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Part 4: सलीम
Piyashi Atma · Ghost Stories · 19 मिनट
"मैं।"
यह शब्द लाइब्रेरी की ठंडी हवा में लटका रहा, जैसे किसी कुएँ में फेंका गया पत्थर, जिसके तली से टकराने की आवाज़ कभी नहीं आती।
विक्रांत ने रजिस्टर से हाथ हटा लिया। उसे एहसास भी नहीं हुआ था कि उसने उसे छुआ था, बिना gloves के, उँगलियाँ उस फटे किनारे पर टिकाए। उसकी उँगलियों के पोरों पर पुराने काग़ज़ की धूल थी, बारीक, सूखी, जैसे किसी तितली के पंख की।
"इसका मतलब कुछ भी हो सकता है," इरा ने कहा। बहुत सावधानी से, जैसे किसी ज़ख्म पर पट्टी रख रही हो।
"जैसे?"
"हो सकता है ये लिस्ट उन लोगों की न हो जो..." उसने शब्द ढूँढा, "...जो गए। हो सकता है ये उनकी हो जिन्हें चुना गया।"
विक्रांत ने उसकी तरफ़ देखा।
"चुना गया," उसने दोहराया। "किसके लिए?"
इरा ने जवाब नहीं दिया। उसने रजिस्टर का पन्ना पलटकर 1971 वाली उस बिखरी, काँपती लिखावट पर रोका। बारह नाम।
"हर पच्चीस-तीस साल में एक नाम," उसने धीरे से कहा। "एक परिवार की बही में। किसी गोले और लकीर वाले निशान के साथ। विक्रांत, मैंने पुराने ज़मींदारों के बहुत रजिस्टर देखे हैं। लगान के, क़र्ज़ के, मन्नतों के। ये उनमें से किसी जैसा नहीं है। ये..." वह रुकी। "ये किसी सौदे का हिसाब लगता है।"
"सौदा।"
"किसी चीज़ के बदले कुछ देना। बार-बार। हर पीढ़ी में।"
विक्रांत उठा और खिड़की तक गया। बाहर पूरा अंधेरा था, कोहरा काँच से सटा हुआ, जैसे कोई सफ़ेद चेहरा अंदर झाँक रहा हो। उसने अपना प्रतिबिंब देखा। धुँधला, आँखों की जगह दो काले गड्ढे।
उसके अंदर एक कहानी बन रही थी, अपने आप, टुकड़ों से। और उसे वह कहानी पसंद नहीं थी, क्योंकि उसमें एक ऐसी तर्कसंगतता थी जो उसके guilt के हर कोने में ठीक बैठती थी।
जनवरी 1999। परिवार किसी पुराने, बीमार रिवाज़ के तहत इस रजिस्टर में एक नाम लिखता है। नौ साल के बच्चे का नाम। बड़े बेटे का। उसका।
और फिर उसी रात दोनों बच्चे बावड़ी जाते हैं। वह अंशु को dare देता है। वह भाग जाता है। और अंशु...
अंशु मेरी जगह गया।
यह विचार उसके अंदर इतनी साफ़ आवाज़ में बोला कि उसे लगा जैसे किसी ने उसके कान में कहा हो।
"विक्रांत?"
"ये पन्ना किसने फाड़ा?" उसने बिना मुड़े पूछा।
"पता नहीं।"
"मैं पता करूँगा।"
उस रात वह थोड़ा सोया। दो घंटे, शायद तीन, बेचैन, उथली नींद, जिसमें कोई सपना नहीं था, बस एक लगातार एहसास कि वह कहीं गिर रहा है, धीरे-धीरे, अंधेरे में, और नीचे कोई तली नहीं है।
सुबह रसोई में रघु काका अँगीठी पर दूध गरम कर रहा था। विक्रांत ने रजिस्टर उसके सामने लकड़ी के पटरे पर रखा, उस फटे किनारे वाले पन्ने पर खोलकर।
रघु काका का हाथ दूध के भगोने पर जम गया। उसने रजिस्टर को देखा, फिर विक्रांत को, फिर फिर से रजिस्टर को। उसकी आँखों में वह भाव आया जो किसी ऐसे इंसान का होता है जिसने बरसों से किसी दरवाज़े को बंद रखा हो और अचानक उसे खुला पाए।
"ये कहाँ मिली?"
"लाइब्रेरी में। छिपाकर रखी थी।" विक्रांत ने उस नीली स्याही पर उँगली रखी। जनवरी 1999। 9 बरस। "ये पन्ना किसने फाड़ा, काका?"
रघु काका ने भगोना अँगीठी से उतारा। धीरे से। उसने पल्लू से हाथ पोंछे। उसका चेहरा कुछ नहीं कह रहा था, पर उसकी उँगलियाँ, विक्रांत ने देखा, लोई के किनारे को मरोड़ रही थीं।
"बड़े साहब ले गए थे," उसने आख़िरकार कहा।
"पापा?"
"उस रात के बाद। जिस सुबह आप लोग गए।" रघु काका की आवाज़ बहुत धीमी थी, अँगीठी की चटचटाहट के लगभग बराबर। "मैंने देखा था। लाइब्रेरी में खड़े थे, ये किताब हाथ में। रो रहे थे। फिर पन्ना फाड़ा, मोड़ा, जेब में रखा, और किताब ऊपर रख दी। मुझसे कहा, इसे कोई न छुए।"
"उस पन्ने पर क्या लिखा था?"
"मैंने नहीं पढ़ा।"
"काका।"
"मैंने नहीं पढ़ा," रघु काका ने दोहराया, और इस बार उसने विक्रांत की आँखों में सीधे देखा। "मुझे पढ़ना नहीं आता, बाबू।"
यह सच था या झूठ, विक्रांत तय नहीं कर पाया। उसने रजिस्टर बंद किया।
पापा। वह सख़्त, चुप आदमी जिसने तेईस साल तक इस कोठी का नाम नहीं लिया। जिसने 2003 में Delhi से फ़ोन करके यहाँ की line कटवाई। जिसने मरते वक़्त उसकी कलाई पकड़कर कहा था, सीढ़ियाँ मत गिनना।
Delhi में, पापा के flat में, उनके पलंग के नीचे, एक पुराना स्टील का ट्रंक था। हरा, ताला लगा, जिसके बारे में विक्रांत को हमेशा बताया गया था कि उसमें "पुराने काग़ज़ हैं, ज़मीन-जायदाद के"। अंतिम संस्कार के बाद उसने ताले की चाबी पापा के बटुए में देखी थी, और उसे छुआ तक नहीं था। अब उसे वह चाबी याद आई, छोटी, पीतल की, एक लाल धागे में बँधी।
उसने मन में दर्ज किया। Delhi। ट्रंक।
कबीर दस बजे के आसपास लौटा, एक किराए की Scorpio में, जो पुलिया पर नहीं रुकी। ड्राइवर उसे फाटक तक छोड़कर इतनी तेज़ी से पलटा कि बजरी उछलकर दीवार से टकराई।
कबीर थका हुआ लग रहा था। उसकी jacket सिलवटों भरी थी, दाढ़ी बढ़ी हुई, आँखें लाल। उसने विक्रांत को आँगन में देखा और मुस्कुराने की कोशिश की।
"Registry office वाले साले," उसने कहा। "एक काग़ज़ के लिए तीन चक्कर।"
विक्रांत ने कुछ नहीं कहा।
वह कुछ कहता, इससे पहले फाटक पर खटखटाहट हुई। लोहे पर किसी पत्थर या सिक्के की, तेज़, बार-बार।
रघु काका ने फाटक खोला।
बाहर दो लोग थे। एक बूढ़ी औरत, साठ के ऊपर, काले बुर्के में, जिसका चेहरे वाला हिस्सा खुला था। चेहरा सूजा हुआ, आँखें धँसी हुईं, जैसे बहुत दिनों से रोई हो और अब आँसू ख़त्म हो गए हों। उसके साथ एक लड़का, बीस-बाईस का, दुबला, सस्ती jacket, गले में मफ़लर, और हाथ में एक मोबाइल जिसे वह ऐसे पकड़े था जैसे वह कोई हथियार हो।
कबीर का चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
"साहब कहाँ हैं?" लड़के ने कहा। फिर उसकी नज़र कबीर पर पड़ी। "आप। आप हैं।"
"इमरान..." कबीर आगे बढ़ा, दोनों हाथ उठाए, जैसे किसी भड़के जानवर को शांत कर रहा हो। "मैंने कहा था न, फ़ोन कर लेना। यहाँ आने की..."
"फ़ोन?" लड़का, इमरान, उसकी तरफ़ बढ़ा। उसकी आवाज़ काँप रही थी, गुस्से से। "तीन महीने से फ़ोन कर रहे हैं साहब। आप उठाते नहीं। थाने वाले कहते हैं केस बंद। कहते हैं भाई भाग गया। भाग गया!" उसने हँसने जैसी आवाज़ निकाली, फटी हुई। "अम्मी को बिना बताए? अपनी तनख़्वाह छोड़कर? अपनी बाइक यहीं छोड़कर?"
बूढ़ी औरत आगे आई। उसने इमरान की बाँह पर हाथ रखा, और लड़का चुप हो गया। फिर उसने कबीर को नहीं, विक्रांत को देखा। शायद इसलिए कि वह नया चेहरा था। शायद इसलिए कि वह चुप था।
"आप इस कोठी के मालिक हैं?" उसने पूछा। उसकी आवाज़ में गुस्सा नहीं था। बस एक भयानक, ठहरी हुई थकान।
"जी।" विक्रांत ने कहा। "आधा।"
"मेरा बेटा सलीम," उसने कहा। "इनकी survey में काम करता था। Machine चलाता था, नाप-जोख की। सितंबर की चौदह तारीख़ को यहाँ आया था। शाम को फ़ोन किया था, बोला अम्मी देर हो जाएगी, साहब ने रात तक रोका है, कोई कुआँ नापना है। फिर फ़ोन नहीं आया। फिर कभी नहीं आया।"
उसने अपने बुर्के के अंदर से एक मुड़ा हुआ काग़ज़ निकाला। एक photo का printout। एक हँसता हुआ नौजवान, घुँघराले बाल, हल्की मूँछें, हाथ में एक पीली survey machine लिए, किसी खेत में खड़ा।
"यही है।" उसने काग़ज़ विक्रांत की तरफ़ बढ़ाया। "आपने देखा है इसे?"
विक्रांत ने photo ली। उस हँसते चेहरे को देखा। उसके पीछे सुबह की धूप थी, खुला आसमान। इस गाँव से बहुत दूर की धूप।
"नहीं," उसने कहा। "मैं तीन दिन पहले आया हूँ।"
बूढ़ी औरत ने सिर हिलाया, जैसे उसे यही जवाब पता था, जैसे उसने यह जवाब बहुत बार सुना था।
"वो भागा नहीं है," उसने कहा। कबीर की तरफ़ नहीं, किसी की तरफ़ नहीं। "वो यहीं है। कहीं।"
"आंटी, प्लीज़..." कबीर की आवाज़ टूट रही थी। "मैंने police को सब बता दिया। उस दिन काम ख़त्म होने के बाद वो चला गया था। मैंने खुद उसे फाटक से निकलते..."
"आपने देखा था?" विक्रांत ने बिना सोचे पूछा।
कबीर ने उसकी तरफ़ देखा, और एक पल, बस एक पल, उसकी आँखों में कुछ गिड़गिड़ाता हुआ था। मत पूछ। अभी नहीं। यहाँ नहीं।
"हाँ," उसने कहा। "देखा था।"
विक्रांत ने उसकी आवाज़ सुनी। सवाल के बाद, जवाब से पहले, वह ठहराव। वह माइक्रो-सेकंड। उसने इसे सैकड़ों interrogation tapes में सुना था।
कबीर झूठ बोल रहा था।
इमरान ने अपना मोबाइल उठाया।
"उसका फ़ोन कभी नहीं मिला," उसने कहा। उसकी आवाज़ अब शांत थी, एक अजीब, ठंडी शांति, जैसे किसी ऐसे इंसान की जिसने कुछ तय कर लिया हो। "Police ने location निकाली थी। Last location। जानते हैं कहाँ की थी?"
उसने उँगली उठाई और कोठी की तरफ़ इशारा किया। उसके पीछे की तरफ़।
"यहाँ की। चौदह सितंबर, रात ग्यारह बजकर बावन मिनट। उसके बाद फ़ोन बंद।"
"Battery ख़त्म हो गई होगी," कबीर ने कमज़ोर-सी आवाज़ में कहा।
इमरान ने उसे अनदेखा किया। "मैं हर रोज़ उसे फ़ोन करता हूँ। हर रात। ताकि अगर कहीं... अगर किसी दिन..." वह रुका। उसने अपने मोबाइल पर एक नंबर dial किया। Speaker पर।
Ring की आवाज़ नहीं आई। एक लंबी, सपाट खामोशी, फिर एक recorded आवाज़: आप जिस नंबर से संपर्क करना चाहते हैं, वह अभी उपलब्ध नहीं है...
इमरान ने काटा। फिर से dial किया। आप जिस नंबर से...
"तीन महीने से," उसने कहा। "हर रात।"
उसने फिर से dial किया। उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं।
इस बार recorded आवाज़ नहीं आई।
इस बार कुछ नहीं आया। न ring, न message। बस वह खामोशी, एक खुली line की खामोशी। इमरान ने स्क्रीन देखी। Calling... का शब्द टिमटिमा रहा था, और नीचे सेकंड गिने जा रहे थे। 00:04। 00:05। 00:06।
"Connect हो रहा है," उसने फुसफुसाया। उसकी आँखें फैल गईं। "अम्मी, connect हो..."
और विक्रांत ने उसे सुना।
बहुत दूर। बहुत धीमा। इतना धीमा कि अगर उसके कान बारह साल से tape की hiss में फुसफुसाहटें ढूँढने के आदी न होते, तो वह उसे कभी न पकड़ पाते। कोठी के पीछे से। पीछे के आँगन से। और नीचे से, ज़मीन के नीचे से, जैसे किसी बहुत गहरी जगह से उठकर पत्थर की दीवारों से टकराती हुई ऊपर आ रही हो।
एक धुन। एक सस्ते मोबाइल की ringtone। किसी पुराने फ़िल्मी गाने की पतली, electronic धुन, दबी हुई, गूँज में लिपटी हुई।
विक्रांत ने अपना सिर पीछे की तरफ़ घुमाया। उसकी साँस रुक गई।
"आपको..." उसने कहा, "...आपको सुनाई दे रहा है?"
सबने उसकी तरफ़ देखा।
"क्या?" कबीर ने कहा।
"Ringtone। पीछे से। बावड़ी से।"
कबीर ने उसे ऐसे देखा जैसे वह कोई दूसरी भाषा बोल रहा हो। बूढ़ी औरत ने अपना सिर झुकाकर सुना, आँखें बंद करके। इमरान ने अपना मोबाइल कान से हटाया और आँगन के पीछे की तरफ़ गर्दन घुमाई।
विक्रांत ने अपने कानों पर ज़ोर डाला। वह अब भी थी। कमज़ोर, लगभग मिटती हुई, पर वहाँ। धुन के बीच-बीच में एक खिंचाव था, जैसे गूँज उसे लंबा कर रही हो, फिर छोड़ रही हो।
"मुझे कुछ नहीं..." इमरान ने कहा। फिर उसकी आँखें बदल गईं। "कहाँ? किधर?"
उसने कबीर को धक्का दिया और कोठी के अंदर भागा।
"इमरान, रुको!" कबीर उसके पीछे लपका। विक्रांत भी।
गलियारा। लंबा, सँकरा, नीची छत। इमरान को रास्ता नहीं पता था, पर विक्रांत ने उसे इशारा किया, और वह भागा, उसके पैर लकड़ी के तख़्तों पर धमकते हुए। पीछे के दरवाज़े पर, जिस पर रघु काका की कीलें काँटों की तरह उभरी थीं, उसने कुंडी खोली और बाहर निकल गया।
पीछे का आँगन। कोहरा। ठंड। बीच में बावड़ी का काला, जाली से ढका मुँह।
इमरान दौड़कर जाली तक पहुँचा, घुटनों के बल गिरा, और उसके चेहरे को लोहे की सलाखों से सटा दिया। मोबाइल अब भी उसके हाथ में था, स्क्रीन पर सेकंड गिनते हुए। 00:31। 00:32।
"सुनाई दे रहा है?" उसने पागलों की तरह विक्रांत की तरफ़ देखा। "कहाँ? मुझे बताइए कहाँ!"
विक्रांत जाली के पास खड़ा हुआ। उसने सुना।
धुन यहाँ ज़्यादा साफ़ थी। ज़्यादा नहीं, पर थोड़ी। और वह ऊपर से नहीं आ रही थी, पहली सीढ़ियों से नहीं। वह बहुत नीचे से आ रही थी। इतनी नीचे कि उसकी गूँज ऊपर पहुँचते-पहुँचते तीन-चार बार दीवारों से टकरा चुकी थी, हर टक्कर पर थोड़ी और पतली, थोड़ी और बिगड़ी हुई।
"नीचे," उसने कहा। "बहुत नीचे।"
इमरान ने सलाखों को पकड़कर हिलाया। जाली नहीं हिली। उसके ऊपर रखी पत्थर की पटिया नहीं हिली। उसने अपना मुँह सलाखों के बीच की जगह पर लगाया, गहरी साँस ली, और विक्रांत ने देखा कि वह चिल्लाने वाला है। अपने भाई का नाम। उस अंधेरे में।
"सलीम भा..."
एक हाथ उसके मुँह पर आकर पड़ा।
झुर्रियों भरा, सख़्त, बूढ़ा हाथ। रघु काका। वह कब आया, किसी ने नहीं देखा। उसने इमरान के मुँह को इतनी ज़ोर से दबाया कि लड़के का सिर पीछे झुक गया। दूसरे हाथ से उसने उसे जाली से पीछे खींचा।
"नहीं," रघु काका ने कहा। उसकी आवाज़ में कोई उतार-चढ़ाव नहीं था, पर उसकी आँखें, विक्रांत ने देखा, फटी हुई थीं, जैसे किसी ऐसी चीज़ को देख रही हों जो दूसरों को नहीं दिख रही। "यहाँ नहीं। यहाँ नाम नहीं।"
इमरान छटपटाया। बूढ़े की पकड़ नहीं छूटी।
"बेटा, सुन," रघु काका ने उसके कान में, बहुत धीमे, लगभग प्यार से कहा। "अगर वो यहाँ है, तो तेरी आवाज़ उसे नहीं, किसी और को मिलेगी। समझा? किसी और को।"
इमरान ने छटपटाना बंद कर दिया। उसकी आँखें रघु काका पर टिकी थीं, फैली हुई, समझने की कोशिश करती हुई।
मोबाइल उसके हाथ से छूटकर पत्थर पर गिरा। स्क्रीन ऊपर की तरफ़। 00:47। फिर स्क्रीन बदली। Call ended।
विक्रांत ने सुना।
धुन ख़त्म हो चुकी थी। बावड़ी के नीचे से अब कुछ नहीं आ रहा था। बस वह गहरी, खुली खामोशी, जिसमें, अगर बहुत ध्यान से सुनो, तो लगता है कि तली बहुत दूर है। बहुत दूर।
उन्होंने इमरान और उसकी माँ को बहुत देर तक समझाया। या यूँ कहें, कबीर ने समझाया, और बाकी चुप रहे। कि बावड़ी दो बार check हुई है। कि police उतरी थी, पहले तल तक। कि नीचे पत्थर गिरे हुए हैं, रास्ता बंद है। कि विक्रांत को शायद वहम हुआ। "ये lab वाले हैं, इनके कान बहुत sensitive हैं, हर आवाज़ में कुछ न कुछ सुन लेते हैं।"
विक्रांत ने इसका खंडन नहीं किया। पर जब इमरान ने उसकी तरफ़ देखा, एक लंबी, सवालिया नज़र, तो उसने भी नज़र नहीं फेरी।
बूढ़ी औरत ने जाते वक़्त एक बार पीछे मुड़कर कोठी को देखा। फिर विक्रांत को।
"आपने सुना था न?" उसने पूछा। बहुत धीमे। "सच में?"
विक्रांत ने एक पल सोचा।
"हाँ," उसने कहा।
उसने सिर हिलाया। उसकी आँखों में आँसू नहीं आए। बस कुछ और ठहर गया, और गहरा। फिर वह मुड़ी और अपने बेटे की बाँह पकड़कर कोहरे में चली गई।
शाम को, अँगीठी के पास, विक्रांत ने कबीर से कुछ नहीं पूछा।
यह जानबूझकर था। Lab में उसने सीखा था कि झूठ बोलने वाले से बहस करने का कोई फ़ायदा नहीं। उसे बस बोलने दो। हर झूठ के लिए दो और झूठ चाहिए। और हर झूठ में कोई दरार होती है।
कबीर ख़ुद ही बोला। दूसरे गिलास के बाद।
"वो भागा था, यार।" उसने आग में देखते हुए कहा। "सच में। लड़का क़र्ज़ में था, जुआ खेलता था। उसके घरवालों को नहीं पता। Police ने बताया मुझे।"
"फ़ोन की last location यहाँ की थी।"
"तो? फ़ोन यहीं फेंक गया होगा। ताकि trace न हो।"
"बावड़ी में?"
कबीर ने उसकी तरफ़ देखा। "तुझे सच में लगता है तूने ringtone सुनी? तीन महीने बाद? किस battery पर चल रहा होगा वो फ़ोन, विक्रांत?"
यह सवाल विक्रांत के अपने दिमाग़ में दोपहर से घूम रहा था, और उसके पास इसका कोई जवाब नहीं था। तीन महीने। कोई फ़ोन इतने दिन standby पर नहीं रहता। और कोई network उस गहराई तक, पत्थर की सात तलों की दीवारों के नीचे, signal नहीं पहुँचाता।
पर उसने सुना था।
या तुम्हें लगता है कि सुना था।
"तू survey वाली रात यहीं था," विक्रांत ने कहा। सवाल नहीं, बात।
कबीर का गिलास उसके होंठों पर रुका।
"Police report में लिखा है?" विक्रांत ने आगे पूछा। "कि तू रात ग्यारह बावन पर कहाँ था?"
कबीर ने गिलास नीचे रखा। बहुत धीरे। उसकी आँखें आग पर टिकी रहीं।
"मैं सोने जा रहा हूँ," उसने कहा, और उठ गया।
उस रात, कबीर के कमरे में जाने के बाद, विक्रांत टॉर्च लेकर पीछे के आँगन में गया।
वह बावड़ी को ठीक से देखना चाहता था। अकेले। बिना किसी के चेहरे, बिना किसी के डर के बीच में। जैसे वह किसी crime scene को देखता।
कोहरा ज़मीन से लिपटा था, घुटनों तक। उसकी टॉर्च की रोशनी उसमें घुसती और एक सफ़ेद, बेजान चमक में बिखर जाती। आँगन की पटियाँ नमी से काली थीं, और उन पर ओस की एक पतली परत जम रही थी, जो टॉर्च की रोशनी में बारीक चाँदी की तरह झिलमिला रही थी।
वह जाली के पास घुटनों के बल बैठा।
बोल्ट। चार। हर कोने पर एक। दो पुराने, जंग से भूरे, धागे घिसे हुए। दो नए, चमकदार, steel के, जिनके सिरों पर spanner के ताज़ा निशान थे। किसी ने इन्हें खोला था, और फिर, हड़बड़ी में, शायद, पुराने की जगह नए कस दिए थे।
पत्थर की पटिया पर, उसके किनारे के पास, नीले चॉक की एक धुँधली लकीर थी, जो ओस में आधी घुल चुकी थी। एक तीर का निशान, नीचे की तरफ़। और उसके बगल में, आधे मिटे अक्षर, किसी surveyor की तेज़, काम-चलाऊ लिखावट में:
L1 → L7 — depth?
विक्रांत ने उसे देखा। सलीम का लिखा। शायद आख़िरी चीज़ जो उसने लिखी थी।
उसने टॉर्च नीचे, जाली के बीच से अंदर की तरफ़ की। पहली सीढ़ियाँ दिखीं। पत्थर की, चौड़ी, घिसी हुई, एक के नीचे एक, अंधेरे में उतरती। सूखी। धूल भरी। सूखे पत्ते, किसी चिड़िया का पंख। पहले तल का चबूतरा, उसकी मेहराबें, और उसके बाद रोशनी ख़त्म।
सब कुछ वैसा ही था जैसा दिन में था। सूखा।
वह उठा। उसके घुटने ओस से गीले हो गए थे। उसने एक आख़िरी बार आँगन पर नज़र डाली और वापस मुड़ा।
उसने उन्हें सुबह देखा।
सुबह, जब कोहरा थोड़ा उठा था और आसमान फीके, बीमार सलेटी रंग का था। वह रात भर ठीक से सोया नहीं था, और सात बजे से पहले ही नीचे उतर आया था, चाय के लिए नहीं, बस इसलिए कि कमरे की दीवारें उसे घूर रही थीं।
पीछे के दरवाज़े पर पहुँचकर वह रुक गया।
दरवाज़ा खुला था।
रघु काका रोज़ रात उसे बंद करता था, कुंडी लगाता था, और विक्रांत ने कल रात ख़ुद लौटकर उसे बंद किया था। उसे याद था। उसने कुंडी की ठंडी धातु अपनी उँगलियों में महसूस की थी।
अब वह खुला था। एक हाथ भर। और कुंडी नीचे लटक रही थी।
उसने दरवाज़ा पूरा खोला।
पीछे के आँगन की पटियों पर ओस जमी थी, एक बारीक, सफ़ेद, अछूती परत। जैसे किसी ने पूरे आँगन पर बारीक नमक छिड़क दिया हो। उस परत में उसके कल रात के निशान थे, उसके जूतों के, बावड़ी तक जाते और लौटते, अब आधे भरे हुए।
और उनके बगल में, दूसरे निशान।
विक्रांत ने उन्हें पहले समझा नहीं। फिर समझा, और उसकी रीढ़ में एक ठंडी लकीर ऊपर से नीचे उतर गई।
पैरों के निशान। नंगे पैरों के। ओस की सफ़ेद परत में गहरे, काले, गीले, जैसे जिस पैर ने उन्हें बनाया था वह ख़ुद पानी से भीगा था। हर निशान में पाँच छोटी उँगलियों के गोल धब्बे साफ़ दिख रहे थे, और एड़ी का अंडाकार गड्ढा।
वे छोटे थे।
बहुत छोटे। विक्रांत ने अपने जूते को एक निशान के बगल में रखा। निशान उसके जूते के आधे से थोड़ा ज़्यादा था।
एक बच्चे के पैर।
वे दरवाज़े से शुरू होते थे, उसके पैरों के ठीक पास से, और आँगन पार करते हुए एक सीधी, बिना हिचकिचाहट वाली लकीर में बावड़ी की तरफ़ जाते थे। धीमे नहीं, भागते हुए नहीं। एक-एक कदम, बराबर दूरी पर, जैसे कोई बच्चा किसी ऐसी जगह की तरफ़ चल रहा हो जिसका रास्ता उसे अच्छी तरह पता हो।
विक्रांत उनका पीछा करता हुआ आगे बढ़ा, अपने पैर उनसे दूर रखते हुए, जैसे किसी crime scene पर चलते हैं।
निशान बावड़ी के चबूतरे तक गए। पत्थर की पटिया के किनारे तक। जाली तक।
और वहीं ख़त्म हो गए।
जाली के ठीक सामने, आख़िरी दो निशान, दोनों पैर एक साथ, अगल-बगल। जैसे बच्चा वहाँ रुका हो। खड़ा हुआ हो। नीचे देखा हो।
और फिर... उसके आगे कुछ नहीं। सलाखें थीं, जिनके बीच की जगह में मुश्किल से एक हाथ जा सकता था। उनके ऊपर पत्थर की भारी पटिया थी, अपनी जगह पर, बिना हिली। नए बोल्ट कसे हुए।
विक्रांत ने चारों तरफ़ देखा। आँगन की ओस में कोई और निशान नहीं था। वापस आते हुए कोई निशान नहीं। किसी दीवार की तरफ़ जाता हुआ नहीं। कोई निशान नहीं जो कहता हो कि वह बच्चा, वह जो भी था, यहाँ से कहीं और गया।
अंदर गया था। बाहर नहीं आया।
उसके कान में अपनी ही धड़कन बज रही थी। वह मुड़ा, उस लकीर को उलटा देखा, बावड़ी से दरवाज़े तक। और फिर उसने वह किया जो उसका दिमाग़ करना नहीं चाहता था, पर उसकी professional आदत ने करवाया।
उसने निशानों को उनके source तक खोजा।
दरवाज़े पर निशान ख़त्म नहीं होते थे। वे दहलीज़ पार करके अंदर, गलियारे में जाते थे। गलियारे के लकड़ी के फ़र्श पर ओस नहीं थी, पर निशान वहाँ भी थे। गीले, धुँधले, आधे सूखे, लकड़ी पर पानी के काले धब्बे, छोटे-छोटे पैरों के आकार में। गलियारे के बीच से होते हुए। सीढ़ियों तक।
विक्रांत सीढ़ियाँ चढ़ा। धीरे। हर सीढ़ी पर एक धब्बा, आधा सूखा, किनारों पर पानी की एक पतली लकीर।
ऊपर, फ़ोन वाले स्टूल के पास से। गलियारे में। उसके कमरे की तरफ़।
निशानों की लकीर उसके दरवाज़े पर जाकर रुकी।
उसके दरवाज़े के ठीक बाहर वाले तख़्ते पर। उसी तख़्ते पर जो दो रात पहले बर्फ़ जैसा ठंडा था। वहाँ पानी का एक छोटा-सा गड्ढा था, अब भी गीला, दो छोटे पैरों के आकार में। अगल-बगल। जैसे कोई बच्चा वहाँ बहुत देर तक खड़ा रहा हो। बहुत, बहुत देर तक। बंद दरवाज़े के सामने। इंतज़ार करता हुआ।
और फिर, किसी पल, उसने इंतज़ार करना छोड़ दिया हो। मुड़ा हो। और नीचे चला गया हो।
विक्रांत उस गीले निशान को देखता रहा। उसके पैरों के आकार को। उसकी छोटी, गोल उँगलियों को।
उसे याद आया कि वह कल रात कितनी देर तक अपने कमरे में जागा पड़ा रहा था। दरवाज़े से कुछ फ़ुट दूर। और उसने कुछ नहीं सुना था। एक भी आहट नहीं।
पर यह बात उसे उतना नहीं डरा रही थी, जितनी दूसरी बात।
निशानों की लकीर उसके दरवाज़े से शुरू होकर बावड़ी तक गई थी। वहाँ से आई नहीं थी। जो भी उसके दरवाज़े के बाहर खड़ा था, वह बावड़ी से निकलकर नहीं आया था।
वह यहीं से चला था। ऊपर से। उसके दरवाज़े से।
जैसे वह कहीं बाहर से अंदर नहीं आया था।
जैसे वह पूरी रात अंदर ही था।
[Part 4 समाप्त]
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- जवाब मत देना
- Chapter
- 4 of 30
- Category
- Ghost Stories
- Reading time
- 19 min
- Words
- 3714
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
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