Pretika › Ghost Stories › जवाब मत देना

Part 26: कोठी जागती है

Piyashi Atma · Ghost Stories · 15 मिनट

"तुमने मेरी जगह ले ली।"

विक्रांत ने जवाब नहीं दिया।

यह पुकार नहीं थी। इसमें कोई नाम नहीं था। कोई "भैया" नहीं, कोई "विक्की" नहीं। बस एक वाक्य। एक इल्ज़ाम, जिसमें इल्ज़ाम की कोई गर्मी नहीं थी। सिर्फ़ ठंडक। जैसे कोई बच्चा बहुत लंबे इंतज़ार के बाद किसी को बता रहा हो कि उसकी कुर्सी पर कोई और बैठा है।

और विक्रांत को पता था कि वह बच्चा कौन है। उसे पता था, उसके हर डर ने, हर रात के सपने ने, तेईस साल के हर अपराध-बोध ने उसे बताया था।

मुझे जाना था। मेरा नाम रजिस्टर में था। और तू गया। मेरी जगह।

तुमने मेरी जगह ले ली। अंशु। ज़िंदगी की जगह। बचने की जगह। ऊपर की जगह।

वह बावड़ी के किनारे घुटनों पर बैठा रहा, और उसकी आँखों से आँसू नीचे के अंधेरे में गिरते रहे, और उनकी भी कोई आवाज़ नहीं लौटी।

"मुझे पता है," उसने फुसफुसाया। अंधेरे से। "मुझे पता है।"

नीचे से कुछ नहीं आया।

बहुत देर बाद वह उठा। उसके घुटने ठंडे और अकड़े हुए थे। उसने मुड़कर पीछे देखा, गलियारे के दरवाज़े की तरफ़, जहाँ से एक फीकी, पीली रोशनी आ रही थी, अँगीठी वाले कमरे की।

और वह अंदर चला।

गलियारा लंबा था।

यह बात उसने तुरंत नहीं पकड़ी। वह चलता रहा, दीवार के साथ-साथ, अपनी उँगलियाँ ठंडे plaster पर टिकाए, उस पीली रोशनी की तरफ़ जो सामने थी। कोठरियों के बंद दरवाज़े उसके दोनों तरफ़ से गुज़रते रहे। एक। दूसरा। तीसरा।

उसने उन्हें गिना नहीं। पर उसके दिमाग़ को पता था कि पीछे के गलियारे में सात कोठरियाँ हैं। उसने उन्हें Day 6 पर नापा था, एक-एक करके।

वह चलता रहा। रोशनी पास नहीं आई।

चौथा दरवाज़ा। पाँचवाँ। छठा।

सातवाँ।

आठवाँ।

विक्रांत रुका।

उसने अपने बगल के दरवाज़े को देखा। लकड़ी का, पुराना, जिसके कब्ज़े टूटे हुए थे। उसने उसे पहचाना। तीसरी कोठरी। जहाँ कबीर ने survey का सामान छिपाया था।

उसने पीछे देखा। गलियारा पीछे की तरफ़ फैला था, अंधेरे में, उसके छोर का पीछे वाला दरवाज़ा अब दिख नहीं रहा था। उसने आगे देखा। वह पीली रोशनी, अँगीठी वाले कमरे की, अब भी उतनी ही दूर थी, जितनी पहले थी।

वह फिर चला। तेज़। फिर दौड़ा।

दरवाज़े गुज़रते गए। बंद, लकड़ी के, एक जैसे। और हर कुछ दरवाज़ों के बाद वह फिर से उसी टूटे कब्ज़े वाले दरवाज़े के पास से गुज़रता। फिर से। फिर से।

उसकी साँसें फूल गईं। वह रुका। हाँफता हुआ। दीवार से टिककर।

रोशनी अब भी उतनी ही दूर थी।

उसने बगल के दरवाज़े को धकेला। जो भी था। बस किसी चीज़ से निकलने के लिए।

वह खुला।

और अंदर अँगीठी वाला कमरा था।

वही। तीन गद्दे, एक कोने में लिपटा हुआ। अँगीठी में बुझती राख। Lamps। कबीर, करवट लिए, सोता हुआ। इरा, दीवार की तरफ़ मुँह किए।

विक्रांत ने पीछे देखा। वह दरवाज़ा, जिससे वह अभी अंदर आया था, कोठरी का नहीं था। वह अँगीठी वाले कमरे का सामान्य दरवाज़ा था, कीलों के छेदों से भरा, जिसकी दहलीज़ पर ज़ंजीर पड़ी थी।

और उसके पार, गलियारा सामान्य था। छोटा। उसके छोर पर, कुछ ही कदम दूर, पीछे का दरवाज़ा।

विक्रांत ने उसे घूरा। फिर कमरे में कदम रखा। फिर पीछे हटा, बाहर, गलियारे में। उसने बगल वाला दरवाज़ा खोला, कोठरियों में से पहली।

अंदर अँगीठी वाला कमरा था।

उसने अगला खोला। अँगीठी वाला कमरा। कबीर, सोता हुआ। इरा।

अगला।

वही।

हर दरवाज़ा एक ही कमरे में खुल रहा था।

वह अँगीठी वाले कमरे में आया, और दरवाज़ा बंद किया, और उससे अपनी पीठ सटाकर फ़र्श पर बैठ गया।

उसने कबीर को छुआ। नियम दो। उसकी बाँह। गर्म। कबीर ने करवट ली, नींद में बुदबुदाया, और फिर सो गया। उसने इरा को छुआ, उसके कंधे को। गर्म। सोती हुई।

असली। दोनों।

उसने अपनी कलाई की घड़ी देखी। बारह बजकर चालीस मिनट।

फिर उसे कुछ सुनाई दिया।

सामने के हिस्से से। कोठी के बड़े दालान से, जहाँ एक पुरानी, लंबी, लकड़ी की pendulum घड़ी दीवार से टँगी थी, कमरे से ऊँची, जिसका काँच धूल से धुँधला था। विक्रांत ने उसे पहले दिन देखा था, और रघु काका ने बताया था, बड़े साहब के जाने के बाद से बंद है। किसी ने चाबी नहीं दी।

टिक।

टॉक।

टिक।

वह चल रही थी।

विक्रांत ने अपनी कलाई की घड़ी फिर से देखी। उसकी सुइयाँ नहीं हिल रही थीं। बारह बजकर चालीस मिनट पर रुकी हुई। उसने अपना फ़ोन निकाला। Screen जली।

2:14 AM

और उसके नीचे, तारीख़।

Mon, 11 Jan 1999

उसकी उँगलियाँ ठंडी हो गईं।

उसने laptop खोला। Screen के कोने की घड़ी। 02:14। 11-01-1999।

उसने कबीर का फ़ोन उठाया, जो उसके तकिए के पास पड़ा था। 11 जनवरी 1999।

टिक। टॉक।

और फिर, उस टिक-टॉक के साथ, आवाज़ें।

वे दीवारों से आईं। फ़र्श से। छत से। जैसे कोठी की हर ईंट, हर कड़ी, हर plaster की परत ने तेईस साल पहले कुछ सुना हो और अब उसे लौटा रही हो। एक साथ। धीमे, गुनगुनाते हुए, एक-दूसरे पर चढ़ते हुए।

लोगों की फुसफुसाहट। बहुत सारे लोग। किसी के जाने के बाद की धीमी, दबी हुई बातें। बड़े अच्छे आदमी थे। अंत में बहुत तकलीफ़ में थे। ओमप्रकाश अकेला कैसे संभालेगा।

कहीं, सामने के आँगन से, किसी पंडित का मंत्रोच्चार। धीमा, एक लय में।

बर्तनों की खनक। रसोई से। किसी औरत का हँसना। किसी बच्चे का रोना, दूर, और किसी का उसे चुप कराना।

तेरहवीं।

विक्रांत ने उन आवाज़ों में से गुज़रते हुए अपना सिर उठाया, जैसे कोई किसी भीड़ के बीच में किसी एक चेहरे को ढूँढता है।

और फिर उसने उसे सुना।

ऊपर से। पहली मंज़िल से। उसके कमरे से। पूर्वी कोने से।

बच्चों की हँसी। दो। दबी हुई, फुसफुसाती, किसी शरारत में।

और एक औरत की आवाज़। थकी, पर प्यार से भरी। बिस्तर लगाती हुई, रज़ाई ठीक करती हुई।

"विक्की, अंशु, बस। अब सो जाओ। कल सुबह जल्दी उठना है। दादा जी की पूजा है।"

माँ।

विक्रांत का पूरा शरीर काँपने लगा।

"अच्छा, मम्मी।" एक बच्चे की आवाज़। बड़े की। नौ साल का।

"गुड नाइट, मम्मी।" छोटे की। छह साल का। एक हल्की-सी तोतली खनक के साथ।

विक्रांत ने उन दोनों आवाज़ों को सुना, और उसके अंदर कुछ बहुत गहरा, बहुत पुराना हिला। उसने उन्हें पहचाना। उसे पता था कि उसे उन्हें पहचानना चाहिए। एक उसकी अपनी थी। उसके बचपन की। दूसरी उसके भाई की।

पर कौन सी किसकी थी?

वह यह तय नहीं कर पा रहा था। वह उन दोनों को बार-बार अपने दिमाग़ में दोहरा रहा था, अच्छा, मम्मी। गुड नाइट, मम्मी।, और उनमें से किसी को भी उसका दिल मैं नहीं कह रहा था।

नौ साल से पहले का कुछ याद नहीं। Childhood trauma।

उसने अपनी आँखें बंद कर लीं, और ख़ुद को उस बात पर टिकाया।

टिक। टॉक।

माँ के कदम, सीढ़ियों से नीचे। एक दरवाज़ा बंद होना।

फिर, ऊपर, कमरे में, बच्चों की फुसफुसाहट। बहुत धीमी।

“...चल ना। बस एक बार। देखते हैं।”

"मुझे डर लगता है।"

"डरपोक।"

विक्रांत ने अपने हाथ अपने कानों पर रख लिए। ज़ोर से। पूरी ताक़त से। जैसे नूर बानो ने अपने मुँह पर रखे थे।

आवाज़ें फिर भी आती रहीं। उसकी हथेलियों के पार से। उसके सिर के अंदर से।

"डरपोक है तू।"

सुबह होने में बहुत देर लगी।

विक्रांत ने बाद में सोचा कि शायद सुबह नहीं हुई, कम से कम सामान्य तरीके से नहीं। शायद रात बस थक गई। कोहरा सलेटी हुआ, धीरे-धीरे, खिड़कियों पर, और pendulum की टिक-टॉक धीमी हुई, और फिर एक आख़िरी टॉक के साथ रुक गई।

उसने अपना फ़ोन देखा। 7:03 AM। Tue, 23 Dec 2026।

कबीर उठा, आँखें मलता हुआ। उसने विक्रांत को देखा, दरवाज़े से पीठ सटाए, फ़र्श पर बैठे, उसकी आँखें लाल, उसका चेहरा राख जैसा।

"क्या हुआ?" उसने कहा। "तू सोया नहीं?"

"तुमने कुछ नहीं सुना?"

कबीर ने उसे देखा। उसने अपना सिर हिलाया। धीरे से।

इरा भी उठ बैठी थी। उसकी आँखें विक्रांत पर थीं। उसने कुछ नहीं पूछा। उसने बस देखा, और उसके चेहरे पर एक ऐसी चिंता थी जो विक्रांत ने पहले नहीं देखी थी। डर नहीं। शोक। जैसे वह किसी ऐसी चीज़ को देख रही हो जो धीरे-धीरे उसके सामने ख़त्म हो रही हो।

विक्रांत ने उन्हें बताया। गलियारा। दरवाज़े। घड़ी। 1999।

माँ की आवाज़। दो बच्चे।

उसने यह नहीं बताया कि वह यह तय नहीं कर पाया कि कौन सी आवाज़ उसकी थी।

"अब ये सिर्फ़ गूँज नहीं है," इरा ने धीरे से कहा। "पूरी कोठी। ये उसकी हो गई है।"

"फिर हम यहाँ क्यों हैं?" कबीर ने कहा।

किसी ने जवाब नहीं दिया।

फाटक पर खटखटाहट हुई। लोहे पर पत्थर। तीन बार। फिर एक बार।

विक्रांत उठा, और उसके पैर उसे अपने आप फाटक तक ले गए।

रामदुलारी थी। अपनी लाठी के साथ, हाँफती हुई, जैसे बहुत तेज़ चलकर आई हो। और उसके बगल में, उसकी बाँह थामे, झुकी हुई, काँपती हुई, अपनी काली, धुँधली चादर में लिपटी, गले में स्लेट लटकाए।

नूर बानो।

कोठी के फाटक पर। पचपन साल में पहली बार।

विक्रांत उसे देखता रह गया। सुबह की सलेटी रोशनी में, खुले में, वह और भी छोटी लग रही थी। और भी पतली। उसका चेहरा, जो अपने अंधेरे कमरे में किसी पुराने काग़ज़ जैसा लगता था, यहाँ, इस फीकी रोशनी में, लगभग पारदर्शी था। जैसे उसके पीछे की दुनिया उसमें से झलक रही हो।

"वो ज़िद कर रही थी," रामदुलारी ने ज़ोर से कहा। "सुबह से। मेरा दरवाज़ा पीट रही थी। उसे यहाँ आना था। बोली, आज ही। अभी।" उसने अपनी सखी को देखा, और उसकी एक अच्छी आँख में डर था। "मैंने इसे पचपन साल में इस गली के इस तरफ़ कभी नहीं देखा, बेटा।"

नूर ने विक्रांत को देखा। फिर उसकी नज़र उसके पीछे गई। कोठी की तरफ़। आँगन। मेहराबें। पीछे का गलियारा, जो अंधेरे में कहीं बावड़ी तक जाता था।

उसने फाटक की दहलीज़ पार नहीं की।

उसने अपनी स्लेट उठाई। उसके हाथ इतने काँप रहे थे कि चॉक दो बार स्लेट से फिसली। फिर उसने लिखा। धीरे। बहुत धीरे। हर अक्षर जैसे उसकी आख़िरी ताक़त से खींचकर निकाला गया हो।

जहाँ गूँज न हो,

वहाँ वो नहीं टिकता।

विक्रांत ने उसे पढ़ा।

नूर ने पोंछा, और फिर लिखा:

मेरा कमरा।

पचपन साल।

वो कभी अंदर नहीं आया।

सिर्फ़ दरवाज़े तक।

विक्रांत को उसका कमरा याद आया। रज़ाइयों में लिपटी दीवारें। छत से लटकते कंबल। फ़र्श पर गद्दों की परतें। मिट्टी से भरी खिड़की। वह गहरी, निगलती हुई खामोशी, जिसमें उसकी आवाज़ बिना गूँजे मर जाती थी। जिसमें उसे अपने कानों में अपना ही ख़ून बहता सुनाई देता था।

एक anechoic chamber। एक बूढ़ी औरत के हाथों से बना। पचपन साल में। एक-एक रज़ाई करके।

"नूर, बेटा। दरवाज़ा खोल।" हर रात। दरवाज़े के बाहर। कभी अंदर नहीं।

"आपने इसे बनाया," विक्रांत ने फुसफुसाया। "जानबूझकर।"

नूर ने उसे देखा। उसके होंठों के कोने पर कुछ आया, बहुत हल्का। एक मुस्कान का भूत।

उसने स्लेट पोंछी, और लिखा। आख़िरी बार।

अब तुम्हारी बारी।

फिर उसने स्लेट को अपनी गर्दन से उतारा। रस्सी सहित। और उसे विक्रांत की तरफ़ बढ़ाया।

विक्रांत ने उसे लिया। उसकी उँगलियाँ नूर की उँगलियों से छुईं। वे बर्फ़ जैसी ठंडी थीं।

नूर ने एक बार और उसे देखा। लंबी, गहरी, थकी हुई दया से। फिर रामदुलारी की बाँह पकड़ी, और मुड़ गई।

रामदुलारी दोपहर को लौटी। अकेली। उसकी लाठी उसके हाथ में काँप रही थी, और उसकी एक अच्छी आँख लाल थी।

"चली गई," उसने कहा। ज़ोर से नहीं। पहली बार, विक्रांत ने उसे धीमे बोलते सुना। "मेरी सखी।"

नूर बानो अपनी चारपाई पर बैठी मिली थी, रामदुलारी ने बताया। अपने अंधेरे, कपड़े में लिपटे कमरे में। उसकी पीठ दीवार से टिकी, उसके हाथ उसकी गोद में। आँखें बंद।

"और उसके हाथ," रामदुलारी ने कहा, और उसकी आवाज़ टूटी, "उसके मुँह पर नहीं थे। पचपन साल में पहली बार। मैंने उसे सोते हुए हमेशा मुँह पर हाथ रखे देखा था। पर आज नहीं। उसकी गोद में थे। खुले। जैसे कुछ पकड़ना ही न हो।"

उसने अपनी आँखें पोंछीं।

"मुस्कुरा रही थी, बेटा। हल्का-सा। जैसे बचपन में, कुएँ पर, गाते वक़्त।"

विक्रांत ने स्लेट को देखा, जो उसके हाथों में थी। उस पर अब भी, धुँधले चॉक में, आख़िरी तीन शब्द थे। अब तुम्हारी बारी।

उस शाम, जब कोहरा उतर रहा था, एक आवाज़ आई।

बावड़ी से। पीछे के आँगन से। कोठी के हर गलियारे से होती हुई, हर बंद दरवाज़े के नीचे से सरकती हुई। धीमी, दूर की, गूँज में लिपटी, पर साफ़।

एक लड़की गा रही थी।

जवान। सोलह-सत्रह साल की। एक ऐसी आवाज़ में, जिसके बारे में रामदुलारी ने कहा था, कोयल भी शरमा जाए। एक विदाई गीत। पुराना, गँवई, उदास, जो लड़कियाँ अपनी शादी की रात गाती हैं, अपने घर, अपनी माँ, अपनी गलियों को छोड़ते हुए।

विक्रांत, इरा और कबीर अँगीठी वाले कमरे में बैठे थे, और उन्होंने उसे सुना, और कोई कुछ नहीं बोला।

मैंने अपनी आवाज़ उसे दे दी। आख़िरी बार बोलकर। बावड़ी में। 'ले।'

पचपन साल से वह आवाज़ उसके पास थी। नीचे। उसके ख़ज़ाने में।

और आज रात वह उसे गा रहा था।

इरा ने अपना चेहरा अपनी हथेलियों में छिपा लिया। कबीर ने अपनी आँखें बंद कर लीं। विक्रांत बस बैठा रहा, स्लेट अपनी गोद में, और सुनता रहा। जब तक गीत ख़त्म नहीं हुआ। जब तक उसकी आख़िरी लंबी, काँपती तान कोहरे में मर नहीं गई।

विक्रांत रात को नूर के घर गया। अकेला। अपना सामान लेकर।

रामदुलारी और मोहल्ले की औरतें उसे दफ़नाने की तैयारी कर रही थीं, और कमरा ख़ाली था। चारपाई ख़ाली। पर रज़ाइयाँ, दीवारों पर, छत पर, फ़र्श पर, सब वैसी ही थीं।

उसने अपना speaker रखा। Recorder। Laptop।

Sweep। फिर लकड़ी की चटाक।

Laptop पर, impulse response। एक नुकीली चोटी। सीधी आवाज़। और उसके बाद... लगभग कुछ नहीं। दीवारों से कोई लौटती लहर नहीं। छत से कोई नहीं। फ़र्श से कोई नहीं। आवाज़ बस पैदा हुई, और मर गई, उसी जगह, एक पल में।

RT60: शून्य दशमलव एक दो सेकंड।

उसने वह संख्या देखी, और उसका दिल तेज़ धड़का। किसी professional recording studio के vocal booth जितना। किसी विश्वविद्यालय के anechoic chamber के क़रीब।

उसने चौंतीस मीटर वाली गूँज ढूँढी। वह नहीं थी।

उसने सीधी आवाज़ से साठ milliseconds पहले वाली छोटी, असंभव चोटी ढूँढी। उलटी गूँज। वह नहीं थी।

उसने infrasound नापा। उन्नीस hertz। बारह लहरें प्रति मिनट। साँस।

वहाँ कुछ नहीं था। Graph सपाट था। मरा हुआ।

विक्रांत ने laptop को देखा। उन संख्याओं को। उस सपाट लकीर को। और उसके अंदर, तीन हफ़्तों में पहली बार, कुछ ऐसा उभरा जो डर नहीं था, जो शोक नहीं था, जो अपराध-बोध नहीं था।

एक pattern।

एक सच्चा, नापा हुआ, physics वाला pattern।

जहाँ गूँज न हो, वहाँ वो नहीं टिकता।

वह गूँज में रहता था। गूँज उसका शरीर थी, उसका घर, उसका रास्ता। और जहाँ गूँज नहीं थी, वहाँ उसके पास खड़े होने के लिए कोई ज़मीन नहीं थी। वहाँ वह था ही नहीं।

और अगर कोई उसे किसी ऐसी जगह बुलाए, जहाँ गूँज न हो, और वह आए...

विक्रांत ने अपनी आँखें बंद कीं, और उसने उसे देखा। अपने दिमाग़ में। पूरा। एक चित्र की तरह।

एक कमरा। बावड़ी के सबसे नीचे। सातवें तल पर। रज़ाइयों से भरा। हर दीवार, हर कोना, हर इंच। एक anechoic chamber। उसकी अपनी तिजोरी के बीच में।

और उस कमरे के बीच में, कोई खड़ा होकर उसका नाम पुकारता हुआ।

उसने अपनी आँखें खोलीं। उसके हाथ काँप रहे थे, पर डर से नहीं।

वह आधी रात के बाद कोठी लौटा।

इरा और कबीर अँगीठी वाले कमरे में सो रहे थे। उसने उन्हें नहीं जगाया। उसे पहले अपने कमरे से कुछ लेना था। उसका दूसरा recorder, जो उसने ऊपर छोड़ दिया था, पलंग के नीचे, उस रात से जब वह अपना कमरा छोड़कर नीचे आया था।

वह सीढ़ियाँ चढ़ा। उसने उन्हें नहीं गिना।

उसका कमरा। पूर्वी कोना। दरवाज़े पर रघु काका की कीलों के छेद। अंदर ठंडा, बासी, उसके पलंग पर अब भी वह रज़ाई जिस पर उस रात गीले बालों के निशान थे।

उसने recorder पलंग के नीचे से निकाला। फिर, उठते हुए, उसकी नज़र आईने पर पड़ी।

वह पुराना, धुँधला आईना, अलमारी के बगल में, जिसे उसने पहली रात देखा था। उसके किनारों से पारा उखड़ रहा था, काले, फैलते धब्बों में। उसमें उसकी आकृति थी। धुँधली, सलेटी, lamp की कमज़ोर रोशनी में। पाँच दिन की दाढ़ी। धँसी हुई आँखें।

वह मुड़ने वाला था।

फिर उसने देखा कि आईने में उसके होंठ हिल रहे थे।

विक्रांत जम गया।

उसने अपने होंठों पर अपनी उँगलियाँ रखीं। वे बंद थे। स्थिर। सूखे। उसकी उँगलियों के नीचे बिल्कुल नहीं हिल रहे थे।

आईने में, उसकी आकृति ने भी अपनी उँगलियाँ अपने होंठों पर रखी थीं। उसी तरह। उसी पल। बिल्कुल उसकी नक़ल।

पर उन उँगलियों के नीचे, आईने वाले होंठ हिल रहे थे।

धीरे-धीरे। साफ़। एक-एक अक्षर बनाते हुए। जैसे कोई बहुत सावधानी से, बहुत धैर्य से, किसी बहरे को कुछ समझा रहा हो, ताकि वह होंठ पढ़ सके।

कोई आवाज़ नहीं थी। कमरे में कोई आवाज़ नहीं थी। बस वह, अपने बंद, स्थिर होंठों के साथ, और आईने में वह, उसकी शक्ल, उसकी आँखें, उसकी दाढ़ी, उसकी उँगलियाँ, और उसके हिलते होंठ।

विक्रांत ने उन्हें पढ़ा। अपने आप। उसने अदालतों में lip-reading experts के साथ काम किया था। उसे पता था कि शब्द होंठों पर कैसे बनते हैं। "म" पर होंठ बंद होते हैं। "ई" पर फैलते हैं। "व" पर नीचे का होंठ ऊपर के दाँतों को छूता है।

आईने वाले होंठों ने तीन शब्द बनाए। बहुत धीरे। बार-बार। हर बार उसकी आँखों में सीधे देखते हुए, जैसे कोई तय कर रहा हो कि उसने ठीक से समझ लिया है।

और जब वह समझ गया, जब उसके चेहरे पर, असली चेहरे पर, उन शब्दों के अर्थ का आतंक फैला, तो आईने वाली शक्ल ने अपनी उँगलियाँ अपने होंठों से हटाईं, और मुस्कुराई। धीमे से। प्यार से। बिल्कुल उसकी मुस्कान में।

और फिर, आख़िरी बार, उसने कहा। बिना आवाज़ के। सिर्फ़ होंठों से।

मैं विक्रांत हूँ।

[Part 26 समाप्त]

Writer
Piyashi Atma
Story
जवाब मत देना
Chapter
26 of 30
Category
Ghost Stories
Reading time
15 min
Words
2899
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

← पिछला भाग  ·  अगला भाग →

जवाब मत देना · सभी भाग →

और कहानियाँ · More stories