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Part 9: मेहमान

Piyashi Atma · Ghost Stories · 16 मिनट

सुबह विक्रांत ने वह file बंद कर दी, पर delete नहीं की।
उसने उसे एक अलग folder में रखा, बिना नाम के। Laptop के एक ऐसे कोने में जहाँ वह गलती से भी न खुले। फिर उसने laptop बंद किया, और उसके ढक्कन पर अपनी हथेली रखे बैठा रहा, जैसे किसी ताबूत के ढक्कन पर कोई हाथ रखता है।
उसकी अपनी आवाज़। चीखती हुई। उसका अपना नाम।
उसने सोचा था कि वह इरा को बताएगा। रात भर, restoration करते हुए, वह यही सोच रहा था। सुबह इरा को दिखाऊँगा। वह कुछ कहेगी, कोई तर्क देगी, कोई पुरानी किताब का हवाला।
अब, खिड़की से आती सलेटी रोशनी में, उसे पता था कि वह नहीं बताएगा।
क्योंकि बताने का मतलब होता उसे ज़ोर से कहना। और ज़ोर से कहने का मतलब होता उसे सच मानना। मैं किसी दिन, कहीं बहुत नीचे, अपना नाम चीखूँगा। यह बात जब तक उसके दिमाग़ के अंदर थी, एक file में बंद, तब तक वह एक डेटा थी, एक अजीब anomaly। ज़ोर से कहते ही वह एक भविष्यवाणी बन जाती।
वह उठा। उसने अपना चेहरा ठंडे पानी से धोया। आईने में एक आदमी दिखा, जिसकी आँखें धँसी हुई थीं और जिसकी दाढ़ी पाँच दिन से नहीं बनी थी। उसने उसे पहचाना, उसी तरह जैसे उसने उस photo वाले बच्चे को पहचाना था।
जानकारी के तौर पर।
रघु काका नीचे गलियारे में खड़ा था। बाजा-घर के टूटे दरवाज़े के सामने। फ़र्श पर वह भारी, जंग लगा ताला पड़ा था, जहाँ कल कबीर के हथौड़े से गिरा था।
बूढ़ा उसे देख रहा था, जैसे कोई किसी कटे हुए बंधन को देखता है।
उसके हाथ में चाय का कुल्हड़ था, विक्रांत के लिए। पर उसने उसे आगे नहीं बढ़ाया। वह वहीं खड़ा रहा, ताले को देखता।
"काका।"
रघु काका ने सिर नहीं उठाया। "कल दरवाज़े पर किसी ने खटखटाया था?"
विक्रांत ठिठका। "आपको कैसे पता?"
"मैंने नहीं सुना।" रघु काका ने कहा। "मैं अपनी कोठरी में था, कान बंद करके। पर मैं जानता हूँ।" उसने आख़िरकार सिर उठाया, और उसकी आँखें, सुबह की रोशनी में, किसी बहुत पुराने, बहुत गहरे कुएँ जैसी थीं। "बाजा-घर इकहत्तर से बंद था। बड़े साहब ने बंद करवाया था, क्योंकि उसमें आवाज़ें थीं। और जब आवाज़ें बाहर आती हैं, तो वो सुनता है।"
"कौन, काका? कौन सुनता है?"
रघु काका ने कुल्हड़ उसकी तरफ़ बढ़ाया। विक्रांत ने उसे लिया। गर्म। भाप उठती हुई।
"मेहमान," बूढ़े ने कहा।
यह शब्द गलियारे में धीरे से गिरा। एक घरेलू, आम शब्द, जो हर घर में रोज़ बोला जाता है। मेहमान आए हैं। मेहमान के लिए चाय बनाओ। पर रघु काका ने उसे जिस तरह कहा, होंठों को मुश्किल से हिलाकर, आवाज़ को साँस से भी धीमा करके, उसने उस शब्द को कुछ और बना दिया। कुछ ऐसा जो किसी बच्चे की नींद में फुसफुसाया जाता है, ताकि वह कभी बड़ा होकर उसे ज़ोर से न बोले।
"मेहमान," विक्रांत ने दोहराया।
"धीरे।" रघु काका का हाथ उठा, जैसे उसके मुँह को ढकना चाहता हो, फिर रुक गया। "उसका नाम नहीं लिया जाता। इसलिए मेहमान कहते हैं।"
"क्यों मेहमान?"
"क्योंकि वो बुलाया गया था।" रघु काका ने कहा। "बहुत पहले। इस घर में। और जो बुलाया जाता है, वो मेहमान होता है।" वह रुका। "और जो मेहमान एक बार आ जाए, वो जाता नहीं।"
विक्रांत ने चाय का एक घूँट लिया। उसके गले में वह गर्म उतरी, और उस गर्मी ने उसे थोड़ी हिम्मत दी।
"काका, मैं आपकी इज़्ज़त करता हूँ। पर ये..." उसने हाथ से गलियारे की तरफ़ इशारा किया, ताले की तरफ़, कोठी की तरफ़। "...ये पुराने गाँव की कहानियाँ हैं। लोग किसी चीज़ से डरते हैं, उसे नाम दे देते हैं, उसके नियम बना लेते हैं। ताकि डर कम लगे।"
"हाँ।" रघु काका ने अजीब शांति से कहा। "नियम।"
"तो?"
"तो मैं आपको नियम बताता हूँ।" उसने एक उँगली उठाई, फिर दूसरी, जैसे किसी बच्चे को पहाड़े पढ़ा रहा हो। "जब सूखे कमरे में पानी की गंध आए, तो समझो वो पास है। जब दीये की लौ बिना हवा के किसी की तरफ़ झुके, तो समझो वो उसे देख रहा है। और जब कोई आवाज़ अपने आने से पहले आए, कदम, दरवाज़ा, कुछ भी, तो समझो वो रास्ता बना रहा है।" उसने विक्रांत को देखा। "आपने इनमें से कुछ देखा है?"
विक्रांत ने कुछ नहीं कहा।
उसने सब कुछ देखा था। गंध, उसके कमरे में। लौ, दरवाज़े की तरफ़ खिंचती हुई। कदम, आधा सेकंड पहले।
"मेहमान जाग गया है," रघु काका ने कहा। "सितंबर में किसी ने बावड़ी की नींद तोड़ी। अब आपने बाजा-घर का मुँह खोल दिया। अब वो सुन रहा है। हर आवाज़। हर नाम।"
उसने मुड़कर जाते हुए आख़िरी बात कही, बिना पीछे देखे:
"नाम मत लेना। और किसी को अंधेरे में मत पुकारना। चाहे कितना भी डर लगे।"
Infrasound।
यह शब्द विक्रांत के दिमाग़ में दोपहर को आया, जैसे डूबते आदमी के हाथ में कोई लकड़ी का टुकड़ा।
उसने इसके बारे में पढ़ा था। सालों पहले, एक conference में, किसी ने एक पुराना case सुनाया था। 1990 के दशक के आख़िर में, England में एक engineer ने अपनी lab में अजीब चीज़ें महसूस कीं। बेचैनी, कंपकंपी, यह एहसास कि कमरे में कोई और है। एक रात उसने अपनी आँख के कोने से एक धुँधली, सलेटी आकृति देखी, जो उसके पास आई और फिर गायब हो गई। वह डरा, पर वह engineer था, और उसने जाँच की।
एक नया extractor fan। जो बहुत धीमी, सुनाई न देने वाली आवाज़ पैदा कर रहा था। लगभग उन्नीस hertz। इंसानी कानों की सीमा से नीचे। उतनी धीमी कि तुम उसे सुन नहीं सकते, पर तुम्हारा शरीर उसे महसूस करता है।
और उन्नीस hertz के आसपास, इंसानी आँख की पुतली ख़ुद काँपने लगती है। Resonance। आँख धुँधली आकृतियाँ बनाने लगती है, किनारों पर। और दिमाग़, जो हर अजीब चीज़ का कोई कारण ढूँढता है, उसे एक मौजूदगी का नाम देता है।
Fan हटाया गया। भूत चला गया।
विक्रांत ने अपना सामान फिर से निकाला। उसके condenser mics बीस hertz तक नीचे की आवाज़ पकड़ सकते थे, शायद थोड़ा और नीचे। काफ़ी नहीं, पर कुछ तो।
उसने पूरी कोठी को फिर से नापा, इस बार सुनने के लिए नहीं, उसके नीचे सुनने के लिए।
सामने वाले कमरे। लाइब्रेरी। सामान्य। बस हल्की-सी, बेजान, नीची गुनगुनाहट, जो हर पुरानी इमारत में होती है।
पीछे का गलियारा। उसने laptop पर spectrum खोला, और बाईं तरफ़, जहाँ सबसे नीची frequencies होती हैं, वहाँ एक चोटी उभरी।
अठारह दशमलव नौ hertz।
उसकी साँस निकल गई। राहत की। लगभग ख़ुशी की।
वह बावड़ी की तरफ़ बढ़ा। चोटी बढ़ती गई। आँगन के दरवाज़े पर, वह किसी पहाड़ जैसी खड़ी थी। Laptop की screen पर एक मोटी, स्थिर, लाल लकीर।
यही है, उसने सोचा। यही है। बावड़ी में कोई हवा का बहाव है, कोई ज़मीन के नीचे की गुफ़ा, कोई कुदरती organ pipe, जो यह frequency पैदा करती है। यह मेरी आँखों को काँपा रही है। मेरे दिमाग़ को डरा रही है। मेरे सपने बदल रही है। मुझे नींद में चला रही है।
यह सब कुछ नहीं समझाता था। Recordings को नहीं। Disc पर उसकी चीख को नहीं। पर यह कुछ समझाता था, और इस वक़्त विक्रांत को किसी भी चीज़ की ज़रूरत थी जो कुछ भी समझाए।
उसने recording पाँच मिनट चलने दी, ताकि वह उस frequency के pattern को देख सके। फिर उसने graph बनाया। समय के साथ, उस चोटी की ताक़त।
और उसकी राहत धीरे-धीरे, जैसे किसी गिलास से पानी रिसता है, बाहर निकलने लगी।
चोटी स्थिर नहीं थी।
वह उठती थी। फिर गिरती थी। फिर उठती थी। एक लय में। एक लहर की तरह। धीमी, बराबर, लगातार।
उसने लहरों को गिना। एक मिनट में।
बारह।
बारह बार उठना, बारह बार गिरना, एक मिनट में।
उसे यह संख्या पता थी। हर doctor को पता होती है, हर नर्स को। एक आराम कर रहे, सोते हुए वयस्क इंसान की साँसों की दर। बारह से सोलह प्रति मिनट।
कोई हवा का बहाव इस तरह नहीं चलता। कोई organ pipe इस तरह नहीं बजता।
बावड़ी साँस ले रही थी।
इरा लाइब्रेरी में थी, पर काम नहीं कर रही थी।
वह खिड़की के पास बैठी थी, एक कुर्सी पर, घुटने मोड़े, और उसके हाथ में बाजा-घर वाली वह photo थी। सफ़ेद कपड़ों वाला आदमी। उसकी झुकी हुई आँखें। ज़मीन की तरफ़ देखती हुई।
विक्रांत अंदर आया तो उसने photo जल्दी से अपनी गोद में उलट दी।
"Infrasound," विक्रांत ने कहा, और उसे बताया। उन्नीस hertz। बारह लहरें। साँस की लय।
इरा ने सुना, और उसका चेहरा, उसने देखा, कुछ नहीं बोला। न हैरानी, न डर, न अविश्वास। बस एक सावधान, थका हुआ ध्यान। जैसे वह कोई ऐसी बात सुन रही हो जो उसे पहले से पता थी, बस इस भाषा में नहीं।
"वो आदमी कौन है, इरा?"
"कौन?"
विक्रांत ने उसकी गोद की तरफ़ इशारा किया।
इरा ने photo को पलटा। उसे देखा। फिर उसे सावधानी से मेज़ पर रख दिया, चेहरा नीचे।
"मैंने कहा था। पता नहीं।"
"आपने कल कहा था। पर आपकी उँगलियाँ उस शीशे पर रुकी थीं। ठीक उसके चेहरे पर।"
इरा ने उसकी तरफ़ देखा। लंबी, स्थिर नज़र। और फिर, विक्रांत को हैरानी हुई, वह हल्का-सा मुस्कुराई। एक थकी, उदास मुस्कान।
"आप हर चीज़ नोट करते हैं।"
"Occupational disease।"
"मेरे पास आपको बताने के लिए कुछ नहीं है," उसने धीरे से कहा। "अभी।"
अभी।
उसने यह शब्द कहा, और फिर तुरंत अपनी आँखें फेर लीं, जैसे उसे पता हो कि वह शब्द उसके मुँह से फिसल गया था। जैसे कोई गिलास हाथ से छूट जाए, और तुम उसके फ़र्श तक पहुँचने का इंतज़ार करो।
विक्रांत ने उसे नहीं दबाया। उसने उसे उस ढेर में रखा, जो अब इतना बड़ा हो चुका था कि उसके नीचे से फ़र्श नहीं दिखता था।
उस रात उसने हर आवाज़ पर रुकना सीखा।
वह इसके बारे में सोचता नहीं था। उसका शरीर करता था। पलंग की लकड़ी की एक चरमराहट, और उसकी साँस रुक जाती। छत पर किसी चूहे की खरखराहट, और उसकी उँगलियाँ रज़ाई पर कस जातीं। पंखे की वह चीं, जिसे उसने पहली रात से सुना था, अब हर बार उसके दिल की धड़कन को एक पल के लिए गलत ताल पर फेंक देती।
उसने लालटेन की लौ देखी। सीधी। उसने हवा सूँघी। सूखी, धूल की।
ढाई बजे के आसपास, उसे प्यास लगी। पानी का जग ख़ाली था।
वह उठा, torch ली, और दरवाज़ा खोला। गलियारा अंधेरा था, बल्ब बुझा हुआ। शायद बिजली फिर से कम थी।
उसने कबीर के कमरे की तरफ़ देखा। दरवाज़ा थोड़ा खुला था। अंदर से कोई आवाज़ नहीं।
विक्रांत ने, बिना किसी कारण के, बस इसलिए कि वह दरवाज़ा खुला था और कबीर हमेशा अपना दरवाज़ा बंद रखता था, उसे धकेला।
कमरा ख़ाली था।
पलंग पर रज़ाई पीछे फेंकी हुई थी। तकिए पर सिर का गड्ढा। उसने हाथ से चादर को छुआ। ठंडी। घंटों से ख़ाली।
पलंग के पास एक छोटी मेज़ पर पानी का गिलास था, और उसके बगल में दवाइयों का एक पत्ता। नींद की गोलियाँ। विक्रांत ने उसे उठाया। दस की strip। एक भी नहीं निकली थी।
नींद की गोली। दो। कभी तीन। क्योंकि अगर नहीं लूँ तो कोई मुझे बुलाता है।
कबीर ने आज रात गोली नहीं ली थी।
विक्रांत ने गलियारे में देखा। अंधेरा। सीढ़ियाँ। वह नीचे उतरा, torch नीचे झुकाए, अपने कदमों को देखते हुए, उन्हें न गिनते हुए।
नीचे का गलियारा। सामने का दरवाज़ा, बंद, कुंडी लगी। लाइब्रेरी, अंधेरी। रसोई, ख़ाली।
उसका मुँह खुला। उसके होंठों पर नाम आ गया। कबीर। इतना स्वाभाविक, इतना आसान, जैसे साँस लेना। अंधेरे में किसी को ढूँढ रहे हो, तो उसे पुकारते हो। यही तो इंसान करता है।
उसने अपने दाँत अपनी जीभ पर गड़ा दिए। ज़ोर से। इतने ज़ोर से कि उसके मुँह में ख़ून का हल्का, धात्विक स्वाद आया।
नाम उसके गले में वापस चला गया।
उसने पीछे के गलियारे की तरफ़ torch घुमाई। लंबा, सँकरा, उसकी दोनों तरफ़ कोठरियों के बंद दरवाज़े। और उसके अंत में, पीछे के आँगन वाला दरवाज़ा, रघु काका की कीलों से भरा।
वह खुला था।
विक्रांत उसकी तरफ़ बढ़ा। हर कदम पर उसका शरीर उसे रोक रहा था, और वह उसे धकेल रहा था। दरवाज़े पर पहुँचकर उसने बाहर झाँका।
कोहरा। आँगन में भरा हुआ, कमर तक, धीरे-धीरे घूमता हुआ, जैसे कोई बहुत बड़ा, सफ़ेद जानवर करवट ले रहा हो। Torch की रोशनी उसमें दो फ़ुट जाती और बिखर जाती।
और कोहरे के बीच, बावड़ी की जगह के पास, एक छोटा, लाल बिंदु।
एक cigarette का जलता सिरा।
वह हवा में था, कमर की ऊँचाई पर, स्थिर। कोई उसे पकड़े खड़ा था, बावड़ी की जाली के ठीक पास। विक्रांत को आकृति नहीं दिख रही थी, बस वह लाल बिंदु। एक पल के लिए वह चमका, जैसे किसी ने कश लिया हो। फिर हल्का पड़ा।
उसने torch उसकी तरफ़ की।
कोहरा। सफ़ेद, घना, बेजान।
बिंदु वहाँ नहीं था।
उसने torch इधर-उधर घुमाई। जाली का किनारा, पत्थर की पटिया। ख़ाली आँगन। कोई नहीं। कोई cigarette नहीं, कोई धुआँ नहीं।
उसने आँगन में कदम नहीं रखा। वह मुड़ा, दरवाज़ा बंद किया, कुंडी लगाई, और उसकी कीलों वाली लकड़ी से अपनी पीठ सटाकर कुछ देर साँस लेता रहा।
वह पानी पीना भूल गया था।
सुबह पाँच बजे के आसपास, उसने कबीर के दरवाज़े की आवाज़ सुनी। धीरे से खुलना, धीरे से बंद होना। कुंडी।
सात बजे, नाश्ते पर, कबीर नहाया हुआ, ताज़ा, बाल गीले, मुस्कुराता हुआ नीचे आया। ज़रूरत से ज़्यादा मुस्कुराता हुआ।
"Dealer ने बोला है," उसने रोटी तोड़ते हुए कहा, "पूरा collection साढ़े चार-पाँच लाख का है। HMV अलग। अच्छा है न? कम से कम कुछ तो..."
"रात को ठीक से सोया?" विक्रांत ने पूछा।
"घोड़े बेचकर।" कबीर हँसा। "दो गोलियाँ, सीधा सुबह।"
विक्रांत ने उसे देखा। उसकी आवाज़ में वह ठहराव नहीं था। कबीर झूठ नहीं बोल रहा था।
वह सच में मानता था कि वह सोया था।
विक्रांत की नज़र नीचे गई। कबीर के जूते, नाश्ते की मेज़ के नीचे। महँगे, भूरे चमड़े के, जो उसने पहले दिन पहने थे।
उनके तलवों के किनारों पर, सूखी, भूरी-काली मिट्टी जमी थी। और उस मिट्टी में, बारीक, हरे, रेशेदार धागे। काई।
दोपहर को विक्रांत छत पर गया। Signal के लिए। उस कोने पर, जहाँ इरा ने कहा था कि थोड़ा network आता है।
उसका फ़ोन कई दिनों बाद काँपा। एक के बाद एक notifications, जो उसके पीछे कहीं अटकी पड़ी थीं। Office के emails। Delhi से कुछ दोस्तों के messages। कैसा है? पापा के बाद सब ठीक?
और एक missed call। एक नया नंबर। फिर एक message, उसी नंबर से।
विक्रांत साहब, मैं इमरान हूँ। सलीम का भाई। आपने अपना नंबर दिया था, अम्मी को। कृपया call कीजिए।
उसने call किया। दो बार कटा, तीसरी बार लगा।
"साहब!" इमरान की आवाज़ में एक काँपती, बेताब ऊर्जा थी। "आपको कुछ बताना है। भाई का फ़ोन, परसों रात, on हुआ था। बस एक मिनट के लिए। मेरे दोस्त का भाई Airtel में है, उसने बताया। Tower ने signal पकड़ा, एक मिनट, फिर बंद।"
"कहाँ से?"
"रौशनपुर। आपकी कोठी वाला tower।" इमरान रुका। "साहब, तीन महीने हो गए। कौन सी battery तीन महीने चलती है?"
विक्रांत के पास जवाब नहीं था।
"और..." इमरान की आवाज़ धीमी हो गई, शर्मिंदा। "...एक और बात। मैं हर रात भाई के नंबर पर WhatsApp करता हूँ। Voice message। बस बोलता हूँ, अम्मी कैसी हैं, घर में क्या हुआ। पता है पागलपन है। पर..." वह रुका। "...उस दिन आपके जाने के बाद, मैंने उसमें आपका नंबर भी भेज दिया। Contact। पता नहीं क्यों। बस लगा कि अगर वो कभी..." उसकी आवाज़ टूटी। "...अगर वो कभी किसी को फ़ोन करना चाहे, तो कोई ऐसा हो जिसने सच में सुना था।"
विक्रांत ने आँखें बंद कीं। छत पर ठंडी हवा चल रही थी, कोहरे से गीली।
"ठीक है, इमरान," उसने कहा। "ठीक किया।"
उस रात वह फिर छत पर गया।
उसे नहीं पता था क्यों। शायद इसलिए कि यह कोठी की इकलौती जगह थी जहाँ से बाहर की दुनिया से जुड़ाव होता था। शायद इसलिए कि यहाँ ऊपर, खुले में, दीवारें नहीं थीं, गलियारे नहीं थे, बंद दरवाज़े नहीं थे।
शायद इसलिए कि वह किसी चीज़ का इंतज़ार कर रहा था, और उसे यह पता भी नहीं था।
छत ठंडी और गीली थी। कोहरा यहाँ ऊपर कम था, पर आसमान फिर भी एक सपाट, काला, बिना तारों का ढक्कन था। नीचे, गाँव पूरी तरह अंधेरा था। एक भी रोशनी नहीं। जैसे वहाँ कोई रहता ही न हो।
वह छत के उस कोने पर खड़ा रहा, फ़ोन हाथ में, signal की एक कमज़ोर, आती-जाती लकीर को देखता हुआ। एक bar। फिर कुछ नहीं। फिर एक।
उसने समय देखा। दो बजकर तेरह मिनट।
उसके हाथ में फ़ोन काँपा।
एक notification। WhatsApp। एक नंबर से, जो उसकी contacts में नहीं था। पर उसके ऊपर एक छोटी, गोल profile photo थी, और विक्रांत ने उसे पहचाना, क्योंकि उसने उसे इमरान की माँ के हाथ में एक मुड़े हुए काग़ज़ पर देखा था। एक हँसता हुआ नौजवान। घुँघराले बाल। हल्की मूँछें। हाथ में एक पीली survey machine।
Voice message। 0:41।
भेजा गया: 2:14 AM।
विक्रांत की उँगलियाँ फ़ोन पर जम गईं।
दो बजकर चौदह मिनट। वही वक़्त। जब उस ताला-बंद कोठरी में उसकी आवाज़ ने गिनती शुरू की थी।
उसने अपना छोटा recorder निकाला। उसके हाथ इतने काँप रहे थे कि उसे बटन दबाने में दो बार कोशिश करनी पड़ी। लाल बत्ती जली। उसने उसे फ़ोन के speaker के पास रखा।
फिर उसने play दबाया।
पहले, कुछ सेकंड की खामोशी। फिर hiss। वह खुली, गूँजती, खाली जगह की hiss जो उसने पहली रात उस landline पर सुनी थी। एक बहुत बड़ी, बहुत गहरी, पत्थर की जगह, जहाँ आवाज़ गिरती है और देर तक लौटती रहती है।
उसके कान, जो अपने आप नापने लगते थे, उसने उन्हें रोका नहीं। Reverb, ढाई सेकंड। बंद। गहरी। नीचे की तरफ़।
टप।
पानी। गूँज में लिपटा हुआ।
टप।
और फिर, बहुत दूर से, एक धुन। एक सस्ते मोबाइल की ringtone। किसी पुराने फ़िल्मी गाने की पतली, electronic धुन। बस कुछ सुर, और फिर रुक गई, जैसे किसी ने उसे दबा दिया हो।
विक्रांत ने अपनी साँस रोक ली।
फिर, उस गहरी, अंधेरी, गूँजती खामोशी में, एक आवाज़ आई।
सलीम की नहीं।
किसी आदमी की नहीं।
एक बच्चे की।
छोटी, पतली, ठंड से काँपती हुई, किसी ऐसे बच्चे की जो बहुत देर से रो रहा हो और अब रोने की ताक़त भी खो चुका हो। आवाज़ बहुत दूर से आ रही थी, पत्थर की दीवारों से टकराकर, लौटकर, हर लौटने के साथ थोड़ी और पतली, थोड़ी और खोई हुई। जैसे वह किसी ऐसे गड्ढे की तली से बोल रहा हो जिसका कोई सिरा नहीं। साँस थी, उसमें, छोटी, काँपती, गीली। एक ज़िंदा बच्चे की साँस।
और उस आवाज़ ने, बहुत धीमे, बहुत थकी हुई, बिना किसी को पुकारे, जैसे बस किसी को बताना चाह रही हो, जो भी सुन रहा हो, कहा:
"मैं अभी भी नीचे हूँ।"
[Part 9 समाप्त]

Writer
Piyashi Atma
Story
जवाब मत देना
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9 of 30
Category
Ghost Stories
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16 min
Words
3056
Language
Hindi (हिंदी)
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