उसे धकेला था, और अंदर कोई नहीं था।
उसने उस हिस्से को select किया। Gain बढ़ाया। बीस decibel। तीस। Noise floor नीचे खींचा। फिर headphones पूरे volume पर करके play दबाया।
वही आवाज़। इरा की। वही बेजान, साँस-रहित सफ़ाई। वही ढाई सेकंड की, पत्थर की, नीचे फैलती गूँज। पर इस बार बहुत पास से, बहुत धीमे, जैसे कोई ठीक उसके पीछे खड़ा होकर, उसके कंधे के ऊपर से, फुसफुसाकर पूछ रहा हो:
"...और तुम? तुम कहाँ हो?"
विक्रांत ने headphones उतार दिए। उसके हाथ उन्हें पकड़ने लायक नहीं रहे थे।
उसने वह सवाल सुना नहीं था। उस अंधेरे गलियारे में, उस पल, उसके कानों तक नहीं पहुँचा था। इसीलिए उसने उसका जवाब नहीं दिया था।
उसने सोचा कि अगर पहुँच जाता तो क्या होता। अगर वह इरा की आवाज़ सुनता, उस अंधेरे में, उस राहत भरे पल में, पूछती हुई कि वह कहाँ है।
वह जवाब दे देता। बिना एक पल सोचे।
हर कोई देता।
[Part 5 समाप्त]
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- जवाब मत देना
- Chapter
- 5 of 30
- Category
- Ghost Stories
- Reading time
- 19 min
- Words
- 3632
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
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