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Part 27: मुर्दा कमरा

Piyashi Atma · Ghost Stories · 15 मिनट

मैं विक्रांत हूँ।

विक्रांत आईने से पीछे हटा। एक कदम। फिर दूसरा। उसकी पीठ पलंग से टकराई, और वह उस पर गिर पड़ा, उसकी नज़रें अब भी उस धुँधले काँच पर टिकी हुईं।

आईने में उसकी आकृति भी पीछे हटी थी। उसी तरह। उसी पल। पलंग पर गिरी। उसका चेहरा भी आतंक से भरा था, उसकी आँखें भी फैली हुईं, उसका मुँह भी बंद।

अब उसके होंठ नहीं हिल रहे थे।

वह सामान्य था। एक प्रतिबिंब। एक थका, डरा हुआ आदमी, एक पुराने आईने में, पारे के उखड़ते धब्बों के बीच।

विक्रांत ने अपना हाथ उठाया। आईने वाले ने भी। उसने अपना सिर टेढ़ा किया। आईने वाले ने भी। बिल्कुल साथ। बिना एक पल की देरी के।

पर वह मुस्कान, जो उसने अभी देखी थी, धीमी, प्यार भरी, बिल्कुल उसकी, वह अब भी उसके दिमाग़ में जली हुई थी, जैसे किसी तेज़ रोशनी को देखने के बाद आँखों के सामने रह जाने वाला धब्बा।

मैं विक्रांत हूँ।

उसने इसे समझने की कोशिश की, और उसका दिमाग़ एक ही दिशा में भागा।

वो मेरा नाम चाहता है।

पहले तल की दीवार। विक्रा... अधूरा, पत्थर पर, ताज़ा चूरे के साथ। बाकी लिखने के इंतज़ार में। इरा का घेरा, उसके शरीर में, उसकी आवाज़ में, उसके नाम में। और अब यह। उसकी अपनी शक्ल, उसकी अपनी मुस्कान, उसके होंठों से, उसका नाम लेते हुए। जैसे कोई कपड़ा पहनने से पहले उसे आईने में अपने ऊपर रखकर देखता है।

वो मुझे पहनना चाहता है। मेरा नाम। मेरी जगह।

उसने recorder उठाया, और कमरे से बाहर भागा, और उसने दरवाज़ा अपने पीछे बंद नहीं किया, और उसने पीछे मुड़कर उस आईने की तरफ़ नहीं देखा।

"उसने क्या कहा?" कबीर ने पूछा।

सुबह थी। अँगीठी जल रही थी। विक्रांत ने उन्हें आईने के बारे में बताया था, और जब उसने वे तीन शब्द कहे, उसकी आवाज़ पहली बार काँपी थी।

“'मैं विक्रांत हूँ,'” उसने दोहराया।

कबीर का चेहरा कड़ा हो गया। "वो तेरी नक़ल कर रहा था। तुझे डराने के लिए।"

"वो झूठ नहीं बोलता," विक्रांत ने कहा। "किताब में लिखा है। उसके पास अपना कोई झूठ नहीं।"

"तो वो सच के टुकड़े दे रहा था। ऐसे जोड़कर कि तू ख़ुद झूठ बना ले।" कबीर ने उसके कंधे पर हाथ रखा। "तू विक्रांत है। वो तेरा नाम लेना चाहता है। पहले तल पर अधूरा लिखा था, अब वो उसे पूरा करना चाहता है। बस इतना मतलब है।"

विक्रांत ने सिर हिलाया। यही उसने भी सोचा था। यही ठीक बैठता था।

उसने इरा की तरफ़ देखा।

इरा अँगीठी के दूसरी तरफ़ बैठी थी, और उसकी आँखें विक्रांत पर नहीं थीं। वे उसके हाथों पर थीं, जो उसकी गोद में थे। उसका चेहरा बहुत शांत था, बहुत सफ़ेद, और उसके होंठ कसकर बंद थे, जैसे वह किसी शब्द को अंदर रोके हुए हो।

उसने कुछ नहीं कहा।

विक्रांत ने उस पर ध्यान नहीं दिया। या दिया, और उसे वहीं रखा जहाँ बाकी सब रखा था, उस ढेर पर, जिसे अब वह देखता भी नहीं था।

"मेरे पास एक plan है," उसने कहा। "पर हम उसके बारे में यहाँ बात नहीं करेंगे।"

"क्यों?"

विक्रांत ने दीवारों की तरफ़ देखा। रज़ाइयों से ढकी, पर फिर भी दीवारें। छत। गलियारा। "क्योंकि वो सुन रहा है। हर गूँज उसका कान है। हम जो भी यहाँ कहेंगे, वो उसे पता होगा।"

"तो कहाँ?"

विक्रांत ने स्लेट उठाई। नूर बानो की। जिसके गले की रस्सी अब भी उसके साथ लटकी थी।

"वहाँ, जहाँ वो कभी नहीं आया।"

नूर बानो को दोपहर में दफ़नाया गया।

मस्जिद के पीछे वाले छोटे क़ब्रिस्तान में। मोहल्ले के लोग आए। ज़्यादा नहीं। बीस-पच्चीस। औरतें दूर खड़ी, आदमी क़ब्र के पास। रामदुलारी अपनी लाठी पर झुकी, बिना आवाज़ के रोती हुई। विक्रांत, इरा और कबीर पीछे खड़े रहे, थोड़ा अलग।

किसी ने कुछ नहीं बोला। कोई दुआ ज़ोर से नहीं पढ़ी गई। मौलवी साहब ने होंठ हिलाए, बिना आवाज़ के, और लोगों ने उनके साथ। यह रौशनपुर का तरीका था। यहाँ मरने वालों को भी चुपचाप विदा किया जाता था।

जब मिट्टी डाली गई, विक्रांत ने लोगों के चेहरे देखे। और उसने उनमें कुछ देखा जो उसने इन तीन हफ़्तों में कभी नहीं देखा था।

पिछली रात उन सबने वह गीत सुना था। विदाई का गीत। बावड़ी से उठता हुआ, गाँव की हर गली में फैलता हुआ। एक सोलह साल की लड़की की आवाज़ में, जो पचपन साल पहले चुप हो गई थी।

उनके चेहरों पर डर था, हमेशा की तरह। पर उसके नीचे कुछ और था। एक थकान। एक बोझ, जो बहुत पीढ़ियों से उठाया गया हो, और अब उठाने की ताक़त ख़त्म हो रही हो।

जब लोग लौटने लगे, विक्रांत आगे बढ़ा। रामदुलारी के पास।

"बुआ," उसने कहा। धीमे नहीं। ज़ोर से। ताकि वह सुन सके, और ताकि बाकी लोग भी। "मुझे गाँव से कुछ माँगना है।"

नूर बानो के कमरे में चौदह लोग आए।

वह छोटा कमरा था, और वे एक-दूसरे से सटकर बैठे, रज़ाइयों से ढकी दीवारों से पीठ टिकाए, फ़र्श के गद्दों पर। रामदुलारी। बद्री। वे तीन बूढ़े जो चौपाल से उठकर चले गए थे, जब विक्रांत ने इकहत्तर के बारे में पूछा था। हुक्के वाला, जिसकी उम्र अस्सी से ऊपर थी। कुछ औरतें, घूँघट में। और इमरान, और उसकी माँ, जो पिछली रात गीत सुनकर बहराइच से आए थे, क्योंकि उन्होंने सुना था कि गाँव में कुछ हो रहा है।

कमरे की वह गहरी, निगलती हुई खामोशी उन सबके चारों तरफ़ बंद थी। विक्रांत ने देखा कि लोग उसे महसूस कर रहे थे। उनके कंधे ढीले पड़ रहे थे, धीरे-धीरे। जैसे वे किसी ऐसी जगह आए हों जहाँ पहली बार, पीढ़ियों में, कोई उन्हें सुन नहीं रहा।

विक्रांत खड़ा हुआ। नूर बानो की स्लेट उसके गले में थी। उसने उसे अपने आप पहन लिया था, बिना सोचे।

"ये कमरा," उसने कहा, "पचपन साल तक उसके लिए बंद रहा। हर रात वो इसके दरवाज़े पर आया। हर रात। और कभी अंदर नहीं आ पाया।"

उसने दीवारों की तरफ़ इशारा किया।

"इसलिए। रज़ाइयाँ। कंबल। गद्दे। इस कमरे में कोई आवाज़ नहीं लौटती। कोई गूँज नहीं बनती। और जहाँ गूँज नहीं, वहाँ वो नहीं।"

कुछ लोगों ने एक-दूसरे को देखा।

"मैंने इसे नापा है," विक्रांत ने कहा। "कल रात। अपनी machines से। इस कमरे में उसकी कोई साँस नहीं है। कोई आहट नहीं। वो यहाँ है ही नहीं।"

"तो?" हुक्के वाले ने पूछा। उसकी आवाज़ खुरदरी थी, धीमी, जैसे उसने उसे बरसों से इस्तेमाल न किया हो।

"तो मैं एक ऐसा ही कमरा बनाना चाहता हूँ," विक्रांत ने कहा। "उसके घर में। बावड़ी में। सबसे नीचे। सातवें तल पर। उसकी तिजोरी के दरवाज़े के ठीक सामने।"

कमरे में किसी ने साँस रोकी।

"और फिर मैं उसे वहाँ बुलाऊँगा। उसके नाम से। और जब वो जवाब देगा, उसकी आवाज़ उस कमरे में होगी। एक जगह। और वहाँ से वो लौट नहीं पाएगी, क्योंकि वहाँ लौटने के लिए कोई दीवार नहीं होगी, कोई गूँज नहीं।" उसने एक साँस ली। "और तब, उस पल, उसे बाँधा जा सकता है।"

"बाँधा कैसे?" बद्री ने पूछा।

विक्रांत ने इरा की तरफ़ देखा।

इरा कमरे के कोने में बैठी थी, घुटने मोड़े, और कबीर उसके बगल में, उसकी jacket के अंदर किताब। उसने सिर उठाया।

"मेरे पर-पर-दादा की किताब में दो तरीके लिखे हैं," उसने कहा। उसकी आवाज़ धीमी थी, पर साफ़। "एक, उसे किसी इंसान में बाँधना। हमेशा के लिए।" उसने विक्रांत की तरफ़ नहीं देखा। "मैंने वो कोशिश की थी। मैं गलत थी।"

कमरे में कुछ लोगों ने उसकी तरफ़ देखा। उसने नज़रें नहीं झुकाईं।

"दूसरा तरीका," उसने कहा, "किताब के आख़िरी हिस्से में है। जो मैंने कल रात पढ़ा। कबीर के सामने।" उसने कबीर की तरफ़ देखा, और कबीर ने सिर हिलाया। “'अगर कोई ऐसी जगह बना सके जहाँ कोई सदा न लौटे, और उसे वहाँ उसके पहने हुए नाम से बुलाए, और जब वो जवाब दे, तो उस जगह को बंद कर दे, उसके जवाब के साथ, तो वो वहीं रह जाएगा। एक आवाज़, जो कभी लौटती नहीं। एक पुकार, जिसका कोई जवाब नहीं। हमेशा।'”

उसने किताब बंद की।

"मीर साहब ने इसे लिखा, पर कभी किया नहीं। उन्हें नहीं पता था कि ऐसी जगह कैसे बनाई जाए।" उसने विक्रांत की तरफ़ देखा। पहली बार, आज सुबह से। "उन्हें किसी sound engineer की ज़रूरत थी।"

"और उसके लिए," विक्रांत ने कहा, "मुझे आपकी रज़ाइयाँ चाहिए।"

कमरा शांत रहा।

"सबकी।" उसने कहा। "आपकी दीवारों से। आपकी छतों से। आपके टाट, आपके कंबल, आपके गद्दे। सब। सातवें तल पर एक कमरा बनाने के लिए, जिसमें कोई गूँज न हो, बहुत चाहिए होगा। बहुत मोटा। हर दीवार पर, कम से कम तीन-चार हाथ मोटा। छत पर। फ़र्श पर। जितना मिल सके।"

उसने उनके चेहरे देखे।

"मुझे पता है मैं क्या माँग रहा हूँ।" उसकी आवाज़ थोड़ी धीमी हुई। "ये रज़ाइयाँ आपको बचाती हैं। पीढ़ियों से। इन्हीं की वजह से आपके घरों में उसकी आवाज़ कम पहुँचती है। अगर आप इन्हें उतारेंगे, तो आज रात आपके घर गूँजेंगे। पहली बार। और वो उन गूँजों में होगा।"

कोई कुछ नहीं बोला।

"मैं कह नहीं सकता कि ये काम करेगा," विक्रांत ने कहा। "मुझे नहीं पता। पर ये पहली बार है, एक सौ तैंतीस साल में, कि किसी के पास कोई तरीका है। सिर्फ़ उससे छिपने का नहीं। उसे ख़त्म करने का।"

बहुत देर तक खामोशी रही। वह गहरी, नूर बानो वाली खामोशी।

फिर हुक्के वाला बूढ़ा उठा। धीरे से, अपनी बूढ़ी, अकड़ी टाँगों पर। उसने विक्रांत को देखा, अपनी धँसी हुई आँखों से।

"मेरी बहन उस बारात में थी," उसने कहा। "इकहत्तर में। ढोल वाले की बीवी। उसका आदमी गया। फिर उसका बेटा, अगले महीने, जब उसने उसे पुकारा।" उसने अपना सिर हिलाया। "पचपन साल मैंने अपनी दीवारों पर रज़ाइयाँ टाँगीं। अपनी बहन की याद में। ताकि वो मुझे न ले जाए।"

उसने अपनी लोई कंधे पर ठीक की।

"मेरे घर में ग्यारह रज़ाइयाँ हैं," उसने कहा। "सब ले जाओ।"

रामदुलारी ने अपनी लाठी फ़र्श पर ठोकी, बिना आवाज़ के। "मेरी सात।"

बद्री: "गुमटी के ऊपर के कमरे में चार। और टाट, जितना चाहिए।"

एक औरत, घूँघट के पीछे से, बहुत धीमे: "हमारे पास नौ। और बच्चों के गद्दे।"

इमरान की माँ आगे आई। उसने कुछ नहीं कहा। उसने बस अपनी काली शॉल उतारी, जो उसके कंधों पर थी, मोटी, ऊनी, और उसे विक्रांत की तरफ़ बढ़ा दिया।

वह दिन, विक्रांत ने बाद में सोचा, रौशनपुर में सबसे अजीब दिन रहा होगा। एक सौ तैंतीस साल में।

दोपहर से शाम तक, गाँव की हर गली से, लोग कोठी की तरफ़ आते रहे। बोझ उठाए हुए। रज़ाइयाँ, कंबल, टाट के बोरे, पुराने गद्दे, फटे हुए दरी के टुकड़े, शॉलें, साड़ियाँ, भूसे से भरे बोरे। बच्चे अपने छोटे-छोटे कंबल लिए। बूढ़े अपनी लाठियों के साथ, अपनी पीठ पर गठरियाँ बाँधे।

कोई बोल नहीं रहा था। पूरा गाँव, एक लंबी, चुपचाप, धीमी कतार में, कोठी के फाटक से अंदर आता, अपना बोझ आँगन में रखता, और बिना कुछ कहे लौट जाता।

आँगन में ढेर बढ़ता गया। रंग-बिरंगा, मोटा, ऊँचा। लाल, नीला, पीला, हरा। कुछ नई, कुछ इतनी पुरानी कि उनके कपड़े में से रुई झाँक रही थी। हर एक पर किसी की कहानी। किसी की रात।

कबीर और इमरान उन्हें छाँटते रहे, मोटाई के हिसाब से, गठरियों में बाँधते रहे, रस्सियों से कसते रहे। इमरान बिना रुके काम करता रहा, उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं, उसके हाथ तेज़ और सख़्त।

"मैं नीचे जाऊँगा," उसने विक्रांत से कहा, शाम को। "जब तुम लोग जाओगे।"

"इमरान..."

"मेरा भाई वहाँ है।" उसने सीधे उसकी आँखों में देखा। “मरा नहीं, ज़िंदा भी नहीं। मैं उसे उस अंधेरे में छोड़कर नहीं बैठूँगा।”

उसकी माँ आँगन के कोने में खड़ी थी, अपने बेटे को देखती हुई, उसके चेहरे पर कुछ नहीं। फिर वह आगे आई, और उसने इमरान का चेहरा अपने दोनों हाथों में लिया, और उसकी आँखों में बहुत देर तक देखा।

फिर उसने अपना सिर हिलाया। एक बार। नहीं।

इमरान का चेहरा टूटा।

"अम्मी..."

उसकी माँ ने अपने होंठ उसके माथे पर रखे, और फिर उसे छोड़ दिया, और विक्रांत की तरफ़ मुड़ी।

"एक को उसने ले लिया," उसने कहा। धीमे। "दूसरा मैं उसे नहीं दूँगी।"

विक्रांत ने उसी रात test किया।

उसने अँगीठी वाले कमरे के एक कोने में, बाँस के डंडों और रस्सियों से, एक छोटा ढाँचा बनाया। एक बक्से जैसा, दो हाथ लंबा, दो हाथ चौड़ा, ऊँचाई में उसके सिर तक। फिर उस पर रज़ाइयाँ लपेटीं। एक के ऊपर एक। सात परतें। फिर भूसे के बोरे, बाहर की तरफ़। फिर और रज़ाइयाँ। फ़र्श पर गद्दे, चार परतें। ऊपर, छत की जगह, कंबल और टाट।

एक छोटा, मोटा, कपड़े का डिब्बा। एक कोने में, एक छोटा सा मुँह, जिससे अंदर रेंगकर जाया जा सके।

उसने अपना recorder अंदर रखा, speaker के साथ, और ख़ुद बाहर रहा।

चटाक।

Laptop पर: सीधी आवाज़। और फिर कुछ नहीं। कोई चौंतीस मीटर नहीं। कोई साठ milliseconds पहले वाली चोटी नहीं।

RT60: शून्य दशमलव एक पाँच।

नूर बानो के कमरे जितना नहीं, पर क़रीब। बहुत क़रीब।

उसने infrasound नापा। उन्नीस hertz। साँस।

यहाँ उसे थोड़ी निराशा हुई। वह अब भी थी। धीमी, कमज़ोर, पर थी। बारह लहरें प्रति मिनट।

"क्या हुआ?" कबीर ने पूछा, उसका चेहरा देखकर।

"इतनी नीची आवाज़ को कोई कपड़ा नहीं रोक सकता," विक्रांत ने कहा। "उन्नीस hertz की लहर अठारह मीटर लंबी होती है। उसे सोखने के लिए दीवारें मीटरों मोटी चाहिए। हमारे पास उतनी रज़ाइयाँ नहीं हैं। पूरे ज़िले में नहीं होंगी।"

"तो ये काम नहीं करेगा?"

विक्रांत ने laptop को देखा, उन सपाट, ख़ाली impulse response वाली लकीरों को, और उसके बगल में, वह धीमी, ज़िद्दी, साँस लेती infrasound की लहर।

"उसकी साँस हम नहीं रोक सकते," उसने कहा। "पर उसकी साँस उसकी आवाज़ नहीं है। वो बस वो है जिससे वो ज़िंदा रहता है। उसकी आवाज़, उसकी पुकार, उसका जवाब, वो गूँज में रहता है। ऊँची frequencies में। और वो हम रोक सकते हैं।" उसने एक लंबी साँस ली। "अगर वो उस कमरे में जवाब देगा, तो उसकी आवाज़ वहीं मरेगी। कहीं नहीं जाएगी। और वो उस पल वहाँ होगा। बस वही पल हमें चाहिए।"

इरा ने ढाँचे की तरफ़ देखा, फिर विक्रांत की तरफ़।

"और कौन होगा उस कमरे के अंदर?" उसने धीरे से पूछा। "उसे पुकारता हुआ?"

कोई नहीं बोला।

देर रात, जब बाकी सो गए थे, विक्रांत आँगन में आया।

रज़ाइयों का पहाड़ वहाँ था, अंधेरे में, कोहरे में डूबा, गठरियों में बँधा, सुबह बावड़ी में उतारे जाने के इंतज़ार में। उसने उसे देखा। पूरे गाँव की दीवारें। पचपन साल का डर, एक-एक धागे में बुना हुआ।

और फिर उसने गाँव की तरफ़ से कुछ सुना।

आवाज़ें।

बहुत दूर, बहुत धीमी। पर आवाज़ें, जो इस गाँव में कभी नहीं होती थीं। एक कुत्ते का भौंकना, जो गलियों की दीवारों से टकराकर गूँजा, लौटा, फिर गूँजा। किसी बच्चे का खाँसना, और उसकी गूँज। किसी दरवाज़े का बंद होना, और उसकी गूँज, जो किसी ख़ाली, रज़ाई-रहित कमरे से टकराकर लौटी।

रौशनपुर पहली बार अपनी आवाज़ में गूँज रहा था।

और उन गूँजों में, विक्रांत ने उसे सुना। उसके कान, जो अब हर चीज़ को अलग कर लेते थे, उन्होंने उसे पकड़ा। हर गूँज के ठीक पहले, आधे पल पहले, एक बहुत हल्की, बहुत धीमी, उलटी गूँज। कुत्ते की भौंक से पहले कुत्ते की भौंक। खाँसी से पहले खाँसी।

वह वहाँ था। हर घर में। आज रात। पूरे गाँव में, जिसने अपनी दीवारें उसके लिए खोल दी थीं।

और किसी ने किसी को नहीं पुकारा।

विक्रांत ने अपनी आँखें बंद कीं। पूरे गाँव में, उस रात, हर माँ अपने बच्चे के मुँह पर हाथ रखकर सो रही थी। हर पति अपनी पत्नी के। हर बूढ़ा अपने ख़ुद के। चौदह घंटे, अँधेरे में, अपनी गूँजती दीवारों के बीच।

उसके लिए। एक ऐसे आदमी के लिए जिसे वे तीन हफ़्ते पहले जानते भी नहीं थे।

वह रज़ाइयों के पहाड़ के पास बैठा था, जब उसने उसे सुना।

पीछे से नहीं। बावड़ी से नहीं। किसी गलियारे से नहीं, किसी कमरे से नहीं।

उसके ठीक सामने से। आँगन के बीच से। कोहरे से। जहाँ कुछ नहीं था। कोई नहीं।

और वह आवाज़ किसी की नहीं थी।

यह पहली बार था। तीन हफ़्तों में। बाईस रातों में। उसने माँ की आवाज़ सुनी थी, इरा की, कबीर की माँ की, रघु काका की, नूर की, एक बच्चे की, अपनी ख़ुद की। हमेशा किसी की। हमेशा किसी ऐसे की, जिसे वह जानता था, या जिसे कोई और जानता था। उधार की आवाज़ें। चुराई हुई।

यह किसी की नहीं थी।

यह न आदमी की थी, न औरत की। न बूढ़ी, न जवान। इसमें कोई लहजा नहीं था, न लखनवी, न गँवई, न दिल्ली वाला। इसमें कोई गला नहीं था। कोई होंठ नहीं। कोई जीभ नहीं। जैसे किसी ने आवाज़ को इंसान से पूरी तरह अलग कर दिया हो, और बस उसकी हड्डी बचा ली हो। एक सपाट, साफ़, पूरी, बेजान ध्वनि, जो शब्द बनाती थी, जैसे कोई मशीन बनाती है, पर किसी मशीन से कहीं ज़्यादा पुरानी।

और सबसे भयानक बात: उसमें कोई गूँज नहीं थी।

वह आँगन के बीच में बोली गई। ऊँची दीवारों के बीच। पत्थर की पटियों पर। उस आँगन में, जहाँ कबीर की हँसी पहले दिन लौटने में इतनी देर लगाती थी, जहाँ हर आवाज़ टकराकर बार-बार लौटती थी। और यह आवाज़ लौटी ही नहीं। वह बस हवा में थी, एक पल, और फिर नहीं थी। जैसे वह किसी ऐसी जगह से बोल रही हो जिसके पास अपनी कोई गूँज नहीं, क्योंकि वह ख़ुद गूँज है।

विक्रांत के शरीर का हर बाल खड़ा हो गया।

उसने महसूस किया कि वह पहली बार उससे बात कर रहा था। किसी और बनकर नहीं। किसी का नाम पहनकर नहीं। अपनी असली आवाज़ में। जो उसके पास कभी थी ही नहीं। एक सौ तैंतीस साल से। हज़ारों साल से।

और उसने कहा। धीरे। हर शब्द एक-एक करके, जैसे कोई बच्चा पहली बार अपने मुँह से कुछ बोलने की कोशिश करता है, और उसे अपने ही शब्द अजीब लगते हैं।

"तुम नीचे आओगे।"

ठहराव।

"और अपना नाम पुकारोगे।"

ठहराव। लंबा।

और फिर, उस सपाट, बेजान, बिना-गूँज वाली आवाज़ में, कुछ ऐसा आया जो लगभग, बस लगभग, एक इंसानी भाव जैसा था। संतोष। जैसे किसी ने कोई बहुत पुराना वादा पूरा होते देखा हो।

"मैंने सुना है।"

[Part 27 समाप्त]

Writer
Piyashi Atma
Story
जवाब मत देना
Chapter
27 of 30
Category
Ghost Stories
Reading time
15 min
Words
2944
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

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