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Part 30: जवाब
Piyashi Atma · Ghost Stories · 19 मिनट
"हाँ, भैया?"
विक्रांत ने उस आवाज़ को अपने अंदर उतरते महसूस किया। उसके कानों से नहीं। उससे कहीं गहरे से। जैसे कोई चाबी किसी ऐसे ताले में घूमी हो जो तेईस साल से जंग खाया पड़ा था।
मेरी आवाज़।
उसके दिमाग़ ने वह शब्द बनाया, पूरा, साफ़। और फिर उसी तेज़ी से, जैसे कोई जलते कोयले को हथेली से फेंकता है, उसे दूर धकेल दिया।
नहीं। उसके पास मेरी आवाज़ है। बचपन की भी। उस रात की। 1999 की। हर गूँज जो उस आँगन में गिरी, उसके पास है। वो मेरी आवाज़ में मुझसे बात कर रहा है, जैसे उसने इरा की आवाज़ में, माँ की आवाज़ में किया। ये उसकी चाल है। एक और टुकड़ा। एक और आईना।
उसने इस बात को पकड़ा। उसे इसकी ज़रूरत थी। अभी। इस पल। इस अंधेरे में। इसके बिना वह यहाँ से कभी नहीं उठ पाता।
और फिर उसने उसे महसूस किया।
उसके सामने। कुछ इंच दूर। अंधेरे में। कुछ था।
ठंड। पहले वह। एक ऐसी ठंड जो हवा की नहीं थी, बल्कि किसी चीज़ की थी, जैसे किसी बर्फ़ के ढेले के पास बैठो। फिर गंध। गीला पत्थर, काई, बहुत पुराना पानी। और फिर, उसके घुटनों के पास, गद्दे पर, एक दबाव। जैसे कोई बहुत हल्का, बहुत छोटा, उसके सामने बैठा हो, और अपना वज़न आगे झुका रहा हो।
उन्नीस hertz की साँस अब उसकी रीढ़ में नहीं थी। वह यहाँ थी। उसके चेहरे के सामने। तेज़, उथली, घबराई हुई।
किसी फँसे हुए जानवर की तरह।
जब वो उस नाम पर जवाब देगा, उस पल वो एक जगह होगा। एक आवाज़ में। एक शरीर जैसी चीज़ में।
वह यहाँ था। उसके पास। इस मरे हुए कमरे में। जहाँ उसकी आवाज़ लौट नहीं सकती थी। जहाँ उसके पास कोई गूँज नहीं थी जिसमें वह भाग सके।
पहली बार, हज़ारों साल में, वह एक जगह था।
"इरा!" विक्रांत ने चीखा। उसकी आवाज़ उस कमरे में मर गई, पर बाहर, उस छोटे मुँह के पार, उसने उसके जवाब में इरा की आवाज़ सुनी।
उर्दू में। अरबी के टुकड़ों के साथ। तेज़, एक लय में। रस्म।
बाहर से रोशनी अंदर आई।
उस छोटे मुँह से। इरा की battery lamp, जो उसने झुककर उसके अंदर थामी थी, उसकी किरण टिमटिमाती, काँपती। और उस नीली-सफ़ेद, टूटी हुई रोशनी में, विक्रांत ने उसे देखा।
वह जो उसके सामने बैठा था।
उसकी कोई शक्ल नहीं थी। यह पहली बात थी जो विक्रांत ने समझी। उसकी कोई अपनी शक्ल नहीं थी, जैसे उसकी कोई अपनी आवाज़ नहीं थी। वह बस एक आकार था, अंधेरे से थोड़ा ज़्यादा घना, एक बच्चे जितना बड़ा, घुटने मोड़े बैठा हुआ। और उसकी सतह पर, जहाँ किसी चेहरे को होना चाहिए था, चेहरे उभर रहे थे।
एक के बाद एक। तेज़ी से। जैसे कोई बहुत पुरानी film की reel, जिसका projector काबू से बाहर हो गया हो।
एक दूल्हा, सेहरे में। एक ढोल वाला। एक बूढ़ी औरत। एक सोलह साल की लड़की, गाने के लिए मुँह खोले। एक किशोर, लालटेन की रोशनी में पीला। सलीम। रघु काका, ऊनी टोपी में, उसकी आँखें बंद। एक ग्यारह साल का लड़का, पुराने ज़माने की अचकन में। चेहरे, जिन्हें विक्रांत नहीं जानता था। सैकड़ों। हज़ारों। उनकी आँखें खुलतीं, उसे देखतीं, और फिर डूब जातीं, अगले चेहरे के नीचे।
हर नाम, जिसे उसने कभी पहना था। हर आवाज़, जिसे उसने कभी चुराया था।
और फिर, उनके बीच, बार-बार लौटता हुआ, दो चेहरे।
एक नौ साल का लड़का। हाफ़ स्वेटर। गंभीर चेहरा। वह photo वाला।
और एक छह साल का लड़का। लाल ऊनी टोपी। आगे का एक दाँत टूटा।
वे एक-दूसरे में मिल रहे थे। एक उभरता, दूसरे में घुलता, फिर दूसरा उभरता। जैसे वह चीज़ ख़ुद तय नहीं कर पा रही हो कि वह कौन सा पहने। जैसे उसके पास दोनों थे, और दोनों में से कोई भी पूरी तरह उसका नहीं।
विक्रांत ने उसे देखा, और उसके अंदर कुछ टूटा।
"अंशु," उसने फुसफुसाया।
वह छह साल वाला चेहरा रुका। एक पल के लिए। उसकी आँखें, बड़ी, गीली, उसकी तरफ़। और फिर वह हिला, धीरे से, बाएँ से दाएँ।
नहीं।
और नौ साल वाला चेहरा उसके ऊपर उभरा, और उसके होंठ हिले, और उसने कहा, बिना किसी गूँज के, उस पतली, ऊँची, बड़े भाई वाली आवाज़ में, जो विक्रांत ने उस पत्थर के दरवाज़े के पीछे सुनी थी:
"तुमने मेरी जगह ले ली।"
बाहर, इरा की आवाज़ ऊँची हो रही थी। तेज़। रस्म के आख़िरी हिस्से की तरफ़।
और वह चीज़ हिली।
जैसे किसी फँसे जानवर को अपने पिंजरे के दरवाज़े का एहसास हो। उसकी साँस, उन्नीस hertz, एक चीख में बदल गई। सुनाई नहीं देने वाली, पर विक्रांत की हर हड्डी में महसूस होने वाली। उसके दाँत बजने लगे। उसकी आँखें धुँधली हो गईं, उनकी पुतलियाँ काँपती हुईं।
वह छोटे मुँह की तरफ़ झपटा।
उसका इकलौता रास्ता। वह खुली जगह, जहाँ से रोशनी आ रही थी। जहाँ से इरा की आवाज़ आ रही थी, और उसके पार, बावड़ी की दीवारें थीं, पत्थर था, गूँज थी। उसका घर।
विक्रांत ने उसे पकड़ा।
उसे पता नहीं था कि कैसे। उसके हाथ आगे बढ़े, उस ठंडे, घने अंधेरे में, और उन्होंने कुछ पकड़ा। कुछ जो पानी जैसा था, और धुएँ जैसा, और किसी बहुत छोटे बच्चे की कलाई जैसा। उसकी उँगलियाँ उस पर कस गईं।
बिल्कुल वैसे ही जैसे, तेईस साल पहले, ठंडे पानी में, अंधेरे में, किसी ने उसकी कलाई पकड़ी थी। और उसे ऊपर खींचा था।
वह चीज़ छटपटाई। उसके चेहरे बदलते रहे, तेज़, पागलों की तरह। माँ। इरा। कबीर की माँ। रघु काका। सब, उसकी तरफ़ देखते हुए, उनके होंठ हिलते हुए। छोड़ दो, बेटा। विक्की, छोड़ दे। बाबू, छोड़ दो। बिना आवाज़ के, बिना गूँज के, बस होंठ।
विक्रांत ने नहीं छोड़ा।
पर वह ताक़तवर था। बहुत ताक़तवर। विक्रांत की उँगलियाँ फिसल रही थीं, उस ठंडे, पानी जैसे आकार पर। मुँह कुछ ही इंच दूर था।
और फिर उस मुँह से कोई अंदर आया।
कबीर।
वह रेंगता हुआ आया, पानी में, अपने कंधे से उस छोटे मुँह को भरता हुआ। उसका चेहरा सफ़ेद, उसके होंठ नीले, उसकी आँखें बड़ी। उसने उस चीज़ को देखा, उन बदलते चेहरों को, और एक पल के लिए उसकी साँस रुकी।
फिर उसने विक्रांत को देखा।
"चल," उसने कहा। उसकी आवाज़ उस मरे हुए कमरे में बिना गूँजे पहुँची, बहुत साफ़, बहुत पास। "बाहर।"
"कबीर, नहीं..."
कबीर ने उसका हाथ पकड़ा। वह हाथ जो उस चीज़ को थामे था। और उसने उसे छुड़ाया, एक-एक उँगली करके, और उस चीज़ को अपने हाथों में ले लिया।
वह उसकी पकड़ में छटपटाया। उसके चेहरे कबीर की तरफ़ मुड़े। एक औरत। बीमार, पतली, बिस्तर पर लेटी हुई औरत का चेहरा। उसके होंठ हिले, और इस बार, विक्रांत ने उनमें आवाज़ सुनी। बहुत धीमी। बिना गूँज के। एक बीमार, खरखराती, प्यार भरी आवाज़।
"कबीर, बेटा। एक गिलास पानी दे दे।"
कबीर ने उसे देखा। उसकी आँखें भर आईं।
"ला रहा हूँ, मम्मी," उसने कहा।
उसने यह जानबूझकर कहा। विक्रांत ने यह उसकी आँखों में देखा। उसने वह जवाब, जिससे वह तीन महीने से भाग रहा था, जिसके लिए वह हर रात नींद की गोलियाँ खाता था, जिसके डर से उसने अपना टखना एक बूढ़े आदमी की कलाई से बँधवाया था, वह जवाब उसने आख़िरकार दे दिया। अपनी मर्ज़ी से। आँखें खोलकर।
उस कमरे में, जहाँ उस जवाब की कोई गूँज नहीं हो सकती थी।
"कबीर!"
कबीर ने अपना पैर पीछे की तरफ़ मारा। विक्रांत के सीने पर। ज़ोर से। और विक्रांत पीछे गिरा, उस छोटे मुँह से, बाहर, पानी में, इरा के पैरों के पास।
"चालीस लाख," कबीर की आवाज़ अंदर से आई, एक हल्की, टूटी हँसी के साथ, "तू मत भरना।"
और उसने आख़िरी गठरी खींची। रज़ाइयों की। इमरान की माँ की काली शॉल वाली। और उस छोटे मुँह को अंदर से बंद कर दिया।
इरा की रस्म का आख़िरी शब्द हवा में था।
विक्रांत पानी में घुटनों पर था, उस बंद मुँह को घूरता हुआ, उस रज़ाइयों की दीवार को, जिसके पीछे कबीर था। उसने उस पर अपने हाथ रखे, उसे खींचने के लिए, खोलने के लिए।
इरा ने उसकी कलाई पकड़ ली।
उसने उसकी तरफ़ देखा। उसका चेहरा भीगा था, आँसुओं से और पानी से। उसने अपना सिर हिलाया। धीरे से।
नहीं।
"किताब कहती है," उसने फुसफुसाया, “'उस जगह को बंद कर दो, उसके जवाब के साथ।'” उसकी आवाज़ टूटी। "पर इसे बंद करने के लिए, किसी को कुछ देना होगा। उसके अंदर। आख़िरी बार। कुछ जो कभी वापस न आए।"
विक्रांत ने उसे देखा।
"नूर बानो जानती थीं," इरा ने कहा। "उन्होंने हमें दिखाया था।"
उसने अपनी lamp नीचे रखी। किताब नीचे रखी, एक भूसे के बोरे पर, जो पानी से थोड़ा ऊपर था। फिर वह उस बंद मुँह के पास झुकी, उस रज़ाइयों की दीवार पर अपना माथा टिकाया, अपने होंठ उसकी सबसे पतली जगह पर रखे, जहाँ इमरान की माँ की शॉल थी।
और वह बोली। बहुत धीमे। बहुत साफ़। एक शब्द।
"ले।"
विक्रांत ने उसे सुना। वह शब्द उस दीवार में गया, और मर गया।
और फिर, उसके बाद, इरा का मुँह खुला रहा। उसके होंठ हिले, कुछ और कहने के लिए। विक्रांत, शायद, या माफ़ कीजिए, या कुछ और।
और कुछ नहीं निकला।
उसने अपना हाथ अपने गले पर रखा। उसकी आँखें बड़ी हुईं। फिर, धीरे-धीरे, शांत हुईं। उसने विक्रांत की तरफ़ देखा, और उसके होंठों पर एक बहुत छोटी, बहुत थकी, बहुत टूटी मुस्कान आई।
नूर बानो जैसी।
रज़ाइयों के कमरे के अंदर से, आख़िरी बार, विक्रांत ने एक आवाज़ सुनी। बहुत धीमी। बिना गूँज के। उस दीवार के पार से, जैसे किसी बहुत दूर, बहुत बंद जगह से।
कबीर की। हँसती हुई। हल्के से।
और फिर एक औरत की आवाज़। उसकी माँ की। अब बीमार नहीं। अब खरखराती नहीं। बस एक माँ की आवाज़, बहुत प्यार से, बहुत राहत से, जैसे किसी ने बहुत लंबे इंतज़ार के बाद आख़िरकार एक गिलास पानी पाया हो।
"शाबाश, बेटा।"
फिर कुछ नहीं।
पानी उतरने लगा।
वे सुबह ऊपर आए। विक्रांत और इरा। रस्सी के सहारे, जो इमरान ने पूरी रात थामे रखी थी, अपनी हथेलियाँ छिलवाकर, अपनी माँ के बगल में बैठे-बैठे।
पानी हर तल पर कम होता गया। पाँचवें पर टखनों तक। चौथे पर बस नमी। तीसरे पर सूखा। जैसे बावड़ी फिर से वही हो गई हो जो पचपन साल से थी। एक सूखा, पुराना, पत्थर का गड्ढा।
पहले तल पर, विक्रांत रुका। उस पिछली दीवार के सामने।
सलीम — 2026। रघुनाथ — 2026। और उनके ऊपर, अधूरा, विक्रां।
और सबसे नीचे, एक नया नाम। ताज़ा, सफ़ेद, उसके खाँचों में बारीक चूरा। पर किसी अदृश्य हाथ से नहीं खुदा हुआ। विक्रांत ने उसके किनारों को देखा। वे टेढ़े थे, कच्चे, जल्दबाज़। जैसे किसी इंसान ने, किसी नुकीली चीज़ से, बहुत ज़ोर से, बहुत जल्दी में खोदा हो।
कबीर।
और उसके बगल में, बहुत छोटे अक्षरों में, उसी कच्चे हाथ से:
ला रहा हूँ।
विक्रांत ने उसे छुआ। अपनी उँगलियों से। उसके खाँचों में अब भी चूरा था।
कबीर ने इसे कब खोदा था? वह रात भर उस कमरे के अंदर था। सातवें तल पर। सील किया हुआ।
उसने इस सवाल को वहीं छोड़ दिया। उसके पास अब उसे रखने के लिए कोई ढेर नहीं बचा था।
ऊपर, गाँव इंतज़ार कर रहा था।
उन्होंने विक्रांत और इरा को देखा, बस दो, और किसी ने कुछ नहीं पूछा। इमरान ने रस्सी छोड़ी, और उसकी माँ ने उसे गले लगाया, और दोनों रोए, बिना आवाज़ के।
उन्होंने जाली गिराई। पत्थर की पटिया खिसकाई। बोल्ट कसे। और फिर रामदुलारी आगे आई, अपनी लाठी के साथ, और उसके हाथ में कुछ था।
रघु काका की कीलें। जो उसने, पता नहीं कैसे, उनके क्वार्टर से उठा ली थीं।
उसने उन्हें जाली की दरारों में नहीं ठोका। उसने उन्हें बस पत्थर की पटिया पर रखा। एक कतार में। जैसे रघु काका ने उस आख़िरी शाम अँगीठी के पास रखी थीं।
"गिन नहीं रही," उसने कहा, ज़ोर से, अपनी बहरी आवाज़ में, और उसके चेहरे पर कुछ ऐसा था जो मुस्कान के बहुत क़रीब था। "बस देख रही हूँ।"
विक्रांत ने उस दोपहर गाँव में एक impulse response लिया।
चौक पर। मंदिर के सामने। पीपल के नीचे। जहाँ अब, पचपन साल में पहली बार, घरों की दीवारों पर कोई रज़ाई नहीं थी।
चटाक।
सीधी आवाज़। और फिर दीवारों से लौटती गूँजें। सामान्य। साफ़। गाँव की गलियों की, घरों की, मंदिर की।
और कोई उलटी गूँज नहीं। कोई साठ milliseconds पहले वाली चोटी नहीं। कोई उन्नीस hertz। कोई साँस।
बस गूँज। बस physics। बस एक आवाज़, जो पैदा हुई, टकराई, और लौटी। उसके बाद। जैसे हमेशा लौटनी चाहिए थी।
चौक के उस पार, कुछ बच्चे खेल रहे थे। और एक लड़की ने, बहुत हिचकिचाते हुए, जैसे कोई बहुत ठंडे पानी में पहला कदम रखता है, दूसरी को उसका नाम लेकर पुकारा। ज़ोर से।
"मुन्नी!"
और मुन्नी मुड़ी, और हँसी, और जवाब दिया। "क्या है?"
और उसकी आवाज़ चौक की दीवारों से टकराई, और लौटी, और कुछ नहीं हुआ।
विक्रांत ने अपनी आँखें बंद कीं।
उसके दिमाग़ में अब भी वह आवाज़ अटकी थी। "हाँ, भैया?" उसकी अपनी। बचपन वाली। उसने उसे बार-बार झटका। Mimicry। उसके पास मेरी हर आवाज़ थी। उसने बस एक और आईना दिखाया। आख़िरी बार।
उसने इसे सच माना। उसे इसकी ज़रूरत थी।
Delhi में फ़रवरी की धूप पीली और पतली थी।
विक्रांत ने अपने पिता के flat का दरवाज़ा खोला। तीन महीने बाद। धूल। बंद हवा। पलंग के नीचे, वह हरा स्टील का ट्रंक।
छोटी, पीतल की चाबी। लाल धागे में बँधी।
उसने उसे खोला।
अंदर काग़ज़ थे। ज़मीन-जायदाद के, जैसा उसे हमेशा बताया गया था। पुराने बिजली के बिल। उसकी माँ की कुछ चिट्ठियाँ।
और सबसे नीचे, एक मोटे लिफ़ाफ़े में, एक पन्ना।
पीला, किनारे से फटा हुआ, जैसे किसी किताब की सिलाई से एक झटके में खींचा गया हो। उस पर खाने बने थे, पेंसिल की लकीरों से। तारीख़। नाम। उम्र। और आख़िरी खाने में, एक गोला, उसके बीच से नीचे जाती एक लकीर।
नीली ball-pen की स्याही में:
जनवरी 1999 — विक्रांत सहगल — 9 बरस।
विक्रांत ने उसे देखा। उसने यह पहले से जानता था। इरा के अब्बू की diary। दादा का हाथ।
उसने पन्ना पलटा।
उसके पीछे, किसी और की लिखावट में। सख़्त, सीधी, कम बोलने वाले आदमी की लिखावट। उसके पिता की। बहुत छोटे अक्षरों में, जैसे लिखने वाला नहीं चाहता था कि कोई इसे कभी पढ़े। जैसे यह किसी और के लिए नहीं, सिर्फ़ उसके अपने लिए लिखा गया हो, किसी बहुत अकेली रात में।
माफ़ करना, अंशु।
बस इतना।
विक्रांत ने उन दो शब्दों को देखा। बहुत देर तक।
फिर उसने पन्ना वापस लिफ़ाफ़े में रखा, और ट्रंक बंद किया, और उस पर बैठ गया, और उसने कुछ नहीं सोचा। उसने ख़ुद को कुछ नहीं सोचने दिया।
पापा ने अंशु से माफ़ी माँगी थी। उस रात के लिए। उस भाई के लिए जिसे बचाना था, और जो नहीं बचा।
यह ठीक बैठता था। उसने इसे ठीक बैठने दिया।
उस रात, अपने studio में, उसने वह disc वाली file फिर से खोली।
उसे नहीं पता था क्यों। शायद इसलिए कि यह आख़िरी चीज़ थी। उसकी case file का आख़िरी पन्ना। नवंबर 1936। मीर ज़ाकिर अली की आवाज़। और उसके पीछे, hiss के बहुत नीचे, उसकी अपनी चीख। "विक्रांत!"
वह अब उसे सुन सकता था, बिना काँपे। वह जानता था कि वह कब हुई थी। वह उस पल वहाँ था।
पर उसने देखा कि उस चीख के पीछे और भी परतें थीं। उसने उन्हें पहली बार नहीं छुआ था, क्योंकि तब उसे सिर्फ़ चीख चाहिए थी। अब उसने छुआ। धीरे-धीरे। एक-एक करके। जैसे कोई किसी पुरानी पेंटिंग की आख़िरी परतें छीलता है।
और उनके नीचे, और भी गूँजें थीं। और भी आवाज़ें। आने वाले वक़्त की। जो उस रात मीर ज़ाकिर अली ने सुनी थीं, और लिखी नहीं थीं, क्योंकि कुछ चीज़ें लिखने से वो पक्की हो जाती हैं।
एक ढोल। पचपन साल पहले का। एक सोलह साल की लड़की का गीत।
और फिर, एक बच्चे की आवाज़। नौ साल का। ऊपर से, किसी खुले आसमान वाली जगह से। घबराई हुई।
"अंशु! अंशु, तू कहाँ है?"
विक्रांत ने अपनी साँस रोक ली।
और एक जवाब। नीचे से। एक छह साल की आवाज़ में। तोतली खनक के साथ।
"हाँ, भैया! यहाँ हूँ!"
बिना साँस के।
कदम। सीढ़ियों पर। तेज़। नीचे की तरफ़। एक बड़े बच्चे के। भागते हुए। अपने छोटे भाई को बचाने।
फिर पानी। फिर एक औरत की आवाज़। नीचे से। प्यार से। माँ की।
"अंशु?"
ख़ामोशी। बहुत लंबी।
"विक्रांत?"
और फिर, एक जवाब। बहुत छोटा। बहुत डरा हुआ। बहुत ठंडा। एक बच्चे की आवाज़, ठंडे पानी में, अंधेरे में, अपनी माँ की आवाज़ सुनकर, उसके पास भागने को बेताब।
"हाँ?"
विक्रांत ने उसे सुना।
फिर उसने उसके formants देखे। उसकी pitch। उसकी बनावट। उसके गले की, उसके मुँह की गुफ़ा की। उसने उसे उस आवाज़ के ऊपर रखा जो उसने रज़ाइयों के कमरे में सुनी थी। हाँ, भैया?
एक।
फिर उसने उसे अपनी अपनी आवाज़ के ऊपर रखा। उसकी test files। उसकी गिनती। उसकी चीख।
एक।
किसी अदालत में, विक्रांत सहगल उस पर अपना नाम लिखकर कहता: same speaker।
उसका नाम।
या वह नाम जिस पर वह तेईस साल से जवाब देता आया था।
उसने laptop बंद नहीं किया। उसे ज़रूरत नहीं थी। सब कुछ, अपने आप, अपनी जगह बैठ रहा था। शांति से। बिना किसी शोर के। जैसे बहुत लंबे बुख़ार के बाद अचानक साफ़ दिखने लगता है।
वो विक्रांत नहीं है। माँ, बावड़ी के किनारे, उस बच्चे को देखते हुए जो गीला, काँपता, कंबल में ऊपर आया था।
उसे इस नाम से मत बुलाओ, वो जवाब दे देगा। क्योंकि अगर वह उस नाम पर जवाब देता रहा, तो वह उसका हो जाता। हमेशा के लिए।
नूर बानो की स्लेट। अंशु। दो बार। उसकी छाती पर थपथपाते हुए। तुम।
तुम्हें याद नहीं, पर उसे याद है।
तुमने मेरी जगह ले ली। एक नौ साल के लड़के की आवाज़ में। उस पत्थर के दरवाज़े के पीछे से। शब्दशः। सच।
उसका बायाँ हाथ। Photo में, पतंग की डोर, दाहिने हाथ में।
वह एक याद, साफ़, ऊपर की सीढ़ी पर लालटेन लिए, डरपोक, जो नाम के साथ आई थी। उसके असली मालिक की। सबसे गहरी, सबसे दर्द वाली। और उसकी अपनी सारी यादें, नौ साल से पहले की, धुँधली, जैसे किसी और की कहानी।
यादों में रोशनी ऊपर से आती थी, क्योंकि वह हमेशा नीचे था। सीढ़ियों पर। गर्दन उठाए। अपने बड़े भाई को देखता हुआ।
इरा की उँगलियाँ, उसके अँगूठे पर। अगर आपको कभी पता चले कि आप वो नहीं हैं...
रघु काका की नज़र, जो उसके चेहरे से हट गई थी, और फिर कभी नहीं लौटी।
माफ़ करना, अंशु। उसके पिता ने, अकेले, किसी बहुत लंबी रात में, उस बेटे से माफ़ी माँगी थी जो ज़िंदा था। जिसे उन्होंने तेईस साल तक किसी और के नाम से बुलाया था। ताकि वह कभी उस नाम पर जवाब न दे जो उसका था, और जो उस रात से नीचे किसी और के पास था, उसकी आवाज़ में, इंतज़ार करता हुआ।
और हाँ, भैया? उस मुर्दा कमरे में। उसकी अपनी आवाज़। अपने बड़े भाई को जवाब देती हुई। क्योंकि उसने, एक छत्तीस साल के आदमी ने, उस नाम को पुकारा था जो उसके भैया का था। और उस अंधेरे में, एक छह साल के बच्चे की तरह, उसकी अपनी पुरानी आवाज़ ने वैसे ही जवाब दिया था जैसे वह हमेशा देती थी।
मुझे जाना था। मेरा नाम था। और तू गया।
उसने यह तेईस साल अपने आप से कहा था। हर रात।
यह सच था। बस उल्टा।
Studio रात के तीन बजे पूरी तरह शांत था।
उसने इसे ख़ुद बनाया था, सालों पहले। दीवारों पर foam के wedges, छत पर panels, फ़र्श पर मोटा क़ालीन। और कोने में, एक vocal booth। एक छोटा, बंद, अंधेरा डिब्बा, जिसकी दीवारें इतनी मोटी थीं कि उसमें आवाज़ बिना गूँजे मर जाती थी। एक मुर्दा कमरा। नूर बानो के कमरे जैसा। सातवें तल वाले जैसा।
एक ऐसी जगह, जहाँ वह नहीं टिक सकता था।
विक्रांत अपनी कुर्सी पर बैठा था, laptop बंद, उसकी screen की रोशनी के बिना, कमरे में बस एक छोटी, लाल बत्ती। उसका recorder। आदत से। हमेशा चलता हुआ।
वह रो नहीं रहा था। वह सोच नहीं रहा था। वह बस बैठा था, अपने हाथों को देखता हुआ। अपनी बाईं हथेली को।
उसे अपना असली नाम याद था। वह अब उसे जानता था। वह उसके दिमाग़ में था, पूरा, साफ़, एक पत्थर पर खुदे अक्षरों की तरह।
पर उसने उसे कभी ज़ोर से नहीं कहा था। तेईस साल में। और उसे नहीं पता था कि अगर कोई उसे पुकारे, तो उसका गला हिलेगा या नहीं।
रघु काका का नहीं हिलता था।
पर रघु काका के भैया का नाम पचपन साल तक नीचे था। सदाई उसे पहने हुए था। उसने यह सोचा, धीरे से, बहुत सावधानी से। और विक्रांत का नाम, उस रात से, सदाई के पास था। और अब... अब सदाई बँधा है। उस नाम के साथ। उस मुर्दा कमरे में। उस जवाब के साथ, जो कभी नहीं लौटेगा।
तो अब वह नाम किसी के पास नहीं है।
तो अब मेरा... मेरा अपना...
उसने वह विचार पूरा नहीं किया।
क्योंकि उस पल, vocal booth के अंधेरे से, उस छोटे, बंद, मुर्दा डिब्बे से, जिसमें कोई गूँज नहीं हो सकती थी, जिसमें वह नहीं टिक सकता था, एक आवाज़ आई।
बहुत धीमी। बहुत पास। बिना किसी गूँज के।
एक बच्चे की।
नौ साल का। एक बड़े बच्चे की हल्की भारीपन के साथ। ठंड से काँपती हुई, थकी हुई, जैसे बहुत लंबे अंधेरे से, बहुत लंबी सीढ़ियों से, अभी-अभी ऊपर आई हो। और उसमें साँस थी। गीली, छोटी, ज़िंदा।
उस आवाज़ में कोई ग़ुस्सा नहीं था। कोई इल्ज़ाम नहीं। बस एक बहुत पुरानी, बहुत धैर्य से भरी उम्मीद। जैसे कोई बड़ा भाई, शाम को, खेत से लौटते हुए, अपने छोटे भाई को आँगन से बुलाता है।
और उस आवाज़ ने, बहुत धीरे, बहुत प्यार से, बस एक शब्द कहा। एक नाम। एक सवाल।
"अंशु?"
विक्रांत ने उसे सुना।
और इससे पहले कि उसका दिमाग़ कुछ सोच पाता, इससे पहले कि उसके बारह साल के forensic कान उस आवाज़ को नाप पाते, इससे पहले कि उसे याद आता कि नियम क्या थे, कौन से अधूरे थे, कौन से ग़लत, इससे पहले कि उसके दाँत उसकी जीभ पर गड़ पाते, जैसे उन्होंने इतनी रातों में गड़ना सीखा था—
उसका गला हिला।
एक छोटी, पुरानी, तोतली खनक उसके अपने आदमी वाले गले से उठी, जैसे किसी बहुत गहरे कुएँ की तली से कोई बुलबुला ऊपर आता है।
और तेईस साल में पहली बार, उसके होंठों ने उसके असली नाम पर जवाब दिया—सोचने से पहले।
"हाँ?"
[समाप्त]
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- जवाब मत देना
- Chapter
- 30 of 30
- Category
- Ghost Stories
- Reading time
- 19 min
- Words
- 3659
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
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