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Part 19: अविश्वास
Piyashi Atma · Ghost Stories · 14 मिनट
आख़िरी कील रात के बारह बजकर चालीस मिनट पर गिरी।
टक।
उसके बाद दरवाज़े पर एक भी कील नहीं बची थी। चौखट और पल्ले पर बस छोटे, गोल, काले छेद थे, दर्जनों, ऊपर से नीचे तक, जैसे किसी लकड़ी पर दीमक ने रास्ते बनाए हों। और फ़र्श पर, दरवाज़े के पास, कीलों का एक छोटा, बिखरा हुआ ढेर। काली, मोटी, कुछ मुड़ी हुई, कुछ सीधी। अब बस लोहे के बेजान टुकड़े।
चारों उस दरवाज़े को देखते रहे। इंतज़ार करते रहे कि वह खुलेगा।
वह नहीं खुला।
फिर, उस पार से, एक बार, बहुत धीमे, किसी ने खटखटाया।
ठक।
अकेला। बिना पहले के तीन के। वही, जो बाजा-घर के दरवाज़े पर आया था। जैसे कोई कह रहा हो, मैं यहाँ था। मैं फिर आऊँगा।
फिर कुछ नहीं।
रघु काका अपने गद्दे से उठा। धीरे से। उसके घुटने चटके। वह दरवाज़े तक गया, और उसके सामने घुटनों के बल बैठ गया। और एक-एक करके, कीलें उठाने लगा। अपनी झुर्रियों भरी उँगलियों से, बहुत सावधानी से, जैसे कोई किसी टूटी माला के मनके उठाता है। उसने उन्हें अपनी हथेली में इकट्ठा किया।
उसने उन्हें दोबारा नहीं ठोका।
वह बस उनके साथ वहीं बैठा रहा, दरवाज़े के सामने, अपनी हथेली में कीलों का एक ढेर थामे, और उन्हें देखता रहा।
"पचपन साल," उसने फुसफुसाया।
विक्रांत उसके पास गया। उसने बूढ़े के कंधे पर हाथ रखा।
"काका, मुझे आपको कुछ बताना है।"
और उसने बताया। कोठरी। कीलें, जिनसे कोई फ़र्क नहीं पड़ा। लोहे की छड़ें, उनकी टनटनाहट, चार सेकंड की ख़ाली जगह। और फिर, पाँचवीं बार, वह उलटी गूँज। उसकी अपनी टनटनाहट, उसके टकराने से पहले।
रामदुलारी की कहानी। जगन्नाथ पंडित। सात रातों तक हमने उसे घंटी सुनाई। और उसने सीख ली।
रघु काका ने सुना। उसने कुछ नहीं कहा। जब विक्रांत चुप हुआ, बूढ़े ने अपनी हथेली को देखा, उन कीलों को, बहुत देर तक।
फिर उसने अपनी मुट्ठी बंद की, और उन्हें अपनी लोई की जेब में डाल दिया।
"तो बस," उसने कहा। बिना किसी ग़ुस्से के। बिना किसी दुख के। बस एक बहुत, बहुत पुरानी थकान के साथ। "तो बस।"
सुबह, कबीर ने कहा कि उसने रात को कुछ सुना।
"तू पहरे पर था," उसने इरा से कहा। "तीन बजे के आसपास। मैं जागा हुआ था, आँखें बंद करके। और मैंने तुझे सुना। फुसफुसाते हुए।"
इरा ने उसकी तरफ़ देखा। "मैं किसी से बात नहीं कर रही थी।"
"तू कह रही थी," कबीर ने कहा, और उसकी आवाज़ में कुछ कड़ा था, कुछ ऐसा जो विक्रांत ने पिछले कई दिनों से नहीं सुना था, “'कबीर को पीछे छोड़ना होगा।'”
रसोई में खामोशी छा गई।
इरा का चेहरा सफ़ेद पड़ गया। "मैंने ऐसा कुछ नहीं कहा।"
"मैंने सुना।"
"तुमने सुना जो उसने तुम्हें सुनाया।" इरा ने कहा। उसकी आवाज़ काँप रही थी, पर उसमें ग़ुस्सा भी था। "मेरी आवाज़ में। जैसे उस रात विक्रांत ने सुना था। तुम ये जानते हो।"
"और मैं ये कैसे जानूँ," कबीर ने कहा, "कि वो तू नहीं थी?"
कोई कुछ नहीं बोला।
"तू पिछली दो रातों से पहरे के दौरान बाहर जाती है," कबीर ने कहा। "विक्रांत, तुझे पता है? तेरी बारी के बाद। जब तू सो जाता है। ये उठती है, और चली जाती है। आधा घंटा। कभी ज़्यादा।"
विक्रांत ने इरा की तरफ़ देखा।
"मैं बाथरूम जाती हूँ," इरा ने कहा।
"आधा घंटा?"
"मेरा पेट ठीक नहीं है।"
कबीर हँसा। एक छोटी, कड़वी आवाज़। "और छत पर? कल दोपहर? तू किससे बात कर रही थी, फ़ोन पर, उर्दू में?"
इरा ने अपनी आँखें बंद कर लीं।
"मैंने सुना," कबीर ने कहा। "मैं सीढ़ियों पर था। तू कह रही थी, 'वो वही है। मुझे यक़ीन है। अब्बू, वो वही है।'"
"अपने अब्बू से बात कर रही थी।" इरा ने अपनी आँखें खोलीं। वे गीली थीं। “Lucknow में। वो बीमार हैं। हर दिन पूछते हैं कि मैं कब लौटूँगी।”
“'वो वही है' कौन?”
इरा ने जवाब नहीं दिया।
विक्रांत उन दोनों को देख रहा था। कबीर, उसकी पट्टी बँधी हथेली, जिसमें उसके अपने हाथ से खुदा हुआ था, विक्रांत को मत बचाना। इरा, उसकी गीली आँखें, उसका आधा-अधूरा जवाब, उसका एक पल वाली केतली की पकड़।
और उसे एहसास हुआ कि वह दोनों में से किसी पर भरोसा नहीं कर रहा था।
अगले दो दिन ऐसे ही बीते।
चीज़ें छोटी थीं, और इसीलिए बदतर। कोई बड़ी घटना नहीं, कोई चीख नहीं, कोई गिरती कील नहीं। बस आवाज़ें। टुकड़े। बातें, जो दीवारों के पार से, बंद दरवाज़ों के पीछे से, सीढ़ियों के मोड़ से सुनाई देतीं। हमेशा किसी अपने की आवाज़ में। हमेशा कुछ ऐसा जो सुनने वाले को चुभे।
रघु काका ने विक्रांत की आवाज़ सुनी, गलियारे में, किसी से बात करती हुई: "बूढ़े पर भरोसा मत करना। उसने अपने भाई को भेजा।"
विक्रांत ने रघु काका की आवाज़ सुनी, आँगन से, अपनी खिड़की के नीचे: "बाबू को नीचे जाना ही होगा। कोई और रास्ता नहीं।"
इरा ने कबीर की आवाज़ सुनी: "मैं ही उसे ले गया था। जानबूझकर।"
और हर बार, जब कोई किसी से पूछता, "क्या तुमने ये कहा?", दूसरा इनकार करता, और फिर दोनों एक दूसरे को देखते, और दोनों की आँखों में वही सवाल होता।
क्या ये सच में इनकार है? या ये भी वही है?
दीवार पर टँगी नियमों की सूची अब भी वहीं थी। जवाब मत देना। छुओ। पर अब कोई किसी को छूता नहीं था। जब कबीर ने विक्रांत के कंधे पर हाथ रखा, एक शाम, सीढ़ियों पर, विक्रांत ने अपने आप पीछे हटकर उसे झटक दिया। फिर उसे शर्म आई। पर कबीर की आँखों में जो चोट थी, वह वापस नहीं गई।
रात को, अँगीठी वाले कमरे में, वे चारों अपने गद्दों पर लेटते, और कोई किसी की तरफ़ मुँह नहीं करता था। रस्सी अब भी कबीर के टखने से रघु काका की कलाई तक बँधी थी, पर अब वह सुरक्षा नहीं, निगरानी लगती थी।
तीसरे दिन, विक्रांत ने वह किया जो उसे शुरू में ही करना चाहिए था।
उसने अपने मोबाइल पर, जो अब हर वक़्त record करता रहता था, उसकी जेब में, कबीर वाली बात ढूँढी। वह आवाज़ जो कबीर ने रात को सुनी थी। इरा की। कबीर को पीछे छोड़ना होगा।
उसके पास नहीं थी। उस रात उसका recorder कमरे के बीच में था, और उसने कोई फुसफुसाहट नहीं पकड़ी थी।
पर अगली रात, जब उसने रघु काका की आवाज़ सुनी, अपनी खिड़की के नीचे, बाबू को नीचे जाना ही होगा, उसका मोबाइल चल रहा था।
उसने उसे laptop पर डाला, और उस वाक्य को zoom किया।
और तुरंत, उसकी आँखों ने, उसके बारह साल ने, कुछ पकड़ा।
वाक्य के बीच में, "बाबू को" और "नीचे जाना" के बीच, एक बहुत छोटा, बहुत बारीक अंतराल था। आधे milliseconds का। उसमें background noise बदल रहा था। "बाबू को" के पीछे एक हल्की गुनगुनाहट थी, अँगीठी की। "नीचे जाना ही होगा" के पीछे नहीं थी। उसके पीछे कोहरे की, खुले आसमान की, एक अलग hiss थी।
विक्रांत ने उसे देखा, और उसका दिल तेज़ धड़का। उसने इसे पहचाना। उसने इसे सैकड़ों बार अदालतों में पकड़ा था। जब कोई किसी की बात के टुकड़े काटकर, अलग-अलग recordings से जोड़कर, एक नया वाक्य बनाता है।
Splicing।
उसने अपनी पुरानी recordings खोलीं। सारी। पिछले दो हफ़्तों की। और ढूँढना शुरू किया।
दो घंटे लगे।
"बाबू को" मिला। रघु काका की आवाज़, अँगीठी के पास, पहली रात। "बाबू को चाय दे दो।" अँगीठी की वही गुनगुनाहट।
"नीचे जाना ही होगा" मिला। रघु काका की आवाज़, आँगन में, उस दिन जब वे बावड़ी में उतरने की तैयारी कर रहे थे। विक्रांत ने उनसे पूछा था कि क्या वह ख़ुद भी चलेंगे, और बूढ़े ने कहा था, "किसी को रस्सी पकड़कर ऊपर रहना होगा। तुम्हें नीचे जाना ही होगा, तो मैं ऊपर रहूँगा।" बीच का एक टुकड़ा। नीचे जाना ही होगा।
दो असली टुकड़े। दो अलग दिनों के। दो अलग बातों के। एक साथ जोड़े हुए, ठीक उसी बारीकी से जैसे कोई माहिर editor करता है।
सदाई झूठ नहीं बोलता। उसके पास अपनी कोई ज़ुबान नहीं, तो अपना कोई झूठ भी नहीं। पर वो सच भी पूरा नहीं बोलता। वो सच के टुकड़े देता है, ऐसे जोड़कर कि तुम ख़ुद झूठ बना लो।
विक्रांत ने अपनी कुर्सी पर पीछे टेक लगाई, और पहली बार, कई दिनों में, उसके अंदर कुछ हल्का हुआ। राहत की एक पतली, काँपती धारा।
वह इसे पकड़ सकता था। यह उसका क्षेत्र था। यह वह चीज़ थी जो वह अपनी पूरी ज़िंदगी करता आया था। हर splice का एक निशान होता है। हर जोड़ की एक सिलाई। और अगर वह उसे दिखा सके, तो वे फिर से एक-दूसरे पर भरोसा कर सकते थे।
उसने इरा वाली बात ढूँढने की कोशिश की। कबीर को पीछे छोड़ना होगा। उसके पास उसकी recording नहीं थी, पर उसने इरा की पुरानी बातें खंगालीं, और "पीछे छोड़ना होगा" उसे मिल गया। Council वाले दिन। जब उन्होंने नियम बनाए थे। इरा ने कहा था, "हमें डर को पीछे छोड़ना होगा, नहीं तो ये हमें खा जाएगा।"
सब कुछ अपनी जगह बैठ रहा था। हर इल्ज़ाम, हर ज़हरीली बात, असली शब्दों के टुकड़ों से बनी हुई, काटी और जोड़ी गई। उसने कबीर वाली बात भी ढूँढी, मैं ही उसे ले गया था, और वह भी मिली, कबीर के उस टूटे हुए confession से, बावड़ी के पहले तल पर, सलीम के नाम के सामने।
उसने उन्हें इकट्ठा किया। एक file में। ताकि शाम को सबको दिखा सके।
फिर, बस पक्का करने के लिए, उसने अपने मोबाइल की आख़िरी दो दिन की recordings एक बार और देखीं। उन हिस्सों को, जहाँ कोई आवाज़ थी जो वहाँ नहीं होनी चाहिए थी।
और एक आवाज़ उसे मिली जो उसकी सूची में नहीं थी।
कल दोपहर की। छत की सीढ़ियों के पास से, जब वह ऊपर जा रहा था, signal के लिए। उसके मोबाइल ने बहुत हल्के से कुछ पकड़ा था, छत से आती हुई, जिसे उसने उस वक़्त ठीक से नहीं सुना था।
इरा की आवाज़। फुसफुसाती हुई, उर्दू-मिली हिंदी में। फ़ोन पर, किसी से।
“...नहीं, अब्बू। अभी नहीं। उसे सच नहीं पता होना चाहिए। अभी नहीं।”
विक्रांत ने उसे सुना। फिर फिर से।
उसने background noise देखा। एक, बराबर। खुले आसमान की hiss, छत की हवा। कोई बदलाव नहीं। कोई सिलाई नहीं।
उसने साँस देखी। "अब्बू" से पहले। छोटी, हल्की, धुँधली लकीर। "उसे" से पहले फिर। होंठों की बारीक चट।
यह splice नहीं था।
यह इरा थी। असली। ज़िंदा। साँस लेती हुई। किसी से कहती हुई कि किसी को सच नहीं पता होना चाहिए।
विक्रांत ने laptop बंद कर दिया।
उसने वह file नहीं दिखाई, जो उसने सबके लिए बनाई थी। उस शाम नहीं।
उस रात, उसके पहरे के बाद, वह सोया नहीं। उसने सोने का नाटक किया। आँखें बंद, साँसें धीमी, और कान खुले।
तीन बजकर दस मिनट पर, इरा उठी।
उसने बहुत धीरे से अपनी रज़ाई हटाई। एक पल रुकी, कमरे को देखा। सबको। विक्रांत ने अपनी आँखें पूरी बंद रखीं, अपनी साँसें बराबर। फिर उसके कदम, बहुत हल्के, दरवाज़े की तरफ़। ज़ंजीर के ऊपर से, सावधानी से। कुंडी, धीरे से।
वह बाहर गई।
विक्रांत ने तीस तक इंतज़ार किया। नहीं, उसने इंतज़ार किया, गिना नहीं। फिर उठा, और उसके पीछे गया।
गलियारा अंधेरा था। इरा की कोई रोशनी नहीं दिख रही थी। विक्रांत ने अपने कानों पर भरोसा किया। कदम, लाइब्रेरी की तरफ़ नहीं। पश्चिम की तरफ़, उस लंबे, बिना खिड़की वाले गलियारे में।
बाजा-घर।
दरवाज़ा थोड़ा खुला था, टूटे ताले के बिना, और उसकी दरार से एक बहुत हल्की, नीली-सफ़ेद रोशनी आ रही थी। मोबाइल की screen की।
विक्रांत ने अंदर झाँका।
इरा ग्रामोफ़ोन के पास खड़ी थी। Aluminium disc turntable पर थी। तजदीद। सन 1936। उसके कानों पर headphones थे, विक्रांत के, जो उसने उसके bag से लिए होंगे, और उनकी तार उसके मोबाइल तक जाती थी, और मोबाइल की तार एक छोटे mic तक, जो उसने भोंपू के ठीक सामने रखा था।
वह disc नहीं चला रही थी। Turntable रुका हुआ था। वह कुछ सुन रही थी। अपने मोबाइल पर। Headphones में।
विक्रांत ने उसके मोबाइल की screen देखी। एक audio file। लंबी। और उसकी waveform उसने पहचानी। वह उसकी अपनी restoration थी। Disc वाली। जो उसने उस रात की थी।
और waveform वहाँ ख़त्म नहीं हो रही थी जहाँ उसने रोका था। जहाँ खटखटाहट आई थी। वह आगे जा रही थी। दो, तीन मिनट और।
उसने बाकी disc चलाई थी। अकेले। किसी रात, जब वह सो रहा था।
विक्रांत ने दरवाज़ा धकेला।
इरा मुड़ी, एक झटके से। Headphones उसके कानों से फिसले। उसकी आँखें बड़ी हुईं, फिर सिकुड़ीं, जैसे वह यह तय कर रही हो कि जो दरवाज़े पर खड़ा है वह असली है या नहीं।
विक्रांत ने कुछ नहीं कहा। वह आगे बढ़ा, और उसका हाथ पकड़ लिया।
नियम दो।
इरा की हथेली गर्म थी। काँपती हुई। असली।
"क्या कर रही हो?" उसने पूछा।
इरा ने अपना हाथ नहीं छुड़ाया। उसने उसे देखा, और उसकी आँखों में एक पल के लिए कुछ टूटा।
“Disc का बाकी हिस्सा,” उसने कहा। "जहाँ हमने रोका था, उसके आगे। उसमें मीर साहब के बेटे की आवाज़ है। रस्म के आख़िरी शब्द। Binding के।" उसने गला साफ़ किया। "मुझे लगा, अगर हमें पता हो कि उन्होंने उसे कैसे बाँधा था, तो शायद..."
"तो शायद क्या?"
"तो शायद हम उसे फिर से बाँध सकें।"
यह जवाब अच्छा था। तर्कसंगत। उपयोगी। बिल्कुल वही, जो एक archivist कहती।
"तुमने मुझे क्यों नहीं बताया?"
"क्योंकि आपने कहा था कि आप उसे दोबारा नहीं चलाएँगे।" इरा ने कहा। "आप डरे हुए थे। मैंने सोचा, मैं पहले सुन लूँ, फिर आपको..."
"मीर साहब के बेटे की आवाज़," विक्रांत ने कहा, धीरे से। "तुम्हें कैसे पता कि वो उनके बेटे की आवाज़ है?"
इरा ने कुछ नहीं कहा।
"तुमने उस photo वाले आदमी के चेहरे पर अपनी उँगलियाँ रखी थीं," विक्रांत ने कहा। "तुमने रिसाले की मुहर पर। और कल तुमने छत पर किसी से कहा, 'उसे सच नहीं पता होना चाहिए।'"
इरा का चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
"वो splice नहीं था, इरा।" विक्रांत की आवाज़ बहुत शांत थी। "मैंने जाँचा। उसमें साँस थी।"
बाजा-घर के मख़मल ने उनकी आवाज़ों को निगल लिया। कोई गूँज नहीं। बस वे दोनों, उस बिना-गूँज वाले कमरे में, एक-दूसरे का हाथ थामे, एक-दूसरे को घूरते हुए।
"मैं आपको बताऊँगी," इरा ने आख़िरकार फुसफुसाया। "सब। मैं क़सम खाती हूँ। पर अभी नहीं।"
"क्यों?"
"क्योंकि अगर मैं अभी बताऊँ," उसने कहा, और उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे, "तो आप मेरी बात नहीं सुनेंगे। आप भाग जाएँगे। और फिर मैं आपको बचा नहीं पाऊँगी।"
विक्रांत अँगीठी वाले कमरे में लौटा, इरा से पहले। उसने उसे बाजा-घर में छोड़ दिया था, ग्रामोफ़ोन के पास, अपना चेहरा अपनी हथेलियों में छिपाए।
कमरे में कबीर और रघु काका सो रहे थे। रस्सी, टखने से कलाई तक। Lamps जलती हुईं।
विक्रांत अपने गद्दे पर बैठा। उसका दिमाग़ चक्कर खा रहा था। उसे सच नहीं पता होना चाहिए। फिर मैं आपको बचा नहीं पाऊँगी। विक्रांत को मत बचाना।
कौन किसे बचा रहा था? किससे?
उसने अपनी jacket की जेब से अपना notebook निकाला। उसकी diary। जिसमें वह हर दिन लिखता आया था, पहले दिन से। हर घटना, हर recording, हर माप। उसकी case file। उसका सबूत कि वह पागल नहीं हो रहा।
उसने उसे खोला, आज का दिन लिखने के लिए। Splicing। इरा। बाजा-घर।
आख़िरी लिखा हुआ पन्ना कल का था। उसकी अपनी बाईं ओर झुकी, सधी हुई लिखावट। Day 19। लोहे की आवाज़ सीखी गई। रामदुलारी: जगन्नाथ पंडित, घंटी। कीलें गिरीं।
उसके नीचे, उसी पन्ने पर, एक और पंक्ति थी।
विक्रांत ने उसे नहीं लिखा था।
वह इसके बारे में पक्का था। उसने कल रात कीलों के बारे में लिखने के बाद notebook बंद किया था, और उसे अपनी jacket की अंदर वाली जेब में रखा था, उस lal ऊन वाली थैली के साथ, अपनी छाती से सटाकर। और वह पूरी रात उसी jacket में सोया था।
पर पंक्ति उसकी लिखावट में थी।
उसी नीली स्याही में, उसी pen से, जो अब भी उसकी jacket की जेब में था। वही बाईं ओर का झुकाव। वही "क" जिसकी पूँछ नीचे की तरफ़ थोड़ी मुड़ती थी, जैसे वह हमेशा बनाता था। वही दबाव, वही गति, वही छोटी-छोटी आदतें, जो किसी handwriting expert को किसी इंसान के fingerprint जितनी साफ़ दिखती हैं। विक्रांत ने अदालतों में ऐसे experts के साथ काम किया था। वह जानता था। यह उसकी लिखावट थी। किसी और की नहीं।
उसके नीचे तारीख़ नहीं थी। कोई दिन का नंबर नहीं। बस एक वाक्य, साफ़, सीधा, बिना किसी काँपने के। जैसे किसी ने एक सीधी-सादी बात लिखी हो, जो उसे पहले से पता थी, जैसे कोई कल के मौसम के बारे में लिखता है।
कल रघु काका सीढ़ियाँ गिनेंगे।
[Part 19 समाप्त]
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- जवाब मत देना
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- Category
- Ghost Stories
- Reading time
- 14 min
- Words
- 2699
- Language
- Hindi (हिंदी)
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