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Part 2: Source

Piyashi Atma · Ghost Stories · 21 मिनट

बाकी रात विक्रांत सोया नहीं।
वह अपने कमरे में पलंग के किनारे बैठा रहा, कंधों पर रज़ाई, सामने laptop। लालटेन उसने दोबारा जला ली थी और उसकी लौ को देखता रहा, जो हर बार उसके साँस छोड़ने पर हल्की-सी काँप जाती थी। Headphones उसके कानों पर थे, और recording शुरू से चल रही थी, चौथी बार, या शायद पाँचवीं।
ट्रिन्न्न्न...
घंटी। साफ़, धातु की, असली। उसके अपने कदम, गलियारे के फ़र्श पर। रिसीवर उठाने की खड़खड़ाहट।
फिर वह hiss।
Recorder उसकी jacket की जेब में था, रिसीवर से एक फ़ुट दूर। Earpiece से निकली आवाज़ उस तक बहुत धीमी पहुँची थी, पर पहुँची थी। विक्रांत ने उस हिस्से का gain बढ़ाया, noise floor नीचे खींचा, और वह खुली, गूँजती खाली जगह उसके कानों में फिर से खुल गई। पानी का टपकना। टप। लंबा अंतराल। टप।
फिर उसकी अपनी आवाज़: "Hello?"
फिर कुछ।
यहीं पर हर बार उसका दिमाग़ अटक जाता था। Hello के बाद लगभग सात सेकंड का एक हिस्सा था जहाँ, उसे याद था, माँ ने बोलना शुरू किया था। सुन रहे हो? मेरी बात सुनो...
Recording में उस जगह कुछ था। एक मटमैली, धुँधली परत, जैसे पानी के नीचे से कोई बोल रहा हो। उसमें आवाज़ के उतार-चढ़ाव जैसा कुछ था, कोई लय, कोई साँचा। पर शब्द नहीं थे। विक्रांत ने उसे हर filter से गुज़ारा जो उसके पास था: noise reduction, spectral repair, de-reverb। हर बार वह परत थोड़ी बदल जाती, और हर बार उसे लगता कि बस अगली कोशिश में शब्द उभर आएँगे।
नहीं उभरे।
फिर उसकी अपनी आवाज़, फुसफुसाती, टूटी हुई: "मम्मी?"
उसे यह सुनना अच्छा नहीं लगा। छत्तीस साल का आदमी, अदालतों में expert गवाही देने वाला, अंधेरे गलियारे में किसी कटे हुए फ़ोन पर "मम्मी" फुसफुसाता हुआ। उसकी आवाज़ में वह कुछ था जो उसने खुद में कभी नहीं सुना था। एक बच्चे जैसी लाचारी।
उसके बाद वह आख़िरी वाक्य होना चाहिए था। वह जो बहुत पास से आया था। वो विक्रांत नहीं है।
Recording में वहाँ बस एक हल्की-सी सरसराहट थी, और फिर क्लिक।
विक्रांत ने उस आधे सेकंड को चालीस बार सुना। Loop पर। धीमा करके, तेज़ करके, उलटा करके। एक बार, तीसवीं-बत्तीसवीं बार के आसपास, उसे लगा कि उस सरसराहट में "क्रांत" जैसी कोई ध्वनि थी। उसने उसे फिर सुना। अब वह नहीं थी। फिर सुना। शायद थी।
उसने headphones उतार दिए और हथेलियों से आँखें दबाईं।
यह वही चीज़ थी जिसके ख़िलाफ़ वह अपने juniors को हमेशा चेताता था। Pareidolia। इंसानी दिमाग़ noise में पैटर्न ढूँढने के लिए बना है। बादलों में चेहरे, नल की टपकन में शब्द। अगर तुम पहले से जानते हो कि तुम्हें क्या सुनना है, तो तुम्हें वह सुनाई देगा। Forensic audio में सबसे बड़ा दुश्मन यही है: सुनने वाले की उम्मीद।
और उसे उम्मीद थी। उसने वह वाक्य सुना था, अपने कान से, recorder से नहीं।
या तुम्हें लगता है कि सुना था।
खिड़की के बाहर कोहरा धीरे-धीरे सलेटी हो रहा था। सुबह आ रही थी, बिना सूरज के, बिना पक्षियों के।
विक्रांत ने laptop बंद किया, और पहली बार उसके मन में यह सवाल ठीक-ठीक शब्दों में बना:
अगर recording में वह आवाज़ नहीं है, तो मैंने किसको जवाब दिया था?
सुबह सात बजे उसे हथौड़े की आवाज़ ने नीचे बुलाया।
ठक। ठक। ठक।
धीमी, नपी-तुली, जैसे कोई जल्दी में नहीं है पर रुकने वाला भी नहीं। विक्रांत सीढ़ियाँ उतरा। वह स्टूल वहीं था, फ़ोन वहीं था, रिसीवर अपने cradle में ठीक से रखा हुआ, जैसा उसने रात को रखा था। दिन की फीकी रोशनी में वह बस एक पुराना, धूल भरा प्लास्टिक का डिब्बा लग रहा था। उसका कटा हुआ तार स्टूल से नीचे लटका था, बेजान।
रघु काका गलियारे के अंत में था, पीछे के आँगन वाले दरवाज़े पर। उसके एक हाथ में हथौड़ा था, दूसरे में मुट्ठी भर नई कीलें, और वह दरवाज़े की चौखट में एक-एक करके कीलें ठोक रहा था। पहले से ठुकी कीलों के बीच, जहाँ भी जगह बची थी।
"गुड मॉर्निंग, काका।"
बूढ़े ने सिर नहीं घुमाया। ठक।
"रात को... आपने कुछ सुना था?"
ठक। हथौड़ा रुका। रघु काका ने अगली कील उँगलियों में घुमाई, पर ठोकी नहीं।
"क्या?"
"फ़ोन। सीढ़ियों वाला। बजा था। बारह बजे के आसपास।"
रघु काका ने अब मुड़कर देखा। उसकी आँखें लाल थीं, जैसे वह भी रात भर सोया न हो। उसने विक्रांत को देखा, फिर उसके पीछे, सीढ़ियों की तरफ़, फ़ोन की तरफ़।
"आपने उठाया था?"
"हाँ।"
"कुछ बोले थे?"
विक्रांत एक पल रुका। "बस... hello।"
यह झूठ था, और उसने इसे इतनी आसानी से बोला कि उसे खुद हैरानी हुई। वह नहीं जानता था कि उसने "मम्मी" वाली बात क्यों छिपाई। शायद शर्म से। शायद इसलिए कि रघु काका की आँखों में कोई ऐसी चीज़ थी जो जवाब का इंतज़ार नहीं कर रही थी, बल्कि उससे डर रही थी।
"किसी को पुकारा तो नहीं? नाम लेकर?"
"नहीं।"
रघु काका ने बहुत देर तक उसे देखा। फिर उसके कंधे थोड़े ढीले हुए। पूरी तरह नहीं, बस थोड़े। उसने कील चौखट पर रखी और हथौड़ा उठाया।
"वो line 2003 में कटी थी," उसने कहा। ठक। "बड़े साहब ने Delhi से फ़ोन करके कटवाई थी। आपके पापा ने।"
"क्यों? कोठी तो खाली पड़ी थी। कोई इस्तेमाल भी नहीं करता होगा।"
ठक।
"इसीलिए कटवाई थी," रघु काका ने कहा, और फिर कुछ नहीं बोला। विक्रांत ने इंतज़ार किया। बूढ़ा अगली कील ठोकता रहा, फिर अगली, जैसे बात वहीं ख़त्म हो गई हो।
"काका, आप हर दरवाज़े पर कीलें क्यों..."
"लोहा।" ठक। "पुराने लोग कहते थे।"
"क्या कहते थे?"
रघु काका ने आख़िरी कील ठोकी, हथौड़ा नीचे किया और दरवाज़े को देखा। पूरी चौखट अब काली, मोटी कीलों के सिरों से भरी थी, जैसे किसी जानवर की खाल पर काँटे।
"कहते थे कि जो चीज़ अंदर आनी नहीं चाहिए, उसे लोहा पसंद नहीं।" उसने कहा। फिर अपनी लोई कंधे पर ठीक की और बिना विक्रांत की तरफ़ देखे रसोई की ओर चला गया। "चाय बना देता हूँ।"
कबीर अपने कमरे में औंधे मुँह सो रहा था, एक बाँह पलंग से बाहर लटकी, फ़ोन फ़र्श पर। विक्रांत ने दरवाज़ा खटखटाए बिना खोला और पर्दे खींच दिए।
"उठ।"
"यार..." कबीर ने तकिया सिर पर दबा लिया। "आठ भी नहीं बजे।"
"रात को फ़ोन तूने किया था?"
"कौन सा फ़ोन?"
"सीढ़ियों वाला landline। बारह बजे बजा था।"
कबीर ने तकिए के नीचे से एक आँख निकाली। "वो डिब्बा? उसकी line तो..."
"पता है उसकी line कटी है। इसीलिए पूछ रहा हूँ।" विक्रांत ने पलंग के पास की कुर्सी खींची और बैठ गया। "देख, मैं समझता हूँ। तू चाहता है कि मैं जल्दी sign करूँ और Delhi भाग जाऊँ। कोठी डरावनी लगे, मैं परेशान होऊँ, बस। ठीक है। पर मेरे साथ ये मत कर। मैं सालों से recordings में छेड़छाड़ पकड़ता आया हूँ। मुझे पता चल जाएगा।"
कबीर अब पूरी तरह उठ बैठा था। उसके बाल बिखरे थे, आँखों के नीचे के काले घेरे सुबह की रोशनी में और गहरे लग रहे थे।
"तू सच में सोच रहा है," उसने धीरे से कहा, "कि मैं रात बारह बजे उठकर तेरे साथ prank कर रहा था?"
"तो कौन था?"
"मुझे क्या पता!" कबीर की आवाज़ ऊँची हुई, फिर उसने खुद ही उसे दबा लिया, जैसे दीवारों से डर लगा हो। "कोई wiring का चक्कर होगा। कोई पुराना... तू इंजीनियर है न, तू बता। मुझे तो घंटी भी नहीं सुनाई दी।"
विक्रांत ने उसका चेहरा पढ़ा। Lab में उसने सैकड़ों interrogation tapes सुनी थीं। झूठ बोलने वालों की आवाज़ में एक ख़ास ठहराव होता है, सवाल के बाद, जवाब से पहले। एक माइक्रो-सेकंड का हिसाब। कबीर की आवाज़ में वह ठहराव नहीं था। उसमें कुछ और था। झुँझलाहट, और उसके नीचे, बहुत नीचे, कुछ और।
डर।
"तेरे को नहीं सुनाई दी?" विक्रांत ने पूछा। "तेरा कमरा सीढ़ियों से बीस फ़ुट दूर है।"
"मैं नींद की गोली लेता हूँ आजकल।" कबीर ने नज़रें फेर लीं। "Business का tension है। सुन, विक्रांत... कुछ सुना था तूने? मतलब, घंटी के अलावा?"
विक्रांत ने एक पल सोचा।
"नहीं," उसने कहा। "बस घंटी।"
दूसरा झूठ। उसी सुबह।
चाय पीने के बाद उसने काम शुरू किया, जैसे lab में करता। कोई अंदाज़ा नहीं, कोई डर नहीं। बस source।
उसने रघु काका से एक पेचकस माँगा और फ़ोन को स्टूल से उठाकर बरामदे की रोशनी में ले आया। नीचे के चार पेच खोले, plastic का ढक्कन हटाया।
अंदर वही था जो होना चाहिए था। एक पुराना circuit board, धूल से ढका। एक छोटा-सा speaker। और घंटी: दो धातु के कटोरे और उनके बीच एक छोटा हथौड़ा, जिसे एक electromagnet चलाता है।
विक्रांत ने इसे पहले भी देखा था, बचपन में नहीं, training में। ऐसी mechanical घंटी बजाने के लिए telephone exchange line पर लगभग नब्बे volt का ringing current भेजता है। अलग से। उसके बिना हथौड़ा हिल नहीं सकता। कोई battery नहीं, कोई capacitor इतना बड़ा नहीं जो उसे चला सके। उसने board को उलट-पलटकर देखा। कोई जोड़ नहीं, कोई नया तार नहीं, कोई चिपकाया हुआ device नहीं। अगर किसी ने इसमें छेड़छाड़ की थी तो बहुत सफ़ाई से की थी, और उसके निशान धूल ने भी छिपा लिए थे।
उसने घंटी के हथौड़े को उँगली से छुआ।
धातु पर जंग नहीं थी। ठीक उस जगह, जहाँ हथौड़ा कटोरे से टकराता है, एक छोटा-सा चमकदार निशान था। ताज़ा घिसाव।
उसने ढक्कन वापस लगाया और तार की तरफ़ बढ़ा।
तार स्टूल से दीवार तक जाता था, और दीवार के पुराने socket से कुछ इंच पहले ख़त्म हो जाता था। साफ़ कटा हुआ। Socket खुद दीवार में धँसा था, बेकलाइट का भूरा डिब्बा। विक्रांत ने उसके पेच खोले। अंदर, दीवार की गहराई में, दूसरा तार था, वह जो बाहर की line से आता।
वह भी कटा हुआ था।
पर उसका कटना अलग था। Socket से लगभग एक फ़ुट अंदर, दीवार के खोखले हिस्से में। विक्रांत ने torch से अंदर झाँका, फिर रघु काका की छेनी से socket के आसपास का भुरभुरा plaster थोड़ा तोड़ा। तार दिखा। उसका एक सिरा दीवार के अंदर लटका था, दूसरा कहीं नीचे की तरफ़ जाता हुआ।
कटे हुए सिरे गीले थे।
विक्रांत ने उँगली से छुआ। तांबे के बारीक धागों पर नमी थी, और कुछ हरा-सा, रेशेदार। उसने उसे उँगलियों के बीच मसला।
काई।
दिसंबर के सूखे मौसम में। एक बंद दीवार के अंदर। दूसरी मंज़िल की सीढ़ियों के पास।
"ये line कहाँ से आती है?" उसने रघु काका से पूछा, जो दूर खड़ा उसे देख रहा था, जैसे किसी ऐसी चीज़ को देख रहा हो जिसके पास जाना ठीक न हो।
"पीछे से।" बूढ़े ने ठोड़ी से इशारा किया। "पुराना डिब्बा है, दीवार पर।"
पीछे का आँगन दिन में भी अंधेरा था। ऊँची दीवारों के बीच कोहरा फँसा पड़ा था, और ज़मीन पर पत्थर की पटियाँ नमी से काली थीं। बावड़ी का मुँह बीच में था, लोहे की जाली और पत्थर की पटिया के नीचे। विक्रांत ने उसकी तरफ़ नहीं देखा। उसने खुद को रोका।
Telephone का junction box पूर्वी दीवार पर था, बावड़ी से मुश्किल से दस फ़ुट दूर। P&T के ज़माने का लोहे का डिब्बा, जिस पर हल्का नीला रंग अब परतों में उखड़ रहा था। उसका ढक्कन जंग से जाम था। विक्रांत ने पेचकस फँसाकर उसे खोला।
एक गंध बाहर आई, और वह रुक गया।
डिब्बे के अंदर, जहाँ तारों के जोड़ होने चाहिए थे, गाद भरी थी। सूखी, भूरी-काली मिट्टी, जिसमें तार दबे हुए थे जैसे किसी पुराने तालाब की तली में जड़ें। मिट्टी पर सूखी काई की परतें थीं। और एक कोने में, गाद में आधा धँसा, एक घोंघे का छोटा-सा, खाली, सफ़ेद खोल।
विक्रांत ने उस डिब्बे को देखा, फिर उसकी ऊँचाई को। ज़मीन से कम से कम सात फ़ुट ऊपर। फिर दीवार को, जिस पर पानी का कोई निशान नहीं था। कोई धारी नहीं, कोई दाग़ नहीं। न ऊपर से कोई पाइप आता था, न छत का कोई नाला।
यह डिब्बा किसी समय पानी के अंदर रहा था।
पूरी तरह डूबा हुआ। इतनी देर तक कि उसमें गाद बैठ जाए और घोंघे रहने लगें।
उसका दिमाग़ तर्क के पीछे भागा। बाढ़। कभी बहुत पहले कोई बाढ़ आई होगी, पूरा आँगन भर गया होगा। पर आँगन की दीवारें सूखी थीं। उनके plaster पर कोई water line नहीं थी, कोई सीलन की पट्टी नहीं। सात फ़ुट ऊपर तक पानी भरने के बाद कोई दीवार उस निशान को नहीं भूलती।
सिर्फ़ यह डिब्बा भूला नहीं था।
उसने मुड़कर बावड़ी को देखा, आख़िरकार। लोहे की जाली के बीच से नीचे की पहली सीढ़ियाँ दिख रही थीं, पत्थर की, घिसी हुई, और उनसे नीचे अंधेरा। सूखी। धूल भरी। सीढ़ियों पर पत्तों के टुकड़े, किसी पक्षी का पंख।
"काका," उसने कहा, बिना पीछे देखे, "इस बावड़ी में पानी कब तक था?"
रघु काका गलियारे के दरवाज़े पर खड़ा था, आँगन में कदम रखे बिना।
"इकहत्तर तक।"
"1971?"
"उसके बाद सूख गई।" बूढ़े की आवाज़ में कोई उतार-चढ़ाव नहीं था। "एक ही रात में।"
विक्रांत ने मुड़कर उसे देखा। "एक रात में बावड़ी नहीं सूखती, काका। Water table धीरे-धीरे गिरता है, सालों में।"
रघु काका ने उसकी तरफ़ देखा, उस नज़र से जिससे बड़े किसी बच्चे को देखते हैं जो ऐसी बात पर बहस कर रहा हो जिसे वह नहीं समझता।
"ये भी गिरी थी," उसने कहा। "एक रात में।"
और वह अंदर चला गया।
दोपहर को विक्रांत लाइब्रेरी गया, बिना किसी ख़ास वजह के। शायद इसलिए कि वहाँ रोशनी ज़्यादा थी। शायद इसलिए कि वहाँ एक ऐसा इंसान था जो न डरा हुआ लगता था, न कुछ छिपाता हुआ।
इरा ने एक अलमारी के सामने सीढ़ी लगा रखी थी और ऊपर के खानों से बस्ते उतार रही थी। मेज़ पर काग़ज़ों के ढेर बन चुके थे, हर ढेर पर एक छोटी पर्ची: ज़मीन, 1890–1910। हिसाब, 1920s। शायरी/अज्ञात।
"Good timing," उसने उसे देखकर कहा। "ये पकड़िए।"
उसने एक भारी, चमड़े की जिल्द वाली बही नीचे बढ़ाई। विक्रांत ने उसे थामा और मेज़ पर रख दिया। इरा नीचे उतरी, gloves ठीक किए।
"आप ठीक से सोए नहीं," उसने कहा। सवाल नहीं, बस बात।
"इतना दिख रहा है?"
"आँखों से।" वह मुस्कुराई। "पहली रात में पुरानी इमारतें किसी को नहीं सोने देतीं। मुझे भी पहले दो दिन हर आवाज़ पर लगता था कि कोई चल रहा है।"
"और अब?"
इरा ने बही खोली और उसके पन्ने उलटने लगी। "अब मुझे पता है कि कोई चल रहा है," उसने कहा, बहुत सहजता से। "रघु काका रात को कोठी के चक्कर लगाते हैं। तीन बजे के आसपास। हर दरवाज़े को छूते हैं।"
विक्रांत ने उसे देखा। इरा ने ऊपर नहीं देखा।
"आपने रात को कोई फ़ोन बजते सुना?" उसने पूछा।
"फ़ोन?" अब इरा ने ऊपर देखा। "नहीं। मेरा कमरा पश्चिम में है, यहीं, लाइब्रेरी के पास। यहाँ की दीवारें बहुत मोटी हैं।" उसने सिर थोड़ा टेढ़ा किया। "क्यों?"
"कुछ नहीं।"
इरा ने उसे एक पल देखा, जैसे किसी पांडुलिपि का कोई मुश्किल शब्द पढ़ रही हो। फिर बही की तरफ़ लौटी।
"ये देखिए," उसने कहा, थोड़ी देर बाद, "मुझे सुबह मिला। इसी बही के बीच में था।"
उसने पन्नों के बीच से एक तस्वीर निकाली और विक्रांत की तरफ़ बढ़ाई। Gloves वाली उँगलियों से, किनारे से पकड़े हुए।
एक पुरानी colour photo, उन दिनों की जब photos दुकानों पर धुलती थीं। रंग उड़े हुए, किनारे पीले। कोठी का सामने वाला आँगन, तुलसी का चौरा, पीछे वही मेहराबें। आँगन में दो लड़के खड़े थे। एक बड़ा, आठ-नौ साल का, हाफ़ स्वेटर, गंभीर चेहरा, उसके दाएँ हाथ में पतंग की डोर, जो फ्रेम से बाहर ऊपर कहीं जा रही थी। दूसरा छोटा, पाँच-छह साल का, बड़े की बाँह पकड़े, कैमरे की तरफ़ मुस्कुराता हुआ, आगे का एक दाँत टूटा।
विक्रांत ने photo पलटी। पीछे नीली स्याही में, माँ की गोल, साफ़ लिखावट थी:
विक्की और अंशु। रौशनपुर। जनवरी 1999।
उसने फिर तस्वीर पलटी और बड़े लड़के को देखा।
वह उसे पहचानता था, जैसे कोई अपने नाम को पहचानता है। जानकारी के तौर पर। यह मैं हूँ। उसके घर में ऐसी और तस्वीरें थीं, एलबम में, स्कूल की, जन्मदिन की। उसने उन्हें देखा था और सिर हिलाया था, हाँ, मैं।
पर उसके अंदर कुछ नहीं हिला। न कोई याद, न कोई धूप, न उस पतंग की डोर का खिंचाव। उस लड़के का चेहरा उसे किसी अजनबी के बच्चे जैसा लगा। किसी ऐसे रिश्तेदार के बच्चे जैसा जिसे शादियों में एक बार देखा हो।
और छोटा लड़का। अंशु। जिसका चेहरा माँ के कमरे में फ्रेम में लगा रहता था, और जिसे विक्रांत ने जब भी देखा, उसके पेट में एक ठंडी, भारी गाँठ बँध जाती थी। Guilt की गाँठ। उस रात की, जिसके बारे में उसने कभी किसी को कुछ नहीं बताया।
"ये आप हैं?" इरा ने पूछा।
"हाँ।" विक्रांत ने photo लौटा दी। उसकी आवाज़ सपाट निकली। "और मेरा छोटा भाई।"
"आपको याद है ये दिन?"
"नहीं।" उसने सच कहा। "मुझे नौ साल से पहले का कुछ ख़ास याद नहीं। Doctor कहते थे childhood trauma से ऐसा होता है। अंशु के... उसके बाद।"
इरा ने photo को देखा, फिर विक्रांत को। फिर photo को।
उसकी नज़र बड़े लड़के के हाथ पर टिकी, जिसमें डोर थी। फिर मेज़ पर रखे विक्रांत के notebook पर, जिसके पास उसका pen पड़ा था। बाईं तरफ़।
उसने कुछ नहीं कहा। Photo को सावधानी से एक plastic sleeve में रखा और sleeve पर पर्ची लगाई। फिर, थोड़ा रुककर, उसने वह sleeve बाकी ढेरों से अलग, अपने bag में रख ली।
विक्रांत ने यह देखा, पर उस वक़्त उसे इसमें कुछ अजीब नहीं लगा।
शाम ढलते-ढलते कबीर का मिज़ाज बदल चुका था।
विक्रांत ने उसकी आवाज़ बरामदे से सुनी, फ़ोन पर, उसी ऊँचे, ज़बरदस्ती खुश लहजे में जो वह clients के साथ इस्तेमाल करता था। फिर लहजा गिरा। आवाज़ धीमी हुई, तेज़, दबी हुई।
"...नहीं, उसे कुछ नहीं पता। मैंने बोला न... Survey वाली बात बाहर नहीं जानी चाहिए। बिल्कुल नहीं।"
विक्रांत सीढ़ियों के बीच रुक गया।
"...और अगर उसके घरवाले फिर से थाने गए तो? ...हाँ, तो दो और। जितना माँगे। बस मार्च से पहले ये deal..."
कबीर ने मुड़कर देखा। विक्रांत सीढ़ियों पर था, आधे अंधेरे में। एक पल को दोनों की नज़रें मिलीं। कबीर का चेहरा एक सेकंड के लिए खाली हुआ, फिर मुस्कान वापस आ गई, बहुत जल्दी, बहुत चौड़ी।
"बाद में बात करता हूँ," उसने फ़ोन में कहा, और काट दिया। "अरे! तू यहाँ है। चल, बैठते हैं। मैं Lucknow से एक bottle लाया था, ठंड बहुत है।"
उस रात, अँगीठी के पास, दो गिलास के बाद कबीर ने papers निकाल लिए। Sale agreement, power of attorney, पीली flags जहाँ-जहाँ sign करने थे।
"बस देख ले एक बार। कोई जल्दी नहीं।"
"किसके घरवाले थाने गए थे, कबीर?"
कबीर का हाथ papers पर रुक गया।
"Survey में क्या हुआ था?"
"कुछ नहीं हुआ।" कबीर ने गिलास उठाया। "एक मज़दूर था, बीच में काम छोड़कर भाग गया। उसके घरवाले हल्ला कर रहे हैं कि पैसे बाकी हैं। Settle कर रहा हूँ। Business है, यार, ऐसा होता रहता है।"
"और survey वालों ने बावड़ी के बोल्ट क्यों खोले थे?"
"Structure check करने।" कबीर ने गिलास ख़ाली किया। "तू न, विक्रांत, हर चीज़ में conspiracy ढूँढता है। ये तेरी lab नहीं है।"
विक्रांत ने papers उसकी तरफ़ वापस खिसका दिए।
"मैं अभी sign नहीं करूँगा।"
"क्यों?"
विक्रांत ने एक पल अँगीठी की आग देखी। कोठी बेचना मत।
"पापा ने मना किया था," उसने कहा।
कबीर ने उसे ऐसे देखा जैसे उसने कोई बहुत बेवकूफ़ी भरी बात कह दी हो। फिर उसके चेहरे पर कुछ और आया। गुस्सा नहीं। कुछ ज़्यादा थका हुआ। ज़्यादा हताश।
"चाचाजी ने," उसने धीरे से कहा, "तेईस साल में इस कोठी पर एक रुपया नहीं लगाया। एक बार झाँकने तक नहीं आए। और मरते-मरते याद आया कि बेचना मत?" उसने papers उठाए, मोड़े, अपनी jacket में रखे। "ठीक है। तू सोच ले। पर ज़्यादा मत सोचना। यहाँ ज़्यादा सोचना अच्छा नहीं होता।"
वह उठा और चला गया। उसके जाने के बाद विक्रांत ने महसूस किया कि आख़िरी वाक्य उसने बिल्कुल रघु काका के लहजे में कहा था।
उस रात विक्रांत ने तैयारी की।
अगर कुछ हो रहा था, तो वह उसे पकड़ेगा। Lab के तरीके से। Evidence के साथ, sync के साथ, ताकि सुबह किसी अंदाज़े, किसी डर, किसी "मुझे लगा कि" की गुंजाइश न बचे।
उसने अपना दूसरा recorder, बड़ा वाला, जिसमें दो अच्छे condenser mics थे, गलियारे के बीच में एक कुर्सी पर रखा, फ़ोन वाले स्टूल की तरफ़ मुँह करके। अपने मोबाइल को एक छोटे tripod पर लगाया, गलियारे के दूसरे सिरे पर, ताकि पूरा गलियारा फ्रेम में आए: उसके कमरे का दरवाज़ा, लकड़ी का फ़र्श, सीढ़ियाँ, स्टूल। Video record पर। उसने कमरे के बाहर का बल्ब जलता छोड़ दिया। पीली, काँपती रोशनी, पर काफ़ी।
फिर उसने वह किया जो हर shoot पर किया जाता है।
Camera के सामने खड़े होकर उसने एक ज़ोरदार ताली बजाई।
चटाक।
Sync slate। Audio और video को बाद में मिलाने के लिए। Video में जिस frame में हथेलियाँ मिलेंगी, audio में उसी पल ताली की तीखी spike होगी। अगर दोनों मिलते हैं, तो सब कुछ sync में है।
ताली की आवाज़ गलियारे में गूँजी और लौटी, और लौटने में थोड़ा ज़्यादा समय लगा, जैसे पिछली रात कबीर की हँसी के साथ हुआ था। विक्रांत ने उस पर ध्यान नहीं दिया।
फिर उसने calibration walk की। अपने कमरे के दरवाज़े से फ़ोन वाले स्टूल तक, धीमी, बराबर चाल से, ताकि बाद में recording में उसके कदमों का pattern एक reference बन सके। उसने कदम गिने, मन में, एक, दो, तीन, लकड़ी के तख़्ते हर कदम पर हल्के-से बोलते।
"...बाईस... तेईस... चौबीस।"
वह स्टूल पर पहुँचकर रुका। और रुकते ही उसे याद आया।
सीढ़ियाँ मत गिनना।
वह एक पल वहीं खड़ा रहा, फ़ोन के पास, और खुद पर हल्की, थकी हुई हँसी आई। ये सीढ़ियाँ नहीं हैं, ये कदम हैं। और पापा morphine पर थे।
उसने एक बार और ताली बजाई, end slate, और अपने कमरे में लौट आया। दरवाज़ा बंद किया। बिना रज़ाई ओढ़े पलंग पर बैठ गया और इंतज़ार करने लगा।
कुछ नहीं हुआ।
बारह बजे, कुछ नहीं। साढ़े बारह, कुछ नहीं। फ़ोन नहीं बजा। गलियारे से कोई आवाज़ नहीं आई। पंखा अपने डंडे पर एक-एक इंच घूमता रहा। चीं। पाँच सेकंड। चीं।
डेढ़ बजे के आसपास विक्रांत को लगा कि कोठी उसे देख रही है, ठीक वैसे ही जैसे वह कोठी को देख रहा था। दोनों इंतज़ार में। दोनों में से कोई पहले हिलना नहीं चाहता।
पौने दो बजे उसने हार मान ली। वह बाहर गया, recorder और मोबाइल उठा लाया, और laptop पर files डालीं। कम से कम calibration data तो काम आएगा।
उसने video खोला, audio file उसके नीचे की timeline पर रखी, और पहली ताली पर दोनों को मिलाया।
Video में: उसकी हथेलियाँ आपस में मिलती हुईं। Frame 214।
Audio में: ताली की तीखी, सफ़ेद spike। ठीक frame 214 पर।
Sync perfect था।
उसने play दबाया।
Screen पर वह खुद था, अपने कमरे के दरवाज़े पर, धीमे कदम उठाता, फ़ोन की तरफ़ बढ़ता। Headphones में लकड़ी के तख़्ते की आवाज़, हर कदम पर।
तीसरे-चौथे कदम पर विक्रांत की भौंहें सिकुड़ीं।
कुछ ठीक नहीं था। उसने रोका। पीछे किया। फिर play।
उसके पैर screen पर तख़्ते पर पड़ता है... और आवाज़ उससे पहले आ चुकी होती है।
उसने timeline को zoom किया। Frame by frame। Video में उसकी एड़ी तख़्ते को छूती है: frame 301। Audio में उस कदम की आवाज़: frame 289।
बारह frames पहले। आधा सेकंड।
Latency, उसका दिमाग़ तुरंत बोला। Codec drift। Audio और video के sample rates अलग होंगे, धीरे-धीरे खिसक रहे होंगे।
पर अगर drift होता तो वह धीरे-धीरे बढ़ता। पहले कदम पर कम, आख़िरी पर ज़्यादा। और ताली भी खिसकती।
उसने end slate देखी। आख़िरी ताली। Video में हथेलियाँ मिलती हैं, audio में spike। Perfect sync। उसी frame पर।
ताली ठीक थी। स्टूल के पास पहुँचकर उसकी हल्की-सी खाँसी, video में कंधे का हिलना, audio में खाँसी, perfect sync।
सिर्फ़ कदम गलत थे।
हर कदम। बाईस, तेईस, चौबीस। हर कदम की आवाज़ उसके पैर पड़ने से आधा सेकंड पहले recording में मौजूद थी। जैसे गलियारा उसके कदमों को पहले से जानता हो। जैसे फ़र्श उसके चलने का इंतज़ार नहीं कर रहा हो, बल्कि उसे गूँज की तरह पहले ही लौटा रहा हो।
विक्रांत की उँगलियाँ touchpad पर ठंडी पड़ गईं।
उसने फिर से गिना। Audio में कदम। Waveform पर हर कदम की छोटी, नुकीली spike। एक। दो। तीन। उसने गिनती जारी रखी, धीरे-धीरे, cursor को हर spike पर रखते हुए।
बाईस। तेईस। चौबीस।
Video में वह स्टूल के पास खड़ा है। रुका हुआ। पूरी तरह स्थिर, फ़ोन को देखता हुआ, शायद उसी पल जब उसे पापा की बात याद आई थी।
और audio में, उस स्थिरता के बीच, waveform पर एक और spike थी।
पच्चीस।
एक कदम। लकड़ी के तख़्ते पर, उसी वज़न का, उसी चाल का। स्टूल से एक कदम आगे, सीढ़ियों की तरफ़। एक ऐसा कदम जो उसने कभी नहीं उठाया था।
विक्रांत बहुत देर तक उस spike को देखता रहा। उसका दिमाग़ pattern पूरा कर रहा था, जैसे करने के लिए वह बना था, बिना उसकी मर्ज़ी के।
हर कदम की आवाज़ कदम से पहले आई थी।
तो इस आवाज़ का कदम...
अभी आना बाकी था।
कमरे में खामोशी थी। पंखा रुका हुआ था। लालटेन की लौ सीधी खड़ी थी। फिर वह धीरे-धीरे दरवाज़े की तरफ़ झुकने लगी, जैसे कोई ठंडी हवा उसे उधर खींच रही हो। और विक्रांत ने, अपने बंद दरवाज़े के ठीक उस पार, गलियारे के लकड़ी के फ़र्श पर, एक कदम सुना।
एक।
उसके वज़न का। उसकी चाल का।
और उसके बाद कोई दूसरा कदम नहीं आया। जो कोई भी था, वह वहीं रुक गया था। दरवाज़े के बाहर। बिल्कुल वैसे ही, जैसे विक्रांत रुका था। स्थिर। इंतज़ार में।
[Part 2 समाप्त]

Writer
Piyashi Atma
Story
जवाब मत देना
Chapter
2 of 30
Category
Ghost Stories
Reading time
21 min
Words
4155
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

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