Pretika › Ghost Stories › जवाब मत देना

Part 23: विश्वासघात

Piyashi Atma · Ghost Stories · 15 मिनट

सुबह होने तक विक्रांत ने तय कर लिया था कि वह किससे पूछेगा।

उसके फ़ोन में दो photos थीं। एक पन्ना जिस पर एक इंसानी आकृति बनी थी, उसकी छाती पर गोला और लकीर। उसके नीचे उर्दू की घुमावदार लिखावट, कुछ शब्दों के नीचे नई स्याही की लकीर। और उसके बाद वाला पन्ना।

वह उन्हें पढ़ नहीं सकता था। कबीर भी नहीं। और जो पढ़ सकती थी, उसी ने वह पन्ना छोड़ा था।

उसने नाश्ते के वक़्त इरा को देखा। वह अँगीठी के पास बैठी थी, चाय बनाती हुई, उसका चेहरा थका और शांत। उसने विक्रांत को कुल्हड़ दिया, और उनकी उँगलियाँ एक पल के लिए छुईं। उसकी उँगलियाँ गर्म थीं।

उसने कुछ नहीं कहा। उसने भी नहीं।

"मैं गाँव जा रहा हूँ," उसने कबीर से कहा। "बद्री के पास। Batteries लानी हैं।"

कबीर ने उसे देखा, फिर इरा को, और सिर हिलाया।

नूर बानो के दरवाज़े पर उसने खटखटाया। अपनी उँगलियों के जोड़ से। तीन बार। फिर एक बार।

अंदर से कोई आवाज़ नहीं आई।

उसने फिर से खटखटाया। फिर से वही।

उसे रामदुलारी का इशारा याद था, पर यह भी याद था कि सदाई ने वह इशारा बाजा-घर के दरवाज़े पर बजाया था। शायद नूर को भी पता था। शायद वह किसी खटखटाहट पर भरोसा नहीं करती थी।

उसने दरवाज़े के नीचे की दरार में अपना फ़ोन सरकाया। Screen ऊपर। उस पन्ने की photo पर।

कुछ देर कुछ नहीं हुआ।

फिर अंदर कुंडी खुली।

नूर बानो उसी अंधेरे, कपड़े में लिपटे कमरे में खड़ी थी। उसके हाथ में उसका फ़ोन था, और उसकी धुँधली आँखें screen पर थीं। उसने उसे अपने चेहरे के बहुत पास पकड़ा था, जैसे बूढ़े लोग पढ़ते हैं।

उसने विक्रांत को अंदर आने का इशारा किया।

कमरे की वह गहरी, निगलती हुई खामोशी उसके चारों तरफ़ बंद हुई। विक्रांत चारपाई के पास, फ़र्श पर बैठा। नूर अपनी चारपाई पर। उसकी स्लेट उसके गले में।

उसने बहुत देर तक photo को पढ़ा। उसकी उँगली screen पर चलती रही, पंक्ति दर पंक्ति, बहुत धीरे। एक बार उसने zoom किया, अपनी काँपती उँगलियों से, अजीब ढंग से, जैसे उसने यह कभी न किया हो। फिर दूसरी photo पर गई।

फिर उसने फ़ोन नीचे रखा, और अपनी स्लेट उठाई।

इसमें लिखा है कि उसे कैसे बाँधा जाए।

चीं-चीं। पोंछना।

हमेशा के लिए। पीढ़ियों का सौदा ख़त्म करके।

विक्रांत ने आगे झुककर पढ़ा।

सदाई का कोई शरीर नहीं। इसीलिए वो कहीं बंधता नहीं। उसे बाँधने के लिए उसे एक शरीर देना होगा। एक इंसान।

पोंछना।

उसे हर किसी में नहीं बाँधा जा सकता। सिर्फ़ एक में।

नूर ने उस पन्ने की photo पर फिर से उँगली रखी, उन शब्दों पर जिनके नीचे किसी ने नई स्याही से लकीर खींची थी। उसने उन्हें बहुत ध्यान से पढ़ा। फिर लिखा, धीरे, हर अक्षर को सावधानी से बनाते हुए।

जो आख़िरी अदला-बदली में बचकर निकला हो।

जिसके साथ सदाई ने आख़िरी बार सौदा किया हो।

उसी में। उसके शरीर में। उसकी आवाज़ में। उसके नाम में।

और फिर वो कभी बाहर नहीं आएगा। और गाँव आज़ाद हो जाएगा।

विक्रांत ने उन शब्दों को पढ़ा। फिर से पढ़ा।

आख़िरी अदला-बदली। 1999।

"और उस इंसान का क्या होगा?" उसने पूछा। उसकी आवाज़ उस खामोश कमरे में बिना गूँजे मर गई।

नूर ने उसकी तरफ़ देखा। वही पुरानी, थकी हुई दया।

उसने स्लेट पर एक शब्द लिखा।

कुछ नहीं।

विक्रांत ने उसे समझा नहीं। "कुछ नहीं मतलब?"

नूर ने पोंछा, और लिखा: कुछ नहीं बचेगा। सिर्फ़ शरीर। उसके अंदर वो। हमेशा।

उसने अपनी हथेली अपनी छाती पर रखी। फिर उसे खोला, धीरे से, जैसे कोई चिड़िया उड़ा रहा हो।

बाकी सब जाएगा।

विक्रांत ने अपनी आँखें बंद कर लीं।

नूर ने उसकी बाँह छुई। उसने आँखें खोलीं। वह फिर से लिख रही थी, और इस बार उसके हाथ तेज़ चल रहे थे, जल्दी में, जैसे उसे डर हो कि वक़्त ख़त्म हो रहा है।

ये किताब किसके पास थी?

"इरा के पास। वो archivist है। कहती है Lucknow के किसी दुकानदार से ख़रीदी।"

नूर ने उसे बहुत देर तक देखा। फिर उसने अपना सिर हिलाया, धीरे-धीरे, बाएँ से दाएँ।

उसने स्लेट पोंछी और लिखा:

ये किताब कोई नहीं बेचता।

ये ख़ून में चलती है।

फिर उसने फ़ोन उठाया, उस photo पर गई जिसमें पहले पन्ने का कोना दिख रहा था, और उस पर अपनी उँगली रखी। वहाँ, हाशिए पर, नई स्याही में, एक छोटी पंक्ति थी जिसे विक्रांत ने पहले देखा था, और जिसे उसने बस किसी की निशानी समझा था।

नूर ने लिखा:

यहाँ लिखा है: 'मेरी बेटी इरा के लिए। जब वक़्त आए।'

और नीचे, एक नाम। उसके बाप का। क़ुरैशी।

और उसके नीचे: 'मीर ज़ाकिर अली के ख़ानदान से।'

विक्रांत का पूरा शरीर ठंडा पड़ गया।

बाजा-घर की photo। सफ़ेद कपड़ों वाला आदमी। आँखें ज़मीन की तरफ़ झुकी हुई। और इरा की उँगलियाँ, उस शीशे पर, ठीक उस चेहरे पर, एक पल के लिए।

इसी दिन वो पूछेगी कि मैंने ये क्यों छिपाया।

...आपने ये क्यों छिपाया?

वह किसी से नहीं पूछ रही थी। वह अपने पर-दादा से पूछ रही थी।

नूर ने एक आख़िरी बार स्लेट पोंछी। उसने लिखा, बहुत सीधे, बहुत सादे अक्षरों में, और फिर उसे विक्रांत की तरफ़ घुमाया, और अपनी उँगली से उसकी छाती पर दो बार थपथपाया। जैसे हाट में किया था।

वो लड़की तुम्हारे लिए आई है।

वह कोठी की तरफ़ भागा।

कोहरा फिर से नीचे उतर रहा था, शाम से पहले, गलियों को भरता हुआ, घरों की दीवारों से लिपटता हुआ। विक्रांत ने उसे चीरा, पत्थर की गलियों पर अपने जूते बजाते हुए, बिना सोचे कि आवाज़ कहाँ जा रही है, कौन सुन रहा है।

फाटक। आँगन। सामने का बरामदा।

कबीर अँगीठी वाले कमरे में था, अकेला, गद्दे पर बैठा, अपनी पट्टी वाली हथेली को घूरता हुआ।

"इरा कहाँ है?"

कबीर ने ऊपर देखा। उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया, विक्रांत का चेहरा देखकर।

"बावड़ी पर।" उसने कहा। "एक घंटे पहले गई। किताब लेकर। बोली, उसने बाँधने का तरीका ढूँढ लिया है, और उसे तैयारी करनी है। कहा, जब तू लौटे, तुझे वहाँ भेज दूँ।"

विक्रांत ने उसकी तरफ़ देखा।

"कहा था," कबीर ने जोड़ा, धीरे से, "कि तेरे बिना नहीं होगा।"

विक्रांत ने उसे सब बताया। तेज़ी से, टुकड़ों में, बिना साँस लिए। नूर बानो। स्लेट। आख़िरी अदला-बदली में बचकर निकला। कुछ नहीं बचेगा। मीर ज़ाकिर अली। वो लड़की तुम्हारे लिए आई है।

कबीर ने सुना। उसके चेहरे पर कई चीज़ें आईं और गईं। अविश्वास। ग़ुस्सा। और फिर, सबसे आख़िर में, कुछ ठंडा और सख़्त।

उसने अपनी पट्टी वाली हथेली को देखा। विक्रांत को मत बचाना।

फिर उसने पट्टी खोली। धीरे से, एक-एक लपेट करके। अक्षर अब भी वहीं थे, नीले-बैंगनी, खाल में खुदे हुए, आधे भरे हुए ज़ख़्मों पर।

उसने उन्हें बहुत देर तक देखा।

"सच के टुकड़े," उसने कहा। "ऐसे जोड़कर कि तुम ख़ुद झूठ बना लो।"

उसने अपनी हथेली को मुट्ठी में बंद कर लिया।

पीछे का आँगन धुंध में डूबा था। जाली खुली थी।

विक्रांत ने उसे दूर से देखा, गलियारे के दरवाज़े से। पत्थर की पटिया एक तरफ़ खिसकी हुई। जाली ऊपर उठी, अपने कब्ज़ों पर टिकी। बोल्ट ज़मीन पर पड़े, और उनके साथ रघु काका की कीलें, जो विक्रांत ने उस रात ठोकी थीं। बिखरी हुई।

और बावड़ी के मुँह के चारों तरफ़, पत्थर के चबूतरे पर, चॉक से कुछ बना था।

एक घेरा। बड़ा, बावड़ी के मुँह को घेरता हुआ, पर एक तरफ़, गलियारे वाले दरवाज़े की तरफ़, उसके किनारे पर एक छोटा, दूसरा घेरा। इतना बड़ा कि उसमें एक इंसान खड़ा हो सके। और उस छोटे घेरे के बीच, चॉक से बना, वही निशान। एक गोला, और उसके बीच से नीचे जाती एक सीधी लकीर।

इरा बावड़ी के किनारे बैठी थी। बड़े घेरे के अंदर। उसके सामने ज़मीन पर दूसरी किताब खुली रखी थी, और उसके चारों तरफ़ दीये जल रहे थे। मिट्टी के, छोटे, सात। उनकी लौ, विक्रांत ने देखा, बावड़ी के मुँह की तरफ़ झुकी हुई थी।

उसने उसे आते सुना, और मुड़ी।

विक्रांत ने उसका चेहरा देखा, और उसमें वह नहीं था जिसकी उसे उम्मीद थी। कोई चालाकी नहीं, कोई क्रूरता नहीं, कोई जीत नहीं। बस एक बहुत गहरी, बहुत थकी हुई उदासी। और उसकी आँखें, लाल और सूजी हुईं, जैसे वह बहुत देर से रो रही हो।

"आप नूर बानो के पास गए थे," उसने कहा।

यह सवाल नहीं था।

"हाँ।"

इरा ने सिर हिलाया, धीरे से। "मुझे पता था कि आप जाएँगे। कल रात, जब आपने मेरे bag से किताब निकाली। मैं जाग रही थी।"

विक्रांत रुका।

"मैंने आपको रोका नहीं," उसने कहा। "शायद इसलिए कि मैं चाहती थी कि आप जानें। मुझसे नहीं, किसी और से। ताकि मुझे ख़ुद कहना न पड़े।"

"मेरा नाम इरा क़ुरैशी है," उसने कहा। उसकी आवाज़ शांत थी, कोहरे में धीमी। "मेरे अब्बू का नाम है ज़फ़र क़ुरैशी। उनके अब्बू थे मीर अहमद अली। और उनके अब्बू थे मीर ज़ाकिर अली।" उसने बाजा-घर वाली photo की तरफ़ नहीं देखा, पर विक्रांत को पता था कि वह उसे देख रही है, अपनी आँखों के पीछे। "वो आदमी जिसने 1936 में यहाँ तजदीद की रस्म की थी। और उनके अब्बू मीर सादिक़ अली। जिन्होंने उसे बुलाया था।"

"ये किताब हमारे घर में चार पीढ़ियों से है," उसने कहा, अपनी उँगलियाँ उसकी चिकनी, घिसी हुई जिल्द पर फेरते हुए। "हर पीढ़ी में कोई एक इसे पढ़ता है। इसकी हिफ़ाज़त करता है। रौशनपुर पर नज़र रखता है, दूर से। ख़बरें रखता है। इंतज़ार करता है।"

"किस बात का?"

"इस बात का कि कोई अहद तोड़े।" इरा ने कहा। "कि कोई बावड़ी की नींद तोड़े। ताकि हम आकर उसे ख़त्म कर सकें। हमेशा के लिए। मेरे पर-पर-दादा ने उसे बुलाया था, विक्रांत। उनकी ग़लती से पीढ़ियों तक ये गाँव अपने बच्चों को उसके हवाले करता रहा। हर पीढ़ी में एक। और हमारा ख़ानदान ये जानता था। और कुछ नहीं कर पाता था। क्योंकि अहद क़ायम था।"

"और फिर कबीर ने सील तोड़ी।"

"सितंबर में।" इरा ने सिर हिलाया। "अब्बू को ख़बर मिली। एक सर्वेयर गायब। रौशनपुर। सहगल कोठी।" उसकी आवाज़ टूटी। "वो बीमार हैं। वो नहीं आ सकते थे। तो उन्होंने मुझे भेजा।"

"और मैं?"

इरा ने उसकी तरफ़ देखा। बहुत देर तक।

"मुझे बताया गया था कि सहगल परिवार का एक वारिस आएगा," उसने कहा। "वो जो 1999 में बचकर निकला था। अब्बू को पता था। हमारे ख़ानदान को हमेशा पता रहता है कि किसने कब जवाब दिया, कौन गया, कौन लौटा।" उसने अपने हाथ अपनी गोद में बाँधे। "मुझे बताया गया था कि वही वो है। जिसमें उसे बाँधा जा सकता है। और कोई नहीं।"

"इसीलिए तुमने मुझे सच नहीं बताया।" विक्रांत की आवाज़ सपाट थी। "पुकारने के बारे में। दूसरे दरवाज़े के बारे में।"

"किताब में लिखा है," इरा ने धीरे से कहा, "कि जिसमें उसे बाँधना है, उसे अपनी मर्ज़ी से आना होगा। किनारे तक। घेरे में।" उसने चॉक वाले छोटे घेरे की तरफ़ देखा। "अगर आपको पूरा सच पता होता, सारे नियम, सब कुछ, तो आप कभी नहीं आते। आप उस पहली रात ही भाग जाते। पुलिया के पार।"

"और रघु काका?" विक्रांत ने कहा। "अगर तुमने हमें बताया होता कि पुकारना भी दरवाज़ा है, वो आज ज़िंदा होते।"

इरा का चेहरा टूटा। उसके होंठ काँपे।

"मुझे पता है," उसने फुसफुसाया। "मुझे पता है। मैं हर पल उनके बारे में सोचती हूँ।" उसके आँसू बहने लगे। "मैंने सोचा था, मैं उन्हें बचा लूँगी। मैं हमेशा उनके पास रहती थी, उन्हें देखती थी। मैंने नहीं सोचा था कि वो ख़ुद जाएँगे। अपनी मर्ज़ी से।"

"और फिर भी, आज तुम यहाँ हो।" विक्रांत ने उन दीयों को देखा, उस घेरे को। "रस्म की तैयारी करते हुए।"

इरा ने अपना चेहरा पोंछा।

"एक इंसान," उसने कहा, "या पूरा गाँव? हर पीढ़ी में एक बच्चा, हमेशा के लिए? नूर बानो, जो पचपन साल से अपने मुँह पर हाथ दबाकर सोती है? सलीम, और उसकी माँ? रघु काका, जिन्होंने पचपन साल अपने भाई का नाम पहना?" उसकी आवाज़ में अब ग़ुस्सा था, पर वह ग़ुस्सा उस पर नहीं था। "मैं इसे ख़त्म कर सकती हूँ, विक्रांत। आज रात। हमेशा के लिए। कोई और बच्चा नहीं। कोई और नाम नहीं। बस..."

"बस मैं।"

इरा ने अपनी आँखें बंद कर लीं।

"मैंने आपको पसंद किया," उसने कहा। बहुत धीमे। "पहले दिन से। जब आप लाइब्रेरी में आए, थके हुए, डरे हुए, और फिर भी हर चीज़ नापते हुए। जब आपने अपना notebook निकाला, बाएँ हाथ से।" उसके होंठों पर एक बहुत टूटी, बहुत उदास मुस्कान आई। "मुझे पता था कि आप कौन हैं। मुझे पता था कि मुझे क्या करना है। और मैंने फिर भी आपको पसंद किया।"

उसने अपनी आँखें खोलीं।

"इसीलिए ये इतना मुश्किल था।"

विक्रांत को एहसास नहीं हुआ कि वह कब उस छोटे घेरे में खड़ा हो गया था।

उसे याद था कि वह गलियारे के दरवाज़े से आँगन में आया था, इरा की तरफ़। उसे याद था कि वह उससे बात करते हुए आगे बढ़ा था, धीरे-धीरे, ग़ुस्से में, दुख में। उसे याद नहीं था कि उसके पैर कहाँ रुके थे।

उसने नीचे देखा।

उसके जूते चॉक की लकीर के अंदर थे। उस गोले के बीच में, जिसके बीच से एक सीधी लकीर नीचे जाती थी।

इरा ने उसे देखा, और उसके चेहरे पर कुछ बदला। एक पल के लिए, बस एक पल, उसकी आँखों में एक अजीब, भयानक राहत आई।

"माफ़ कीजिए," उसने फुसफुसाया।

और उसने बावड़ी के मुँह की तरफ़ झुककर, नीचे, अंधेरे में, एक नाम पुकारा।

विक्रांत ने उसे सुना। उसका अपना नाम।

"विक्रांत!"

वह उसे नहीं बुला रही थी। उसका चेहरा उसकी तरफ़ नहीं था। वह नीचे की तरफ़ झुकी थी, बावड़ी की गहराई में, और उसकी आवाज़ उस अंधेरे में गिरी, और गूँजी, नीचे और नीचे।

और नीचे से, जवाब आया।

एक बच्चे की आवाज़। नौ साल का। साफ़, ऊँची, थोड़ी डरी हुई। जैसे कोई बच्चा, जिसे अंधेरे में किसी ने उसका नाम लेकर बुलाया हो।

"हाँ?"

विक्रांत के पूरे शरीर में एक ठंडक दौड़ी। उसके पैरों से, उस चॉक के घेरे से, ऊपर, उसकी टाँगों में, उसकी रीढ़ में, उसके सीने में। जैसे कोई उसे अंदर से भर रहा हो, बर्फ़ के पानी से।

वह हिल नहीं पा रहा था। उसके पैर ज़मीन में गड़े थे।

मैं उसे रोक नहीं पाया। मैं ठीक उसके पास था, और मैं उसे रोक नहीं पाया। जैसे मेरे पैर ज़मीन में गड़ गए हों।

इरा किताब से पढ़ने लगी। उर्दू में। अरबी के टुकड़ों के साथ। तेज़, एक लय में, वही लय जो उसने 1936 की disc पर सुनी थी। अहद पुराना है, अहद नया हो। दीयों की लौ लंबी होती गई, बावड़ी की तरफ़ खिंचती हुई, फिर धीरे-धीरे मुड़ती हुई।

विक्रांत की तरफ़।

उसने अपना मुँह खोला, कुछ कहने के लिए, चीखने के लिए, और कोई आवाज़ नहीं निकली। उसका गला ठंडा था, सुन्न। जैसे उसकी आवाज़ उससे धीरे-धीरे, बूँद-बूँद करके, किसी नली से खींची जा रही हो।

नीचे से, वह बच्चे की आवाज़ फिर आई। पास। ऊपर आती हुई।

"मैं आ रहा हूँ।"

खन्न्-खन्न्-खन्न्-खन्न्।

एक धात्विक, कर्कश, बेसुरी आवाज़। लोहे पर पत्थर नहीं। कुछ और। किसी पतीले पर किसी कड़छी की। किसी बाल्टी पर किसी हथौड़े की। तेज़, बेतरतीब, बिना किसी लय के।

कबीर।

वह गलियारे के दरवाज़े से निकला, उसके एक हाथ में रसोई का पीतल का बड़ा पतीला, दूसरे में लोहे की कड़छी, और वह उसे पूरी ताक़त से पीट रहा था, बिना रुके, बिना किसी ताल के, जैसे कोई पागल ढोलक बजा रहा हो। आवाज़ आँगन में भर गई, दीवारों से टकराई, कोहरे को चीर दिया।

एक ही आवाज़ को बार-बार मत बजाना। उसे बदलते रहना।

इरा की लय टूटी। दीयों की लौ फड़फड़ाई।

नीचे से आती बच्चे की आवाज़ बीच शब्द में कट गई।

कबीर विक्रांत तक पहुँचा। उसने पतीला फेंका, जो पत्थर पर गिरकर एक लंबी, कराहती टनटनाहट में लुढ़कता रहा, और उसने विक्रांत की बाँह पकड़ी, और खींचा।

विक्रांत के पैर नहीं हिले।

कबीर ने ज़मीन पर देखा। चॉक का घेरा। उसने अपना पैर उठाया, और अपने जूते से, ज़ोर से, उस लकीर को रगड़ा। एक बार। दो बार। चॉक धुँधली हुई, टूटी, घेरे में एक दरार पड़ी।

विक्रांत के पैर ज़मीन से उखड़े। जैसे किसी ने एक जड़ काट दी हो।

"नहीं!" इरा चिल्लाई। उसकी आवाज़ टूटी हुई थी, किसी जानवर जैसी। "कबीर, नहीं, तुम नहीं समझते, ये आख़िरी मौक़ा है, ये..."

कबीर ने उसकी तरफ़ नहीं देखा। उसने विक्रांत को अपने कंधे पर टिकाया, और गलियारे की तरफ़ भागा।

विक्रांत के पैर उसके साथ घिसटते गए, सुन्न, बर्फ़ जैसे। उसका गला अब भी ठंडा था। पर उसके पीछे, आँगन की आवाज़ें दूर होती जा रही थीं। इरा का रोना। दीयों की फड़फड़ाहट। पतीले की आख़िरी, मरती टनटनाहट।

गलियारा। अंधेरा, लंबा, सँकरा। कबीर उसे खींचता हुआ भागा, उसकी साँसें तेज़, फटी हुई, कोठरियों के बंद दरवाज़ों के पास से, सामने के हिस्से की तरफ़, फाटक की तरफ़, कोहरे की तरफ़, पुलिया की तरफ़।

नाले पर जो पत्थर की पुलिया है, वो आख़िरी जगह है जहाँ उसकी गूँज पहुँचती है।

विक्रांत ने उसे समझा। कबीर उसे बाहर ले जा रहा था। इस गाँव से। इस गूँज से। इस सब से।

उसने अपने पैरों को ज़ोर दिया, और उनमें धीरे-धीरे जान लौटने लगी। चुभन, सुई जैसी। उसने कबीर के कंधे से अपना वज़न थोड़ा हटाया, और ख़ुद दौड़ने लगा।

वे गलियारे के बीच में थे, सामने के बरामदे की रोशनी अभी कुछ ही कदम दूर, जब उसके पीछे से एक आवाज़ आई।

अंधेरे से। गलियारे के उस सिरे से, जहाँ से वे अभी आए थे। बावड़ी वाले दरवाज़े से।

एक आदमी की आवाज़। ऊँची, घबराई हुई, हाँफती हुई। जैसे कोई बहुत तेज़ दौड़कर आया हो, और पीछे छूट गया हो।

कबीर रुक गया।

विक्रांत भी।

वह आवाज़ उसे पता थी। वह उसे किसी भी और आवाज़ से बेहतर जानता था। उसने उसे बारह साल तक हर दिन अपने recordings में सुना था। अपनी test files में। अपनी गिनती में। उस aluminium disc पर, नब्बे साल पहले, एक चीख में।

उसकी अपनी आवाज़।

कबीर ने धीरे-धीरे अपना सिर मोड़ा। उसने विक्रांत को देखा, जो उसके बगल में खड़ा था, उसकी बाँह अब भी उसके कंधे पर, उसकी साँसें फूली हुईं, उसका गला अब भी सुन्न।

फिर उसने गलियारे के अंधेरे की तरफ़ देखा।

उसकी आँखें दोनों के बीच घूमीं। आगे, पीछे। आगे, पीछे।

और अंधेरे से, उस विक्रांत की आवाज़ ने, जो विक्रांत के बगल में नहीं था, बहुत घबराकर, बहुत बेताबी से, जैसे कोई अपने इकलौते भाई को किसी खाई के किनारे से वापस बुला रहा हो, पुकारा:

"कबीर, रुक जा! मैं यहाँ हूँ!"

[Part 23 समाप्त]

Writer
Piyashi Atma
Story
जवाब मत देना
Chapter
23 of 30
Category
Ghost Stories
Reading time
15 min
Words
2999
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

← पिछला भाग  ·  अगला भाग →

जवाब मत देना · सभी भाग →

और कहानियाँ · More stories