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Part 15: माधो
Piyashi Atma · Ghost Stories · 15 मिनट
"हाँ?"
वह शब्द ऊपर से आया, और फिर कमरे में कुछ नहीं बचा। न साँस, न हरकत। बस वह एक शब्द, उस थकी हुई, बूढ़ी, बिना साँस की आवाज़ में, लाइब्रेरी की ऊँची छत के ठीक ऊपर कहीं से, जैसे कोई ठीक उनके सिरों के ऊपर फ़र्श पर लेटा हो, कान लगाए।
इरा की उँगली अब भी किताब पर थी। उस नाम पर।
लालटेन की लौ उसकी तरफ़ खिंची हुई थी, इतनी लंबी कि चिमनी के काँच पर काली कालिख की एक लकीर बनने लगी थी।
फिर, ऊपर, एक कदम।
भारी। धीमा। लकड़ी के तख़्ते पर। एक बड़े आदमी का, जो बहुत देर से बैठा हो और अब उठा हो, और जिसके पैर अभी चलना याद कर रहे हों।
एक और।
कदम छत पर चल रहे थे। लाइब्रेरी के ऊपर से, पूर्व की तरफ़। धीरे-धीरे। विक्रांत की नज़र उनके साथ-साथ छत पर चल रही थी, उन लकड़ी की कड़ियों पर, उस पुराने प्लास्टर पर, जिससे हर कदम के साथ धूल का एक बारीक, सफ़ेद पर्दा नीचे झड़ रहा था, lamp की रोशनी में चमकता हुआ।
कबीर ने एक आवाज़ निकाली। एक घुटी हुई, गले में फँसी सिसकी।
विक्रांत ने अपना हाथ उठाया, उसकी तरफ़। चुप।
लाइब्रेरी का दरवाज़ा एक झटके से खुला।
रघु काका। नंगे पैर, बिना लोई के, उसकी पतली छाती ठंड में तेज़-तेज़ उठती-गिरती, उसके हाथ में एक लोहे की सलाख, अँगीठी वाली, जिसका सिरा अब भी हल्का लाल था। उसकी आँखें इरा पर पड़ीं, उसके हाथ की किताब पर, उस लालटेन पर जिसकी लौ उसकी तरफ़ झुकी थी।
उसने कुछ नहीं पूछा। उसे पूछने की ज़रूरत नहीं थी।
वह तीन लंबे कदमों में मेज़ तक पहुँचा, किताब को इरा के हाथ से खींचकर बंद किया, एक धप के साथ, और फिर अपनी खुरदरी, बूढ़ी हथेली इरा के मुँह पर रख दी। उसी तरह जैसे उसने बावड़ी के किनारे इमरान के मुँह पर रखी थी।
"अब कोई कुछ नहीं बोलेगा," उसने फुसफुसाया। उसकी आवाज़ में कोई काँपना नहीं था, बस एक सख़्त, पुराना, आदेश देने वाला लहजा, जो विक्रांत ने उसमें पहले कभी नहीं सुना था। "कोई नाम नहीं। कोई सवाल नहीं। कोई साँस भी ज़ोर से नहीं।"
ऊपर कदम रुके।
फिर फिर से चले। दूसरी दिशा में। पूर्व से पश्चिम की तरफ़। और अब वे किसी चीज़ को ढूँढ रहे थे, विक्रांत ने समझा। धीमे, रुक-रुककर, जैसे कोई अंधेरे कमरे में दीवार टटोल रहा हो।
एक कदम। रुकना।
फिर, ऊपर से, एक आवाज़। लकड़ी पर कुछ। घिसटता हुआ। जैसे किसी ने अपनी हथेली किसी दरवाज़े पर फिराई हो, ऊपर से नीचे।
रघु काका की कीलें।
विक्रांत ने उन्हें अपनी आँखों के सामने देखा। ऊपर की मंज़िल के हर दरवाज़े की चौखट, काली, मोटी कीलों से भरी, जैसे किसी जानवर की खाल पर काँटे।
घिसटन रुकी। एक कदम। फिर अगले दरवाज़े पर वही आवाज़। हथेली का फिरना।
रुकना।
अगला।
वह हर दरवाज़े को जाँच रहा था। एक-एक करके। कोई ऐसा दरवाज़ा ढूँढते हुए जिस पर लोहा न हो।
लालटेन की लौ अब इरा की तरफ़ से थोड़ी हट रही थी, धीरे-धीरे, ऊपर की तरफ़ झुकती हुई, छत की तरफ़, जैसे वह भी ऊपर चलती उस चीज़ के पीछे-पीछे जा रही हो।
फिर, कोठी के पूर्वी कोने से, एक आवाज़ आई जिसने विक्रांत की रीढ़ को बर्फ़ बना दिया।
एक दरवाज़े का चरमराना। धीरे से खुलना।
उसका दरवाज़ा।
उसका कमरा। पूर्वी कोना। वह कमरा जिसकी चौखट पर रघु काका ने, उन गीले पैरों के निशानों के बाद, तीन मोटी कीलें ठोकी थीं।
पर सिर्फ़ चौखट पर। दरवाज़े के पल्ले पर नहीं।
कदम अंदर गए। विक्रांत ने उन्हें सुना, उसके कमरे के फ़र्श पर, उसके पलंग की तरफ़। फिर रुके।
कमरे में बहुत देर तक कुछ नहीं हुआ। विक्रांत ने उस खामोशी में अपना ही कमरा देखा, अपनी आँखों के पीछे। उसका पलंग। उसकी रज़ाई, जिसमें उसके शरीर का आकार अब भी बना था। उसका तकिया। उसका laptop, पलंग के पास, जिसमें माँ की आवाज़ थी, उसकी अपनी चीख, उसकी अपनी गिनती।
वहाँ कोई खड़ा था। उन सब चीज़ों को देखता हुआ।
फिर, सीढ़ियों के पास से, एक दबी हुई, घुटी हुई आवाज़। ट्रि—
फ़ोन। रघु काका की लोई के नीचे लिपटा, बजने की कोशिश करता हुआ। एक बार। बस आधी घंटी, ऊन में दबी हुई, जैसे किसी के गले में अटकी चीख।
फिर कुछ नहीं।
लालटेन की लौ धीरे-धीरे सीधी हो गई।
गंध पतली हुई, और धीरे-धीरे लाइब्रेरी की सूखी, काग़ज़ और धूल वाली हवा में घुल गई।
रघु काका ने बहुत देर तक अपना हाथ इरा के मुँह से नहीं हटाया। जब हटाया, इरा की आँखें भरी हुई थीं, और उसके होंठों पर बूढ़े की उँगलियों के लाल निशान थे।
"माफ़ कीजिए," इरा ने फुसफुसाया। "मैं... मैं पढ़ रही थी, और..."
"मुझे पता है।" रघु काका ने कहा। उसकी आवाज़ अब फिर से थकी हुई थी, वह सख़्ती जा चुकी थी। "हर कोई पढ़ता है। एक दिन।" उसने किताब को देखा, बंद, मेज़ पर। "इसीलिए छिपाई थी।"
"आपको पता था ये यहाँ है?"
रघु काका ने जवाब नहीं दिया।
कबीर फ़र्श पर बैठा था, अपनी गिरी हुई कुर्सी के पास, दीवार से पीठ सटाए, घुटने छाती से लगाए। उसकी आँखें छत पर टिकी थीं।
"वो ऊपर था," उसने कहा। बहुत धीमे, किसी से नहीं। "वो सच में ऊपर था।"
विक्रांत उस रात अपने कमरे में नहीं गया।
उसने रघु काका से कुछ नहीं कहा, और बूढ़े ने भी कुछ नहीं कहा। पर जब बाकी लोग अँगीठी वाले कमरे में आए, सब, एक साथ, बिना किसी के कहे, क्योंकि कोई भी अकेला नहीं रहना चाहता था, तो रघु काका ऊपर गया। अकेला। एक लालटेन और मुट्ठी भर कीलें लेकर।
विक्रांत ने उसे नीचे से सुना। ठक। ठक। ठक। उसके दरवाज़े पर। इस बार पल्ले पर।
बहुत देर तक।
जब बूढ़ा लौटा, उसने अपने हाथ अँगीठी पर फैलाए, और विक्रांत ने देखा कि उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं। ठंड से नहीं।
"अंदर क्या था, काका?"
रघु काका ने आग में देखा।
"पानी," उसने कहा। "आपके पलंग पर। आपके तकिए पर। जैसे कोई गीले बालों से लेटा हो।"
आधी रात हो चुकी थी। कबीर एक कोने में रज़ाई ओढ़े सो गया था, या सोने का नाटक कर रहा था, उसका चेहरा दीवार की तरफ़। इरा अँगीठी के दूसरी तरफ़ बैठी थी, घुटनों पर सिर रखे, आँखें खुली, आग में देखती हुई।
रघु काका ने अँगीठी में एक और लकड़ी डाली।
विक्रांत ने उसे देखा। आग की नारंगी रोशनी उसके झुर्रियों भरे चेहरे पर काँप रही थी, उसकी धँसी आँखों को और गहरा करती हुई।
"आपने कहा था, कल पूछना," विक्रांत ने धीरे से कहा।
रघु काका ने सिर नहीं उठाया।
"अब कल हो गया है।"
बूढ़ा बहुत देर तक चुप रहा। आग चटकती रही। बाहर, कहीं बहुत दूर, एक कुत्ता भौंका, पहली बार इन दो हफ़्तों में। एक बार। फिर चुप हो गया, जैसे किसी ने उसका मुँह दबा दिया हो।
"मेरा नाम रघु नहीं है," रघु काका ने कहा।
इरा ने अपना सिर उठाया।
"रघु मेरा बड़ा भाई था।" बूढ़े की आवाज़ सपाट थी, बिना उतार-चढ़ाव के, जैसे वह कोई ऐसी बात दोहरा रहा हो जो उसने अपने आप से हज़ार बार कही हो, अंधेरे में, अकेले। "रघुनाथ। चौदह साल का था। मैं बारह का। हमारे बाबू भोला, इस कोठी के चौकीदार। उनसे पहले उनके बाबू। तीन पीढ़ी से हम यहीं।"
उसने अपनी हथेलियाँ आग के पास रगड़ीं।
"मेरा नाम माधो था।"
"उस रात बारात थी। नूर बीबी की।" उसने कहा। "बाबू ने रघु भैया को भेजा, लालटेन देकर, बारात को बावड़ी वाली गली से निकालने के लिए। रास्ता दिखाने। मुझे मना किया। बोले, तू छोटा है, घर पर रह।"
वह रुका, और विक्रांत ने उसके होंठों के कोने पर कुछ देखा। एक बहुत पुरानी, बहुत छोटी मुस्कान का भूत।
"पर ढोल बज रहा था। और मैं बारह साल का था।" उसने कहा। "मैं पीछे-पीछे गया। छिपकर। दीवारों के साथ-साथ। भैया को पता नहीं था।"
"बावड़ी वाली गली में पहुँचे। मैं गली के मुहाने पर था, एक दीवार के पीछे। भैया आगे, बारात के साथ, लालटेन लिए। ढोल बज रहा था। लोग नाच रहे थे।"
"फिर आवाज़ें आने लगीं।"
उसने आग से नज़र हटाई और विक्रांत को देखा। "आपने नूर बीबी की स्लेट पढ़ी है।"
"हाँ।"
"तो आपको पता है।" उसने फिर आग की तरफ़ देखा। "एक-एक करके। मैंने देखा। दीवार के पीछे से। कोई पुकारता, कोई मुड़ता, 'हाँ अम्मी', 'हाँ अब्बा', और फिर..." उसने अपनी हथेली को हवा में घुमाया, जैसे किसी चीज़ को पोंछ रहा हो। “...और फिर वहाँ कोई नहीं होता। बस अंधेरा।”
"मैं इतना डरा कि हिल नहीं पाया। दीवार से चिपका रहा। मेरी पैंट गीली हो गई।" उसने यह बात बिना किसी शर्म के कही, जैसे पचपन साल ने हर शर्म को घिस दिया हो। "और भैया... भैया आगे थे। उन्हें आवाज़ें सुनाई दे रही थीं। उन्होंने मुड़कर देखा। और उन्हें याद आया कि शायद मैं पीछे आया हूँ। क्योंकि मैं हमेशा आता था।"
उसकी आवाज़ पहली बार काँपी।
"और उन्होंने मुझे पुकारा।"
विक्रांत की साँस रुकी।
“'माधो! माधो, तू यहाँ है? माधो!'” रघु काका ने कहा। उसकी आवाज़ धीमी थी, पर उसमें एक चौदह साल के लड़के की घबराहट थी, जो पचपन साल से उसके गले में फँसी थी। "लालटेन ऊपर उठाकर। इधर-उधर। मुझे ढूँढते हुए।"
"और जवाब आया।"
"मेरी आवाज़ में। बावड़ी की तरफ़ से। 'यहाँ हूँ भैया! इधर!'"
"मैं वहाँ नहीं था। मैं दीवार के पीछे था, उल्टी तरफ़। पर वो आवाज़ मेरी थी। बिल्कुल मेरी। और भैया..." उसकी आवाज़ टूटी। “...भैया उसकी तरफ़ भागे। बावड़ी की तरफ़। लालटेन लिए। मुझे बचाने।”
इरा ने अपना हाथ अपने मुँह पर रख लिया।
विक्रांत ने महसूस किया कि उसका पूरा शरीर ठंडा हो रहा है, अंदर से, जैसे कोई बर्फ़ का पानी उसकी नसों में भर रहा हो।
सलीम। नीचे कोई बच्चा है। रो रहा है। मैं देखता हूँ।
नूर बानो की स्लेट। कोई अपने गए हुए को पुकारता है। अंधेरे में। और वो जवाब देता है। उसी की आवाज़ में। और फिर तुम उसके पीछे जाते हो।
"मैं दीवार के पीछे से निकला," रघु काका ने कहा। "मैंने भैया को भागते देखा। मैं उनके पीछे भागा। चिल्लाना चाहता था, 'भैया, वो मैं नहीं हूँ!' पर मेरा गला बंद था। आवाज़ नहीं निकल रही थी।"
"और फिर किसी ने पुकारा।"
वह रुका। बहुत देर तक। आग में एक लकड़ी टूटी, और चिंगारियाँ ऊपर उड़ीं।
"अम्मा की आवाज़ में," उसने फुसफुसाया। "बावड़ी के किनारे से। बहुत प्यार से। जैसे वो रात को खाने के लिए बुलाती थीं।"
“'रघु! रघु, बेटा, इधर आ।'”
विक्रांत ने अपनी आँखें बंद कर लीं।
"वो भैया का नाम था," रघु काका ने कहा। "भैया को बुला रही थी। पर भैया आगे थे, बावड़ी की सीढ़ियों पर, मेरी आवाज़ के पीछे। उन्होंने नहीं सुना। या सुना, पर रुके नहीं। मुझे ढूँढ रहे थे।"
"और मैं..."
उसकी आवाज़ टूट गई। पूरी तरह। उसने अपना चेहरा अपनी हथेलियों में छिपा लिया, और उसके दुबले कंधे काँपने लगे। बिना किसी आवाज़ के। पचपन साल में उसने बिना आवाज़ के रोना सीख लिया था।
इरा उठी और उसके पास आई। उसने उसके कंधे पर हाथ रखा। रघु काका ने उसे नहीं झटका।
जब वह फिर से बोला, उसकी आवाज़ उसकी हथेलियों में दबी हुई थी।
"मैं बारह साल का था। मुझे अम्मा चाहिए थीं। अंधेरा था, लोग गायब हो रहे थे, भैया जा रहे थे। और अम्मा की आवाज़ आई। और मैंने..."
उसने अपने हाथ नीचे किए। उसका चेहरा गीला था।
"मैंने कहा, 'हाँ अम्मा।'"
अँगीठी की आग चटकती रही।
"भैया के नाम पर," विक्रांत ने फुसफुसाया।
"भैया के नाम पर।" रघु काका ने सिर हिलाया, धीरे-धीरे। "उसने रघु को बुलाया, और माधो ने जवाब दिया।"
"और फिर?"
"फिर लालटेन गिरी।" बूढ़े ने कहा। "मैंने उसे गिरते देखा। सीढ़ियों पर। लुढ़कती हुई, नीचे, नीचे, उसकी रोशनी घूमती हुई, दीवारों पर। और भैया वहाँ नहीं थे। बस लालटेन। फिर वो भी बुझ गई।"
"उसके बाद मुझे कुछ याद नहीं। सुबह, लोगों ने मुझे पाया। बावड़ी की पहली सीढ़ी पर। बेहोश।" उसने विक्रांत की तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में कुछ ऐसा था, एक गहरी, सधी हुई ध्यान, जैसे वह कुछ ऐसा कह रहा हो जिसे वह विक्रांत को ठीक से सुनाना चाहता हो। "भीगा हुआ। सिर से पैर तक। बाल से पानी टपकता हुआ। दाँत बजते हुए।"
विक्रांत का दिल रुका।
कंबल में लिपटा। गीला। बालों से पानी। दाँत बजते हुए।
"और बावड़ी उस सुबह सूखी थी," रघु काका ने कहा। "पूरी तरह। तली तक। एक बूँद नहीं। पर मैं भीगा था।"
"जैसे," इरा ने धीरे से कहा, "आप किसी बहुत गहरे पानी से निकले हों।"
रघु काका ने सिर हिलाया।
"जब मुझे होश आया," उसने कहा, "अम्मा मेरे पास बैठी थीं। रोती हुई। उन्होंने मुझे गले लगाया और कहा, 'माधो, मेरे बच्चे, माधो।'"
वह रुका।
"और मुझे कुछ महसूस नहीं हुआ।"
"कुछ नहीं?"
"उस नाम पर।" उसने अपनी छाती पर हाथ रखा। "माधो। जैसे वो किसी और का नाम हो। किसी अजनबी का। जैसे कोई तुम्हें किसी पड़ोसी के नाम से बुलाए, और तुम सोचो कि वो किससे बात कर रहे हैं।" उसने अपनी उँगलियाँ अपनी छाती पर दबाईं। "मेरा गला उस नाम पर हिलता ही नहीं था। जवाब नहीं बनता था।"
"और जब बाबू आए और उन्होंने कहा, 'रघु कहाँ है? रघु कहाँ गया?'"
उसने आँखें बंद कीं।
"तो मेरे मुँह से अपने आप निकला। 'मैं यहाँ हूँ, बाबू।'"
बहुत देर तक किसी ने कुछ नहीं कहा।
"अम्मा जानती थीं," रघु काका ने आख़िरकार कहा, बहुत धीमे। "उन्होंने मुझे देखा, और जानती थीं। एक माँ जानती है। पर वो कुछ नहीं कर सकती थीं। मैं उनके माधो के नाम पर जवाब नहीं देता था। रघु के नाम पर देता था। तो वो मुझे रघु बुलाने लगीं। क्योंकि अगर नहीं बुलातीं, तो उनका एक भी बेटा नहीं बचता।"
"और गाँव?"
"गाँव ने सोचा कि छोटा लड़का भाई के ग़म में पागल हो गया। भाई का नाम ले लिया। हमारे गाँव में ऐसा होता है, कभी-कभी।" उसने कंधे उचकाए। "पहले लोगों ने माधो कहकर बुलाया। मैं नहीं मुड़ा। फिर धीरे-धीरे उन्होंने बुलाना छोड़ दिया। एक साल बाद, किसी को याद भी नहीं था कि कोई माधो था।"
उसने अपनी हथेलियाँ देखीं।
"मुझे ख़ुद भी कई सालों तक लगता रहा कि मैं पागल हो गया था। सदमे से। कि मैं सच में माधो हूँ, और बस दिमाग़ ने भैया का नाम पकड़ लिया।" उसने विक्रांत की तरफ़ देखा। "पर फिर मुझे वो चीज़ें याद आने लगीं जो सिर्फ़ भैया को पता थीं।"
"जैसे?"
"जैसे बाबू की वो बात जो उन्होंने सिर्फ़ भैया से कही थी, अकेले में, गौशाला में, मेरे पैदा होने से पहले। जैसे भैया की वो लड़की, दूसरे गाँव की, जिसके बारे में किसी को नहीं पता था। जैसे एक पेड़ के नीचे दबी एक टीन की डिबिया, जिसमें भैया के कंचे थे। मैं गया, खोदा। वहीं थी।"
उसने अपना सिर हिलाया।
"मेरे पास उसका नाम था। और उसके नाम के साथ, उसकी कुछ यादें। जैसे नाम के साथ आ जाती हैं।"
"और आपकी अपनी यादें?" इरा ने धीरे से पूछा। "माधो की?"
रघु काका बहुत देर तक चुप रहा।
"धुँधली हैं," उसने कहा। "जैसे किसी और की हों। जैसे मैंने उन्हें किसी से सुना हो, बचपन में, और अब बस उनकी कहानी याद है, असली चीज़ नहीं।"
विक्रांत ने अपने हाथों को देखा। अपनी बाईं हथेली को। जिससे वह लिखता था।
मुझे नौ साल से पहले का कुछ याद नहीं।
उसने उस विचार को रोका। उसे वहीं, उसकी शुरुआत में, पकड़कर दबा दिया, जैसे कोई सिगरेट को जूते के नीचे मसलता है।
"नीचे से," उसने कहा, और उसकी आवाज़ उसे ख़ुद अजनबी लगी, "कभी कोई आवाज़ आती है? आपके भैया की?"
रघु काका ने उसे देखा।
"कभी-कभी," उसने कहा। "बहुत सालों में एक बार। जब कोहरा बहुत घना हो। जब बावड़ी बहुत गहरी साँस ले।"
"क्या कहते हैं?"
बूढ़े ने अपना सिर झुकाया।
"मेरा नाम लेते हैं," उसने कहा। "मेरा असली नाम। 'माधो, ऊपर आ जा।' जैसे बचपन में खेत से बुलाते थे।"
"और आप?"
"मैं जवाब नहीं देता।" उसने कहा। "मैं जवाब नहीं दे सकता। उस नाम पर मेरा गला हिलता ही नहीं।" उसने एक लंबी, काँपती हुई साँस ली। "और शायद अच्छा है। क्योंकि अगर कभी हिल गया, तो पता नहीं कौन ऊपर आएगा, और कौन नीचे जाएगा।"
इरा उसके पास बैठी रही, उसका हाथ उसके कंधे पर।
विक्रांत ने आग में देखा। उसकी नारंगी, नाचती लपटों में। उसके दिमाग़ में कई तस्वीरें एक-दूसरे पर चढ़ रही थीं, जैसे पुरानी film के frames।
एक बारह साल का लड़का, बावड़ी की पहली सीढ़ी पर, भीगा हुआ, बेहोश।
एक नौ साल का लड़का, कंबल में लिपटा, भीगा हुआ, काँपता।
एक माँ, जिसने अपने बचे हुए बेटे को देखा, और जानती थी।
उसे इस नाम से मत बुलाओ। वो जवाब दे देगा।
उसने इन तस्वीरों को एक-दूसरे से अलग रखा। जानबूझकर। ताकत से। जैसे कोई दो पत्थरों को अलग रखता है जिन्हें पास लाने से आग लग सकती है।
"आपने ये किसी को क्यों नहीं बताया?" उसने पूछा। "पचपन साल?"
"किसे बताता?" रघु काका ने कहा। "कि मैं अपने भाई के नाम पर जीता हूँ, और मेरा भाई मेरे नाम पर नीचे है? कौन मानता?" उसने अपने सिर को हल्का-सा हिलाया। "और फिर, बताने से क्या होता? जो हो गया, हो गया। वो लौटता नहीं।"
उसने अँगीठी से एक जलती लकड़ी उठाई, उसे देखा, फिर वापस रख दी।
"मैंने इस कोठी में रहना चुना," उसने कहा। "बावड़ी के पास। उसकी चौकीदारी करने। उस पर कीलें ठोकने। ताकि किसी और के साथ ऐसा न हो।"
वह रुका।
"पर हुआ।"
और फिर, बहुत धीरे, उसने अपना सिर उठाया, और विक्रांत की तरफ़ देखा। सीधे। आग की रोशनी में, उसकी आँखें दो गहरे, गीले कुओं जैसी थीं।
"जो बचकर निकलता है," रघु काका ने कहा, "वो पूरा वही नहीं निकलता, बाबू।"
विक्रांत ने उसकी आँखों में देखा।
“1999 में भी,” बूढ़े ने कहा, बहुत धीमे, हर शब्द को अलग से तौलते हुए, "कोई बचकर निकला था।"
फिर उसने अपनी नज़र हटा ली।
धीरे से। जानबूझकर। विक्रांत के चेहरे से, अँगीठी की आग की तरफ़। जैसे कोई किसी ऐसी चीज़ से अपनी आँखें हटाता है जिसे देखते रहना उसके बर्दाश्त से बाहर हो।
और उस रात, बाकी के सारे घंटों में, जब तक अँगीठी की आख़िरी लकड़ी राख नहीं हो गई, जब तक खिड़कियों के पार सलेटी, बीमार सुबह नहीं आ गई, रघु काका ने एक बार भी विक्रांत की तरफ़ नहीं देखा।
[Part 15 समाप्त]
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- जवाब मत देना
- Chapter
- 15 of 30
- Category
- Ghost Stories
- Reading time
- 15 min
- Words
- 2977
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
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