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Part 25: अदला-बदली

Piyashi Atma · Ghost Stories · 14 मिनट

उस रात नीचे से एक नहीं, दो नाम बोले गए थे।

विक्रांत ने स्लेट को पढ़ा। फिर नूर बानो के चेहरे को देखा।

"कौन से?" उसकी आवाज़ फटी हुई थी। "कौन से दो नाम?"

नूर ने अपनी उँगली अपने होंठों पर रखी। फिर उसने उसी उँगली से अपनी काली दीवार की तरफ़ इशारा किया, उस धुँधले धब्बे की तरफ़, 1999 के नीचे। और अपना सिर हिलाया। धीरे से, पर पक्के तरीक़े से।

नाम यहाँ नहीं।

"किसने किसे पुकारा? किसने जवाब दिया?"

नूर ने स्लेट पोंछी। उसने बहुत देर तक कुछ नहीं लिखा। फिर:

पहली पुकार नीचे से आई। एक औरत की आवाज़ में। प्यार से।

फिर ख़ामोशी।

फिर दूसरी पुकार। फिर से नीचे से। उसी औरत की आवाज़ में।

और फिर, किसी ने जवाब दिया।

उसने पोंछा, और उसके हाथ अब काँप रहे थे। उसने आख़िरी बार लिखा, और फिर स्लेट को अपनी गोद में उलट दिया, जैसे वह उसे और देखना न चाहती हो।

बाकी उस लड़की से पूछो। उसकी किताब में लिखा है। जो पन्ना उसने तुम्हें नहीं पढ़ाया।

वे नूर के घर से बाहर निकले, और कोहरा अब भी दिन की फीकी, सलेटी रोशनी में ठहरा हुआ था।

विक्रांत मस्जिद की दीवार के पास रुका। इरा उसके पीछे। कबीर, इरा के पीछे, उससे दो कदम दूर, उसकी हर हरकत पर नज़र रखता हुआ।

"वो पन्ना," विक्रांत ने कहा। "जो तुमने छोड़ा था। लोहे के बाद, जवाब से पहले।"

इरा ने सिर हिलाया।

"मेरे पास उसकी photo है। मैं उसे पढ़ नहीं सकता।"

"मुझे पता है।" इरा ने अपना bag खोला, और दूसरी किताब निकाली। लाल कपड़े में लिपटी। उसने कपड़ा हटाया, और किताब को अपने हाथों में एक पल थामे रखा, जैसे किसी को अलविदा कह रही हो।

फिर उसने उसे कबीर की तरफ़ बढ़ा दिया।

कबीर ने उसे देखा, फिर किताब को। "मैं उर्दू नहीं पढ़ सकता।"

"मुझे पता है।" इरा ने कहा। "पर इसे आप रखिए। मेरे पास नहीं। ताकि आपको पता रहे कि मैं इससे कुछ नहीं करूँगी, जब तक आप दोनों न चाहें।" उसकी आवाज़ काँपी। "मैं पढ़ूँगी, जो आप कहेंगे। पर ये आपके हाथ में रहेगी।"

कबीर ने एक पल हिचकिचाया। फिर उसने किताब ली, और उसे अपनी jacket के अंदर, अपनी छाती से सटाकर रखा। जैसे विक्रांत ने लाल ऊन वाली थैली रखी थी।

"पढ़ो," विक्रांत ने कहा।

वे पीपल के नीचे बैठे, चौक के किनारे, बद्री की गुमटी से थोड़ा दूर। दिन था, और लोग थे, चुपचाप आते-जाते, और यह किसी तरह कोठी से ज़्यादा सुरक्षित लग रहा था। कबीर ने किताब खोली, उस पन्ने पर, जिस पर इंसानी आकृति बनी थी, और उसे इरा के सामने रखा, अपने हाथों से थामे हुए।

इरा ने पढ़ा।

“'जो मैंने रिसाले में नहीं लिखा, और जो मैं इस किताब में भी लिखते हुए डरता हूँ, वो ये है कि सदाई सिर्फ़ लेता नहीं।'”

उसने एक साँस ली।

“'वो बदलता है।'”

विक्रांत आगे झुका।

“'जब सदाई किसी का नाम पुकारता है, और वही इंसान जवाब देता है, तो वो उसे ले लेता है। नाम, आवाज़, सब। उसे नीचे रख देता है, अपने ख़ज़ाने में, और उसका नाम पहन लेता है। ये सीधा लेना है।'”

“'पर कभी-कभी, जब वो किसी का नाम पुकारता है, तो कोई और जवाब देता है। डर में। उलझन में। प्यार में। किसी ऐसी वजह से जो सिर्फ़ उस पल में समझ आती है।'”

इरा रुकी, और उसकी उँगली अगली पंक्ति पर चली, उन शब्दों पर जिनके नीचे किसी ने नई स्याही से लकीर खींची थी।

“'तब वो अदला-बदली करता है। जिसका नाम पुकारा गया, वो नीचे जाता है। और जिसने जवाब दिया, वो उस नाम को पहनकर ऊपर रहता है। उसकी जगह। उसकी ज़िंदगी में। और उसका अपना असली नाम पीछे छूट जाता है, किसी ख़ाली कपड़े की तरह, जिसमें अब कोई नहीं।'”

कबीर ने विक्रांत की तरफ़ देखा।

"रघु काका," विक्रांत ने फुसफुसाया।

“'जो ऊपर रहता है,'” इरा ने पढ़ा, “'वो उस नाम के साथ उसकी यादें भी पाता है। कुछ। सबसे गहरी, सबसे दर्द वाली। और अपनी यादें धीरे-धीरे खो देता है, जैसे किसी और की कहानी। वो अपने असली नाम पर कभी जवाब नहीं दे पाता, क्योंकि वो नाम अब उसका नहीं रहा। वो किसी और ने ले लिया है।'”

उस नाम पर मेरा गला हिलता ही नहीं।

धुँधली हैं। जैसे किसी और की हों।

“'और सदाई,'” इरा ने पढ़ा, और उसकी आवाज़ और धीमी हुई, “'उस नाम को पहनता है जो उसने नीचे लिया। वही उसका नया नाम है। उसका ताज़ा दरवाज़ा। अगर तुम्हें उसे बाँधना है, उसे हमेशा के लिए किसी जगह क़ैद करना है, तो उसे उसी नाम से पुकारना होगा जो वो आख़िरी बार पहने हुए है। और जब वो उस नाम पर जवाब देगा, उस पल वो एक जगह होगा। एक आवाज़ में। एक शरीर जैसी चीज़ में। और तब उसे पकड़ा जा सकता है।'”

इरा ने किताब से नज़र उठाई।

“'पर अगर तुम ग़लत नाम पुकारोगे, तो वो जवाब नहीं देगा। और वो जान जाएगा कि तुम उसे ढूँढ रहे हो।'”

कुछ देर कोई नहीं बोला। चौक पर लोग चुपचाप आते-जाते रहे। बद्री की केतली उबलती रही।

"तो," कबीर ने आख़िरकार कहा, धीरे-धीरे, जैसे वह किसी गणित के सवाल को सुलझा रहा हो। "रघु काका। 1971। उसने 'रघु' पुकारा। माधो ने जवाब दिया। तो रघुनाथ नीचे गया, और माधो रघु बनकर ऊपर रहा।"

"और सदाई ने 'रघुनाथ' पहन लिया," इरा ने कहा। "इसीलिए वो उसकी आवाज़ में नीचे से 'माधो' बुलाता था। पचपन साल।"

"और उस रात," विक्रांत ने कहा, "रघु काका ने 'भैया' पुकारा। और उसने जवाब दिया। और वो चले गए।"

किसी ने इसका खंडन नहीं किया।

“1999,” कबीर ने कहा।

विक्रांत ने अपने हाथों को देखा।

"दो नाम बोले गए," उसने कहा। "नूर ने कहा। दोनों नीचे से। एक औरत की आवाज़ में। माँ की, शायद। सदाई के पास माँ की आवाज़ होगी। वो उस शाम बावड़ी वाले आँगन में रही होंगी, बोली होंगी।"

"कौन से दो?" इरा ने धीरे से पूछा।

विक्रांत ने उसकी तरफ़ देखा। "दादा ने रजिस्टर में मेरा नाम लिखा था। तो पहला नाम मेरा होगा। विक्रांत। सौदे वाला नाम।" उसकी आवाज़ में कोई काँपना नहीं था। उसने यह सब इतनी बार अपने दिमाग़ में घुमाया था कि अब यह किसी case file की तरह लग रहा था। "और नूर ने कहा कि पहली पुकार के बाद ख़ामोशी थी। किसी ने जवाब नहीं दिया।"

"क्योंकि आप भाग गए थे," इरा ने कहा।

"क्योंकि मैं भाग गया था।" विक्रांत ने सिर हिलाया। "मैं ऊपर था। मैंने उसे सुना, और मैं डर गया, और मैं भागा। मैंने जवाब नहीं दिया।"

"तो दूसरा नाम?"

"अंशु।" विक्रांत ने कहा। "सदाई को अपना नाम चाहिए था। जिस नाम पर सौदा था, उसने जवाब नहीं दिया। तो उसने दूसरे को पुकारा। जो नीचे था। सातवीं सीढ़ी पर। अकेला।" उसकी आवाज़ टूटी, बस एक पल के लिए। "और अंशु ने जवाब दिया। अपने नाम पर। क्योंकि वो छह साल का था, और अंधेरे में अपनी माँ की आवाज़ सुनी थी।"

उसने अपनी आँखें बंद कीं।

"तो सदाई अंशु को ले गया। और अब वो 'अंशु' पहने हुए है।"

इरा ने कुछ नहीं कहा।

वह किताब को देख रही थी, जो कबीर के हाथों में थी, उस पन्ने पर, उस इंसानी आकृति पर जिसकी छाती पर गोला और लकीर थी। उसका माथा सिकुड़ा हुआ था।

"क्या?" विक्रांत ने कहा।

"कुछ नहीं।"

"इरा।" विक्रांत ने उसकी तरफ़ देखा। "तुमने वादा किया था। कुछ नहीं छिपाओगी।"

इरा ने अपनी आँखें बंद कीं।

"ये सीधा लेना हुआ," उसने धीरे से कहा। "आपने जो बताया। सदाई ने अंशु को पुकारा, अंशु ने अपने नाम पर जवाब दिया, अंशु गया। इसमें कोई अदला-बदली नहीं है।"

"हाँ।"

"पर अब्बू ने लिखा था," इरा ने कहा, "और ये किताब कहती है, कि जिसमें सदाई को बाँधा जा सकता है, वो वो है जो आख़िरी अदला-बदली में बचकर निकला हो। रस्म के लिए। मेरे ख़ानदान को हमेशा पता रहता है, किसने कब जवाब दिया, कौन लौटा।" उसने विक्रांत की तरफ़ देखा, बहुत सावधानी से। "अब्बू ने 1999 के बारे में लिखा था, कि उस रात अदला-बदली हुई थी। कि कोई बचकर निकला था, किसी और का नाम पहनकर।"

कबीर ने किताब को थोड़ा कसकर पकड़ा।

"अगर 1999 में सिर्फ़ सीधा लेना हुआ था," इरा ने कहा, "तो वो अदला-बदली कहाँ है?"

विक्रांत ने उसे देखा।

"शायद तुम्हारे अब्बू ग़लत थे," उसने कहा।

"हो सकता है।"

"वो Lucknow में थे। दूर। उन्होंने रामदुलारी से सुना। जो बहरी है, और जिसकी एक आँख है।"

"हो सकता है।" इरा ने कहा। "या..."

वह रुकी।

"या क्या?"

इरा ने उसकी आँखों में देखा। बहुत देर तक। उसकी नज़र उसके चेहरे पर घूमी, उसकी आँखों पर, उसकी नाक पर, उसके होंठों पर, जैसे वह उसमें कुछ ढूँढ रही हो। जैसे उसकी माँ ढूँढती थी। फिर उसकी नज़र उसके हाथ पर गई। उसके बाएँ हाथ पर। जो उसकी जाँघ पर रखा था, उसकी उँगलियाँ हल्की-सी मुड़ी हुईं, जैसे वे अब भी कोई pen पकड़े हों।

"या फिर," इरा ने बहुत धीमे कहा, "कहानी उस तरह नहीं हुई, जिस तरह आपको याद है।"

विक्रांत का चेहरा कड़ा हो गया।

"मुझे याद है, इरा।" उसकी आवाज़ में कुछ ठंडा था, कुछ ऐसा जो इरा ने उसमें पहले नहीं सुना था। "मुझे वो एक चीज़ याद है। वो रात। लालटेन। मैं ऊपर। अंशु नीचे। मैंने उसे डरपोक कहा। नूर ने ख़ुद सुना। डरपोक। बड़ा भाई छोटे को चिढ़ाता है। वो सच है।"

"मुझे पता है।"

"मेरी माँ ने मुझे तेईस साल तक विक्रांत कहा।" उसकी आवाज़ ऊँची हो रही थी। "मेरे पापा ने। मेरे स्कूल ने। मेरे कॉलेज ने। मेरे passport ने। मेरी अपनी आवाज़ ने, हर recording में, हर test file में।" उसने अपनी छाती पर हाथ रखा। "मैं विक्रांत हूँ।"

"विक्रांत..."

"और अगर मैं विक्रांत नहीं होता," वह बोलता रहा, उसके शब्द तेज़, कटे हुए, जैसे वह किसी ऐसी चीज़ को धकेल रहा हो जो किसी दरवाज़े से अंदर आने की कोशिश कर रही हो, "तो मुझे उस रात की कोई याद नहीं होती। मुझे वो dare याद है। वो लालटेन। मेरे हाथ में। मुझे याद है मैंने उसे भेजा था।"

“नाम के साथ यादें भी आती हैं,” इरा ने बहुत धीमे कहा। “कुछ। सबसे गहरी, सबसे दर्द वाली।”

विक्रांत ने उसे घूरा।

कबीर ने अपना हाथ विक्रांत के कंधे पर रखा। "बस, इरा।" उसकी आवाज़ में कोई ग़ुस्सा नहीं था, बस एक थकी, सख़्त दीवार। "बस। ये विक्रांत है। मैं इसे जानता हूँ। बचपन से। मोती ने इसे काटा था। इसने cricket के बाद radio फेंका था।" उसने इरा की तरफ़ देखा। "कल रात तुमने इसे एक घेरे में खड़ा किया था। आज तुम इसे बता रही हो कि ये ख़ुद नहीं है। तुम्हें क्या चाहिए?"

इरा का चेहरा टूटा।

"कुछ नहीं," उसने फुसफुसाया। "मुझे कुछ नहीं चाहिए।"

वह उठी, और थोड़ी दूर जाकर पीपल के तने से टिककर खड़ी हो गई, उनकी तरफ़ पीठ करके।

विक्रांत ने उसकी पीठ को देखा। उसके अंदर कुछ हिल रहा था। कोई बहुत गहरी, बहुत धुँधली चीज़, उस मछली की तरह जो बार-बार सतह के पास आती थी। उसने उसे देखने से इनकार कर दिया। उसने उसे वापस नीचे धकेल दिया, पूरी ताक़त से, जैसे कोई अपनी मुट्ठी में किसी पानी की धारा को रोकता है।

मैं विक्रांत हूँ।

"तो नाम अंशु है," कबीर ने कहा। एक पक्की, सीधी आवाज़ में। "उसका नया दरवाज़ा। अगर हमें उसे बाँधना है, तो हमें उसे 'अंशु' कहकर पुकारना होगा। और जब वो जवाब देगा..."

"तब वो एक जगह होगा," विक्रांत ने कहा। "एक आवाज़ में।"

"और तब उसे पकड़ा जा सकता है।"

विक्रांत ने सिर हिलाया।

पीपल के तने के पास, इरा ने कुछ नहीं कहा। उसकी पीठ उनकी तरफ़ रही। पर विक्रांत ने देखा कि उसकी शॉल उसके कंधों पर काँप रही थी, धीरे-धीरे, जैसे वह बिना आवाज़ के रो रही हो।

उस शाम, विक्रांत अकेला पीपल के नीचे बैठा रहा, कोहरे के उतरने तक।

उसने अपनी आँखें बंद कीं और वह याद बुलाई। फिर से। अपनी एक याद। जिसे उसने तेईस साल तक अपने अंदर संभालकर रखा था, जैसे कोई किसी पुराने, ज़हरीले, क़ीमती पत्थर को रखता है।

ठंड। जनवरी की ठंड। लालटेन, उसके हाथ में। दरार वाली चिमनी, लाल धागा।

और अंशु, लाल ऊनी टोपी में, सीढ़ियों के ऊपर, नीचे झाँकता हुआ। डरपोक। नीचे जा के दिखा। सातवीं सीढ़ी तक।

उसने इस बार उसे और ध्यान से देखा। हर frame को। जैसे वह किसी अदालती tape का frame-by-frame analysis करता।

लालटेन उसके हाथ में थी। वह ऊपर खड़ा था।

पर रोशनी ऊपर से आ रही थी।

उसने यह पहले भी देखा था। Day 5। और उसने ख़ुद को समझाया था। यादें reconstructed होती हैं। Perspective खिसक जाता है।

उसने इस बार भी ख़ुद को समझाया। पर इस बार, समझाने में ज़्यादा वक़्त लगा।

और फिर, उसकी उस याद के किनारे पर, जहाँ हमेशा अंधेरा होता था, जहाँ वह भागता था, कुछ और था। बहुत धुँधला। बहुत छोटा। जैसे किसी tape के आख़िरी हिस्से में, noise के बहुत नीचे, एक आवाज़, जिसे सुनने के लिए gain बहुत बढ़ाना पड़ता है।

ठंडा पानी। सीने तक। अंधेरा। और नीचे से, किसी औरत की आवाज़, बहुत प्यार से, बहुत पास से, एक नाम पुकारती हुई।

और उसका अपना मुँह, छोटा, ठंड से काँपता, खुलता हुआ।

"हाँ?"

विक्रांत ने अपनी आँखें खोल दीं। झटके से।

चौक पर कोहरा उतर आया था। लोग जा चुके थे। मंदिर का ख़ाली हुक धुंध में गायब हो रहा था।

उसकी साँसें तेज़ थीं।

सपना। Day 7 वाला सपना। मैंने उसे अंशु की नज़र से देखा था। Survivor’s guilt। मैं हमेशा सोचता हूँ कि उसने क्या महसूस किया होगा। नीचे। अकेले। जब उसे पुकारा गया। ये उसकी याद नहीं। ये मेरी कल्पना है। उसकी।

उसने इस बात को कसकर पकड़ा। उसकी उँगलियाँ उसकी हथेलियों में गड़ गईं।

मैं ऊपर था। मैं भागा। मैंने जवाब नहीं दिया।

मैं विक्रांत हूँ।

उन्होंने रात कोठी में बिताने का फ़ैसला किया।

यह कबीर ने सुझाया था, और विक्रांत ने माना था, और इरा ने कुछ नहीं कहा था। अगर हमें उसे बाँधना है, तो हमें वहीं रहना होगा जहाँ वो है। और हमें उसके बारे में जितना हो सके, जानना होगा।

अँगीठी वाला कमरा। तीन गद्दे। रघु काका वाला, कोने में लिपटा। नियमों की सूची दीवार से उतार दी गई थी। कबीर ने उसे मोड़कर अपनी जेब में रख लिया था, फेंका नहीं। रघु काका की कील से टँगी थी, उसने कहा था।

विक्रांत सो नहीं पाया।

आधी रात के बाद वह उठा, और बिना किसी को जगाए, बिना कोई recorder लिए, पीछे के गलियारे में गया। Torch नहीं जलाई। उसने अपने कानों पर भरोसा किया।

पीछे का दरवाज़ा। आँगन। कोहरा, कमर तक।

बावड़ी का मुँह खुला था। जाली अब भी ऊपर, पत्थर की पटिया एक तरफ़, जैसे इरा ने कल शाम छोड़ा था। चॉक का घेरा, आधा मिटा हुआ, कबीर के जूते की रगड़ से टूटा। दीये, बुझे हुए, ठंडे। रसोई का पीतल का पतीला, पत्थर पर पड़ा, उल्टा।

विक्रांत किनारे पर गया। उस छोटे, टूटे घेरे से दूर। और बावड़ी के मुँह के पास घुटनों के बल बैठ गया।

उसने नीचे देखा। अंधेरा। पूरा। गहरा। साँस लेता हुआ। बाहर। रुकना। अंदर।

वह किसी को पुकारना चाहता था। अंशु। उसके होंठों पर था, पूरा, तैयार। तेईस साल से उसके गले में फँसा हुआ।

उसने उसे रोका। उसने अपने दाँत अपनी जीभ पर गड़ाए। नियम, अब सही वाला। पुकारना भी दरवाज़ा है।

वह बस बैठा रहा। नीचे देखता हुआ। अंधेरे में। जैसे कोई क़ब्र के किनारे बैठता है।

"मुझे माफ़ कर दे," उसने फुसफुसाया। किसी का नाम लिए बिना। बस अंधेरे से। "मुझे माफ़ कर दे। मैंने तुझे भेजा। मैं भागा। मुझे जाना था। मेरा नाम था। और तू गया।"

उसकी आवाज़ नीचे गिरी, और उसकी कोई गूँज नहीं लौटी। जैसे पहले तल पर नहीं लौटी थी। जैसे यह बावड़ी उसकी आवाज़ को निगल रही हो, सिर्फ़ उसकी।

उसने इस पर ध्यान नहीं दिया।

वह बहुत देर तक वहाँ बैठा रहा। कोहरा उसके चारों तरफ़ घूमता रहा।

और फिर, नीचे से, एक आवाज़ आई।

कोई पुकार नहीं। कोई नाम नहीं। कोई "विक्की" नहीं, कोई "बेटा" नहीं, कोई लोरी नहीं। कुछ ऐसा जो इन तीन हफ़्तों में कभी नहीं हुआ था।

एक वाक्य। पूरा। सीधा। बिना किसी को बुलाए।

एक बच्चे की आवाज़। ठंडी, थकी, बहुत दूर से आती, ढाई सेकंड की गूँज में लिपटी, पर साफ़। हर शब्द अलग। जैसे बोलने वाले ने यह वाक्य बहुत, बहुत लंबे समय तक, अंधेरे में, अकेले, अपने मन में दोहराया हो, और आख़िरकार उसे कहने का मौक़ा मिला हो। उस इंसान से, जिससे वह तेईस साल से यह कहना चाहता था।

उसमें कोई ग़ुस्सा नहीं था। कोई इल्ज़ाम नहीं। बस एक ठहरी हुई, ठंडी, पूरी सच्चाई। जैसे कोई बच्चा किसी बड़े को कोई ऐसी बात बताता है जो उसे बहुत साफ़ पता हो, और बड़े को कभी समझ में न आई हो।

विक्रांत ने उसे सुना, और उसका पूरा शरीर पत्थर हो गया।

"तुमने मेरी जगह ले ली।"

[Part 25 समाप्त]

Writer
Piyashi Atma
Story
जवाब मत देना
Chapter
25 of 30
Category
Ghost Stories
Reading time
14 min
Words
2746
Language
Hindi (हिंदी)
Price
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