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Part 11: गाँव की चुप्पी
Piyashi Atma · Ghost Stories · 15 मिनट
रस्सी ने उसे ऊपर खींचा।
विक्रांत को बाद में यह ठीक से याद नहीं रहा कि वह सीढ़ियाँ कैसे चढ़ा। उसे बस इतना याद था कि उसकी कमर पर बँधी रस्सी तनी हुई थी, लगातार, धीरे-धीरे ऊपर की तरफ़ खिंचती हुई, और उसके पैर उस खिंचाव के पीछे-पीछे चलते गए, जैसे किसी और के पैर हों। इरा उसके पीछे थी, उसका हाथ उसकी jacket की पीठ पकड़े। कबीर सबसे पीछे, हर सीढ़ी पर लड़खड़ाता, बुदबुदाता हुआ, शब्द जो कोई नहीं समझ पा रहा था।
वह गिन नहीं रहा था। उसने इस बात पर ध्यान दिया, एक अजीब, दूर की संतुष्टि के साथ। वह गिन नहीं रहा था।
ऊपर, बावड़ी के मुँह पर, रघु काका खड़ा था, रस्सी को दोनों हाथों से, हथेलियों पर लपेटकर, खींचता हुआ। उसका चेहरा पसीने से भीगा था, दिसंबर की ठंड में। उसकी हथेलियाँ रस्सी की रगड़ से लाल और छिली हुई थीं।
जब विक्रांत का सिर ऊपर निकला, बूढ़े ने रस्सी छोड़ी नहीं। उसने उसे पकड़े रखा, जब तक विक्रांत पूरी तरह बाहर नहीं आ गया, जब तक इरा नहीं आ गई, जब तक कबीर आख़िरी सीढ़ी पर ठोकर खाकर पत्थर के चबूतरे पर नहीं गिर पड़ा।
फिर उसने रस्सी छोड़ी, और जाली की तरफ़ झपटा।
"काका..."
रघु काका ने नहीं सुना। उसने जाली को उठाकर उसकी जगह गिराया, एक धातु की धमक के साथ, जिसने पूरे आँगन को झनझना दिया। फिर सब्बल उठाया, पत्थर की पटिया के नीचे फँसाया, और अकेले, अपने बूढ़े, दुबले शरीर का पूरा वज़न लगाकर, उसे खिसकाने लगा।
विक्रांत ने मदद की। फिर इरा ने। कबीर ज़मीन पर बैठा रहा, घुटनों में सिर दिए।
जब पटिया अपनी जगह पर आ गई, रघु काका ने spanner उठाया और बोल्ट कसने लगा। चारों। एक-एक करके। इतनी ज़ोर से कि उसकी बाँहों की नसें उभर आईं। फिर उसने अपनी लोई की जेब से मुट्ठी भर कीलें निकालीं, और हथौड़े से जाली के लोहे और पत्थर के बीच की दरारों में ठोकने लगा।
ठक। ठक। ठक।
विक्रांत ने उसे नहीं रोका।
"आपने देखा?" उसने आख़िरकार पूछा। "नीचे क्या हुआ?"
रघु काका का हथौड़ा रुका नहीं। ठक।
"आपको नाम दिखा। आपका नाम।" यह सवाल नहीं था।
"आधा।"
ठक। "आधा ही लिखा जाता है।" रघु काका ने कहा। उसकी आवाज़ बहुत धीमी थी, हथौड़े की चोटों के बीच लगभग खोई हुई। "पहले।"
"और फिर?"
बूढ़े ने आख़िरी कील ठोकी। हथौड़ा नीचे रखा। फिर वह जाली के किनारे, ठंडे पत्थर पर बैठ गया, अपनी पीठ जाली से सटाकर, जैसे वह उसे अपने शरीर से बंद रखना चाहता हो।
उसने जवाब नहीं दिया। उसने बस अपनी लोई कसकर लपेट ली, और अपनी आँखें बंद कर लीं।
विक्रांत ने उसे बाद में, शाम को, फिर वहीं देखा। फिर रात को, दस बजे, खिड़की से। बूढ़ा वहीं बैठा था, जाली से पीठ सटाए, एक लालटेन उसके पैरों के पास, उसकी आँखें खुली, अंधेरे में घूरती हुईं।
वह पूरी रात वहीं बैठा रहा।
विक्रांत सोया नहीं।
वह अपने कमरे में बैठा रहा, laptop खोले, पर उस पर कुछ नहीं कर रहा था। बस उसकी screen को देख रहा था, उसकी नीली रोशनी को, जैसे वह किसी खिड़की को देख रहा हो जो किसी ऐसी दुनिया में खुलती हो जहाँ चीज़ें अब भी समझ में आती थीं।
विक्रा।
उसने उसे देखा था। अपनी आँखों से। कोई recording नहीं, कोई interpretation नहीं, कोई spectrogram नहीं जिसे गलत पढ़ा जा सके। पत्थर पर एक लकीर, अपने आप बनती हुई। चूरा झड़ता हुआ।
उसके दिमाग़ ने, अपनी पुरानी आदत से, फिर भी कोशिश की। Mass hallucination। तीन लोग, डरे हुए, अंधेरे में, एक ही उम्मीद के साथ। Infrasound, उन्नीस hertz, आँखें काँपती हैं, आकृतियाँ बनती हैं। शायद वह नाम पहले से वहाँ था, और तुम्हें लगा कि वह बन रहा है।
और फिर उसने उस तर्क को ख़ुद ही, धीरे से, एक तरफ़ रख दिया। जैसे कोई बूढ़ा अपनी छड़ी, यह मानकर कि अब उसकी ज़रूरत नहीं, क्योंकि अब चलना ही नहीं है।
वह विज्ञान से भाग नहीं रहा था। वह बस थक गया था उसे ऐसी चीज़ों पर लगाते हुए जिनके लिए वह बना ही नहीं था।
पर एक चीज़ उसके अंदर अब भी बची थी। उसकी सबसे पुरानी, सबसे गहरी आदत। Source ढूँढना।
अगर कुछ था, कोई मेहमान, कोई चीज़ जो आवाज़ों में रहती थी, नाम लिखती थी, बच्चों के पैरों से चलती थी, तो उसकी भी एक शुरुआत होगी। एक इतिहास। एक कारण। एक पहला दिन।
और जो चीज़ शुरू हुई है, वह समझी जा सकती है।
उसने laptop बंद किया। खिड़की से बाहर देखा। अंधेरे में, पीछे के आँगन की दिशा में, एक छोटी, पीली, स्थिर रोशनी। रघु काका की लालटेन।
इकहत्तर। वह साल जब बावड़ी सूखी। जब घंटी उतारी गई। जब बारह नाम एक साथ लिखे गए। जब नूर बानो ने बोलना बंद किया।
वहाँ से शुरू करेगा।
सुबह कबीर अपने कमरे से नहीं निकला।
विक्रांत ने उसका दरवाज़ा खटखटाया। बहुत देर बाद, अंदर से एक आवाज़ आई, भारी, धीमी। "जा यार।"
उसने दरवाज़ा धकेला। कबीर पलंग पर बैठा था, कल वाले कपड़ों में, जूते अब भी पहने। उसके हाथ में एक गिलास था, ख़ाली, और पलंग के पास फ़र्श पर एक बोतल, लगभग ख़त्म।
"सुबह के आठ बजे हैं, कबीर।"
"हाँ।" कबीर ने गिलास को देखा। "पता है।"
विक्रांत कमरे में आया और खिड़की के पास खड़ा हो गया। कुछ देर दोनों चुप रहे।
"मैं इमरान के घर जाऊँगा," कबीर ने आख़िरकार कहा। "उसकी अम्मी के पास। सब बताऊँगा।"
विक्रांत ने उसकी तरफ़ देखा।
"उसके बाद जो होगा, होगा। Police, case, अरोड़ा, जो भी।" कबीर हँसा, एक सूखी आवाज़। "चालीस लाख का क़र्ज़ तो वैसे भी डुबो देगा। कम से कम..." वह रुका। "...कम से कम एक चीज़ तो ठीक करूँ।"
"कब?"
"आज नहीं।" कबीर ने गिलास नीचे रखा। "मैं... आज नहीं हो पाएगा। कल। या परसों।" उसने विक्रांत की तरफ़ देखा, और उसकी लाल, धँसी हुई आँखों में कुछ ऐसा था जो विक्रांत ने बचपन में कभी किसी छोटे भाई की आँखों में देखा होगा, अगर उसे याद होता। एक गुहार। "तू मुझे माफ़ करेगा?"
विक्रांत ने बहुत देर तक कुछ नहीं कहा।
"मैं तुझे माफ़ करने वाला कौन होता हूँ," उसने आख़िरकार कहा। "मैंने भी किसी को नीचे भेजा था।"
कबीर ने उसे देखा। समझा नहीं। विक्रांत ने समझाया भी नहीं।
बद्री की गुमटी पर चाय उबल रही थी, और गुमटी के पास, पीपल के नीचे, कुछ बूढ़े बैठे थे। तीन या चार। चौपाल। एक के हाथ में हुक्का, दूसरे के गले में मफ़लर, तीसरा अपने घुटनों पर एक लाठी टिकाए। वे विक्रांत को आते देखकर चुप हो गए। जैसे किसी कमरे में कोई अजनबी घुसे तो बातचीत टूट जाती है।
इरा उसके साथ थी। उसने सलाह दी थी: "आप सीधे मत पूछिएगा। ये लोग अजनबियों से सीधे बात नहीं करते। पहले बैठिए। चाय पीजिए।"
विक्रांत ने चाय ली। बैठा। बद्री ने उसकी तरफ़ एक सावधान, लगभग दयालु नज़र डाली, जैसे उसे कल रात कोई ख़बर मिली हो।
विक्रांत ने बूढ़ों को नमस्ते की। उन्होंने सिर हिलाया, बिना कुछ बोले।
कुछ देर, वह बस चाय पीता रहा। फिर, जैसे यूँ ही, बात शुरू की। मौसम की। फ़सल की। कोहरे की। बूढ़े धीरे-धीरे, एक-एक शब्द में, जवाब देने लगे।
फिर, बहुत सावधानी से, उसने कोठी की बात की। कि वह उसे बेचने आया है, पर उसके बारे में कुछ नहीं जानता। कि उसके दादा यहाँ रहते थे। कि उसे परिवार का इतिहास जानना है।
बूढ़ों ने एक-दूसरे को देखा।
"बहुत पुरानी कोठी है," हुक्के वाले ने कहा। उसकी उम्र अस्सी से ऊपर रही होगी, चेहरा किसी सूखी, फटी ज़मीन जैसा। "लाला हरकिशन के ज़माने की।"
"आपने उन्हें देखा था?"
"मेरे बाबा ने देखा था।"
"और इकहत्तर में?" विक्रांत ने पूछा।
हुक्के की गुड़गुड़ाहट रुक गई।
कोई कुछ नहीं बोला। मफ़लर वाले ने अपनी नज़र ज़मीन पर गड़ा दी। लाठी वाले ने अपनी लाठी को दोनों हाथों से पकड़ लिया, कसकर।
"इकहत्तर में यहाँ एक बारात आई थी," विक्रांत ने धीरे से कहा। "नूर बानो की।"
हुक्के वाला उठ खड़ा हुआ। बहुत धीरे, अपनी बूढ़ी, अकड़ी हुई टाँगों पर, पर बिना रुके। उसने अपना हुक्का उठाया, और बिना एक शब्द कहे, पीपल के पीछे की गली में चला गया।
मफ़लर वाला उठा। फिर लाठी वाला।
तीस सेकंड में, चौपाल ख़ाली थी।
विक्रांत ने गली की तरफ़ देखा। एक दरवाज़ा बंद हुआ। फिर दूसरा। धीमे, बिना किसी आवाज़ के, पर बंद। जैसे गाँव ख़ुद अपनी आँखें बंद कर रहा हो।
"मैंने कहा था, सीधे मत पूछिए," इरा ने फुसफुसाया।
बद्री ने उनके कुल्हड़ों में और चाय डाली। उसने उनकी तरफ़ नहीं देखा।
"बाबू," उसने बहुत धीरे से कहा। "आप वो बात मत पूछिए। यहाँ कोई नहीं बताएगा।"
"क्यों?"
बद्री ने केतली नीचे रखी। उसने चौक के चारों तरफ़ देखा, जैसे कोई देख न रहा हो। फिर वह झुका।
"क्योंकि जो बताते हैं," उसने कहा, "वो पुकारे जाते हैं।"
वे उठने वाले थे, जब एक बूढ़ी औरत गुमटी के पीछे से निकली।
बद्री की कोई रिश्तेदार, शायद। उसकी बुआ, या उसकी माँ की बहन। झुकी हुई कमर, सफ़ेद धोती, एक आँख में मोतियाबिंद का धुँधलापन। उसके हाथ में एक बाल्टी थी। वह गुमटी के पीछे के नल से पानी भरने आई थी, और रास्ते में रुककर विक्रांत को देखने लगी।
"तू कोठी वाला है?" उसने पूछा। उसकी आवाज़ ऊँची थी, जैसे बहरे लोगों की होती है, और उसने बाकी गाँव की तरह उसे धीमा करने की कोई कोशिश नहीं की।
"जी।"
"ओमप्रकाश का लड़का?"
विक्रांत ठिठका। पापा का नाम। "जी।"
बूढ़ी ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा, अपनी एक अच्छी आँख से।
"इकहत्तर पूछ रहा था?"
"बुआ..." बद्री ने हाथ बढ़ाया।
"चुप रह।" बूढ़ी ने उसे झिड़का। फिर विक्रांत की तरफ़ मुड़ी। "मैं बताती हूँ। मुझे क्या डर? अस्सी पार की हूँ, कान से सुनाई नहीं देता। कोई पुकारेगा, मैं सुनूँगी ही नहीं।" वह हँसी, एक पोपली, खिलखिलाती हँसी।
उसने बाल्टी ज़मीन पर रखी, और बेंच के किनारे बैठ गई।
"मैं उस रात बारात में थी," उसने कहा। "लड़की वालों की तरफ़ से। नूर के घर के पास रहती थी। जवान थी तब, तेरी इस छोकरी जितनी।" उसने इरा की तरफ़ ठोड़ी से इशारा किया।
"बारात दूसरे गाँव से आई थी। निकाह हुआ, खाना हुआ। बहुत रात हो गई। फिर विदाई। नूर डोली में, और बाराती आगे-पीछे। ढोल वाले, नाचने वाले, दूल्हे के भाई, चाचा। बारह-पंद्रह लोग। और कोठी वाले रास्ते से लौटे, क्योंकि वो छोटा था। बावड़ी वाली गली से।"
उसकी आवाज़ थोड़ी धीमी हुई। पहली बार।
"मना किया था लोगों ने। पर वो दूसरे गाँव के थे, उन्हें क्या पता। और जवान लड़के, नशे में, नाचते हुए। ढोल बज रहा था। ज़ोर-ज़ोर से।"
वह रुकी। उसकी एक अच्छी आँख चौक के उस पार, कोठी की दिशा में, देख रही थी।
"हम पीछे थे, औरतें। थोड़ी दूर। और हमने सुना..." उसने अपना सिर हिलाया, धीरे-धीरे। "...ढोल बज रहा था। बज रहा था। और उसके साथ आवाज़ें, हँसी, गाना। फिर एक-एक करके, आवाज़ें कम होती गईं। जैसे कोई गाना धीमा होता है। एक आवाज़ गई। फिर दूसरी। फिर तीसरी।"
"और?"
"और आख़िर में सिर्फ़ ढोल बचा।" बूढ़ी ने कहा। "अकेला। बजता हुआ। अंधेरे में। उस गली में। धम, धम, धम। कोई गाना नहीं, कोई हँसी नहीं, कोई आदमी नहीं। बस ढोल। जैसे कोई अकेला बजा रहा हो।"
उसकी आवाज़ अब बहुत धीमी थी, बाकी गाँव जितनी।
"फिर वो भी बंद हो गया।"
चौक पर खामोशी थी। बद्री ने अपने हाथ अपनी धोती में पोंछे, बार-बार, जबकि वे सूखे थे।
"नूर?" इरा ने पूछा।
"डोली मिली। गली के बीच में, ज़मीन पर रखी हुई। कहार नहीं थे। बाराती नहीं थे। और नूर अंदर बैठी थी। जागी हुई। आँखें खुली। अपने दोनों हाथ अपने मुँह पर दबाए।" बूढ़ी ने अपनी झुर्रियों वाली हथेलियाँ उठाकर अपने मुँह पर रखीं, दिखाने के लिए। "ऐसे। इतनी ज़ोर से कि उसके होंठों से ख़ून निकल आया था।"
उसने हाथ नीचे किए।
"उसके बाद उसने कभी कुछ नहीं बोला। कभी नहीं।"
विक्रांत उससे और पूछने वाला था। ढोल वाले कौन थे। बाराती कहाँ गए। बावड़ी उसी रात कैसे सूखी।
वह पूछने के लिए मुँह खोलता, उससे पहले उसने उसे सुना।
बहुत दूर। बहुत धीमा। उसके कानों के लगभग नीचे, जैसे दूर कहीं किसी के दिल की धड़कन।
धम।
उसका सिर अपने आप घूमा।
धम। धम।
एक लय। भारी, गहरी, मोटी खाल पर लकड़ी की। कोठी की दिशा से। चौक के उस पार की गलियों से, कोहरे से।
धम। धम-धम। धम।
ढोल।
किसी शादी का ढोल, उसकी जानी-पहचानी, उछलती, नाचने वाली लय में, पर इतनी धीमी, इतनी दूर, जैसे किसी बहुत पुराने, घिसे हुए tape पर बज रहा हो। आवाज़ में वह गहराई थी, वह खिंचाव। गूँज। ढाई सेकंड की।
विक्रांत ने इरा की तरफ़ देखा। उसकी आँखें बड़ी थीं। उसने भी सुना था।
बद्री ने भी। उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया था। उसके हाथ धोती पोंछना भूल गए थे।
बूढ़ी, बद्री की बुआ, अब भी बेंच पर बैठी थी, हाथ गोद में। उसने कुछ नहीं सुना। वह बस उनके चेहरों को देख रही थी, हैरानी से।
"क्या हुआ?" उसने ज़ोर से पूछा। "क्या है?"
धम। धम-धम।
चौक के चारों तरफ़, धीरे-धीरे, दरवाज़े बंद होने लगे। एक। फिर दूसरा। जो लोग गलियों में थे, सब्ज़ी वाले, औरतें, बच्चे, वे रुके, कोठी की तरफ़ देखा, और फिर भागे। बिना किसी आवाज़ के। अपने घरों की तरफ़, अपने बच्चों के हाथ पकड़कर, उनके मुँह पर हाथ रखकर।
तीस सेकंड में, चौक ख़ाली था।
ढोल बजता रहा। धीरे-धीरे, किसी ऐसी शादी के लिए जो पचपन साल पहले कभी ख़त्म नहीं हुई।
और फिर, बीच ताल में, रुक गया।
जैसे किसी ने उसके ऊपर हाथ रख दिया हो।
विक्रांत ने अपनी जेब में recorder को छुआ। उसकी लाल बत्ती बुझी हुई थी। उसने उसे सुबह on नहीं किया था। पहली बार, इतने दिनों में, वह भूल गया था।
"मुझे कुछ मिला है," इरा ने कहा। "कल रात।"
वे लाइब्रेरी में थे। दोपहर ढल रही थी, और कोहरा फिर से खिड़कियों से सटने लगा था। मेज़ पर एक बस्ता खुला था, लाल कपड़े का, जिसकी गाँठें पुरानी और कड़ी थीं। अंदर काग़ज़ थे। अलग तरह के। मोटे, सरकारी, छपे हुए फ़ॉर्म, जिन पर हाथ से भरे गए खाने।
"ये परिवार के वकील की फ़ाइल है," इरा ने कहा। "उसने हर मुक़दमे की नक़ल रखी थी। ज़मीन के झगड़े, लगान के मामले।" उसने एक काग़ज़ उठाया, पीला, किनारों से भुरभुरा, उस पर एक मुहर। "और ये।"
प्रथम सूचना रिपोर्ट।
थाना — रामनगर, ज़िला बहराइच।
दिनांक — ७ मार्च, १९७१।
FIR। पुलिस की। हाथ से भरी हुई, नीली स्याही में, जो अब बैंगनी-भूरी पड़ चुकी थी।
"उन्होंने परिवार पर शक किया था," इरा ने कहा। "क्योंकि घटना कोठी के पास हुई। वकील को नक़ल मिली, बचाव के लिए।"
विक्रांत ने काग़ज़ लिया। सरकारी हिंदी, उर्दू के शब्दों से भरी, जिसे पढ़ने में उसे वक़्त लगा।
सूचक बयान करता है कि दिनांक ६ मार्च की रात, क़रीब पौने एक बजे, मौज़ा रौशनपुर की बावड़ी वाली गली से गुज़रती हुई बारात के निम्नलिखित व्यक्ति लापता हो गए। तलाश करने पर कोई सुराग़ नहीं मिला। बावड़ी में उतरकर पहले दो तल तक तलाश की गई, कोई लाश या कपड़ा बरामद नहीं हुआ। बावड़ी, जो उस शाम तक पानी से भरी थी, सुबह तक पूरी तरह सूख गई पाई गई, जिसका कोई कारण समझ में नहीं आता।
विक्रांत ने उस आख़िरी पंक्ति को दोबारा पढ़ा। पूरी तरह सूख गई पाई गई। रघु काका की आवाज़। एक ही रात में।
नीचे, एक सूची। नाम, पिता का नाम, उम्र, गाँव।
उसने उन्हें पढ़ा, होंठ हिलाए बिना। उसने यह सीख लिया था।
१. शफ़ीक़ अहमद (दूल्हा), उम्र २२...
२. ...
दूल्हे के भाई। चाचा। दो दोस्त। ढोल वाले, दो। कहार, चार। एक-एक करके। उनके गाँवों के नाम, जो विक्रांत ने कभी नहीं सुने थे। उम्रें, अठारह से पचपन तक।
उसने गिना। ग्यारह।
ग्यारह बाराती।
पर रजिस्टर में बारह नाम थे। बावड़ी की दीवार पर, बारह।
उसकी नज़र नीचे गई।
ग्यारहवें नाम के नीचे, एक लकीर। और फिर, अलग से, एक दूसरी लिखावट में, जैसे बाद में जोड़ी गई हो, दरोग़ा के हाथ से:
नोट — उसी रात कोठी के चौकीदार भोला का बड़ा लड़का भी लापता है, जो बारात को रास्ता दिखाने के लिए लालटेन लेकर साथ गया था। विवरण निम्नानुसार:
१२. रघुनाथ, पुत्र भोला, उम्र १४ वर्ष, निवासी सहगल कोठी, रौशनपुर।
विक्रांत ने उसे पढ़ा।
फिर दोबारा पढ़ा।
रघुनाथ।
उसके हाथ, जिनमें वह पीला काग़ज़ था, धीरे-धीरे ठंडे पड़ने लगे।
"इरा," उसने फुसफुसाया। "भोला..."
"मैंने भी देखा।" इरा की आवाज़ काँप रही थी। "बद्री ने कल बताया था। रघु काका के पिता का नाम। भोला। वो भी इसी कोठी के चौकीदार थे।"
"रघुनाथ, पुत्र भोला।" विक्रांत ने काग़ज़ को मेज़ पर रखा, जैसे वह जलता हो। "चौदह साल। लापता।" उसने इरा की तरफ़ देखा। "काका का पूरा नाम क्या है?"
इरा ने जवाब नहीं दिया।
उसकी नज़र विक्रांत पर नहीं थी। उसके पीछे थी। लाइब्रेरी के दरवाज़े पर।
विक्रांत मुड़ा।
रघु काका दरवाज़े पर खड़ा था। उसके हाथ में एक थाली थी, दो कप चाय की, भाप उठती हुई। वह कितनी देर से वहाँ खड़ा था, कोई नहीं जानता था। उसके नंगे पैरों ने कोई आवाज़ नहीं की थी।
उसकी नज़र मेज़ पर थी। उस पीले काग़ज़ पर। उस मुहर पर। उस आख़िरी नाम पर।
थाली उसके हाथों में काँपी। एक कप किनारे तक खिसका, चाय छलकी, और फ़र्श पर गिरकर एक भूरा धब्बा बनाने लगी।
उसने उसे नहीं देखा। वह बस खड़ा रहा, काग़ज़ को घूरता हुआ, उसके चेहरे पर कोई ऐसा भाव जो डर नहीं था, गुस्सा नहीं था, शर्म भी नहीं थी। कुछ और। कोई बहुत पुरानी चीज़, जो बहुत देर से किसी कोठरी में बंद थी, और अब उसके दरवाज़े पर किसी ने उँगली रख दी हो।
उस काग़ज़ में, पचपन साल पहले, एक चौदह साल का लड़का लालटेन लेकर बारात के साथ गया था, और फिर कभी नहीं लौटा था।
और उस लड़के का नाम, वही था, जिस नाम से पूरा गाँव, पिछले पचपन सालों से, इस बूढ़े आदमी को बुलाता आया था।
[Part 11 समाप्त]
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- जवाब मत देना
- Chapter
- 11 of 30
- Category
- Ghost Stories
- Reading time
- 15 min
- Words
- 2910
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
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