Pretika › Ghost Stories › जवाब मत देना

Part 16: नियमों का क़िला

Piyashi Atma · Ghost Stories · 16 मिनट

सुबह रघु काका ने विक्रांत को चाय दी, और उसकी तरफ़ नहीं देखा।

कुल्हड़ उसकी तरफ़ बढ़ाया, उसकी हथेली में रखा, और फिर मुड़ गया, अपनी नज़र अँगीठी पर, बर्तनों पर, खिड़की पर, कहीं भी, बस उसके चेहरे पर नहीं। इतने सधे हुए ढंग से कि विक्रांत को लगा कि बूढ़ा अपनी आँखों को किसी रस्सी से बाँधकर रख रहा है, ताकि वे गलती से भी उसकी तरफ़ न मुड़ें।

विक्रांत ने चाय पी। उसका स्वाद उसे नहीं आया।

जो बचकर निकलता है, वो पूरा वही नहीं निकलता।

उसने रात भर इस वाक्य को अपने अंदर घुमाया था, और सुबह तक उसने इसे एक ऐसी शक्ल दे दी थी जिसे वह संभाल सकता था। एक ऐसी शक्ल जिसमें कोई धारदार कोना नहीं था।

वह मेरी याददाश्त की बात कर रहा था। नौ साल से पहले का सब धुँधला। वह रात, जो सिर्फ़ टुकड़ों में थी। वह गीलापन, जिसकी कोई कहानी उसके पास नहीं थी। मैं बचकर निकला, पर अपना बचपन वहीं छोड़ आया। अपनी यादें। अपने भाई का चेहरा। इसीलिए पूरा नहीं निकला।

यह सच था। हर हिस्सा सच था। वह इस बात को जानता था।

और फिर भी, जब उसने रघु काका की झुकी हुई पीठ को देखा, जो उससे मुँह फेरे खड़ी थी, उसे लगा कि बूढ़ा किसी और सच की बात कर रहा था। एक ऐसे सच की, जिसके बारे में वह इतना पक्का था कि उसे विक्रांत की आँखों में देखने से डर लग रहा था।

कि कहीं उसकी आँखों में वह सच दिख न जाए।

"हमें नियम चाहिए," विक्रांत ने कहा।

रसोई में चारों थे। दोपहर का वक़्त था, पर कोहरा इतना घना था कि खिड़कियों के पार कुछ नहीं दिख रहा था, बस एक सफ़ेद, बेजान दीवार। अँगीठी जल रही थी। मेज़ पर विक्रांत ने एक काग़ज़ रखा था, एक pen, और रिसाला-ए-सदाई, बंद।

"नियम?" कबीर ने कहा। उसकी आवाज़ में अब वह पुरानी झुँझलाहट नहीं थी। कल रात के बाद, लाइब्रेरी की छत पर चलते उन कदमों के बाद, उसमें बस एक थकी हुई सहमति थी।

"हम चार लोग हैं। इस कोठी में। उसके साथ।" विक्रांत ने कहा। "हमें नहीं पता वो क्या चाहता है, कितनी ताक़त है उसकी, कब तक रहेगा। पर हमें कुछ बातें पता हैं। ये किताब है। काका का पचपन साल का अनुभव है। मेरी recordings हैं।" उसने pen उठाया। "तो हम वो लिखेंगे जो हमें पता है, और उसका पालन करेंगे। हर कोई। बिना किसी अपवाद के।"

इरा ने सिर हिलाया। रघु काका अँगीठी के पास बैठा था, चुप, पर सुन रहा था।

"पहला," विक्रांत ने लिखा, और ज़ोर से पढ़ा, "जवाब मत देना।"

"किताब में सबसे साफ़ यही लिखा है," इरा ने कहा। “सदाई सिर्फ़ उसी को ले सकता है जो उसे जवाब दे।”

"और नूर बानो ने भी यही कहा," विक्रांत ने कहा। "बारात में हर कोई गया जिसने जवाब दिया। नूर बची, क्योंकि उसने नहीं दिया। काका..." वह रुका। उसने रघु काका की तरफ़ देखा, और बूढ़े ने अपनी नज़र अँगीठी पर रखी। “...काका ने जवाब दिया, पर अपने नाम पर नहीं। इसलिए किसी और को ले गया।”

"तो ये सबसे ज़रूरी नियम है," कबीर ने कहा।

"ये सबसे ज़रूरी नियम है।" विक्रांत ने उसके नीचे दो लकीरें खींचीं। "कोई भी आवाज़ तुम्हारा नाम ले, किसी की भी हो, कहीं से भी आए, दिन हो या रात, जवाब नहीं देना। एक शब्द नहीं। 'हाँ' नहीं, 'कौन' नहीं, 'क्या' नहीं। कुछ नहीं।"

"और अगर सच में कोई हो?" कबीर ने पूछा। "हम में से कोई? अगर मुझे सच में तेरी ज़रूरत हो, रात को?"

"तो तू आएगा, और मुझे छुएगा," विक्रांत ने कहा।

रघु काका ने पहली बार सिर उठाया।

"मेरी अम्मा कहती थीं," उसने धीमे से कहा। "हाथ से छूकर देखो। मुँह से जवाब मत दो।"

"दूसरा नियम," विक्रांत ने लिखा। "किसी पर भरोसा करना है, तो उसे छुओ। उसकी आवाज़ पर नहीं, उसके हाथ पर।"

"खटखटाहट का क्या?" इरा ने धीरे से पूछा। "हमारा इशारा?"

विक्रांत ने उसकी तरफ़ देखा। बाजा-घर का बंद दरवाज़ा। चार छोटे, गीले धब्बे।

"वो उसे पता है," उसने कहा। "वो हमें सुन रहा था, जब तुमने उसे लाइब्रेरी की मेज़ पर बजाया था। अब वो उसका भी है।"

इरा ने अपनी आँखें नीचे कर लीं।

"तीसरा," विक्रांत ने लिखा। "अंधेरे में किसी को नाम लेकर मत बुलाना।"

"ये भी ज़रूरी है?" कबीर ने पूछा।

"उस रात मैंने इरा को बुलाया था, और उसने जवाब दिया। इरा की आवाज़ में।" विक्रांत ने कहा। "काका के भैया ने उन्हें बुलाया, और उसने जवाब दिया। उनकी आवाज़ में। और वो उस आवाज़ के पीछे गए।"

"पर भैया ने ख़ुद जवाब नहीं दिया," रघु काका ने कहा। उसकी आवाज़ धीमी थी, सोचती हुई। "वो उसके पीछे गए। फिर अम्मा की आवाज़ ने 'रघु' पुकारा, और जवाब मैंने दिया। भैया तब भी चुप थे।" वह रुका। "जवाब किसी ने तो दिया था। हमेशा कोई देता है।"

"तो ये उसका चारा है," विक्रांत ने कहा। "बुलाने पर जवाब देकर, वो तुम्हें अपने पास खींचता है। और फिर, जब तुम पास हो, तुम्हें तुम्हारे नाम से पुकारता है। और तब तुम जवाब देते हो, क्योंकि तुम्हें लगता है कि तुमने उसे पा लिया है जिसे ढूँढ रहे थे।"

किसी ने इस बात का खंडन नहीं किया। सबको यह ठीक लगा। यह किताब के साथ ठीक बैठता था, नूर के साथ, रघु काका की कहानी के साथ।

बुलाना ख़तरनाक था, क्योंकि उससे जवाब आता था। पर असली दरवाज़ा जवाब देना था। पहला नियम। दो लकीरों वाला।

चौथा नियम लोहा था। रघु काका ने इसे ख़ुद लिखवाया।

"हर कोई अपनी जेब में कील रखेगा। रात को मुट्ठी में।" उसने कहा। "जिस कमरे में सोएँगे, उसकी चौखट पर ही नहीं, दरवाज़े पर भी। और दहलीज़ पर।"

"दहलीज़ पर कैसे?" कबीर ने पूछा।

रघु काका उठा और बाहर चला गया। जब लौटा, उसके हाथ में एक ज़ंजीर थी। पुरानी, लोहे की, भारी, जंग से भूरी, जिसकी हर कड़ी एक अँगूठे जितनी मोटी थी।

"गौशाला से," उसने कहा। "जब कोठी में भैंसें थीं।"

उसने उसे फ़र्श पर रखा, और वह एक भारी, धात्विक, खनखनाती आवाज़ के साथ गिरी।

पाँचवाँ नियम: रात को सब एक कमरे में। अँगीठी वाले कमरे में, नीचे, क्योंकि उसकी दीवारें सबसे मोटी थीं और उस पर पहले से ही रज़ाइयाँ टँगी थीं। Lamps रात भर जलेंगी। और एक-एक करके, बारी से, कोई जागेगा, पहरा देगा।

छठा: कोई कुछ नहीं गिनेगा। न सीढ़ियाँ, न कदम, न कुछ और। ज़ोर से नहीं, मन में भी नहीं।

सातवाँ: कोई किताब से कोई नाम नहीं पढ़ेगा। रिसाला बंद रहेगा।

"और आठवाँ," विक्रांत ने लिखा। "हर रात recorder चलेगा। इस कमरे में। पूरी रात। ताकि अगर कुछ हो, तो हमें पता हो। सुबह मैं सुनूँगा।"

"गवाह," इरा ने कहा।

"गवाह।"

उसने काग़ज़ उठाया और उसे दरवाज़े के पास वाली दीवार पर, एक रज़ाई के ऊपर, एक कील से टाँग दिया। रघु काका की कील से।

आठ नियम। एक साफ़, सधी हुई, विक्रांत की बाईं ओर झुकी लिखावट में। पहला नियम, सबसे ऊपर, दो लकीरों के साथ।

जवाब मत देना।

वे चारों उसे देखते रहे। और विक्रांत ने महसूस किया, दो हफ़्तों में पहली बार, कुछ ऐसा जो डर नहीं था। उसके किनारे पर कुछ। नियंत्रण का एक बहुत पतला, बहुत नाज़ुक एहसास।

जैसे अंधेरे में कोई दीवार पर हाथ रखे, और महसूस करे कि वहाँ एक दीवार है।

रिसाला-ए-सदाई को रघु काका के लोहे के संदूक में बंद किया गया। उसके क्वार्टर वाला, लकड़ी का नहीं, एक दूसरा, पुराना, फ़ौजी, जिस पर अंग्रेज़ों के ज़माने का कोई निशान था।

इरा ने उसे बंद करने से पहले, एक आख़िरी बार, उसके पन्ने पलटे। बिना पढ़े, बिना किसी शब्द पर रुके। बस देखते हुए, जैसे कोई किसी चीज़ को आख़िरी बार देखता है।

फिर वह एक पन्ने पर रुकी।

"ये देखिए।"

विक्रांत झुका। वह पन्ना था जिस पर नियम लिखे थे। दरवाज़ों पर लोहा ठोको। उसे लोहा पसंद नहीं। उस पंक्ति के बगल में, हाशिए पर, किसी ने कुछ जोड़ा था। मुख्य लिखावट से अलग, बहुत छोटे, बहुत बारीक अक्षरों में, जैसे किसी ने पेंसिल से लिखा हो और फिर उस पर हल्की स्याही फेरी हो।

"क्या लिखा है?"

इरा ने आँखें सिकोड़ीं। “'लोहा नहीं'...” उसने पढ़ा। “'लोहे की आवाज़।'”

"लोहा नहीं, लोहे की आवाज़," विक्रांत ने दोहराया।

"ये किसी और की लिखावट है," इरा ने कहा। "मीर सादिक़ अली की नहीं। बाद में किसी ने जोड़ा है।"

रघु काका ने पन्ने को देखा, फिर अपनी मुट्ठी में बंद कील को। उसने कंधे उचकाए।

"लोहा लोहा है," उसने कहा। "पचपन साल से मेरी कीलें काम कर रही हैं।"

किसी ने इस पर बहस नहीं की। यह एक हाशिए की पंक्ति थी, किसी अनजान हाथ की, धुँधली, बेमतलब-सी। और उनके पास एक नियमों की सूची थी, दीवार पर टँगी, और एक बूढ़े आदमी का पचपन साल का भरोसा।

इरा ने किताब बंद की, और संदूक का ढक्कन गिराया।

विक्रांत ने उस पंक्ति को उस ढेर में रखा। उसके सबसे ऊपर।

पहली रात शांत रही।

उन्होंने अँगीठी वाले कमरे के फ़र्श पर गद्दे बिछाए। चार, एक घेरे में, अँगीठी की तरफ़ पैर करके, जैसे किसी कैंप में। दरवाज़े पर कीलें, पल्ले पर भी। दहलीज़ पर ज़ंजीर, एक कोने से दूसरे कोने तक, भारी और जंग लगी। दो battery lamps, एक लालटेन। Recorder, कमरे के बीच में, अँगीठी के पास, उसके दोनों mics अलग-अलग दिशाओं में, ताकि कमरे की हर आवाज़ पकड़ सकें, और यह भी बता सकें कि आवाज़ कहाँ से आई।

पहला पहरा कबीर का था। फिर इरा का। फिर विक्रांत का। आख़िरी, सुबह से पहले, रघु काका का।

विक्रांत ने अपनी बारी में जागकर बैठे हुए वह खामोशी सुनी। तीन लोगों की साँसें। कबीर के हल्के खर्राटे। इरा की धीमी, लगभग न सुनाई देने वाली साँस। रघु काका की, थोड़ी घरघराती, बुढ़ापे की। अँगीठी में राख का खिसकना। बाहर, कुछ नहीं।

उसने लालटेन की लौ देखी। सीधी। उसने हवा सूँघी। सूखी, धुएँ की, ऊन की।

सुबह उसने recording सुनी। सात घंटे। कुछ नहीं। साँसें, करवटें, पहरा बदलने की फुसफुसाहटें। एक बार कबीर का खाँसना। बस।

उसने laptop बंद किया और इरा की तरफ़ देखा, जो रज़ाई में लिपटी, आँखें मलती हुई, उसे देख रही थी।

"कुछ नहीं," उसने कहा।

इरा की मुस्कान बहुत छोटी थी, बहुत थकी हुई, पर असली।

दूसरी रात भी शांत रही।

तीसरा दिन धूप वाला था।

यह इतना अजीब था कि सुबह जब विक्रांत ने खिड़की से बाहर देखा, तो उसे लगा कि वह सपना देख रहा है। कोहरा अब भी था, पर पतला, और उसके पार, आसमान में, एक फीका, पीला गोला। सूरज। दो हफ़्तों में पहली बार।

रोशनी आँगन में गिरी, तुलसी के सूखे चौरे पर, मेहराबों पर, और कोठी अचानक कम डरावनी, ज़्यादा थकी, ज़्यादा बूढ़ी लगने लगी। एक पुराना घर। बस।

कबीर दोपहर को छत पर गया, signal के लिए। विक्रांत उसके पीछे गया।

कबीर फ़ोन पर था। आशीष अरोड़ा। विक्रांत ने उसकी आवाज़ में वह पुरानी, client वाली मिठास सुनी, फिर उसका टूटना, फिर कुछ नया।

“...नहीं, आशीष जी। मैं extension नहीं माँग रहा।” कबीर ने कहा। उसकी आवाज़ शांत थी। "मैं deal cancel कर रहा हूँ।"

विक्रांत रुका।

“...हाँ, मुझे पता है। Refund। ब्याज समेत। मैं इंतज़ाम करूँगा। Property बेचूँगा Lucknow वाली, गाड़ी, जो भी हो।” एक लंबा ठहराव। दूसरी तरफ़ से ऊँची आवाज़। कबीर ने फ़ोन को कान से थोड़ा दूर किया, और उसकी आँखें विक्रांत से मिलीं।

“...क्योंकि आप यहाँ एक resort बनाएँगे,” उसने फ़ोन में कहा। "और उस resort के बीच में एक बावड़ी होगी। और आप उस पर glass का floor लगाएँगे, और नीचे lights, और लोग शाम को wine पीते हुए नीचे झाँकेंगे। और उनमें से कोई एक दिन, बस मज़ाक में, अपने दोस्त का नाम पुकारेगा।"

वह रुका।

"नहीं, आशीष जी, मैं पागल नहीं हूँ। मैं बस वो आदमी हूँ जिसने एक बार किसी को नीचे भेजा था।"

उसने फ़ोन काट दिया।

विक्रांत उसके पास गया। दोनों छत की मुंडेर पर खड़े हुए, उस फीकी, पीली धूप में, नीचे के गाँव को देखते हुए।

"चालीस लाख," विक्रांत ने कहा।

"चालीस लाख।" कबीर हँसा, एक छोटी, सच्ची हँसी। "पता नहीं कैसे दूँगा। पर दूँगा।"

वे कुछ देर चुप रहे।

"अंशु कैसा था?" कबीर ने आख़िरकार पूछा। "मुझे याद नहीं। मैं छोटा था, बस एक-दो बार मिला था। शादियों में।"

विक्रांत ने मुंह खोला, जवाब देने के लिए।

और उसके पास कुछ नहीं था।

उसने अपने दिमाग़ में अंशु को ढूँढा। उसका चेहरा। उसकी हँसी। उसकी आवाज़। और उसे जो मिला वह photos थीं। माँ के कमरे वाला फ्रेम। इरा की वह पुरानी तस्वीर, लाल ऊनी टोपी, टूटा हुआ आगे का दाँत। कहानियाँ, जो माँ ने बताई थीं। अंशु को आम बहुत पसंद थे। अंशु रात को बिना बत्ती के सो नहीं पाता था।

पर अंशु ख़ुद, उसका एक भी पल, उसकी एक भी हरकत, जो विक्रांत ने अपनी आँखों से देखी हो, और जो किसी तस्वीर या कहानी से नहीं आई हो, वह कहीं नहीं था।

"उसे आम पसंद थे," उसने कहा।

कबीर ने सिर हिलाया, और कुछ नहीं पूछा।

विक्रांत ने नीचे के आँगन को देखा, धूप में चमकते पत्थरों को। उसने ख़ुद से कहा कि यह नौ साल से पहले की धुँधली याददाश्त की वजह से है। Childhood trauma। उसने ख़ुद से कहा कि यह बात इतनी बड़ी नहीं है।

उसने ख़ुद से यह भी नहीं पूछा कि उसे अपने ख़ुद के बचपन की वह एक याद, बावड़ी वाली, अंशु को dare देने वाली, कहाँ से मिली थी। अगर बाकी सब धुँधला था, तो वह एक याद इतनी साफ़ क्यों थी?

तीसरी रात, उन्होंने ताश खेला।

कबीर का विचार था। उसके bag में एक पुराना पत्ता था, जो वह हमेशा रखता था। "तनाव कम होता है," उसने कहा। अँगीठी के पास, गद्दों पर बैठकर, lamps की रोशनी में।

"नियम छह," इरा ने कहा, अपने पत्ते देखते हुए, एक हल्की मुस्कान के साथ। "कोई गिनती नहीं।"

कबीर ने उसे देखा। फिर अपने पत्तों को। फिर हँसा। "यार, ताश में बिना गिने कैसे खेलेंगे?"

“Points नहीं,” विक्रांत ने कहा। "बस जो पहले सब पत्ते ख़त्म करे।"

"ये तो बच्चों वाला खेल हुआ।"

"तो बच्चों वाला खेल खेलो।"

उन्होंने खेला। धीमे, फुसफुसाकर, जैसे पूरा गाँव बोलता था। कबीर दो बार जीता, और दोनों बार उसने हाथ उठाकर ख़ुशी दिखाई, बिना आवाज़ के, जैसे कोई मूक फ़िल्म का अभिनेता। इरा हँसी, अपना मुँह अपनी हथेली से ढककर। रघु काका नहीं खेला, पर अपनी जगह से उन्हें देखता रहा, और एक बार, जब कबीर ने हारते हुए अपने पत्ते हवा में फेंके, बूढ़े के होंठों पर कुछ ऐसा आया जो मुस्कान के बहुत क़रीब था।

विक्रांत ने उन चेहरों को देखा। lamps की पीली रोशनी में, अँगीठी की नारंगी चमक में। तीन इंसान, एक बंद कमरे में, कीलों और ज़ंजीरों के पीछे, फुसफुसाकर ताश खेलते हुए।

और उसने महसूस किया कि वह उन्हें पसंद करता है। तीनों को। कबीर को, अपनी ग़लतियों और अपनी बेवकूफ़ हँसी के साथ। इरा को, अपनी तेज़ आँखों और अपने छिपाए हुए पन्नों के साथ। रघु काका को, जो एक ऐसे नाम में जीता था जो उसका नहीं था।

उसे नहीं याद था कि उसने आख़िरी बार कब किसी के साथ ऐसा महसूस किया था।

उस रात, पहरे के दौरान, उसने कबीर को नींद में बुदबुदाते सुना। बहुत धीमे। "मम्मी... पानी... ला रहा हूँ..."

विक्रांत ने उसकी तरफ़ देखा। कबीर की आँखें बंद थीं, उसका चेहरा शांत। उसकी मुट्ठी में कील थी, कसकर।

उसने उसे नहीं जगाया। वह बस बुदबुदा रहा था। जवाब नहीं दे रहा था। नींद में बोलना जवाब देना नहीं होता।

चौथी सुबह, विक्रांत सबसे पहले उठा।

बाकी तीन सो रहे थे। रघु काका, अपने आख़िरी पहरे के बाद, दीवार से पीठ सटाए, बैठे-बैठे सो गया था, सिर एक तरफ़ लुढ़का हुआ। खिड़की से सलेटी रोशनी आ रही थी, धूप वाले दिन के बाद का कोहरा फिर से लौटा हुआ।

विक्रांत ने recorder उठाया और laptop पर file डाली। चौथी रात। सात घंटे बीस मिनट।

उसने उसे तेज़ी से scroll किया। सपाट waveform, साँसों की हल्की, लगातार धारा। कहीं कोई उभार नहीं। कोई आवाज़ नहीं। कोई कदम, कोई फ़ोन, कोई पानी।

वह laptop बंद करने वाला था।

फिर उसके दिमाग़ के किसी पुराने, professional कोने ने, जो कभी आराम नहीं करता था, उसे रोका। तुम बस आवाज़ें ढूँढ रहे हो। उभार। पर साँसें सुनो। गिनो कि कितनी हैं।

यह आसान था। उसने इसे सैकड़ों बार किया था, अदालती मामलों में, जहाँ यह तय करना होता था कि किसी कमरे में recording के वक़्त कितने लोग मौजूद थे। हर इंसान की साँस की एक अपनी लय होती है, अपनी गति, अपनी गहराई, अपनी आवाज़। उन्हें अलग किया जा सकता है। Spectral separation।

उसने software चलाया। रात के बीच का एक हिस्सा लिया, तीन बजे के आसपास, जब सब सो रहे थे। और साँसों को अलग करना शुरू किया।

एक। कबीर। गहरी, धीमी, नाक से, एक हल्की खरखराहट के साथ। चौदह प्रति मिनट।

दो। इरा। हल्की, उथली, तेज़। सोलह-सत्रह।

तीन। रघु काका। घरघराती, अनियमित, बुढ़ापे की, बीच-बीच में रुकती हुई।

चार। ख़ुद। विक्रांत ने अपनी साँस पहचानी। वह उसे सबसे अच्छी तरह जानता था। तेरह प्रति मिनट।

चार। चार लोग। चार साँसें।

उसने software को एक बार और चलाने दिया, बस यह पक्का करने के लिए।

Screen पर एक पाँचवीं लकीर उभरी।

विक्रांत की उँगलियाँ जम गईं।

वह बहुत हल्की थी। बाकी चारों से कहीं हल्की, जैसे बहुत छोटे फेफड़े हों, या बहुत दूर हों। पर वह वहाँ थी। एक अलग लय। एक अलग धारा। पूरी रात, शुरू से आख़िर तक, बिना टूटे।

उसने उसे अलग किया। Gain बढ़ाया। Headphones लगाए।

साँस। धीमी, गीली, जैसे किसी ठंडी, नम जगह में ली जा रही हो। हर साँस के अंदर जाने के साथ एक बहुत हल्की, बहुत बारीक सरसराहट, जैसे पानी किसी पतली नली से खिंच रहा हो।

उसने उसकी दिशा देखी। दोनों mics के बीच के उस छोटे समय-अंतर से। Recorder कमरे के बीच में था। उसने दिशा का हिसाब लगाया, कोण, दूरी।

वह साँस कमरे के किसी कोने से नहीं आ रही थी। दरवाज़े से नहीं, ज़ंजीर के पास से नहीं, खिड़की से नहीं।

वह उसके गद्दे के पास से आ रही थी।

उसके तकिए के ठीक बगल से। फ़र्श की ऊँचाई पर। उसके सिर से एक फ़ुट दूर। पूरी रात। जैसे कोई उसके बगल में, ज़मीन पर, लेटा हो, अपना चेहरा उसके चेहरे की तरफ़ किए।

विक्रांत ने अपने तकिए को देखा। उसके बगल का फ़र्श। गद्दे का किनारा। कुछ नहीं। सूखा। साफ़।

फिर उसने पाँचवीं साँस की लय को नापा।

तेरह प्रति मिनट।

उसकी अपनी गति।

उसने अपनी साँस की लकीर, चौथी, को पाँचवीं के ठीक ऊपर रखा। Zoom किया। और देखा।

वे एक जैसी थीं। हर उठान, हर गिरावट, हर ठहराव। जैसे एक ही साँस की दो प्रतियाँ। जैसे कोई उसकी साँस की नकल कर रहा हो, पूरी रात, उसके बगल में लेटकर, हर साँस को उसी तरह लेते हुए जैसे वह ले रहा था।

नहीं। नकल नहीं।

उसने और zoom किया, और उसका दिल धीरे-धीरे, बहुत धीरे, रुक-सा गया।

पाँचवीं साँस उसकी साँस के बाद नहीं आ रही थी।

वह पहले आ रही थी।

हर बार। पूरी रात। आधा सेकंड पहले।

जैसे उसके बगल में लेटी वह चीज़ यह तय कर रही हो कि वह कब साँस लेगा। और वह, नींद में, बिना जाने, उसके पीछे-पीछे साँस ले रहा था।

[Part 16 समाप्त]

Writer
Piyashi Atma
Story
जवाब मत देना
Chapter
16 of 30
Category
Ghost Stories
Reading time
16 min
Words
3121
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

← पिछला भाग  ·  अगला भाग →

जवाब मत देना · सभी भाग →

और कहानियाँ · More stories