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Part 12: माँ की आवाज़

Piyashi Atma · Ghost Stories · 14 मिनट

रघु काका ने थाली मेज़ के किनारे पर रख दी।
बहुत धीरे, बहुत सावधानी से, जैसे उसके अंदर कुछ टूटने वाला हो और वह उसे ज़मीन तक पहुँचने से पहले थाम लेना चाहता हो। छलकी हुई चाय का धब्बा फ़र्श पर फैलता रहा। उसने उसे नहीं पोंछा।
"काका," विक्रांत ने कहा। उसकी आवाज़ धीमी थी, लगभग माफ़ी माँगती हुई। "ये..."
"चाय ठंडी हो रही है।"
बूढ़े ने यह बात उसी सपाट, बेजान लहजे में कही जिसमें वह हर सुबह कहता था, चाय बना देता हूँ। उसकी नज़र अब भी उस पीले काग़ज़ पर थी। उस आख़िरी नाम पर। फिर उसने उसे वहाँ से उठाया, जैसे किसी भारी पत्थर को, और विक्रांत की तरफ़ देखा।
उसकी आँखों में कुछ नहीं था। न ग़ुस्सा, न डर। बस एक बहुत पुराना, बहुत थका हुआ ख़ालीपन। जैसे किसी कुएँ में झाँको और उसमें पानी न हो, तली न हो, बस अंधेरा, नीचे और नीचे।
"मुझसे मत पूछिए," उसने कहा। "अभी नहीं।"
वह मुड़ा और चला गया। उसके नंगे पैर लकड़ी के फ़र्श पर कोई आवाज़ नहीं कर रहे थे।
विक्रांत ने उसे बाद में खिड़की से देखा। फाटक से बाहर निकलते हुए, लोई कंधों पर, झुकी कमर, गाँव की तरफ़। कोहरे में धीरे-धीरे घुलता हुआ।
वह उस दिन लौटा नहीं।
"हो सकता है वो मिल गया हो," इरा ने कहा। "बाद में। FIR सिर्फ़ उस रात की है। हो सकता है वो अगले दिन किसी खेत में बेहोश मिला हो, और पुलिस ने काग़ज़ पर कभी लिखा ही न हो।"
"हो सकता है।"
"या ये कोई और रघुनाथ है। उसका कोई cousin। गाँवों में एक नाम कई लोगों के होते हैं।"
"भोला का बेटा। कोठी का।" विक्रांत ने काग़ज़ को देखा। "चौदह साल।" उसने हिसाब लगाया। "आज ज़िंदा होता तो उनहत्तर का। काका की उम्र।"
इरा चुप रही।
"आपने उनकी आँखें देखीं," विक्रांत ने धीरे से कहा। "जब उन्होंने ये नाम देखा।"
"हाँ।"
"वो किसी ऐसे आदमी की आँखें नहीं थीं जो अपना नाम देख रहा हो।"
इरा ने FIR को सावधानी से वापस बस्ते में रखा, और उसकी गाँठ बाँधी। उसकी उँगलियाँ थोड़ी काँप रही थीं।
"बद्री की बुआ ने कहा था कि नूर बानो सब देख रही थी। उस रात। डोली में से।" उसने कहा। "अगर कोई जानता है कि उस रात कौन गया और कौन लौटा, तो वो है।"
"वो बोलती नहीं।"
"वो लिखती है।" इरा ने बस्ता अलमारी में रखा। "मैंने बुआ से बात की है। वो नूर की पुरानी सहेली थीं, बचपन की। वो कल मुझे ले जाएँगी। शायद बुआ के साथ नूर दरवाज़ा खोल दें।"
विक्रांत ने उसकी तरफ़ देखा। "आपने ये कब तय किया?"
"आज सुबह। जब आप ढोल की आवाज़ के बाद चौक पर खड़े थे।" उसने कंधे उचकाए। "Archivist हूँ। Sources जुटाती हूँ।"
कबीर शाम को लौटा।
वह सुबह निकला था, बिना किसी को बताए, कोठी की पुरानी साइकिल पर, जो बरामदे में धूल खा रही थी। विक्रांत को पता था कि वह कहाँ गया था। उसने किसी से नहीं पूछा।
जब वह लौटा, अँधेरा हो चुका था। उसने साइकिल फाटक के पास गिरा दी, बिना उसे खड़ा किए, और सीधा अँगीठी वाले कमरे में आया। उसके कपड़ों पर रास्ते की धूल थी, उसके चेहरे पर ठंड की लाली, और उसकी आँखों में कुछ ऐसा जो विक्रांत ने उसमें पहले कभी नहीं देखा था।
सुकून नहीं। पर उसके आसपास का कुछ। जैसे कोई बहुत लंबे बुख़ार के बाद पहली बार ठीक से साँस ले।
"गया था," उसने कहा, और अँगीठी के पास बैठ गया, हाथ आग की तरफ़ बढ़ाए।
"और?"
कबीर कुछ देर चुप रहा। आग में देखता रहा।
"उसकी अम्मी ने चीखा नहीं," उसने आख़िरकार कहा। "मुझे लगा था वो चीखेंगी, गालियाँ देंगी, मुझे मारेंगी। मैं तैयार था। मैंने सब बताया। सितंबर की रात। कि मैंने उसे नीचे भेजा। कि मैंने उसकी machine छिपाई। कि मैंने थाने में पैसे दिए। सब।" उसकी आवाज़ टूटी। "और वो बस बैठी रहीं। सुनती रहीं। और जब मैं चुप हुआ, तो उन्होंने कहा, 'मुझे पता था, बेटा।'"
"पता था?"
"हाँ।" कबीर ने अपनी jacket की जेब में हाथ डाला और अपना फ़ोन निकाला। "इमरान ने मुझे ये भेजा। वहीं बैठे-बैठे। बोला, ये उसने police को कभी नहीं दिखाया, क्योंकि उन्हें लगता कि वो पागल है।"
उसने फ़ोन विक्रांत की तरफ़ बढ़ाया। Screen पर एक WhatsApp chat। सलीम का नंबर, वही profile photo। और एक voice message, सलीम से इमरान को।
भेजा गया: 14 Sept, 11:49 PM।
उसके फ़ोन बंद होने से तीन मिनट पहले।
विक्रांत ने play दबाया।
एक आदमी की आवाज़। जवान, घबराई हुई, साँस फूली हुई, फुसफुसाती। पीछे गूँज। पत्थर की, नीचे फैली हुई।
"भाई... भाई, सुन। मैं बावड़ी में हूँ, साहब ने भेजा, नाप लेने। पहला तल हो गया। पर..." एक ठहराव। तेज़, उथली साँसें। "...पर नीचे कोई है, भाई। कोई बच्चा। मैंने सुना। रो रहा है। बहुत छोटा बच्चा। पता नहीं कैसे यहाँ आया, गिर गया होगा। मैं..." वह रुका। पीछे, बहुत धीमी, बहुत दूर, एक आवाज़। एक बच्चे की सिसकी। "...सुना? तूने सुना? मैं देखता हूँ। नीचे जाता हूँ बस थोड़ा। अम्मी को मत बताना, वो डर जाएँगी। बस... बस दो मिनट।"
Message ख़त्म हुआ।
अँगीठी की चटचटाहट के अलावा कमरे में कुछ नहीं था।
"वो उसे बचाने गया था," कबीर ने फुसफुसाया। "भाई। वो उस बच्चे को बचाने नीचे गया था।"
विक्रांत ने message फिर चलाया। उस हिस्से पर रुका। वह धीमी, दूर की सिसकी। उसने अपना फ़ोन निकाला, कल रात वाला message खोला। मैं अभी भी नीचे हूँ।
उसे ज़रूरत नहीं थी उन्हें एक के ऊपर रखकर नापने की। उसके कान जानते थे।
वही बच्चा।
सलीम ने एक रोते हुए बच्चे की आवाज़ सुनी थी, और वह नीचे गया था। क्योंकि कोई भी जाता। कोई भी अच्छा इंसान।
और वह बच्चा अब भी वहाँ था। अब भी रो रहा था। अब भी बुला रहा था।
अब भी।
उस रात विक्रांत अपनी पहली recording पर लौटा।
वह जो सब शुरू हुआ था। पहली रात, पहला फ़ोन, कटे हुए तार वाला landline। माँ की आवाज़।
उसने उसे दो हफ़्ते पहले छोड़ दिया था, एक धुँधली, मटमैली परत के रूप में, जिसमें शब्द नहीं निकल रहे थे। तब उसने हर filter, हर तरीका आज़माया था, और हार गया था।
पर तब वह नहीं जानता था कि वह क्या ढूँढ रहा है। अब जानता था।
उसके पास अब कुछ ऐसा था जो तब नहीं था। उस पत्थर की जगह का fingerprint। वह impulse response जो उसने पीछे की कोठरियों में नापा था, चौंतीस मीटर नीचे से लौटती गूँज वाला। अगर माँ की आवाज़ उसी जगह से आई थी, उसी बावड़ी में बोली गई थी, तो उस पर उसी गूँज का लेप चढ़ा होगा। और अगर उसे उस गूँज की बनावट पता हो, तो वह उसे उलटा कर सकता था। उसे हटा सकता था। जैसे किसी गीली पेंटिंग पर से एक-एक परत छीलकर नीचे का असली रंग निकाला जाता है।
Deconvolution। Forensic audio का सबसे नाज़ुक, सबसे धीमा काम।
उसने शुरू किया।
रात के दो बज गए।
विक्रांत ने अपनी आँखें मलीं। उसकी screen पर माँ की आवाज़ का spectrogram था, अब पहले से बहुत अलग। वह धुँधली, मटमैली परत छँट चुकी थी, जैसे किसी शीशे से भाप हट गई हो। उसके नीचे से रंगों की साफ़ लकीरें उभर रही थीं। Formants। आवाज़ की हड्डियाँ।
पर उससे पहले, उसने वह किया जो वह हर case में करता था। आवाज़ के आसपास की जगह को पढ़ा।
हर recording में दो चीज़ें होती हैं: आवाज़, और वह जगह जहाँ वह बोली गई। जगह आवाज़ पर अपनी छाप छोड़ती है, शुरुआती गूँजों के रूप में। Early reflections। पहले कुछ milliseconds में लौटने वाली छोटी-छोटी लहरें, जो बताती हैं कि बोलने वाले के आसपास क्या था। दीवारें कितनी दूर थीं। छत थी या नहीं। फ़र्श किस चीज़ का था।
उसने उन्हें नापा।
छत नहीं थी। ऊपर से कोई लौटती लहर नहीं। ऊपर खुला आसमान था।
बगल में, एक-दो मीटर पर, पत्थर। सख़्त, समतल। जैसे किसी चबूतरे का किनारा, या कोई मुंडेर।
और नीचे, सीधे नीचे, बोलने वाले के पैरों के सामने, एक बहुत बड़ी, बहुत गहरी, खुली जगह, जिसमें आवाज़ गिरती थी, नीचे और नीचे, चौंतीस मीटर तक, और फिर धीरे-धीरे, ढाई सेकंड में, लौटती थी।
वह किसी कमरे में नहीं बोली थीं। किसी फ़ोन में नहीं।
वह बावड़ी के मुँह पर खड़ी थीं। उसके किनारे पर। नीचे की तरफ़ झुककर। अंधेरे में चीखती हुई।
विक्रांत ने आँखें बंद कीं।
और याद आई।
यह एक तस्वीर नहीं थी। एक एहसास था, फिर कुछ टुकड़े, फिर थोड़ा और।
ठंड। बहुत ठंड। उसके दाँत बज रहे थे, इतनी ज़ोर से कि उसका पूरा जबड़ा दुख रहा था। कोई कंबल, मोटा, खुरदरा, जो किसी ने उसके चारों तरफ़ लपेट दिया था। कंबल गीला था। उसके नीचे वह भी गीला था। उसके बाल गीले थे, उनसे पानी टपक रहा था, उसकी आँखों में, उसके मुँह में। ठंडा, पत्थर के स्वाद वाला पानी।
रोशनियाँ। लालटेनें, कई, आँगन में इधर-उधर हिलती हुईं। लोग। आवाज़ें, ऊँची, घबराई हुई।
और माँ।
बावड़ी के किनारे पर। घुटनों के बल। उसके बाल खुले हुए, उसकी शॉल गिर चुकी। आधी झुकी हुई, उस काले, गहरे मुँह में, और चीखती हुई। कोई नाम। बार-बार। और पापा उसके पीछे, उसकी बाँहें पकड़े, उसे पीछे खींचते हुए, ताकि वह गिर न जाए।
और कोई और, एक आदमी, लालटेन लिए, किनारे पर खड़ा। दुबला, उस वक़्त चालीस के आसपास, उसका चेहरा लालटेन की रोशनी में पीला और डरा हुआ। रघु काका। जवान।
और वह ख़ुद, कंबल में लिपटा, कहीं थोड़ा दूर, ज़मीन पर बैठा, काँपता हुआ, देखता हुआ।
विक्रांत ने आँखें खोलीं।
उसका दिल ज़ोर से धड़क रहा था।
मैं गीला था।
यह बात उसकी याद में ठीक नहीं बैठ रही थी। जिस याद को वह तेईस साल से अपने अंदर लिए घूम रहा था, उसमें वह ऊपर था। सीढ़ियों के ऊपर। लालटेन लिए। और जब नीचे से आवाज़ आई, वह भागा। पीछे मुड़े बिना। अंधेरे में।
भागने वाला गीला नहीं होता।
तो वह गीला कैसे था?
और फिर उसके अंदर, धीरे-धीरे, एक नई कहानी बनने लगी। एक कहानी जो पिछले से बहुत अलग थी, और जिसे उसका हर हिस्सा, बेताबी से, पकड़ लेना चाहता था।
शायद मैं भागा नहीं था।
शायद मैंने उसे बचाने की कोशिश की थी। नीचे गया था। पानी में। उसके पीछे। और किसी ने मुझे निकाला, और उसे नहीं निकाल पाया।
शायद मैं वो नहीं हूँ जो मैं तेईस साल से ख़ुद को समझता आया हूँ।
उसकी आँखें भर आईं। वह इस विचार को कसकर पकड़े रहा, जैसे कोई डूबता आदमी किसी लकड़ी के टुकड़े को। उसने इसकी जाँच नहीं की। उसने इसे नापा नहीं। पहली बार अपनी ज़िंदगी में, उसने किसी चीज़ को बस इसलिए सच माना क्योंकि उसे उसकी ज़रूरत थी।
फिर उसने headphones लगाए, और माँ की आवाज़ चलाई।
अब शब्द थे।
धुँधले, गूँज के कुछ हिस्से अब भी बचे हुए, पर शब्द। साफ़। उसकी माँ की आवाज़ में, जैसी वह तेईस साल पहले थी। जवान। टूटी हुई। हाँफती हुई।
"...सुन रहे हो? मेरी बात सुनो..."
वह किसी से बात कर रही थी। उसके पास खड़े किसी से। उसकी आवाज़ में आँसू थे, और उनके नीचे कुछ और। ग़ुस्सा। एक भयानक, पागल यक़ीन।
"...मैंने देखा उसे... जब वो ऊपर आया... मैंने उसकी आँखें देखीं..."
विक्रांत ने अपनी साँस रोक ली।
"...वो विक्रांत नहीं है..."
वह वाक्य जो उसने पहली रात सुना था। जिसने उसे इस पूरे भँवर में धकेला था। अब, साफ़ होकर, पूरे वाक्य के बीच में, वह अलग सुनाई दे रहा था। वह कोई अकेली, अंधेरे से आई चेतावनी नहीं थी। वह एक बहस का हिस्सा था। एक माँ, अपने पति से, बावड़ी के किनारे, किसी बात पर ज़ोर देती हुई।
जब वो ऊपर आया।
विक्रांत ने उस वाक्य को अपने दिमाग़ में घुमाया।
ऊपर कौन आया था? उस रात? कंबल में लिपटा, काँपता, गीला एक बच्चा। वह ख़ुद।
वो विक्रांत नहीं है।
और उसे वे रातें याद आईं। कॉलेज के दिन, जब माँ उसे सोता समझकर उसके पास बैठती थीं। उसे देखती थीं, उसके चेहरे में कुछ ढूँढती हुई, जो उन्हें कभी नहीं मिलता था। और वह एक रात, जब उन्होंने धीरे से एक नाम लिया था, और रोई थीं, बहुत देर तक।
वह नाम। जो उसे याद नहीं था।
विक्रांत ने महसूस किया कि उसका सीना कस रहा था, जैसे कोई रस्सी उसके चारों तरफ़ लपेटी जा रही हो।
माँ को लगता था कि मैं... मैं नहीं हूँ।
उस रात के बाद। उस बावड़ी के बाद। जब एक बेटा खोया और दूसरा लौटा। Grief। उसने इसके बारे में पढ़ा था। कुछ माँएँ इतने बड़े दुख में टूट जाती हैं कि वे बचे हुए बच्चे को भी नहीं पहचान पातीं। Capgras। एक ऐसा भ्रम जिसमें तुम्हें लगता है कि तुम्हारा कोई अपना किसी नक़ली से बदल दिया गया है। माँ ने इसीलिए उसे ऐसे देखा। इसीलिए उनकी आँखों में वह अधूरी तलाश थी, सालों तक।
वह बीमार थीं। दुख से। वह जानता था। और यह जानना उसे बचा रहा था।
उसने recording आगे चलाई।
उसके कानों में, उस वक़्त, एक और आवाज़ घुली।
Headphones से नहीं। बाहर से। उसके कमरे से।
उसने एक तरफ़ का headphone अपने कान से हटाया।
गुनगुनाहट।
बहुत धीमी। बहुत पास। कमरे के उस कोने से, जहाँ अलमारी थी, और जहाँ लालटेन की रोशनी नहीं पहुँचती थी। एक औरत की आवाज़। बिना शब्दों के, बस एक धुन, होंठ बंद करके, जैसे कोई बच्चे को सुलाते वक़्त गुनगुनाता है।
विक्रांत का पूरा शरीर पत्थर हो गया।
वह धुन उसे पता थी। उसने उसे सैकड़ों बार सुना था, बचपन में, अंधेरे कमरे में, रज़ाई के अंदर, किसी के हाथ उसके बालों पर फिरते हुए। एक लोरी। कोई फ़िल्मी गाना नहीं, कोई मशहूर लोरी नहीं। माँ की बनाई हुई। उनकी अपनी। जो वह सिर्फ़ अपने बच्चों के लिए गाती थीं।
सो जा, सो जा, चाँद की नाव में,
तारे बैठे तेरे पाँव में,
सो जा मेरे...
धुन वहीं रुक गई। उस शब्द से ठीक पहले। उस नाम से ठीक पहले, जो लोरी की आख़िरी पंक्ति में आता था, और जो माँ हर बार बदल देती थीं, जिस भी बच्चे को सुला रही होतीं।
गुनगुनाहट रुकी रही। एक पल। दो पल। जैसे इंतज़ार कर रही हो कि वह उसे पूरा करे।
विक्रांत ने अपनी जीभ अपने दाँतों के बीच दबाई। फिर से। ख़ून का वही धात्विक स्वाद।
उसने लालटेन देखी। उसकी लौ उस कोने की तरफ़ नहीं झुकी थी। वह उसकी तरफ़ झुकी थी। उसके चेहरे की तरफ़। लंबी, पतली, खिंचती हुई।
और कमरे में गीले पत्थर की गंध थी।
धुन फिर शुरू हुई। शुरू से। सो जा, सो जा, चाँद की नाव में...
और फिर रुकी। उसी जगह। उसी शब्द से ठीक पहले।
विक्रांत ने आँखें बंद कर लीं। उसने उस नाम को याद करने की कोशिश नहीं की। उसने अपने दिमाग़ को उस लोरी से दूर, बहुत दूर धकेला। अपनी lab। अपने equipment। Spectrogram के रंग। फ़्रीक्वेंसी, formants, decibels।
जब उसने आँखें खोलीं, गुनगुनाहट बंद हो चुकी थी।
लौ सीधी थी। गंध हल्की होकर सूखी, धूल भरी ठंड में घुल रही थी।
उसका दिल इतनी ज़ोर से धड़क रहा था कि उसे लगा उसका headphone वाला कान उसकी नब्ज़ से काँप रहा है।
उसने headphone वापस कान पर लगाया। उसकी उँगलियाँ नहीं काँपीं, क्योंकि उसने उन्हें काँपने नहीं दिया।
उसे वह recording ख़त्म करनी थी। उसे बाकी सुनना था।
माँ की आवाज़ लौटी। अब धीमी। रोती हुई। बहस नहीं, विनती।
"...तुम समझ नहीं रहे... मैंने उसकी आँखें देखीं... और उसे पुकारा, और उसने..."
एक सिसकी। लंबी।
विक्रांत ने volume बढ़ाया।
उस सिसकी के बाद, recording में वह जगह थी जहाँ पहली रात लाइन कट गई थी। वह आधे सेकंड की सरसराहट, और फिर क्लिक। उसने उस हिस्से को हमेशा ख़ाली समझा था।
पर अब, deconvolution के बाद, उस सरसराहट के अंदर कुछ था।
उसने उसे अलग किया। Gain बढ़ाया। Noise की आख़िरी परत हटाई।
और माँ की आवाज़ उभरी। एक आख़िरी वाक्य। बहुत धीमी, बहुत जल्दी, घबराई हुई फुसफुसाहट, जैसे वह किसी ऐसी चीज़ से डर रही हों जो पास ही खड़ी हो और सुन रही हो। जैसे वह अपने पति के कान में, किनारे पर, अंधेरे से छिपाकर कह रही हों। एक चेतावनी।
"...उसे इस नाम से मत बुलाओ... वो जवाब दे देगा..."
विक्रांत ने उसे सुना।
फिर उसने उसे फिर से सुना।
और उसे पता था कि उसके दिमाग़ में अभी-अभी बनी वह नई कहानी, वह जिसे उसने इतनी बेताबी से पकड़ा था, जिसमें वह भागा नहीं था, जिसमें वह अपने भाई को बचाने पानी में उतरा था, वह कहानी अपनी जगह से हिल गई थी। थोड़ा। बस थोड़ा। जैसे किसी इमारत की नींव में एक पतली दरार पड़ती है, जिसे देखने के लिए बहुत ध्यान से देखना पड़ता है, और जिसके बाद इमारत वैसी ही खड़ी रहती है, सालों तक, जब तक एक दिन नहीं रहती।
उसे इस नाम से मत बुलाओ।
किसे?
वो जवाब दे देगा।
उस रात, बावड़ी के किनारे, जब एक बच्चा गीला, काँपता, कंबल में लिपटा ज़मीन पर बैठा था, उसकी माँ ने अपने पति से कहा था कि उसे किसी नाम से न बुलाएँ।
क्योंकि अगर बुलाया, तो वह जवाब दे देगा।
[Part 12 समाप्त]

Writer
Piyashi Atma
Story
जवाब मत देना
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12 of 30
Category
Ghost Stories
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14 min
Words
2771
Language
Hindi (हिंदी)
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