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Part 10: पहला तल

Piyashi Atma · Ghost Stories · 16 मिनट

"मैं अभी भी नीचे हूँ।"
विक्रांत छत पर बैठ गया। उसे पता नहीं चला कि कब उसके घुटनों ने जवाब दिया। गीली, ठंडी छत उसके नीचे थी, फ़ोन उसके हाथ में, screen की रोशनी उसके चेहरे पर, और वह बच्चे की आवाज़ बार-बार उसके कानों में बज रही थी। उसने message दोबारा नहीं चलाया था। उसे ज़रूरत नहीं थी।
छह साल का बच्चा। काँपती, थकी आवाज़। साँस के साथ। गीली, छोटी साँस।
अभी भी।
उस एक शब्द में तेईस साल थे। तेईस जनवरी, तेईस गर्मियाँ, तेईस बरसातें, जिनमें उसने Delhi में बड़ा होना सीखा। स्कूल, कॉलेज, नौकरी, एक flat, एक ज़िंदगी। और इन सब सालों में, उसके हर जन्मदिन पर, हर बार जब उसने हँसकर किसी दोस्त के साथ चाय पी, हर बार जब वह गर्म रज़ाई में सोया, कोई नीचे था। अंधेरे में। ठंडे पानी के पास। इंतज़ार करता हुआ।
अभी भी।
उसका तर्क, उसकी lab, उसकी physics, infrasound, reconstructed memory, pareidolia, सब कुछ उसके हाथों से फिसल रहा था। वे शब्द अब भी उसके दिमाग़ में थे, पर उनमें कोई वज़न नहीं बचा था। जैसे कोई डूबते समय तैरने के नियम याद करे।
उसने फ़ोन को अपने सीने से लगाया, और जो आवाज़ उसके गले से निकली, वह रोना नहीं थी। उससे पुरानी कोई चीज़ थी।
"हम नीचे जा रहे हैं," उसने सुबह कहा।
रसोई में तीनों थे। कबीर, अपनी चाय के कप के साथ, जिसे उसने छुआ नहीं था। इरा, खिड़की के पास, शॉल में लिपटी। रघु काका, अँगीठी के पास, जिसने विक्रांत की बात सुनकर अपना सिर नहीं उठाया, बस आग को कुरेदना बंद कर दिया।
"नीचे," कबीर ने दोहराया। "बावड़ी में।"
"पहले तल तक।"
"तू पागल हो गया है।"
विक्रांत ने अपना फ़ोन मेज़ पर रखा, speaker चालू, और voice message चलाया। Hiss। पानी। Ringtone की वह छोटी, कटी हुई धुन। और फिर बच्चे की आवाज़।
रसोई में किसी ने साँस नहीं ली।
कबीर का चेहरा उस ringtone पर बदला। विक्रांत ने उसे देखा। एक पल के लिए उसकी आँखें बंद हुईं, जैसे किसी को अचानक चोट लगे। उसने वह धुन पहचानी थी।
इरा खिड़की से हटकर मेज़ तक आई। उसने फ़ोन को देखा, फिर विक्रांत को। "ये किसके नंबर से आया?"
"सलीम के।"
रघु काका का हाथ, जिसमें लोहे की सलाख थी, अँगीठी के किनारे पर धीरे से गिरा।
"सलीम का फ़ोन नीचे है," विक्रांत ने कहा। "इमरान की माँ सही थी। वो यहीं है। और..." उसकी आवाज़ टूटी। उसने उसे जोड़ा। "...और कोई और भी।"
"विक्रांत।" इरा ने उसकी बाँह छुई। "ये अंशु की आवाज़ है? आपको यक़ीन है?"
"मुझे किसी चीज़ का यक़ीन नहीं है।" उसने कहा। "इसीलिए जाना है।"
"मैं नहीं जाऊँगा," कबीर ने कहा।
विक्रांत ने उसकी तरफ़ देखा। "तू जाएगा।"
"क्यों?"
"क्योंकि अगर नहीं गया," विक्रांत ने बहुत शांति से कहा, "तो मैं आज दोपहर छत पर जाकर Bahraich के SP office को फ़ोन करूँगा, और उन्हें बताऊँगा कि चौदह सितंबर की रात ग्यारह बावन पर एक लड़के का फ़ोन इस कोठी में बंद हुआ था, और उस रात तू Bahraich के किसी hotel में नहीं, यहीं था। और फिर मैं आशीष अरोड़ा को फ़ोन करूँगा, और उसे बताऊँगा कि जिस property के लिए उसने चालीस लाख दिए हैं, उसमें एक missing person का case दबाया गया है।"
रसोई में खामोशी थी।
कबीर उसे देखता रहा। बहुत देर तक। फिर उसने अपना चाय का कप उठाया, एक घूँट लिया, ठंडी चाय का, और नीचे रख दिया।
"ठीक है," उसने कहा। उसकी आवाज़ में कोई गुस्सा नहीं था। बस एक अजीब, थकी हुई राहत, जैसे कोई बहुत भारी बोझ उठाने के लिए झुकते हुए राहत महसूस करे कि आख़िरकार उठाना ही पड़ेगा। "ठीक है।"
"मैं भी चलूँगी," इरा ने कहा।
विक्रांत ने उसकी तरफ़ देखा। उसके चेहरे पर कोई डर नहीं था। उसमें कुछ और था। एक तरह की तैयारी।
अँगीठी के पास, रघु काका उठा।
"दिन में," उसने कहा। सबको, किसी को नहीं। "बारह बजे। जब सूरज सबसे ऊपर हो, भले दिखे नहीं। और पहले तल से नीचे नहीं।" उसने विक्रांत की तरफ़ देखा। "एक भी सीढ़ी नहीं।"
जाली के बोल्ट खोलने के लिए spanner चाहिए था।
विक्रांत ने रघु काका से पूछा। बूढ़े ने सिर हिलाया। उसके पास नहीं था।
कबीर, बिना कुछ कहे, पीछे के गलियारे की तरफ़ गया। विक्रांत उसके पीछे गया। कबीर सीधा तीसरी कोठरी तक गया, बिना इधर-उधर देखे, बिना किसी दरवाज़े पर हिचकिचाए, जैसे उसे पता हो कि कहाँ जाना है। उसने टूटे बोरों के ढेर के पीछे हाथ डाला, और एक मैले कपड़े में लिपटा कुछ निकाला।
कपड़ा खोला। एक भारी, steel का spanner। एक लोहे का सब्बल। और एक पीली, धूल भरी measuring tape, जिस पर किसी company का नाम छपा था। Sharma Survey Associates, Lucknow।
कबीर ने उन्हें विक्रांत की तरफ़ बढ़ाया, बिना उसकी आँखों में देखे।
विक्रांत ने उन्हें लिया। उसने कुछ नहीं कहा। कहने की ज़रूरत नहीं थी।
बारह बजे, पीछे के आँगन में, कोहरा सबसे पतला था। आसमान अब भी सलेटी था, पर उसमें एक हल्की, सफ़ेद चमक थी, ऊपर कहीं, जहाँ सूरज होना चाहिए था।
रघु काका ने हर किसी को एक-एक कील दी। मोटी, काली, लोहे की, उसकी उँगली जितनी लंबी।
"मुट्ठी में रखिए," उसने कहा। "पूरा वक़्त। छोड़िएगा मत।"
कबीर ने कील को देखा, फिर रघु काका को, और उसके होंठ हिले, जैसे वह कोई मज़ाक करने वाला हो। फिर उसने चुपचाप कील अपनी मुट्ठी में बंद कर ली।
"और?" इरा ने पूछा।
रघु काका ने एक पल सोचा, जैसे कोई पुरानी, धुँधली लिस्ट याद कर रहा हो। "सीढ़ियाँ मत गिनना। किसी का नाम मत लेना, न नीचे, न ऊपर। अगर नीचे से कोई पुकारे, चाहे किसी की आवाज़ हो, जवाब मत देना।" वह रुका। "और अगर नीचे पानी दिखे, तो वापस आ जाना। तुरंत।"
"पानी?" कबीर ने कहा। "ये सूखी है, काका। पचपन साल से।"
रघु काका ने कुछ नहीं कहा।
बोल्ट खोलने में बीस मिनट लगे। दो पुराने, जंग से जमे हुए, जिन्हें खोलने के लिए कबीर और विक्रांत दोनों को अपना पूरा वज़न लगाना पड़ा। दो नए, जो आसानी से खुल गए। बहुत आसानी से।
फिर पत्थर की पटिया। सब्बल को उसके नीचे फँसाकर, तीनों आदमियों ने ज़ोर लगाया। पटिया हिली, कराही, और धीरे-धीरे एक तरफ़ खिसकी, पत्थर पर पत्थर की घिसटन के साथ, एक गहरी, भारी आवाज़ जो विक्रांत को अपने पेट में महसूस हुई।
और जाली, जो अब सिर्फ़ अपने कब्ज़ों पर टिकी थी, एक तरफ़ से उठी, और ऊपर खुल गई।
बावड़ी का मुँह खुला था।
हवा ऊपर आई।
विक्रांत ने उसे अपने चेहरे पर महसूस किया। ठंडी, नम, भारी। उस गंध के साथ जो उसके कमरे में, उसके पैरों पर, उसके सपनों में थी। गीला पत्थर। काई। और उसके नीचे कुछ और, कुछ पुराना, कुछ मीठा-सा और सड़ता हुआ, जैसे बहुत पुराने फूल किसी बंद डिब्बे में।
और हवा बाहर की तरफ़ आ रही थी, धीरे-धीरे, एक लहर में। फिर रुकी। फिर अंदर की तरफ़ खिंची।
बाहर। रुकना। अंदर।
विक्रांत ने उसे गिना नहीं। उसे गिनने की ज़रूरत नहीं थी। वह लय पहचानता था।
वे एक-एक करके उतरे। पहले विक्रांत, फिर इरा, फिर कबीर। रघु काका ऊपर रुका, एक मोटी रस्सी का एक सिरा अपनी कमर पर बाँधे, दूसरा सिरा विक्रांत की कमर पर। "अगर ज़रूरत पड़ी," उसने कहा था, और किस ज़रूरत की, यह नहीं बताया।
विक्रांत के हाथ में एक नई लालटेन थी, रघु काका की दी हुई। इरा के हाथ में उसकी battery lamp। कबीर के पास मोबाइल की torch।
सीढ़ियाँ चौड़ी थीं, पत्थर की, हर एक कम से कम चार फ़ुट चौड़ी, किनारों पर घिसी हुई, बीच में हल्की-सी गहरी, सदियों के कदमों से। धूल की एक मोटी परत, उस पर सूखे पत्ते, किसी पक्षी के पंख, और कहीं-कहीं, धूल में, पुराने, धुँधले जूतों के निशान। सितंबर के।
विक्रांत ने अपना ध्यान अपने पैरों पर रखा, और सीढ़ियों पर नहीं।
वह गिन नहीं रहा था। पर उसका दिमाग़ हर कदम के साथ एक हल्की-सी धड़क महसूस कर रहा था, जैसे कोई और उसके अंदर गिन रहा हो, और वह उसे सुनने से इनकार कर रहा हो।
रोशनी ऊपर से कम होती गई। पहले आसमान की वह सफ़ेद चमक, फिर बस एक धुँधला, चौकोर टुकड़ा, फिर कुछ नहीं। अब बस उनकी अपनी रोशनियाँ थीं, लालटेन का पीला गोला, इरा की lamp का नीला-सफ़ेद, कबीर की torch की तीखी किरण।
ठंड बढ़ती गई। हर कदम के साथ। विक्रांत ने अपनी साँस देखी, एक सफ़ेद बादल, लालटेन की रोशनी में।
दीवारें पास आती गईं। पत्थर की, बड़े-बड़े तराशे हुए टुकड़ों से बनी, उनके बीच की दरारों में काई। सूखी, भूरी, मरी हुई काई। पर जितना वे नीचे गए, वह उतनी ही गहरे रंग की होती गई। हरी। फिर गहरी हरी।
नम।
"विक्रांत।" इरा ने उसकी बाँह छुई, और फुसफुसाकर कहा। "आपकी आवाज़।"
"क्या?"
"आप अभी कुछ बोले। पीछे मुड़कर। 'ध्यान से' कहा था।"
"हाँ?"
"उसकी गूँज नहीं आई।"
विक्रांत रुका। उसने सोचा। उसने सचमुच कुछ कहा था, कबीर को, कि एक टूटी सीढ़ी है। और उसने अपनी आवाज़ सुनी थी, बस अपने मुँह से निकलते हुए। उसके बाद कुछ नहीं।
"ये पत्थर आवाज़ सोख रहा है," उसने कहा। "Angle..."
"मेरी आवाज़ की गूँज आ रही है," इरा ने धीरे से कहा। उसने एक हल्की, छोटी आवाज़ निकाली, बस एक "हम्म", और विक्रांत ने उसे सुना, उसे दीवारों से टकराते, उसे लौटते, धीमा और गहरा।
"कबीर?"
कबीर ने खाँसा, जानबूझकर। गूँज लौटी। लंबी।
विक्रांत ने अपना मुँह खोला। "Check," उसने कहा। एक छोटा, साफ़, professional शब्द, जिसे उसने हज़ार बार हज़ार कमरों में बोला था।
शब्द उसके मुँह से निकला। उसने उसे सुना।
और फिर, वह गया। बिना लौटे। जैसे कुएँ में फेंका गया पत्थर, जिसके तली से टकराने की आवाज़ कभी नहीं आती।
उसने फिर कोशिश की। "Check। One, two।"
कुछ नहीं। सिर्फ़ उसकी आवाज़, और फिर एक खाली, पूरी खामोशी। जैसे ये पत्थर, ये दीवारें, ये गहराई सिर्फ़ उसकी आवाज़ को निगल रही थीं। सिर्फ़ उसकी।
"तेरी आवाज़..." कबीर ने कहा, धीमे, अजीब नज़र से। "...कहाँ गई?"
"Angle," विक्रांत ने फिर कहा, और इस बार उसे अपने ही शब्द पर भरोसा नहीं था। "मैं सबसे आगे हूँ। मेरी आवाज़ नीचे की तरफ़ जा रही है, खुली जगह में। तुम्हारी दीवारों की तरफ़।"
कोई कुछ नहीं बोला। वे आगे बढ़े।
पहला तल।
सीढ़ियाँ एक चौड़े, चौकोर चबूतरे पर ख़त्म हुईं। पत्थर का एक मंच, बावड़ी के चारों तरफ़ फैला हुआ, ऊपर से मेहराबों से ढका। मेहराबों के नीचे, दीवारों में, आले थे। छोटे, गहरे, कटे हुए खाने, जिनमें कभी दीये जलते होंगे।
चबूतरे के बीच में, उसके सामने वाले किनारे पर, सीढ़ियाँ फिर से नीचे जाती थीं। दूसरे तल की तरफ़। अंधेरे में।
विक्रांत ने लालटेन उधर नहीं की। उसने खुद को रोका।
"ये देखो," इरा ने कहा।
उसकी lamp एक आले की तरफ़ थी। उसमें कुछ रखा था। विक्रांत पास गया।
चूड़ियाँ। काँच की, टूटी हुई, रंग उड़ चुका। एक पुरानी, फटी चुनरी का टुकड़ा। मिट्टी का एक छोटा दीया, जिसमें कभी तेल था। एक बच्चे का खिलौना, लकड़ी का, कोई घोड़ा, जिसके पैर टूट चुके थे।
"चढ़ावा," इरा ने फुसफुसाया। "लोग यहाँ चीज़ें छोड़ते थे।"
"किसके लिए?"
इरा ने जवाब नहीं दिया।
अगले आले में और। और अगले में। हर आले में कुछ। किसी की कंघी। किसी की पायल। एक छोटी, जंग लगी तलवार। एक तस्वीर, इतनी पुरानी और गीली कि उस पर बस धब्बे बचे थे।
और चबूतरे के एक कोने में, ज़मीन पर, कुछ बड़ा पड़ा था। धातु का। गोल, उलटा। कबीर की torch उस पर पड़ी, और वह एक पल के लिए झिलमिलाया।
एक घंटी। पीतल की, भारी, हरी-काली। उसके ऊपर एक सड़ी हुई, गलकर लगभग ख़त्म हो चुकी रस्सी का टुकड़ा। उसकी भीतरी सतह पर, जहाँ लटकन होनी चाहिए थी, कुछ नहीं था। लटकन निकाल दिया गया था।
विक्रांत उसे देखता रहा। मंदिर का वह ख़ाली हुक। उसके नीचे पत्थर पर रस्सी का घिसा निशान।
"इकहत्तर," उसने फुसफुसाया। "उन्होंने इसे उतारा, और यहाँ फेंक दिया।"
"क्यों?" कबीर ने कहा। "घंटी को बावड़ी में क्यों..."
"मुझे नहीं पता।" विक्रांत ने घंटी को छुआ। ठंडी। बर्फ़ जैसी। "पर वे इससे इतना डरते थे कि इसे इसकी आवाज़ से अलग करके यहाँ, अंधेरे में, फेंक आए।"
नाम दीवार पर थे।
चबूतरे की पिछली दीवार, जो सीधे नीचे जाती सीढ़ियों के ठीक सामने थी, पत्थर के बड़े-बड़े टुकड़ों से बनी थी। और उन टुकड़ों पर, ऊपर से नीचे, अक्षर खुदे थे।
इरा ने lamp ऊपर उठाई। रोशनी दीवार पर फैली, और अक्षर उभरे, एक के नीचे एक, जैसे किसी क़ब्रिस्तान के पत्थर।
सबसे ऊपर, सबसे पुराने, सबसे घिसे हुए। कैथी लिपि में, शायद, जिसे विक्रांत पढ़ नहीं सकता था। और उनके बगल में अंक। 1893।
उसके नीचे, उर्दू में। 1921।
देवनागरी में। 1946।
इरा की उँगली, हवा में, हर नाम के ऊपर से गुज़रती गई। उसने एक भी नहीं पढ़ा। उसके होंठ बंद थे, कसकर।
फिर एक जगह, दीवार का एक बड़ा हिस्सा, अक्षरों से भरा। तेज़, गहरे, जल्दी में खुदे हुए, जैसे किसी ने पत्थर पर पूरा ग़ुस्सा, पूरा डर उतार दिया हो। विक्रांत ने गिने। बारह नाम। और उनके नीचे, एक बार, बड़े अक्षरों में: 1971।
उनके नीचे, एक और।
वहाँ नाम नहीं था।
वहाँ पत्थर टूटा हुआ था। छेनी से, जानबूझकर, कई बार मारा गया, उखाड़ा गया, जैसे किसी ने कोई नाम पूरी तरह से मिटाने की कोशिश की हो। उखड़े हुए पत्थर के किनारे पर काई जम चुकी थी। पुरानी। बरसों पुरानी। पर उस टूटे हिस्से के बगल में, अंक बच गए थे, उतने ही गहरे और साफ़ जितने खुदे गए होंगे:
1999।
विक्रांत ने उसे देखा। उस टूटे पत्थर को। उस मिटाए गए नाम को।
रजिस्टर का फटा हुआ पन्ना। पापा, लाइब्रेरी में, रोते हुए।
"किसी ने इसे भी मिटाया," इरा ने फुसफुसाया।
"पापा ने।" विक्रांत की आवाज़ बिना गूँज के उसके मुँह से निकलकर ख़त्म हो गई। "उन्होंने पन्ना फाड़ा, और फिर यहाँ आकर..."
उसकी नज़र नीचे गई।
1999 के नीचे, दीवार के उस हिस्से में जो चबूतरे के फ़र्श से थोड़ा ऊपर था, एक और नाम था।
बाकियों से बिल्कुल अलग।
उसके अक्षर तीखे थे। उनके किनारे साफ़, धारदार, बिना किसी घिसाव के। उन पर कोई काई नहीं थी। कोई धूल नहीं। और खाँचों के अंदर, पत्थर का बारीक, सफ़ेद चूरा अब भी पड़ा था, जैसे किसी ने इसे बस कुछ दिन पहले खोदा हो।
देवनागरी में:
सलीम — 2026
कबीर के गले से एक आवाज़ निकली। एक कराह, जो किसी इंसान से ज़्यादा किसी घायल जानवर की लगती थी। Torch उसके हाथ में काँपी, और उसकी किरण दीवार पर पागलों की तरह नाचने लगी।
"नहीं," उसने कहा। "नहीं, नहीं, नहीं..."
वह घुटनों के बल गिर गया। उसकी मुट्ठी अब भी बंद थी, रघु काका की कील पर, इतनी कसकर कि उसकी उँगलियों के जोड़ सफ़ेद पड़ गए थे।
"मैंने उसे कहा था," उसने फुसफुसाया। किसी से नहीं। दीवार से। "मैंने कहा था, बस पहला तल नाप ले। बस पहला। Depth का अंदाज़ा चाहिए था, plan के लिए। वो डर रहा था। बोला, साहब, अंधेरा है, कल सुबह कर लूँगा। मैंने कहा..." उसकी आवाज़ टूटी। "...मैंने कहा, डरपोक है क्या? पाँच मिनट का काम है।"
विक्रांत का पूरा शरीर ठंडा पड़ गया।
डरपोक है तू। नीचे जा के दिखा।
उसने कबीर को देखा, घुटनों पर, दीवार के सामने, उस नाम के सामने, और उसे लगा कि वह आईने में देख रहा है।
"मैं ऊपर था," कबीर ने कहा। "गेट पर। फ़ोन पर। फिर उसने नीचे से आवाज़ दी। 'साहब, नीचे पानी है।' मैं हँसा। मैंने कहा, पागल हो गया है, बावड़ी सूखी है। और फिर..." उसने अपना चेहरा अपनी हथेलियों में छिपा लिया। "...फिर कुछ नहीं। कुछ भी नहीं। मैंने रोशनी डाली, नीचे उतरा, यहाँ तक। उसकी machine यहाँ पड़ी थी, सीढ़ी पर। वो नहीं था।"
"कबीर।" इरा ने उसके कंधे पर हाथ रखा।
"पचपन साल से सूखी है," कबीर ने कहा, और हँसा, एक फटी, पागल हँसी, जो बावड़ी की दीवारों से टकराई और लौटी, बहुत देर तक, बहुत देर तक लौटती रही। "पचपन साल से..."
विक्रांत ने उन्हें नहीं सुना। उसका ध्यान कहीं और था।
उसकी लालटेन। उसके हाथ में।
उसकी लौ झुक रही थी।
धीरे-धीरे, बिना किसी हवा के, लंबी और पतली होती हुई, एक तरफ़ खिंच रही थी। दीवार की तरफ़ नहीं। सीढ़ियों की तरफ़ नहीं। उसकी तरफ़। ख़ुद उसकी तरफ़। जैसे कोई उसके कंधे के ठीक पीछे खड़ा होकर साँस अंदर खींच रहा हो।
गंध भारी हो गई। पानी की। इतनी भारी कि उसकी जीभ पर उसका स्वाद आने लगा।
और उसके कानों ने, जो कभी आराम नहीं करते थे, कुछ पकड़ा।
एक आवाज़। बहुत हल्की। बहुत पास। एक बारीक, लगातार, खुरदरी खरखराहट। जैसे किसी छोटी, सख़्त चीज़ को पत्थर पर घसीटा जा रहा हो। या जैसे कोई नाख़ून, बहुत धीरे, बहुत सधे हुए, किसी पत्थर में कुछ खोद रहा हो।
वह आवाज़ दीवार से आ रही थी।
विक्रांत ने लालटेन नीचे की। सलीम के नाम के नीचे।
वहाँ, पत्थर की चिकनी, अछूती सतह पर, एक लकीर बन रही थी।
उसकी आँखों के सामने। धीरे-धीरे। एक पतली, सफ़ेद खरोंच, जो पत्थर के अंदर से, बाहर की तरफ़ गहरी होती जा रही थी। उसके किनारों से पत्थर का बारीक चूरा झड़ रहा था, नीचे गिर रहा था, लालटेन की रोशनी में बारीक धूल की तरह चमकता हुआ। बिना किसी औज़ार के। बिना किसी हाथ के। जैसे पत्थर ख़ुद अपनी खाल पर कुछ लिख रहा हो।
लकीर मुड़ी। एक घुमाव बना। फिर एक सीधी खड़ी लकीर।
वि
"इरा," विक्रांत ने फुसफुसाया।
इरा मुड़ी। उसकी lamp की रोशनी उस पत्थर पर पड़ी। उसने देखा, और उसके मुँह से कोई आवाज़ नहीं निकली। उसने बस अपनी कील वाली मुट्ठी अपने मुँह पर दबा ली।
कबीर ने सिर उठाया। उसकी हँसी बीच में रुक गई।
खरखराहट जारी रही। बारीक, धैर्य से। एक नई लकीर। फिर एक घुमाव। एक आधा-अधूरा अक्षर, फिर पूरा होता हुआ।
विक
किसी ने साँस नहीं ली। चबूतरे पर सिर्फ़ वह आवाज़ थी, पत्थर पर नाख़ून जैसी, और नीचे की सीढ़ियों से ऊपर आती वह धीमी, बराबर हवा। बाहर। रुकना। अंदर।
विक्रा
विक्रांत पीछे हटा। एक कदम। उसकी पीठ किसी चीज़ से टकराई। रस्सी। उसकी कमर से बँधी, ऊपर रघु काका तक जाती। वह तनी हुई थी। कसकर।
खरखराहट रुकी।
अक्षर अधूरे रह गए। विक्रा। पत्थर पर ताज़ा, सफ़ेद, उनके खाँचों में बारीक चूरा अब भी काँप रहा था।
बाकी नाम नहीं लिखा गया। न कोई "न्", न कोई "त"। बस वह अधूरा शब्द, एक खुले मुँह की तरह।
और उसके बगल में, उसी ऊँचाई पर जहाँ बाकी नामों के साथ तारीख़ें खुदी थीं, पत्थर पर पहले से कुछ लिखा था। विक्रांत ने उसे अभी देखा, जबकि वह शायद पूरे वक़्त वहीं था। पुराना नहीं, ताज़ा भी नहीं। बस वहाँ। जैसे उसे किसी ने लिखा नहीं, बस पत्थर ने उसे हमेशा से अपने अंदर रखा हो, और अब उसे दिखाने का वक़्त आया हो।
2026
नाम अधूरा था। तारीख़ पूरी।
जैसे कोई इंतज़ार कर रहा हो।
बाकी लिखने के लिए।
[Part 10 समाप्त]

Writer
Piyashi Atma
Story
जवाब मत देना
Chapter
10 of 30
Category
Ghost Stories
Reading time
16 min
Words
3059
Language
Hindi (हिंदी)
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