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Part 22: पुकार का सच

Piyashi Atma · Ghost Stories · 15 मिनट

"इसी दिन वो पूछेगी कि मैंने ये क्यों छिपाया।"

इरा ने किताब बंद नहीं की। वह उसे अपनी गोद में खोले बैठी रही, उस आख़िरी पन्ने पर, उस तारीख़ पर, और उसकी आँखें उन बैंगनी-भूरे अक्षरों पर टिकी रहीं, जैसे वह उनमें किसी चेहरे को ढूँढ रही हो।

फिर उसके होंठ हिले। बहुत धीमे। विक्रांत उसके सबसे पास था, और उसने भी मुश्किल से सुना।

“...क्यों छिपाया?”

वह किसी से बात नहीं कर रही थी। न कबीर से, न विक्रांत से। उसकी नज़र किताब पर थी, और उसकी आवाज़ में एक ऐसा दर्द था जो विक्रांत ने उसमें पहले कभी नहीं सुना था। किसी बच्चे का दर्द, जो किसी बड़े से पूछ रहा हो जिसने उसे धोखा दिया हो।

"आपने ये क्यों छिपाया?"

फिर उसे होश आया। उसने अपना सिर उठाया, विक्रांत को देखा, कबीर को, और उसका चेहरा, जो पल भर पहले खुला और टूटा हुआ था, धीरे-धीरे फिर से बंद हो गया। उसने किताब बंद की, उसे लाल कपड़े में लपेटा, और अपने bag में रख दिया।

"मुझे नहीं पता था," उसने कहा। "कि वो सच में हो जाएगा।"

कबीर ने उसे देखा। "क्या?"

"वो वाक्य।" इरा ने अपनी आँखें पोंछीं। "मैंने अभी वही पूछा। वही शब्द। जैसे उन्होंने लिखा था।"

"तू किससे पूछ रही थी?"

इरा ने जवाब नहीं दिया।

विक्रांत ने उसे देखा, और उस ढेर के बारे में सोचा जो अब इतना ऊँचा हो चुका था कि वह उसके ऊपर नहीं देख सकता था। Photo पर उँगलियाँ। मुहर पर उँगलियाँ। उसे सच नहीं पता होना चाहिए। ज़ंजीर की आवाज़ से पहले की वह केतली वाली पकड़। एक छूटा हुआ पन्ना। एक किताब जिसके किनारे पीढ़ियों के हाथों से चिकने हो गए थे।

और अब यह। इसी दिन वो पूछेगी। एक ऐसे आदमी से, जो नब्बे साल पहले मरा था, जिसने यह जानते हुए लिखा था कि उसकी किताब किसके हाथ में पहुँचेगी।

किसके हाथ में?

उसने यह सवाल नहीं पूछा। अभी नहीं।

रात को, जब इरा और कबीर सो गए, या सोने का नाटक कर रहे थे, विक्रांत अपने गद्दे पर बैठा रहा, laptop खोले।

उसके दिमाग़ में वह धुँधली चीज़ अब भी अटकी थी। ...भैया? कल रात से। हर बार जब वह उसे पकड़ने की कोशिश करता, वह फिसल जाती, जैसे किसी गहरे पानी में मछली।

दूसरा दरवाज़ा... जिसे तुम ख़ुद खोलते हो, बिना जाने...

उसने अपनी recordings खोलीं। कल रात की। बावड़ी के किनारे की, जो उसकी jacket की जेब में चलते मोबाइल ने पकड़ी थी।

रघु काका की गिनती। एक। दो। तीन। एक सौ आठ तक। फिर खामोशी।

फिर वह किशोर आवाज़। "माधो? माधो, तू यहाँ है?"

खामोशी। लंबी। रघु काका ने जवाब नहीं दिया था। विक्रांत ने waveform को देखा। उस पूरे हिस्से में, उनकी तरफ़ से एक भी आवाज़ नहीं थी।

फिर: “...भैया?”

रघु काका की आवाज़। धीमी। काँपती। एक सवाल।

फिर: "हाँ, माधो। मैं यहाँ हूँ।"

और रस्सी ढीली हो गई।

विक्रांत ने उस हिस्से को loop किया। ...भैया? / हाँ, माधो। मैं यहाँ हूँ। बार-बार।

उन्होंने जवाब नहीं दिया था। यह सच था। जब उस आवाज़ ने "माधो" कहा, उन्होंने जवाब नहीं दिया। उनका गला उस नाम पर नहीं हिलता था।

पर उन्होंने कुछ कहा था।

उन्होंने पुकारा था।

भैया?

एक बूढ़ा आदमी, एक अंधेरी बावड़ी की तली पर, अपने भाई को ढूँढ रहा था। जैसे कोई भी ढूँढता। और उसने पुकारा। और जवाब आया, उसी की आवाज़ में, जिसे वह ढूँढ रहा था। हाँ, मैं यहाँ हूँ।

और फिर वह चला गया।

विक्रांत ने laptop को अपनी गोद से नीचे रखा, और उसके हाथ ठंडे पड़ गए।

उसने उस बात को अपने दिमाग़ में घुमाया, उसके हर कोने को देखते हुए, और हर कोने पर वह ठीक बैठ रही थी।

जवाब देना एक दरवाज़ा है। पर अकेला दरवाज़ा नहीं।

दूसरा दरवाज़ा। जिसे तुम ख़ुद खोलते हो। बिना जाने।

पुकारना।

उसने अपनी पूरी case file दोबारा खोली। हर recording, पहले दिन से।

वह इसे जानता था, अब। उसने इसे Part 5 वाली रात देखा था, जब उसने इरा को पुकारा था और उसकी आवाज़ में जवाब आया था। पर तब उसे लगा था कि वह एक अजीब घटना थी। एक अपवाद। कि सदाई ने बस उसके साथ खेला था, उसकी आवाज़ में, जैसे वह सबके साथ खेलता था।

उसने तब यह नहीं समझा था कि वह कोई खेल नहीं था। वह एक दरवाज़ा था। और उसने उसे ख़ुद खोला था।

उसने रघु काका की कहानी याद की। उस रात, 1971 में। भैया को याद आया कि शायद मैं पीछे आया हूँ। और उन्होंने मुझे पुकारा। 'माधो! माधो, तू यहाँ है?' और जवाब आया। मेरी आवाज़ में। और भैया उसकी तरफ़ भागे।

रघुनाथ ने जवाब नहीं दिया था। उसने पुकारा था।

उसने सलीम का आख़िरी message फिर से सुना। "नीचे कोई बच्चा है। रो रहा है।" और उसके बाद, जो उसने पहले नहीं सुना था क्योंकि वह सिर्फ़ बच्चे की आवाज़ पर ध्यान दे रहा था, सलीम की अपनी आवाज़, बहुत धीमी, बहुत नरम, किसी ऐसे इंसान की तरह जो किसी डरे हुए बच्चे को पास बुलाता है:

“...बच्चे? ओ बच्चे, कहाँ है तू? आवाज़ दे।”

उसने पुकारा था। और बच्चे ने आवाज़ दी थी।

विक्रांत ने अपनी आँखें बंद कर लीं।

हर बार। हर बार जो गया, उसने पहले किसी को पुकारा था। किसी अपने को, जो खो गया था। और सदाई ने उस खोए हुए की आवाज़ में जवाब दिया था। और पुकारने वाला उस आवाज़ के पीछे गया, क्योंकि कौन नहीं जाता? जब तुम अपने भाई को अंधेरे में ढूँढ रहे हो, और वह कहता है मैं यहाँ हूँ?

और तब, जब पुकारने वाला पास पहुँचता, नीचे, सीढ़ियों पर, अंधेरे में, तब सदाई उसका नाम लेता। और वह, जिसने अभी-अभी उस आवाज़ को पाया था, जिसे वह ढूँढ रहा था, बिना एक पल सोचे जवाब देता।

या नहीं भी देता। रघु काका ने नहीं दिया था।

और फिर भी वह गए।

क्योंकि शायद जवाब देना ज़रूरी ही नहीं था। शायद पुकारना काफ़ी था। शायद जब तुम किसी को पुकारते हो, अंधेरे में, उसके इलाक़े में, और वह जवाब देता है, तो तुम उसे अपना नाम दे चुके होते हो, बिना जाने। तुम्हारी आवाज़ उसके पास जा चुकी होती है। और तुम उसके पीछे चल चुके होते हो।

मैं यहाँ हूँ। और तुम जाते हो। हमेशा।

उसने कबीर को जगाया। धीरे से, उसके कंधे को छूकर। नियम दो। फिर इरा को।

उसने उन्हें बताया।

कबीर बहुत देर तक कुछ नहीं बोला। वह अपने गद्दे पर बैठा रहा, रज़ाई अपने कंधों पर लपेटे, और उसकी नज़र अपनी पट्टी वाली हथेली पर थी।

"सितंबर में," उसने आख़िरकार कहा। बहुत धीमे। "उस रात। सलीम के जाने के बाद। मैं बावड़ी के ऊपर खड़ा था, नीचे झाँकता हुआ। उसकी machine सीढ़ी पर पड़ी थी।" उसकी आवाज़ टूटी। "और मैंने उसे पुकारा। 'सलीम! सलीम, कहाँ है तू?' बार-बार। चिल्लाकर। दस, पंद्रह बार।"

"और जवाब आया?"

कबीर ने सिर हिलाया। "उसकी आवाज़ में। 'साहब, नीचे आइए। यहाँ बहुत कुछ है।'" उसने अपनी आँखें बंद कीं। "मैं डर गया। मैं भागा। मैं नीचे नहीं गया। मुझे लगा था कि मैं बच गया।"

वह रुका।

"फिर उस रात, जब मैं अपने कमरे में था, अकेला, नींद नहीं आ रही थी, मुझे मम्मी की याद आई। बहुत ज़ोर से। जैसे बीमारी के आख़िरी दिनों में आती थी। और मैं..." उसकी आवाज़ बिल्कुल धीमी हो गई। “...मैं अंधेरे में फुसफुसाया। 'मम्मी?' जैसे बचपन में करता था, जब डर लगता था।”

विक्रांत ने उसे देखा।

"और उसने जवाब दिया," कबीर ने कहा। “'बेटा, एक गिलास पानी दे दे।'”

उसने अपनी हथेली अपनी छाती पर दबाई।

"तीन महीने। तीन महीने से वो हर रात आती है। और मुझे लगता था कि वो मुझे ढूँढ रही है।" उसने अपना चेहरा अपने हाथों में छिपा लिया। "पर मैंने उसे बुलाया था। पहली रात। मैंने ख़ुद दरवाज़ा खोला था।"

इरा ने कुछ नहीं कहा।

वह अपने गद्दे पर बैठी थी, घुटने छाती से लगाए, और उसकी आँखें दीवार पर टँगी नियमों की सूची पर थीं। अंधेरे में किसी को नाम लेकर मत बुलाना। नियम तीन। विक्रांत ने उसे लिखा था, एहतियात के तौर पर। एक छोटा नियम। पहले नियम के नीचे, जिसमें दो लकीरें थीं।

उन्होंने सोचा था कि बुलाना ख़तरनाक है क्योंकि उससे जवाब आता है, और जवाब तुम्हें फुसलाता है। एक चारा। पर असली दरवाज़ा जवाब देना था।

वे ग़लत थे। पूरी तरह। दो लकीरें ग़लत नियम के नीचे थीं।

विक्रांत ने इरा को देखा। उसके चेहरे पर कोई हैरानी नहीं थी। कबीर की तरह कोई टूटन नहीं, कोई अविश्वास नहीं। बस एक थकी हुई, भारी स्वीकृति।

जैसे यह बात उसे पहले से पता थी।

और उसके दिमाग़ में, बहुत धीरे, एक-एक करके, चीज़ें अपनी जगह बैठने लगीं।

तीसरी रात। जब इरा ने उसे लाइब्रेरी में रजिस्टर दिखाने के लिए बुलाया था। उसने खटखटाया था। उसने आवाज़ नहीं दी थी। और सीढ़ियाँ उतरते हुए विक्रांत को अजीब लगा था कि उसने एक बार भी उसे नाम लेकर नहीं बुलाया। न उस रात, न हाट में, न गुमटी पर, न रास्ते में। बस उसका हाथ छुआ था, या उसके सामने आकर खड़ी हो गई थी।

पहले दिन से।

चार दिन पहले से, जब वह इस कोठी में आई थी, विक्रांत से भी पहले।

वह कभी किसी को नहीं पुकारती थी। विक्रांत को नहीं, कबीर को नहीं, रघु काका को नहीं। दिन में भी नहीं। दीवारों के पार नहीं। गलियारे के अंत से नहीं। अगर उसे किसी की ज़रूरत होती, वह चलकर जाती। खटखटाती। छूती।

और उस रात, Part 5 वाली रात, जब विक्रांत ने उसे पुकारा था और उसकी आवाज़ में जवाब आया था, और वह छत से उतरी थी, और विक्रांत ने उसे बताया था, तो उसका चेहरा कैसे बदला था। उसके गालों का रंग उतरा था, धीरे-धीरे, जैसे कोई तस्वीर पानी में धुल रही हो। और उसने पहला सवाल यही पूछा था।

"आपने मुझे पुकारा था? नाम लेकर? अंधेरे में?"

उसे जवाब के बारे में चिंता नहीं थी। उसे पुकारने के बारे में चिंता थी।

वह जानती थी।

पूरे वक़्त। पहले दिन से। उसे पता था कि असली नियम क्या है। उसके पास वह किताब थी, जिसके किनारे पीढ़ियों के हाथों से चिकने हो गए थे। और उसने उन्हें दीवार पर एक ग़लत सूची टाँगते देखा था, एक ग़लत नियम के नीचे दो लकीरें खींचते देखा था, और कुछ नहीं कहा था।

और रघु काका गए।

विक्रांत ने उसकी तरफ़ देखा। इरा ने उसकी नज़र महसूस की, और अपनी आँखें उठाईं। और एक पल के लिए, बस एक पल, उनकी नज़रें मिलीं, और उसने उसकी आँखों में देखा कि वह जानती है कि उसने समझ लिया है।

उसने कुछ नहीं कहा। उसने अपनी आँखें नीचे कर लीं।

विक्रांत ने भी कुछ नहीं कहा। उसका मुँह खुला, सवाल पूछने के लिए, और कुछ नहीं निकला। सवाल उसके गले में इतना बड़ा था कि बाहर नहीं आ पा रहा था।

वह उस रात सोया नहीं।

दो बजे के आसपास, जब उसने इरा और कबीर की साँसें धीमी और गहरी होते सुनीं, वह उठा, और इरा के bag के पास गया।

वह उसके गद्दे के सिरहाने रखा था, उसके तकिए के बगल में। विक्रांत ने बहुत धीरे से उसकी ज़िप खोली। उसके अंदर लाल कपड़े में लिपटी किताब थी।

उसने उसे निकाला। उसने उसे खोला, उस जगह पर जहाँ इरा ने एक पन्ना छोड़ दिया था। लोहे वाले हिस्से के बाद, जवाब वाले हिस्से से पहले।

वह उसे पढ़ नहीं सकता था। उर्दू की घुमावदार लिखावट, उसके लिए बस लकीरें। पर उसने देखा कि वह पन्ना बाकियों से अलग था। उस पर एक चित्र था। स्याही से बना, बारीक। एक आकृति। एक इंसान की, खड़ा हुआ। और उसकी छाती पर, उसके दिल की जगह, वही निशान। एक गोला, और उसके बीच से नीचे जाती एक सीधी लकीर।

और उसके नीचे, उर्दू में, कुछ लिखा था। एक लंबा हिस्सा। और कुछ शब्द, जिनके नीचे किसी ने, बहुत बाद में, किसी नई स्याही से, एक लकीर खींची थी। जैसे किसी ने उन्हें बहुत बार पढ़ा हो। जैसे वे किसी के लिए बहुत ज़रूरी हों।

विक्रांत ने अपना फ़ोन निकाला और उस पन्ने की photo ली। फिर अगले की, बस एहतियात के तौर पर। फिर उसने किताब को वापस लाल कपड़े में लपेटा, bag में रखा, और ज़िप बंद की।

इरा सोती रही। उसकी साँसें बराबर थीं। हल्की, उथली, सोलह-सत्रह प्रति मिनट।

विक्रांत अपने गद्दे पर लौटा और फ़ोन को अपनी छाती पर रखकर लेट गया।

वह फिर से अपनी recordings पर गया।

इस बार किसी घटना के लिए नहीं। किसी एक रात के लिए नहीं। उसने सारी files खोलीं, पहले दिन से, और उनमें एक शब्द ढूँढने लगा। अपनी आवाज़ में।

इरा।

यह आसान था। उसके software में एक feature था, एक तरह का voice search, जो किसी ख़ास शब्द को हर recording में ढूँढ सकता था, अगर तुम उसे एक sample दे दो। उसने उसे अपनी आवाज़ में "इरा" का एक sample दिया। Part 5 वाली रात का। गलियारे वाला।

और उसे चलने दिया।

Results धीरे-धीरे आने लगे।

पहला: Part 5 की रात। गलियारा। "इरा?" और जवाब: "हाँ, यहीं हूँ। लाइब्रेरी में।" बिना साँस।

यह उसे पता था।

दूसरा: Day 7। सुबह। रसोई से। विक्रांत की आवाज़, ऊँची, लापरवाह। "इरा, चाय पियोगी?" और जवाब, लाइब्रेरी की दिशा से, दो कमरे दूर: "हाँ, आती हूँ।"

विक्रांत ने उसे सुना। फिर उसे zoom किया।

साँस नहीं थी।

और फिर, कुछ मिनट बाद, recording में, इरा का असली आना। उसके कदम, सीढ़ियों से। ऊपर से नहीं, लाइब्रेरी से नहीं। छत की सीढ़ियों से। और उसकी असली आवाज़, साँस के साथ: “Good morning। चाय की खुशबू आ रही थी, तो नीचे आ गई।”

उसने विक्रांत की पुकार नहीं सुनी थी। वह छत पर थी। और विक्रांत ने उस वक़्त कुछ नहीं सोचा था, क्योंकि वह आई थी, चाय के लिए, बिल्कुल उसी वक़्त जब उसे आना चाहिए था।

तीसरा: Day 9। शाम। आँगन में कोहरा। "इरा? तुम बाहर हो?" जवाब: "हाँ, यहीं हूँ।" बिना साँस। बावड़ी की दिशा से।

वह उस शाम पीछे के आँगन की तरफ़ गया था, उस आवाज़ की तरफ़। उसे याद नहीं था। उसने recording में अपने कदम सुने। बावड़ी की तरफ़ जाते हुए। फिर रुकते हुए। फिर किसी ने उसका हाथ पकड़ा था, पीछे से, और इरा की असली आवाज़, साँस के साथ, घबराई हुई: "वहाँ क्या कर रहे हैं? अंदर चलिए। ठंड है।"

उसे यह याद नहीं था। बिल्कुल नहीं।

चौथा। पाँचवाँ। छठा।

Results आते रहे। एक के बाद एक। कोहरे में, गलियारों में, सीढ़ियों पर, छत पर। हर बार जब उसने, बिना सोचे, एक आम इंसान की तरह, किसी दूसरे कमरे से, अंधेरे में, कोहरे में, इरा का नाम लेकर उसे बुलाया था।

उसने गिना नहीं। उसने ख़ुद को रोका। पर screen पर नंबर था, results के ऊपर, एक छोटे से कोने में, उसकी इच्छा के बिना।

उसने उसे देखा।

और उसका पूरा शरीर ठंडा पड़ गया।

हर बार जवाब आया था। हर बार। बिना किसी अपवाद के। "हाँ?" "यहीं हूँ।" "आती हूँ।" "बोलो।" उसकी आवाज़ में, उसके लहजे में, उसकी नानी से आए उस "यहीं" के खिंचाव के साथ।

कुछ में साँस थी। असली इरा। जो सच में पास थी, जिसने सच में सुना था।

और कुछ में नहीं थी।

उसने उन्हें अलग किया। साँस वाले, और बिना साँस वाले। और जो list उसके सामने बची, बिना साँस वाली, वह उस list से लंबी थी जिसकी उसने उम्मीद की थी।

बहुत लंबी।

उसने उनमें से हर एक को सुना। हर बार उसने इरा को पुकारा था, और कुछ उसे जवाब देने आया था। उसकी आवाज़ पहनकर। उसकी तरफ़ से। और हर बार, विक्रांत ने उस जवाब पर भरोसा किया था, और उसकी तरफ़ चला था, या बात जारी रखी थी, या मुस्कुराया था। हर बार उसने एक दरवाज़ा खोला था, और उसमें से कुछ अंदर आया था, और उसे पता भी नहीं चला था।

कितनी बार वह आधी रात को, किसी गलियारे में, किसी से बात करता रहा था, यह सोचकर कि वह इरा है?

कितनी बार इरा ने उसका हाथ पकड़कर उसे किसी किनारे से वापस खींचा था, और उसे याद भी नहीं रहा?

उसने आख़िरी result खोला। सबसे नया। Day 18 की। कोठरी वाला दिन। जिस दिन उसने लोहे की छड़ें टकराई थीं, और फिर फ़र्श पर बैठकर टूट गया था, और इरा आई थी, और उसका हाथ पकड़ा था।

उसे याद नहीं था कि उसने उस दिन इरा को पुकारा था।

पर recording में उसकी आवाज़ थी। बहुत धीमी, टूटी हुई, कोठरी के कच्चे फ़र्श पर बैठे-बैठे, किसी बच्चे की तरह। अपनी कील वाली मुट्ठी अपनी छाती पर दबाए।

“...इरा?”

और जवाब। बहुत पास से। बहुत नरम।

"हाँ। यहीं हूँ।"

उसने उसे zoom किया।

साँस नहीं थी।

और फिर, ठीक चार मिनट बाद, recording में, कोठरी का दरवाज़ा खुला, और इरा के असली कदम अंदर आए। उसकी असली साँसें। वह आकर उसके बगल में बैठी, और उसका हाथ पकड़ा।

चार मिनट।

चार मिनट तक, उस कोठरी में, उन कीलों के बीच, जब वह फ़र्श पर बैठा अपना दुख बहा रहा था, कोई उसके पास था। उसकी बात सुनता हुआ। "मैंने उसे सिखा दिया।" "मेरे पास कुछ नहीं बचा।" कोई उसके बगल में बैठा था, इरा बनकर, उसकी हर बात का जवाब देता हुआ, उसकी आवाज़ में, बहुत प्यार से, बहुत धैर्य से।

उसे याद था कि उसने उस दिन इरा से बहुत कुछ कहा था। अपने डर। अपनी हार। अपनी physics के टूटने के बारे में।

उसे याद नहीं था कि उसमें से कितना उसने असली इरा से कहा था।

विक्रांत ने laptop बंद कर दिया।

कमरे में दो साँसें थीं। कबीर की, गहरी। इरा की, हल्की। और उसकी अपनी, तेज़, उथली, काँपती।

और कोई चौथी नहीं। उसने बहुत ध्यान से सुना। कोई चौथी नहीं।

अभी नहीं।

उसने छत की तरफ़ देखा, और उन रातों को गिनना शुरू किया जो उसने इस कोठी में बिताई थीं। बाईस। और उन बार को, जब उसने कोहरे में, अंधेरे में, किसी दूसरे कमरे से, बिना एक पल सोचे, उस एक नाम को पुकारा था।

उसने उन्हें गिना। उसने ख़ुद को रोका नहीं। अब रोकने का कोई मतलब नहीं था।

और उसे याद आया, एक ठंडी, साफ़ स्पष्टता के साथ, जैसे किसी ने उसके सिर में बर्फ़ का पानी डाल दिया हो, कि उन सबमें, पहली रात से आज तक, एक भी बार ऐसा नहीं हुआ था जब उसने उसे पुकारा हो, और उसे कोई जवाब न मिला हो।

हर बार। हर एक बार।

कोई न कोई हमेशा बोला था।

[Part 22 समाप्त]

Writer
Piyashi Atma
Story
जवाब मत देना
Chapter
22 of 30
Category
Ghost Stories
Reading time
15 min
Words
2993
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

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