Pretika › Jinn & Spirits › जिसने नाम पुकारा
एपिसोड 1: कोई है तो सामने आ जाए
firoj saifi · Jinn & Spirits · 20 मिनट
बस ने उसे धुंधलपुर के मोड़ पर ऐसे उतारा, जैसे कोई बोरी उतारता है। कंडक्टर ने आगे की सीट से ही चिल्लाकर कहा, "ए बाबू! धुंधलपुर! उतरो जल्दी, यहाँ बस नहीं रुकती ज़्यादा देर।"
फ़िरोज़ ख़ान ने अपना भारी बैग कंधे पर चढ़ाया, दूसरे हाथ में लैपटॉप वाला झोला पकड़ा और नीचे कूद गया। पैर के नीचे कच्ची सड़क की धूल उठी और उसकी काली जूतियों पर बैठ गई। बस ने एक लंबा काला धुआँ छोड़ा और खड़खड़ाती हुई आगे बढ़ गई। थोड़ी देर तक उसकी आवाज़ आती रही, फिर वह भी खेतों में कहीं खो गई।
फ़िरोज़ ने चारों तरफ़ देखा। दोपहर के साढ़े तीन बज रहे थे, मगर रोशनी में अजीब-सी थकान थी, जैसे सूरज भी चलते-चलते हाँफ गया हो। सड़क के एक तरफ़ गेहूँ कटने के बाद की सूनी ज़मीन थी, दूसरी तरफ़ बबूल की झाड़ियाँ। दूर, बहुत दूर, कुछ कच्चे-पक्के मकानों की छतें दिख रही थीं और उनके पीछे एक विशाल बरगद का पेड़, जिसकी जटाएँ ज़मीन तक झूल रही थीं।
उसने जेब से फ़ोन निकाला। नेटवर्क की एक ही लकीर थी, वह भी काँप रही थी। उसने होंठ टेढ़े किए और बड़बड़ाया, "वाह फ़िरोज़ मियाँ। दिल्ली की सबसे बड़ी न्यूज़ वेबसाइट के सीनियर रिपोर्टर से सीधे धुंधलपुर के नेटवर्क की इस एक लकीर तक। तरक़्क़ी इसी को कहते हैं।"
फ़ोन तुरंत बज उठा। स्क्रीन पर नाम चमका: **ज़ोया**।
उसने उठाते ही कहा, "हाँ मेरी माँ, पहुँच गया। ज़िंदा हूँ। बस ने उतार दिया, किसी ने लूटा नहीं।"
उधर से ज़ोया की हँसी आई, मगर उस हँसी के नीचे एक चिंता दबी थी। "भाई, तुमने खाना खाया? सुबह से निकले हो।"
"दो समोसे खाए हैं। एक तो बस वाले ने ज़बरदस्ती खिला दिया, कहने लगा बाबू भूखे पेट सफ़र में बीमार पड़ जाते हैं।"
"वह तो ठीक कहता है। और जगह कैसी है?"
फ़िरोज़ ने नज़र घुमाई। "जगह... जगह ऐसी है कि अगर मैं कहूँ कि भगवान ने इसे बनाकर बाक़ी काम पूरा करने के लिए छोड़ दिया तो भगवान नाराज़ हो जाएँगे। पर शांत है, ज़ोया। यहाँ कोई कॉल नहीं करेगा कि भाई साहब, आपकी किस्त बाक़ी है।"
दूसरी तरफ़ एकदम ख़ामोशी हो गई। फिर ज़ोया ने धीरे से कहा, "भाई, वह सब मैं सँभाल लूँगी। मेरी स्कॉलरशिप आ जाएगी न अगले महीने।"
"तू कुछ नहीं सँभालेगी," फ़िरोज़ ने झट से कहा, इस बार आवाज़ में मज़ाक नहीं था। "तू सिर्फ़ पढ़ेगी। क़र्ज़ मेरा है, चार लाख बारह हज़ार, मैंने लिया है, मैं ही चुकाऊँगा। मैंने कहा था न, छह महीने की बात है। यहाँ किराया महीने का पंद्रह सौ है। पंद्रह सौ, ज़ोया! दिल्ली में इतने में तो आदमी को नल के नीचे खड़े होने की भी जगह नहीं मिलती।"
"और नौकरी?"
"ऑनलाइन लिखूँगा। फ्रीलांस। ब्लॉग, रिपोर्टें, जो मिल जाए। नेटवर्क के लिए गाँव के चौराहे पर चढ़ना पड़े तो चढ़ जाऊँगा।"
ज़ोया फिर हँस दी, इस बार ज़रा खुलकर। "ठीक है, चौराहे वाले पत्रकार। रात को नौ बजे फ़ोन करूँगी। उठाना ज़रूर। नहीं उठाया तो मैं सीधे बस पकड़कर आ जाऊँगी।"
"नौ बजे। पक्का। चल, रखता हूँ। कोई मुझे लेने आ रहा है शायद।"
सच में कोई आ रहा था। सड़क के मोड़ से एक आदमी साइकिल पर हिलता-डुलता चला आ रहा था। उसने सफ़ेद कुर्ता पहना था जो अब सफ़ेद कम और धूल का रंग ज़्यादा था। सिर पर टोपी, गले में चारख़ाने का गमछा, और चेहरे पर वह घिसी हुई मुस्कान जो दलालों के चेहरे पर पैदा होते ही चिपक जाती है।
"फ़िरोज़ साहब? दिल्ली वाले?" उसने साइकिल रोकते ही पूछा। "मैं बशीर। बशीर दलाल। फ़ोन पर बात हुई थी। आइए, आइए, सामान दीजिए, मैं साइकिल पर रख लेता हूँ।"
"रहने दो, मैं उठा लूँगा।"
"अरे नहीं साहब, आप मेहमान हैं।"
बशीर ने ज़बरदस्ती उसके हाथ से लैपटॉप का झोला ले लिया। फ़िरोज़ को हल्की हँसी आई। आदमी विनम्र था, पर उसकी आँखें बार-बार किसी और ही तरफ़ भाग रही थीं, जैसे वह कुछ गिन रहा हो या किसी से बचना चाहता हो।
वे गाँव की तरफ़ पैदल चले। साइकिल बशीर के हाथ में थी, उस पर बैग लदा था, पहिया कच्ची सड़क पर चूँ-चूँ करता चल रहा था।
"तो आप अख़बार वाले हैं, साहब?" बशीर ने पूछा।
"थे। अब कहिए कि घर बैठे लिखने वाला। अख़बार बंद हो गया।"
"अच्छा, अच्छा। तो हवेली क्यों? गाँव में और भी मकान हैं। मास्टर जी का घर है, उनकी बैठक ख़ाली है। चार सौ रुपये ज़्यादा लगेंगे बस।"
फ़िरोज़ ने भौंहें उठाईं। "आप तो ख़ुद फ़ोन पर बोले थे कि हवेली बहुत सस्ती मिल रही है, पंद्रह सौ में। अब आप मुझे महँगे मकान की तरफ़ क्यों भेज रहे हैं?"
बशीर ने गमछे से माथा पोंछा, हालाँकि पसीना कहीं था नहीं। "मैंने बस इसलिए कहा कि... साहब, वह हवेली पुरानी है। बहुत पुरानी। सीलन होगी। साँप-बिच्छू... लोग कहते हैं..."
"क्या कहते हैं लोग?"
"कुछ नहीं, कुछ नहीं। गाँव वाले हैं, उनकी तो बातें हैं। कहते हैं भूत-प्रेत।" बशीर ने ऐसे कहा जैसे मौसम की बात कर रहा हो, पर उसकी आवाज़ नीचे गिर गई थी।
फ़िरोज़ ज़ोर से हँस पड़ा। इतनी ज़ोर से कि सड़क के किनारे बैठी दो बकरियाँ चौंककर उसे देखने लगीं। "भूत? बशीर भाई, मैंने बीस साल की उम्र से रिपोर्टिंग की है। श्मशान घाटों पर रात गुज़ारी है। एक तांत्रिक बाबा का स्टिंग किया है जो हवा में नींबू निकालता था, पर नींबू उसकी आस्तीन में थे। भूत होते हैं तो मुझे आज तक एक भी इंटरव्यू देने क्यों नहीं आया?"
बशीर ने कुछ नहीं कहा। बस साइकिल की घंटी को अँगूठे से दबा-दबाकर चुप-सी आवाज़ें निकालता रहा।
गाँव के भीतर पहुँचे तो फ़िरोज़ ने महसूस किया कि कुछ नज़रें उसके साथ-साथ चल रही हैं। मिट्टी के आँगन में बैठी औरतें अपना काम छोड़कर उसे देख रही थीं। एक बुज़ुर्ग चारपाई पर हुक़्क़ा गुड़गुड़ा रहे थे, हुक़्क़ा रुक गया। दो-तीन बच्चे गली के नुक्कड़ पर खेल रहे थे, उन्होंने खेल बंद कर दिया और उसे यूँ घूरने लगे जैसे किसी ऐसे आदमी को देख रहे हों जो उनकी नज़र में पहले ही मर चुका हो।
"यह लोग मुझे ऐसे क्यों देख रहे हैं?" फ़िरोज़ ने धीमे से पूछा। "मेरे चेहरे पर कुछ लगा है?"
"नहीं साहब। गाँव में कोई नया आदमी आता है तो सब देखते ही हैं।"
"और हवेली में रहने वाला नया आदमी?"
बशीर ने जवाब नहीं दिया। पर फ़िरोज़ ने एक बात ग़ौर की। बशीर ठीक चौराहे पर पहुँचकर रुक गया। वहाँ चाय की एक टपरी थी, उसके बाहर लकड़ी की बेंच, बेंच पर कुछ लोग, और टपरी के पीछे एक छोटा-सा लड़का जो गिलास धो रहा था। लड़के ने सिर उठाया, फ़िरोज़ को देखा, और उसके हाथ का गिलास छूटकर ज़मीन पर गिर गया। टन्न की आवाज़ हुई।
"छोटू! ध्यान से!" किसी ने डाँटा।
छोटू ने जवाब नहीं दिया। वह फ़िरोज़ को नहीं, बल्कि उसके ठीक पीछे, उसके बाईं तरफ़ की ज़मीन को देख रहा था।
फ़िरोज़ ने पलटकर देखा। वहाँ सिर्फ़ उसकी अपनी परछाईं पड़ी थी, लंबी, दोपहर के ढलते सूरज में खिंची हुई। उसने फ़ौरन छोटू की तरफ़ मुँह फेरा, पर लड़का तब तक टपरी के पीछे भाग चुका था।
"बच्चे हैं साहब," बशीर ने हड़बड़ाकर कहा। "चलिए, अब चलते हैं। रोशनी रहते हवेली पहुँचना ठीक रहता है।"
"ठीक रहता है?"
"मतलब अँधेरे में नए आदमी को रास्ता नहीं सूझता।"
"बशीर भाई, आप बहुत बुरे झूठे हैं," फ़िरोज़ ने हल्के से कहा। "पर कोई बात नहीं। चलिए।"
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गाँव के आख़िरी मकान के बाद रास्ता ढलान पर उतरता था, फिर एक सूखे नाले को पार करके सीधा बरगद के उस पुराने पेड़ तक जाता था जो दूर से दिखाई दे रहा था। पास पहुँचकर फ़िरोज़ को समझ आया कि वह पेड़ कितना विशाल है। उसका तना इतना चौड़ा था कि चार आदमी हाथ पकड़कर भी न घेर पाएँ। जटाएँ मोटी रस्सियों की तरह नीचे लटक रही थीं और हवा न होने पर भी हल्की-हल्की हिल रही थीं।
उस बरगद के पीछे, ठीक उसकी छाया की गोद में, वह खड़ी थी।
नूर-ए-मंज़िल।
फ़िरोज़ अनायास रुक गया।
हवेली दो मंज़िला थी, पर उसकी ऊँचाई तीन मंज़िल के बराबर लगती थी। ऊँची मेहराबें, लाल-भूरी ईंटें जिन पर काई की हरी परतें चढ़ी थीं, खिड़कियों में झड़े हुए रंगीन काँच, और बीच की छत पर एक गुंबद जिसका सोने जैसा रंग उड़कर मटमैला हो चुका था। सामने लोहे का एक बड़ा फाटक, जिस पर जंग इतनी जम चुकी थी कि वह फाटक कम और किसी जानवर की सूखी पसलियाँ ज़्यादा लग रहा था।
"यही है," बशीर ने कहा। उसकी आवाज़ में अब दलालों वाली मिठास नहीं थी। "गाँव वाले इसे काली हवेली कहते हैं। असली नाम नूर-ए-मंज़िल है। रौशनी का घर।"
"रौशनी का घर," फ़िरोज़ ने दोहराया और मुस्कुरा दिया। "वाह, क्या विडंबना है। नाम रौशनी और रंग काला।"
उसने जेब से अपना फ़ोन निकाला और एक तस्वीर खींची। फ़्लैश नहीं चलाया, पर स्क्रीन पर तस्वीर आते ही उसे लगा कि कुछ ठीक नहीं है। हवेली की सबसे ऊपरी खिड़की, जो बाकी सब खिड़कियों से अलग थी, छोटी, गोल, और सीधी गुंबद के नीचे, उसमें एक हल्की चमक थी। जैसे किसी ने अंदर से शीशा रख दिया हो और उस पर ढलते सूरज की किरण पड़ रही हो।
उसने नज़र उठाकर असली खिड़की की तरफ़ देखा। वहाँ अँधेरा था, धूल-भरा सादा अँधेरा।
"कैमरे की चाल है," उसने ख़ुद से कहा और फ़ोन जेब में डाल लिया।
बशीर ने कमर से बँधी एक पोटली में से भारी-सी चाबी का गुच्छा निकाला। गुच्छे में कोई आठ-दस चाबियाँ थीं, कुछ पीतल की, कुछ लोहे की, एक तो इतनी बड़ी कि बच्चे की हथेली जितनी। उसने काँपते हाथ से फाटक का ताला खोला। जंग लगे कब्ज़े चीख़ पड़े। यह चीख़ इतनी लंबी और तीखी थी कि बरगद की शाखों पर बैठे कौवे एक साथ फड़फड़ाकर उड़ गए और आसमान में काला धब्बा बनकर गोल-गोल घूमने लगे।
अंदर एक बड़ा आँगन था। आँगन के बीच एक सूखा हौज़, जिसमें कभी फ़व्वारा चलता होगा। एक कोने में नीम का पेड़ खड़ा था, पत्तियाँ पीली और झरती हुईं। आँगन की ज़मीन पर पुराने पत्थर जड़े थे, जिनके बीच की दरारों से घास उग आई थी। चारों तरफ़ बरामदे थे, मेहराबों वाले, और उनके पीछे बंद दरवाज़ों की कतार।
"बाईं तरफ़ वाला कमरा," बशीर ने जल्दी-जल्दी बताया, जैसे सबक़ रट रहा हो। "वही रहने लायक़ है। साफ़ करवा दिया है कल। दालान से सटा है, पीछे रसोई है, उसके बाहर हैंडपंप है। बिजली है, पर बल्ब कभी-कभी जाते हैं। लालटेन और मोमबत्ती रखी है। ऊपर की मंज़िल..."
"ऊपर की मंज़िल?"
"ऊपर मत जाइएगा, साहब," बशीर ने कहा और उसकी आवाज़ एकदम सपाट हो गई। "ऊपर की सीढ़ियाँ कमज़ोर हैं। लकड़ी की हैं, सड़ चुकी हैं। गिर-गिरा गए तो कौन उठाएगा आपको? और ऊपर वाला कमरा तो ताले में है, चाबी किसी के पास नहीं।"
"किसके पास नहीं?"
"किसी के पास नहीं, बस।"
फ़िरोज़ ने उसकी तरफ़ ग़ौर से देखा। बशीर पसीने से तर था, हालाँकि हवा में नमी थी, गर्मी नहीं। "बशीर भाई, एक बात बताइए। आप मुझे रोज़ाना के किराए पर रखने का झाँसा दे रहे हैं या डरा रहे हैं?"
"मैं तो बस बता रहा हूँ, साहब। हिदायत है।" बशीर ने गुच्छे में से एक ज़ंग-लगी चाबी अलग की और उसकी हथेली पर रख दी। "यह कमरे की चाबी है। मैं अब चलता हूँ। अँधेरा गिरने वाला है।"
"आप चाय पिएँगे?"
"नहीं, नहीं। मेहरबानी। घर पर काम है।"
वह इतनी तेज़ी से बाहर निकला कि उसकी चप्पल की आवाज़ आँगन के पत्थरों पर तड़-तड़ गूँज गई। फाटक के पार पहुँचकर उसने साइकिल पकड़ी और मुड़कर एक बार हवेली की ऊपरी मंज़िल की तरफ़ देखा। फिर तेज़ी से पैडल मारता हुआ गाँव की ओर चला गया।
फ़िरोज़ अकेला रह गया।
हवा चल पड़ी थी। नीम की सूखी पत्तियाँ आँगन में गोल-गोल घूमकर बैठ गईं। कहीं दूर कुत्ता भौंका, फिर चुप हो गया। इतना सन्नाटा था कि फ़िरोज़ को अपने ही कंधे के बैग की पट्टी की चरमराहट साफ़ सुनाई दे रही थी।
उसने गहरी साँस ली और बड़बड़ाया, "ठीक है फ़िरोज़। छह महीने। पंद्रह सौ। चार लाख बारह हज़ार। गिनती याद रख।"
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कमरा सचमुच साफ़ किया गया था, पर 'साफ़' का मतलब यहाँ बस इतना था कि जाले झाड़ दिए गए थे और फ़र्श पर पानी डालकर पोंछा मार दिया गया था। कमरा लंबा था, ऊँची छत वाला, जिसमें एक पुरानी लकड़ी की चारपाई, एक मेज़, एक कुर्सी, कील पर टँगा एक ज़ंग-लगा आईना जो इतना धुँधला था कि उसमें चेहरा नहीं, सिर्फ़ एक ख़ाली परछाईं-सी दिखती थी, और एक खिड़की थी जो सीधे बरगद की तरफ़ खुलती थी।
फ़िरोज़ ने सामान रखा। लैपटॉप मेज़ पर सजाया, चार्जर लगाया। बिजली का बटन दबाया तो छत पर लटका पीला बल्ब पहले झिलमिलाया, फिर जल उठा। उसकी रोशनी में कमरे की दीवारें हल्की नीली दिख रही थीं, जिन पर चूने की पपड़ियाँ झड़ रही थीं।
उसने धुँधले आईने के सामने खड़े होकर अपना चेहरा देखा। अठाईस साल का थका हुआ आदमी, घनी भौंहें, दो दिन की बढ़ी दाढ़ी, आँखों के नीचे हल्के काले घेरे। गले के पास कुर्ते का कॉलर मुड़ा हुआ। बाएँ हाथ में स्टील की घड़ी, जो ज़ोया ने उसकी पहली तनख़्वाह पर तोहफ़े में दी थी।
"हैंडसम," उसने आईने से कहा। "बस थोड़ा-सा बेरोज़गार।"
आईने में उसका अक्स भी उसी पल होंठ हिलाता दिखा।
उसने कमरे के कोनों की तलाशी ली। चारपाई के नीचे धूल, एक मरा हुआ झींगुर, और एक पुराना, पीला पड़ा अख़बार का टुकड़ा। उसने उसे उठाकर देखा। एक कोने पर तारीख़ पड़ी थी, कुछ-कुछ मिटी हुई। साल पढ़ने में आया: उन्नीस सौ अट्ठावन।
"इतिहास की सेवा हो रही है," उसने कहा और अख़बार को वापस फेंक दिया।
फिर वह रसोई देखने निकला। रसोई टूटी-फूटी थी, पर काम चलाऊ। एक कोने में मिट्टी का चूल्हा, एक तरफ़ पुराना स्टील का गैस सिलेंडर, जिस पर बशीर ने कपड़ा लपेटकर रखा था, और पास में एक नई केतली, कुछ बर्तन और चायपत्ती का एक पैकेट, जो शायद उसी दलाल की मेहरबानी था। खिड़की के बाहर हैंडपंप खड़ा था। उसने दो बार दबाया तो पहले खखारती-सी आवाज़ निकली, फिर ठंडा, साफ़ पानी बहने लगा।
उसने हाथ-मुँह धोया और बाहर बरामदे में आकर खड़ा हो गया।
शाम उतर रही थी। आसमान में धीरे-धीरे ग्रे रंग घुलने लगा था। बरगद की जटाओं के बीच से चमगादड़ निकलकर बाहर आने लगे थे। आँगन के बीच का हौज़ बिलकुल ख़ाली और सूखा था, पर उसमें कुछ पुराने पत्ते यूँ पड़े थे जैसे किसी ने जान-बूझकर सजाए हों।
उसकी नज़र ऊपर की मंज़िल की तरफ़ गई।
ऊपर चारों तरफ़ वैसा ही बरामदा था, लकड़ी की रेलिंग वाला, जिसका आधा हिस्सा टूटकर झूल गया था। बाईं तरफ़ कोने में लकड़ी की सीढ़ियाँ ऊपर जाती थीं। सीढ़ियों के ऊपर, गुंबद के ठीक नीचे, एक दरवाज़ा था। गहरे रंग की मोटी लकड़ी का दरवाज़ा, जिस पर ताँबे की कीलें जड़ी थीं और बीच में एक भारी, काली कुंडी। उस कुंडी पर एक बड़ा ताला लटक रहा था।
"ऊपर वाला कमरा," फ़िरोज़ ने मन ही मन दोहराया। "जिसकी चाबी किसी के पास नहीं।"
उसके अंदर का पत्रकार एक पल के लिए जाग गया। हर बंद दरवाज़ा एक ख़बर होता है। पर उसने तुरंत ख़ुद को झिड़क दिया।
"कोई ख़बर नहीं, फ़िरोज़। छह महीने। लिखना है, चुकाना है, भागना है। बस।"
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रात को खाना उसने गाँव से लाए पराठों और अचार से निपटाया। जाते वक़्त बशीर ने एक टिफ़िन उसके हाथ में थमा दिया था, "घर से है, साहब, भाभी ने भेजा है", और वह पराठे सचमुच अच्छे थे, हालाँकि ठंडे। बल्ब फिर टिमटिमाया। उसने लैपटॉप पर ज़ोया को वीडियो कॉल की कोशिश की, पर नेटवर्क इतना कमज़ोर था कि सिर्फ़ आवाज़ आ पाई।
"भाई, तुम्हारी तस्वीर नहीं आ रही। सिर्फ़ आवाज़ है।"
"अच्छा है, मेरी शक्ल पर तेरी नज़र नहीं पड़ेगी। मैं दो दिन से नहाया नहीं।"
"गंदे!" ज़ोया हँसी। "कमरा कैसा है? डर नहीं लग रहा?"
"डर? ज़ोया, मैं तेरा भाई हूँ, फ़िरोज़ ख़ान। मेरे से डरकर ख़ुद डर भाग जाता है।" उसने सीना ठोका, भले ही वह देख न सकती थी। "कमरा बढ़िया है। पुरानी हवेली है, ऊँची छत, मोटी दीवारें। एक नवाब का घर था। गर्मियों में ठंडा रहेगा।"
"नवाब का घर? तुमने तो कहा था भूतिया..."
"मैंने कहा था गाँव वाले कहते हैं। और गाँव वाले तो यह भी कहते हैं कि चाँद पर बुढ़िया चरखा कातती है।" वह कुर्सी पर पीछे टिक गया। "सुन, तू इन बातों की चिंता मत कर। थीसिस पर ध्यान दे। कल बात करेंगे।"
"भाई।"
"हाँ?"
"मुझे थोड़ा अजीब लग रहा है। तुम इतनी दूर हो। और वहाँ से जब भी तुम्हारी आवाज़ आती है, ऐसा लगता है कुछ और भी सुन रहा है।"
फ़िरोज़ का हाथ क्षण भर के लिए ठहर गया। "क्या मतलब?"
"पता नहीं। शायद कनेक्शन की ख़राबी है। एक हल्की-सी सरसराहट आ रही है, जैसे कोई हमारी बातें सुन रहा हो।"
"ज़ोया, वह मेरी साँस है। और बगल की दीवार में चूहे हैं।"
"चूहे!"
"हाँ, चूहे। जो आज के बाद तुझे डराते नहीं, मुझे डराएँगे। पर देख, मैं उन्हें भी पत्रकार वाला इंटरव्यू दे दूँगा।"
ज़ोया की हँसी में अब थोड़ी राहत थी। "अच्छा, ठीक है। सो जाओ। गुड नाइट, भाई। और दरवाज़ा बंद करके सोना।"
"जो आज्ञा, मालिक।"
कॉल कट गई। कमरे में फिर वही सन्नाटा लौट आया, पर अब वह पहले से ज़्यादा भारी लग रहा था, जैसे ज़ोया की आवाज़ के जाने के बाद दीवारों ने साँस लेना शुरू किया हो।
फ़िरोज़ ने लैपटॉप खोलकर एक नया डॉक्यूमेंट बनाया। शीर्षक लिखा: *धुंधलपुर डायरी: एक पत्रकार की गाँव में शरण*। फिर थोड़ी देर स्क्रीन को घूरा। उँगलियाँ चल नहीं रही थीं। वह उठा, खिड़की के पास गया और बाहर झाँका।
बरगद की काली आकृति रात में और भी विशाल हो गई थी। चाँद नहीं निकला था, सिर्फ़ तारे थे, बेहिसाब तारे, जो दिल्ली में कभी दिखते ही नहीं। उनके नीचे गाँव की कुछ टिमटिमाती बत्तियाँ थीं, फिर एक-एक करके बुझने लगीं।
उसने खिड़की के पास रखे तख़्त पर बैठकर अपने जूते उतारे। तभी उसे लगा कि दीवार के उस पार, ठीक उसके सिर के ऊपर वाली दीवार में, कुछ सरक गया।
"चूहा," उसने तुरंत कहा।
कोई आवाज़ नहीं।
फिर, बहुत हल्के से, जैसे किसी ने नाखून से दीवार पर लकीर खींची हो, खर्र... खर्र...
फ़िरोज़ ने सिर उठाया। छत पर लटके बल्ब की रोशनी में दीवार वैसी ही नीली-पपड़ीदार थी। कोई निशान नहीं।
"ठीक है," उसने ऊँची आवाज़ में कहा, ख़ुद को सुनाते हुए। "यह पुरानी इमारत है। लकड़ी सिकुड़ती है। पुराने घर बोलते हैं। यह फ़िज़िक्स है, भूतिया हॉरर नहीं।"
खर्र... खर्र...
उसने पलटकर दीवार को घूरा। थोड़ी देर यूँ ही देखता रहा। उसके मन में कुछ उमड़ा, वही पुराना घमंड जो पत्रकारिता के दिनों में उसके साथ चलता था। वह जो हर अफ़वाह को ज़मीन पर पटक देता था। वह जो हर तांत्रिक की पोल खोलता था। उस घमंड के साथ-साथ थकान थी, क़र्ज़ का बोझ था, ज़ोया की चिंता थी और अकेलेपन की बेचैनी भी। और उसी सबने मिलकर उसके भीतर एक ज़िद्दी, कड़वा-सा मज़ाक़ जगा दिया।
उसने हथेली उठाई और पूरी ताक़त से दीवार पर थप्पड़ मारा। पट!
आवाज़ कमरे में गूँज गई।
"कोई है," वह चिल्लाया, चेहरे पर टेढ़ी मुस्कान लिए, "तो सामने आ जाए!"
कमरा चुप रहा।
वह कुछ सेकंड तक इंतज़ार करता रहा, फिर ठहाका मारकर हँस पड़ा। "देखा! कोई नहीं है। कोई भूत नहीं, कोई जिन्न नहीं, कोई चुड़ैल नहीं। बस एक पत्रकार है, जो दीवार से बात कर रहा है। अब यह ख़बर बनेगी: *बेरोज़गार पत्रकार को हवेली में अकेलेपन ने पागल कर दिया*।"
उसकी हँसी बहुत देर तक कमरे में गूँजती रही। फिर उसके ख़त्म होने के बाद भी कमरा उसे थोड़ी देर और लौटाता रहा, एक हल्की-सी प्रतिध्वनि बनकर। ऐसा लगा जैसे ऊँची छत के किसी अँधेरे कोने में कोई और भी उसकी हँसी दोहरा रहा हो, पर धीमे, दबे हुए, और ज़रा-सा देर से।
फ़िरोज़ की हँसी बीच में ही टूट गई।
उसने चारों तरफ़ देखा। सब कुछ वैसा ही था। चारपाई, मेज़, खिड़की, और कील पर टँगा वह धुँधला आईना।
"बहुत हो गया," उसने बड़बड़ाते हुए कहा और बत्ती बुझा दी।
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अँधेरे में लेटना उसके लिए आसान नहीं था। चारपाई की रस्सियाँ हर करवट पर कराह रही थीं। खिड़की से तारों की हल्की रोशनी अंदर आ रही थी, जिसमें कमरे की चीज़ें अपने आकार से कुछ बड़ी और टेढ़ी दिख रही थीं। मेज़ के ऊपर लैपटॉप की चार्जिंग वाली नीली बत्ती टिमटिमा रही थी, उसकी रोशनी दीवार पर एक छोटा-सा चमकता बिंदु बनाकर काँप रही थी।
उसने आँखें बंद कीं, पर नींद नहीं आई। उसके दिमाग़ में बार-बार वही सारी बातें घूमती रहीं। चार लाख बारह हज़ार। क़र्ज़ वाले का फ़ोन, जो कहता था, "ख़ान साहब, मैंने आपको इज़्ज़त से बात करने का मौक़ा दिया था।" वह दफ़्तर, जहाँ उसने सात साल बिताए, और जिसका आख़िरी दिन ऐसे बीता जैसे किसी ने बिजली का प्लग निकाल दिया हो। ज़ोया की आँखें, जो अपनी चिंता भाई से छिपाना सीख रही थीं। और अब यह जगह, जहाँ चूहे दीवारों में चलते थे।
बाहर से किसी पेड़ की शाख़ चरमराई।
फ़िरोज़ ने पलकें खोलीं। छत पर बने मकड़ी के जालों में तारों की हल्की चमक अटकी हुई थी।
फिर उसे महसूस हुआ कि कमरे का तापमान गिर रहा है।
शुरुआत बहुत धीमी थी। पहले उसके पैर के तलवे ठंडे हुए, जैसे किसी ने ठंडे पानी की बाल्टी चारपाई के नीचे रख दी हो। फिर ठंड घुटनों तक चढ़ी, फिर कमर तक। उसने कंबल खींचा, पर ठंड कंबल के नीचे से नहीं, कमरे की हवा में से आ रही थी। यह वैसी ठंडक नहीं थी जो रात की हवा में होती है। यह किसी तहख़ाने की ठंडक थी, किसी बंद, पुराने, नम कुएँ की ठंडक।
उसकी साँस सफ़ेद भाप बनकर होंठों से निकली।
"अक्टूबर है," फ़िरोज़ ने फुसफुसाकर कहा। "अक्टूबर के आख़िर में खिड़की खुली रखने पर ऐसा होता है। खिड़की बंद कर दे।"
उसने उठकर खिड़की की तरफ़ देखा। खिड़की के पल्ले पहले से बंद थे। भीतर से सिटकनी चढ़ी थी।
उसके हाथों के रोंगटे खड़े हो गए।
"ठीक है," उसने कहा, इस बार उसकी आवाज़ पहले जितनी मज़बूत नहीं थी। "यह कोई हवा का झोंका होगा, दरवाज़े के नीचे की दरार से।"
उसने दरवाज़े की तरफ़ देखा। दरवाज़ा भी बंद था। उसने ख़ुद बोल्ट चढ़ाया था।
तभी बल्ब, जो बुझा हुआ था, एक बार अपने आप टिमटिमाया और बुझ गया।
फ़िरोज़ हड़बड़ाकर उठ बैठा। दिल की धड़कन उसके कानों में सुनाई दे रही थी, धप, धप, धप। उसने मेज़ की तरफ़ हाथ बढ़ाकर फ़ोन उठाया और टॉर्च जलाई। नीली-सफ़ेद रोशनी कमरे में फैली।
कुछ नहीं था। वही दीवारें, वही चारपाई, वही मेज़।
उसकी टॉर्च की रोशनी कील पर टँगे आईने पर पड़ी।
धुँधला आईना अब धुँधला नहीं लग रहा था। या शायद टॉर्च की रोशनी उसकी सतह से टकराकर किसी अजीब ढंग से वापस आ रही थी। उसमें फ़िरोज़ को अपना ही चेहरा दिखा, टॉर्च की रोशनी से नीचे से रौशन, डरावना, आँखें फटी हुईं।
"मैं तो नहीं डरता," उसने आईने से कहा। "तू भी मत डर।"
आईने में उसके होंठ हिले।
और उसी क्षण, ऊपर से, ठीक उसके सिर के ऊपर, छत के पार, कहीं बहुत ऊँचाई पर, एक आवाज़ आई।
ठक।
फ़िरोज़ ने साँस रोक ली।
ठक... ठक...
वह किसी के चलने की आवाज़ थी। धीमे, भारी, सधे हुए क़दम, जैसे कोई लकड़ी के फ़र्श पर नंगे पैर चल रहा हो। एक क़दम। रुकना। फिर दूसरा क़दम। ऊपर वाला बरामदा, जिसकी लकड़ी सड़ चुकी थी। या शायद उससे भी ऊपर, गुंबद के नीचे वाला वह कमरा।
ठक... ठक... ठक...
क़दम धीरे-धीरे उसके सिर के ऊपर से गुज़रे और कमरे के पार जाकर रुक गए। फिर सब शांत हो गया।
फ़िरोज़ का गला सूख गया था। उसके हाथ की टॉर्च हल्के-हल्के काँप रही थी, और रोशनी का गोला छत पर नाच रहा था। उसने ख़ुद को समझाने की कोशिश की: चमगादड़। बिल्ली। कोई बंदर। गाँव वाले, जो उसे डराने के लिए छत पर चढ़ गए हों।
पर बशीर ने कहा था, ऊपर की सीढ़ियाँ सड़ चुकी हैं। और ऊपर वाला कमरा ताले में है।
उसने बहुत धीमी आवाज़ में, ख़ुद से भी छिपाते हुए, पूछा: "कौन है?"
जवाब में कमरे की ठंडक एक पल को और गहरी हो गई। आईने की सतह पर टॉर्च की रोशनी काँपी। और फ़िरोज़ ने साफ़ देखा कि आईने में उसके अपने चेहरे के पीछे, कमरे की अँधेरी दीवार पर, कुछ था, कोई लंबा, पतला, हल्का-सा गहरा आकार, जो उसके कंधे के ठीक ऊपर झुका हुआ था।
उसने झटके से पलटकर देखा।
पीछे सिर्फ़ दीवार थी।
और ऊपर, छत के पार, एक बार फिर से, उसी भारी, सधी हुई चाल में, किसी ने क़दम उठाया।
ठक।
- Writer
- firoj saifi
- Story
- जिसने नाम पुकारा
- Chapter
- 1 of 10
- Category
- Jinn & Spirits
- Reading time
- 20 min
- Words
- 3979
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
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