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Part 18: बिना घंटी का मंदिर
Piyashi Atma · Ghost Stories · 16 मिनट
विक्रांत को मत बचाना।
कबीर ने अपनी हथेली को ऐसे पकड़ा जैसे वह किसी और की हो। उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं, और नीली स्याही वाले अक्षरों के बीच से ख़ून की बारीक, लाल लकीरें उभर रही थीं, जहाँ pen की नोक ने खाल फाड़ी थी।
"मैंने नहीं लिखा," उसने कहा। उसकी आवाज़ टूटी हुई थी। "मैंने नहीं... विक्रांत, मैं क़सम खाता हूँ, मैं..."
"मुझे पता है।"
"ये मेरी लिखावट है।"
"मुझे पता है।"
कबीर ने अपनी हथेली को रज़ाई पर रगड़ा। ज़ोर से। बार-बार। स्याही धुँधली हुई, फैली, ख़ून के साथ मिलकर एक गंदा, बैंगनी धब्बा बनी, पर अक्षर नहीं मिटे। वे खाल में खुदे थे।
रघु काका ने अपनी कलाई से रस्सी खोली। धीरे-धीरे, गाँठ को अपनी उँगलियों से सुलझाते हुए। उसकी आँखें कबीर की हथेली पर थीं।
विक्रांत ने फ़र्श पर देखा। कबीर के गद्दे के पास, उसके तकिए के नीचे से आधा बाहर निकला, एक pen पड़ा था। नीला, plastic का, सस्ता। उसका अपना। उसके notebook वाला, जो वह हमेशा अपनी jacket की जेब में रखता था।
उसने jacket टटोली। Notebook वहाँ था। Pen नहीं।
उसने pen उठाया। उसकी नोक पर ख़ून सूख चुका था, भूरा।
"किसके लिए था?" इरा ने धीरे से पूछा। "ये संदेश?"
कोई कुछ नहीं बोला।
"मेरे लिए," कबीर ने आख़िरकार कहा। "मेरे हाथ पर है। मुझसे कह रहा है।" उसने विक्रांत की तरफ़ देखा, उसकी आँखें गीली और डरी हुई। "मुझसे कह रहा है कि तुझे मत बचाना। क्यों? किससे? मैं तुझे किससे बचाऊँगा?"
विक्रांत ने इरा की तरफ़ देखा।
इरा ने अपनी नज़र नीचे कर ली थी। अपनी चाय की केतली पर, जिसमें से अब भी भाप उठ रही थी। उसका चेहरा शांत था, पर उसकी उँगलियाँ केतली के हत्थे पर इतनी कसी हुई थीं कि उनके जोड़ सफ़ेद पड़ गए थे।
यह एक पल था। बस एक। फिर उसने ऊपर देखा, और उसकी आँखों में वही सावधान, थकी हुई चिंता थी, जो पिछले कई दिनों से थी।
विक्रांत ने उस पल को उस ढेर में रखा।
"किताब में एक बात लिखी थी," इरा ने कहा। "मैंने उसे पढ़ा था, पर उस रात ज़ोर से नहीं पढ़ा। नियमों के बाद। एक छोटी पंक्ति।" उसने अपनी आँखें बंद कीं, याद करते हुए। “'सदाई झूठ नहीं बोलता। उसके पास अपनी कोई ज़ुबान नहीं, तो अपना कोई झूठ भी नहीं। पर वो सच भी पूरा नहीं बोलता। वो सच के टुकड़े देता है, ऐसे जोड़कर कि तुम ख़ुद झूठ बना लो।'”
"तो ये सच है?" कबीर ने अपनी हथेली उठाई। "कि मुझे इसे नहीं बचाना चाहिए?"
"या ये सच का एक टुकड़ा है," इरा ने कहा, "जिसका बाकी हिस्सा हमें नहीं पता।"
रघु काका ने रस्सी लपेटी और उसे एक कोने में रख दिया। उसने कुछ नहीं कहा। उसने विक्रांत की तरफ़ नहीं देखा।
विक्रांत उस दिन दोपहर तक अपने laptop के सामने बैठा रहा, बिना कुछ किए।
उसके दिमाग़ में चीज़ें एक-दूसरे पर चढ़ रही थीं, और पहली बार, उसकी professional आदत उन्हें अलग नहीं कर पा रही थी। उसने एक काग़ज़ लिया, और लिखना शुरू किया। जैसे किसी case file में लिखता।
१. ज़ंजीर। कल रात। कबीर का पैर उस पर पड़ा, कड़ी पत्थर पर खिसकी। कबीर एक पल के लिए रुका।
२. बावड़ी पर। मेरा हाथ फिसला, ज़ंजीर जाली से टकराई। नीचे की आवाज़ बीच शब्द में रुकी।
३. रिसाले के हाशिए पर, किसी और के हाथ में: 'लोहा नहीं, लोहे की आवाज़।'
४. मंदिर की घंटी। उतारी गई, 1971 में। उसका लटकन निकाला गया। फिर उसे बावड़ी के पहले तल पर फेंक दिया गया।
५. पाँचवीं साँस, मेरे तकिए के पास। मेरी मुट्ठी में कील थी। फ़र्क नहीं पड़ा।
उसने सूची को देखा। फिर पाँचवें बिंदु को। फिर पहले चार को।
लोहा उसे नहीं रोकता।
लोहे की आवाज़ रोकती है।
तो फिर गाँव ने घंटी क्यों उतारी? अगर उसकी आवाज़ उसे रोकती थी, तो उसे मंदिर में लटकाए रखना चाहिए था, हर रात बजाना चाहिए था। उसका लटकन निकालकर, उसे चुप करके, उसे ठीक उसी जगह फेंकना जहाँ वह रहता है, इसका क्या मतलब था?
यह pattern में नहीं बैठता था। और जो चीज़ pattern में नहीं बैठती, विक्रांत ने सालों पहले सीखा था, वही असली सच का दरवाज़ा होती है।
रामदुलारी अपने घर के आँगन में बैठी थी, धूप के एक कमज़ोर, पीले टुकड़े में, जो कोहरे को चीरकर आ रहा था। उसकी गोद में एक सूप था, और वह उसमें चावल फटक रही थी, अपनी एक अच्छी आँख से कंकड़ चुनती हुई।
उसने विक्रांत को देखा और उसकी पोपली मुस्कान खिल गई।
"आ गया ओमप्रकाश का लड़का!" उसने ज़ोर से कहा। "बैठ, बैठ। नूर से मिलकर आया था न? कैसी लगी?"
विक्रांत उसके पास बैठ गया, एक पीढ़े पर। उसने इरा को साथ नहीं लाया था। वह ख़ुद नहीं जानता था क्यों। शायद इसलिए कि सुबह की उस केतली वाली पकड़ उसके दिमाग़ में अब भी थी।
"बुआ," उसने कहा, ज़ोर से, ताकि वह सुन सके। "मंदिर की घंटी के बारे में पूछना था।"
रामदुलारी का हाथ सूप पर रुक गया।
"घंटी?"
"जो इकहत्तर में उतारी गई। क्यों उतारी?"
बूढ़ी ने उसे देखा, अपनी एक अच्छी आँख से, बहुत देर तक। फिर उसने सूप नीचे रखा।
"तुझे पता है न," उसने कहा, और उसकी आवाज़ पहली बार थोड़ी धीमी हुई, "कि मुझे कोई पुकारे, मैं सुनूँगी ही नहीं? इसलिए मैं बता देती हूँ। बाकी कोई नहीं बताएगा।"
"हाँ, बुआ।"
उसने अपने हाथ अपनी गोद में बाँधे।
"बारात वाली रात के बाद," उसने कहा, "गाँव में बहुत डर था। ग्यारह आदमी, एक बच्चा। एक रात में। लोग घरों से नहीं निकलते थे। रात को बच्चे रोते, तो माँएँ उनका मुँह दबा देतीं।"
"मंदिर में तब जगन्नाथ पंडित थे। बड़े ज्ञानी। उन्होंने कहा, घंटी बजाओ। रात भर। घंटी की आवाज़ में बुरी चीज़ें नहीं टिकतीं। तो उन्होंने बजाई। हर रात। अपने हाथ से। कभी उनका बेटा, कभी गाँव का कोई जवान। बारी-बारी। रात भर। टन्न। टन्न। टन्न।"
उसने अपना हाथ हवा में हिलाया, एक घंटी बजाने की तरह।
"और सच में, बेटा, कुछ नहीं हुआ। सात रातें। कोई आवाज़ नहीं आई। कोई नहीं गया। लोगों को लगा, बस, ख़त्म। पंडित जी की बात सच थी।"
वह रुकी।
"आठवीं रात, पंडित जी को बुख़ार था। बहुत तेज़। उन्होंने अपने बेटे से कहा, आज रात रहने दे, सात रातें हो गईं, अब ठीक है। और सब सो गए।"
"फिर?"
"फिर रात तीन बजे," रामदुलारी ने कहा, "घंटी बजी।"
विक्रांत की त्वचा पर बाल खड़े हो गए।
"मंदिर ख़ाली था। ताला लगा था। पंडित जी अपने घर में बुख़ार में पड़े थे। उनका बेटा उनके पास। पर घंटी बजी। टन्न। टन्न। टन्न। ठीक वैसे ही, जैसे सात रातों से बज रही थी। उसी लय में। उसी ताक़त से।" उसकी आवाज़ और धीमी हुई। "मैंने ख़ुद सुनी। तब मेरे कान ठीक थे।"
"और लोग?"
"लोग निकले।" रामदुलारी ने कहा। "आधी नींद में। सोचा, पंडित जी ठीक हो गए होंगे, फिर से बजा रहे हैं। कुछ आरती के लिए गए, कुछ बस देखने। घंटी की आवाज़ के पीछे-पीछे, अंधेरे में।"
"और मंदिर के रास्ते में, कोठी वाले मोड़ पर, आवाज़ें आईं।"
उसने अपना सिर हिलाया, धीरे-धीरे।
"दो गए। हरिया लोहार और उसका भतीजा। सुबह उनकी चप्पलें मिलीं, बावड़ी वाली गली में।"
विक्रांत ने अपनी आँखें बंद कर लीं।
"अगले दिन," रामदुलारी ने कहा, "पंडित जी बुख़ार में ही उठे। सीढ़ी लगाई, मंदिर पर चढ़े। अपने हाथ से घंटी का लटकन निकाला। फिर घंटी उतारी, अपनी पीठ पर लादी, और सीधे बावड़ी पर ले गए। गाँव के सब लोग पीछे-पीछे। और उन्होंने उसे अंदर फेंक दिया।"
"क्यों? अगर वो उसे रोकती थी..."
"मैंने भी यही पूछा था।" रामदुलारी ने कहा। "पंडित जी से। उस दिन। वो पसीने में भीगे थे, आँखें लाल। और उन्होंने मुझसे कहा..."
वह रुकी, जैसे शब्दों को ठीक से याद कर रही हो।
"उन्होंने कहा, 'बेटी, सात रातों तक हमने उसे घंटी सुनाई। और उसने सीख ली।'"
विक्रांत कोठी लौटा, और सीधा पीछे की कोठरी में गया।
वह छोटा, कच्चा, खिड़की-रहित कमरा जहाँ उसने पहली बार चौंतीस मीटर की गूँज नापी थी। जहाँ उसकी आवाज़ ने एक सौ नौ गिने थे।
उसने अपना सामान लगाया। Speaker, recorder, laptop। और एक छोटा थैला, जिसमें रघु काका की मुट्ठी भर कीलें थीं, और दो लोहे की छड़ें, जो उसे गौशाला में मिली थीं।
उसे जाँचना था। अपनी आँखों से नहीं, अपनी उम्मीदों से नहीं। Data से।
पहले, बिना कुछ बदले, एक impulse response। लकड़ी की चटाक।
Laptop पर: वही। सीधी आवाज़ की चोटी। चौंतीस मीटर नीचे से लौटती गूँज, एक सौ अट्ठानवे milliseconds पर। और सीधी आवाज़ से साठ milliseconds पहले, वह छोटी, असंभव चोटी।
उलटी गूँज।
फिर उसने कीलें बिखेरीं। कमरे के चारों तरफ़। Recorder के चारों तरफ़ एक घेरे में। Speaker के चारों तरफ़। दरवाज़े पर। फ़र्श पर, एक लकीर में, कोने से कोने तक।
चटाक।
वही। एक सौ अट्ठानवे milliseconds। साठ milliseconds पहले। बिल्कुल वही, जैसे कीलें वहाँ थीं ही नहीं।
उसने लोहे की छड़ें उठाईं, उन्हें recorder के mics के ठीक बगल में रखा, उन्हें छूती हुईं।
चटाक।
वही।
उसने infrasound नापा। उन्नीस hertz। बारह लहरें प्रति मिनट। लोहे के बीच में, लोहे के ऊपर, लोहे से घिरा हुआ। वही। साँस लेता हुआ। अछूता।
लोहा कुछ नहीं कर रहा था।
रघु काका के पचपन साल, उसकी हर कील, हर ज़ंजीर, हर ठोकी हुई चौखट। कुछ नहीं।
विक्रांत ने एक गहरी साँस ली, और अगला test किया।
उसने दोनों लोहे की छड़ें उठाईं, और उन्हें आपस में टकराया।
टन्न्न्न्न्।
एक तीखी, धात्विक, लंबी आवाज़। लोहे पर लोहा। वह कमरे में भरी, कच्ची दीवारों से टकराई, और गूँजी, देर तक, धीरे-धीरे मरती हुई।
Laptop पर: वह आवाज़। उसकी गूँज। और उसके बाद...
उसने ठीक से देखा।
उस आवाज़ के गूँजते रहने तक, लगभग चार सेकंड, चौंतीस मीटर वाली गूँज नहीं थी। उसकी जगह ख़ाली थी। और उलटी गूँज, साठ milliseconds पहले वाली छोटी चोटी, वह भी नहीं थी। जैसे लोहे की टनटनाहट ने उस जगह को भर दिया हो, पूरी तरह, जिसमें वह चीज़ रहती थी। जैसे किसी कमरे में इतना शोर हो कि कोई फुसफुसाहट नहीं सुनी जा सकती।
विक्रांत का दिल तेज़ धड़का। लोहे की आवाज़।
उसने फिर से टकराया। टन्न्न्न्। फिर से वही। चार सेकंड की ख़ाली जगह।
फिर से। फिर से।
पाँचवीं बार उसने छड़ें टकराने के लिए उठाईं, और रुक गया।
उसकी नज़र laptop पर थी। पिछली टनटनाहट के बाद की recording पर। उस ख़ामोशी पर, जब वह छड़ें उठा रहा था, अगली बार टकराने के लिए।
उस ख़ामोशी में, waveform पर, कुछ था।
एक छोटी, पतली चोटी। धुँधली, दूर की, गूँज में लिपटी।
उसने उसे zoom किया। फिर headphones लगाए, और play किया।
...टन्न्न्...
बहुत हल्की। बहुत धीमी। जैसे बहुत नीचे से आती हुई। एक धात्विक, लंबी टनटनाहट। लोहे पर लोहा।
पर उसने अभी छड़ें नहीं टकराई थीं।
उसने समय नापा। वह हल्की टनटनाहट, उसके पाँचवीं बार टकराने से ठीक साठ milliseconds पहले थी।
उलटी गूँज।
उसकी लोहे की आवाज़ की।
विक्रांत के हाथों से छड़ें छूट गईं। वे कच्चे फ़र्श पर गिरीं, एक भारी, धप्प आवाज़ के साथ, बिना किसी टनटनाहट के।
उसने laptop पर, recording पर, वह पल फिर से देखा। और फिर से। और पता था, उसे पता था, बिना किसी शक के, बिना किसी तर्क के।
चार बार। उसने चार बार उसे वह आवाज़ सुनाई थी। और पाँचवीं बार तक, वह उसे पहले से जानता था।
सात रातों तक हमने उसे घंटी सुनाई। और उसने सीख ली।
इरा ने उसे वहीं पाया। एक घंटे बाद।
वह कोठरी के कच्चे फ़र्श पर बैठा था, पीठ दीवार से टिकाए, घुटने छाती से लगाए, उसके चारों तरफ़ रघु काका की कीलें बिखरी हुईं, जैसे किसी बच्चे के खिलौने। Laptop उसके बगल में खुला था, screen बुझ चुकी थी। लोहे की छड़ें उसके पैरों के पास पड़ी थीं।
उसकी आँखें खुली थीं, सामने की दीवार पर टिकी हुईं।
इरा ने उसे देखा, और फिर, बिना कुछ कहे, उसके पास आकर बैठ गई। फ़र्श पर। उसके बगल में।
"मैंने उसे सिखा दिया," विक्रांत ने कहा। उसकी आवाज़ सपाट थी, किसी और की। "एक घंटे में। उसकी अकेली कमज़ोरी, जो हमें पता थी, जो इस पूरे गाँव को पचपन साल में पता चली, वो मैंने एक घंटे में उसे सिखा दी।"
"विक्रांत..."
"मैं इसीलिए आया था, इरा।" उसने हँसने जैसी आवाज़ निकाली। “Source ढूँढने। Data से। Physics से। हर चीज़ नापने, हर चीज़ समझने। मुझे लगता था कि अगर मैं इसे समझ लूँ, अगर मैं इसका pattern पकड़ लूँ, तो मैं इससे बच सकता हूँ। इससे लड़ सकता हूँ।”
उसने अपनी हथेलियाँ देखीं।
"हर बार जब मैं इसे नापता हूँ, ये मुझे नापता है। हर बार जब मैं इसे कुछ सुनाता हूँ, ये उसे सीखता है। मेरे recorders, मेरे mics, मेरे tests, सब कुछ जो मैं इसे समझने के लिए करता हूँ, वो इसे और बड़ा बनाते हैं।" उसकी आवाज़ टूटी। "मेरी आवाज़ इसके पास है। मेरी गिनती। मेरी चीख। अब मेरा लोहा भी।"
इरा कुछ नहीं बोली।
"मेरे पास कुछ नहीं बचा," विक्रांत ने फुसफुसाया। "कोई तर्क नहीं। कोई explanation नहीं। कोई नियम नहीं जिस पर भरोसा किया जा सके। लोहा काम नहीं करता। लोहे की आवाज़ बस तब तक करती है जब तक वो उसे सीख न ले। और फिर वो भी उसकी हो जाती है।"
उसने अपनी आँखें बंद कीं।
"मैं विज्ञान पर इसलिए भरोसा करता था, क्योंकि वो कभी नहीं बदलता। Physics कभी नहीं सीखती। गूँज कभी आवाज़ से पहले नहीं आती। वो नियम हैं। हमेशा।" उसने सिर हिलाया। "पर यहाँ नहीं।"
उसकी आँखों से एक आँसू निकला, उसके गाल पर बहा। वह उसे पोंछना भूल गया।
इरा ने अपना हाथ बढ़ाया, और उसका हाथ पकड़ लिया।
नियम दो। छुओ।
उसकी हथेली गर्म थी। सूखी। ज़िंदा। विक्रांत ने उसे महसूस किया, उसकी उँगलियों का दबाव, और एक पल के लिए, बस एक पल के लिए, सब कुछ थोड़ा रुक गया।
वे बहुत देर तक ऐसे ही बैठे रहे। उस कच्ची कोठरी में, कीलों से घिरे, चौंतीस मीटर ऊपर एक गहरे, साँस लेते अंधेरे के।
"विक्रांत," इरा ने आख़िरकार कहा, बहुत धीमे। "मैं आपसे कुछ पूछूँ?"
"हम्म।"
"अगर आपको कभी पता चले," उसने कहा, अपनी नज़र उनके जुड़े हाथों पर रखते हुए, "कि आप वो नहीं हैं जो आप ख़ुद को समझते आए हैं। कि आपकी कहानी, जो आप ख़ुद को सालों से सुनाते आए हैं, उसमें कुछ गलत है। तो आप क्या करेंगे?"
विक्रांत ने उसकी तरफ़ देखा।
इरा की आँखें उसके हाथ पर थीं, उसकी बाईं हथेली पर, जिसे वह थामे हुई थी। उसका अँगूठा धीरे-धीरे उसके अँगूठे के जोड़ पर फिर रहा था। उस जगह पर, जहाँ हर left-handed इंसान की खाल pen पकड़ने से थोड़ी सख़्त हो जाती है।
"आप ऐसा क्यों पूछ रही हैं?"
इरा ने उसका हाथ छोड़ दिया।
"कुछ नहीं," उसने कहा, और उठ गई। "बस... एक सवाल था। Archivist हूँ। हम हर कहानी पर सवाल करते हैं।"
वह दरवाज़े तक गई, फिर रुकी, पीठ उसकी तरफ़।
"खाना बन गया है," उसने कहा। "रघु काका बुला रहे हैं।"
वह चली गई।
विक्रांत ने अपने हाथ को देखा, जो अभी-अभी उसकी गर्म हथेली में था, और अब ठंडा, अकेला, कच्ची कोठरी की हवा में पड़ा था।
उसने उस सवाल को उस ढेर में रखा। और उसने देखा कि वह ढेर अब इतना ऊँचा हो चुका था कि उसकी चोटी किसी अंधेरे में गायब हो रही थी।
उस रात कोई ताश नहीं खेला गया।
अँगीठी वाले कमरे में, चारों गद्दों पर लेटे थे, पर कोई सो नहीं रहा था। Lamps जल रही थीं। लालटेन की लौ सीधी थी। रघु काका ने कबीर के टखने को फिर से अपनी कलाई से बाँधा था, बिना किसी के कहे, और कबीर ने अपना बायाँ हाथ, जिस पर वे अक्षर खुदे थे, एक कपड़े में लपेट रखा था।
विक्रांत ने किसी को नहीं बताया था कि उसने कोठरी में क्या पाया। लोहे के बारे में। लोहे की आवाज़ के बारे में।
वह रघु काका को देख रहा था। बूढ़ा अपने गद्दे पर बैठा था, दीवार से टिका, उसकी मुट्ठी में कील, उसकी आँखें दरवाज़े पर। पचपन साल का भरोसा, उसकी उँगलियों में दबा हुआ।
विक्रांत ने उसे नहीं तोड़ा। वह नहीं कर सका।
ग्यारह बजे के आसपास, सबसे पहले इरा ने सुना। उसका सिर उठा। फिर रघु काका का।
विक्रांत ने उसे सबसे आख़िर में सुना, और यह अपने आप में अजीब था, क्योंकि उसके कान हमेशा सबसे पहले सुनते थे।
एक बहुत हल्की, बहुत बारीक आवाज़। लकड़ी में से। एक धीमी, लगातार, कराहती चरमराहट, जैसे कोई चीज़ बहुत धीरे, बहुत ताक़त से, किसी कसी हुई जगह से बाहर खिसक रही हो।
दरवाज़े से।
सबने दरवाज़े की तरफ़ देखा।
Lamp की रोशनी उस पर पड़ रही थी। उसका लकड़ी का पल्ला, उसकी चौखट, और उन पर रघु काका की कीलें, काली, मोटी, दर्जनों, ऊपर से नीचे तक।
एक कील हिल रही थी।
ऊपर वाली, चौखट के बाएँ कोने में। उसका सिर, जो लकड़ी में बराबर ठुका था, धीरे-धीरे बाहर निकल रहा था। एक मिलीमीटर। फिर दो। घूमता हुआ, बहुत धीरे, जैसे कोई उसे पीछे से, लकड़ी के अंदर से, अपनी उँगलियों से, बाहर की तरफ़ धकेल रहा हो। चरमराहट उसी से आ रही थी। लकड़ी के रेशों का कील के लोहे पर घिसना।
कील बाहर आई। आधी। फिर पूरी। एक पल हवा में, अपनी जगह पर, जैसे सोच रही हो।
फिर गिरी।
टक।
फ़र्श पर। लकड़ी पर लोहे की एक छोटी, साफ़ आवाज़।
किसी ने साँस नहीं ली।
दूसरी कील हिलने लगी। उसके ठीक नीचे वाली।
चरमराहट। धीमी, धैर्य से। घूमती हुई, बाहर खिसकती हुई।
टक।
तीसरी।
रघु काका अपने गद्दे पर बैठा था, और उसकी मुट्ठी, जिसमें उसकी कील थी, धीरे-धीरे खुल रही थी। उसकी उँगलियाँ अपने आप ढीली पड़ रही थीं, जैसे उनमें से ताक़त निकल रही हो। उसकी आँखें दरवाज़े पर थीं, और उनमें विक्रांत ने वह देखा जो उसने पिछले दो हफ़्तों में कभी नहीं देखा था, न उस रात जब इरा ने नाम पढ़ा, न उस सुबह जब उसने FIR देखी।
एक बूढ़े आदमी का, पचपन साल पुराना भरोसा, एक-एक कील करके, उसकी आँखों के सामने बाहर निकलता हुआ।
टक।
टक।
वे एक-एक करके गिरती रहीं। ऊपर से नीचे। बाएँ से दाएँ। पल्ले पर से, चौखट पर से। बिना किसी जल्दी के। हर कील अपनी बारी का इंतज़ार करती हुई, धीरे-धीरे घूमती हुई, लकड़ी से बाहर आती हुई, और गिरती हुई।
जैसे कोई दरवाज़े के उस पार खड़ा हो। बहुत धैर्य से। और अपनी उँगलियों से, एक-एक करके, वे सब चीज़ें बाहर धकेल रहा हो जो उन्होंने उसे रोकने के लिए लगाई थीं।
उन्हें यह दिखाने के लिए नहीं कि वे बेकार हैं।
बल्कि यह दिखाने के लिए कि वह जानता है कि वे वहाँ थीं।
[Part 18 समाप्त]
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- जवाब मत देना
- Chapter
- 18 of 30
- Category
- Ghost Stories
- Reading time
- 16 min
- Words
- 3021
- Language
- Hindi (हिंदी)
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