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Part 24: 1999
Piyashi Atma · Ghost Stories · 14 मिनट
"कबीर, रुक जा! मैं यहाँ हूँ!"
कबीर की आँखें आगे-पीछे घूमती रहीं। गलियारे के अंधेरे की तरफ़, जहाँ से वह आवाज़ आ रही थी, हाँफती, बेताब, टूटी हुई। फिर अपने बगल की तरफ़, जहाँ विक्रांत खड़ा था, उसकी बाँह उसके कंधे पर, उसका चेहरा सफ़ेद, उसका मुँह खुला, पर उसमें से कोई आवाज़ नहीं निकल रही थी।
विक्रांत ने कुछ कहना चाहा। मैं हूँ। मैं यहाँ हूँ। ये मैं हूँ। उसके होंठ हिले, उसकी जीभ हिली, पर उसका गला अब भी सुन्न था, ठंडा, जैसे कोई उसकी आवाज़ अभी भी उस चॉक के घेरे में छोड़ आया हो।
वह बोल नहीं पा रहा था।
और अंधेरे वाला विक्रांत बोल रहा था। साफ़, ऊँचा, पूरी ताक़त से।
"कबीर! वो मैं नहीं हूँ! जिसे तू पकड़े है, वो मैं नहीं हूँ! वो उसके अंदर है, इरा ने उसे डाल दिया! रुक जा, भाई, प्लीज़!"
कबीर का चेहरा टूटा। उसकी पकड़ विक्रांत की कमर पर ढीली पड़ी।
विक्रांत ने उसकी आँखों में देखा। उसने देखा कि वह क्या सोच रहा था। जिसे मैं पकड़े हूँ, वो बोल नहीं पा रहा। जो पुकार रहा है, उसकी आवाज़ विक्रांत की है। इरा ने अभी-अभी कुछ किया था। एक रस्म। एक घेरा।
कबीर का हाथ उसकी कमर से हटा।
विक्रांत ने उसका हाथ पकड़ लिया।
कसकर। अपनी पूरी ताक़त से। अपनी सुन्न, बर्फ़ जैसी उँगलियों से, उसकी हथेली को, उस हथेली को जिस पर नीली-बैंगनी स्याही में खुदा था विक्रांत को मत बचाना। उसने उसे दबाया, और अपनी आँखें उसकी आँखों में गड़ा दीं।
नियम दो। छुओ।
कबीर ने अपनी हथेली में वह दबाव महसूस किया। उसकी आँखें नीचे गईं, उनके जुड़े हाथों पर। फिर ऊपर, विक्रांत के चेहरे पर।
"कबीर! भाई!"
कबीर ने अंधेरे की तरफ़ नहीं देखा। उसने जवाब नहीं दिया। उसने बस विक्रांत का हाथ अपनी मुट्ठी में और कसकर दबाया, जैसे कोई डूबने से पहले आख़िरी रस्सी पकड़ता है।
और भागा।
फाटक। आँगन। गाँव की गलियाँ, कोहरे में डूबी हुईं, अंधेरी, ख़ाली।
पीछे, कोठी से, वह आवाज़ उनका पीछा करती रही। "कबीर! रुक! वो मैं नहीं हूँ!" पहले पास। फिर दूर। फिर और दूर। हर गली के मोड़ पर थोड़ी धीमी, जैसे किसी अदृश्य रस्सी से बँधी हो जो उसे एक हद से आगे नहीं जाने देती।
चौक। मंदिर। ख़ाली हुक। पीपल।
गाँव के बाहर का रास्ता। खेत, दोनों तरफ़, सरसों के फूल अंधेरे में बस धुँधले, सलेटी धब्बे। साल के पेड़, कोहरे से उभरते और गायब होते, लंबे, पतले आदमियों की तरह।
और फिर पुलिया।
पत्थर की, पुरानी, उसके दोनों तरफ़ झाड़ियाँ। वही पुलिया जहाँ पहली रात taxi रुकी थी। जहाँ ड्राइवर ने कहा था, रात में कोई आपको नाम लेकर बुलाए, तो पहले देख लीजिएगा कौन है।
कबीर ने उसे लगभग घसीटकर पार कराया।
और विक्रांत ने उसे महसूस किया।
यह कोई दृश्य नहीं था। यह कुछ ऐसा था जो उसके कानों ने किया, उसकी त्वचा ने, उसके पूरे शरीर ने। जैसे किसी बहुत लंबे, बंद, दबाव वाले कमरे से बाहर निकलो, और हवा अचानक हल्की हो जाए। जैसे किसी गहरे पानी से सतह पर आओ, और तुम्हारे कान खुल जाएँ।
आवाज़ें।
झींगुर। पुलिया के उस पार की झाड़ियों में, सैकड़ों, अपनी लगातार, तीखी, कंपकंपाती चिरचिराहट में। दूर कहीं, एक कुत्ता भौंका, और भौंकता रहा, और किसी ने उसे चुप नहीं कराया। उससे भी दूर, किसी highway पर, एक truck का भारी, गुर्राता engine, और उसके horn की लंबी, बेसुरी चीख।
विक्रांत पुलिया के किनारे घुटनों के बल गिर गया।
उसने सुना। बस सुना। झींगुरों को। कुत्ते को। Truck को। तीन हफ़्तों में पहली बार, कुछ ऐसा जो सामान्य था। जो किसी ने छिपाया नहीं था। जो किसी से डरता नहीं था।
उसके गले में कुछ टूटा। पहले एक सिसकी, जो उसकी सुन्न जीभ से फिसलकर बाहर आई। फिर एक और। और उसकी आवाज़ लौट आई, उसके साथ, टूटी हुई, फटी हुई, उसकी अपनी।
वह रोया। पुलिया के किनारे, कीचड़ में, अपने घुटनों पर, झींगुरों की आवाज़ में। जैसे वह शायद उस जनवरी के बाद कभी नहीं रोया था।
कबीर उसके पास बैठ गया। उसने उसके कंधे पर हाथ रखा, और कुछ नहीं कहा।
वे पुलिया के उस पार, सड़क के किनारे एक पेड़ के नीचे बैठे, रात भर। ठंड थी, और उनके पास कोई रज़ाई नहीं थी, बस उनकी jackets, और कबीर का एक मफ़लर जो उसने विक्रांत के गले में लपेट दिया था।
"मेरे हाथ पर लिखा था," कबीर ने कहा, बहुत देर बाद, "कि तुझे मत बचाना।"
"हाँ।"
"गलियारे में, जब वो आवाज़ आई, मुझे एक पल लगा..." कबीर रुका। “...कि शायद यही मतलब था। कि जिसे मैं पकड़े हूँ, उसे मत बचाना। कि असली तू पीछे है।”
विक्रांत ने उसकी तरफ़ देखा।
"फिर तूने मेरा हाथ पकड़ा," कबीर ने कहा। "उसी हाथ को। और मुझे लगा, भाड़ में जाए। जो भी लिखा है, जिसने भी लिखा है। मैं अपने भाई का हाथ नहीं छोड़ूँगा।"
वह हँसा, एक थकी, छोटी हँसी।
"सच के टुकड़े," उसने कहा। "शायद उसका मतलब कुछ और था। शायद इसका मतलब था कि अगर मैं तुझे बचाऊँगा, तो कुछ और बुरा होगा। मुझे नहीं पता।" उसने अपनी हथेली को देखा। "मुझे फ़र्क नहीं पड़ता।"
विक्रांत ने उसका हाथ पकड़ा। फिर से। बिना किसी नियम के।
"शुक्रिया," उसने कहा।
कबीर ने सिर हिलाया।
कुछ देर दोनों चुप रहे। झींगुर बोलते रहे।
"हम कल यहीं से निकल जाते हैं," कबीर ने कहा। “Bahraich। फिर Lucknow। तू मेरे यहाँ रह, जब तक ठीक न हो जाए। फिर Delhi। कोठी जाए भाड़ में। अरोड़ा जाए भाड़ में। सब कुछ।”
विक्रांत ने जवाब नहीं दिया।
"विक्रांत?"
"अंशु अभी भी नीचे है," विक्रांत ने कहा। बहुत धीमे।
कबीर ने उसकी तरफ़ देखा।
"सलीम भी। रघु काका भी। और वो सब, जिनके नाम दीवार पर हैं।" विक्रांत ने पुलिया के उस पार देखा, कोहरे में, अंधेरे गाँव की तरफ़। “मरे नहीं, ज़िंदा भी नहीं। बस रखे हुए। और मुझे अब भी नहीं पता कि उस रात क्या हुआ था, कबीर। मुझे टुकड़े पता हैं। एक लालटेन। एक dare। एक गीला कंबल। माँ की आवाज़। पर मुझे पूरी चीज़ नहीं पता।”
"तो?"
"तो मैं जा नहीं सकता।" विक्रांत ने कहा। "जब तक मुझे पता न हो कि मैंने उस रात अपने भाई के साथ क्या किया।"
सुबह होते-होते, कोहरे से एक आकृति निकली। गाँव की तरफ़ से। पुलिया की तरफ़ आती हुई।
इरा।
उसने शॉल ओढ़ी थी, और उसके हाथ में उसका bag था। उसका चेहरा सफ़ेद था, उसकी आँखें सूजी हुईं, और वह धीरे चल रही थी, जैसे हर कदम उसे किसी भारी चीज़ से आगे धकेलना पड़ रहा हो।
कबीर उठ खड़ा हुआ। उसके हाथ मुट्ठियों में बंद।
इरा पुलिया के बीच में रुकी। उसने उन्हें देखा, और कुछ देर उसके मुँह से कोई शब्द नहीं निकला।
"मैं इस पार नहीं आऊँगी," उसने आख़िरकार कहा, "अगर आप नहीं चाहते।"
"हम नहीं चाहते," कबीर ने कहा।
इरा ने सिर हिलाया। वह वहीं बैठ गई। पुलिया के पत्थर के किनारे पर। गाँव और उसके बीच की लकीर पर।
"मैं माफ़ी माँगने नहीं आई," उसने कहा। "क्योंकि उसका कोई मतलब नहीं। जो मैंने किया, वो किया।" उसने विक्रांत की तरफ़ देखा। "मैं आपको कुछ देने आई हूँ।"
उसने अपने bag से एक diary निकाली। पुरानी, नीली, cardboard की जिल्द वाली, उसके कोने मुड़े हुए।
"ये मेरे अब्बू की है," उसने कहा। "हर पीढ़ी में, जो इस किताब का बोझ उठाता है, वो रौशनपुर की ख़बरें रखता है। कौन गया, कौन लौटा, अहद कब पूरा हुआ, कब टूटा। अब्बू ने 1980 से लिखना शुरू किया था।"
उसने diary खोली, एक पन्ने पर, जिसे उसने एक पुराने bus ticket से चिह्नित किया था।
"जनवरी 1999," उसने कहा।
विक्रांत का दिल रुका।
"मैं आपको इसमें से सब पढ़कर सुनाऊँगी," इरा ने कहा। "बिना कुछ छोड़े। बिना कोई पन्ना पलटे।" उसकी आवाज़ काँपी। "और फिर, अगर आप चाहें, तो मैं चली जाऊँगी, और आप मुझे कभी नहीं देखेंगे। और अगर आप चाहें, तो मैं आपके साथ नूर बानो के पास चलूँगी, और हम मिलकर उस रात को पूरा करेंगे। आप तय कीजिए।"
कबीर ने विक्रांत की तरफ़ देखा।
विक्रांत ने पुलिया के बीच बैठी उस औरत को देखा। जिसने उसे पसंद किया था। जिसने उसे एक चॉक के घेरे में खड़ा किया था।
"पढ़ो," उसने कहा।
“'३ जनवरी, १९९९,'” इरा ने पढ़ा। “'बहराइच से ख़बर। सहगल कोठी में बुज़ुर्ग, लाला रामनाथ सहगल, का इंतक़ाल। ख़ानदान दिल्ली से आया है तेरहवीं के लिए। बेटा ओमप्रकाश, उसकी बीवी, दो बच्चे।'”
विक्रांत के दादा। रामनाथ। उसने यह नाम बस कुछ पुरानी photos के पीछे देखा था।
“'१० जनवरी। रामदुलारी से (हमारी पुरानी मुख़बिर) ख़बर मिली। बूढ़े लाला ने मरने से दो दिन पहले रजिस्टर मँगवाया था। ख़ुद अपने हाथ से उसमें एक नाम लिखा। अहद के मुताबिक़। पीढ़ी का नाम। १९७१ में ख़ानदान ने नाम नहीं दिया था, और गाँव ने उसकी क़ीमत चुकाई थी। बूढ़ा जानता था। उसने इस बार नाम दिया।'”
इरा रुकी। उसने ऊपर देखा, विक्रांत के चेहरे की तरफ़।
"आगे पढ़ो।"
“'नाम बड़े पोते का था। उम्र नौ बरस।'”
विक्रांत ने अपनी आँखें बंद कर लीं।
जनवरी 1999। 9 बरस। नीली स्याही में। रजिस्टर के फटे किनारे पर।
उसके दादा ने उसका नाम लिखा था। अपने हाथ से। अपनी मौत से दो दिन पहले। एक नौ साल के बच्चे का नाम, एक ऐसी चीज़ के लिए जो नाम खाती थी।
“'ओमप्रकाश को इसका पता बाद में चला,'” इरा ने पढ़ा। “'तेरहवीं की शाम। रामदुलारी कहती है, उसने बहुत हंगामा किया। पिता की लाश के सामने। वो बच्चों को उसी रात दिल्ली ले जाना चाहता था। पर रात हो चुकी थी, कोहरा था, और गाड़ी नहीं थी।'”
“'११ जनवरी की रात,'” इरा ने पढ़ा, और उसकी आवाज़ बहुत धीमी हो गई, “'दोनों बच्चे बावड़ी गए।'”
वह पुलिया पार करके वापस गए। तीनों। दिन के उजाले में।
कबीर इरा के पीछे चला, उससे दो कदम दूर, उसकी हर हरकत पर नज़र रखते हुए। इरा ने इस पर कुछ नहीं कहा।
नूर बानो ने इस बार पहली खटखटाहट पर दरवाज़ा खोला। जैसे उसे पता हो कि वे आ रहे हैं।
वह अपनी चारपाई पर बैठी, उसकी स्लेट उसके गले में, और उसने इरा को देखा। बहुत देर तक। इरा ने अपनी नज़रें नहीं झुकाईं।
फिर नूर ने अपनी स्लेट उठाई, और लिखा:
ज़ाकिर अली की आँखें हैं तुम्हारी।
इरा के होंठ काँपे। उसने सिर हिलाया।
नूर ने पोंछा। फिर उसने विक्रांत की तरफ़ देखा।
विक्रांत ने उसे बताया। इरा के अब्बू की diary। दादा का रजिस्टर। नौ बरस। ग्यारह जनवरी की रात।
"आप वहाँ थीं," उसने कहा। "किनारे पर। सुबह। आपने लिखा था, दो बच्चे नीचे गए, एक ऊपर आया। मुझे बाकी चाहिए। सब। जो भी आपने देखा। जो भी सुना।"
नूर ने उसे देखा। फिर अपनी स्लेट को। फिर बहुत देर तक दीवार को, वह काली, लिखावट से भरी दीवार, जिस पर 1999 के नीचे एक नाम था जो उसने उस दिन रगड़कर मिटा दिया था।
फिर उसने लिखना शुरू किया।
मैं रात को सोती नहीं। पचपन साल से।
उस रात मैं अपने दरवाज़े पर बैठी थी। अंदर। कान लगाकर।
आधी रात के बाद, हवा कोठी की तरफ़ से आ रही थी। और मैंने आवाज़ें सुनीं।
बच्चों की। दो।
विक्रांत ने अपनी साँस रोकी।
हँस रहे थे पहले। फुसफुसाकर। जैसे कोई शरारत कर रहे हों।
फिर एक ने दूसरे को कुछ कहा। ज़ोर से। चिढ़ाते हुए।
उसने पोंछा।
'डरपोक।'
विक्रांत का पूरा शरीर कस गया। डरपोक है तू। नीचे जा के दिखा। सातवीं सीढ़ी तक।
उसकी याद। उसकी एक याद। सच थी।
फिर कुछ देर कुछ नहीं।
फिर एक बच्चे ने दूसरे को नाम लेकर पुकारा। बहुत ज़ोर से। घबराकर।
"कौन सा नाम?" विक्रांत ने पूछा। उसकी आवाज़ फटी हुई थी।
नूर ने उसे देखा। उसने लिखा नहीं।
"कौन किसे पुकार रहा था? बड़ा छोटे को? अंशु? क्या मैंने अंशु को पुकारा था?"
नूर ने अपनी उँगली अपने होंठों पर रखी। चुप।
फिर उसने लिखा: मैं नहीं लिखूँगी। नाम यहाँ नहीं।
उसने अपनी काली दीवार की तरफ़ इशारा किया। 1999 के नीचे वाले धुँधले धब्बे की तरफ़।
उसके बाद, पानी की आवाज़।
बावड़ी पचपन साल से सूखी थी। तब भी। पर मैंने पानी सुना। जैसे कोई बड़ी चीज़ उसमें गिरी हो। या उससे निकली हो।
फिर एक बच्चे का रोना।
फिर ख़ामोशी।
उसने पोंछा, और उसके हाथ अब काँप रहे थे।
मैं सुबह से पहले गई। जब कोठी में शोर मचा। लालटेनें। लोग।
तुम्हारी माँ किनारे पर थी। नीचे झुकी। चीखती हुई।
और एक बच्चा, ज़मीन पर, कंबल में। भीगा हुआ।
"मैं," विक्रांत ने कहा।
नूर ने उसे देखा। उसने सिर नहीं हिलाया। उसने इनकार भी नहीं किया। उसने बस देखा।
विक्रांत ने अपना फ़ोन निकाला। माँ की आवाज़। Deconvolution के बाद। पूरी।
उसने उसे चलाया। नूर के उस खामोश, कपड़े में लिपटे कमरे में, जहाँ आवाज़ें बिना गूँजे मरती थीं।
“...सुन रहे हो? मेरी बात सुनो... मैंने देखा उसे... जब वो ऊपर आया... मैंने उसकी आँखें देखीं... वो विक्रांत नहीं है...”
नूर बानो ने उस आवाज़ को सुना, और उसकी आँखें बंद हो गईं।
“...तुम समझ नहीं रहे... मैंने उसकी आँखें देखीं... और उसे पुकारा, और उसने...”
“...उसे इस नाम से मत बुलाओ... वो जवाब दे देगा...”
विक्रांत ने फ़ोन नीचे रखा।
और उसके दिमाग़ में, सब कुछ एक साथ आया। सारे टुकड़े। तेईस साल। एक लालटेन, एक dare, एक रजिस्टर, एक दादा, एक रात। और वे अपनी जगह बैठे। एक-एक करके। एक ऐसी तस्वीर में, जो उसने पहले कभी पूरी नहीं देखी थी, और जो उसके हर डर, हर अपराध-बोध, हर रात के सपने के साथ बिल्कुल ठीक बैठती थी।
दादा ने उसका नाम दिया था। विक्रांत। नौ बरस। जाना उसे था। सौदा उसके नाम पर था।
उस रात, बच्चे गए। उसने अंशु को चिढ़ाया। डरपोक। उसने उसे नीचे भेजा। सातवीं सीढ़ी तक।
और नीचे से उसका नाम पुकारा गया। विक्रांत। वही नाम जो रजिस्टर में था। सदाई अपना सौदा लेने आया था।
और उसने जवाब नहीं दिया। वह भागा। लालटेन छोड़कर। डर से। वह बच गया।
पर सदाई ख़ाली हाथ नहीं जाता। सदाई कभी ख़ाली हाथ नहीं जाता।
और नीचे, अंधेरे में, एक छह साल का बच्चा था। अकेला। डरा हुआ। अपने बड़े भाई की बात रखने के लिए सातवीं सीढ़ी पर खड़ा। और किसी ने उसे पुकारा, किसी ऐसी आवाज़ में जिस पर वह भरोसा करता था, और उसने जवाब दिया।
अंशु गया। उसकी जगह।
और फिर किसी ने उसे निकाला। गीला, काँपता, बेहोश। शायद वह भागते-भागते फिसलकर नीचे गिरा था, अंधेरे में। शायद उसने अपने भाई को बचाने की कोशिश की थी, पानी में, बहुत देर से। उसे याद नहीं था। पर वह बच गया।
और उसकी माँ ने उसे देखा। बावड़ी के किनारे। उसकी आँखों में। और समझ गई।
वो विक्रांत नहीं है।
वह वो बेटा नहीं था जिसे उसकी माँ ने बचाना चाहा था। वह वो बेटा था जिसका नाम दिया गया था। जिसे जाना था। जो भागा। और जिसकी जगह उसका छोटा, मासूम, भरोसा करने वाला बेटा अंधेरे में चला गया।
उसे इस नाम से मत बुलाओ।
माँ उस नाम से नफ़रत करती थीं। रजिस्टर वाले नाम से। जिस नाम ने उनका छोटा बेटा छीन लिया। वह नहीं चाहती थीं कि उस रात कोई उसे उस नाम से बुलाए, उस बावड़ी के किनारे, क्योंकि अगर उसने उस नाम पर जवाब दिया, तो शायद सदाई उसे भी ले जाता। सौदा पूरा करने।
इसीलिए उन्होंने उसे बाद में "विक्की" कहना बंद कर दिया था। इसीलिए वह उसे ऐसे देखती थीं, सालों तक, जैसे उसके चेहरे में कुछ ढूँढ रही हों जो कभी नहीं मिलता। वह अंशु को ढूँढती थीं। उसके चेहरे में। उस बेटे के चेहरे में जो बच गया था, जबकि बचना किसी और को था।
विक्रांत ने अपना चेहरा अपनी हथेलियों में छिपा लिया।
उसका अपराध-बोध सच था। तेईस साल। हर रात। हर सपना। वह सब सच था।
उसने अपने भाई को मरने भेजा था। और ख़ुद, उसकी जगह, ज़िंदा रहा था।
इरा ने उसके कंधे पर हाथ रखा। कबीर ने दूसरे पर। कमरे की खामोशी उन सबके चारों तरफ़ बंद रही, निगलती हुई, पूरी।
बहुत देर बाद, विक्रांत ने अपना चेहरा उठाया।
नूर बानो अब भी उसे देख रही थी। वही पुरानी, गहरी, थकी हुई दया। पर अब उसमें कुछ और भी था। एक तरह की बेचैनी। जैसे वह कुछ कहना चाहती हो, और ख़ुद को रोक रही हो।
उसकी स्लेट उसकी गोद में थी। उसका हाथ उस पर था, चॉक के साथ, बिना लिखे।
"क्या?" विक्रांत ने फुसफुसाया। "और क्या है?"
नूर ने उसकी तरफ़ देखा। फिर इरा की तरफ़, जिसकी आँखें बड़ी हो गई थीं, जैसे वह भी कुछ समझ रही हो। फिर कबीर की तरफ़। फिर दीवार की तरफ़, उस धुँधले, रगड़े हुए धब्बे की तरफ़, 1999 के नीचे।
उसने अपनी आँखें बंद कीं, जैसे कोई बहुत लंबी, बहुत ठंडी नदी में उतरने से पहले करता है।
फिर उसने स्लेट उठाई, और लिखा। धीरे-धीरे। हर अक्षर अलग। जैसे हर अक्षर उसकी उँगलियों से खींचकर निकाला जा रहा हो।
और फिर उसने उसे घुमाया, ताकि विक्रांत पढ़ सके।
उस रात नीचे से एक नहीं,
दो नाम बोले गए थे।
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- जवाब मत देना
- Chapter
- 24 of 30
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- Ghost Stories
- Reading time
- 14 min
- Words
- 2753
- Language
- Hindi (हिंदी)
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