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Part 3: गूँगी बेगम

Piyashi Atma · Ghost Stories · 22 मिनट

विक्रांत ने दरवाज़ा नहीं खोला।
वह पलंग के किनारे बैठा रहा, laptop अभी भी घुटनों पर, screen पर वह पच्चीसवीं spike जमी हुई, एक छोटी नुकीली लकीर जो किसी ऐसे कदम की थी जो अभी-अभी उठाया गया था। उसके दरवाज़े से छह फ़ुट दूर।
लालटेन की लौ अब भी दरवाज़े की तरफ़ झुकी थी। सीधी नहीं, बल्कि लंबी और पतली होकर किसी अदृश्य धागे से खिंचती हुई, जैसे दरवाज़े के उस पार कोई साँस अंदर खींच रहा हो और कमरे की हवा उसके पीछे-पीछे जा रही हो।
और गंध लौट आई थी। गीला पत्थर। काई। किसी बंद कुएँ की तली की गंध।
विक्रांत ने अपनी साँस रोकी और सुना। उसके कान, जो बारह साल से tape की hiss में फुसफुसाहटें ढूँढते आए थे, अब दरवाज़े की लकड़ी के पार कुछ ढूँढ रहे थे। साँस। कपड़े की सरसराहट। फ़र्श के तख़्ते का किसी वज़न के नीचे दबना।
कुछ नहीं।
पर कुछ था। उसे यह पता था, उसी तरह जैसे अंधेरे कमरे में घुसते ही पता चल जाता है कि वहाँ कोई और भी है, बिना कुछ देखे, बिना कुछ सुने। हवा का दबाव अलग होता है। खामोशी का आकार अलग होता है।
उसकी नज़र दरवाज़े के नीचे की दरार पर गई।
गलियारे का बल्ब जल रहा था, और दरवाज़े के नीचे की आधे इंच की दरार से उसकी पीली रोशनी एक पतली पट्टी बनकर कमरे के फ़र्श पर पड़ रही थी। पूरी, साफ़, एक सिरे से दूसरे सिरे तक।
विक्रांत उस पट्टी को देखता रहा, और धीरे-धीरे उसकी गर्दन के पीछे के बाल खड़े होने लगे।
अगर दरवाज़े के ठीक बाहर कोई खड़ा होता, तो उस रोशनी में दो काले टुकड़े होते। दो पैरों की परछाइयाँ।
पट्टी पूरी थी। कहीं कोई टुकड़ा नहीं।
कदम वहीं रुका था। उसने उसे सुना था। पर दरवाज़े के बाहर खड़े होने के लिए जिस चीज़ को पैरों की ज़रूरत होती, वह वहाँ नहीं थी।
वह कितनी देर ऐसे बैठा रहा, उसे नहीं पता। दस मिनट। आधा घंटा। उसकी टाँगें सुन्न हो गईं, कंधों में दर्द होने लगा। फिर किसी पल, बिना किसी आवाज़ के, लालटेन की लौ धीरे-धीरे सीधी हो गई। गंध पतली हुई और कमरे की सामान्य, सूखी, धूल भरी ठंड में घुल गई।
विक्रांत उठा। उसके घुटने चटके। उसने दरवाज़े की कुंडी पर हाथ रखा, एक लंबी साँस ली, और खोला।
गलियारा खाली था। बल्ब अपनी थकी हुई रोशनी में काँप रहा था। दूर, सीढ़ियों के ऊपर, फ़ोन अपने स्टूल पर चुप बैठा था।
उसने नीचे देखा। दरवाज़े के ठीक बाहर वाले तख़्ते पर। कुछ नहीं था। न कोई निशान, न मिट्टी, न पानी।
उसने झुककर हथेली तख़्ते पर रखी।
वह ठंडा था। बाकी फ़र्श से ज़्यादा ठंडा। जैसे किसी ने अभी-अभी उस पर बर्फ़ का एक टुकड़ा रखकर उठाया हो। विक्रांत ने बगल वाले तख़्ते को छुआ। सामान्य, लकड़ी की हल्की गर्माहट। फिर वापस पहले वाले पर।
बर्फ़।
वह वहाँ घुटनों के बल बैठा रहा, हथेली उस ठंडे तख़्ते पर टिकाए, और महसूस करता रहा कि कैसे वह ठंड धीरे-धीरे, बहुत धीरे, उसकी हथेली की गर्मी में घुलकर ख़त्म हो रही थी। जैसे कोई निशान मिट रहा हो।
सुबह कबीर Bahraich चला गया था। "Registry office का काम है, शाम तक आ जाऊँगा," उसने रघु काका से कहलवाया था, विक्रांत से मिले बिना।
विक्रांत ने नाश्ते में बस चाय पी। उसकी आँखें जल रही थीं और सिर में एक धीमी, लगातार धमक थी, जैसे कोई दूर कहीं ढोल बजा रहा हो। उसे कोठी से बाहर निकलना था। कुछ घंटों के लिए ही सही। दीवारों से दूर, गलियारों से दूर, उस फ़ोन से दूर।
"काका, यहाँ बाज़ार कहाँ लगता है? मुझे batteries चाहिए। और कोई जगह जहाँ signal आता हो।"
रघु काका ने आटा गूँधना रोका। "आज बिरस्पत है। चौक पर हाट लगती है।" उसने एक पल रुककर जोड़ा, "दोपहर से पहले लौट आइएगा।"
"क्यों?"
"कोहरा फिर से उतरता है।"
विक्रांत bag उठाकर फाटक की तरफ़ बढ़ा तो लाइब्रेरी का दरवाज़ा खुला और इरा बाहर आई, शॉल ओढ़े, एक छोटी diary हाथ में।
"हाट जा रहे हैं?"
"हाँ।"
"मैं भी चलूँ? गाँव के कुछ बुज़ुर्गों से बात करनी है। कोठी के पुराने काग़ज़ों में कुछ नाम हैं जो मुझे समझ नहीं आ रहे।" उसने उसके चेहरे को देखा। "और आपको शायद किसी ऐसे की ज़रूरत है जो रास्ते में आपसे बात करता रहे।"
"इतना बुरा दिख रहा हूँ?"
"हाँ," इरा ने सहजता से कहा, और पहली बार विक्रांत हल्का-सा मुस्कुराया।
कोहरा दिन में पतला था, पर गया नहीं था। सूरज कहीं ऊपर एक फीका, सफ़ेद सिक्का था जिसकी रोशनी ज़मीन तक पहुँचते-पहुँचते थककर बिखर जाती थी। रास्ते के दोनों तरफ़ खेतों में सरसों के पीले फूल थे, पर कोहरे में उनका रंग भी धुँधला, बीमार-सा लग रहा था।
"आपने पूछा था कल," इरा ने चलते हुए कहा, "कि मैंने रात को फ़ोन सुना या नहीं।"
विक्रांत चुप रहा।
"आप मुझे बताना चाहते हैं क्या हुआ था? या नहीं?"
उसने एक पल सोचा। फिर उसे सब बताया। लगभग सब। घंटी, कटा हुआ तार, दीवार के अंदर की काई, junction box की गाद और घोंघे का खोल। Calibration walk। वे कदम जो हर बार आधा सेकंड पहले आए थे। पच्चीसवाँ कदम। दरवाज़े के नीचे की अटूट रोशनी।
उसने माँ की आवाज़ नहीं बताई। उसके बारे में बोलने के लिए उसके गले में शब्द ही नहीं बने।
इरा ने पूरी बात बिना टोके सुनी। जब वह चुप हुआ, तो वह कुछ कदम चुप चलती रही।
"आप मुझ पर हँस नहीं रहीं," विक्रांत ने कहा।
"आप forensic audio analyst हैं। आपकी गवाही पर लोगों को सज़ा होती है। अगर आप कह रहे हैं कि recording में ऐसा है, तो recording में ऐसा है।" उसने कंधे उचकाए। "उसका मतलब क्या है, वह अलग सवाल है।"
"आपको क्या लगता है उसका मतलब क्या है?"
इरा ने जवाब देने में थोड़ा समय लिया।
"मेरी दादी को आख़िरी सालों में भूलने की बीमारी थी," उसने कहा। "Dementia। वो चीज़ें भूल जाती थीं, लोग भूल जाती थीं, कभी-कभी अपना नाम भी। पर एक चीज़ वो कभी नहीं भूलीं। लखनऊ के हमारे पुराने घर की एक कोठरी, जिसके बारे में वो कहती थीं कि वहाँ की दीवारें बातें याद रखती हैं। कि अगर तुम रात को वहाँ बैठो तो तुम्हें वो बातें सुनाई देंगी जो सौ साल पहले वहाँ बोली गई थीं।" उसने सामने देखते हुए कहा। "हम सब उसे बीमारी समझते थे।"
"और आप?"
"मैं archivist हूँ, विक्रांत। मेरा पूरा काम यह मानने पर टिका है कि चीज़ें अतीत को अपने अंदर रखती हैं। काग़ज़, स्याही, पत्थर।" उसने उसकी तरफ़ देखा। "मुझे नहीं पता कि एक दीवार आवाज़ याद रख सकती है या नहीं। पर मुझे यह पता है कि डर लोगों को उतना बेवकूफ़ नहीं बनाता जितना हम सोचते हैं। अगर पूरा गाँव दीवारों पर रज़ाइयाँ टाँगता है, तो कभी किसी ने कोई वजह देखी होगी।"
विक्रांत ने इस पर कुछ नहीं कहा। पर उसे अजीब तरह से राहत मिली, किसी ऐसे इंसान से बात करके जो उसे पागल नहीं समझ रहा था, और जो खुद भी पागल नहीं लग रहा था।
हाट मंदिर वाले चौक पर लगी थी, उसी पीपल के नीचे और आसपास।
विक्रांत ने गाँव के हाट देखे थे, बचपन में नहीं, पर बाद में, कभी-कभार shoots पर, दोस्तों के गाँवों में। हाट का मतलब होता है शोर। सब्ज़ी वालों की चिल्लाहट, "आलू ले लो, बीस का किलो!", मोलभाव की बहस, बच्चों का रोना, किसी transistor पर बजता फ़िल्मी गाना, बकरियों का मिमियाना।
रौशनपुर की हाट में यह सब था। सिवाय आवाज़ के।
ज़मीन पर बोरियाँ बिछी थीं, उन पर सब्ज़ियों के ढेर, गुड़ की भेलियाँ, चूड़ियाँ, सस्ते plastic के खिलौने, ऊनी टोपियाँ। लोग थे, शायद सौ के आसपास। औरतें घूँघट में, आदमी शॉल लपेटे, बच्चे माँओं के आँचल पकड़े। सौदे हो रहे थे। पैसे हाथ बदल रहे थे।
पर कोई चिल्ला नहीं रहा था।
सब्ज़ी वालों ने हर ढेर के सामने cardboard के टुकड़ों पर दाम लिख रखे थे, कोयले से। मोलभाव फुसफुसाहट में हो रहा था, सिर झुकाकर, कान के पास। एक औरत ने किसी बच्चे को डाँटा तो उसकी आवाज़ बस एक तेज़ फुसफुसाहट थी, "चुप, चुप", और बच्चे का रोना भी, विक्रांत ने देखा, अजीब तरह से दबा हुआ था। मुँह खुला हुआ, आँसू बहते हुए, पर आवाज़ बहुत धीमी, जैसे उसने बहुत छोटी उम्र में ही सीख लिया हो कि यहाँ रोया भी धीरे जाता है।
पूरी हाट एक धीमी, लगातार सरसराहट में डूबी थी। सौ लोगों की फुसफुसाहट, कदमों की आहट, सिक्कों की खनक। जैसे किसी बहुत बड़े पुस्तकालय में भीड़ लग गई हो।
"ये..." विक्रांत ने धीरे से कहा, "...ये normal है?"
"मैं चार दिन पहले आई थी, पहली बार।" इरा ने भी धीरे से कहा। उसने ध्यान नहीं दिया था, पर वह भी फुसफुसा रही थी। "मुझे लगा था मेरे साथ ही ऐसा हो रहा है।"
विक्रांत ने अपने recorder को जेब में छुआ और फिर छोड़ दिया।
उसने एक दुकान से batteries खरीदीं। दुकानदार, एक दुबला-सा आदमी जिसके दाँत पान से लाल थे, उसे देखता रहा, ऊपर से नीचे तक, और जब विक्रांत ने पैसे दिए तो उसने उन्हें बहुत देर तक हथेली में रखे रखा, जैसे कुछ कहना चाहता हो।
"कोठी वाले हैं न आप?" आख़िरकार उसने पूछा। फुसफुसाकर।
"हाँ।"
दुकानदार ने सिर हिलाया, जैसे किसी पुरानी बात की पुष्टि हो गई हो, और batteries उसकी तरफ़ बढ़ा दीं। कुछ नहीं कहा।
चौक के एक कोने में, पीपल की जड़ों के पास, कुछ बच्चे खेल रहे थे। चार-पाँच, सात से दस साल के। विक्रांत का ध्यान उन पर इसलिए गया क्योंकि वे भी चुप थे। बच्चे, जो चुप रहते ही नहीं।
एक लड़की बीच में बैठी थी, आँखों पर अपनी चुन्नी बाँधे। बाकी बच्चे उसके चारों तरफ़ गोल घेरे में थे, धीरे-धीरे घूम रहे थे, और एक लय में कुछ गुनगुना रहे थे। बहुत धीमे, लगभग साँसों में:
सातवीं सीढ़ी, गहरा पानी,
मेहमान पुकारे अपनी ज़ुबानी।
नाम सुने तो होंठ सी ले,
हाँ जो बोले, वो नीचे जी ले।
गीत ख़त्म होते ही घेरा रुक गया। आँखों पर पट्टी बाँधे लड़की ने एक बच्चे का नाम लिया, "मुन्नी?", बहुत धीमे, सवाल की तरह।
घेरे में खड़ी एक छोटी लड़की, शायद मुन्नी, ने अपने दोनों हाथ मुँह पर रख लिए। पूरी ताक़त से। उसकी आँखें बड़ी हो गईं, पर उसने कोई आवाज़ नहीं निकाली।
पट्टी वाली लड़की ने फिर पुकारा: "मुन्नी? तू है न?"
मुन्नी चुप रही। बाकी बच्चे भी चुप, साँस रोके।
कुछ सेकंड बाद पट्टी वाली लड़की ने चुन्नी खोल दी, और सब बच्चे दबी हुई हँसी में फूट पड़े। मुन्नी जीत गई थी। उसने जवाब नहीं दिया था।
विक्रांत उन्हें देखता रहा। उसके पेट में कुछ ठंडा-सा घूमा।
"बच्चों का खेल है," इरा ने धीरे से कहा, पर उसकी आवाज़ में भी वह ठंडक थी।
"हर बच्चों के खेल के पीछे कोई डर होता है," विक्रांत ने कहा। "Ring-a-ring-o'-roses प्लेग के बारे में है।"
वह मुड़ा, और तभी किसी ने उसका हाथ पकड़ लिया।
पकड़ इतनी तेज़ थी कि उसकी कलाई की हड्डियाँ आपस में दब गईं।
उसने नीचे देखा। एक हाथ। झुर्रियों से भरा, पतला, नीली नसों वाला, उँगलियाँ चॉक की धूल से सफ़ेद। हाथ ने उसकी बाईं कलाई पकड़ी थी, ठीक उस जगह जहाँ नब्ज़ धड़कती है, और उसे छोड़ नहीं रहा था।
हाथ एक बूढ़ी औरत का था।
वह विक्रांत के कंधे तक मुश्किल से आती थी। काली, धुँधली पड़ चुकी एक चादर में लिपटी, जिसके किनारे फटे हुए थे। सिर ढका हुआ, चेहरा बहुत पुराना, गालों की खाल पतली और पारदर्शी जैसी, जैसे बहुत ज़्यादा धोया गया कपड़ा। उसकी आँखें धुँधली थीं, सफ़ेदी में पीलापन, पर उनके बीच की पुतलियाँ अजीब तरह से तेज़ और स्थिर थीं।
उसके गले में एक मैली रस्सी से लटकी एक छोटी, काली, लकड़ी के फ्रेम वाली स्लेट थी। बच्चों वाली स्लेट। उसके किनारे घिसकर गोल हो चुके थे।
वह विक्रांत को देख रही थी, और उसकी नज़र में कोई पागलपन नहीं था। उसमें कुछ और था। पहचान।
"जी..." विक्रांत ने कहा, "...क्या चाहिए आपको?"
बूढ़ी औरत ने कुछ नहीं कहा। उसका मुँह बंद रहा, होंठ आपस में सिले हुए। उसने अपना दूसरा हाथ, अब भी उसकी कलाई छोड़े बिना, अपनी चादर में डाला और एक छोटा, घिसा हुआ चॉक का टुकड़ा निकाला।
फिर उसने विक्रांत की कलाई छोड़ी, पर पूरी तरह नहीं। उसकी उँगलियाँ धीरे-धीरे ऊपर सरकीं, उसकी बाँह पर, उसके कंधे पर, और फिर उसकी छाती पर आकर रुक गईं। दिल के ठीक ऊपर। उसने वहाँ दो बार थपथपाया, धीरे से।
तुम।
फिर उसने स्लेट उठाई और लिखना शुरू किया।
उसका हाथ काँप रहा था, पर अक्षर साफ़ बने, सधे हुए, जैसे उसने ज़िंदगी भर इसी तरह बात की हो। चॉक की चीं-चीं आवाज़ उस फुसफुसाती हाट में बहुत ज़ोर से सुनाई दी।
उसने स्लेट विक्रांत की तरफ़ घुमाई।
अंशु
विक्रांत के चारों तरफ़ की दुनिया एक पल के लिए थम गई।
हाट की सरसराहट दूर चली गई, जैसे किसी ने volume नीचे कर दिया हो। उसे अपने कानों में अपना खून बहता सुनाई दिया। उसकी नज़र उस शब्द पर अटकी रही। चार अक्षर, सफ़ेद चॉक में, काली स्लेट पर।
उसके मुँह से आवाज़ नहीं निकली। उसने कोशिश की, और गले में बस एक सूखी हवा बनी।
उसके पीछे कोई हँसा। धीमी, फुसफुसाती हँसी।
"अरे, गूँगी बेगम है बाबू!" किसी आदमी ने कहा, एक सब्ज़ी वाला, अपनी बोरी के पास से। "पागल है। सबको पकड़ लेती है। छोड़ दीजिए, कुछ नहीं करेगी।"
"चल अम्मा, चल," एक औरत ने आकर बूढ़ी के कंधे पर हाथ रखा, बहुत नरमी से, जैसे किसी बच्चे को समझा रही हो। "बाबू को परेशान मत कर।"
पर बूढ़ी औरत हिली नहीं। उसकी आँखें विक्रांत पर टिकी रहीं। उस नज़र में इंतज़ार था। जैसे उसने कोई सवाल पूछा हो और जवाब का इंतज़ार कर रही हो।
"आपने..." विक्रांत की आवाज़ आख़िरकार निकली, फटी हुई, "...आपने ये नाम कहाँ से..."
उसने स्लेट के शब्द पर उँगली रखी।
बूढ़ी ने फिर उसकी छाती थपथपाई। दो बार। तुम।
"नहीं," विक्रांत ने कहा। उसने अपना सिर हिलाया, जैसे किसी बच्चे को समझा रहा हो, और खुद को भी। "नहीं। मैं विक्रांत हूँ। विक्रांत सहगल। अंशु मेरा भाई था। छोटा भाई। वो..." उसकी आवाज़ टूटी। "...वो नहीं रहा। बहुत साल पहले।"
बूढ़ी औरत ने उसे देखा। बहुत देर तक।
और फिर उसके चेहरे पर कुछ बदला। विक्रांत ने उसे पहचाना, क्योंकि उसने वही भाव माँ के चेहरे पर देखा था, उन रातों में जब वह उसे सोता समझती थीं। दया। गहरी, पुरानी, थकी हुई दया। जैसे वह किसी ऐसे इंसान को देख रही हो जो कोई बहुत बड़ी बात भूल गया हो, और जिसे यह भी नहीं पता कि उसने कुछ भूला है।
उसने अपनी चादर की बाँह से स्लेट पोंछी। "अंशु" एक सफ़ेद धब्बे में मिट गया।
फिर उसने कुछ नहीं लिखा। उसने अपनी एक उँगली अपने होंठों पर रखी। चुप। और फिर उसी उँगली से नीचे इशारा किया, ज़मीन की तरफ़। सीधे नीचे। जैसे पैरों के नीचे की मिट्टी से भी नीचे, किसी गहरी जगह की तरफ़।
फिर वह मुड़ी और हाट की भीड़ में धीरे-धीरे चली गई। झुकी हुई, धीमी, उसकी स्लेट उसकी छाती पर हल्की-सी झूलती हुई। लोग उसके लिए रास्ता बनाते गए, बिना देखे, बिना कुछ कहे, जैसे पानी किसी पत्थर के चारों तरफ़ से बहता है।
विक्रांत वहीं खड़ा रहा। उसकी बाईं कलाई पर उसकी उँगलियों के सफ़ेद, चॉक भरे निशान थे।
और उसके अंदर कुछ हिला था।
बहुत छोटी चीज़, बहुत तेज़, एक ही पल के लिए। उस बूढ़े हाथ ने जिस तरह उसकी कलाई पकड़ी थी, उस पकड़ ने कुछ खोला था। एक तस्वीर नहीं, एक एहसास। ठंडा पानी, कमर तक, या शायद सीने तक। अंधेरा। और किसी का हाथ, उसकी कलाई पकड़कर उसे ऊपर खींचता हुआ। उसी तरह, उसी जगह, उतनी ही ज़ोर से।
फिर वह एहसास चला गया, जैसे कोई मछली पानी की सतह से एक पल के लिए उछलकर वापस गहराई में डूब जाए।
"विक्रांत?" इरा का हाथ उसकी बाँह पर था। "आप ठीक हैं? बैठिए। यहाँ बैठिए।"
चौक के किनारे एक चाय की गुमटी थी। टीन की छत, एक लकड़ी की बेंच, कोयले की अँगीठी पर उबलती केतली। चाय वाला, पचास-पचपन का एक मोटा आदमी जिसका नाम बद्री था, उसने बिना पूछे दो कुल्हड़ उनके सामने रख दिए।
"अम्मा ने डरा दिया आपको?" उसने पूछा। उसकी आवाज़ बाकी गाँव की तरह धीमी थी, पर उसमें एक तरह की दोस्ताना गर्मी थी।
"वो कौन हैं?" इरा ने पूछा।
"नूर बानो। गाँव वाले गूँगी बेगम बोलते हैं।" बद्री ने केतली में और पत्ती डाली। "बोलती नहीं हैं। बरसों से। स्लेट पर लिखकर बात करती हैं। पीछे वाले मुहल्ले में अकेली रहती हैं, मस्जिद के पास।"
"जन्म से गूँगी हैं?"
"नहीं-नहीं।" बद्री ने सिर हिलाया। "पहले बोलती थीं। मेरी अम्मा बताती थीं कि गाती भी बहुत अच्छा थीं। शादी-ब्याह में ढोलक पर गाती थीं।" उसने चाय छानी। "फिर इकहत्तर में, उनकी शादी की रात..."
वह रुक गया।
विक्रांत ने उसकी नज़र का पीछा किया। गुमटी के बाहर, बेंच के दूसरे सिरे पर, दो बूढ़े आदमी बैठे थे, चुपचाप बीड़ी पीते हुए। दोनों उसे देख रहे थे। बद्री को। सीधे, बिना पलक झपकाए।
बद्री ने अपनी बात निगल ली, जैसे गले में कोई कंकड़ फँसा हो।
"...बस," उसने कहा। "उसके बाद से नहीं बोलतीं। पगला गईं। बेचारी।" उसने केतली अँगीठी पर वापस रखी और दूसरी तरफ़ मुड़ गया, बर्तन धोने लगा, जैसे बातचीत कभी हुई ही न हो।
विक्रांत ने कुल्हड़ उठाया। उसकी उँगलियाँ अब भी काँप रही थीं। उसने चाय पी, और उसे उसका स्वाद नहीं आया।
"उसे कैसे पता?" उसने धीरे से कहा। खुद से ज़्यादा, इरा से कम। "उसे अंशु का नाम कैसे पता?"
इरा ने अपना कुल्हड़ दोनों हाथों में थामे रखा। "आपका परिवार 1999 में यहाँ आया था। दादाजी की तेरहवीं पर। पूरे गाँव को पता होगा। दो बच्चे, कोठी वाले। फिर एक बच्चे के साथ कुछ हुआ।" उसने कंधे उचकाए। "गाँव में ऐसी बातें याद रहती हैं।"
"हमें बताया गया था कि अंशु Delhi के पास डूबा था। एक तालाब में।"
इरा ने उसे देखा। कुछ नहीं कहा।
"तो ठीक है," विक्रांत ने अपनी ही बात पकड़ी, तर्क की तरफ़ भागते हुए। "बूढ़ी औरत है। उसे वो दो बच्चे याद हैं। उसे लगता है मैं... उसने नाम मिला दिए। Dementia। आपकी दादी की तरह।"
"हो सकता है।"
"वो पागल है। सबने कहा।"
"सबने कहा," इरा ने दोहराया।
विक्रांत ने उसकी तरफ़ देखा। "आप ऐसे क्यों कह रही हैं?"
इरा ने अपना कुल्हड़ बेंच पर रखा, बहुत सावधानी से, जैसे वह किसी नाज़ुक पांडुलिपि को रख रही हो।
"क्योंकि मैं चार दिन से इस गाँव में हूँ," उसने कहा, "और जिन लोगों को पूरा गाँव पागल कहता है, उनकी आँखें आम तौर पर उतनी साफ़ नहीं होतीं जितनी उस औरत की थीं।"
बाहर, कोहरा फिर से नीचे उतरने लगा था। रघु काका ने सही कहा था। चौक के उस पार का मंदिर धुँधला हो रहा था, उसके ऊपर का खाली हुक धुंध में गायब हो रहा था। बच्चे खेल छोड़कर घरों की तरफ़ भाग रहे थे, चुपचाप। दुकानदार अपनी बोरियाँ समेट रहे थे।
उठते हुए विक्रांत ने देखा कि इरा ने अपनी diary खोलकर उसमें कुछ लिखा, और फिर बद्री से धीमे से कुछ पूछा। बद्री ने एक पल हिचकिचाकर पीछे के मुहल्ले की तरफ़ इशारा किया। मस्जिद की ओर।
विक्रांत ने नहीं पूछा कि उसने क्या पूछा था।
कबीर शाम को नहीं लौटा। उसका फ़ोन आया, रघु काका के पुराने Nokia पर, जो कोठी के एक कोने में थोड़ा-बहुत signal पकड़ लेता था। Bahraich में देर हो गई, कोहरा बहुत है, रात वहीं रुक जाएगा।
विक्रांत ने रात को अपना कमरा नहीं छोड़ा। उसने recorders नहीं लगाए। उसने दरवाज़े के नीचे की दरार में एक मुड़ा हुआ तौलिया ठूँस दिया, बिना यह सोचे कि क्यों, और फिर उसे निकाल दिया, क्योंकि उसे वह रोशनी की पट्टी देखनी थी। उसे देखना था कि वह टूटती है या नहीं।
वह टूटी नहीं।
ग्यारह बजे के आसपास दरवाज़े पर खटखटाहट हुई। तीन बार। धीमी।
विक्रांत ने पलंग से उठकर दरवाज़े तक का रास्ता बहुत धीरे तय किया। उसने कुंडी पर हाथ रखा और रुका। पहले नीचे देखा।
रोशनी की पट्टी में दो काले टुकड़े थे। पैर।
उसकी साँस, जो उसे पता नहीं था कि वह रोके हुए था, निकल गई। उसने दरवाज़ा खोला।
इरा थी। शॉल में लिपटी, एक battery lamp हाथ में, उसका चेहरा lamp की नीली-सफ़ेद रोशनी में पीला और तना हुआ।
"सो रहे थे?"
"नहीं।"
"मुझे कुछ मिला है," उसने कहा। "लाइब्रेरी में। आपको देखना चाहिए।"
विक्रांत ने अपनी शॉल उठाई। सीढ़ियाँ उतरते हुए उसे एक बात खटकी, धुँधली-सी, जिसे वह तुरंत पकड़ नहीं पाया। फिर पकड़ में आई।
इरा ने दरवाज़ा खटखटाया था। उसने आवाज़ नहीं दी थी। उसने "विक्रांत?" नहीं पुकारा था, जैसे कोई भी आम इंसान रात को किसी के बंद दरवाज़े पर पुकारता। आज दिन में भी, विक्रांत को अब याद आया, हाट में उसके ठिठकने पर, गुमटी पर, रास्ते में, इरा ने एक बार भी उसे नाम लेकर नहीं बुलाया था। बस उसका हाथ छुआ था, या उसके सामने आकर खड़ी हो गई थी।
उसने इसके बारे में कुछ नहीं कहा।
लाइब्रेरी ठंडी थी। सारी lamps जल रही थीं, और उनकी रोशनी में अलमारियों की परछाइयाँ छत तक लंबी खिंची थीं। मेज़ पर काग़ज़ों के ढेर अब और बढ़ गए थे।
बीच में, एक साफ़ सफ़ेद कपड़े पर, एक किताब रखी थी।
बाकी बहियों जैसी नहीं थी। छोटी, मोटी, जिल्द काले चमड़े की, जो उम्र से सख़्त और दरारों भरी हो गई थी। उसके कोने पीतल से मढ़े थे, और पीतल हरा पड़ चुका था। उस पर कोई नाम नहीं था। बस सामने की जिल्द पर, चमड़े में दबाकर बनाया गया एक निशान: एक गोला, और उसके बीच से नीचे की ओर जाती एक सीधी लकीर।
"सबसे ऊपर वाली अलमारी में थी," इरा ने कहा। "पीछे की तरफ़। किताबों की एक कतार के पीछे, जैसे किसी ने जानबूझकर छिपाई हो। दीवार और अलमारी के बीच की दरार में।"
उसने gloves पहने और किताब खोली।
पन्ने मोटे थे, हाथ के बने काग़ज़ के, पीले और भुरभुरे। पहले पन्ने पर उर्दू में कुछ लिखा था, एक लंबी, घुमावदार लिखावट में, जिसकी स्याही भूरी पड़ चुकी थी।
"यह फ़ेहरिस्त है," इरा ने कहा। "एक तरह का रजिस्टर। Index।"
उसने पन्ना पलटा। अंदर, काग़ज़ पर पेंसिल और स्याही से खींची गई लकीरों से खाने बने थे। Columns। विक्रांत उर्दू नहीं पढ़ सकता था, पर तारीख़ों के अंक उसने पहचान लिए।
"पहले column में तारीख़," इरा ने उँगली से बिना छुए इशारा किया। "दूसरे में नाम। तीसरे में उम्र। और चौथे में..." उसने रुककर देखा। हर पंक्ति के आख़िरी खाने में स्याही से बना वही निशान था जो जिल्द पर था। गोला, और उसके बीच से नीचे जाती लकीर। हर पंक्ति में। एक जैसा। "...ये। मुझे नहीं पता इसका मतलब क्या है।"
विक्रांत झुका। पहली entry की स्याही सबसे पुरानी थी, लगभग भूरी।
"सन अठारह सौ तिरानवे," इरा ने पढ़ा। धीमे, बहुत धीमे। "और नाम है..."
वह रुक गई।
विक्रांत ने उसकी तरफ़ देखा। उसके होंठ बंद थे। उसने नाम नहीं पढ़ा। उसने बस अपनी gloves वाली उँगली उस शब्द के ऊपर, एक इंच ऊपर, हवा में रखी।
"क्या लिखा है?"
"एक लड़के का नाम है। ग्यारह बरस।" उसने कहा। "किसी हरकिशन का बेटा।"
"नाम क्या है?"
इरा ने उसकी तरफ़ नहीं देखा। "ज़ोर से मत पढ़िए," उसने कहा। उसकी आवाज़ में कुछ था, जल्दबाज़ी, जो उसने तुरंत दबा दिया। "मेरा मतलब... यहाँ के लोग पसंद नहीं करते। नाम लेना। आपने देखा न, आज।"
विक्रांत ने उसे देखा। उसने इसे अपने दिमाग़ में दर्ज किया, उसी जगह जहाँ उसने कबीर की survey वाली बात रखी थी, और रघु काका का सफ़ेद चेहरा।
इरा ने पन्ना पलटा। अगली entries। सन 1921। फिर 1946। हर entry में एक नाम, एक उम्र, और वही निशान। अलग-अलग लिखावटें, अलग-अलग स्याहियाँ, जैसे दशकों में अलग-अलग हाथों ने इसे लिखा हो।
"हर पच्चीस-तीस साल में एक नाम," विक्रांत ने कहा।
"हाँ।"
फिर एक पन्ना जो बाकियों से अलग था। लिखावट तेज़ थी, बिखरी हुई, स्याही जगह-जगह फैली हुई, जैसे किसी ने काँपते हाथों से जल्दी में लिखा हो। सन 1971। और उसके नीचे एक नाम नहीं था।
कई थे। एक के नीचे एक। विक्रांत ने गिने।
बारह।
"इकहत्तर," उसने धीरे से कहा। उसे बद्री की बात याद आई। उनकी शादी की रात...
इरा ने कुछ नहीं कहा। उसने आख़िरी पन्ना पलटा।
अगला पन्ना वहाँ नहीं था।
उसे फाड़ा गया था। जिल्द के पास, सिलाई के बगल में, काग़ज़ का एक कटा-फटा किनारा बचा था, आधे इंच का, टेढ़ा-मेढ़ा, जैसे किसी ने गुस्से में या डर में उसे एक झटके में खींच लिया हो।
उस बचे हुए किनारे पर, स्याही के कुछ टुकड़े रह गए थे। बाकी पन्ना जा चुका था, पर किनारा पहली दो columns के कुछ अक्षर बचा ले गया था।
इरा ने lamp पास किया। दोनों झुके।
पहले column में, तारीख़, नीली ball-pen की स्याही में, साफ़ और आधुनिक, बाकी पुरानी भूरी स्याहियों से बिल्कुल अलग:
...जनवरी 1999
विक्रांत का दिल धीमा हुआ, फिर बहुत तेज़ धड़का।
नाम वाला column फटकर चला गया था। उसका कोई अक्षर नहीं बचा।
पर तीसरा column, उम्र, किनारे के सबसे करीब था। और उसमें, उसी नीली स्याही में, एक अंक और एक शब्द बचे थे:
9 बरस
विक्रांत ने उसे पढ़ा। फिर दोबारा पढ़ा।
"ये गलत है," उसने कहा। उसकी आवाज़ उसे खुद दूर से आती लगी। "अंशु छह साल का था। जनवरी 1999 में अंशु छह साल का था।"
इरा चुप रही।
"किसी ने गलत लिखा होगा। जल्दी में। या..." विक्रांत ने अपने तर्क को पकड़ने की कोशिश की, पर वह उसकी उँगलियों से फिसल रहा था, गीली मछली की तरह। "...या ये किसी और बच्चे के बारे में है। गाँव के किसी और बच्चे के।"
"ये सहगल परिवार का रजिस्टर है, विक्रांत।" इरा ने बहुत धीरे कहा। उसने ऊपर देखा, और lamp की रोशनी में उसकी आँखें बहुत गहरी लगीं। "इसकी हर entry इसी कोठी से जुड़ी है। और उस जनवरी में, इस कोठी में, नौ साल का सिर्फ़ एक ही बच्चा था।"
लाइब्रेरी की खामोशी में कहीं, बहुत दूर, कोठी के पिछले हिस्से से, पानी की एक बूँद गिरी।
टप।
विक्रांत ने रजिस्टर के फटे हुए किनारे को देखा, उस नीली स्याही को, उस एक अंक को।
"मैं," उसने कहा।

Writer
Piyashi Atma
Story
जवाब मत देना
Chapter
3 of 30
Category
Ghost Stories
Reading time
22 min
Words
4252
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

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