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Part 28: सातवाँ तल

Piyashi Atma · Ghost Stories · 16 मिनट

"मैंने सुना है।"

विक्रांत रज़ाइयों के पहाड़ के पास बैठा रहा, जब तक कोहरा सलेटी नहीं हो गया।

उसने अपना फ़ोन नहीं निकाला। उसने उस आवाज़ को record करने की कोशिश नहीं की। उसे पता था कि उसमें कुछ नहीं मिलेगा। एक ऐसी आवाज़, जिसकी कोई गूँज नहीं, जिसका कोई गला नहीं। शायद वह उसके mic तक पहुँची ही नहीं होगी। शायद वह सिर्फ़ उसके कानों के लिए थी।

तुम नीचे आओगे। और अपना नाम पुकारोगे।

उसे वह aluminium disc याद आई। नवंबर 1936। मीर ज़ाकिर अली की आवाज़ के पीछे, hiss के बहुत नीचे, एक चीख। उसकी अपनी। आज की उम्र की। एक बहुत गहरी, पत्थर की जगह से, ढाई सेकंड की गूँज में लिपटी।

"विक्रांत!"

उसने उसे तब नहीं समझा था। अब भी नहीं समझता था। पर अब उसे पता था कि वह कहाँ होगी। कब होगी।

आज। नीचे। सातवें तल पर।

"तो तू कुछ नहीं पुकारेगा," कबीर ने कहा।

सुबह थी। अँगीठी वाला कमरा। विक्रांत ने उन्हें बताया था। वह आवाज़। वह disc। सब।

"अगर वो कहता है कि तू नीचे जाकर अपना नाम पुकारेगा," कबीर ने कहा, "तो तू नीचे जाएगा, पर तेरा मुँह बंद रहेगा। पूरे वक़्त। एक शब्द नहीं।" उसने अपनी पट्टी वाली हथेली उठाई। "उस कमरे के अंदर मैं रहूँगा।"

"कबीर..."

"मैं रहूँगा।" कबीर की आवाज़ में कोई बहस की गुंजाइश नहीं थी। "मैंने एक लड़के को नीचे भेजा था। पाँच मिनट का काम है, मैंने कहा था। डरपोक है क्या, मैंने कहा था।" वह रुका। "अब मैं ख़ुद जाऊँगा।"

"मैं जा सकती हूँ," इरा ने कहा। धीरे से। "मुझे विधि पता है। मैं..."

"तुम्हें विधि पढ़नी है," कबीर ने बिना उसकी तरफ़ देखे कहा। "बाहर से। जब वो जवाब दे। किसी को उस कमरे के मुँह पर खड़े होकर वो शब्द पढ़ने होंगे, और किसी को अंदर रहकर उसे पुकारना होगा। और वो दोनों एक इंसान नहीं हो सकते।"

इरा चुप हो गई।

विक्रांत ने कबीर को देखा। उसकी लाल, धँसी हुई आँखें। उसकी बढ़ी हुई दाढ़ी। उसकी हथेली, जिस पर अब भी, आधे भरे ज़ख़्मों पर, नीली-बैंगनी स्याही में चार शब्द थे।

"वो तेरे हाथ पर लिखा था," उसने कहा। “विक्रांत को मत बचाना।”

"हाँ।" कबीर ने अपनी हथेली को देखा। फिर उसे मुट्ठी में बंद कर लिया। "शायद इसका मतलब यही था। कि तुझे मत बचा। किसी और को बचा। सलीम को। अंशु को। रघु काका को। सबको जो नीचे हैं।" वह हल्का-सा मुस्कुराया। "सच के टुकड़े, न?"

विक्रांत ने कुछ नहीं कहा।

कबीर ने उसकी गर्दन में लटकी नूर बानो की स्लेट की तरफ़ इशारा किया। "तू उसे क्यों पहने है?"

विक्रांत ने उसे छुआ। काली, लकड़ी के फ्रेम वाली, किनारे घिसकर गोल। उस पर अब भी, धुँधले चॉक में, नूर के आख़िरी शब्द थे। अब तुम्हारी बारी।

उसने उन्हें ध्यान से देखा, कमरे की सुबह की रोशनी में, और पहली बार उसने कुछ और देखा। उन शब्दों के नीचे। स्लेट की काली सतह में, जहाँ चॉक बार-बार लिखा और पोंछा गया था, पचपन साल तक, सफ़ेद धूल की परतों के भूत थे। पुराने शब्द। अधूरे, धुँधले, एक-दूसरे पर चढ़े हुए, जैसे नूर की दीवार पर थे।

और उनमें से एक, अब तुम्हारी बारी के ठीक नीचे, बाकियों से थोड़ा गहरा था। जैसे वह हाल ही में लिखा गया हो, और ठीक से नहीं पोंछा गया हो। उसके अक्षर इतने धुँधले थे कि वह उन्हें पढ़ नहीं पाया। बस इतना दिखा कि वह एक शब्द था। छोटा। तीन-चार अक्षरों का।

"पता नहीं," उसने कहा। "बस लगा कि इसे साथ रखना चाहिए।"

वे बारह बजे उतरे।

जैसे रघु काका ने कहा था। दिन में। जब सूरज सबसे ऊपर हो, भले दिखे नहीं।

बावड़ी के मुँह पर आधा गाँव था। चुपचाप। आँगन में, दीवारों पर, कोठी की छत पर। आदमी, औरतें, बच्चे, बूढ़े। कोई नहीं बोल रहा था। हर कोई अपने हाथ अपने मुँह के पास रखे हुए, जैसे किसी भी पल उसे दबाने के लिए तैयार।

इमरान रस्सी के पास था। गौशाला वाली मोटी रस्सी, जिसका एक सिरा उसकी कमर पर बँधा था, दूसरा विक्रांत की कमर पर। रघु काका की जगह। उसकी माँ उसके पीछे खड़ी थी, उसके कंधे पर हाथ रखे, जैसे उसे वहीं पकड़कर रखना चाहती हो।

रज़ाइयों की गठरियाँ रस्सियों से बँधी थीं, एक के बाद एक, और गाँव के आदमी उन्हें नीचे उतारने के लिए तैयार थे। तल दर तल। जितना नीचे रस्सियाँ जा सकें।

कबीर ने अपना कंधा विक्रांत के कंधे से टकराया। एक हल्का धक्का। बचपन वाला।

"चल," उसने कहा।

वे उतरे।

पहला तल। चौड़ा चबूतरा। मेहराबें। आले, चूड़ियों, कंघियों, खिलौनों से भरे। कोने में मंदिर की घंटी, उलटी, बिना लटकन के।

और पिछली दीवार पर नाम।

विक्रांत ने अपनी नज़रें उन पर नहीं जाने देनी चाहीं। पर वे गईं, अपने आप, सबसे नीचे, सलीम के नाम के नीचे।

विक्रां

एक अक्षर और। पिछली बार से। ताज़ा, सफ़ेद, उसके खाँचे में बारीक चूरा।

और उसके नीचे, एक नया नाम। उसी ताज़े, धारदार तरीके से खुदा हुआ।

रघुनाथ — 2026

कबीर ने उसे देखा, और उसकी साँस रुकी।

"रघुनाथ," इरा ने फुसफुसाया। "माधो नहीं।"

"उसने भैया का नाम पहना था," विक्रांत ने कहा। "पचपन साल। पत्थर उसी नाम को जानता है।"

वह आगे बढ़ा। उसने उस नाम को नहीं छुआ।

दूसरा तल सूखा था। तीसरा भी।

चौथे तल पर, दीवारें नम थीं।

विक्रांत ने उन्हें छुआ, और उसकी उँगलियाँ गीली हो गईं। पत्थर की दरारों में काई हरी और ताज़ी थी, फिसलन भरी। और हवा में वह गंध, जो अब उसके लिए किसी के नाम जितनी जानी-पहचानी हो गई थी।

पाँचवें तल पर, पानी था।

सीढ़ियों पर। पहले बस एक पतली परत, उनके जूतों के नीचे चमकती। फिर टखनों तक। काला, ठंडा, बिल्कुल स्थिर, बिना किसी लहर के, जैसे काँच।

"ये कहाँ से आया?" कबीर ने फुसफुसाया। "पचपन साल से सूखी है।"

किसी ने जवाब नहीं दिया।

वे पानी में उतरे। उसकी ठंडक उनके जूतों से होकर उनके पैरों में घुसी, उनकी हड्डियों में, जैसे बर्फ़ की सुइयाँ।

और जैसे ही वे उतरे, ऊपर की रोशनी गायब हो गई।

विक्रांत ने पीछे मुड़कर देखा। ऊपर, बावड़ी का मुँह, आसमान का वह फीका, सलेटी चौकोर टुकड़ा, जो हर तल पर छोटा होता जा रहा था, वह अब नहीं था। बस अंधेरा। पूरा। जैसे किसी ने ढक्कन रख दिया हो।

रस्सी अब भी उसकी कमर पर थी। तनी हुई, ऊपर की तरफ़। वह उसे महसूस कर सकता था।

पर वह ऊपर नहीं देख सकता था कि वह कहाँ जाती है।

छठे तल तक पहुँचने में बहुत देर लगी।

या शायद बिल्कुल देर नहीं लगी। विक्रांत तय नहीं कर पाया। सीढ़ियाँ नीचे जाती रहीं, पत्थर की, चौड़ी, पानी से ढकी, एक के बाद एक, और हर मोड़ पर एक नया चबूतरा आता, और हर चबूतरा पिछले जैसा लगता। वही मेहराबें। वही आले। वही नम, काई भरी दीवारें।

उसने गिना नहीं। किसी ने नहीं गिना। और इसलिए किसी को नहीं पता था कि वे कितनी सीढ़ियाँ उतरे थे।

इरा की battery lamp टिमटिमाने लगी। उसकी नीली-सफ़ेद रोशनी धुँधली हुई, फिर तेज़, फिर धुँधली, जैसे कोई उसकी साँस रोक रहा हो। विक्रांत की लालटेन की लौ उसकी तरफ़ झुकी थी, हर पल।

और दीवारों पर नाम थे।

हर तल पर। हर दीवार पर। ऊपर से नीचे। सिर्फ़ पहले तल पर नहीं, जैसा उन्होंने सोचा था। हर जगह। हज़ारों। कैथी में, उर्दू में, देवनागरी में, फ़ारसी में, और उनसे भी पुरानी लिपियों में, जिन्हें इरा भी नहीं पहचान पा रही थी। कुछ इतने घिसे हुए कि बस खाँचों के भूत बचे थे। कुछ ताज़े।

"ये..." इरा ने फुसफुसाया। उसकी उँगलियाँ एक ऐसी लिपि पर थीं जो किसी सिक्के पर पाई जाने वाली लगती थी। “...ये एक सौ तैंतीस साल नहीं हैं। ये बहुत पुराने हैं। बहुत पहले के।”

मैं हज़ारों साल से हूँ, और किसी ने मुझे कभी पुकारा नहीं।

मीर सादिक़ अली ने उसे बुलाया नहीं था। उसने बस उसे जगाया था। वह यहाँ पहले से था। इस बावड़ी से पहले। शायद इस गाँव से पहले। इस ज़मीन के नीचे, किसी पुराने कुएँ में, किसी पुरानी गुफ़ा में, जहाँ भी कोई आवाज़ लौटती थी।

सातवें तल से ठीक पहले, आवाज़ें आईं।

पहले ढोल। धम। धम-धम। बहुत पास। जैसे किसी मोड़ के ठीक उस पार।

फिर हँसी। जवान, नशे में, बिखरी हुई। गाने की कुछ पंक्तियाँ, किसी शादी के, गँवई, टूटी हुई।

और फिर नाम।

"शफ़ीक़! अबे शफ़ीक़, रुक, दूल्हा भागता है क्या!"

"हाहाहा, अम्मी बुला रही है, जा!"

"अरे इक़बाल, ढोल धीमा कर, गाँव सो रहा है..."

बारात। 1971 की। पचपन साल पहले की। उसके हर बाराती की आवाज़, ज़िंदा, जवान, ख़ुश, एक-दूसरे को पुकारते हुए। अपनी आख़िरी रात में। बार-बार। लगातार। जैसे उनकी वह रात कभी ख़त्म ही नहीं हुई, बस इसी अंधेरे में, इन्हीं सीढ़ियों पर, एक घूमते हुए tape की तरह चलती रहती है।

कबीर ने अपने दोनों हाथ अपने कानों पर रख लिए।

फिर एक और आवाज़। बाकियों से अलग। अकेली। एक जवान आदमी की, घुँघराले बालों वाले, हल्की मूँछों वाले चेहरे की।

"साहब?"

कबीर जम गया।

"साहब, आप आ गए? मैं नीचे हूँ। यहाँ बहुत कुछ है, साहब। आइए, दिखाता हूँ।"

और नीचे, सीढ़ियों के अगले मोड़ पर, अंधेरे में, एक पीली रोशनी चमकी। छोटी, चौकोर। किसी survey machine की screen जैसी।

कबीर का एक पैर उठा। उसकी तरफ़।

विक्रांत ने उसका हाथ पकड़ लिया। नियम दो। कबीर ने एक झटका खाया, और उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखें गीली थीं।

विक्रांत ने अपना सिर हिलाया। बिना कुछ कहे। उसने अपना मुँह नहीं खोला। उसने कबीर से वादा किया था।

कबीर ने एक लंबी, काँपती साँस ली। और अपने कान से हाथ हटाए, और उस पीली रोशनी की तरफ़ नहीं देखा, और आगे बढ़ा।

विक्रांत ने सातवें तल से ठीक पहले वाले मोड़ पर कुछ देखा।

अगले तल पर। ऊपर। उसके पीछे, उस चबूतरे पर जहाँ से वे अभी उतरे थे।

एक रोशनी। पीली। छोटी। एक लालटेन की।

उसने उसे देखा, और उसके हाथ ठंडे पड़ गए।

लालटेन किसी के हाथ में थी। सीढ़ियों के ऊपर। आँगन के किनारे जैसी जगह पर, जबकि वहाँ कोई आँगन नहीं था, बस पत्थर और अंधेरा। और उसे पकड़ने वाली आकृति छोटी थी। बच्चे जितनी। नौ साल की।

विक्रांत नीचे था। सीढ़ियों पर। और उसने ऊपर देखा।

रोशनी ऊपर से आ रही थी। लालटेन की पीली रोशनी, एक काली परछाई के पीछे। उसकी चिमनी में एक दरार। उसके हैंडल पर एक लाल धागा।

Perspective खिसक जाता है। यादें reconstructed होती हैं।

और लालटेन के नीचे, उस छोटी आकृति के पैरों के पास, एक और आकृति। और भी छोटी। छह साल की। एक लाल ऊनी टोपी में। सीढ़ियों के ऊपर बैठी, अपनी बाँहें घुटनों पर लपेटे। नीचे झाँकती हुई। सीधे उसकी तरफ़।

उसकी तरफ़। विक्रांत की तरफ़।

विक्रांत ने अपनी आँखें बंद कर लीं।

जब उसने उन्हें खोला, वहाँ कुछ नहीं था। बस अंधेरा। और पत्थर।

"क्या देखा?" इरा ने फुसफुसाया। उसका हाथ उसकी बाँह पर था।

विक्रांत ने अपना सिर हिलाया। उसने अपना मुँह नहीं खोला।

सातवाँ तल।

वह बाकियों जैसा नहीं था। कोई चौड़ा चबूतरा नहीं। कोई मेहराबें नहीं। सीढ़ियाँ एक छोटे, चौकोर, पत्थर के मंच पर ख़त्म होती थीं, मुश्किल से पंद्रह फ़ुट चौड़ा, चारों तरफ़ से सीधी, ऊँची, गीली दीवारों से घिरा। पानी यहाँ कमर तक था, काला, स्थिर, बर्फ़ जैसा।

और मंच के सामने वाली दीवार में एक दरवाज़ा था।

पत्थर का। एक अकेले, भारी, तराशे हुए पत्थर का पल्ला, जिसके किनारे दीवार में इतनी सफ़ाई से बैठे थे कि लगता था वह दीवार का ही हिस्सा हो। उस पर कोई कुंडी नहीं थी। कोई ताला नहीं। कोई हत्था नहीं। बस, उसके बीच में, पत्थर में गहरा खुदा हुआ, वही निशान। एक गोला, और उसके बीच से नीचे जाती एक सीधी लकीर।

सातवें तल का दरवाज़ा अंदर से बंद होता है।

ख़ज़ाना।

विक्रांत ने अपना हाथ उस पर रखा। पत्थर बर्फ़ जैसा था, और काँप रहा था। बहुत हल्का। जैसे कुछ उसके दूसरी तरफ़ से उससे टकरा रहा हो।

उसने अपना कान उस पर लगाया।

और उसने उन्हें सुना।

आवाज़ें। सैकड़ों। हज़ारों। बहुत धीमी, बहुत दूर, एक-दूसरे पर चढ़ती हुईं, एक लगातार, अंतहीन गुनगुनाहट में। फुसफुसाहटें। सिसकियाँ। कोई गाना, अधूरा। कोई नाम, बार-बार। कोई बच्चा रोता हुआ। कोई बूढ़ा खाँसता हुआ। एक बारात। एक ढोल। एक विदाई गीत।

मरे नहीं। ज़िंदा भी नहीं। बस रखे हुए।

उसने उनमें एक आवाज़ ढूँढने की कोशिश की। छह साल की। एक हल्की, तोतली खनक के साथ।

और उसे वह नहीं मिली।

उसने फिर से ढूँढा। बहुत ध्यान से। उसके कान, जो एक पूरी अदालत में एक फुसफुसाहट अलग कर सकते थे, उन्होंने उस गुनगुनाहट की हर परत को छाना।

बूढ़े। जवान। औरतें। एक किशोर, गँवई, टूटती आवाज़। रघुनाथ। एक जवान आदमी, घबराया हुआ। सलीम। और एक बच्चा। हाँ, एक बच्चा था। रोता हुआ। धीमा। ठंडा।

पर वह छह साल का नहीं था।

वह बड़ा था। थोड़ा। आठ-नौ साल का। उसकी आवाज़ में वह तोतलापन नहीं था। उसमें एक बड़े बच्चे का, एक बड़े भाई का, हल्का-सा भारीपन था।

विक्रांत ने अपना कान दरवाज़े से हटा लिया।

उसने इसे उस ढेर पर नहीं रखा। उसने इसे बस... छोड़ दिया। अंधेरे में। जैसे कोई किसी चीज़ को किसी कुएँ में गिरा देता है, और उसके तली तक पहुँचने का इंतज़ार नहीं करता।

उन्होंने कमरा बनाया।

यह घंटों का काम था। गठरियाँ रस्सियों से नीचे आती रहीं, तल दर तल, गाँव के हाथों से, और जब वे सातवें तल पर पहुँचतीं, तो वे पानी में भीग जातीं, और भारी हो जातीं, और विक्रांत और कबीर उन्हें खींचकर मंच पर लाते, और खोलते।

बाँस के डंडे, जो उन्होंने ऊपर से उतारे थे, एक ढाँचा बने। उस पत्थर के दरवाज़े को घेरते हुए। दरवाज़ा उसके अंदर। एक छोटा, बंद कमरा, आठ फ़ुट लंबा, छह फ़ुट चौड़ा, जिसकी एक दीवार वह पत्थर का दरवाज़ा था।

फिर रज़ाइयाँ। एक के ऊपर एक। हर दीवार पर। सात, आठ, नौ परतें। फिर भूसे के बोरे, बाहर की तरफ़, जो कमर तक पानी में डूबे थे। फिर और रज़ाइयाँ। फ़र्श पर गद्दे, पानी के ऊपर बाँस के एक मचान पर। छत पर कंबल, टाट, शॉलें। इमरान की माँ की काली, मोटी शॉल, सबसे अंदर वाली परत में, जहाँ वह दरवाज़े के ठीक ऊपर थी।

एक कोने में एक छोटा मुँह। रेंगकर अंदर जाने लायक। उसके सामने, बाहर, एक और गठरी, उसे बंद करने के लिए तैयार।

जब वह पूरा हुआ, विक्रांत ने अपना recorder अंदर रखा। Speaker। और रेंगकर बाहर आया।

चटाक।

वह पानी में खड़ा था, बाहर, कमर तक, और laptop को अपनी छाती से सटाए, ताकि वह गीला न हो। उसने screen देखी।

सीधी आवाज़। फिर कुछ नहीं।

RT60: शून्य दशमलव एक तीन।

उलटी गूँज: नहीं।

चौंतीस मीटर वाली गूँज: नहीं।

उसकी तिजोरी के दरवाज़े के ठीक सामने, उसके अपने घर की सबसे गहरी जगह में, एक कमरा था जिसमें वह नहीं था।

विक्रांत ने कबीर की तरफ़ देखा, और सिर हिलाया।

कबीर ने अपनी jacket उतारी। उसके नीचे से किताब निकाली, लाल कपड़े में लिपटी, और उसे इरा की तरफ़ बढ़ाया।

"तुम्हारी है," उसने कहा। "अब।"

इरा ने उसे लिया। उसके हाथ काँप रहे थे।

कबीर ने विक्रांत की तरफ़ देखा। बहुत देर तक। उस काँपती लालटेन की रोशनी में, कमर तक काले पानी में, उस रज़ाइयों के कमरे के सामने।

"अगर कुछ हो," उसने कहा, "तो चालीस लाख तू मत भरना। अरोड़ा जाए भाड़ में।"

विक्रांत हँसा। एक टूटी, गीली आवाज़। उसने अपना मुँह खोला, कुछ कहने के लिए, और फिर उसे बंद किया। उसने वादा किया था।

उसने बस कबीर को गले लगाया। कसकर। उस ठंडे पानी में। कबीर ने उसकी पीठ पर दो बार थपथपाया। पहले दिन की तरह।

फिर वह मुड़ा, और घुटनों के बल, पानी से निकलकर मचान पर, रेंगता हुआ, उस छोटे मुँह से अंदर चला गया।

इरा उस मुँह के सामने खड़ी हुई, किताब खोले, उस पन्ने पर, जिसमें आख़िरी विधि थी। उसकी battery lamp उसके कंधे पर टँगी, अब भी टिमटिमाती हुई।

विक्रांत उसके बगल में। उसका laptop उसकी छाती से सटा। उसका दूसरा recorder, उस मुँह के ठीक बाहर, एक बाँस पर टँगा। उसका मुँह बंद।

अंदर से, कबीर की आवाज़ आई। बहुत धीमी। बिना किसी गूँज के। जैसे वह किसी बहुत दूर, बहुत बंद, बहुत मरी हुई जगह से बोल रहा हो।

"तैयार?"

इरा ने गला साफ़ किया। "तैयार।"

कबीर ने पुकारा।

"अंशु!"

विक्रांत ने उसे सुना, उस मुँह के बाहर से, और उसकी आवाज़ बिना गूँजे मर गई, अंदर ही, रज़ाइयों में।

उसने laptop देखा। Recorder अंदर था। Screen पर: कबीर की आवाज़। सीधी। एक नुकीली चोटी। और उसके बाद, कुछ नहीं।

कोई जवाब नहीं।

"अंशु!" कबीर ने फिर पुकारा। ज़ोर से।

कुछ नहीं।

"अंशु! मैं कबीर हूँ! तेरा भाई! बाहर आ जा!"

विक्रांत की उँगलियाँ laptop पर कस गईं। उसकी नज़र screen पर थी, उस सपाट लकीर पर, जो कबीर की हर पुकार के बाद सपाट रहती थी। कोई चोटी नहीं। कोई गूँज नहीं। कोई जवाब नहीं।

इरा किताब के सामने खड़ी थी, उसकी उँगली उस पहले शब्द पर, जिससे विधि शुरू होनी थी, जब जवाब आए। उसके होंठ तैयार थे।

कोई जवाब नहीं आया।

"अंशु!"

कबीर की आवाज़ अब फट रही थी। हताश।

"अंशु, प्लीज़! जवाब दे!"

ख़ामोशी।

विक्रांत ने उस पत्थर के दरवाज़े के बारे में सोचा। रज़ाइयों के पीछे। उसकी गुनगुनाहट। हज़ारों आवाज़ें। एक किशोर, एक जवान आदमी, एक बड़ा बच्चा। आठ-नौ साल का। एक बड़े भाई के हल्के भारीपन के साथ।

और कोई छह साल का नहीं।

उसकी साँस धीरे-धीरे उसके सीने में रुक गई।

पर अगर तुम ग़लत नाम पुकारोगे, तो वो जवाब नहीं देगा।

कबीर ने आख़िरी बार पुकारा। अपनी पूरी ताक़त से। एक चीख, जो उस मुर्दा कमरे में बिना किसी गूँज के मर गई, किसी कुएँ में फेंके पत्थर की तरह, जिसके तली से टकराने की आवाज़ कभी नहीं आती।

"अंशुऽऽऽ!"

कुछ नहीं।

पत्थर के दरवाज़े के पीछे की गुनगुनाहट रुक गई।

एक पल में। हज़ारों आवाज़ें, एक साथ, जैसे किसी ने एक बटन दबा दिया हो। सिसकियाँ, फुसफुसाहटें, ढोल, गीत, नाम। सब। एक साथ। चुप।

विक्रांत ने उस अचानक, पूरी, भयानक खामोशी को सुना। उसके कानों में उसका अपना ख़ून बज रहा था।

यह किसी के जवाब न देने की खामोशी नहीं थी।

यह किसी के सुनने की खामोशी थी। किसी बहुत बड़ी, बहुत पुरानी चीज़ की, जिसने अभी-अभी अपना सिर घुमाया हो, और उन तीनों की तरफ़ देखा हो।

और वो जान जाएगा कि तुम उसे ढूँढ रहे हो।

और उस खामोशी के ऊपर, उसके पीछे, उसके चारों तरफ़, बावड़ी की दीवारों में, कमर तक के काले पानी में, सातों तलों की हर सीढ़ी पर, विक्रांत ने उसे महसूस किया। उसकी साँस। उन्नीस hertz। जो पिछले तीन हफ़्तों से, हर रात, बारह लहरें प्रति मिनट थी। एक सोते हुए आदमी की।

वह बदल गई।

तेज़ हुई।

जैसे कोई जाग गया हो।

[Part 28 समाप्त]

Writer
Piyashi Atma
Story
जवाब मत देना
Chapter
28 of 30
Category
Ghost Stories
Reading time
16 min
Words
3031
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

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