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Part 21: दूसरी किताब

Piyashi Atma · Ghost Stories · 14 मिनट

"माधो... ऊपर आ जा।"

कदम ऊपर आ रहे थे।

विक्रांत ने उन्हें सुना, एक-एक करके, पत्थर पर नंगे पैरों की धीमी, धैर्य भरी आहट। हर कदम के बाद एक ठहराव, जैसे चढ़ने वाला साँस ले रहा हो, या सुन रहा हो। और हर कदम के साथ, वह किशोर आवाज़ थोड़ी पास, थोड़ी साफ़। उसमें अब वह टूटती, गँवई खुरदरापन और ज़्यादा था, और उसके नीचे कुछ और भी। एक हल्की खनक। जैसे बोलने वाले के गले में पानी हो।

"माधो। देख, मैं आ गया। ऊपर आ जा, सब घर चलते हैं।"

विक्रांत ने गीला फंदा छोड़ दिया।

उसने जाली को पकड़ा, अपनी पूरी ताक़त से उसे ऊपर उठाकर उसकी जगह पर गिराया। धातु की धमक आँगन में गूँजी। फिर पत्थर की पटिया। उसने सब्बल उसके नीचे फँसाया और धकेला, और उसकी बाँहों की हर नस में आग लग गई, क्योंकि यह काम तीन आदमी मिलकर करते थे, और वह अकेला था।

पटिया खिसकी। एक इंच। दो।

कदम पास आ रहे थे।

"विक्रांत!"

इरा। और कबीर। दरवाज़े से भागते हुए। उन्होंने सब्बल पकड़ा, और तीनों ने धकेला, और पटिया एक भारी, घिसटती कराह के साथ अपनी जगह पर आ बैठी।

विक्रांत ने spanner उठाया और बोल्ट कसने लगा। पहला। दूसरा। उसके हाथ इतने काँप रहे थे कि spanner दो बार फिसला।

पटिया के नीचे से, जाली के बिल्कुल नीचे से, वह आवाज़ आई।

अब किशोर लड़के की नहीं।

एक बूढ़े आदमी की। थकी, घरघराती, बुढ़ापे की। जिसे विक्रांत पिछले तीन हफ़्तों से हर सुबह सुनता आया था। चाय बना देता हूँ।

"बाबू?"

विक्रांत का हाथ बोल्ट पर जम गया।

"बाबू, खोलो। मैं हूँ। रघु। ऊपर आ गया हूँ। ठंड बहुत है।"

कबीर ने एक आवाज़ निकाली, घुटी हुई। इरा ने अपने दोनों हाथ अपने मुँह पर दबा लिए।

"बाबू... भैया मिल गए। मैंने उन्हें ढूँढ लिया। अब खोल दो। हम दोनों बाहर आना चाहते हैं।"

विक्रांत ने अपनी आँखें बंद कर लीं।

और सुबह तक दरवाज़ा मत खोलना। किसी के लिए भी नहीं। मेरे लिए भी नहीं।

उसने तीसरा बोल्ट कसा। फिर चौथा। उसकी हथेलियाँ spanner की रगड़ से छिल गई थीं, और उसने महसूस किया कि उसके गाल गीले थे, और यह कोहरे की नमी नहीं थी।

"बाबू?"

उसने जवाब नहीं दिया।

"बाबू, तू सुन रहा है न?"

उसने अपनी जेब से रघु काका की वे कीलें निकालीं, जो बूढ़े ने उस शाम एक कतार में रखी थीं, और जिन्हें विक्रांत ने, बिना यह जाने क्यों, अँगीठी के पास से उठा लिया था। उसने उन्हें जाली की दरारों में ठोकना शुरू किया, हथौड़े के बिना, spanner की पीठ से।

ठक। ठक। ठक।

वह जानता था कि लोहा बेकार है। वह जानता था कि ये कीलें कुछ नहीं रोकेंगी। पर ये रघु काका की कीलें थीं, और यह आख़िरी काम था जो वह उनके लिए कर सकता था।

नीचे की आवाज़ धीरे-धीरे ख़ामोश हुई।

सुबह तक कोई कुछ नहीं बोला।

सुबह, कोहरा अजीब तरह से पतला था। आँगन में सलेटी रोशनी थी, और बावड़ी की पत्थर की पटिया उसमें बिल्कुल सामान्य लग रही थी। एक पुराना, भारी पत्थर। बस।

पर उस पर निशान थे।

पटिया के नीचे की तरफ़, जाली के लोहे पर, जहाँ से पटिया उसे ढकती थी, विक्रांत ने उन्हें तब देखा जब उसने झुककर दरारों में से झाँका। हथेलियों के निशान। गीले, बड़े, किसी वयस्क के। नीचे से ऊपर दबाए हुए, जैसे किसी ने पूरी रात जाली को अपने हाथों से ऊपर धकेलने की कोशिश की हो।

और उनके बीच, छोटे निशान। किसी बच्चे जितने नहीं। किसी किशोर जितने।

विक्रांत ने उन्हें देखा, और कुछ नहीं कहा।

वे रघु काका के क्वार्टर में गए। तीनों। बिना किसी के कहे।

दरवाज़ा खुला था। अंदर, सब वैसा ही था। चारपाई, पतली रज़ाई, मिट्टी का चूल्हा, दीवारों पर टाट। लकड़ी का संदूक, उस पर दरार वाली लालटेन, लाल धागे के साथ।

और चारपाई पर, रघु काका की लोई।

तह की हुई। सलीक़े से, चौकोर, जैसे बूढ़ा उसे हर सुबह तह करता होगा। उसके ऊपर उनकी ऊनी टोपी।

विक्रांत ने लोई को छुआ। वह गीली थी। पूरी तरह। और ठंडी। और उससे वही गंध आ रही थी। गीला पत्थर। काई। बहुत गहरे, बहुत पुराने पानी की।

रघु काका ने कल रात वह लोई नहीं पहनी थी। वह उसे अँगीठी वाले कमरे में छोड़कर गए थे। विक्रांत को याद था, उसका किनारा उस गद्दे पर पड़ा था, जहाँ से बूढ़े उठे थे।

किसी ने उसे यहाँ लाकर रखा था। गीला करके। तह करके।

कबीर दरवाज़े पर खड़ा था, और उसकी आँखें लोई पर थीं। उसका चेहरा भीगा था। वह बिना आवाज़ के रो रहा था, जैसे पूरा गाँव रोना सीख चुका था।

"वो मर गए?" उसने फुसफुसाया। "या..."

किसी ने जवाब नहीं दिया। किसी के पास जवाब नहीं था।

दोपहर को रामदुलारी आई। अपनी लाठी टेकती हुई, फाटक पर, अपनी ऊँची, बहरी आवाज़ में विक्रांत को पुकारती हुई।

उसने विक्रांत का नाम नहीं लिया। उसने "ओमप्रकाश के लड़के" कहकर बुलाया, और विक्रांत ने महसूस किया कि वह इस बात पर राहत महसूस कर रहा था।

"आज सुबह," रामदुलारी ने कहा, आँगन में पीढ़े पर बैठते हुए, "मैं मंदिर गई थी। अँधेरा था अभी। दिया जलाने।" उसने अपनी लाठी अपने घुटनों पर टिकाई। "और वहाँ एक लड़का खड़ा था।"

विक्रांत ने इरा की तरफ़ देखा।

"चौदह-पंद्रह साल का। नंगे पैर। सिर से पैर तक भीगा हुआ। इस ठंड में।" रामदुलारी ने अपना सिर हिलाया। "मंदिर के सामने खड़ा, ऊपर देख रहा था। जहाँ घंटी होती थी। वो ख़ाली हुक।"

"आपने..." विक्रांत की आवाज़ फटी। "आपने उसका चेहरा देखा?"

"मेरी एक आँख है, बेटा।" बूढ़ी ने अपनी धुँधली आँख की तरफ़ इशारा किया। "और अँधेरा था। पर मैंने पूछा। ज़ोर से। 'किसका है रे? किसका लड़का है?'"

"और?"

"उसने मुड़कर मुझे देखा। और कुछ कहा।" रामदुलारी ने अपना माथा सिकोड़ा। "मुझे ठीक से सुनाई नहीं दिया। तुझे पता है मेरे कान। पर लगा जैसे उसने कहा..." वह रुकी। “...’रघु।'”

किसी ने साँस नहीं ली।

"फिर वो चला गया। कोहरे में। खेतों की तरफ़।" रामदुलारी ने कंधे उचकाए। "मैंने सोचा, किसी का नाती होगा, मेहमान आया होगा। पर फिर याद आया, तेरे यहाँ जो बूढ़ा था, भोला का बेटा, उसे भी तो रघु कहते हैं। तो सोचा, बता दूँ।"

उसने अपनी एक अच्छी आँख से विक्रांत का चेहरा देखा।

"क्या हुआ, बेटा? तेरा रंग क्यों उड़ गया?"

शाम को, अँगीठी वाले कमरे में, तीन गद्दे बिछे थे। चौथा, रघु काका वाला, कोने में लिपटा हुआ रखा था।

किसी ने नियमों की सूची की तरफ़ नहीं देखा। वह अब भी दीवार पर थी, रघु काका की कील से टँगी हुई। जवाब मत देना। दो लकीरें। पर अब वह किसी पुराने अख़बार की तरह लगती थी, जिसकी ख़बरें बासी हो चुकी हों।

"मेरे पास एक किताब है," इरा ने कहा।

विक्रांत और कबीर ने उसकी तरफ़ देखा।

वह अपने गद्दे पर बैठी थी, घुटने मोड़े, उसका चेहरा lamp की रोशनी में थका और सफ़ेद। उसने अपना bag अपनी गोद में रखा था, और उसकी उँगलियाँ उसकी ज़िप पर थीं।

"मीर सादिक़ अली की," उसने कहा। "दूसरी किताब। जिसके बारे में रिसाले में लिखा था। जो इसके आगे है, वो दूसरी किताब में है, जो मेरे बेटे के पास रहेगी।"

कमरे में खामोशी छा गई।

"तेरे पास?" कबीर ने कहा। उसकी आवाज़ में ग़ुस्सा था, धीमा, ठंडा। "तेरे पास पूरे वक़्त थी? और तूने..."

“Lucknow में।” इरा ने कहा, जल्दी से। "एक पुराने किताब वाले से ख़रीदी थी। सालों पहले। Research के लिए। मुझे नहीं पता था कि ये क्या है, मुझे बस लगा कि ये कोई पुरानी, दिलचस्प पांडुलिपि है। फिर जब मुझे इस कोठी का काम मिला, और मैंने रिसाला देखा, उसकी मुहर, उसका निशान..." वह रुकी। “...तब मुझे समझ आया।”

"और तूने हमें नहीं बताया।"

"मुझे यक़ीन नहीं था।" इरा ने कबीर की आँखों में देखा। "मुझे लगा, शायद मैं ग़लत हूँ। शायद ये सिर्फ़ एक जैसी मुहर है।"

विक्रांत ने उसकी आवाज़ सुनी। सवाल के बाद, जवाब से पहले।

वह ठहराव वहाँ था।

उसने कुछ नहीं कहा। उसने बस देखा, जब इरा ने अपने bag की ज़िप खोली, और उसके अंदर से, एक पुराने, लाल कपड़े में लिपटी, एक किताब निकाली।

रिसाले जैसी। पतली, हाथ से सिली, चमड़े की जिल्द। उसी गोले और लकीर वाले निशान के साथ। पर इसका चमड़ा गहरे रंग का था, और उसके किनारों पर किसी ने बार-बार उँगलियाँ फेरी थीं, इतनी बार कि वे चिकने और चमकदार हो गए थे।

किसी पुराने किताब वाले की दुकान से ख़रीदी किताब इस तरह नहीं घिसती। यह किसी ऐसी किताब का घिसाव था जिसे किसी ने बरसों तक, शायद पीढ़ियों तक, बार-बार पढ़ा हो। अपनी गोद में रखकर। रात को।

विक्रांत ने इसे भी उस ढेर में रखा।

"पढ़ो," उसने कहा। "पर नाम नहीं।"

इरा ने किताब खोली।

“'जो मैंने रिसाले में लिखा, वो गाँव के लिए था,'” इरा ने पढ़ा। “'ताकि वो डरें, पर इतना नहीं कि भाग जाएँ। ताकि उनके पास कुछ नियम हों, कुछ ऐसा जिसे वो पकड़ सकें। पर नियम पूरा सच नहीं होते। ये किताब पूरे सच के लिए है। उनके लिए, जो इसका बोझ उठा सकें।'”

उसने पन्ना पलटा।

“'पहली बात। गाँव वाले मानते हैं कि सदाई बावड़ी में बंद है। मैंने ही उन्हें यह बताया। यह झूठ है।'”

कबीर आगे झुका।

“'वो बावड़ी में बंद नहीं। वो कहीं बंद नहीं। उसका कोई शरीर नहीं, कोई जगह नहीं। वो हर उस जगह रहता है जहाँ आवाज़ टकराकर लौटती है। हर दीवार में, हर गलियारे में, हर कुएँ में, हर उस खाली कमरे में जहाँ तुम्हारी आवाज़ तुम्हें वापस मिलती है। रौशनपुर की हर गूँज उसका घर है।'”

विक्रांत ने अपनी आँखें बंद कीं। रज़ाइयाँ। टाट। दीवारों पर टँगे कंबल। नूर बानो का वह कपड़े में लिपटा, बिना गूँज वाला कमरा।

पूरा गाँव। पचपन साल से। अपनी दीवारों को ढक रहा था। ताकि उसके घर कम हों।

“'बावड़ी उसकी जेल नहीं,'” इरा ने पढ़ा। “'बावड़ी उसका ख़ज़ाना है। उसकी तिजोरी। सातवें तल पर, उस कोठरी में, जिसका दरवाज़ा अंदर से बंद होता है, वो वह सब रखता है जो उसने लिया है। हर नाम। हर आवाज़। हर वो इंसान जिसने उसे जवाब दिया। वो वहाँ हैं। मरे नहीं। ज़िंदा भी नहीं। बस रखे हुए। जैसे कोई कंजूस अपने सिक्के गिनता है।'”

"वो ज़िंदा हैं?" कबीर ने फुसफुसाया। "सलीम?"

“'मरे नहीं, ज़िंदा भी नहीं,'” इरा ने दोहराया।

विक्रांत को अपने फ़ोन पर आई वह आवाज़ याद आई। मैं अभी भी नीचे हूँ। और उसमें की साँस। छोटी, गीली, काँपती।

“'और उसके इलाक़े की एक हद है,'” इरा ने आगे पढ़ा। “'अहद ने उसे एक दायरे में बाँधा है। बावड़ी की आवाज़ जहाँ तक जाती है, वहाँ तक। गाँव के दक्खिन में, नाले पर जो पत्थर की पुलिया है, वो आख़िरी जगह है जहाँ उसकी गूँज पहुँचती है। उसके आगे वो नहीं जा सकता।'”

विक्रांत ने अपना सिर उठाया।

पुलिया। पहली रात। Taxi का ड्राइवर, जिसने वहाँ गाड़ी रोक दी थी, और आगे जाने से इनकार कर दिया था। रात में मैं उधर नहीं जाता।

वह जानता था। हर कोई जानता था। सिवाय उसके।

“'दूसरी बात। लोहे के बारे में।'” इरा ने कहा, और उसकी आवाज़ थोड़ी धीमी हुई। “'मैंने गाँव वालों से कहा कि उसे लोहा पसंद नहीं। यह भी पूरा सच नहीं। लोहे से उसे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। मैंने उन्हें लोहा इसलिए दिया ताकि उनके हाथ में कुछ हो। डर को पकड़ने के लिए कोई चीज़ चाहिए होती है, नहीं तो डर ख़ुद इंसान को पकड़ लेता है।'”

विक्रांत ने कोने में लिपटे रघु काका के गद्दे की तरफ़ देखा।

पचपन साल की कीलें। एक बूढ़े आदमी का पूरा भरोसा। डर को पकड़ने के लिए कोई चीज़।

“'असली चीज़ लोहे की आवाज़ है। घंटी की। ठनकते धातु की। वो आवाज़ जगह भर देती है, गूँज के हर कोने को, और जब तक वो बजती है, सदाई के पास बोलने की जगह नहीं होती। पर वो सीखता है। वो हर आवाज़ सीखता है। इसलिए एक ही आवाज़ को बार-बार मत बजाना। उसे बदलते रहना।'”

"हमें पता चल गया था," विक्रांत ने कहा। उसकी आवाज़ कड़वी थी। "बहुत देर से।"

इरा ने पन्ना पलटा, और उसकी उँगलियाँ एक पल के लिए रुकीं।

विक्रांत ने उसे देखा। वह अगला पन्ना नहीं, उसके बाद वाला पढ़ने लगी थी। उसने एक पन्ना छोड़ दिया था। जल्दी से, अपनी उँगली से, जैसे गलती से दो पन्ने एक साथ पलट गए हों।

विक्रांत ने कुछ नहीं कहा। उसने बस पन्नों की गिनती की तरफ़ ध्यान दिया, किताब की मोटाई की तरफ़, उस जगह की तरफ़ जहाँ एक पन्ना दूसरे के ऊपर से फिसला था।

“'तीसरी बात,'” इरा ने पढ़ा, “'और सबसे ज़रूरी। जवाब के बारे में।'”

कबीर ने अपनी पट्टी वाली हथेली अपनी छाती पर दबा ली।

“'मैंने रिसाले में लिखा, सदाई सिर्फ़ उसी को ले सकता है जो उसे जवाब दे। यह सच है। पर अधूरा। जवाब देना एक दरवाज़ा है। पर अकेला दरवाज़ा नहीं।'”

इरा रुकी। उसकी उँगली अगली पंक्ति पर थी, और उसके चेहरे पर एक उलझन आई।

"आगे?" विक्रांत ने कहा।

"यहाँ पानी लगा है," इरा ने धीरे से कहा। उसने किताब को lamp के पास किया। "स्याही फैल गई है। बस कुछ शब्द बचे हैं।" उसने आँखें सिकोड़ीं। “‘...दूसरा दरवाज़ा...’ और फिर धब्बा। फिर ‘...जिसे तुम ख़ुद खोलते हो, बिना जाने...’ फिर धब्बा। फिर...” उसने अपना सिर हिलाया। “...बस इतना।”

"बिना जाने," विक्रांत ने दोहराया।

उसके दिमाग़ के किसी कोने में कुछ खटका। वही धुँधली चीज़ जो कल रात बावड़ी के किनारे खटकी थी। ...भैया? उसने उसे पकड़ने की कोशिश की, और वह फिसल गई।

इरा ने किताब के आख़िरी हिस्से तक पढ़ा। बाकी पन्ने ज़्यादातर रस्मों के बारे में थे, उर्दू और फ़ारसी में, अरबी के कुछ टुकड़ों के साथ, जिन्हें उसने नहीं पढ़ा। "ये सिर्फ़ विधि है," उसने कहा। "बाँधने की। ये हमें बाद में चाहिए होगी।"

फिर लिखावट बदली।

विक्रांत ने इसे देखा, उसके कंधे के ऊपर से। पहले की लिखावट मीर सादिक़ अली की थी, सधी हुई, पुराने ज़माने की, घुमावदार। अब एक नई लिखावट शुरू हुई। थोड़ी तेज़, थोड़ी आधुनिक, थोड़ी झुकी हुई। स्याही भी अलग थी। गहरी नीली, अब बैंगनी-भूरी।

"ये किसी और ने लिखा है," इरा ने कहा। उसकी आवाज़ में कुछ बदला। "बाद में। मीर साहब के बाद।"

"किसने?"

इरा ने उस लिखावट के पहले शब्द देखे, और उसके होंठ एक पल के लिए कसकर बंद हुए।

"उनके बेटे ने," उसने कहा। "इस हिस्से पर तारीख़ है। सन 1936।" उसने पढ़ा। “'मैं, मीर ज़ाकिर अली, अपने वालिद की किताब में ये पन्ने जोड़ रहा हूँ, सहगल कोठी में तजदीद की रस्म के बाद।'”

बाजा-घर। Aluminium disc। रस्म की आवाज़। वह सफ़ेद कपड़ों वाला आदमी, photo में, आँखें ज़मीन की तरफ़ झुकाए।

“'रस्म की रात कुछ ऐसा हुआ जो मेरे वालिद ने कभी नहीं लिखा था। जब मैंने नाम पुकारे, तो सिर्फ़ पुराने नाम जवाब नहीं दे रहे थे। मैंने आवाज़ें सुनीं जो अभी आई नहीं थीं। जो आने वाली थीं। एक आदमी की चीख, किसी बहुत गहरी जगह से, जो अपना ही नाम पुकार रहा था।'”

विक्रांत का पूरा शरीर ठंडा पड़ गया।

उसकी अपनी चीख। विक्रांत! उस disc पर।

“'तब मुझे समझ आया कि सदाई की गूँज सिर्फ़ आगे नहीं जाती। पीछे भी जाती है। जो होने वाला है, उसकी आवाज़ पहले से उसकी दीवारों में होती है। और अगर कोई ठीक से सुने, तो वह आने वाले को सुन सकता है।'”

इरा का हाथ काँपने लगा।

“'मैंने उस रात बहुत कुछ सुना। मैंने उसे सब इस किताब में नहीं लिखा, क्योंकि कुछ चीज़ें लिखने से वो पक्की हो जाती हैं। पर एक बात मैं लिखूँगा, क्योंकि मुझे पता है कि ये किताब किसके हाथ में पहुँचेगी।'”

उसने अगला पन्ना पलटा। आख़िरी पन्ना।

उसके बीच में, बाकी सब से अलग, बड़े और साफ़ अक्षरों में, ज़ाकिर अली की उसी बैंगनी-भूरी, नब्बे साल पुरानी स्याही में, कुछ लिखा था। उर्दू अंकों में, पहले एक तारीख़।

इरा ने उसे पढ़ा, और उसका चेहरा बदल गया।

वह बोली नहीं। विक्रांत ने उसके कंधे के ऊपर से देखा, पर वह उर्दू अंक नहीं पढ़ सकता था। उसने इरा के चेहरे को देखा, जो एक पल में राख जैसा हो गया था, और उसकी उँगलियों को, जो उस तारीख़ पर जमी हुई थीं।

"क्या लिखा है?" कबीर ने पूछा।

इरा ने अपने गले में आवाज़ ढूँढी।

"बाईस दिसंबर," उसने फुसफुसाया। "दो हज़ार छब्बीस।"

कबीर ने अपना फ़ोन उठाया। Screen पर तारीख़ देखी। फिर उसे नीचे रख दिया, बहुत धीरे, जैसे वह गर्म हो।

आज।

"और नीचे?" विक्रांत ने कहा। "तारीख़ के नीचे?"

इरा ने उस पंक्ति को देखा। नब्बे साल पहले, एक आदमी ने, एक रस्म की रात, अपने कानों में आने वाले वक़्त की गूँजें सुनते हुए, अपनी काँपती क़लम से यह लिखा था। किसी ऐसे के लिए, जिसे वह कभी नहीं मिला। जो अभी पैदा भी नहीं हुआ था।

उसकी आँखें भर आईं। उसने पढ़ा, बहुत धीमे, उर्दू से हिंदी में, हर शब्द जैसे उसके अपने गले को काटता हुआ।

“'इसी दिन,'” इरा ने पढ़ा, “'वो पूछेगी कि मैंने ये क्यों छिपाया।'”

[Part 21 समाप्त]

Writer
Piyashi Atma
Story
जवाब मत देना
Chapter
21 of 30
Category
Ghost Stories
Reading time
14 min
Words
2752
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

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