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Part 13: नूर बानो की स्लेट
Piyashi Atma · Ghost Stories · 15 मिनट
सुबह विक्रांत ने इरा को वह आख़िरी वाक्य नहीं सुनाया।
उसने उसे बाकी सब बताया। Deconvolution, early reflections, बावड़ी का मुँह, खुला आसमान। माँ, घुटनों के बल, किनारे पर, नीचे चीखती हुई। वो विक्रांत नहीं है का पूरा वाक्य, उसकी जगह, उसका संदर्भ। Grief। एक टूटी हुई माँ, जो अपने बचे हुए बेटे को पहचान नहीं पा रही थी।
उसने लोरी नहीं बताई। उसने वह फुसफुसाहट नहीं बताई। उसे इस नाम से मत बुलाओ, वो जवाब दे देगा।
उसने ख़ुद से कहा कि वह इसलिए नहीं बता रहा क्योंकि अभी उसका मतलब साफ़ नहीं है। क्योंकि वह पहले उसे ठीक से समझना चाहता है। क्योंकि एक टूटी हुई माँ की फुसफुसाहट को किसी और के सामने रखना उसे उनकी बेइज़्ज़ती जैसा लगता है।
ये सब कारण सच थे। पर उनके नीचे एक और कारण था, जिसे उसने देखने से इनकार कर दिया। जैसे कोई अपनी जेब में रखे पत्थर को टटोलता रहे, उसकी शक्ल महसूस करता रहे, पर उसे निकालकर रोशनी में न देखे।
इरा ने सुना, सिर हिलाया, और उसकी आँखों में वह सावधान ध्यान फिर से था। जैसे वह भी जानती हो कि कोई पन्ना गायब है।
"बुआ ग्यारह बजे आएँगी," उसने बस इतना कहा।
बद्री की बुआ का नाम रामदुलारी था। उसने यह ज़ोर से बताया, गुमटी के बाहर, और फिर विक्रांत के कंधे पर अपनी हड्डियों भरी हथेली से एक थपकी दी, जैसे वे पुराने परिचित हों।
"नूर मेरी सखी थी," उसने चलते हुए कहा, अपनी लाठी टेकते हुए, उस ऊँची, बहरी आवाज़ में जिसे वह कभी धीमा नहीं करती थी। "बचपन की। साथ गुड़िया खेली, साथ कुएँ पे पानी भरा। उसका गला..." उसने एक लंबी साँस ली। "...तुम्हें क्या बताऊँ बेटा। कोयल भी शरमा जाए।"
रास्ता चौक से पीछे की तरफ़ जाता था, सँकरी गलियों में, जिनमें दोनों तरफ़ के घर इतने पास थे कि ऊपर से कोहरे की बस एक पतली पट्टी दिखती थी। मिट्टी की दीवारें, लकड़ी के दरवाज़े, जिनमें से कई पर लोहे की कीलें ठुकी थीं, रघु काका की तरह। गलियों में कोई नहीं था। एक-दो बार किसी खिड़की के पीछे कोई चेहरा दिखा, फिर हट गया।
फिर एक छोटी, सफ़ेद पुती मस्जिद, जिसकी मीनार कोहरे में आधी डूबी थी। और उसके पीछे, एक कच्चा घर। अकेला। नीची छत, छोटा दरवाज़ा, एक भी खिड़की नहीं।
नहीं, खिड़की थी। विक्रांत ने देखा। एक खिड़की की चौखट, पर उसके अंदर मिट्टी भरी हुई थी, और ऊपर से लीपी हुई। जैसे किसी ने बहुत पहले उसे बंद कर दिया हो, और कभी खोलने का इरादा न हो।
रामदुलारी ने दरवाज़ा खटखटाया। अपनी लाठी के सिरे से। तीन बार। फिर एक बार।
विक्रांत ने इरा की तरफ़ देखा। इरा ने भी उसकी तरफ़ देखा।
ठक-ठक-ठक। ... ठक।
"ये हमारा पुराना इशारा है," रामदुलारी ने कहा, उनके चेहरे देखकर। "बचपन का। ताकि रात को पता चले कि मैं हूँ, कोई और नहीं।" वह हँसी। "नूर ने सिखाया था।"
अंदर से कुंडी खुलने की आवाज़ आई।
दरवाज़ा अंदर की तरफ़ खुला, और वहाँ अंधेरा था।
पहले विक्रांत को कुछ नहीं दिखा। फिर उसकी आँखों ने उस अंधेरे को टटोला, और धीरे-धीरे आकृतियाँ उभरीं। एक छोटा कमरा। एक चारपाई। एक मिट्टी का चूल्हा, ठंडा। और दीवारें।
दीवारों पर रज़ाइयाँ थीं। बाकी गाँव की तरह, पर उससे कहीं ज़्यादा। एक के ऊपर एक, परतों में, इतनी मोटी कि कमरे के कोने गोल हो गए थे। छत से भी लटकी थीं। फ़र्श पर गद्दे बिछे थे, एक दूसरे के ऊपर। पूरा कमरा अंदर से कपड़े में लिपटा था, जैसे किसी नाज़ुक चीज़ को डिब्बे में पैक किया जाता है।
विक्रांत ने अपने कदम अंदर रखे, और उसके कानों ने कुछ अजीब महसूस किया।
खामोशी। पूरी। गहरी। उसने ऐसी खामोशी सिर्फ़ एक जगह महसूस की थी, बरसों पहले, training के दौरान, एक anechoic chamber में। एक ऐसा कमरा जिसकी दीवारें हर आवाज़ को निगल लेती हैं, जहाँ कोई गूँज नहीं लौटती, और जहाँ थोड़ी देर बाद तुम्हें अपने ही दिल की धड़कन, अपने ही ख़ून का बहना सुनाई देने लगता है। जहाँ ज़्यादातर लोग आधा घंटा भी नहीं टिक पाते, क्योंकि खामोशी इतनी पूरी होती है कि दिमाग़ उसे भरने के लिए अपनी आवाज़ें बनाने लगता है।
यह कमरा लगभग वैसा ही था।
और उस कमरे के बीच, चारपाई के किनारे, नूर बानो बैठी थी।
वही काली, धुँधली चादर। वही पतला, पारदर्शी चेहरा। गले में वही स्लेट, रस्सी से लटकी। उसकी उँगलियाँ चॉक से सफ़ेद। उसने रामदुलारी को देखा, और उसके चेहरे पर कुछ नरम हुआ। फिर उसकी नज़र इरा पर गई। फिर विक्रांत पर।
और वहाँ रुक गई।
रामदुलारी ने उसके पास बैठकर उसके हाथ थामे। उसने ज़ोर से, बहुत ज़ोर से, उस खामोश कमरे में जहाँ उसकी आवाज़ बिना गूँजे मर रही थी, कुछ कहा। ये लोग कोठी से आए हैं। इकहत्तर के बारे में जानना चाहते हैं। तू बता दे, सखी। अब बहुत हो गया। अब बता दे।
नूर बानो ने विक्रांत को देखा। बहुत देर तक।
फिर उसने अपनी स्लेट उठाई।
कमरे में रोशनी के लिए सिर्फ़ इरा की battery lamp थी। उसने उसे फ़र्श पर रखा, ऊपर की तरफ़ मुँह करके, और उसकी नीली-सफ़ेद रोशनी ने कमरे को किसी गुफ़ा की तरह रोशन किया।
और तब विक्रांत ने पीछे वाली दीवार देखी।
उस पर कोई रज़ाई नहीं थी। बाकी तीन दीवारें कपड़े में लिपटी थीं, पर यह एक दीवार ख़ाली थी। और काली। किसी ने उसे काले रंग से पोता था, या कोयले से, या किसी चीज़ से जो उसे स्लेट की तरह बना दे।
और वह लिखावट से भरी थी।
ऊपर से नीचे। किनारे से किनारे। चॉक की लिखावट, सफ़ेद, परत के ऊपर परत। कुछ ताज़ा, साफ़, चमकते हुए। कुछ आधी मिटी हुई, उनके ऊपर नए शब्द। कुछ इतनी पुरानी, इतनी बार मिटाई और फिर से लिखी हुई, कि वे काले रंग का हिस्सा बन चुकी थीं, सलेटी भूतों की तरह।
इरा के मुँह से एक धीमी आवाज़ निकली। एक archivist की आवाज़, जो किसी असाधारण दस्तावेज़ को देखती है।
"Palimpsest," उसने फुसफुसाया। "पचपन साल का।"
विक्रांत पास गया। वह शब्दों को पढ़ने की कोशिश कर रहा था, पर वे एक दूसरे में इतने उलझे थे कि अलग करना मुश्किल था। फिर उसने कुछ पहचाने। नाम। वही नाम, बार-बार। सैकड़ों बार। हज़ारों बार।
शफ़ीक़।
FIR का पहला नाम। दूल्हा।
उसके बगल में और नाम। वही ग्यारह। एक के नीचे एक, फिर से, फिर से, जैसे किसी ने हर रात उन्हें लिखा हो, ताकि वे भूल न जाएँ। ताकि दुनिया में कम से कम एक जगह हो जहाँ वे अब भी ज़िंदा हों।
और नीचे, नए, साफ़ अक्षरों में, जो शायद पिछले कुछ हफ़्तों में लिखे गए थे:
सलीम।
विक्रांत की नज़र दीवार के दाएँ हिस्से पर गई। वहाँ, बीच की परतों में, एक संख्या थी। 1999। और उसके नीचे, एक नाम। आधा मिटा हुआ, धुँधला, उसके ऊपर किसी और शब्द की परत। उसने उसके अक्षर पढ़ने की कोशिश की। पहला अक्षर...
उसकी बाँह को किसी ने छुआ।
नूर बानो उसके पीछे खड़ी थी। वह कब उठी, उसने नहीं सुना। इस कमरे में कोई कदम सुनाई नहीं देते थे। वह उसकी बगल से निकली, दीवार तक गई, और अपनी चादर की बाँह से उस हिस्से को रगड़ने लगी। जल्दी-जल्दी। ज़ोर से। जब तक वह नाम, जो भी था, एक सफ़ेद, बेमानी धब्बे में नहीं बदल गया।
फिर वह मुड़ी, विक्रांत की आँखों में देखा, और अपना सिर धीरे से हिलाया।
नहीं। अभी नहीं।
वह वापस चारपाई पर जाकर बैठ गई, और अपनी स्लेट उठाई।
चॉक की आवाज़ उस खामोश कमरे में किसी चाकू जैसी थी। चीं-चीं-चीं। हर अक्षर अलग से सुनाई देता, साफ़, धारदार, और फिर तुरंत रज़ाइयों में मर जाता।
नूर बानो लिखती, स्लेट घुमाती, इरा पढ़ती, धीमे, फुसफुसाकर, और फिर नूर अपनी बाँह से स्लेट पोंछती और फिर लिखती।
इरा कोई नाम नहीं पढ़ती थी। जहाँ नाम आता, वह रुक जाती, और बस इतना कहती, "दूल्हा", या "उसका भाई"। नूर ने इस पर ध्यान दिया, और विक्रांत ने देखा कि उसकी धुँधली आँखों में एक पल के लिए कुछ चमका। मंज़ूरी।
ढोल बज रहा था।
चीं-चीं। पोंछना।
हम कोठी वाली गली से लौट रहे थे। मना किया था अब्बू ने। पर दूल्हे वाले नहीं माने।
पोंछना।
बावड़ी के पास, गली में कोई बोला।
"कौन?" इरा ने पूछा।
नूर ने कुछ देर लिखा नहीं। उसकी उँगलियाँ चॉक पर कसी रहीं।
दूल्हे की अम्मी की आवाज़। उसे नाम से बुलाया। 'बेटा, रुक।'
पोंछना।
उसकी अम्मी तो गाँव में थीं। घर पर। पर आवाज़ उनकी थी।
पोंछना।
उसने कहा, 'हाँ अम्मी?' और मुड़ा।
चॉक रुकी।
और फिर वो नहीं था।
इरा ने स्लेट से अपनी नज़र हटाई और विक्रांत की तरफ़ देखा। उसका चेहरा lamp की रोशनी में पीला था।
नूर ने पोंछा, और लिखती रही। धीरे, सधे हुए अक्षरों में, जैसे उसने यह कहानी अपने अंदर पचपन साल तक इतनी बार दोहराई हो कि हर शब्द अपनी जगह पर बैठा हो।
फिर उसका भाई। उसके अब्बू की आवाज़। 'हाँ अब्बा।' और नहीं था।
फिर उसका दोस्त। उसकी बहन की आवाज़।
एक-एक करके। सबको उसी आवाज़ ने बुलाया जिसे वो सबसे ज़्यादा प्यार करते थे।
और सबने जवाब दिया।
क्योंकि उस आवाज़ को कौन जवाब नहीं देगा?
विक्रांत ने अपने हाथ मुट्ठियों में बंद कर लिए। और तुम? तुम कहाँ हो? इरा की आवाज़। अगर उसने सुना होता।
ढोल वाला सबसे आख़िर तक बजाता रहा। उसे शायद कुछ सुनाई नहीं दे रहा था, ढोल के शोर में।
फिर उसकी बेटी की आवाज़। 'अब्बा, घर चलो।'
ढोल रुका।
फिर एक बार बजा। अकेला। जैसे कोई और बजा रहा हो।
फिर बंद।
कमरे की खामोशी अब इतनी भारी थी कि विक्रांत को अपने कानों में अपना ख़ून बहता सुनाई दे रहा था। रामदुलारी, जिसने एक भी शब्द नहीं सुना था, बस स्लेट को देख रही थी, और उसकी एक अच्छी आँख से आँसू बह रहे थे।
नूर ने स्लेट पोंछी। उसका हाथ अब काँप रहा था।
फिर मुझे बुलाया।
अब्बू की आवाज़ में। डोली के बाहर से। 'नूर, बेटा। उतर आ।'
मैंने मुँह पर हाथ रखे। इतने ज़ोर से कि दाँत होंठ में गड़ गए। ख़ून आया।
मैंने जवाब नहीं दिया।
उसने स्लेट पोंछी, और कुछ देर तक कुछ नहीं लिखा। बस अपने हाथों को देखती रही, उन झुर्रियों भरी हथेलियों को, जैसे उन्हें पचपन साल पहले की उस रात में देख रही हो, होंठों पर दबी हुई।
फिर उसने लिखा, और इस बार उसके अक्षर बड़े थे, टेढ़े, काँपते हुए।
फिर उसने मुझे मेरी आवाज़ में बुलाया।
इरा की साँस रुक गई।
मेरी अपनी आवाज़। बिल्कुल मेरी। डोली के पर्दे के ठीक बाहर से। जैसे मैं ख़ुद बाहर खड़ी हूँ और अंदर वाली नूर को बुला रही हूँ।
उसके पास मेरी आवाज़ थी। क्योंकि मैंने उसी शाम विदाई का गीत गाया था। बावड़ी वाले आँगन में। ज़ोर से। सबने तारीफ़ की थी।
विक्रांत को अपना पेट ठंडा पड़ता महसूस हुआ।
पहली रात। गलियारे में। "इरा?" उसकी आवाज़। उस अंधेरे में, उस गूँज में।
पीछे की कोठरी। गिनती। उसकी आवाज़।
तब मैं समझी, नूर ने लिखा। जब तक मेरे पास आवाज़ है, वो मुझे मेरी आवाज़ से बुला सकता है। हर रात। हमेशा।
तो मैंने उसे दे दी।
"दे दी?" इरा ने फुसफुसाया। "कैसे?"
नूर ने बहुत धीरे लिखा।
अगली सुबह। बावड़ी के किनारे गई। सबकी नज़र बचाकर। झुकी। और आख़िरी बार बोली।
'ले।'
बस इतना। 'ले।'
और फिर कभी नहीं बोली।
उसने स्लेट नीचे रखी। उसकी आँखों में आँसू नहीं थे। बस वही पुरानी, थकी हुई, स्थिर दया, जो उसने हाट में विक्रांत को देखते हुए दिखाई थी। पर इस बार अपने लिए।
विक्रांत को अपनी आवाज़ ढूँढने में कुछ पल लगे।
"वो क्या है?" उसने पूछा। बहुत धीमे, उस खामोश कमरे के लायक। "वो... मेहमान?"
नूर ने उसे देखा। फिर स्लेट उठाई।
वो नाम खाता है।
उसका अपना कोई नाम नहीं। कभी नहीं था।
इसलिए वो दूसरों के नाम लेता है। उनकी आवाज़ें। जो जवाब देता है, उसका नाम उसका हो जाता है।
"और जो जवाब देता है, वो?"
नूर ने ज़मीन की तरफ़ इशारा किया। नीचे। जैसे हाट में किया था।
"नीचे।"
नूर ने सिर हिलाया।
विक्रांत ने अपनी जेब से वह टूटा हुआ स्लेट का टुकड़ा निकाला, जो इरा को नूर के दरवाज़े के नीचे से मिला था। उसे मत पुकारना। उसने उसे नूर की तरफ़ बढ़ाया।
"किसे? ये किसके बारे में था?"
नूर ने टुकड़ा लिया, उसे अपनी उँगलियों में घुमाया, फिर अपनी स्लेट पर लिखा।
जो नीचे गया है, उसे।
कोई अपने गए हुए को पुकारता है। अंधेरे में। रोते हुए। 'कहाँ है तू?'
और वो जवाब देता है। उसी की आवाज़ में।
और फिर तुम उसके पीछे जाते हो।
विक्रांत ने सलीम के आख़िरी message के बारे में सोचा। नीचे कोई बच्चा है। रो रहा है। और उस छोटी, काँपती आवाज़ के बारे में जो उसके फ़ोन पर आई थी। मैं अभी भी नीचे हूँ।
उसने अपनी आँखें बंद कर लीं।
"वो लड़का," इरा ने धीरे से पूछा, उस खामोशी में जगह बनाते हुए। "FIR में बारहवाँ नाम था। लालटेन वाला लड़का। चौकीदार का बेटा।"
नूर की उँगलियाँ चॉक पर रुकीं।
उसने लिखना शुरू किया। दो भाई थे...
और रुक गई। उसने उसे देखा, उस अधूरे वाक्य को। फिर बहुत तेज़ी से, अपनी बाँह से, उसे पोंछ दिया।
उसने सिर हिलाया, ज़ोर से। फिर लिखा:
उससे पूछो।
वह विक्रांत ने पहले सुना।
उसके कान, जो इस खामोश कमरे में किसी सुई के गिरने को भी पकड़ लेते, उन्होंने कुछ पकड़ा। बाहर से। दरवाज़े के उस पार से। उस गली से जहाँ कोई नहीं था।
एक आदमी की आवाज़। बूढ़ी, नरम, थोड़ी कर्कश, जैसे गले में बलग़म हो। प्यार से भरी।
"नूर? नूर, बेटा।"
नूर बानो का पूरा शरीर एक झटके से जम गया।
उसके हाथ उठे, अपने आप, जैसे किसी तार से खींचे गए हों, और उसके मुँह पर आ गए। दोनों हथेलियाँ। कसकर। जैसे रामदुलारी ने दिखाया था। जैसे हाट में उस छोटी लड़की ने किया था।
उसकी आँखें बड़ी थीं। दरवाज़े पर टिकी हुई।
इरा ने विक्रांत की बाँह पकड़ ली। उसने भी सुना था।
"नूर? दरवाज़ा खोल, बेटा। ठंड है।"
आवाज़ दरवाज़े के ठीक बाहर थी। लकड़ी से कुछ इंच दूर। विक्रांत के कान उसे नाप रहे थे, अपने आप, बिना उसकी मर्ज़ी के। एक बूढ़ा आदमी। साठ-सत्तर का। लखनवी लहजा, गँवई खिंचाव के साथ।
और उस आवाज़ में कोई साँस नहीं थी।
"क्या हुआ?" रामदुलारी ने ज़ोर से पूछा, सबके चेहरे देखकर। "क्या है? कोई आया?"
किसी ने उसे जवाब नहीं दिया।
"नूर, तेरा अब्बू हूँ। देख, मैं आ गया। तेरी विदाई की रात से तुझे ढूँढ रहा हूँ। एक बार दरवाज़ा खोल दे।"
नूर बानो चारपाई पर बैठी रही, हाथ मुँह पर, आँखें दरवाज़े पर। उसकी उँगलियों के बीच से, उसके होंठों के कोने से, ख़ून की एक पतली, लाल लकीर उसकी ठोड़ी की तरफ़ बहने लगी।
पचपन साल।
पचपन साल से यह आवाज़ उसके दरवाज़े पर आती थी, विक्रांत ने समझा। हर रात। शायद हर रात। उसके अब्बू की आवाज़, जो उस शाम बावड़ी के आँगन में उसकी विदाई पर रोए होंगे, ज़ोर से, गूँजते हुए। और पचपन साल से यह औरत अपने मुँह पर अपने हाथ दबाती आई थी।
इसीलिए खिड़की बंद थी। इसीलिए दीवारें कपड़े में लिपटी थीं। इसीलिए रात को दिया नहीं जलता था।
ताकि अंदर कोई आवाज़ न पहुँचे।
ताकि बाहर कोई आवाज़ न जाए।
"नूर..."
आवाज़ धीमी हुई। थोड़ी दूर हुई। जैसे बोलने वाला दरवाज़े से एक कदम पीछे हटा हो।
"...ठीक है, बेटा। कल आऊँगा।"
फिर कुछ नहीं।
कमरे की खामोशी लौट आई, पूरी, गहरी, निगलती हुई। नूर बानो ने बहुत धीरे, एक-एक उँगली करके, अपने हाथ अपने मुँह से हटाए। उसके होंठ कटे हुए थे, ख़ून से भरे। उसने अपनी चादर के किनारे से उन्हें पोंछा, जैसे यह कोई रोज़ का काम हो।
फिर उसने अपनी स्लेट उठाई, और लिखा, बहुत सीधे, बहुत सादे अक्षरों में:
रोज़ आता है।
वे कुछ देर और बैठे। किसी ने कुछ नहीं कहा। रामदुलारी ने नूर का हाथ थामे रखा, और धीरे-धीरे उसकी हथेली सहलाती रही, जैसे बचपन में करती होगी।
विक्रांत ने एक आख़िरी सवाल पूछा। वह नहीं पूछना चाहता था, पर उसके अंदर वह सवाल पिछले कई दिनों से एक बंद दरवाज़े के पीछे खड़ा होकर खटखटा रहा था, और अब उसने उसे खोल दिया।
"1999 में," उसने कहा। "जनवरी। आप... आप वहाँ थीं? कोठी पर?"
नूर ने उसे देखा।
फिर लिखा: किनारे पर थी। सुबह होने से पहले। सबके साथ।
"आपने क्या देखा?"
नूर ने बहुत देर तक कुछ नहीं लिखा। उसकी चॉक स्लेट के ऊपर, हवा में रुकी रही। फिर उसने लिखा।
दो बच्चे नीचे गए।
एक ऊपर आया।
विक्रांत ने उन शब्दों को पढ़ा। उनके सीधे, सादे अक्षरों को।
"मैं," उसने कहा। उसकी आवाज़ बहुत धीमी थी, उस कमरे में तुरंत मर गई। "मैं ऊपर आया।"
नूर बानो ने कुछ नहीं लिखा।
उसने बस उसे देखा। वही पुरानी, गहरी, थकी हुई दया से। जैसे कोई किसी ऐसे इंसान को देखता है जो बहुत बड़ी बात भूल गया हो, और जिसे यह भी नहीं पता कि उसने कुछ भूला है।
फिर उसने अपनी बाँह से स्लेट पोंछी।
जाने का वक़्त हुआ। रामदुलारी ने अपनी लाठी उठाई। इरा ने अपनी lamp। उन्होंने नूर को सलाम किया, और वह अपनी चारपाई पर बैठी रही, बिना उठे, बस सिर हल्का-सा झुकाकर।
विक्रांत सबसे आख़िर में था। दरवाज़े की दहलीज़ पर, वह एक पल के लिए रुका। उसने पीछे मुड़कर देखा।
नूर बानो उसे देख रही थी। उसकी स्लेट उसके हाथ में थी, और वह उस पर कुछ लिख रही थी। जल्दी, पर सावधानी से।
उसने स्लेट घुमाई, ताकि वह उसे देख सके। Battery lamp की आख़िरी नीली रोशनी, इरा के हाथ में दरवाज़े से बाहर जाती हुई, उस पर एक पल के लिए पड़ी।
ऊपर, वही चार अक्षर, जो उसने हाट में देखे थे। सफ़ेद चॉक में, काली स्लेट पर। बड़े, साफ़।
अंशु
विक्रांत का दिल रुका।
वह कुछ कहने वाला था। फिर से। नहीं, मैं विक्रांत हूँ, अंशु मेरा भाई था। वही बात जो उसने हाट में कही थी। उसके होंठ पहले से उन शब्दों का आकार बना रहे थे।
पर इस बार नूर ने स्लेट नहीं पोंछी। इस बार उसने उसके नीचे, छोटे अक्षरों में, एक और पंक्ति लिखी थी। धीरे-धीरे, जबकि वह देख रहा था, चॉक की आख़िरी चीं के साथ, उसने उसे पूरा किया।
तुम्हें याद नहीं।
पर उसे याद है।
[Part 13 समाप्त]
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- जवाब मत देना
- Chapter
- 13 of 30
- Category
- Ghost Stories
- Reading time
- 15 min
- Words
- 2966
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
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