Pretika › Ghost Stories › जवाब मत देना

Part 14: पहला नाम

Piyashi Atma · Ghost Stories · 15 मिनट

तुम्हें याद नहीं। पर उसे याद है।

विक्रांत ने यह वाक्य गली में चलते हुए अपने मन में बीस बार दोहराया। हर बार उसके शब्दों का वज़न थोड़ा बदल जाता था, जैसे किसी पत्थर को हथेली में घुमाओ और हर बार वह किसी नए कोने से चुभे।

उसे।

किसे? मेहमान को? उस चीज़ को जो नाम खाती थी, जो बावड़ी के नीचे बैठी थी, जो उसके दरवाज़े पर बच्चे के पैरों से खड़ी होती थी? उसे क्या याद था? वह रात? अंशु का नीचे जाना?

या उसे का मतलब था अंशु? कि अंशु को याद है? नीचे, अंधेरे में, अब भी, अभी भी, उसे याद है कि उसके बड़े भाई ने उसे भेजा था और ख़ुद भाग गया था?

और नूर ने उसे अंशु क्यों कहा? दो बार?

उसके तर्क ने, अपनी आख़िरी ताक़त से, एक जवाब बनाया। क्योंकि उसने उस रात दो बच्चों को नीचे जाते देखा, और एक को ऊपर आते। और उसके दिमाग़ में, बीमार, बूढ़े, पचपन साल की खामोशी से टूटे दिमाग़ में, वो दोनों मिल गए। उसे लगता है कि जो ऊपर आया, उसमें नीचे वाले का कुछ है। जैसे हर बचा हुआ इंसान अपने साथ मरने वाले का कुछ लेकर चलता है।

यह जवाब कमज़ोर था। उसे पता था। पर वह उस पर टिका रहा, जैसे कोई टूटी सीढ़ी पर टिकता है, क्योंकि उसके नीचे कुछ और नहीं होता।

"उसने मुझे अंशु क्यों कहा?" उसने आख़िरकार पूछा।

इरा उसके बगल में चल रही थी, अपनी lamp नीचे झुकाए, हालाँकि दिन था। रामदुलारी अपनी लाठी टेकती हुई उनसे आगे जा चुकी थी, अपने घर की तरफ़।

इरा ने तुरंत जवाब नहीं दिया।

"शायद आप उस जैसे दिखते हैं," उसने कहा। "भाई तो एक जैसे होते ही हैं।"

यह एक ऐसा जवाब था जो कोई भी देता। इरा क़ुरैशी, जो हर चीज़ में pattern ढूँढती थी, जो लिखावट का झुकाव पढ़ लेती थी, उसने इससे बेहतर जवाब कभी नहीं दिया था। आज दिया।

विक्रांत ने उसकी तरफ़ देखा। उसकी नज़र सामने की गली पर टिकी थी।

उसने कुछ नहीं कहा।

वे कोठी लौटे तो फ़ोन बज रहा था।

विक्रांत ने उसे फाटक से ही सुन लिया। वह mechanical घंटी। ट्रिन्न्न्न... ट्रिन्न्न्न... सीढ़ियों वाले स्टूल से, बरामदे से, आँगन तक। दिन में।

इरा रुक गई।

विक्रांत आगे बढ़ा, अंदर, सीढ़ियों की तरफ़। घंटी लगातार बज रही थी, हर बार उतनी ही तेज़, उतनी ही धैर्यवान। Receiver अपने cradle में हल्का-हल्का काँप रहा था। कटा हुआ तार स्टूल से नीचे लटका था, और विक्रांत ने देखा कि उसका सिरा, वह जगह जहाँ ताँबे के धागे बाहर निकले थे, गीली थी। एक बूँद उससे लटक रही थी, धीरे-धीरे बड़ी होती हुई।

ऊपर, सीढ़ियों के सिरे पर, कबीर खड़ा था।

पहली बार, इन दो हफ़्तों में, कबीर ने वह आवाज़ सुनी थी। उसका चेहरा सफ़ेद था, पर उसने दीवार का सहारा नहीं लिया था। वह बस खड़ा था, फ़ोन को घूरता हुआ।

"ये बज रहा है," उसने कहा। उसकी आवाज़ में कोई सवाल नहीं था। बस एक अजीब, थका हुआ स्वीकार। "मैंने गोली नहीं ली आज। और ये बज रहा है।"

ट्रिन्न्न्न...

"मत उठाना," विक्रांत ने कहा।

"मुझे पता है।"

घंटी बजती रही। विक्रांत ने गिना नहीं, पर उसके दिमाग़ ने गिना, उसकी इच्छा के ख़िलाफ़, जैसे वह हर चीज़ गिनता था। आठ। नौ। दस।

ग्यारह।

फाटक की तरफ़ से कदमों की आवाज़। धीमे, नंगे पैर, पत्थर पर। रघु काका आया, लोई कंधे पर, चेहरा कोहरे से गीला। वह कहीं से लौटा था, पूरे दिन बाद। उसने किसी की तरफ़ नहीं देखा। वह सीधा स्टूल तक गया।

बारह।

उसने receiver उठाया। उसे अपने कान तक नहीं ले गया। बस उठाया, एक पल हवा में रखा, जैसे उसका वज़न तौल रहा हो, और वापस cradle पर रख दिया।

घंटी रुक गई।

फिर रघु काका ने अपनी लोई कंधे से उतारी, पूरी, मोटी, ऊनी, और उसे फ़ोन पर डाल दिया। उसे चारों तरफ़ से लपेटा, कसकर, जैसे किसी बच्चे को ठंड से बचाने के लिए। या जैसे किसी के मुँह पर कपड़ा बाँधा जाता है।

वह मुड़ा, और उसकी नज़र विक्रांत पर पड़ी। एक पल के लिए।

विक्रांत ने उसकी आँखों में वह सवाल देखा जो उसके अपने होंठों पर था। दो भाई थे...

"कल," रघु काका ने कहा, धीमे, जैसे उसने वह सवाल सुन लिया हो। "कल पूछना।"

और वह पीछे के गलियारे की तरफ़ चला गया, उस आँगन की तरफ़, उस जाली की तरफ़, जहाँ वह पिछली रात बैठा रहा था।

"वो रजिस्टर छिपाया गया था," इरा ने कहा। "किताबों के पीछे। दीवार और अलमारी के बीच की दरार में।"

वे लाइब्रेरी में थे। शाम ढल रही थी, कोहरा खिड़कियों पर भारी था, और सारी lamps जल रही थीं। कबीर भी वहीं था, आज पहली बार, एक कुर्सी पर, बिना किसी गिलास के। उसने कहा था कि वह अकेला अपने कमरे में नहीं बैठ सकता। विक्रांत ने उससे कुछ नहीं पूछा।

"जिसने उसे वहाँ रखा," इरा ने आगे कहा, "वो जानता था कि कोई उसे ढूँढेगा। पर वो उसे आसानी से मिलने नहीं देना चाहता था। तो अगर उसने एक चीज़ छिपाई..."

"तो और भी छिपाई होंगी," विक्रांत ने कहा।

इरा सिर हिलाकर अलमारियों की तरफ़ गई।

उसने तरीके से शुरू किया, जैसे एक archivist करती है। हर अलमारी के पीछे की दीवार को खटखटाया, सुनते हुए। हर खाने की गहराई को नापा, अपनी बाँह अंदर डालकर। किताबों की कतारों को एक-एक करके बाहर खींचा, उनके पीछे देखा, और फिर वापस रखा।

विक्रांत ने उसकी मदद की। उसके कान खटखटाहट में खोखलेपन को पकड़ने में इरा से बेहतर थे।

एक घंटा बीता। फिर डेढ़।

कबीर अपनी कुर्सी पर बैठा रहा, उन्हें देखता हुआ, कुछ नहीं कहता हुआ। बीच-बीच में उसकी नज़र दरवाज़े की तरफ़ जाती, फिर लौट आती।

फिर, सबसे नीचे वाली अलमारी के, सबसे निचले खाने में, उत्तरी दीवार के साथ, विक्रांत ने खटखटाया और सुना।

वहाँ कुछ अलग था। लकड़ी का खाना ठोस था, पर उसके पीछे की दीवार नहीं। खटखटाहट की आवाज़ गहरी थी, गोल, जैसे पीछे कोई ख़ाली जगह हो।

उसने खाने से किताबें निकालीं। पीछे की लकड़ी का पटरा दिखा, बाकी अलमारी जैसा, गहरा भूरा। पर उसके किनारे पर एक पतली दरार थी, जो बाकी पटरों में नहीं थी।

इरा ने अपनी gloves उतारीं, अपनी उँगलियाँ उस दरार में फँसाईं, और खींचा।

पटरा बाहर आया। उसके पीछे, दीवार में, एक छोटी, अंधेरी कोटर थी। और उसमें, एक डिब्बा।

लकड़ी का। छोटा, किसी बड़ी किताब जितना। एक मोटे, मोम लगे कपड़े में लिपटा, जो अब भूरा और सख़्त हो चुका था। इरा ने उसे बाहर निकाला, दोनों हाथों से, बहुत सावधानी से, जैसे कोई नवजात बच्चे को उठाता है।

मेज़ पर रखा। कपड़ा खोला।

कपड़े के अंदर से एक गंध आई। मोम की, सूखी लकड़ी की। और उसके नीचे, बहुत हल्की, वह जानी-पहचानी नमी।

डिब्बे के ढक्कन पर कोई नक़्क़ाशी नहीं थी। बस वही निशान, जो रजिस्टर की जिल्द पर था। लकड़ी में जलाकर बनाया गया। एक गोला, और उसके बीच से नीचे जाती एक सीधी लकीर।

इरा ने ढक्कन खोला।

अंदर एक किताब थी। पतली, हाथ से सिली हुई, चमड़े की जिल्द, जिसके किनारे घिसकर गोल हो चुके थे। उस पर कोई नाम नहीं था। इरा ने उसे उठाया, और पहला पन्ना खोला।

वहाँ उर्दू में कुछ लिखा था, एक सुंदर, सधी हुई, पुराने ज़माने की लिखावट में। सबसे ऊपर, बड़े अक्षरों में, एक शीर्षक। और नीचे, छोटे अक्षरों में, एक नाम, और एक मुहर, लाल स्याही की, जो अब भूरी पड़ चुकी थी।

इरा ने उसे पढ़ा, और उसकी उँगलियाँ पन्ने पर रुक गईं।

विक्रांत ने उसके चेहरे को देखा। उसके होंठ थोड़े खुले, और फिर बंद हुए। उसकी आँखें उस नाम पर टिकी रहीं, उस मुहर पर, बहुत देर तक, जैसे वह किसी ऐसी लिखावट को पहचान रही हो जो उसने पहले कहीं देखी हो।

"क्या लिखा है?" कबीर ने पूछा।

"रिसाला-ए-सदाई," इरा ने कहा। उसकी आवाज़ थोड़ी काँपी, फिर सँभली। "सदाई का रिसाला। एक तरह का... ग्रंथ। Treatise।" उसने गला साफ़ किया। "और लिखने वाले का नाम है मीर सादिक़ अली। आमिल।"

"आमिल?"

"जो जिन्नों से बात करते हैं। उन्हें बुलाते हैं। बाँधते हैं।"

कबीर हँसा, पर उसकी हँसी बीच में टूट गई, और वह चुप हो गया।

विक्रांत ने इरा को देखा। उसकी उँगलियाँ अब भी उस मुहर पर थीं, धीरे से उसके किनारे को छूती हुई। जैसे बाजा-घर में उसने उस photo के शीशे को छुआ था। उस सफ़ेद कपड़ों वाले आदमी के चेहरे को।

उसने उसे उस ढेर में रखा। अब वह ढेर इतना ऊँचा था कि उसके ऊपर से देखना मुश्किल था।

"पढ़ो," उसने कहा।

इरा ने पढ़ा। धीरे-धीरे, एक-एक पंक्ति, उर्दू से हिंदी में ढालते हुए, बीच-बीच में रुककर किसी शब्द का अर्थ सोचते हुए। Lamp की रोशनी उसके चेहरे पर पड़ रही थी, और उसकी आवाज़, उस शांत कमरे में, किसी पुराने ज़माने की क़िस्सागो जैसी लग रही थी।

"सन तेरह सौ दस हिजरी में, जो अंग्रेज़ी में अठारह सौ तिरानवे हुआ, रौशनपुर में बारिश नहीं हुई। तीसरे साल लगातार। ज़मीन फट गई, कुएँ सूख गए। लाला हरकिशन सहगल, जिन्होंने नवाब साहब से यह कोठी ख़रीदी थी, क़र्ज़ में डूब चुके थे। उनकी बावड़ी, जिस पर उनका बहुत नाज़ था, सूखी पड़ी थी, उसकी तली में बस धूल।"

इरा ने पन्ना पलटा।

"लाला मेरे पास आए। लखनऊ। रोते हुए। कहा, मीर साहब, कुछ कीजिए। आप पहुँचे हुए आदमी हैं। मैंने उन्हें मना किया। कहा, जो आप माँग रहे हैं, उसकी क़ीमत आप नहीं चुका पाएँगे। उन्होंने कहा, जो भी क़ीमत हो। मैंने उनकी ज़िद के आगे हार मानी। ये मेरी पहली ग़लती थी, और मेरी सबसे बड़ी।"

कबीर ने अपनी कुर्सी आगे खिसकाई।

"अमावस की रात, बावड़ी की सातवीं तली पर, मैंने उसे बुलाया। वो कोई आम जिन्न नहीं था। उसकी कोई शक्ल नहीं थी। कोई चेहरा नहीं। वो आवाज़ों में रहता था। गूँजों में। हर उस जगह जहाँ कोई आवाज़ टकराकर लौटती है। मैंने उसे सदाई कहा, क्योंकि उसके पास सदा के सिवा कुछ नहीं था। आवाज़। गूँज।"

विक्रांत ने अपनी साँस रोक ली।

उलटी गूँज। चौंतीस मीटर। साठ milliseconds पहले।

"मैंने उससे सौदा किया। बावड़ी में पानी। खेतों में बारिश। कोठी में बरकत। बदले में उसने कुछ माँगा जो मैंने पहले कभी किसी जिन्न को माँगते नहीं सुना था।"

इरा रुकी। उसने ऊपर देखा।

"उसने एक नाम माँगा।"

"उसने कहा, मेरा कोई नाम नहीं है। मैं हज़ारों साल से हूँ, और किसी ने मुझे कभी पुकारा नहीं। जिसका कोई नाम नहीं, उसे कोई बुलाता नहीं। जिसे कोई बुलाता नहीं, वो है ही नहीं। मुझे एक नाम दो।"

"मैंने लाला से कहा, उसे कोई नाम दे दो। कोई भी। लाला ने सोचा ये आसान है। एक नाम। क्या जाता है? उन्होंने हँसकर कहा, सुबह सोचकर बता देंगे।"

"पर सदाई सुबह तक इंतज़ार नहीं करता।"

इरा ने पन्ना पलटा। उसकी उँगलियाँ अब धीमी चल रही थीं।

"उस रात लाला का बेटा, ग्यारह बरस का, नींद से उठकर बावड़ी वाले आँगन में आ गया। शायद हमारी आवाज़ें सुनकर। शायद रोशनी देखकर। वो सीढ़ियों के ऊपर खड़ा था, नीचे झाँकता हुआ।"

"और नीचे से उसकी माँ की आवाज़ आई। जो उस वक़्त कोठी के अंदर सो रही थी।"

"उसने उसे नाम लेकर पुकारा।"

कमरे में कोई नहीं हिला। Lamp की रोशनी स्थिर थी।

"और लड़के ने जवाब दिया। 'हाँ अम्मा?' और वो उतरा। एक सीढ़ी। फिर दूसरी। मैं उसे रोक नहीं पाया। मैं ठीक उसके पास था, और मैं उसे रोक नहीं पाया। मुझे आज भी समझ नहीं आता क्यों। जैसे मेरे पैर ज़मीन में गड़ गए हों।"

"वो नीचे गया। और ऊपर नहीं आया।"

"और सदाई ने अपना पहला नाम पाया।"

इरा ने किताब को एक पल के लिए नीचे रखा। अपनी आँखें मलीं।

"आगे," विक्रांत ने कहा। उसकी आवाज़ उसे ख़ुद अजनबी लगी।

इरा ने फिर उठाई।

"मैंने उसे बाँधा। जितना बाँध सकता था। मैंने एक अहद बनाया, एक क़रार, जो लाला के ख़ानदान और उसके बीच था। वो बावड़ी में रहेगा। नीचे। सातवीं तली पर, उस कोठरी में, जिसका दरवाज़ा मैंने अंदर से बंद किया। ख़ानदान को बरकत मिलेगी। और बदले में, हर पीढ़ी में, ख़ानदान उसे एक नाम देगा। एक। अपनी मर्ज़ी से। और ये नाम एक बही में दर्ज होगा, ताकि हिसाब रहे।"

रजिस्टर। गोला और लकीर।

"और गाँव के लिए मैंने नियम लिखे। ताकि जब तक अहद क़ायम है, वो किसी और को न ले।"

इरा ने पढ़ना जारी रखा, और विक्रांत ने उन्हें सुना, एक-एक करके, जैसे किसी ऐसे दरवाज़े की चाबियाँ जिसे वह दो हफ़्तों से खटखटा रहा था।

"रात में कोई नाम लेकर पुकारे, तो जवाब मत देना। चाहे आवाज़ किसी की भी हो। सदाई सिर्फ़ उसी को ले सकता है जो उसे जवाब दे।"

"दरवाज़ों पर लोहा ठोको। उसे लोहा पसंद नहीं।"

"बावड़ी की सीढ़ियाँ कभी मत गिनना। गिनती की हर आवाज़ उसके लिए एक सीढ़ी है। जितना गिनोगे, उतना वो ऊपर आएगा। और एक सौ आठ के बाद जो सीढ़ी है, वो किसी इंसान के लिए नहीं बनी।"

विक्रांत ने अपनी आँखें बंद कीं। एक सौ नौ। उसकी अपनी आवाज़। उस ताला-बंद कोठरी में।

"और सबसे ज़रूरी: उस नाम की हिफ़ाज़त करो जो वो पहने हुए है। जिस नाम से वो जाना जाता है, वही उसका दरवाज़ा है। उस नाम को अंधेरे में मत लेना। उसे ज़ोर से मत पढ़ना। कभी नहीं।"

इरा ने पढ़ना रोका। उसने किताब को थोड़ा अपनी तरफ़ झुकाया, जैसे अगली पंक्ति ठीक से न दिख रही हो।

"आगे क्या है?" कबीर ने पूछा।

"एक और हिस्सा।" इरा ने कहा। "छोटा। लगता है बाद में जोड़ा गया। अलग स्याही।" उसने आँखें सिकोड़ीं। “'जो इसके आगे है, वो इस रिसाले में नहीं। वो दूसरी किताब में है, जो मेरे बेटे के पास रहेगी, और उसके बेटे के पास, ताकि जब कभी ये अहद टूटे, तो कोई जानता हो कि...'” वह रुकी। "बाकी धुँधला है। पानी लगा है।"

"दूसरी किताब," विक्रांत ने कहा। "कहाँ है वो?"

इरा ने उसकी तरफ़ नहीं देखा। उसने पन्ना पलटा, बहुत तेज़ी से।

"यहाँ एक और पंक्ति है," उसने कहा। "आख़िरी पन्ने पर। उस पहले नाम के बारे में। लिखा है..."

उसकी उँगली शब्दों पर चल रही थी। वह पढ़ रही थी, अनुवाद कर रही थी, उसका दिमाग़ उर्दू से हिंदी में शब्दों को ढाल रहा था, जैसे वह पिछले आधे घंटे से कर रही थी, एक लय में, एक धारा में, बिना रुके। उसकी आवाज़ में एक archivist की वह खोई हुई तल्लीनता थी, जो किसी पुराने पाठ में इतनी डूब जाती है कि बाहर की दुनिया भूल जाती है।

“‘...और वो उस लड़के का नाम पहनकर नीचे बैठ गया। और तब से, जब तक कोई नया नाम न मिले, वो उसी नाम से जाना जाएगा। उसका पहला नाम। उसका असली दरवाज़ा...’” उसकी आवाज़ बहती रही, धारा में, बिना रुके, “‘...देवकिशन।'”

शब्द निकल गया।

इरा का मुँह खुला रह गया। उसकी उँगली उस शब्द पर जमी रही। उसकी आँखें बड़ी हुईं, धीरे-धीरे, जैसे किसी ने उसे अभी-अभी बताया हो कि उसने एक कदम उठाया है और उसके नीचे ज़मीन नहीं है।

उसने वह नाम ज़ोर से पढ़ दिया था।

कुछ पल कुछ नहीं हुआ।

लाइब्रेरी की खामोशी वैसी ही थी। Lamps जल रही थीं। कबीर अपनी कुर्सी पर था, आगे झुका। विक्रांत मेज़ के किनारे खड़ा था।

फिर विक्रांत ने उसे महसूस किया।

गंध पहले आई। गीला पत्थर। काई। इतनी अचानक, इतनी भारी, जैसे किसी ने कमरे के बीच में एक कुएँ का ढक्कन हटा दिया हो।

फिर रोशनी।

लाइब्रेरी में तीन battery lamps थीं, जिनकी लौ नहीं होती। पर एक लालटेन भी थी, असली, केरोसिन वाली, जो रघु काका ने शाम को कोने में रख दी थी, बिजली के भरोसे के बिना। उसकी लौ झुक रही थी।

इरा की तरफ़।

लंबी, पतली, लगभग क्षैतिज, काँच की चिमनी के किनारे को छूती हुई, जैसे कोई चीज़ उसे पूरी ताक़त से खींच रही हो।

और बाहर, गलियारे में, विक्रांत ने उसे देखा, दरवाज़े की दरार से। रसोई की तरफ़ से एक रोशनी, अँगीठी की, आती थी। वह भी झुकी हुई थी। इसी तरफ़। लाइब्रेरी की तरफ़।

कबीर खड़ा हो गया। उसकी कुर्सी पीछे गिरी, एक तेज़ आवाज़ के साथ।

"ये..." उसने कहा। “...ये क्या...”

ऊपर, पहली मंज़िल पर, बरामदे में लटके एक पुराने दीये में, जो रघु काका हर शाम जलाता था, विक्रांत ने बाद में सोचा, उसकी लौ भी नीचे की तरफ़ झुकी होगी। पूरी कोठी की हर लौ। एक तरफ़। एक इंसान की तरफ़।

उस इंसान की तरफ़, जिसने वह नाम लिया था।

इरा की उँगली अब भी किताब पर थी। वह हिल नहीं पा रही थी। उसकी आँखें छत की तरफ़ उठीं, धीरे-धीरे, जैसे कोई चीज़ उसे वहाँ देखने को कह रही हो।

और फिर, ऊपर से, उस मंज़िल से जहाँ बंद कमरों की कतार थी, जिनकी चाबियाँ रघु काका के गुच्छे में थीं और जो सालों से नहीं खुले थे, एक आवाज़ आई।

किसी बच्चे की नहीं।

एक आदमी की। उम्रदराज़। थकी हुई। भारी, कर्कश, जैसे किसी ने बहुत, बहुत देर तक कुछ नहीं बोला हो, और उसका गला भूल गया हो कि आवाज़ कैसे बनाई जाती है। जैसे कोई बहुत लंबी नींद से उठा हो। या बहुत लंबे इंतज़ार से। एक सौ तैंतीस साल के इंतज़ार से।

उसमें कोई साँस नहीं थी।

और उस आवाज़ ने, बहुत धीमे, बहुत आज्ञाकारी ढंग से, जैसे कोई बच्चा माँ के पुकारने पर जवाब देता है, बस एक शब्द कहा:

"हाँ?"

[Part 14 समाप्त]

Writer
Piyashi Atma
Story
जवाब मत देना
Chapter
14 of 30
Category
Ghost Stories
Reading time
15 min
Words
2805
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

← पिछला भाग  ·  अगला भाग →

जवाब मत देना · सभी भाग →

और कहानियाँ · More stories