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Part 17: कबीर

Piyashi Atma · Ghost Stories · 16 मिनट

विक्रांत ने laptop बंद किया, और कुछ देर तक अपने तकिए के बगल वाली जगह को देखता रहा।

फ़र्श। लकड़ी के तख़्ते, गद्दे का किनारा, उस पर ऊन का एक धागा जो उसकी रज़ाई से निकला था। सूखा। ख़ाली। सुबह की सलेटी रोशनी में बिल्कुल साधारण।

वहाँ कुछ था। पूरी रात। उससे एक फ़ुट दूर। उसके चेहरे की तरफ़ मुँह किए। उसकी साँस से आधा सेकंड पहले साँस लेता हुआ।

और उसकी मुट्ठी में, पूरी रात, रघु काका की कील थी।

उसने अपना हाथ खोला। कील वहीं थी, उसकी हथेली पर, पसीने से गीली, उसकी लाल, दबी हुई खाल पर अपना निशान छोड़ती हुई। उसने उसे रात भर इतनी कसकर पकड़ा था कि उसकी उँगलियाँ अकड़ गई थीं।

और फिर भी वह आया था। उसके इतने पास।

लोहा नहीं। लोहे की आवाज़।

उसने कील को देखा। एक बेजान, ठंडा, काला टुकड़ा।

"पाँच साँसें?" इरा ने दोहराया।

दोपहर थी। वे रसोई में थे, चारों, दीवार पर टँगी उस नियमों की सूची के नीचे। विक्रांत ने उन्हें बताया था। Recording, spectral separation, पाँचवीं लकीर। उसकी दिशा। उसके तकिए के पास।

उसने यह नहीं बताया कि वह साँस उसकी साँस के आगे चल रही थी। उसने इस बात को अपनी जेब में रखा, उस पत्थर के साथ, जिसे वह छूता रहता था पर रोशनी में नहीं निकालता था।

"कमरे में," कबीर ने कहा। उसकी आवाज़ में वह पुरानी झुँझलाहट नहीं थी। बस एक थकी हुई, खोखली ठंडक। "हमारे साथ। पूरी रात।"

"हाँ।"

"ज़ंजीर के बावजूद। कीलों के बावजूद।"

"हाँ।"

रघु काका ने अपना सिर हिलाया, धीरे-धीरे, अपनी नज़र अपने हाथों पर। "लोहा उसे पास नहीं आने देता," उसने कहा। पर उसकी आवाज़ में वह पचपन साल का भरोसा नहीं था। उसमें एक दरार थी। "पचपन साल से..."

"शायद उसे अंदर आने की ज़रूरत नहीं थी," इरा ने धीरे से कहा। "शायद वो पहले से अंदर था। जब हमने ज़ंजीर लगाई।"

किसी ने इसका जवाब नहीं दिया।

"आज रात आप बीच में सोइए," इरा ने विक्रांत से कहा। "हम तीनों के बीच। ताकि कोई जगह ख़ाली न रहे।"

विक्रांत ने सिर हिलाया। उसने नहीं कहा कि उसे नहीं लगता इससे कोई फ़र्क पड़ेगा।

पाँचवीं रात, उसका पहरा दो से चार बजे का था।

उसने अपनी जगह बदली थी। अब उसका गद्दा बाकी तीनों के बीच में था। बाईं तरफ़ इरा, दाईं तरफ़ कबीर, पैरों की तरफ़ रघु काका। उसके तकिए के दोनों तरफ़ कोई ख़ाली फ़र्श नहीं था।

वह अपने गद्दे पर बैठा था, पीठ एक तकिए से टिकाए, घुटने मोड़े। Lamps जल रही थीं। लालटेन की लौ सीधी थी। उसकी मुट्ठी में कील थी, और उसकी गोद में recorder, ताकि वह उसकी लाल बत्ती देख सके।

कमरे में तीन साँसें। उसने उन्हें सुना, अलग-अलग, जैसे अब उसके कान अपने आप करते थे। इरा की हल्की। रघु काका की घरघराती। कबीर की, गहरी, धीमी।

और फिर, ढाई बजे के आसपास, कबीर की साँस बदली।

तेज़ हुई। फिर रुकी। फिर बहुत गहरी, जैसे कोई डुबकी लेने से पहले लेता है।

कबीर उठ बैठा।

विक्रांत ने उसे देखा। उसकी आँखें खुली थीं, पर उनमें कुछ नहीं था। Lamp की रोशनी उन पर पड़ रही थी, और वे उसे लौटा रही थीं, बिना पलक झपकाए, जैसे काँच की गोलियाँ। उसका चेहरा शांत था। बिल्कुल शांत। वैसा शांत जैसा कबीर का चेहरा कभी नहीं होता था, न जागते हुए, न सोते हुए।

उसने अपनी रज़ाई हटाई। धीरे से। उठा। खड़ा हुआ।

उसकी मुट्ठी खुली। कील उसके हाथ से छूटकर गद्दे पर गिरी, बिना आवाज़ के।

विक्रांत का पहला instinct उसका नाम पुकारने का था। कबीर! वह उसके होंठों तक आया, पूरा, तैयार।

उसने अपने दाँत भींच लिए। नियम तीन। अंधेरे में किसी को नाम लेकर मत बुलाना।

कबीर दरवाज़े की तरफ़ चला। सीधा, बिना किसी रुकावट के, जैसे कोई उसे खींच रहा हो। उसके नंगे पैर फ़र्श पर कोई आवाज़ नहीं कर रहे थे।

दहलीज़ पर ज़ंजीर थी। भारी, जंग लगी, कोने से कोने तक। कबीर ने उसे देखा नहीं। उसका पैर उस पर पड़ा, उसके ऊपर से गुज़रा, और ज़ंजीर की एक कड़ी उसकी एड़ी से टकराकर पत्थर की दहलीज़ पर खिसकी।

खन्न्।

एक तीखी, धात्विक आवाज़। लोहे पर पत्थर।

कबीर एक पल के लिए रुका। जैसे किसी ने उसे धक्का दिया हो, हल्का-सा। उसका सिर थोड़ा हिला।

फिर वह आगे बढ़ गया।

ज़ंजीर ने उसे नहीं रोका था। वह एक इंसान था, और लोहा उसके लिए बस लोहा था। रघु काका की कीलें, उसकी ज़ंजीरें, उसकी दहलीज़ें, सब कुछ जो उन्होंने बाहर की चीज़ को अंदर आने से रोकने के लिए लगाया था, अंदर की चीज़ को बाहर जाने से रोकने के लिए कुछ नहीं था।

उसने दरवाज़े की कुंडी खोली, और गलियारे के अंधेरे में चला गया।

विक्रांत उसके पीछे गया।

उसने किसी को नहीं जगाया। जगाने के लिए उसे या तो बोलना पड़ता, या उन्हें झकझोरना पड़ता, और कबीर तब तक अंधेरे में गायब हो जाता। उसने बस recorder उठाया, torch, और अपनी कील, और ज़ंजीर के ऊपर से, सावधानी से, बिना उसे छुए, बाहर निकला।

गलियारा अंधेरा था। उसने torch नहीं जलाई। उसने कबीर की आहट सुनी, बहुत धीमी, गलियारे के अंत की तरफ़। पीछे के दरवाज़े की तरफ़।

वह उसके पीछे चला, दीवार के साथ-साथ, अपनी उँगलियाँ ठंडे plaster पर टिकाए। उसके कदम उसके दिमाग़ में अपने आप गिने जाने की कोशिश कर रहे थे, और वह उन्हें बार-बार धकेल रहा था। नहीं। नहीं। नहीं।

पीछे का दरवाज़ा खुला था। कोहरा उसमें से अंदर बह रहा था, ज़मीन के साथ, ठंडा, सफ़ेद, गलियारे के पत्थर पर फैलता हुआ।

विक्रांत ने बाहर झाँका।

आँगन में कोहरा कमर तक था। उसके ऊपर, धुँधली, सलेटी रात। और कोहरे के बीच, बावड़ी की जाली के पास, एक आकृति। घुटनों के बल। कबीर।

वह जाली के सामने बैठा था, अपने हाथ उसकी सलाखों पर रखे, अपना चेहरा उनके बीच की जगह पर झुकाए, जैसे किसी जेल की खिड़की से अंदर झाँक रहा हो।

विक्रांत ने उसके पास जाना शुरू किया। धीरे। फिर रुका।

नीचे से एक आवाज़ आ रही थी।

एक औरत की। बीमार, कमज़ोर, गले में खरखराहट। जैसे किसी को बहुत दिनों से बुख़ार हो, और बोलने में भी ताक़त लगती हो। बावड़ी की गहराई से ऊपर आती, गूँज में लिपटी, ढाई सेकंड की।

"बेटा... बेटा, एक गिलास पानी दे दे... बहुत प्यास लगी है..."

कबीर का सिर हिला। जाली की सलाखों पर उसकी उँगलियाँ कस गईं।

"ला रहा हूँ, मम्मी," उसने कहा।

उसकी आवाज़ में कोई नींद नहीं थी। वह साफ़ थी, कोमल, एक पंद्रह साल के लड़के जैसी, जो आधी रात को उठकर अपनी बीमार माँ के लिए पानी लाने जा रहा हो। प्यार से भरी।

विक्रांत का दिल उसके गले में आ गया।

जवाब। कबीर ने जवाब दिया था। नियम एक। दो लकीरों वाला।

वह आगे झपटा, फिर रुका। कबीर वहीं था। जाली के पास। ठोस। जगह पर। कुछ नहीं हुआ था। उसे कोई नहीं ले गया था।

विक्रांत ने साँस रोककर सोचा। उसका दिमाग़ तेज़ी से चल रहा था। बेटा। उस आवाज़ ने उसे बेटा कहा था। उसका नाम नहीं लिया था। कबीर नहीं कहा था।

सदाई सिर्फ़ उसी को ले सकता है जो उसे जवाब दे। जवाब, नाम पर। उसके अपने नाम पर।

यह उसे फुसला रहा था। तैयार कर रहा था। हर रात। तीन महीने से। बेटा, पानी। ला रहा हूँ, मम्मी। ताकि जिस रात वह उसका नाम ले, वह बिना सोचे जवाब दे। आदत से। प्यार से।

नीचे से आवाज़ फिर आई। इस बार थोड़ी पास। थोड़ी साफ़।

“...जल्दी कर, बेटा... नीचे आ जा... यहाँ ठंड है...”

कबीर का एक पैर उठा। उसके घुटने से जाली की तरफ़ सरका। उसके हाथ सलाखों को खींचने लगे, जैसे वह उन्हें खोलना चाहता हो, जबकि उसे पता था, उसके शरीर को पता था, कि उन पर पत्थर की पटिया है, चार बोल्ट हैं, रघु काका की कीलें हैं।

विक्रांत उसके पास पहुँचा।

उसने उसका नाम नहीं लिया। उसने अपना हाथ उसके कंधे पर रखा।

नियम दो। छुओ।

कबीर का कंधा बर्फ़ जैसा था। उसकी कमीज़ ओस से गीली, और उसके नीचे उसकी खाल पर एक चिपचिपी, ठंडी नमी, जैसे वह घंटों से बाहर बैठा हो, जबकि वह मुश्किल से पाँच मिनट पहले कमरे से निकला था।

कबीर ने एक झटका खाया। जैसे बिजली का करंट। उसका सिर पीछे घूमा, और उसकी आँखों में, उन काँच की गोलियों में, कुछ लौटा। धीरे-धीरे। जैसे पानी की सतह पर किसी डूबी चीज़ का ऊपर आना।

उसने विक्रांत को देखा। फिर जाली को। फिर अपने हाथों को, जो सलाखों पर थे।

"क्या..." उसकी आवाज़ फटी हुई थी, अब उसकी अपनी। “...मैं यहाँ क्या...”

और नीचे से, बहुत पास से, बावड़ी की पहली सीढ़ी से, जैसे कोई ठीक जाली के नीचे खड़ा होकर ऊपर देख रहा हो, उस औरत की आवाज़ आई। अब बीमार नहीं। अब कमज़ोर नहीं। साफ़, प्यार भरी, एक माँ की आवाज़, जो अपने बेटे को रात के खाने के लिए बुलाती है।

"कबीर?"

कबीर का मुँह खुला। उसकी आँखें अब भी आधी सपने में थीं, आधी जाग में, उलझी हुई, और उस आवाज़ की तरफ़ अपने आप मुड़ती हुई। उसके होंठ उस शब्द का आकार बना रहे थे, उस छोटे, आसान, प्यार भरे शब्द का, जो हर बेटा अपनी माँ को देता है।

"हाँ..."

विक्रांत ने अपना हाथ उसके मुँह पर दबा दिया।

पूरी ताक़त से। जैसे रघु काका ने इमरान के मुँह पर दबाया था। जैसे नूर बानो ने पचपन साल से अपने मुँह पर दबाया था। उसकी हथेली कबीर के होंठों पर, उसकी उँगलियाँ उसके गाल में गड़ी हुईं, और उसने कबीर के सिर को पीछे, अपनी छाती की तरफ़ खींचा, जाली से दूर।

कबीर छटपटाया। उसके हाथ विक्रांत की बाँह पर पड़े, उसे हटाने की कोशिश करते हुए। उसकी आँखें बड़ी थीं, अब पूरी तरह जागी हुई, और डरी हुई, और समझती हुई।

"कबीर? बेटा? जवाब दे..."

विक्रांत ने उसे और कसकर पकड़ा। उसने अपना दूसरा हाथ ज़मीन पर टिकाया, पीछे खिसकने के लिए, और उसकी उँगलियाँ किसी ठंडी, भारी चीज़ से टकराईं।

ज़ंजीर। उसका एक सिरा। रघु काका ने उसे कमरे की दहलीज़ से लेकर यहाँ तक बिछाया होगा, या शायद यह कोई दूसरी थी, जाली से बँधी। विक्रांत को नहीं पता था। उसने उसे पकड़ा, और उसका हाथ फिसला, और ज़ंजीर की कड़ियाँ पत्थर की पटिया पर, जाली के लोहे पर, ज़ोर से टकराईं।

खन्न्-खन्न्-खन्न्।

एक तीखी, लंबी, धात्विक खनखनाहट, जो आँगन में गूँजी, कोहरे में फैली।

और नीचे से आती आवाज़ रुक गई।

बीच में। एक शब्द के बीच में। जैसे किसी ने उसके मुँह पर हाथ रख दिया हो।

विक्रांत ने साँस रोककर इंतज़ार किया। एक सेकंड। दो। पाँच।

खामोशी।

ज़ंजीर की आख़िरी कड़ी की गूँज धीरे-धीरे कोहरे में मर गई।

फिर, बहुत देर बाद, बहुत दूर से, बहुत नीचे से, उस औरत की आवाज़ फिर आई। पर अब उसमें कोई प्यार नहीं था। कोई बीमारी नहीं। कुछ नहीं। बस एक सपाट, बेजान, खाली ध्वनि, जैसे किसी ने एक रिकॉर्ड को बहुत धीमी गति पर चला दिया हो।

“...कल...”

फिर कुछ नहीं।

विक्रांत ने अपना हाथ कबीर के मुँह से हटाया। कबीर उसकी छाती से टिका, हाँफता रहा, उसका पूरा शरीर काँपता हुआ, जैसे किसी को बहुत तेज़ बुख़ार हो।

विक्रांत ने अपनी दूसरी हथेली को देखा, जिसमें ज़ंजीर की कड़ी थी। फिर उस हाशिए की पंक्ति के बारे में सोचा। धुँधली। बारीक। किसी अनजान हाथ की।

लोहा नहीं। लोहे की आवाज़।

सुबह कबीर को कुछ याद नहीं था।

वह अपने गद्दे पर बैठा था, रज़ाई ओढ़े, एक कुल्हड़ चाय दोनों हाथों में थामे, जिसे उसने छुआ नहीं था। उसकी आँखों के नीचे के काले घेरे अब किसी चोट जैसे लग रहे थे।

"मुझे बस याद है कि मैं सोया था," उसने कहा। "यहाँ। फिर... तेरा हाथ। मेरे मुँह पर। और ठंड।" उसने अपनी हथेलियाँ कुल्हड़ पर कसीं। "बीच में कुछ नहीं।"

"तू बोल रहा था," विक्रांत ने कहा। "उससे। 'ला रहा हूँ, मम्मी।'"

कबीर ने आँखें बंद कर लीं।

"हर रात," उसने फुसफुसाया। "तीन महीने से। मुझे लगता था मैं गोली खाकर सो जाता हूँ। और सपने आते हैं। मम्मी, पानी माँगती हुई। और मैं सपने में पानी ले जाता हूँ।" उसने अपने पैर देखे, जो रज़ाई के नीचे से बाहर थे। विक्रांत ने भी उन्हें देखा। उसके तलवे काले थे। गीली मिट्टी। और उसमें, उँगलियों के बीच, हरे, बारीक धागे। "पता नहीं था कि मैं सच में ले जाता था।"

इरा ने विक्रांत की तरफ़ देखा। एक लंबी, सवाल भरी नज़र।

विक्रांत ने उसका मतलब समझा।

"आपको यक़ीन है?" इरा ने पूछा। "कि ये कबीर है?"

वे लाइब्रेरी में थे, अकेले। दरवाज़ा बंद। इरा ने यह सवाल बहुत धीमे पूछा था, जैसे उसे डर हो कि दीवारें सुन रही हों।

विक्रांत ने तुरंत जवाब नहीं दिया।

"वो तीन महीने से हर रात बावड़ी पर जा रहा है," इरा ने कहा। "उसे याद नहीं। उसके पैर हर सुबह गीले होते होंगे, और उसने कभी ध्यान नहीं दिया, या उसने ध्यान दिया और ख़ुद को समझा लिया। उसने कल रात जवाब दिया। आपने ख़ुद सुना।"

“'बेटा' पर। उसके नाम पर नहीं।”

"हम ये कैसे जानें? कि ये पहली रात थी जब आप वहाँ थे, पर पिछली नब्बे रातों में से किसी एक में उसने उसका नाम नहीं सुना, और जवाब नहीं दिया?" इरा की आवाज़ काँपी। "रघु काका ने कहा था। जो बचकर निकलता है, वो पूरा वही नहीं निकलता।"

विक्रांत ने उसकी तरफ़ देखा। उसके अंदर कुछ ठंडा और कड़ा था। वह इरा की बात को खारिज़ करना चाहता था। पर वह नहीं कर पाया, क्योंकि यही बात उसके दिमाग़ में भी घूम रही थी, सुबह से।

"तो कैसे पता करें?" उसने पूछा।

उसने कबीर से अकेले में बात की। छत पर। दोपहर की उस फीकी रोशनी में।

उसने सीधे नहीं पूछा। उसने बचपन की बातें कीं। चाचा-चाची की। Lucknow के उस पुराने घर की, जहाँ कबीर बड़ा हुआ था।

"तुझे वो गर्मी याद है?" विक्रांत ने पूछा। "जब मैं तुम्हारे यहाँ आया था, छुट्टियों में? कॉलेज से पहले? तू ग्यारहवीं में था?"

"हाँ।" कबीर ने मुंडेर पर हाथ टिकाए। "तूने हमारी छत पर बैठकर पूरी रात radio पर cricket सुना था। India-Pakistan। और जब India हारी, तो तूने radio नीचे फेंक दिया था। गली में। चाचाजी ने बहुत डाँटा था।"

विक्रांत ने सिर हिलाया। सही था। हर detail।

"और वो कुत्ता?" उसने पूछा। "तुम्हारे घर के पास वाला?"

"मोती।" कबीर हल्का-सा मुस्कुराया। "उसने तुझे काटा था। बाएँ टखने पर। तुझे इंजेक्शन लगे थे, पेट में, चौदह।" उसने विक्रांत की तरफ़ देखा। "तू रोया था। पहली बार मैंने तुझे रोते देखा था।"

सही था। सब सही।

विक्रांत ने राहत की एक साँस छोड़ी।

उसने रघु काका को बताया। शाम को। अँगीठी के पास।

"उसे सब याद है," उसने कहा। "वो चीज़ें जो सिर्फ़ कबीर को पता होंगी। Lucknow की। हमारे बचपन की। Detail के साथ।"

रघु काका ने आग में एक लकड़ी डाली।

"मुझे भी याद था," उसने कहा। बहुत धीमे।

विक्रांत ने उसकी तरफ़ देखा।

"भैया की लड़की। दूसरे गाँव वाली। पेड़ के नीचे दबी कंचों की डिबिया।" बूढ़े ने कहा, बिना उसकी तरफ़ देखे, अब भी अपनी नज़र उससे बचाता हुआ, जैसे उस रात के बाद से कर रहा था। "नाम के साथ यादें भी आती हैं, बाबू। मैंने आपको बताया था।" उसने अपनी हथेलियाँ आग पर फैलाईं। "याद से कुछ पता नहीं चलता। याद तो नाम के साथ मुफ़्त मिलती है।"

विक्रांत बहुत देर तक कुछ नहीं बोला।

उसने अपनी बाईं हथेली को देखा। उसे उस टखने की याद आई, जहाँ मोती ने काटा था। उसने अपना पैर उठाकर देखा। बायाँ टखना। वहाँ एक पुराना, सफ़ेद, धुँधला निशान था। दो छोटे गड्ढे।

और उसे इंजेक्शन याद थे। चौदह। पेट में।

पर उसे यह याद नहीं था कि वह रोया था।

उसने इसके बारे में और नहीं सोचा।

"मुझे बाँध दो," कबीर ने रात को कहा।

वे अँगीठी वाले कमरे में थे, गद्दे बिछे हुए, lamps जलती हुईं। कबीर ने रघु काका की गौशाला वाली रस्सी हाथ में ली थी, और उसे विक्रांत की तरफ़ बढ़ा रहा था।

"क्या?"

"रात को। मेरा पैर। किसी से बाँध दो। ताकि अगर मैं उठूँ, तो पता चले। ताकि मैं जा न पाऊँ।" उसकी आवाज़ में कोई नाटक नहीं था। बस एक सीधी, डरी हुई सच्चाई। "मैं नहीं चाहता कि मैं किसी रात उठूँ, और तू वहाँ न हो।"

रघु काका ने रस्सी ली। उसने उसका एक सिरा कबीर के दाएँ टखने पर बाँधा, एक कसी, सख़्त गाँठ के साथ, जैसे भैंसों के लिए बाँधी जाती है। दूसरा सिरा उसने अपनी बाईं कलाई पर बाँधा।

"अगर आप हिले," उसने कबीर से कहा, "मैं जागूँगा।"

कबीर ने सिर हिलाया। उसकी आँखें भर आई थीं।

"शुक्रिया, काका।"

रघु काका ने कुछ नहीं कहा। वह अपने गद्दे पर लेट गया, अपनी बँधी कलाई को अपनी छाती पर रखे, और आँखें बंद कर लीं।

उस रात कबीर नहीं उठा।

विक्रांत ने अपने पहरे के दौरान बार-बार उसे देखा। वह शांत सोया था, गहरी, बराबर साँसें, रस्सी उसके टखने से रघु काका की कलाई तक ढीली पड़ी हुई। एक बार उसने करवट ली, और रस्सी थोड़ी तनी, और रघु काका की आँखें तुरंत खुल गईं, अंधेरे में चमकीं, और फिर, कबीर को सोता देखकर, धीरे से बंद हो गईं।

कोई आवाज़ नहीं आई। न बाहर से, न नीचे से। न कोई माँ, न कोई पानी।

सुबह छह बजे विक्रांत ने रस्सी देखी। गाँठ वैसी ही थी। कसी, सख़्त, अछूती।

वह इरा थी जिसने सबसे पहले देखा।

कबीर उठा था, आँखें मलता हुआ, अपनी रज़ाई हटाता हुआ। उसने अपना बायाँ हाथ ऊपर उठाया, अँगड़ाई लेने के लिए।

इरा, जो उसके बगल में बैठी चाय डाल रही थी, जम गई। केतली उसके हाथ में रुक गई, चाय कुल्हड़ से बाहर छलकती हुई।

"कबीर," उसने कहा, फिर अपने ही शब्द पर रुक गई। दिन था। सुबह। रोशनी। पर उसने फिर भी अपना मुँह बंद कर लिया, और बस उसकी कलाई की तरफ़ इशारा किया।

कबीर ने अपना हाथ देखा।

उसकी बाईं हथेली पर कुछ लिखा था। नीली स्याही में। Ball-pen की। अक्षर उसकी खाल पर दबाकर लिखे गए थे, इतने ज़ोर से कि कुछ जगहों पर खाल छिल गई थी, और स्याही उसमें घुसकर गहरी, नीली-काली हो गई थी।

विक्रांत ने उसे देखा, और उसकी रीढ़ में कुछ ठंडा, बहुत धीरे, ऊपर से नीचे उतरा।

वह लिखावट कबीर की थी। विक्रांत उसे जानता था। उसने उसे सैकड़ों बार देखा था। जन्मदिन के cards पर, जो कबीर हर साल भेजता था, बचपन में। उस sale agreement के margin पर, जहाँ उसने पीली flags लगाई थीं। दाईं तरफ़ झुकी हुई, मोटी, जल्दबाज़, हर "क" के ऊपर एक छोटा-सा घुमाव जो कबीर बचपन से बनाता था।

कबीर दाहिने हाथ से लिखता था।

और उसकी बाईं हथेली पर, उसकी अपनी लिखावट में, उसके अपने हाथ से लिखे गए, चार शब्द थे।

कबीर ने उन्हें पढ़ा। उसके होंठ हिले, बिना आवाज़ के। फिर उसने अपना सिर उठाया, और विक्रांत की तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में एक ऐसा डर था जो विक्रांत ने उसमें पहले कभी नहीं देखा था। अपने लिए डर नहीं।

विक्रांत के लिए।

रघु काका अपने गद्दे पर बैठा था। उसकी बाईं कलाई पर रस्सी अब भी बँधी थी। गाँठ अछूती। कबीर ने रात भर एक इंच भी नहीं हिला था।

फिर भी किसी समय, उस अँधेरे में, उस कमरे में, उन सबके बीच, जबकि रघु काका की कलाई उसके टखने से बँधी थी और विक्रांत अपने पहरे पर बैठा उसे देख रहा था, कबीर के दाहिने हाथ ने एक pen उठाया था, और अपनी बाईं हथेली पर, इतनी ज़ोर से कि ख़ून निकल आया, ये शब्द खोदे थे:

विक्रांत को मत बचाना।

[Part 17 समाप्त]

Writer
Piyashi Atma
Story
जवाब मत देना
Chapter
17 of 30
Category
Ghost Stories
Reading time
16 min
Words
3169
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

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