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Part 8: बाजा-घर

Piyashi Atma · Ghost Stories · 17 मिनट

विक्रांत ने अपने पैर बाल्टी के पानी में डुबोए, और पानी हरा हो गया।
वह कोठी के पुराने गुसलख़ाने में बैठा था, एक नीचे पीढ़े पर, दरवाज़ा अंदर से बंद। बाल्टी का पानी बर्फ़ जैसा ठंडा था, पर उसके पैरों से ज़्यादा ठंडा नहीं। उसने उन्हें रगड़ा, साबुन से, नाख़ूनों से, और कीचड़ धीरे-धीरे घुलकर पानी को भूरा-हरा करता गया। काई के रेशे सतह पर तैरने लगे, बारीक, बालों जैसे, धीरे-धीरे घूमते हुए।
उसने पानी फेंका, दूसरी बाल्टी भरी, और फिर रगड़ा।
तीसरी बाल्टी के बाद उसके पैर साफ़ थे। लाल, ठंड और रगड़ से छिले हुए, पर साफ़। फिर भी वह गंध नहीं गई। उसने अपना पैर उठाकर सूँघा, और वह वहाँ थी, हल्की, पर वहाँ। गीले पत्थर की। जैसे वह खाल के ऊपर नहीं, खाल के अंदर हो।
ऊन का वह लाल रेशा उसने एक छोटी plastic की थैली में रखा था। Evidence bag, जैसे lab में रखते हैं। थैली अब उसकी jacket की अंदर वाली जेब में थी, उसके सीने से सटी हुई।
उसने कमरे के फ़र्श से कीचड़ के निशान पोंछ दिए थे, सुबह होने से पहले, एक पुराने तौलिए से, घुटनों के बल बैठकर। फिर तौलिए को अपने bag में ठूँस दिया था। उसने किसी को कुछ नहीं बताया था।
यह बात उसे खुद भी अजीब लगी। पिछले हफ़्ते तक वह हर चीज़ record करता, हर चीज़ दिखाता, हर चीज़ साबित करता। पर ये पैर उसके थे। यह कीचड़ उसके तलवों पर था। और अगर वह किसी को दिखाता, तो उसे वह सवाल सुनना पड़ता जो वह खुद से पूछने से डर रहा था।
तुम कहाँ गए थे?
रघु काका का क्वार्टर ख़ाली था। बूढ़ा सुबह-सुबह कहीं निकल गया था, शायद गाँव, शायद खेतों की तरफ़।
विक्रांत ने दरवाज़ा धकेला और अंदर गया।
लालटेन वहीं थी, संदूक के ऊपर, जहाँ कल थी। उसकी दरार वाली चिमनी, उसका हरा पड़ चुका पीतल। और हैंडल पर वह लाल धागा।
विक्रांत ने थैली निकाली और उसे धागे के बगल में रखा, छुए बिना।
वही रंग। वही फीका, धूप और सालों से उड़ा हुआ लाल। वही ऊन, मोटी, हाथ से बुनी, जिसके रेशे घुमावदार थे। वही गाँठ का तरीका। छोटी, कसी हुई, किसी बच्चे के दाँतों से बाँधी गई।
उसने लालटेन के धागे को ध्यान से देखा। उसके दोनों सिरे। कोई टूटा हुआ हिस्सा, कोई ताज़ा खिंचाव, कोई जगह जहाँ से कुछ निकाला गया हो।
धागा पूरा था। अछूता। उस पर धूल की एक पतली परत थी, बराबर, बिना किसी उँगली के निशान के। किसी ने इसे बरसों से नहीं छुआ था।
उसके तलवे पर जो रेशा था, वह यहाँ से नहीं आया था।
वह उसी टोपी से आया था। पर कहीं और से।
विक्रांत ने थैली वापस जेब में रखी और बाहर निकल आया। सुबह का कोहरा उसके चेहरे पर गीला और ठंडा था।
उसने बावड़ी की तरफ़ नहीं देखा। उसने खुद को रोका, जैसे किसी के चेहरे की तरफ़ न देखने के लिए गर्दन घुमाई जाती है।
"बाजा-घर," इरा ने कहा।
वह लाइब्रेरी की मेज़ पर एक पतली, लंबी बही खोले बैठी थी, सामान की फ़ेहरिस्त जैसी। Inventory। हर पंक्ति में एक चीज़, उसकी क़ीमत, ख़रीदने की तारीख़।
"ये 1930 के आसपास की है। उस वक़्त कोठी के मालिक लाला हरकिशन के पोते थे। बहुत शौक़ीन आदमी। देखिए।" उसकी उँगली एक पंक्ति पर रुकी। "विलायती ग्रामोफ़ोन, His Master's Voice। फिर ये: 'आवाज़ उतारने की मशीन, Calcutta से मँगवाई'। Recording machine, विक्रांत। उस ज़माने में। घर में।"
"1930s में home disc recorders होते थे," विक्रांत ने कहा। उसकी आवाज़ में, पहली बार कई दिनों में, एक हल्की-सी professional दिलचस्पी थी। "अमीर लोग शौक़ के लिए ख़रीदते थे। Aluminium या acetate की discs पर सीधे कट करते थे। बहुत दुर्लभ हैं अब।"
"और ये।" इरा का हाथ थोड़ा नीचे खिसका। "'तवा, ख़ास। तजदीद की रस्म का। सन 1936। बाजा-घर में महफ़ूज़।'"
"तजदीद?"
"Renewal।" उसने कहा। "नवीनीकरण। किसी पुरानी चीज़ को नया करना। कोई वादा, कोई क़रार।"
विक्रांत ने उसकी तरफ़ देखा। "किस चीज़ का?"
"यहाँ नहीं लिखा।" इरा ने बही बंद की। "पर बाजा-घर कोठी के पश्चिमी हिस्से में है। लाइब्रेरी के पीछे। मैंने उसका दरवाज़ा देखा है। ताला लगा है, और चाबी रघु काका के गुच्छे में नहीं है।"
कबीर इस बात पर तुरंत तैयार हो गया।
"1930 का HMV?" उसकी आँखों में कई दिनों बाद कोई चमक आई। "यार, collectors लाखों देते हैं इसके। और discs अलग।" उसने हाथ मले। "तोड़ दो ताला। मैं ज़िम्मेदारी लेता हूँ।"
रघु काका ने तोड़ने से इनकार कर दिया।
वह बाजा-घर के दरवाज़े के सामने खड़ा था, एक लंबे, अंधेरे, बिना खिड़की वाले गलियारे के अंत में, और उसकी पीठ उस दरवाज़े से सटी थी, जैसे वह उसे अपने शरीर से बचा रहा हो।
"ये कमरा इकहत्तर से बंद है," उसने कहा।
"तो?" कबीर ने झुँझलाकर कहा। "पचपन साल हो गए, काका। अब तक तो अंदर सब सड़ गया होगा।"
"बड़े साहब ने बंद करवाया था। आपके दादा। उन्होंने कहा था..." रघु काका रुका।
"क्या कहा था?"
"कि इस कमरे में आवाज़ें बंद हैं।"
कबीर हँसा। ऊँची, खोखली हँसी, जो गलियारे में गूँजी, और विक्रांत ने देखा कि रघु काका ने उस गूँज के लौटने पर अपनी आँखें बंद कर लीं।
"आवाज़ें बंद हैं, यार। ये गाँव..." कबीर ने रघु काका को कंधे से हल्का-सा, पर मज़बूती से एक तरफ़ हटाया। "हटिए। विक्रांत, हथौड़ा दे।"
ताला पुराना था, लोहे का, किसी मुट्ठी जितना बड़ा। उसके छेद में जंग इतनी जम चुकी थी कि वह एक ठोस, भूरा पत्थर लगता था। कबीर ने हथौड़ा तीन बार मारा। चौथी बार ताले का कुंडा टूटकर फ़र्श पर गिरा, एक भारी, बेजान आवाज़ के साथ।
रघु काका मुड़ा और बिना कुछ कहे चला गया।
दरवाज़ा अंदर की तरफ़ खुला, और हवा बाहर आई।
बंद कमरों की हवा का एक ख़ास स्वाद होता है। विक्रांत ने उसे पुराने archives में, बंद पड़े studios में, एक बार किसी मरे हुए आदमी के flat में महसूस किया था। रुकी हुई, बासी, धूल की, सड़ते काग़ज़ की। पर इस कमरे की हवा में कुछ और भी था। एक हल्की, मीठी, लगभग फूलों जैसी गंध। पुराने shellac की। लाख की। और उसके नीचे, बहुत हल्की, वह जानी-पहचानी गीली ठंडक।
कबीर ने मोबाइल की torch जलाई।
कमरा छोटा था, चौकोर, ऊँची छत वाला। दीवारें, विक्रांत ने तुरंत देखा, गहरे लाल मख़मल से ढकी थीं, जो अब धूल से भूरा और जगह-जगह से फटा हुआ था। फ़र्श पर एक मोटा, पुराना क़ालीन। छत से भी कपड़ा लटका था, शामियाने की तरह।
"ये..." विक्रांत ने धीरे से कहा। "...ये soundproofing है।"
"क्या?"
"मख़मल, क़ालीन, छत का कपड़ा। ये सब आवाज़ सोखते हैं। कोई इस कमरे को studio की तरह बना रहा था। ताकि recording में गूँज न आए।" उसने दीवार के मख़मल को छुआ। उसकी उँगलियों के नीचे वह मोटा और नम था। "1936 में। किसी ने बहुत सोच-समझकर बनाया था।"
या किसी ऐसी चीज़ से बचने के लिए जो गूँज में रहती है, उसके दिमाग़ के किसी कोने ने कहा, और उसने उस आवाज़ को अनसुना कर दिया।
कमरे के बीच में, एक नक़्क़ाशीदार लकड़ी की मेज़ पर, ग्रामोफ़ोन था।
कबीर ने एक धीमी सीटी बजाई। एक बड़ा, लकड़ी का डिब्बा, जिस पर एक बहुत बड़ा, फूल जैसा भोंपू लगा था, पीतल का, जो अब हरा-काला पड़ चुका था। डिब्बे पर एक छोटा, धुँधला label: एक कुत्ता, ग्रामोफ़ोन के भोंपू में झाँकता हुआ।
उसके बगल में एक दूसरी मशीन थी। ज़्यादा भारी, ज़्यादा अजीब। एक धातु का turntable, उसके ऊपर एक भारी arm जिसकी नोक पर एक cutting stylus था, और एक मोटी तार जो एक पुराने microphone तक जाती थी। Mic एक स्टैंड पर था, कमरे के बीच में, जैसे किसी के बोलने का इंतज़ार कर रहा हो।
दीवारों के साथ लकड़ी की अलमारियाँ थीं, और उनमें discs। सैकड़ों। काग़ज़ के खोल में, कतारों में, जैसे किताबें।
कबीर उनकी तरफ़ बढ़ा, मोबाइल की रोशनी में label पढ़ता हुआ। "Gauhar Jaan... K.L. Saigal... यार, ये सब original हैं। इनका पता है कितना..."
इरा ने उस पर ध्यान नहीं दिया। वह कमरे के दूसरे कोने की तरफ़ गई, जहाँ एक छोटी, अलग अलमारी थी, शीशे के दरवाज़ों वाली, ताला लगा। शीशे के पीछे सिर्फ़ एक disc थी। अकेली।
विक्रांत उसके पीछे गया।
Disc बाकियों जैसी नहीं थी। काली shellac नहीं, बल्कि धातु की, मटमैली चाँदी जैसी। Aluminium। उसके बीच में कोई छपा हुआ label नहीं था, बस एक काग़ज़ का गोल टुकड़ा चिपका था, जिस पर हाथ से, उर्दू में, कुछ लिखा था।
"तजदीद," इरा ने पढ़ा। "सन 1936।"
अलमारी के ऊपर, एक लकड़ी के फ्रेम में, एक photo थी।
सीपिया रंग की, धुँधली, किनारों पर दाग़। कोठी का सामने वाला आँगन। तुलसी का चौरा, तब हरा और भरा हुआ। आँगन में एक परिवार खड़ा था, सज-धजकर, कैमरे की तरफ़ गंभीर चेहरे। बीच में एक मोटा, मूँछों वाला आदमी, अचकन में, टोपी लगाए। उसकी पत्नी, घूँघट में। तीन-चार बच्चे। नौकर, किनारों पर।
और परिवार के ठीक बगल में, थोड़ा अलग, एक और आदमी।
सफ़ेद कपड़ों में। लंबा, दुबला, चेहरे पर सफ़ेद दाढ़ी। उसके हाथ में एक माला थी, और उसकी आँखें कैमरे की तरफ़ नहीं, नीचे की तरफ़ झुकी थीं। ज़मीन की तरफ़।
इरा ने उस photo को देखा, और विक्रांत ने देखा कि उसका हाथ उठा। धीरे से। उसकी उँगलियाँ फ्रेम के शीशे पर, ठीक उस सफ़ेद कपड़ों वाले आदमी के चेहरे के ऊपर, रुकीं। बस एक पल के लिए।
फिर उसने हाथ हटा लिया।
"ये कौन है?" विक्रांत ने पूछा।
"पता नहीं," इरा ने कहा। बहुत जल्दी। "कोई मौलवी होंगे। या हकीम। उस ज़माने में बड़े घरों में आते-जाते रहते थे।"
विक्रांत ने उसकी आवाज़ सुनी। सवाल के बाद, जवाब से पहले।
उसने कुछ नहीं कहा।
कबीर Bahraich चला गया, discs की कुछ photos लेकर, किसी dealer से मिलने। "शाम तक बताता हूँ कितने का माल है।" उसने बाजा-घर में रुकने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई, और विक्रांत ने देखा कि जाते वक़्त उसने उस अकेली aluminium disc की तरफ़ एक बार भी नहीं देखा।
रघु काका ने भी आने से इनकार कर दिया। विक्रांत ने उसे बुलाया, और बूढ़ा अपने क्वार्टर के दरवाज़े पर खड़ा होकर सिर्फ़ इतना बोला: "मैं नहीं सुनूँगा।" और दरवाज़ा बंद कर लिया।
तो सिर्फ़ वे दो थे।
विक्रांत ने बहुत सावधानी से तैयारी की। Aluminium discs नाज़ुक होती हैं। एक गलत सुई, एक गलत दबाव, और वह groove हमेशा के लिए कट सकती है जिसमें नब्बे साल पुरानी आवाज़ बंद है। उसे सिर्फ़ एक मौक़ा मिलेगा।
ग्रामोफ़ोन के बगल में एक छोटी टिन की डिबिया थी, जिसमें स्टील की नई सुइयाँ थीं, अब भी चमकती हुई। उसने एक सुई निकाली, उसे रोशनी में देखा, और sound box में कस दी। ग्रामोफ़ोन की चाबी घुमाई। स्प्रिंग अब भी काम कर रहा था, सख़्त, कराहता हुआ।
उसने अपने दोनों condenser mics भोंपू के मुँह के सामने लगाए, एक पास, एक थोड़ा दूर। Laptop पर recording software खोला। Levels सेट किए।
फिर उसने disc को अलमारी से निकाला, उसके किनारों से पकड़कर, और turntable पर रखा।
इरा उसके बगल में खड़ी थी। उसकी साँसें तेज़ थीं।
"Ready?"
उसने सिर हिलाया।
विक्रांत ने turntable का brake छोड़ा। Disc घूमने लगी, धीरे-धीरे, फिर अपनी गति पकड़ती हुई। उसने sound box उठाया, एक पल रुका, और सुई को groove के बाहरी किनारे पर उतार दिया।
पहले सिर्फ़ शोर।
एक भारी, खुरदरी, सरसराती hiss, जैसे बहुत तेज़ बारिश किसी टिन की छत पर। उसके बीच-बीच में चटक। चट। चट-चट। धातु की groove में पड़ी धूल और नब्बे साल की खरोंचें।
फिर, उस शोर के बीच से, एक आवाज़ उभरी।
एक आदमी की आवाज़। धीमी, गहरी, गूँजती नहीं, क्योंकि कमरे का मख़मल हर गूँज को निगल रहा था। वह उर्दू में बोल रहा था, एक लय में, जैसे कुछ पढ़ रहा हो। शब्द धुँधले थे, शोर में डूबते-उभरते।
इरा ने अपना हाथ मुँह पर रख लिया।
"क्या कह रहा है?" विक्रांत ने फुसफुसाया।
"ये..." इरा ने सुनने के लिए अपना सिर झुकाया। "...ये कोई दुआ नहीं है। कोई आयत नहीं। कुछ और है।" वह रुकी, सुनती रही। "'जो बँधा है, बँधा रहे... जो नीचे है, नीचे रहे... अहद पुराना है, अहद नया हो...'" उसने विक्रांत की तरफ़ देखा। "अहद का मतलब है क़रार। सौदा।"
आवाज़ बदली। लय टूटी। आदमी अब पढ़ नहीं रहा था, बोल रहा था, जैसे किसी को संबोधित कर रहा हो। फिर वह रुका।
और फिर उसने एक नाम लिया।
नाम शोर में डूबा हुआ था। विक्रांत ने उसे पकड़ने की कोशिश की, पर बस एक धुँधला-सा उतार-चढ़ाव सुनाई दिया, दो या तीन अक्षर। उसके बाद ठहराव। लंबा। Hiss।
फिर दूसरा नाम। फिर ठहराव।
नाम पुकारे जा रहे थे। एक के बाद एक। और हर नाम के बाद, आदमी रुक रहा था। जैसे इंतज़ार कर रहा हो।
"रजिस्टर," इरा ने फुसफुसाया। "वो रजिस्टर के नाम पढ़ रहा है। एक-एक करके।"
तीसरा नाम। ठहराव।
और उस ठहराव में, hiss के बहुत नीचे, बहुत दूर से, कुछ आया। इतना धीमा कि विक्रांत को लगा कि उसने सुना ही नहीं। एक आवाज़, शायद। एक छोटा, एक-अक्षर का शब्द। जैसे किसी बहुत गहरे कुएँ की तली से कोई धीरे से जवाब दे।
हाँ।
विक्रांत की त्वचा पर बाल खड़े हो गए। उसने इरा की तरफ़ देखा। उसकी आँखें बड़ी थीं, बहुत बड़ी, और उसने भी सुना था।
चौथा नाम।
और तब, उनके पीछे, बाजा-घर के बंद दरवाज़े पर, किसी ने खटखटाया।
ठक-ठक-ठक।
एक पल का ठहराव।
ठक।
विक्रांत का पूरा शरीर जम गया।
उसने इरा को देखा। इरा उसके बगल में खड़ी थी, उससे एक फ़ुट दूर, उसके दोनों हाथ उसके सीने पर बँधे हुए। उसने खटखटाया नहीं था। वह कमरे के अंदर थी।
वह कोड। उनका कोड। जो इरा ने दो दिन पहले लाइब्रेरी की मेज़ पर बजाया था। जिसके बारे में सिर्फ़ उन दोनों को पता था। अगर कोई आवाज़ आए और खटखटाहट न हो, तो जवाब मत दीजिएगा।
खटखटाहट थी। आवाज़ नहीं थी। बस खटखटाहट। सही, सधी हुई, उसी लय में।
इरा का मुँह खुला। विक्रांत ने अपना हाथ उसकी बाँह पर रखा, कसकर, और उसकी तरफ़ सिर हिलाया। नहीं।
Disc घूमती रही। आदमी की आवाज़ ने पाँचवाँ नाम लिया। ठहराव।
ठक-ठक-ठक। ... ठक।
फिर से। ठीक उसी लय में। धैर्य के साथ। जैसे कोई जानता हो कि अंदर वाले जवाब देंगे, बस थोड़ा इंतज़ार करना है।
दोनों ने साँस रोक ली। कमरे का मख़मल हर आवाज़ को निगल रहा था, और उस खामोशी में विक्रांत को अपना दिल अपनी कनपटियों में धड़कता सुनाई दे रहा था।
दरवाज़े के बाहर कोई आहट नहीं थी। कोई कदम नहीं। कोई साँस नहीं।
फिर, बहुत देर बाद, एक आख़िरी बार:
ठक।
अकेला। बिना पहले के तीन के। जैसे कोई अपनी उँगली दरवाज़े पर रखकर, बहुत आराम से, दोबारा आने का वादा कर रहा हो।
फिर कुछ नहीं।
विक्रांत ने बहुत धीरे, बहुत सावधानी से, sound box उठाया। Disc घूमती रही, बिना आवाज़ के। उसने brake लगाया।
दोनों कई मिनट तक वहीं खड़े रहे।
फिर विक्रांत दरवाज़े तक गया। उसने इरा की तरफ़ देखा। उसने सिर हिलाया। उसने दरवाज़ा खोला।
गलियारा ख़ाली था। लंबा, अंधेरा, बिना खिड़की का। फ़र्श की धूल पर सिर्फ़ उनके अपने, कबीर के, रघु काका के, सुबह वाले पैरों के निशान। कोई नया नहीं।
उसने दरवाज़े की लकड़ी को देखा, बाहर की तरफ़ से। ठीक उस ऊँचाई पर जहाँ कोई खटखटाता है।
वहाँ नमी थी। चार छोटे, गोल, गीले धब्बे। तीन पास-पास, एक थोड़ा हटकर। जैसे किसी गीली उँगली के जोड़ के निशान।
और वे धब्बे छोटे थे। एक बच्चे की उँगली जितने।
इरा ने उस रात लाइब्रेरी में नहीं, अपने कमरे में दरवाज़ा बंद करके बिताई। उसने विक्रांत से कहा कि उसे सिरदर्द है। उसकी आवाज़ में कोई ठहराव नहीं था, कोई झूठ नहीं, पर उसकी आँखें उस photo पर टिकी रहीं जो उसने बाजा-घर से निकालकर अपने साथ ले ली थी। वह सफ़ेद कपड़ों वाला आदमी।
विक्रांत ने बाकी शाम अपने कमरे में, laptop पर बिताई।
Recording सात मिनट चालीस सेकंड की थी। उसने वहीं रोका था, जहाँ खटखटाहट आई थी। Disc पर और भी था, शायद दो-तीन मिनट, पर वह उसे दोबारा नहीं चलाएगा। आज नहीं।
उसने restoration शुरू की।
यह वह काम था जो वह सबसे अच्छी तरह जानता था। De-click: हर चटक को अलग से पहचानना और हटाना, एक-एक करके, हज़ारों। De-crackle: उस बारीक, लगातार सरसराहट को निकालना जो पुरानी discs में बारिश जैसी बजती है। Hiss को, उस भारी, खुरदरे शोर को, धीरे-धीरे, परत दर परत, नीचे खींचना, बिना आवाज़ को नुकसान पहुँचाए। Speed correction, क्योंकि 1936 की home recording machines कभी ठीक अठहत्तर पर नहीं चलती थीं।
घंटों लगे। रात के ग्यारह बज गए। फिर बारह।
धीरे-धीरे, आवाज़ उभरी। उस आदमी की, गहरी, थकी हुई, उर्दू में पढ़ती। नाम अब भी धुँधले थे, पर थोड़े साफ़। अहद पुराना है, अहद नया हो। उन ठहरावों में वह दूर का, धीमा जवाब, अब और साफ़, पर भी इतना धीमा कि उसके शब्दों पर भरोसा नहीं किया जा सकता था।
और फिर, आख़िरी हिस्से में, उसने कुछ और देखा।
Waveform पर। उस आदमी की आवाज़ के पीछे। बहुत नीचे। Hiss के नीचे, जो अब काफ़ी हद तक हट चुकी थी। एक लंबा, ऊँचा, खिंचा हुआ उभार, जो कुछ सेकंड तक चला और फिर टूट गया।
पहले उसने उसे शोर समझा था। Disc की कोई गहरी खरोंच।
अब, साफ़ हो चुकी recording में, वह शोर जैसा नहीं दिख रहा था।
उसने उस हिस्से को अलग किया। उस आदमी की आवाज़ को, जो उसके ऊपर बैठी थी, धीरे-धीरे, spectral editing से, हटाया। Hiss की आख़िरी परत निकाली। फिर बचे हुए को बढ़ाया।
उसने headphones लगाए और play दबाया।
एक चीख।
दूर की, बहुत दूर की, जैसे किसी बहुत बड़ी, बहुत गहरी जगह के दूसरे सिरे से। एक आदमी की। लंबी, फटी हुई, गले को चीरती हुई। उसमें डर था, पर सिर्फ़ डर नहीं। कुछ और भी। हताशा। एक पुकार, जो किसी को ढूँढ रही थी।
और उसमें गूँज थी।
ढाई सेकंड की। पत्थर की। नीचे फैली हुई।
विक्रांत ने उसे फिर सुना। फिर। उसने pitch नापी, उसके formants। उसके हाथ अपने आप चल रहे थे, जैसे वे हज़ार अदालती मामलों में चल चुके थे, बिना उसके दिमाग़ की इजाज़त माँगे।
फिर उसने अपनी एक पुरानी file खोली। एक test recording, जो उसने पिछले साल एक नए mic को check करने के लिए की थी। उसमें वह ज़ोर से चिल्लाया था, जितना ज़ोर से हो सके, mic की सीमा जाँचने के लिए। उसकी अपनी चीख।
उसने दोनों को एक के ऊपर रखा।
और देखा कि वे एक हो गईं।
वही pitch का उठान, वही आवाज़ का बीच में फटना। वही formants, गले की वही बनावट, मुँह की वही गुफ़ा। किसी अदालत में, विक्रांत सहगल उस पर अपना नाम लिखकर कहता: same speaker।
यह उसकी चीख थी।
उसकी। आज की। एक छत्तीस साल के आदमी की, गहरी, भरी हुई आवाज़, जिसने बचपन बहुत पहले छोड़ दिया था। एक aluminium disc पर, जिसे नवंबर 1936 में कोठी के बाजा-घर में कट किया गया था। जिस साल उसके पिता के पिता का भी जन्म नहीं हुआ था।
वह कुर्सी पर पीछे हटा, और उसके हाथ उसकी गोद में गिर गए।
उलटी गूँज। उसके कदम, जो आधा सेकंड पहले आते थे। वह छोटी चोटी, जो हर चटाक से साठ milliseconds पहले आती थी।
और यह। नब्बे साल पहले।
उसका दिमाग़ pattern पूरा कर रहा था, जैसा करने के लिए वह बना था। उसके पैरों ने जो कदम अभी नहीं उठाए थे, उनकी आवाज़ पहले आई थी। तो इस चीख का...
इस चीख का अभी आना बाकी था।
कहीं। किसी दिन। किसी बहुत गहरी, बहुत अंधेरी, पत्थर की जगह में, जहाँ गूँज ढाई सेकंड लंबी होती है। वह यह चीख चीखेगा। और वह चीख इतनी ज़ोर की होगी, इतनी गहरी, कि वह वक़्त में भी उलटी चलेगी। नब्बे साल पीछे तक। एक घूमती हुई aluminium disc पर।
उसने उसे फिर सुना। इस बार उसने सिर्फ़ आवाज़ नहीं, उसके अंदर का शब्द सुनने की कोशिश की। क्योंकि वह चीख शब्दहीन नहीं थी। उसमें कुछ था। कोई पुकार। कोई नाम।
उसने उसे धीमा किया। आधी गति पर। उसने बीच की खिंचावट को अलग किया, उसकी गूँज को कम किया।
और नाम उभरा। धीरे-धीरे। तीन अक्षरों में। उसकी अपनी फटी हुई, हताश आवाज़ में, किसी ऐसी जगह से पुकारता हुआ जहाँ से कोई लौटता नहीं।
विक्रांत ने उसे सुना, और समझ नहीं पाया।
क्योंकि उस पुकार में वह किसी को नहीं बुला रहा था।
वह चीखकर अपना ही नाम पुकार रहा था।
"विक्रांत!"
[Part 8 समाप्त]

Writer
Piyashi Atma
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जवाब मत देना
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Category
Ghost Stories
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17 min
Words
3308
Language
Hindi (हिंदी)
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