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Part 20: गिनती
Piyashi Atma · Ghost Stories · 15 मिनट
कल रघु काका सीढ़ियाँ गिनेंगे।
विक्रांत ने उस पंक्ति को बाकी रात देखा। Lamp की पीली रोशनी में, अपने notebook पर, अपनी लिखावट में। उसने उसे पढ़ा, फिर पन्ना पलटा, फिर वापस पलटा, जैसे उम्मीद हो कि वह गायब हो जाएगी।
वह गायब नहीं हुई।
उसने अपना pen निकाला और उसके नीचे, उसी पन्ने पर, लिखा: मैंने यह नहीं लिखा। फिर दोनों पंक्तियों को साथ देखा। एक जैसी। एक ही हाथ। एक ही झुकाव। कोई अदालत, कोई expert, उनमें फ़र्क नहीं कर पाता।
उलटी गूँज। उसके कदम, आधा सेकंड पहले। उसकी चीख, नब्बे साल पहले। उसकी लिखावट, एक दिन पहले।
जो होने वाला था, उसकी गूँज पहले से आ चुकी थी।
सुबह जब रघु काका उठे, विक्रांत ने उन्हें notebook दिखाई। बूढ़े ने पन्ने को देखा, अपनी झुर्रियों भरी आँखें सिकोड़कर, और विक्रांत को याद आया कि उन्होंने कहा था, वह पढ़ नहीं सकते।
"क्या लिखा है?" रघु काका ने पूछा।
विक्रांत ने बताया।
रघु काका ने बहुत देर तक कुछ नहीं कहा। उसने notebook को वापस विक्रांत की तरफ़ बढ़ाया, और फिर अपनी लोई की जेब में हाथ डाला, जहाँ कल रात की कीलें थीं। विक्रांत ने उनकी हल्की खनक सुनी।
"तो लिखा जा चुका है," बूढ़े ने कहा।
"नहीं।" विक्रांत ने उसकी बाँह पकड़ी। "नहीं, काका। ये बस एक... ये एक चेतावनी है। हम इसे रोक सकते हैं। आप आज बावड़ी के पास नहीं जाएँगे। आप आज हमारी नज़रों से दूर नहीं होंगे। एक पल के लिए भी नहीं।"
रघु काका ने उसकी तरफ़ देखा। पाँच दिनों में पहली बार। सीधे, उसकी आँखों में।
और विक्रांत ने उनमें वह देखा जो उसे उम्मीद नहीं थी। डर नहीं। एक अजीब, थकी हुई कोमलता। जैसे कोई बूढ़ा किसी बच्चे को देखता है जो किसी ऐसे तूफ़ान को रोकने की कोशिश कर रहा हो जो पहले से आसमान में है।
"ठीक है, बाबू," उसने कहा। "ठीक है।"
उन्होंने पूरा दिन उन्हें घेरकर रखा।
यह विक्रांत का विचार था, और कबीर और इरा, जो पिछले दो दिनों से एक-दूसरे की तरफ़ देखते भी नहीं थे, बिना किसी बहस के मान गए। जैसे किसी साझे डर ने उन्हें फिर से एक कर दिया हो, कम से कम कुछ घंटों के लिए।
रघु काका रसोई में रहे। अँगीठी के पास। खाना बनाते, बर्तन माँजते, लकड़ियाँ चीरते। और कोई न कोई हमेशा उनके साथ था। कबीर, उनके लिए लकड़ियाँ उठाता हुआ। इरा, चाय बनाती हुई। विक्रांत, दरवाज़े पर बैठा, पीछे के गलियारे की तरफ़ नज़र रखता हुआ।
दिन धीरे-धीरे बीता। कोहरा सुबह घना था, दोपहर को थोड़ा पतला हुआ, और फिर शाम को और घना होकर लौटा, जैसे कोई बहुत बड़ा, सफ़ेद जानवर कोठी के चारों तरफ़ लेटकर उसे अपनी गर्दन से दबा रहा हो।
रघु काका ने पूरे दिन एक बार भी बावड़ी का नाम नहीं लिया। उन्होंने एक बार भी पीछे के आँगन की तरफ़ नहीं देखा।
पर दोपहर को, जब विक्रांत ने उन्हें अपनी लोई की जेब से कीलें निकालते देखा, एक-एक करके, और उन्हें अँगीठी के पास एक कपड़े पर रखते देखा, कतार में, जैसे कोई किसी चीज़ का हिसाब कर रहा हो, उसने पूछा: "क्या कर रहे हैं, काका?"
"गिन नहीं रहा," रघु काका ने कहा, और उनके होंठों पर एक बहुत हल्की, बहुत थकी मुस्कान आई। "बस देख रहा हूँ।"
फिर उन्होंने कीलें इकट्ठी कीं और उन्हें वापस अपनी जेब में डाल लिया।
शाम को, अँधेरा होने से ठीक पहले, उन्होंने विक्रांत से एक बात कही। अँगीठी में आख़िरी लकड़ियाँ डालते हुए, बिना उसकी तरफ़ देखे।
"पचपन साल," उन्होंने कहा, "मैंने भैया का नाम पहना। उनके नाम पर खाया, सोया, जिया। गाँव वाले मुझे उनके नाम से बुलाते रहे, और मैं जवाब देता रहा। जैसे कोई उधार का कपड़ा पहनकर पूरी ज़िंदगी निकाल दे।"
"काका..."
"उधार लौटाना पड़ता है, बाबू।" उन्होंने लकड़ी को आग में ठीक से बैठाया। "कभी न कभी।"
रात दो बजे, ढोल बजा।
विक्रांत अपने पहरे पर था। कमरे में lamps जल रही थीं। रस्सी कबीर के टखने से रघु काका की कलाई तक। इरा अपने गद्दे पर, करवट लिए, सोती हुई, या सोने का नाटक करती हुई।
और फिर, बहुत दूर से, कोहरे के पार से, गाँव की गलियों से नहीं, कोठी के अंदर से, गलियारे से, पीछे के आँगन से:
धम। धम-धम। धम।
विक्रांत का पूरा शरीर कस गया।
शादी का ढोल। उसकी उछलती, नाचती लय। पर अब वह दूर का, घिसा हुआ, पुराने tape जैसा नहीं था। वह पास था। ठोस। जैसे कोई ढोल वाला गलियारे में खड़ा हो, दरवाज़े से कुछ फ़ुट दूर, और अपनी पूरी ताक़त से बजा रहा हो।
इरा उठ बैठी। कबीर भी। रघु काका की आँखें खुलीं, अंधेरे में चमकीं।
धम। धम-धम।
और फिर, ढोल के साथ, आवाज़ें।
एक-एक करके। दरवाज़े के पार से। गलियारे से। कोठी के हर कोने से। जैसे कोई बारात अंदर आ गई हो, और उसके हर बाराती ने किसी न किसी को पुकारना शुरू कर दिया हो।
"कबीर, बेटा... पानी..."
कबीर ने अपने दोनों हाथ अपने मुँह पर दबा लिए। उसकी आँखें बड़ी, गीली।
"इरा? इरा, मेरी बच्ची, मैं हूँ। अब्बू। दरवाज़ा खोल।"
इरा का चेहरा सफ़ेद पड़ गया। उसने अपनी हथेलियाँ अपने होंठों पर रखीं, और उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं।
विक्रांत ने अपने दाँत भींच लिए। उसने अपने लिए उस आवाज़ का इंतज़ार किया। माँ की। विक्रांत? या लोरी। या...
"विक्की?"
उसकी साँस रुक गई।
माँ की आवाज़। दरवाज़े के ठीक बाहर। प्यार से भरी। एक माँ, जो अपने बेटे को उसके घर वाले नाम से बुलाती है। वह नाम जो सिर्फ़ वह लेती थीं, बचपन में, जो उन्होंने बाद में लेना बंद कर दिया था, पता नहीं क्यों।
"विक्की, बेटा... बाहर आ जा... देख, मैं हूँ..."
विक्रांत ने अपनी जीभ को अपने दाँतों के बीच दबाया, इतने ज़ोर से कि उसका मुँह ख़ून से भर गया।
और फिर, उन सब आवाज़ों के नीचे, ढोल की धम-धम के नीचे, कुछ और।
पानी की गंध। इतनी भारी कि वह उसे अपने गले में महसूस कर रहा था। और उसके गद्दे के पास, फ़र्श पर, एक आवाज़। छोटी, गीली, नंगे पैरों की। थप। थप। उसके चारों तरफ़ चलती हुई। धीरे-धीरे। एक घेरे में। जैसे कोई बच्चा किसी खिलौने के चारों तरफ़ घूम रहा हो, यह तय करते हुए कि उसे कहाँ से उठाए।
लालटेन की लौ उसकी तरफ़ झुकी थी। सिर्फ़ उसकी तरफ़। इतनी लंबी कि उसकी चिमनी का काँच काला पड़ गया था।
विक्रांत ने अपने गद्दे के किनारे देखा। लकड़ी के फ़र्श पर, गीले, छोटे पैरों के निशान बन रहे थे। एक। फिर दूसरा। उसके चारों तरफ़। घेरा कसता हुआ।
रघु काका ने उसे देखा।
विक्रांत ने बाद में, बहुत बाद में, याद किया कि उस पल रघु काका का चेहरा कैसा था। लालटेन की काँपती रोशनी में, ढोल की धमक के बीच, उन आवाज़ों के बीच। उसमें कोई डर नहीं था। बस एक अजीब शांति। जैसे किसी ने कोई बहुत लंबा, बहुत भारी सवाल हल कर लिया हो, और अब उसके पास बस जवाब बचा हो।
बूढ़े ने अपनी कलाई की रस्सी खोली। एक झटके में। जिस गाँठ को उन्होंने बहुत सावधानी से बाँधा था, उसे उन्होंने बहुत आसानी से खोल दिया।
वह उठे।
विक्रांत ने उनकी तरफ़ हाथ बढ़ाया। उनकी लोई का किनारा पकड़ने के लिए। उसका मुँह खुला, उनका नाम लेने के लिए, और उसने ख़ुद को रोका। नियम तीन।
रघु काका ने उसका हाथ अपने हाथ में लिया। एक पल के लिए। बूढ़ी, खुरदरी, गर्म हथेली।
नियम दो। छुओ।
"मैं ठीक हूँ, बाबू," उन्होंने फुसफुसाया। "बस थोड़ा समय चाहिए आप लोगों को। सुबह तक।"
उन्होंने उसका हाथ छोड़ा। अँगीठी के पास से गौशाला वाली रस्सी उठाई, एक मोटा, लंबा गट्ठर। एक लालटेन। और कोने से वह spanner, जो कबीर ने उस दिन कोठरी से निकाला था।
और वह दरवाज़े की तरफ़ बढ़े।
विक्रांत उनके पीछे गया।
उसने इरा और कबीर की तरफ़ नहीं देखा। उसने बस उठा, ज़ंजीर के ऊपर से गुज़रा, और बूढ़े की लालटेन की पीली रोशनी के पीछे अंधेरे गलियारे में चला।
ढोल अब भी बज रहा था। आवाज़ें अब भी पुकार रही थीं। पर गलियारे में, रघु काका के पास, कुछ नहीं था। जैसे वह किसी ऐसी जगह से चल रहे हों जहाँ वे आवाज़ें पहुँच नहीं पातीं। या जैसे वे आवाज़ें उनके लिए नहीं थीं।
पीछे का दरवाज़ा। कोहरा। आँगन।
रघु काका जाली के पास घुटनों के बल बैठे, और spanner से बोल्ट खोलने लगे। उनके हाथ तेज़ी से चल रहे थे, सधे हुए, जैसे उन्होंने यह हज़ार बार सोचा हो।
विक्रांत उनके पास बैठा। उसने मदद की। उसे नहीं पता था क्यों। शायद इसलिए कि उसे पता था कि वह उन्हें रोक नहीं सकता। शायद इसलिए कि अगर वे जा रहे थे, तो वह चाहता था कि वे अकेले न जाएँ।
पत्थर की पटिया खिसकी। जाली उठी।
ठंडी, नम हवा बाहर आई। फिर अंदर गई। फिर बाहर। बावड़ी साँस ले रही थी, और विक्रांत ने महसूस किया कि उसकी साँसें अब तेज़ थीं। उत्सुक।
रघु काका ने रस्सी का एक सिरा अपनी कमर पर बाँधा। दूसरा विक्रांत के हाथ में दिया।
"पकड़कर रखना," उन्होंने कहा। "जब तक ढीली न हो।"
"और जब ढीली हो जाए?"
बूढ़े ने उसकी तरफ़ देखा। लालटेन की रोशनी में, उनका चेहरा किसी बहुत पुरानी, बहुत घिसी हुई मूर्ति जैसा लग रहा था।
"तो छोड़ देना," उन्होंने कहा। "और जाली बंद करके अंदर चले जाना। और सुबह तक दरवाज़ा मत खोलना। किसी के लिए भी नहीं। मेरे लिए भी नहीं।"
"काका, मैं..."
"किताब में लिखा था, न?" रघु काका ने लालटेन उठाई। "गिनती की हर आवाज़ उसके लिए एक सीढ़ी है। जितना गिनोगे, उतना वो ऊपर आएगा।" वह रुके। "पर ये नहीं लिखा था कि अगर कोई नीचे जाते हुए गिने, तो?"
विक्रांत ने उन्हें देखा।
"तो वो उसके पीछे-पीछे नीचे जाएगा," बूढ़े ने कहा। "हर गिनती के साथ। ऊपर से दूर। आप सबसे दूर।"
और वह पहली सीढ़ी पर उतरे।
"एक।"
रघु काका की आवाज़ बावड़ी में गिरी, और गूँजी। साफ़, ऊँची, पूरी ताक़त से। जैसे कोई मंदिर में आरती गाता है।
कोठी के अंदर, ढोल की लय एक पल के लिए डगमगाई।
"दो।"
विक्रांत ने रस्सी को अपनी हथेलियों में लपेटा। उसकी नज़र नीचे थी, उस पीली, हिलती रोशनी पर, जो धीरे-धीरे अंधेरे में उतर रही थी।
"तीन। चार। पाँच।"
ढोल धीमा हुआ। आवाज़ें, जो कोठी के गलियारों से आ रही थीं, कमज़ोर पड़ने लगीं। विक्की... बेटा... दूर होती हुई। जैसे कोई उन्हें पीछे से खींच रहा हो।
"छह। सात।"
रघु काका की आवाज़ में कोई काँपना नहीं था। हर संख्या साफ़, अलग, ज़ोरदार। और हर संख्या के साथ, विक्रांत ने महसूस किया कि बावड़ी की साँस बदल रही थी। तेज़ हो रही थी। गहरी।
हर गिनती एक सीढ़ी थी। और रघु काका उसे नीचे बुला रहे थे।
"बारह। तेरह।"
कोठी के अंदर का ढोल अब बहुत धीमा था। और उसकी आवाज़ बदल रही थी। वह अब गलियारे से नहीं आ रहा था। वह नीचे से आ रहा था। बावड़ी से। जैसे ढोल वाला भी उस गिनती के पीछे-पीछे उतर रहा हो।
"बीस। इक्कीस।"
विक्रांत ने अपनी पीठ पर कुछ महसूस किया। पीछे से। उसने मुड़कर देखा। आँगन ख़ाली था, कोहरा कमर तक। पर उसके चारों तरफ़ की ज़मीन पर, गीली पटियों पर, छोटे, नंगे पैरों के निशान थे। उसकी तरफ़ आते हुए। और फिर, उसके ठीक बगल से, बावड़ी की तरफ़ मुड़ते हुए। पहली सीढ़ी पर।
वह बच्चा भी जा रहा था। गिनती के पीछे।
"चालीस। इकतालीस।"
लालटेन की रोशनी अब बहुत छोटी थी। एक पीला बिंदु, बहुत नीचे, गोल घूमता हुआ, जैसे-जैसे रघु काका चबूतरों से मुड़ते, अगले तल की तरफ़ उतरते।
"साठ।"
रस्सी विक्रांत की हथेलियों से खिसक रही थी, धीरे-धीरे, बराबर गति से। उसने उसे ढील दी। गट्ठर छोटा होता गया।
"अस्सी। इक्यासी।"
ढोल अब बहुत दूर था। बहुत नीचे। उसकी धमक अब सुनाई नहीं दे रही थी, बस महसूस हो रही थी, ज़मीन में, विक्रांत के घुटनों के नीचे, एक धीमी, गहरी धड़कन।
कोठी पूरी तरह शांत थी। कोई आवाज़ नहीं। कोई पुकार नहीं।
रघु काका ने उन्हें सबको नीचे बुला लिया था।
"सौ।"
विक्रांत ने अपनी आँखें बंद कर लीं। उसे याद आया, अपनी उस recording में, उस बंद कोठरी में, उसकी अपनी आवाज़ ने यही संख्याएँ गिनी थीं। सौ। एक सौ एक।
"एक सौ एक। एक सौ दो।"
रघु काका की आवाज़ अब बहुत दूर थी, बहुत गहरी, गूँज में लिपटी, ढाई सेकंड, तीन सेकंड। पर अब भी साफ़। अब भी स्थिर।
"एक सौ छह।"
"एक सौ सात।"
एक ठहराव।
"एक सौ आठ।"
और फिर खामोशी।
रस्सी रुक गई।
विक्रांत ने उसे पकड़े रखा। कसकर। गट्ठर में अब बस कुछ फ़ुट बचे थे। रस्सी तनी हुई थी, नीचे की तरफ़, अंधेरे में, एक सीधी, खिंची हुई लकीर।
नीचे, बहुत नीचे, लालटेन का पीला बिंदु स्थिर था।
कोई आवाज़ नहीं। न ढोल, न पानी, न कदम।
विक्रांत ने साँस रोककर सुना। उसके कान, जो कभी आराम नहीं करते थे, उस गहरी, खुली खामोशी में कुछ भी पकड़ने के लिए फैले हुए।
फिर कुछ आया।
बहुत धीमा। बहुत नीचे से। रघु काका की आवाज़ नहीं।
एक लड़के की। चौदह-पंद्रह साल का। गँवई, खुरदरी, किशोर उम्र की टूटती हुई आवाज़, जो अभी बचपन और जवानी के बीच अटकी हो।
"माधो?"
विक्रांत की उँगलियाँ रस्सी पर कस गईं।
"माधो, तू यहाँ है?"
नीचे, लालटेन का बिंदु हिला। थोड़ा।
विक्रांत ने इंतज़ार किया। उसे पता था कि रघु काका जवाब नहीं देंगे। वह नहीं दे सकते थे। उन्होंने ख़ुद बताया था, उस रात, अँगीठी के पास। उस नाम पर मेरा गला हिलता ही नहीं। जवाब नहीं बनता।
पचपन साल से वह इस आवाज़ को सुनते आए थे। कभी-कभी, कोहरे की रातों में। और पचपन साल से उन्होंने कभी जवाब नहीं दिया था।
खामोशी।
फिर, बहुत नीचे से, रघु काका की आवाज़ आई। धीमी। पहली बार काँपती हुई। जवाब में नहीं। बल्कि एक सवाल की तरह। एक बूढ़े आदमी की आवाज़, जो एक बहुत लंबे अंधेरे में किसी को ढूँढ रहा हो।
“...भैया?”
बस इतना। एक शब्द। एक पुकार।
विक्रांत ने उसे सुना। उसके अंदर कुछ खटका। कोई बहुत छोटी, बहुत धुँधली चीज़, जिसे उसने उस पल पकड़ा नहीं। उसके दिमाग़ ने उसे नोट किया, और उसे उस ढेर पर रख दिया, बिना देखे।
नीचे से, उस किशोर आवाज़ ने, बहुत प्यार से, बहुत राहत से, जवाब दिया।
"हाँ, माधो। मैं यहाँ हूँ।"
रस्सी ढीली हो गई।
एक पल में। बिना किसी झटके के। बिना किसी खिंचाव के। जैसे किसी ने उसके दूसरे सिरे से वज़न उठा लिया हो, बहुत आसानी से, बहुत आराम से।
नीचे, लालटेन का पीला बिंदु एक पल के लिए हवा में रुका।
फिर गिरा।
विक्रांत ने उसे गिरते देखा। सीढ़ियों पर लुढ़कते हुए, उसकी रोशनी घूमती हुई, दीवारों पर, मेहराबों पर, जैसे किसी पागल नर्तक की परछाई। नीचे, नीचे। जैसे रघु काका ने पचपन साल पहले अपने भाई की लालटेन को गिरते देखा था।
फिर वह बुझ गई।
अंधेरा। पूरा। गहरा।
विक्रांत ने रस्सी खींचनी शुरू की।
उसके हाथ अपने आप चल रहे थे, एक के बाद एक, रस्सी ऊपर खींचते हुए, उसकी हथेलियाँ छिलती हुईं। रस्सी हल्की थी। बहुत हल्की। उसमें कोई वज़न नहीं था।
वह ऊपर आती रही। गीली। जितनी नीचे गई थी, उतनी गीली। उस पर काई, बारीक, हरे धागे। और पानी, ठंडा, पत्थर के स्वाद वाला, उसकी उँगलियों पर टपकता हुआ।
बावड़ी पचपन साल से सूखी थी।
रस्सी का आख़िरी सिरा ऊपर आया।
फंदा। वह गाँठ जो रघु काका ने अपनी कमर पर बाँधी थी। सख़्त, कसी हुई, बिल्कुल वैसी जैसी उन्होंने बाँधी थी। उसे किसी ने खोला नहीं था। काटा नहीं था।
फंदा पूरा था। गोल। बंद।
और ख़ाली।
जैसे जिस कमर पर वह बँधा था, वह बस उसके अंदर से निकल गई हो। या गायब हो गई हो।
विक्रांत उस गीले, ख़ाली फंदे को अपनी हथेलियों में थामे बैठा रहा, बावड़ी के किनारे, कोहरे में।
उसे इरा की आवाज़ याद आई, बहुत बाद में, जब वह इस रात को अपने दिमाग़ में दोहरा रहा था। वह पीछे से आई थी, दरवाज़े से, जहाँ वह और कबीर कब आकर खड़े हो गए थे, उसे पता नहीं चला था।
"उन्होंने जवाब नहीं दिया," इरा ने फुसफुसाया था। उसकी आवाज़ में डर था, और उससे भी ज़्यादा, एक तरह का उलझा हुआ, टूटा हुआ अविश्वास। जैसे किसी ने उसकी नींव के नीचे से कोई पत्थर खींच लिया हो। "विक्रांत, उन्होंने उसे जवाब नहीं दिया। मैंने सुना। उसने 'माधो' कहा, और उन्होंने जवाब नहीं दिया।"
"मुझे पता है।"
"पर नियम..." इरा की आवाज़ टूटी। “...किताब में लिखा था। सबसे साफ़। सदाई सिर्फ़ उसी को ले सकता है जो उसे जवाब दे।”
विक्रांत ने गीले फंदे को देखा।
पहला नियम। दो लकीरों वाला। उनकी सबसे पक्की दीवार। जिस पर उन्होंने अपना पूरा भरोसा टिकाया था। जिसे उन्होंने हर रात अपने मुँह पर हाथ दबाकर निभाया था।
उन्होंने कोई गलती नहीं की थी। रघु काका ने कोई नियम नहीं तोड़ा था।
और फिर भी वह उन तक पहुँचा था।
"तो किताब ग़लत थी," विक्रांत ने कहा। उसकी आवाज़ उसे किसी और की लगी, बहुत दूर की। "या अधूरी।"
वह फंदा छोड़ने ही वाला था, जाली बंद करने के लिए, रघु काका की आख़िरी बात मानने के लिए, जब उसने उसे सुना।
नीचे से। बहुत नीचे से। सातवें तल से, शायद, उस कोठरी से जिसका दरवाज़ा अंदर से बंद होता है।
एक आवाज़।
वही किशोर लड़के की आवाज़। चौदह साल का। गँवई, खुरदरी, टूटती हुई। रघुनाथ की आवाज़, जो पचपन साल पहले एक बारात को रास्ता दिखाने लालटेन लेकर गया था।
पर इस बार वह किसी को ढूँढ नहीं रही थी। इस बार उसमें कोई डर नहीं था, कोई घबराहट नहीं। उसमें एक अजीब, नरम, ख़ुश राहत थी। जैसे कोई बहुत लंबे सफ़र के बाद घर पहुँचा हो, और अपने छोटे भाई को आँगन से बुला रहा हो, शाम को, खेत से लौटते हुए।
और वह आवाज़ ऊपर आ रही थी।
विक्रांत ने उसे सुना। हर गूँज के साथ थोड़ी पास। हर लौटती लहर के साथ थोड़ी साफ़। जैसे बोलने वाला खड़ा न हो, चल रहा हो। सीढ़ियों पर। नीचे से ऊपर। धीरे-धीरे।
और उसके साथ, बहुत हल्के, पत्थर पर, नंगे पैरों की आहट। एक। रुकना। एक। रुकना।
कोई चढ़ रहा था।
और वह आवाज़, बहुत प्यार से, बहुत धैर्य से, जैसे पचपन साल का इंतज़ार बस एक शाम का हो, पुकार रही थी:
"माधो... ऊपर आ जा।"
[Part 20 समाप्त]
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- जवाब मत देना
- Chapter
- 20 of 30
- Category
- Ghost Stories
- Reading time
- 15 min
- Words
- 2961
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
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