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Part 29: ग़लत नाम

Piyashi Atma · Ghost Stories · 14 मिनट

साँस तेज़ हुई। और फिर पानी उठा।

विक्रांत ने उसे पहले महसूस किया, देखा बाद में। उसकी कमर पर, जहाँ काला, बर्फ़ जैसा पानी अब तक स्थिर था, काँच की तरह, वह हिला। एक बार। जैसे किसी बहुत बड़ी चीज़ ने नीचे करवट ली हो। फिर ऊपर सरका। धीरे-धीरे। उसकी पसलियों तक।

"विक्रांत!" इरा की आवाज़ फटी हुई थी। उसकी battery lamp उसके कंधे पर तेज़ी से टिमटिमा रही थी, और उस टिमटिमाती नीली रोशनी में उसका चेहरा किसी और का लग रहा था। "पानी बढ़ रहा है!"

रज़ाइयों के कमरे की बाहरी दीवार, भूसे के बोरे जो कमर तक डूबे थे, अब पूरे डूब चुके थे। पानी उनके ऊपर की रज़ाइयों तक चढ़ रहा था, उन्हें भिगोता हुआ, भारी करता हुआ।

अंदर से कबीर की आवाज़। "क्या हो रहा है? मुझे यहाँ पानी लग रहा है! मचान के नीचे से!"

और फिर आवाज़ें लौटीं।

पत्थर के दरवाज़े के पीछे से नहीं। हर जगह से। सातों तलों की दीवारों से। सीढ़ियों से। पानी के नीचे से। ऊपर के अंधेरे से। हज़ारों आवाज़ें, एक साथ, पर अब गुनगुनाहट नहीं। अब वे चीख रही थीं। नाम। हर तरह के नाम। हर तरह की आवाज़ों में। माँओं की, बाप की, भाइयों की, बहनों की, बच्चों की। एक-दूसरे पर चढ़ते हुए, एक बहरा कर देने वाले शोर में, जैसे कोई बहुत बड़ा, अंधा, भूखा जानवर, जिसके पास हज़ार गले हों, एक साथ अपने हर गले से चिल्ला रहा हो।

विक्रांत ने अपने हाथ अपने कानों पर नहीं रखे। उसके हाथ laptop को अपनी छाती से सटाए थे। उसने बस अपने दाँत भींचे, और अपना मुँह बंद रखा।

उसने पानी की सतह देखी। इरा की lamp की टिमटिमाती रोशनी में, वह काँच जैसी नहीं रही थी। उसमें प्रतिबिंब थे। ऊपर की सीढ़ियों के। और उन सीढ़ियों पर, प्रतिबिंब में, लोग खड़े थे।

बहुत सारे। एक के ऊपर एक। हर सीढ़ी पर। नीचे देखते हुए। उनकी तरफ़।

एक दूल्हा, सेहरा बाँधे। एक ढोल वाला, अपना ढोल गले में लटकाए। एक दुबला किशोर, लालटेन लिए। एक जवान आदमी, घुँघराले बाल, एक पीली machine हाथ में। एक बूढ़ा, झुकी कमर, नंगे पैर, ऊनी टोपी में।

और एक लड़की। सोलह-सत्रह साल की। सुर्ख़ जोड़े में। उसका चेहरा उजला, उसकी आँखें बड़ी, उसके होंठ गाने के लिए खुले हुए।

विक्रांत ने ऊपर देखा। असली सीढ़ियों पर।

अंधेरा। ख़ाली।

उसने फिर नीचे देखा। प्रतिबिंब में वे सब अब भी थे। और उन सबके बीच, उनके चेहरों के बीच, उनके कंधों के पीछे से, पानी की सतह में कुछ और भी था। कुछ जिसकी कोई शक्ल नहीं थी। जो उन सबके चेहरों से बना था, और उनमें से किसी का नहीं था। एक बदलती हुई, घूमती हुई आकृति, जिसके चेहरे की जगह हर पल एक नया चेहरा उभरता, और फिर डूब जाता। माँ। रघु काका। सलीम। कबीर की माँ, जिसे विक्रांत ने बस एक बार, बचपन में देखा था। नूर। एक बच्चा।

एक नौ साल का बच्चा। हाफ़ स्वेटर। गंभीर चेहरा।

विक्रांत ने अपनी आँखें बंद कर लीं।

"इरा!" कबीर अंदर से चीखा। "बोल! कौन सा नाम? उसने जवाब क्यों नहीं दिया?"

इरा किताब के सामने खड़ी थी, कमर तक पानी में, उसकी उँगली अब भी उस पहले शब्द पर, जिसे उसे पढ़ना था। उसकी आँखें पन्ने पर दौड़ रही थीं। ऊपर। नीचे। पिछले पन्ने पर। फिर उससे पहले वाले पर।

“'उस नाम को पहनता है जो उसने नीचे लिया,'” वह फुसफुसा रही थी। ख़ुद से। “'जिसका नाम पुकारा गया, वो नीचे जाता है। और जिसने जवाब दिया, वो उस नाम को पहनकर ऊपर रहता है।'”

वह रुकी।

उसका सिर धीरे-धीरे उठा। वह विक्रांत की तरफ़ मुड़ी। उसकी आँखें, उस टिमटिमाती रोशनी में, बड़ी थीं। बहुत बड़ी।

विक्रांत ने उनमें देखा। और उसने उनमें वह देखा जो उसने तीन हफ़्ते पहले, लाइब्रेरी में, उस पहली photo के सामने देखा था। जब उसकी नज़र उस नौ साल के लड़के के दाहिने हाथ पर गई थी, जिसमें पतंग की डोर थी। और फिर विक्रांत के notebook के पास पड़े pen पर। बाईं तरफ़।

"इरा," उसने कहा।

यह उसके मुँह से निकल गया। बिना सोचे। उसका वादा टूटा, एक शब्द में। उसकी आवाज़ उस शोर में खो गई, बिना गूँजे, बिना लौटे।

इरा ने उसे सुना। उसने कुछ नहीं कहा। उसके होंठ काँपे।

"किताब कहती है कि उसने अंशु को नहीं लिया," विक्रांत ने कहा। अब धीमे। उसके दिमाग़ का एक हिस्सा, बहुत दूर, बहुत ठंडा, अब भी तर्क कर रहा था। "दरवाज़े के पीछे कोई छह साल का नहीं है। मैंने सुना। नौ साल का है। तो उसने..." उसने एक साँस ली। "तो उसने किसे लिया?"

इरा ने उसे देखा।

"अगर अंशु नहीं गया," विक्रांत ने कहा, "तो अंशु कहाँ है?"

पानी उसकी छाती तक पहुँच गया था।

इरा का मुँह खुला।

और फिर बंद हो गया।

उसने उसकी तरफ़ नहीं, उसके सीने की तरफ़ देखा। उसकी गर्दन में लटकी नूर बानो की स्लेट की तरफ़, जिसका निचला हिस्सा अब पानी में डूब रहा था।

उसकी आँखें फैल गईं।

"देखिए," उसने फुसफुसाया। "स्लेट।"

विक्रांत ने नीचे देखा।

उसकी लालटेन की रोशनी, जो अब भी उसकी तरफ़ झुकी थी, लंबी और पतली, स्लेट पर गिर रही थी। उसकी काली सतह पर। जहाँ अभी तक, धुँधले, सूखे चॉक में, नूर के आख़िरी तीन शब्द थे।

अब तुम्हारी बारी।

पानी उस पर चढ़ा। ठंडा, काला, स्लेट के निचले किनारे से ऊपर। और जहाँ भी वह पहुँचा, चॉक घुलने लगा। "बारी" के अक्षर पहले धुँधले हुए, फिर बहे, सफ़ेद, बादल जैसी लकीरों में, पानी में घुलते हुए। फिर "तुम्हारी"। फिर "अब"।

और उनके नीचे, कुछ उभरा।

विक्रांत ने यह पहले भी देखा था। पुरानी स्लेटों में। बचपन में। जब तुम किसी स्लेट को गीले कपड़े से पोंछते हो, तो कभी-कभी, सूखने से ठीक पहले, उस पर पुराने शब्दों के भूत उभर आते हैं। वे जो सूखे कपड़े से पोंछे गए थे, पर पूरी तरह मिटे नहीं थे। जो स्लेट की खुरदुरी सतह के छोटे-छोटे गड्ढों में अटके रह गए थे।

पचपन साल की परतें।

वे उभरे। एक के ऊपर एक। धुँधले, सलेटी, उलझे हुए। नाम। शब्द। शफ़ीक़। रोज़ आता है। ले। अंशु।

और उन सबके ऊपर, सबसे ताज़ा, सबसे गहरा, जैसे बहुत हाल में बहुत ज़ोर से लिखा गया हो और फिर जल्दी में पोंछ दिया गया हो, एक शब्द।

अब तुम्हारी बारी के ठीक नीचे वाला। वह जो उसने आज सुबह अँगीठी की रोशनी में देखा था, पढ़ नहीं पाया था।

तीन-चार अक्षरों का।

नूर ने इसे लिखा था। आख़िरी बार। फाटक पर। उसे स्लेट देने से ठीक पहले। फिर उसे पोंछा था, अपनी बाँह से, और उसके ऊपर लिखा था, अब तुम्हारी बारी। जैसे वह उसे कुछ देना चाहती हो, पर अभी नहीं। जैसे वह चाहती हो कि वह उसे ख़ुद ढूँढे। जब वक़्त आए।

पानी में, लालटेन की पीली रोशनी में, वह शब्द उभरा, सफ़ेद, साफ़, एक पल के लिए पूरा।

विक्रांत ने उसे पढ़ा।

उसका अपना नाम।

विक्रांत

कुछ पल वह हिल नहीं पाया।

पानी उसकी छाती पर था। शोर उसके चारों तरफ़। लालटेन उसकी तरफ़ झुकी। और उसकी गर्दन में, स्लेट पर, उसका नाम। नूर बानो के हाथ से। एक औरत, जिसने पचपन साल तक नाम नहीं लिखे थे, सिवाय उनके जो नीचे गए।

शफ़ीक़। सलीम। 1999 के नीचे एक नाम, जो उसने रगड़कर मिटा दिया था, जब विक्रांत उसे पढ़ने वाला था।

उसका दिमाग़ एक बार, बहुत तेज़ी से, उस दिशा में भागा जिस दिशा में भागना चाहिए था। और फिर, उसी तेज़ी से, जैसे किसी गर्म चूल्हे को छूकर हाथ हटाया जाता है, पलट गया।

मेरा नाम।

दादा ने रजिस्टर में मेरा नाम लिखा था। विक्रांत। नौ बरस। सौदे वाला नाम।

और सदाई ने उसे ले लिया।

उसके अंदर एक नई कहानी बनी। तेज़, पूरी, अपने आप। और वह उसे पकड़कर उस पर टिक गया, जैसे डूबता आदमी किसी लकड़ी पर।

उस रात उसने मुझे पुकारा। विक्रांत। मैंने जवाब नहीं दिया। मैं भागा। पर नाम उसका हो गया। सौदा। रजिस्टर। उसने मुझे नहीं लिया, पर मेरा नाम ले लिया। और अंशु, नीचे, अकेले, उसके साथ गया। मेरे नाम के साथ। उस अंधेरे में।

इसीलिए पत्थर पर 'विक्रा' लिखा था। इसीलिए आईने में 'मैं विक्रांत हूँ'। वो तेईस साल से मेरा नाम पहने है। मेरे रहते ही। वो मेरा नाम है, उसका दरवाज़ा।

और वो दरवाज़ा बच्चे के रूप में नौ साल का है, क्योंकि नाम नौ साल के बच्चे का था।

यह ठीक बैठता था। लगभग। अगर वह उसे बहुत ध्यान से न देखे।

उसने उसे बहुत ध्यान से नहीं देखा।

"उसका नाम विक्रांत है," इरा ने फुसफुसाया।

विक्रांत ने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में आँसू थे, और उसके चेहरे पर कुछ ऐसा था जो उसने पहले कभी नहीं देखा था। एक भयानक, टूटी हुई दया। नूर बानो जैसी।

"मुझे पता है," विक्रांत ने कहा। "मेरा नाम। सौदे वाला। उसने ले लिया था। उस रात।"

इरा ने उसे देखा। उसके होंठ हिले, कुछ कहने के लिए, और फिर रुक गए।

विक्रांत ने उसकी आँखों में देखा, और एक पल के लिए, बस एक पल, उसने वहाँ कुछ और पढ़ा। कुछ जो उसके नए, तेज़, पूरे तर्क के साथ ठीक नहीं बैठता था। एक सवाल। एक बहुत पुराना सवाल, जो इरा ने उससे उस कोठरी में पूछा था, कीलों के बीच, उसका हाथ पकड़े हुए।

अगर आपको कभी पता चले कि आप वो नहीं हैं जो आप ख़ुद को समझते आए हैं...

"इरा," उसने कहा। "क्या..."

"अभी नहीं।" इरा ने अपना सिर हिलाया। तेज़ी से। "अभी नहीं। पानी।"

पानी उसकी गर्दन तक पहुँच गया था।

"कबीर!" विक्रांत ने रज़ाइयों के कमरे के छोटे मुँह की तरफ़ झुककर पुकारा। "बाहर आ!"

"क्या? क्यों?" कबीर की आवाज़, मुर्दा, बिना गूँज वाली। "मैं पुकारता हूँ! विक्रांत? अगर वही नाम है, तो मैं..."

"नहीं!"

विक्रांत ने यह इतनी ज़ोर से कहा कि इरा भी ठिठक गई।

"अगर तू उस कमरे में 'विक्रांत' पुकारेगा," विक्रांत ने कहा, जल्दी-जल्दी, उसके शब्द एक-दूसरे पर चढ़ते हुए, "तो उस नाम पर दो लोग जवाब देंगे। वो। और मैं।"

अंदर ख़ामोशी।

"मैं इस नाम पर तेईस साल से जवाब देता आया हूँ, कबीर। हर रोज़। हर बार कोई मुझे बुलाए। ये मेरे अंदर है। मेरे गले में। तू इसे पुकारेगा, और मेरा मुँह खुद खुल जाएगा। मैं उसे रोक नहीं पाऊँगा। और फिर..." उसने अपनी आँखें बंद कीं। “...और फिर पता नहीं, कौन ऊपर जाएगा और कौन नीचे।”

जैसे माधो।

"तो?" कबीर की आवाज़ टूटी।

"तो इसे सिर्फ़ एक इंसान पुकार सकता है," विक्रांत ने कहा। "जो उस पर जवाब नहीं दे सकता।"

"कौन?"

विक्रांत ने अपनी आँखें खोलीं।

"जो उसे पुकार रहा हो।"

कबीर बाहर आया। रेंगकर, उस छोटे मुँह से, पानी में, जो अब मचान के ऊपर तक आ चुका था, अंदर की सबसे नीची रज़ाइयों को भिगोता हुआ। उसका चेहरा सफ़ेद था, उसके होंठ नीले।

"नहीं," उसने कहा। "नहीं। वो कह रहा था, तू नीचे आएगा और अपना नाम पुकारेगा। उसने सुना है। तू उसकी बात सच कर रहा है, विक्रांत। तू वही कर रहा है जो वो चाहता है।"

"मुझे पता है।"

"तो मत कर!"

“Disc पर मेरी चीख है, कबीर।” विक्रांत ने उसके कंधे पकड़े। "नब्बे साल पहले। मेरा नाम। इसी जगह से। ये होगा। ये पहले ही हो चुका है। उसकी गूँज वक़्त में पीछे गई है। मैं इसे रोक नहीं सकता। मैं बस ये तय कर सकता हूँ कि जब ये हो, तो मैं उस कमरे के अंदर हूँ। जहाँ उसकी आवाज़ लौट न सके।"

कबीर ने उसे देखा। उसकी आँखों में पानी था। उसने अपनी पट्टी वाली हथेली उठाई, और उसे विक्रांत के सामने रखा। विक्रांत को मत बचाना।

"शायद इसका मतलब यही था," उसने फुसफुसाया। "कि मैं तुझे इससे नहीं बचा सकता।"

विक्रांत ने उसकी हथेली अपने हाथ में ली। और उसे दबाया।

फिर वह घुटनों के बल गिरा, पानी में, और उस छोटे मुँह से अंदर रेंग गया।

अंदर, दुनिया ख़त्म हो गई।

वह शोर, वह हज़ार गलों वाली चीख, जो अभी बाहर उसके चारों तरफ़ थी, एक पल में कट गई। जैसे किसी ने एक दरवाज़ा बंद कर दिया हो, बहुत मोटा, बहुत भारी। वह बस... नहीं था।

अंधेरा था। पूरा। उसकी लालटेन वह बाहर छोड़ आया था, इरा के पास। उसका laptop भी। उसका recorder, एक बाँस पर, मुँह के बाहर।

और खामोशी। वह गहरी, निगलती हुई, नूर बानो वाली खामोशी। पर उससे भी गहरी। उससे भी पूरी। इतनी पूरी कि उसके कानों ने ख़ुद आवाज़ें बनानी शुरू कर दीं। एक हल्की, ऊँची सीटी, उसके दाएँ कान में। उसका अपना दिल, उसकी पसलियों में, धम, धम, धम। उसका ख़ून, उसकी कनपटियों में, बहता हुआ, एक धीमी नदी की तरह।

उसने अपनी पीठ पर कुछ महसूस किया। ठंडा। सख़्त। काँपता हुआ।

पत्थर का दरवाज़ा।

वह उससे टिका था। और उसके पार, उसकी तिजोरी में, वह था। उसकी साँस, उन्नीस hertz, तेज़, जागी हुई, उसकी रीढ़ से होकर उसकी हड्डियों में गूँज रही थी। एक ऐसी आवाज़, जिसे कोई रज़ाई नहीं रोक सकती थी। एक साँस, जो उसकी अपनी साँस के साथ चल रही थी। उससे आधा सेकंड पहले।

विक्रांत ने अपनी आँखें बंद कीं। अंधेरे में, इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ा।

उसने अपने हाथ अपनी गोद में रखे। उसकी बाईं हथेली, उसकी अँगूठे के जोड़ पर वह सख़्त जगह, जहाँ pen पकड़ने से खाल मोटी हो जाती है। उसने उसे अपने दाएँ अँगूठे से छुआ, जैसे इरा ने छुआ था।

उसने अपना मुँह खोला।

उसे disc वाली चीख याद आई। उसकी अपनी आवाज़। फटी हुई। हताश। एक पुकार, जो किसी को ढूँढ रही थी।

उसे अब समझ आया कि वह चीख क्यों थी। वह किसे ढूँढ रही थी।

मुझे जाना था। मेरा नाम था। और तू गया।

मैं तुझे वापस बुला रहा हूँ।

उसने अपनी पूरी ताक़त से साँस ली। उसके फेफड़े भरे। उस ठंडी, गीली, ऊन और भूसे और काई की गंध वाली हवा से।

और उसने चीखा। अपनी पूरी ज़िंदगी में सबसे ज़ोर से। उस एक नाम को, जिस पर उसने तेईस साल से हर रोज़ जवाब दिया था। जो उसके passport पर था, उसके diploma पर, उसके हर अदालती बयान पर। जो उसकी माँ ने उसे दिया था, या जिसके बारे में उसे बताया गया था कि दिया था।

"विक्रांत!"

उसकी चीख उस कमरे में फटी, और मर गई।

एक पल में। बिना किसी गूँज के। बिना किसी लौटती लहर के। रज़ाइयों ने उसे निगल लिया, जैसे कोई बहुत भूखा जानवर। कहीं कोई दीवार नहीं, जहाँ वह टकराए। कहीं कोई पत्थर नहीं, जहाँ से वह लौटे। वह बस बाहर निकली, और ख़त्म हो गई।

और बाहर, उस छोटे मुँह के पार, बाँस पर टँगे recorder ने उसे पकड़ा। और विक्रांत को, उस पल, अंधेरे में, बिल्कुल साफ़ पता था कि अब उस recorder में क्या है। एक फटी, हताश, पूरी ताक़त वाली चीख। उसका अपना नाम। ढाई सेकंड की गूँज के साथ, जो उस कमरे के बाहर, बावड़ी की दीवारों से टकराकर लौटी होगी।

नवंबर 1936। एक aluminium disc।

यही था वह पल।

ख़ामोशी।

विक्रांत ने इंतज़ार किया। उसकी पीठ पत्थर के दरवाज़े से टिकी। उसकी साँस उसके सीने में रुकी हुई। अपने ख़ून की आवाज़ सुनते हुए।

उन्नीस hertz की साँस उसकी रीढ़ में रुक गई।

एक पल। दो।

और फिर, उस अंधेरे में, उस पूरी, निगलती खामोशी में, एक आवाज़ आई।

बाहर से नहीं। पत्थर के दरवाज़े के पीछे से नहीं।

इसी कमरे के अंदर से। उसके बहुत पास से। उसके चेहरे से कुछ इंच दूर। जैसे कोई उसके सामने बैठा हो, अंधेरे में, घुटने मोड़े, उसकी तरफ़ झुका हुआ।

और उस आवाज़ में कोई गूँज नहीं थी। इस कमरे में गूँज हो ही नहीं सकती थी। वह बस थी। सीधी। साफ़। पूरी।

एक बच्चे की आवाज़।

छोटी। पतली। छह साल की। एक हल्की, तोतली खनक के साथ। वही, जो उसने पिछली रात, तेरहवीं की गूँजों के बीच, ऊपर के कमरे से सुनी थी। गुड नाइट, मम्मी। वह आवाज़ जिसे उसने अंशु की माना था, क्योंकि वह छोटी थी, क्योंकि उसमें तोतलापन था, क्योंकि छोटा भाई तो वही था।

और उसमें साँस थी। छोटी, गीली, काँपती, ठंड से। एक ज़िंदा बच्चे की साँस।

उस आवाज़ ने कहा, बहुत भोलेपन से, बहुत भरोसे से, जैसे किसी बच्चे को अंधेरे में उसके बड़े भाई ने पुकारा हो, और वह बस यह पूछ रहा हो कि क्या चाहिए:

"हाँ, भैया?"

विक्रांत ने उसे सुना।

और उसके कानों ने, जो बारह साल से हर आवाज़ का source ढूँढते आए थे, जो किसी आवाज़ के formants, उसके गले की बनावट, उसके मुँह की गुफ़ा को एक fingerprint की तरह पढ़ लेते थे, जो किसी भी अदालत में खड़े होकर कह सकते थे same speaker, उन्होंने वह किया जो वे हमेशा करते थे। बिना उसकी मर्ज़ी के। बिना उसकी इजाज़त के।

उन्होंने उस आवाज़ को पहचाना।

तोतलेपन के नीचे। बचपन की पतली, ऊँची pitch के नीचे। उस छोटे गले, उस छोटे मुँह के नीचे। वह बनावट। वे हड्डियाँ। वह खिंचाव, हर शब्द के आख़िर में, बहुत हल्का, जो उसने बारह साल तक हर रोज़ अपनी ख़ुद की recordings में सुना था। अपनी test files में। अपनी गिनती में। अपनी चीख में।

वह आवाज़ अंशु की नहीं थी।

वह उसकी अपनी थी।

[Part 29 समाप्त]

Writer
Piyashi Atma
Story
जवाब मत देना
Chapter
29 of 30
Category
Ghost Stories
Reading time
14 min
Words
2764
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

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