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Part 1: रौशनपुर
Piyashi Atma · Ghost Stories · 24 मिनट
विक्रांत सहगल का मानना था कि दुनिया में कोई आवाज़ बेवजह पैदा नहीं होती।
हर आवाज़ के पीछे एक source होता है: कोई सतह जो काँपी, हवा का कोई दबाव जो टूटा, कोई गला जिसने साँस छोड़ी। पिछले बारह सालों से वह Delhi की एक forensic lab में यही काम करता आया था। अदालतों के लिए recordings की जाँच, कटी-फटी phone calls में से किसी अपराधी की आवाज़ अलग करना, यह साबित करना कि कोई tape असली है या जोड़-तोड़ से बनी है। उसके कानों ने हज़ारों चीखें, धमकियाँ और आख़िरी साँसें सुनी थीं। और हर बार, spectrogram की रंगीन लकीरों में, उसे वह जगह मिल जाती थी जहाँ से आवाज़ पैदा हुई थी।
इसीलिए जब taxi बहराइच से निकलकर तराई के अंधेरे में उतरी और ड्राइवर ने radio बंद कर दिया, तो विक्रांत ने सबसे पहले उस खामोशी की बनावट पर ध्यान दिया।
वह खाली खामोशी नहीं थी। उसमें engine की घरघराहट थी, टायरों के नीचे कुचलती बजरी थी, और खिड़की के शीशे पर कोहरे की नमी के सरकने की एक बारीक-सी सरसराहट थी। पर बाहर से कुछ नहीं आ रहा था। न झींगुर, न किसी कुत्ते का भौंकना, न दूर किसी ट्रैक्टर की आवाज़। जैसे दुनिया ने उस सड़क के दोनों तरफ़ किसी ने मोटी दीवारें खड़ी कर दी हों।
"Radio क्यों बंद कर दिया?" विक्रांत ने पूछा।
ड्राइवर ने mirror में उसे देखा। पचास के आसपास का आदमी था। बहराइच station के बाहर उसने किराया तय करते वक़्त ज़्यादा मोलभाव नहीं किया था, पर "रौशनपुर" सुनकर एक पल रुका ज़रूर था।
"Signal नहीं आता साहब इधर।"
"दस मिनट पहले तो आ रहा था।"
ड्राइवर ने कोई जवाब नहीं दिया। Headlights की रोशनी कोहरे में ज़्यादा दूर नहीं जा रही थी। सफ़ेद धुंध की एक दीवार थी जो हर पल गाड़ी के सामने बनती और हर पल पीछे छूटती जाती। सड़क के किनारे साल के पेड़ अपनी जगह से उभरते, एक पल के लिए किसी लंबे, पतले आदमी की तरह खड़े दिखते, और फिर धुंध में घुल जाते।
विक्रांत ने अपने jacket की जेब में हाथ डालकर उस छोटे Zoom recorder को टटोला जो वह हमेशा साथ रखता था। आदत थी। नई जगह पहुँचकर वहाँ की "room tone" record करना, यानी किसी जगह की अपनी खामोशी। हर जगह की खामोशी अलग होती है। Delhi के उसके flat की खामोशी में fridge की गुनगुनाहट और नीचे सड़क का दबा हुआ शोर था। अस्पताल के ICU की खामोशी में machines की बीप थी।
ICU की याद आते ही उसने recorder छोड़ दिया।
आठ दिन पहले, ICU के उसी नीले-सफ़ेद कमरे में, उसके पिता ने आख़िरी बार आँखें खोली थीं। ओमप्रकाश सहगल एक सख़्त, कम बोलने वाले आदमी थे। माँ के जाने के बाद पिछले दो साल में तो और भी कम बोलने लगे थे। विक्रांत से उनका रिश्ता ऐसा था जैसे दो लोग एक ही कमरे में अलग-अलग दीवारों की तरफ़ मुँह करके बैठे हों। फ़ोन पर बातें होतीं: "खाना खाया?" "हाँ।" "काम ठीक चल रहा है?" "हाँ।" बस।
पर उस आख़िरी शाम पिता ने उसका हाथ इतनी ज़ोर से पकड़ा था कि उसकी उँगलियाँ सफ़ेद पड़ गई थीं। Oxygen mask के पीछे से उनकी आवाज़ टूटी हुई निकली थी।
"कोठी... बेचना मत।"
"पापा, आराम कीजिए।"
"सुन।" उनकी आँखें किसी ऐसी चीज़ पर टिकी थीं जो विक्रांत के कंधे के पीछे थी। "और सीढ़ियाँ... मत गिनना।"
उसके बाद उन्होंने कुछ नहीं कहा। रात तीन बजे monitor की लकीर सीधी हो गई।
विक्रांत ने उस वाक्य को बहुत बार दोहराया था। Morphine का असर, दिमाग़ में ऑक्सीजन की कमी, बुढ़ापे का भ्रम। उसके पास हर explanation तैयार था। फिर भी वह वाक्य उसके अंदर किसी अटके हुए सुर की तरह बजता रहता था। सीढ़ियाँ मत गिनना।
कोठी। रौशनपुर की सहगल कोठी, जिसके बारे में घर में कभी बात नहीं होती थी। जिसे परिवार ने तेईस साल पहले छोड़ दिया था और फिर कभी पलटकर नहीं देखा। अब वह उसकी थी, उसकी और उसके cousin कबीर की, आधी-आधी। और कबीर उसे बेचना चाहता था।
गाड़ी एक झटके से रुकी।
सामने एक पुलिया थी, पत्थर की, पुरानी, जिसके दोनों तरफ़ झाड़ियाँ उग आई थीं। पुलिया के उस पार कोहरा और गहरा था।
"बस साहब। आगे नहीं जाएगी।"
"क्यों? सड़क तो है।"
"सड़क है।" ड्राइवर ने engine बंद नहीं किया, जैसे उसे डर हो कि दोबारा start न हो। "पर रात में मैं उधर नहीं जाता। आगे आधा किलोमीटर है, सीधा रास्ता है, कोठी दिख जाएगी। कोई न कोई लालटेन लेकर खड़ा होगा, उन्हें पता है आप आ रहे हैं।"
विक्रांत ने एक पल उसे देखा। उसके मन में बहस करने की इच्छा उठी: डर किस बात का है, गाँव में ऐसा क्या है। पर उसने देखा कि ड्राइवर की उँगलियाँ steering पर कसी हुई थीं और वह mirror में देखने से बच रहा था। Forensic lab में बिताए सालों ने उसे एक बात सिखाई थी: जब कोई इंसान झूठ बोलता है तो उसकी आवाज़ बदलती है, पर जब कोई डरता है तो उसका शरीर बदलता है। यह आदमी झूठ नहीं बोल रहा था।
उसने पैसे दिए और अपना bag निकाला। जैसे ही वह मुड़ा, ड्राइवर ने खिड़की थोड़ी नीचे की।
"साहब।"
"हाँ?"
"गाँव में ज़ोर से मत बोलिएगा।" उसने कहा, और इस बार उसकी आवाज़ लगभग फुसफुसाहट थी। "और रात में कोई आपको नाम लेकर बुलाए... तो पहले देख लीजिएगा कौन है।"
इससे पहले कि विक्रांत कुछ पूछता, गाड़ी पलटी और उसकी लाल tail-lights कोहरे में दो धुँधले धब्बे बनकर गायब हो गईं।
वह पुलिया पर अकेला खड़ा रहा।
ठंड पैरों से ऊपर चढ़ रही थी। दिसंबर की तराई वाली ठंड, जो हवा से नहीं, नमी से आती है। हड्डियों तक पहुँचने वाली, गीली, भारी ठंड। विक्रांत ने अपना muffler कसा और पुलिया पार की।
पत्थर के नीचे कोई नाला बह रहा होगा, उसने सोचा। पर पानी की कोई आवाज़ नहीं आई। उसने नीचे झाँका। अंधेरे में कुछ नहीं दिखा। बस सूखी, काली मिट्टी की गंध।
आदतन उसने recorder निकालकर on कर दिया। लाल बत्ती जली। Input levels की हरी पट्टी लगभग स्थिर थी, बस उसके अपने कदमों पर हल्की-सी उछल जाती।
रास्ता सीधा था, जैसा ड्राइवर ने कहा था। दोनों तरफ़ खेत रहे होंगे, शायद गन्ने के, क्योंकि कोहरे में ऊँची, झुकी हुई आकृतियाँ खड़ी थीं जो हवा न होने के बावजूद हल्की-हल्की हिलती लग रही थीं। विक्रांत ने खुद को याद दिलाया कि यह optical illusion है। Low-visibility में आँखें motion गढ़ लेती हैं। दिमाग़ खाली जगहों को भरता है।
कुछ दूर चलने पर पहले घर दिखे।
मिट्टी और ईंट के घर, नीची छतें, आँगनों में बँधे जानवरों की धुँधली आकृतियाँ। एक घर का दरवाज़ा आधा खुला था और अंदर ढिबरी की पीली रोशनी थी। विक्रांत ने गुज़रते हुए अंदर झाँका तो एक पल के लिए उसके कदम धीमे हो गए।
अंदर की दीवारों पर रज़ाइयाँ टँगी थीं।
बिछी हुई नहीं, टँगी हुई। मोटी, पुरानी, रंग-बिरंगी रज़ाइयाँ, कीलों से दीवारों पर ऐसे लगी थीं जैसे किसी ने पूरे कमरे को अंदर से गद्दों से ढक दिया हो। एक कोने में कोई बूढ़ी औरत बैठी थी। उसने विक्रांत को देखा और बिना कुछ कहे उठकर दरवाज़ा बंद कर दिया। धीरे से, बिना कोई आवाज़ किए।
अगला घर भी वैसा ही था। उसके बाद वाले में दीवारों पर टाट के बोरे लटके थे।
सर्दी से बचने का कोई local तरीका होगा, विक्रांत ने सोचा। Insulation।
पर एक हिस्सा, उसका professional हिस्सा, यह भी जानता था कि रज़ाइयाँ और टाट गर्मी से ज़्यादा किसी और चीज़ को रोकते हैं। Recording studios की दीवारों पर भी यही होता है। मोटा कपड़ा, foam, absorption panels। ताकि आवाज़ टकराकर लौटे नहीं।
ताकि गूँज न बने।
उसने इस विचार को झटक दिया।
गाँव के बीच में एक छोटा चौक था और चौक के किनारे एक मंदिर। पुराना, चूने से पुता, सामने एक पीपल। मंदिर के दरवाज़े पर एक दीया जल रहा था और उसकी लौ बिल्कुल सीधी, बिल्कुल स्थिर थी। विक्रांत ने देखा कि मंदिर के ऊपर, जहाँ आम तौर पर घंटी लटकती है, बस एक जंग लगा लोहे का हुक था। खाली।
उसने हुक को कुछ सेकंड देखा। उसके नीचे पत्थर पर एक घिसा हुआ गोल निशान था, जैसे सालों तक किसी रस्सी ने वहाँ रगड़ खाई हो। फिर किसी दिन वह रस्सी हटा दी गई हो।
"आप आ गए।"
आवाज़ उसके बाएँ से आई और विक्रांत का दिल एक धड़कन चूक गया। उसने मुड़कर देखा।
पीपल की जड़ों के पास एक बूढ़ा आदमी लालटेन लिए खड़ा था। दुबला, झुका हुआ, सिर पर ऊनी टोपी, कंधों पर भूरी लोई। उसका चेहरा झुर्रियों से भरा था और आँखें छोटी, धँसी हुई थीं। विक्रांत को अजीब लगा कि वह उसे आते हुए नहीं देख पाया। वह आदमी शायद वहाँ बहुत देर से खड़ा था, उतना ही स्थिर जितनी मंदिर के दीये की लौ।
"आप... रघु काका?"
बूढ़े ने सिर हिलाया। उसने न विक्रांत का नाम लिया, न कोई "साहब" कहा, न "बेटा"। बस लालटेन थोड़ी ऊँची की और मुड़ गया।
"चलिए। कोठी पास ही है।"
सहगल कोठी कोहरे से ऐसे निकली जैसे पानी से कोई डूबा जहाज़ ऊपर आए।
पहले उसकी ऊँचाई दिखी। आसपास के नीचे घरों के बीच एक दो-मंज़िला ढाँचा, ऊपर झरोखे, किनारों पर टूटी हुई मुंडेरें। फिर उसका फाटक, लोहे का, ऊँचा, जिस पर बेलों जैसी नक्काशी थी। फिर पीली-भूरी दीवारें, जिन पर बरसों की बारिश ने काली लकीरें खींच दी थीं।
रघु काका ने फाटक खोला। उसके कब्ज़े चरमराए नहीं। उनमें शायद हाल ही में तेल डाला गया था। विक्रांत ने यह बात नोट की।
अंदर एक बड़ा आँगन था, बीच में तुलसी का एक सूखा चौरा। चारों तरफ़ बरामदे, मेहराबें, और उनके पीछे अंधेरे दरवाज़े। बाईं तरफ़ की एक खिड़की से रोशनी आ रही थी और किसी के बोलने की आवाज़, एक आदमी की, ऊँची, फ़ोन पर।
"...नहीं भाई, मैंने बोल दिया न, इस हफ़्ते हो जाएगा। Paperwork ready है। बस वो आ जाए, signature..."
आवाज़ रुकी। फिर तेज़ कदम। फिर दरवाज़ा खुला और कबीर बाहर आया, मोबाइल अभी भी कान से लगा।
"आ गया! भाई आ गया!" उसने फ़ोन में कहा, "बाद में बात करता हूँ," और फ़ोन jacket में ठूँसते हुए दोनों बाँहें फैलाकर आगे बढ़ा।
कबीर सहगल हमेशा ऐसा ही था। ज़्यादा ऊँची आवाज़, ज़्यादा चौड़ी मुस्कान, ज़्यादा कसकर गले लगाना। Lucknow में real estate का काम करता था। महँगी jacket, महँगी घड़ी, और आँखों के नीचे काले घेरे जो विक्रांत ने पिता के अंतिम संस्कार पर भी देखे थे। उसने विक्रांत को गले लगाया और पीठ पर दो बार थपथपाया।
"Sorry यार। चाचाजी के लिए। सच में।"
"हम्म।"
"रास्ते में दिक्कत तो नहीं हुई? वो taxi वाले साले पुलिया से आगे नहीं आते, मैंने बोला था रघु काका को..."
"मिल गए थे।" विक्रांत ने पीछे मुड़कर देखा। रघु काका आँगन के एक कोने में खड़ा था, लालटेन नीचे रखे, उनकी तरफ़ पीठ किए। "गाँव काफ़ी... शांत है।"
कबीर हँसा, ज़ोर से, और उसकी हँसी आँगन की दीवारों से टकराई।
उस हँसी में कुछ गलत था। विक्रांत ने महसूस किया, पर तुरंत समझ नहीं पाया क्या। उसकी हँसी लौटी, गूँजी, पर लौटने में एक पल ज़्यादा लगा। जैसे आँगन की दीवारें जितनी दिखती थीं, उससे कहीं दूर थीं।
"शांत?" कबीर बोला। "यार ये मुर्दों का गाँव है। आठ बजे सब सो जाते हैं, कोई बात नहीं करता, मोबाइल में signal आधा आता है। Trust me, तीन दिन में तू भी पागल हो जाएगा। इसीलिए तो बोल रहा हूँ, जल्दी काम निपटाते हैं। Terai Retreats वालों का offer बहुत अच्छा है, विक्रांत। इस खंडहर के लिए इससे अच्छा कोई नहीं देगा।"
"कल बात करते हैं।"
"हाँ हाँ, कल। Obviously।" कबीर ने उसका bag उठा लिया। "चल, अंदर चल। और हाँ, एक और मेहमान है यहाँ। Archivist। Lucknow से बुलाया है मैंने, लाइब्रेरी का catalogue बनाने के लिए। बेचने से पहले पता तो होना चाहिए न कि अंदर कितनी कीमती चीज़ें पड़ी हैं। पुरानी उर्दू-फ़ारसी किताबें हैं, नवाबों के ज़माने की। कुछ तो लाखों की निकलेंगी।"
"मेहमान" शब्द पर विक्रांत ने रघु काका को हल्का-सा सिहरते देखा। या शायद ठंड थी।
लाइब्रेरी कोठी के पश्चिमी हिस्से में थी: एक लंबा, ऊँची छत वाला कमरा, जिसकी तीन दीवारें फ़र्श से छत तक लकड़ी की अलमारियों से ढकी थीं। अलमारियों में किताबें, बस्ते, लाल कपड़े में बँधी पांडुलिपियाँ, और कुछ ऐसी चीज़ें जिन्हें विक्रांत पहचान नहीं पाया। तीन-चार लालटेनें और एक battery lamp जल रहे थे। हवा में पुराने काग़ज़, धूल और किसी कीटनाशक की तीखी गंध थी।
कमरे के बीच में एक लंबी मेज़ थी और मेज़ पर झुकी एक औरत, जिसके हाथों में सफ़ेद cotton gloves थे।
"इरा," कबीर ने कहा। "ये मेरा भाई। विक्रांत।"
इरा क़ुरैशी ने सिर उठाया। तीस के आसपास की, सीधे कटे बाल, मोटा ऊनी sweater, चश्मा जिसे उसने उतारकर मेज़ पर रख दिया। उसका चेहरा शांत था, पर आँखें तेज़, जैसे कोई चीज़ को देखते ही उसका दाम, उसकी उम्र और उसका इतिहास तौल लेती हों।
"आपके पिता के लिए अफ़सोस है," उसने कहा। उसकी आवाज़ धीमी और साफ़ थी। लखनवी लहजा, बिना बनावट के।
"शुक्रिया।"
"मैं gloves नहीं उतारूँगी, हाथ मिलाने के लिए माफ़ी।" उसने हल्का-सा मुस्कुराकर हाथ उठाए। "ये काग़ज़ बहुत नाज़ुक हैं। कुछ तो डेढ़ सौ साल पुराने हैं।"
"कुछ मिला काम का?" कबीर ने पूछा। उसकी आवाज़ में उत्सुकता कम, बेचैनी ज़्यादा थी।
"अभी तो बस ऊपर-ऊपर देखा है। ज़्यादातर हिसाब-किताब के बही-खाते हैं, ज़मीन के काग़ज़, कुछ शायरी के दीवान। लेकिन ऊपर वाली अलमारियों में कुछ चीज़ें हैं जो..." उसने रुककर एक बँधे हुए बस्ते की तरफ़ देखा। "...जो दिलचस्प हैं। अभी कुछ कहना जल्दी होगा।"
विक्रांत अलमारियों के पास गया। उसने एक किताब की पीठ पर उँगली फेरी। धूल की मोटी परत थी, पर उस पर उँगलियों के ताज़ा निशान भी थे। इरा के होंगे।
उसने अपना छोटा notebook निकाला और कुछ लिखने लगा। Ceiling की ऊँचाई का अंदाज़ा, दीवारों की सामग्री। Professional आदत। हर नई जगह की acoustic profile।
"आप left-handed हैं," इरा ने कहा।
विक्रांत ने अपने हाथ की तरफ़ देखा, जिसमें pen था। "हाँ।"
"हमेशा से?"
अजीब सवाल था। "हाँ। हमेशा से। क्यों?"
"कुछ नहीं।" इरा ने फिर चश्मा पहन लिया। "Archivists को आदत होती है। हम हर चीज़ में pattern ढूँढते हैं। लिखने का तरीका, स्याही का झुकाव..." वह मुस्कुराई। "Occupational disease।"
"समझ सकता हूँ," विक्रांत ने कहा। "मेरी occupational disease ये है कि मैं हर आवाज़ का source ढूँढता हूँ।"
"और यहाँ मिलेंगे आपको बहुत सारे," कबीर ने हँसकर कहा, फिर अपनी ही हँसी पर रुक गया। "मतलब... पुरानी इमारत है। लकड़ी चरमराती है, चूहे हैं, छत पर बंदर आते हैं।"
इरा ने कुछ नहीं कहा। उसने बस कबीर को एक पल देखा, फिर वापस अपने काग़ज़ों पर झुक गई।
खाना रघु काका ने बनाया था: मोटी रोटियाँ, अरहर की दाल, आलू-गोभी, और गुड़ का एक टुकड़ा। वे रसोई के पास वाले छोटे कमरे में खाए, जहाँ एक अँगीठी जल रही थी। उस कमरे की दीवारों पर भी रज़ाइयाँ टँगी थीं।
"ये रज़ाइयाँ," विक्रांत ने रोटी तोड़ते हुए कहा, "दीवारों पर क्यों हैं? पूरे गाँव में देखी मैंने।"
"ठंड," कबीर ने कहा, मुँह भरा हुआ।
विक्रांत ने रघु काका की तरफ़ देखा, जो दरवाज़े के पास बैठा था, खाना नहीं खा रहा था, बस अँगीठी की आग देख रहा था।
"काका?"
रघु काका ने सिर नहीं उठाया। "पुराना रिवाज है। आवाज़ कम होती है।"
"आवाज़ कम होती है," विक्रांत ने दोहराया। "किसलिए?"
"रात में आवाज़ दूर तक जाती है।" बूढ़े की आवाज़ इतनी धीमी थी कि अँगीठी की चटचटाहट में लगभग खो गई। "यहाँ ज़मीन के नीचे पानी था कभी। पत्थर है बहुत। आवाज़ लौटती है।"
"Echo।" विक्रांत ने सिर हिलाया। "Interesting। तो लोगों को echo से problem है?"
रघु काका ने जवाब नहीं दिया। उठा, बर्तन समेटे और रसोई में चला गया।
कबीर ने आँखें घुमाईं। "छोड़ यार। गाँव के लोग हैं। हर चीज़ के पीछे कोई कहानी होती है। मंदिर की घंटी तक उतार दी इन्होंने, पता है? पचास साल हो गए, किसी ने वापस नहीं लगाई।"
"क्यों उतारी?"
"किसी को नहीं पता। या पता है पर बताते नहीं।" कबीर ने गिलास में पानी डाला। "Honestly, विक्रांत, ये सब resort वालों के लिए selling point है। 'Haunted heritage stay'। लोग पैसे देकर डरने आते हैं आजकल।"
इरा, जो अब तक चुप थी, बोली: "पहले ये बताइए कि सौदे की इतनी जल्दी क्यों है?"
कबीर का हाथ गिलास पर रुक गया। एक पल के लिए। फिर उसने पानी पिया।
"जल्दी क्या है? Offer है, ठीक है, ले लो। Market का भरोसा नहीं।"
"तीन महीने पहले जो survey हुआ था..."
"इरा।" कबीर की आवाज़ थोड़ी सख़्त हुई। फिर वह मुस्कुराया। "Survey routine था। ज़मीन की नाप-जोख। उसमें क्या है?"
इरा ने कंधे उचकाए और चुप हो गई। विक्रांत ने दोनों को देखा। कमरे में कोई बात हवा में अटक गई थी, कोई ऐसी बात जो उसकी पहुँच से बाहर थी।
उसने इसे अपने notebook में नहीं लिखा, पर दिमाग़ में दर्ज कर लिया। Survey। तीन महीने पहले। कबीर नहीं चाहता इसकी बात हो।
खाने के बाद कबीर उसे कोठी घुमाने ले गया। "ताकि सुबह तुझे खो जाने का डर न हो," उसने कहा।
ऊपर की मंज़िल पर बंद कमरों की कतार थी। हर दरवाज़े के कब्ज़े के पास लोहे की कीलें ठुकी थीं, मोटी, काली, कुछ नई और चमकदार। विक्रांत ने एक को छूकर देखा।
"ये रघु काका का काम है," कबीर ने कहा। "आदमी को कीलों का शौक है। हर दूसरे दिन नई ठोक देता है।"
नीचे उतरकर वे पीछे की ओर बढ़े। एक लंबा, सँकरा गलियारा था, जिसकी छत नीची थी और दीवारें ठंडी। गलियारे के अंत में एक लकड़ी का दरवाज़ा था, उस पर भी कीलें।
"और ये," कबीर ने दरवाज़ा खोलते हुए कहा, "इस पूरी property का सबसे बड़ा selling point।"
बाहर एक दूसरा आँगन था, पहले वाले से छोटा, ऊँची दीवारों से घिरा। कोहरा यहाँ और भी घना था, ज़मीन से लिपटा हुआ। और आँगन के बीच में, कोहरे के नीचे, ज़मीन में एक चौकोर, काला मुँह था।
बावड़ी।
विक्रांत कुछ कदम आगे बढ़ा। पत्थर के चबूतरे के किनारे एक मोटी लोहे की जाली थी, जिसके ऊपर एक भारी पत्थर की पटिया रखी थी। जाली के सिरों पर मोटे-मोटे बोल्ट थे। जाली के बीच की दरारों से नीचे देखने पर बस अंधेरा था। ठहरा हुआ, गहरा अंधेरा, जो धुंध से भी ज़्यादा ठोस लगता था।
और उसमें से एक गंध आ रही थी। ठंडे पत्थर की, सीलन की, और कुछ ऐसी चीज़ की जो सालों से धूप से दूर रही हो।
"सतखंडी बावड़ी," कबीर ने कहा। "सात तल नीचे। अठारह सौ नब्बे के आसपास की। सोच, resort का centerpiece। नीचे lights लगा दो, ऊपर glass का floor, शाम को लोग wine पीते हुए नीचे देखें। Instagram पागल हो जाएगा।"
विक्रांत ने कोई जवाब नहीं दिया।
वह उस अंधेरे को देख रहा था और उसके अंदर कुछ होना चाहिए था। कोई याद। वह यहाँ आ चुका था, तेईस साल पहले, जब वह नौ साल का था। दादाजी की तेरहवीं पर। यहीं, इसी कोठी में। यहीं कहीं अंशु...
पर कुछ नहीं आया।
यह उसके लिए नया नहीं था। उसे नौ साल की उम्र से पहले का लगभग कुछ याद नहीं था। कुछ धुँधली तस्वीरें: Delhi के पुराने घर की नीली खिड़की, स्कूल की एक बेंच। पर रौशनपुर? यह कोठी? वह बावड़ी जिसमें, जैसा परिवार ने बताया था, नहीं, परिवार ने बताया था कि अंशु Delhi के पास एक तालाब में डूबा था...
उसका माथा सिकुड़ गया।
किसने बताया था कि तालाब था?
माँ ने। शायद। पिता ने कभी अंशु का ज़िक्र ही नहीं किया।
"तू ठीक है?" कबीर ने पूछा।
"हम्म।" विक्रांत ने जाली के बोल्टों को देखा। उनमें से दो पर जंग नहीं थी। साफ़, चमकदार धातु, जैसे हाल ही में खोले और कसे गए हों। "ये बोल्ट नए हैं।"
"Survey वालों ने check किया था। Structure safe है या नहीं।" कबीर ने बहुत जल्दी कहा। फिर, जैसे बात बदलने के लिए, वह बावड़ी की तरफ़ मुँह करके ज़ोर से चिल्लाया: "विक्रांत सहगल! नया मालिक!"
आवाज़ नीचे गई।
और लौटी।
...सहगल... मालिक...
पर उससे पहले, कबीर की आवाज़ के ख़त्म होने और गूँज लौटने के बीच, कुछ और भी था। विक्रांत ने उसे सुना। या उसे लगा कि उसने सुना। एक बहुत हल्की, बहुत दबी हुई आवाज़ नीचे से, जो किसी शब्द की तरह नहीं, बस एक छोटी-सी साँस की तरह थी, जैसे कोई जवाब देने वाला हो और फिर रुक गया हो।
पीछे से किसी चीज़ के गिरने की आवाज़ आई।
दोनों मुड़े। गलियारे के दरवाज़े पर रघु काका खड़ा था। उसके पैरों के पास पीतल का एक लोटा गिरा हुआ था, पानी पत्थर पर फैल रहा था। उसका चेहरा, लालटेन की रोशनी में, किसी पुराने काग़ज़ जैसा सफ़ेद था।
"यहाँ नाम मत लीजिए," उसने कहा। उसकी आवाज़ काँप रही थी, पर धीमी थी, बहुत धीमी। "रात में। बावड़ी के पास। किसी का नाम मत लीजिए।"
"अरे काका..." कबीर ने हँसने की कोशिश की।
"मत लीजिए।"
बूढ़े ने लोटा उठाया और बिना पीछे देखे चला गया। उसके कदम गलियारे में धीरे-धीरे गायब हुए।
कबीर ने विक्रांत को देखा, कंधे उचकाए, और मुस्कुराया। पर उसकी मुस्कान आधी ही बनी।
विक्रांत ने अपनी जेब में recorder को छुआ। लाल बत्ती अभी भी जल रही थी।
उसका कमरा ऊपर की मंज़िल पर था, पूर्वी कोने में। एक बड़ा, ठंडा कमरा, जिसमें एक पुराना पलंग था, एक भारी अलमारी, एक धुँधला आईना और छत पर एक पंखा, पुराने ज़माने का, लोहे के लंबे डंडे से लटका हुआ। रघु काका ने पलंग पर दो रज़ाइयाँ रख दी थीं और एक लालटेन जला दी थी। कोठी में बिजली थी, पर कमज़ोर; बल्ब पीली, थकी हुई रोशनी देता और बीच-बीच में काँप जाता।
विक्रांत ने अपना laptop निकाला और headphones लगाकर उस दिन की recording सुनी।
पुलिया से शुरुआत। उसके कदम, बजरी, उसकी अपनी साँसें। गाँव में घुसना। सब normal।
फिर बावड़ी वाला हिस्सा।
कबीर की चिल्लाहट: "विक्रांत सहगल! नया मालिक!" फिर गूँज।
उसने उस हिस्से को loop किया। आवाज़ और गूँज के बीच के उस अंतराल को zoom किया। Spectrogram पर रंगों की लकीरें: कबीर की आवाज़ की मोटी, नारंगी-पीली पट्टियाँ, फिर नीली खामोशी, फिर गूँज की धुँधली लौटती लहरें।
बीच में, खामोशी वाले हिस्से में, एक बहुत पतली लकीर थी। Low frequency, सिर्फ़ डेढ़ सौ milliseconds की। जैसे किसी ने अपने होंठ खोले हों बोलने के लिए।
Noise, उसने खुद से कहा। हवा का कोई झोंका। पत्थर में नमी का खिसकना।
उसने laptop बंद किया।
बाहर से कोई आवाज़ नहीं आ रही थी। पूरे गाँव में, पूरे जंगल में, कोई झींगुर नहीं, कोई कुत्ता नहीं, कोई पत्ता नहीं। बस पंखे की धीमी चरमराहट। पंखा चल नहीं रहा था, पर ऊपर से आती हवा में धीरे-धीरे घूम रहा था, एक-एक इंच। हर बार जब वह किसी ख़ास कोण पर पहुँचता, उसके डंडे से एक बारीक चीं निकलती।
चीं।
चार-पाँच सेकंड।
चीं।
विक्रांत ने आँखें बंद कीं। माँ की याद आई, जैसे अक्सर इस वक़्त आती थी, रात के उस घंटे में जब दिमाग़ अपनी दीवारें ढीली कर देता है। माँ, जो आख़िरी सालों में बहुत चुप हो गई थीं। जो कभी-कभी उसे ऐसे देखती थीं जैसे उसके चेहरे में कुछ ढूँढ रही हों और मिल नहीं रहा हो। एक बार, जब वह कॉलेज में था, माँ ने उसे सोते हुए देखकर धीरे से एक नाम लिया था, और उसकी आँख खुल गई थी, पर उसने सोने का नाटक किया था, और माँ बहुत देर तक वहीं बैठी रोती रही थीं।
उसे वह नाम याद नहीं था।
अजीब बात थी। उसे वह रात याद थी, माँ का रोना याद था, पर नाम नहीं।
चीं।
किसी पल उसे नींद आ गई।
फ़ोन की घंटी ने उसे जगाया।
पहले उसे लगा मोबाइल है। उसने अँधेरे में हाथ बढ़ाया, तकिए के पास टटोला। मोबाइल वहीं था, ठंडा, स्क्रीन काली। Signal: शून्य। समय: 12:04।
घंटी फिर बजी।
बाहर से। गलियारे से।
विक्रांत उठ बैठा। लालटेन बुझ चुकी थी। कमरे में खिड़की से आती कोहरे की सफ़ेद, बेजान रोशनी थी, जो किसी चीज़ को रोशन नहीं करती, बस अंधेरे को थोड़ा कम काला कर देती है।
घंटी तीसरी बार बजी। पुराने ज़माने की mechanical घंटी, असली धातु की, जो फ़ोन के अंदर किसी हथौड़े से बजती है। ट्रिन्न्न्न... ट्रिन्न्न्न...
उसे याद आया। शाम को कोठी घूमते हुए उसने सीढ़ियों के पास एक स्टूल पर रखा एक पुराना landline देखा था। मटमैले क्रीम रंग का, बटनों वाला, नब्बे के दशक का। उसने कबीर से पूछा था, और कबीर ने हँसकर कहा था, "Antique है। Line तो 2003 में ही कट गई थी। रघु काका साफ़ करता रहता है, पता नहीं क्यों।"
विक्रांत ने उस फ़ोन का तार भी देखा था। स्टूल से नीचे लटकता हुआ, दीवार तक जाता, और दीवार के socket से पहले ही ख़त्म। कटा हुआ। हवा में झूलता।
ट्रिन्न्न्न...
उसने मोबाइल की torch जलाई और दरवाज़ा खोला।
गलियारा लंबा था और torch की सफ़ेद किरण उसे पूरी तरह रोशन नहीं कर पा रही थी। किरण के किनारों पर अंधेरा सिकुड़ता और फैलता। ठंड कमरे से ज़्यादा थी, और हवा में एक गंध थी जो पहले नहीं थी।
गीला पत्थर। काई।
जैसे गलियारा किसी कुएँ के अंदर हो।
ट्रिन्न्न्न...
सीढ़ियाँ बाईं तरफ़ थीं, और सीढ़ियों के ऊपरी सिरे पर, स्टूल पर, वह फ़ोन। हर घंटी के साथ उसका रिसीवर अपने cradle में हल्का-सा काँपता था। Torch की रोशनी उस पर पड़ी तो विक्रांत ने उसका कटा हुआ तार देखा, नीचे झूलता हुआ, पीतल के धागे बाहर निकले हुए।
उसने किसी को आवाज़ देनी चाही, कबीर को, रघु काका को। फिर उसे ड्राइवर की बात याद आई। गाँव में ज़ोर से मत बोलिएगा। और रघु काका का सफ़ेद चेहरा। किसी का नाम मत लीजिए।
बकवास, उसके अंदर के तर्क ने कहा। ये फ़ोन बज रहा है। इसके अंदर कोई battery होगी, कोई पुराना capacitor जो किसी short circuit से trigger हुआ। तुम ये जानते हो। तुमने इससे अजीब चीज़ें देखी हैं।
उसने नहीं देखी थीं।
उसने फ़ोन तक पहुँचकर एक पल उसे देखा। घंटी बजी, एक बार और, और इस बार इतने पास से कि उसकी कंपन उसके दाँतों में महसूस हुई।
उसने जेब से recorder निकाला, on किया, और रिसीवर उठा लिया।
घंटी रुक गई।
रिसीवर ठंडा था। इतना ठंडा, जैसे किसी ने उसे बर्फ़ के पानी में डुबोकर रखा हो। उसने उसे कान से लगाया।
पहले कुछ नहीं।
फिर hiss। Static नहीं, उससे अलग। एक खुली, गहरी, हवादार आवाज़, जैसे लाइन के दूसरी तरफ़ कोई बहुत बड़ी खाली जगह हो। पत्थर की दीवारों वाली कोई जगह, जहाँ आवाज़ गिरती है और देर तक लौटती रहती है।
और उस खाली जगह में, बहुत दूर, पानी टपकने की आवाज़।
टप।
कई सेकंड।
टप।
विक्रांत का professional दिमाग़, उसकी इच्छा के ख़िलाफ़, analysis कर रहा था। Reverb time दो-ढाई सेकंड। बड़ी, बंद, पत्थर की जगह। गहरी। नीचे की ओर फैली हुई।
उसका हाथ काँपने लगा।
"Hello?" उसने कहा। उसकी आवाज़ फुसफुसाहट से ज़्यादा नहीं निकली।
लाइन के दूसरी तरफ़ की खामोशी बदली। जैसे किसी ने सुना हो। जैसे कोई करीब आया हो।
फिर एक आवाज़ आई।
एक औरत की आवाज़। थकी हुई, हाँफती हुई, जैसे बहुत रोने के बाद या बहुत दौड़ने के बाद बोल रही हो। आवाज़ में उस बड़ी, खाली जगह की गूँज लिपटी थी, हर शब्द के पीछे उसका धुँधला साया।
और विक्रांत ने उस आवाज़ को पहचाना।
उसने उसे बत्तीस साल तक सुना था। लोरियों में, डाँट में, फ़ोन पर "खाना खाया?" में। दो साल पहले उसने आख़िरी बार उसे अस्पताल के एक बिस्तर पर बहुत धीमे, बहुत टूटे हुए सुना था। फिर अग्नि ने उसे हमेशा के लिए चुप कर दिया था।
"...सुन रहे हो?" माँ की आवाज़ ने कहा। किसी और से, विक्रांत से नहीं; जैसे वह किसी ऐसे इंसान से बात कर रही हो जो उसके बगल में खड़ा हो। "...मेरी बात सुनो... मैंने देखा उसे... जब वो ऊपर आया..."
विक्रांत का गला बंद हो गया। रिसीवर उसके हाथ में पत्थर जैसा भारी हो गया।
"मम्मी?"
उसने यह शब्द कहा, और कहते ही उसे लगा कि उसने कोई गलती की है। जैसे किसी अंधेरे कमरे में उसने अपनी जगह बता दी हो।
लाइन पर खामोशी छा गई। पानी का टपकना भी रुक गया।
फिर माँ की आवाज़ लौटी, और इस बार वह बहुत पास थी। इतनी पास, जैसे होंठ सीधे रिसीवर से लगे हों। जैसे बोलने वाली उसके कान में बोल रही हो। उसकी साँस की आवाज़ नहीं थी। सिर्फ़ शब्द थे, और उनके पीछे वह बड़ी, अंधेरी, गूँजती हुई जगह।
"...वो विक्रांत नहीं है..."
क्लिक।
लाइन मर गई। रिसीवर में अब कुछ नहीं था, न hiss, न गूँज। एक सपाट, मुर्दा खामोशी।
विक्रांत बहुत देर तक वहीं खड़ा रहा, रिसीवर अभी भी कान से लगाए। Torch नीचे झुक गई थी और उसकी रोशनी उस कटे हुए तार पर पड़ रही थी, जो स्टूल से नीचे लटक रहा था, किसी चीज़ से जुड़ा नहीं, बस हवा में धीरे-धीरे घूमता हुआ।
उसने अपनी जेब में recorder को देखा। लाल बत्ती जल रही थी।
उसने इसे record किया था।
कोठी पूरी तरह खामोश थी। कहीं से कोई कदम नहीं आए। कबीर नहीं जागा, रघु काका नहीं आया। जैसे पूरी कोठी में सिर्फ़ उसने वह घंटी सुनी हो।
फिर, सीढ़ियों के नीचे से, अंधेरे गलियारे के उस पार से, जहाँ पीछे वाला आँगन था, जहाँ बावड़ी का काला मुँह कोहरे के नीचे खुला पड़ा था, एक बहुत हल्की, बहुत धीमी आवाज़ ऊपर आई।
पानी की।
टप।
उस बावड़ी से, जो पचास साल से सूखी पड़ी थी।
[Part 1 समाप्त]
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- जवाब मत देना
- Chapter
- 1 of 30
- Category
- Ghost Stories
- Reading time
- 24 min
- Words
- 4768
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
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