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एपिसोड 2: नाम लौटकर आता है

firoj saifi · Jinn & Spirits · 21 मिनट

सुबह की पहली चीज़ जो फ़िरोज़ को महसूस हुई, वह ठंडक नहीं थी। वह धूप थी।

खिड़की की झिर्रियों से सुनहरी लकीरें कमरे में उतर आई थीं और सीधे उसके चेहरे पर पड़ रही थीं। कहीं बाहर चिड़ियाँ चहचहा रही थीं, इतने शोर से कि रात की हर बात बेतुकी लगने लगी। उसने करवट बदली तो चारपाई की रस्सियाँ फिर चरमराईं। वह कुछ देर आँखें मूँदे पड़ा रहा, फिर एक झटके में उठ बैठा।

कमरा वैसा ही था। चारपाई, मेज़, कुर्सी, लैपटॉप, और कील पर टँगा धुँधला आईना। दीवार पर कोई निशान नहीं। छत पर कोई दरार नहीं। खिड़की की सिटकनी अपनी जगह चढ़ी हुई।

"तो," उसने जम्हाई लेकर कहा, "रात का फ़ैसला: चूहे चार, फ़िरोज़ ख़ान शून्य। पर इंसान अभी ज़िंदा है, भूत नहीं निकला। दिल्ली पुलिस को सूचित कर दिया जाए।"

उसने दरवाज़े का बोल्ट खोला और बाहर निकला। आँगन सुबह की रोशनी में बिलकुल दूसरी जगह लग रहा था। नीम की पीली पत्तियाँ चमक रही थीं, सूखे हौज़ के किनारे एक गौरैया फुदक रही थी, और बरगद की जटाओं के बीच से धूप की किरणें ऐसे छनकर आ रही थीं जैसे किसी गिरजाघर की खिड़की से। हवेली की लाल ईंटें अब डरावनी नहीं, बस उदास और बूढ़ी दिख रही थीं।

उसने ऊपर की मंज़िल की तरफ़ देखा। सीढ़ियाँ वहीं थीं, कोने में, और उनके ऊपर वही भारी दरवाज़ा, वही काली कुंडी, वही ताला।

ताला अपनी जगह लटक रहा था। बंद।

"तुम्हें कोई भी नहीं खोल सकता, ठीक है," फ़िरोज़ ने ताले से कहा। "और अगर रात को कोई ऊपर चल रहा था तो वह इसी ताले में से होकर गया है। चाँदनी की तरह। है न?"

ताले ने कोई जवाब नहीं दिया। हवा में उसकी ज़ंजीर हल्की-सी खनकी, बस।

उसने कंधे उचकाए, हैंडपंप पर जाकर मुँह धोया, केतली में चाय चढ़ाई। बशीर की दी हुई चायपत्ती कड़वी निकली, पर गरम थी। वह प्याली हाथ में लिए आँगन में टहलता रहा। हर बार जब उसके क़दम सीढ़ियों के पास से गुज़रते, उसका सिर अपने आप ऊपर उठ जाता, और हर बार वह ख़ुद को डाँट देता।

फिर उसने एक काम किया जो उसके पत्रकार दिमाग़ को राहत देता था। उसने सारे सबूत इकट्ठे किए। दीवार पर कोई खरोंच नहीं। सीढ़ियों की धूल पर किसी के पैरों के निशान नहीं। नीचे सीढ़ियों के पास पुरानी मकड़ी के जाले अब तक ज्यों के त्यों। जो भी रात को ऊपर चला था, उसने जाले नहीं तोड़े थे।

"चमगादड़ जाले नहीं तोड़ते," उसने सोचा, "वे हवा में उड़ते हैं। लेकिन चमगादड़ क़दम की आवाज़ भी नहीं करते।"

उसने सिर झटका। "आज गाँव चलता हूँ। थोड़ा इंसानों के बीच रहूँगा। यहाँ अकेले दीवारों से बात करते-करते सच में पागल हो जाऊँगा।"

उसने लैपटॉप का झोला उठाया। गाँव में इंटरनेट की तलाश भी करनी थी।

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दिन में गाँव और भी बड़ा और जीवित लग रहा था। गलियों में मुर्ग़ियाँ घूम रही थीं, किसी आँगन में कोई औरत चक्की पीस रही थी, कहीं से हँसी और कहीं से गायों के रँभाने की आवाज़ आ रही थी। बच्चे स्कूल की तरफ़ जा रहे थे, कंधे पर थैले, हाथ में तख़्तियाँ। पर इन सबके बीच फ़िरोज़ को वही नज़रें फिर मिलीं। लोग उसे देखकर नज़रें झुका लेते, या जल्दी से दूसरी तरफ़ मुड़ जाते। एक औरत ने तो अपने बच्चे को खींचकर घर के अंदर कर लिया।

चौराहे की टपरी पर लोग जमा थे। टपरी का नाम एक टीन के बोर्ड पर लिखा था, कई बारिशों से धुला हुआ: *रहीम टी स्टॉल, चाय-बिस्कुट-पकौड़ी*। बोर्ड के नीचे एक झुर्रीदार, गोरे-चिट्टे बूढ़े आदमी ने केतली पर नज़र जमा रखी थी। सिर पर सफ़ेद जालीदार टोपी, सफ़ेद दाढ़ी, चश्मे की एक डंडी धागे से बँधी हुई।

फ़िरोज़ ने बेंच के कोने में जगह बनाई। "चाचा, एक कड़क चाय। चीनी कम। और मुझे इंटरनेट कहाँ मिलेगा, वह भी बता दो।"

बूढ़े ने चश्मे के ऊपर से उसे देखा। टपरी पर एकदम चुप्पी फैल गई। तीन-चार आदमी, जो बेंच पर बैठे बीड़ी फूँक रहे थे, अचानक अपनी बीड़ियों में व्यस्त हो गए।

"तुम हवेली वाले हो," बूढ़े ने सीधे कहा। यह सवाल नहीं था।

"जी। फ़िरोज़। फ़िरोज़ ख़ान। दिल्ली से।"

"रहीम," बूढ़े ने अपनी छाती पर हाथ रखकर कहा। "रहीम चाचा। पूरा गाँव यही कहता है।" उसने चाय गिलास में डाली और उसके सामने रख दी। "रात कैसी कटी?"

फ़िरोज़ ने गिलास उठाकर घूँट भरा। चाय में अदरक थी और इलायची की हल्की महक। सच कहूँ तो कल से अब तक की सबसे अच्छी चीज़। "ठीक कटी, चाचा। थोड़ी ठंड थी बस। और चूहे।"

"चूहे," रहीम चाचा ने दोहराया और बेंच पर बैठे आदमियों से नज़र मिलाई। एक आदमी ने खाँसकर बीड़ी बुझा दी।

"आप लोग ऐसे क्यों देख रहे हैं?" फ़िरोज़ ने मुस्कुराकर पूछा। "देखिए, मैं पत्रकार रहा हूँ। मैं जानता हूँ जब कोई बात गाँव के सीने में दबी होती है तो आँखें यूँ ही बोलने लगती हैं। बताइए तो सही, हवेली के बारे में क्या क़िस्सा है?"

रहीम चाचा ने झुककर उसके कान के पास कहा, "बेटा, बीस बरस पहले की बात है। हमारे डाकघर के पोस्टमास्टर थे। रमेश बाबू नाम था। पढ़े-लिखे आदमी, भूत-प्रेत को नहीं मानते थे। गाँव में शर्त लगी तो हवेली में रात गुज़ारने चले गए।"

"फिर?"

"फिर सातवें दिन उनकी साइकिल हवेली के फाटक पर पड़ी मिली। घर में बिस्तर बिछा का बिछा था, चश्मा मेज़ पर रखा था। आदमी नहीं मिला।"

"कहाँ गया?"

"कोई नहीं जानता। पुलिस आई, खोजबीन हुई। कुएँ में, नाले में, जंगल में। पर रमेश बाबू का एक बाल तक नहीं मिला।"

फ़िरोज़ ने चाय का गिलास नीचे रख दिया और कुछ देर तक रहीम चाचा को देखता रहा। फिर उसके होंठ मुस्कुराहट में फैल गए, वही कटाक्ष भरी, शहरी मुस्कान।

"चाचा, मैंने सैकड़ों ऐसे क़िस्से सुने हैं। हर गाँव में एक हवेली होती है, हर हवेली में एक लापता आदमी। कोई रात में कुएँ में गिर गया होगा, कोई शहर भाग गया होगा। मेरे हिसाब से रमेश बाबू ने सरकारी नौकरी से तंग आकर संन्यास ले लिया होगा।"

"बेटा..."

"चाचा, अगर हवेली में कुछ होता तो मैं तो रात को सबसे पहले मरता। मैंने तो पहली ही रात दीवार पर हाथ मारकर कह दिया था: कोई है तो सामने आ जाए! देखिए, यहाँ ज़िंदा बैठा हूँ। चाय पी रहा हूँ।"

बेंच पर जैसे बिजली गिर पड़ी।

रहीम चाचा का हाथ, जो चाय छानने के लिए छलनी उठा रहा था, हवा में ही रुक गया। बाक़ी आदमी एक साथ उठ खड़े हुए। उनमें से एक ने अपना गमछा झटका और बिना कुछ कहे तेज़ क़दमों से वहाँ से निकल गया। दूसरा बीड़ी ज़मीन पर फेंककर उसे पैर से रगड़ता हुआ दूसरी तरफ़ चला गया।

"क्या हुआ?" फ़िरोज़ हक्का-बक्का रह गया। "मैंने क्या ग़लत कह दिया?"

रहीम चाचा का चेहरा राख हो गया था। होंठ हिले, पर पहले आवाज़ नहीं निकली। फिर उन्होंने धीमे, काँपते स्वर में कहा, "तूने... तूने ऐसा कहा? उस हवेली में?"

"हाँ। मज़ाक़ था, चाचा। आप तो सीरियस हो गए।"

"यह मज़ाक़ नहीं होता, बेटा।" बूढ़े ने उसकी कलाई पकड़ ली। उनके हाथ की पकड़ में वह सच्चा, डरा हुआ ज़ोर था, जो फ़िरोज़ ने कभी किसी झूठे आदमी में नहीं देखा था। "वह जगह... वहाँ कोई नाम... कोई पुकार... वहाँ बोलना नहीं चाहिए। वहाँ तो हवा भी सुनती है।"

फ़िरोज़ ने आराम से कलाई छुड़ा ली। "चाचा, आप बड़े हैं, मैं आपकी इज़्ज़त करता हूँ। पर हवा के कान नहीं होते।"

तभी उसे अपने पीछे कुछ सरसराहट महसूस हुई। उसने मुड़कर देखा। टपरी के पीछे से, टीन की चादर की ओट से, एक छोटा-सा चेहरा झाँक रहा था। वही दस साल का लड़का, छोटू। उसकी आँखें बहुत बड़ी हो गई थीं।

"छोटू!" रहीम चाचा ने झल्लाकर पुकारा। "इधर आ!"

छोटू धीरे-धीरे बाहर आया। उसके हाथ में एक गीला कपड़ा था, पर वह उसे भूल चुका था। वह फ़िरोज़ से दस क़दम पहले ही रुक गया।

"कल तुम मुझे देखकर गिलास गिरा बैठे थे," फ़िरोज़ ने नरमी से कहा, घुटनों के बल झुकते हुए। "मैं इतना भयंकर दिखता हूँ क्या?"

छोटू ने मुँह नहीं खोला। उसकी आँखें फिर फ़िरोज़ के पीछे, ज़मीन की ओर चली गईं।

"क्या देख रहे हो?" फ़िरोज़ ने मुड़कर देखा। फिर वही अपनी लंबी परछाईं।

"आपकी परछाईं..." छोटू ने बहुत धीमे कहा, जैसे डर लग रहा हो कि कोई सुन लेगा।

"क्या हुआ उसे?"

"वह आपके साथ नहीं हिलती।"

फ़िरोज़ का दिल एक सेकंड को सिकुड़ गया। उसने जल्दी से हाथ उठाया। परछाईं का हाथ भी उठा। उसने क़दम बढ़ाया, परछाईं ने भी बढ़ाया। सब ठीक।

"बेटा, मैं तो हिल रहा हूँ। देखो, वह मेरे साथ हिल रही है।"

छोटू ने ज़ोर से सिर हिलाया, मानो वह कुछ और ही बात कह रहा हो जिसे समझाने के शब्द उसके पास नहीं थे। "अभी नहीं। कल हिलती थी, थोड़ा देर से। जब आप रुके तो वह थोड़ी देर बाद रुकी।"

"छोटू!" रहीम चाचा ने उसे खींचकर पकड़ लिया। "चल अंदर, बकवास मत कर। बच्चा है साहब, कुछ भी बोलता है।"

उन्होंने लड़के को लगभग घसीटकर टपरी के पीछे धकेल दिया। फ़िरोज़ घुटनों के बल बैठा रह गया। अपनी परछाईं को देखता हुआ। धूप तेज़ थी, परछाईं गहरी और साफ़।

उसने हाथ हिलाया।

परछाईं ने हाथ हिलाया। एक हरकत भी देर से नहीं।

"बच्चों की कल्पना," उसने ज़ोर से कहा, हालाँकि सुनने वाला कोई नहीं था। "यही कारण है कि कहानियाँ पैदा होती हैं। एक बच्चा कुछ देख लेता है, गाँव उसे सच मान लेता है।"

फिर भी वह उठने के बाद देर तक अपने पैरों के पास की ज़मीन को देखता रहा।

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वह जीप की आवाज़ सुनकर चौंका। एक सफ़ेद जीप, धूल उड़ाती हुई, चौराहे पर रुकी। उसमें से एक लंबा-चौड़ा आदमी उतरा। उम्र पैंसठ के आसपास, चौड़े कंधे, घनी सफ़ेद मूँछें जिनकी नोकें ऊपर को ताव खाई हुई थीं, गले में सोने की मोटी चेन, और आँखों में वह ठंडा, नापा-तुला ठहराव जो उन लोगों में होता है जिन्हें हुक्म देने की आदत होती है। उसके पीछे दो लठैत जैसे आदमी भी उतरे।

टपरी पर बैठे बचे-खुचे लोग उठकर खड़े हो गए। "राम-राम, ठाकुर साहब!"

"राम-राम," ठाकुर ने बस सिर हिलाया। उसकी नज़र फ़िरोज़ पर पड़ी। "तो यही हैं दिल्ली वाले पत्रकार महोदय?"

"जी, फ़िरोज़ ख़ान।" फ़िरोज़ ने हाथ आगे बढ़ाया।

ठाकुर ने हाथ नहीं मिलाया, बस उसे ऊपर से नीचे तक देखा। "भानुप्रताप सिंह। इस गाँव का सरपंच। हवेली किराए पर ली है तुमने?"

"जी, बशीर भाई ने दिलवाई। क्या कोई समस्या है?"

"समस्या?" ठाकुर के होंठों के कोने खिंचे, पर वह मुस्कान नहीं थी। "समस्या तो कोई नहीं। हवेली किसी की जागीर नहीं। पर गाँव का मुखिया होने के नाते मेरा फ़र्ज़ है बताना कि वहाँ का पानी ठीक नहीं है। मौसम में नमी रहती है। आदमी बीमार पड़ जाता है। मेरी मानो तो मेरे यहाँ चलकर रहो। मेहमान की तरह। मेरे बाड़े में एक कमरा ख़ाली है।"

"आपकी मेहरबानी, ठाकुर साहब। पर मुझे एकांत चाहिए। लिखने का काम है।"

ठाकुर कुछ देर चुप रहा। फिर आगे झुककर, इतने क़रीब से कि फ़िरोज़ को उसकी साँस में तंबाकू और केवड़े की मिली-जुली गंध महसूस हुई, उसने धीमे स्वर में कहा: "दिल्ली के लोग बहादुर होते हैं। पर बहादुरी और बेवक़ूफ़ी के बीच सिर्फ़ एक रात का फ़र्क़ होता है, बेटा। एक रात और बीत गई तो दूसरी रात आती है। तीसरी... तीसरी रात सबसे भारी होती है।"

फ़िरोज़ ने भौंहें उठाईं। "तीसरी रात?"

ठाकुर ने जवाब नहीं दिया। वह सीधा हुआ, गमछा ठीक किया, और जीप की ओर मुड़ गया। "कभी भी मन बदले तो मेरी हवेली का दरवाज़ा खुला है। राम-राम।"

जीप धूल उड़ाती निकल गई। फ़िरोज़ कुछ देर तक उस धूल को देखता रहा।

"तीसरी रात," उसने बुदबुदाया। "बड़े नाटकीय लोग हैं यहाँ।"

पर उसके हाथों की उँगलियाँ बिना किसी कारण के बार-बार अपनी बाईं कलाई की घड़ी को टटोल रही थीं।

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"बेटा, इधर आ।"

आवाज़ बहुत धीमी थी, जैसे किसी सूखी टहनी के चरमराने की। फ़िरोज़ मुड़ा। चौराहे के सबसे किनारे वाले घर के बाहर एक पुरानी, टूटी चारपाई पर एक बुढ़िया बैठी थी। इतनी बूढ़ी कि लगता था कि वह हवा की जगह धूप पर जी रही है। चेहरे पर इतनी झुर्रियाँ थीं कि हर झुर्री दूसरी में खो जाती थी। सफ़ेद बाल सफ़ेद दुपट्टे के नीचे से बाहर झाँक रहे थे। एक हाथ में लकड़ी की टेढ़ी लाठी थी। आँखों पर मोतियाबिंद की बादली परत थी, मगर उनमें अजीब-सी तीक्ष्णता थी, जैसे वे आँखें कुछ ऐसा देख रही हों जो बाक़ी दुनिया को नहीं दिखता।

"मुझे बुला रही हैं, अम्मा?"

"और कौन? यहाँ तेरे सिवा कोई नया आदमी है क्या?" बुढ़िया ने अपना हाथ हिलाया। "आ, बैठ मेरे पास।"

वह सकुचाते हुए चारपाई के पास गया। बुढ़िया ने उसका हाथ पकड़ा। उसकी हथेली सूखी, काग़ज़ जैसी थी, पर ठंडी। असमान ठंडी।

"मैं अमीना बी हूँ। गाँव वाले दादी कहते हैं। अस्सी की हो चली हूँ, पर सब कुछ याद है।" उसने अपनी बादली आँखें फ़िरोज़ के चेहरे पर टिकाईं, ऐसे कि वह सच में उसे देख पा रही हो। "तू बहुत जवान है। बहुत सीधा चेहरा। बिलकुल उस बच्चे जैसा जो पहली बार हवेली में गया था।"

"किस बच्चे?"

"वह भी नहीं बता पाया। बस उतना बता गया जितना बता सकता था।" बुढ़िया हँसी, एक अजीब सूखी हँसी। "तू कल रात वहाँ सोया?"

"जी।"

"और रात को कुछ बोला?"

फ़िरोज़ चुप रहा। उसे अचानक महसूस हुआ कि पीछे से टपरी के लोग उसे देख रहे हैं। कुछ लोग जिन्होंने उसकी बात सुनी थी, अब आपस में फुसफुसा रहे थे।

"बोला न?" दादी की उँगलियाँ उसकी कलाई पर कस गईं। "तू बोला। मुझे पता है, तू बोला है। तेरी आवाज़ का रंग हवा में लटका है। बता, क्या कहा था तूने?"

"अम्मा, मैंने तो बस मज़ाक़ में..."

"बता!"

"मैंने कहा... कोई है तो सामने आ जाए।"

दादी ने हाथ छोड़ दिया। उसकी गर्दन एक तरफ़ झुक गई, जैसे अचानक किसी ने उसका सारा ज़ोर निचोड़ लिया हो। कुछ देर वह कुछ नहीं बोली। उसके होंठ बहुत धीरे-धीरे हिल रहे थे, मानो कोई पुरानी दुआ पढ़ रही हों। फिर उसने एक लंबी साँस भरी और बहुत धीमे बोली: "एक गाँव में एक नवाब था, बेटा।"

"अम्मा?"

"नवाब था। बहुत बड़ा। बहुत भूखा। भूख पैसे की भी थी, जान की भी थी, और उस चीज़ की भी जो इंसान के बस में नहीं होती। उसने एक दिन नाम पुकारा। एक ऐसा नाम, जो नहीं पुकारना चाहिए था।" बुढ़िया की आवाज़ सपाट और बिना भाव के थी, जैसे वह कोई कहानी नहीं, पुराना पाठ सुना रही हो। "और वह नाम लौटकर आया।"

फ़िरोज़ ने मुस्कुराने की कोशिश की। "अम्मा, किसी नाम के लौटकर आने से क्या..."

"सुन," दादी ने उसकी कलाई फिर पकड़ ली, और इस बार उसकी आँखों में जाने कौन-सा जोश था। "नाम मत पुकारना, बेटा। नाम लौटकर आता है। जो नाम तू पुकारता है, वह तुझे पकड़ लेता है। तूने नाम तो नहीं लिया... पर तूने पुकारा। पुकार भी नाम जैसी ही होती है।"

"अम्मा, आप किस नाम की बात कर रही हैं? मैंने किसी का नाम नहीं लिया।"

"तेरी पुकार ने ख़ुद एक नाम ढूँढ लिया होगा।" दादी ने उसकी आँखों में झाँका। "आईने से दूर रहना, बेटा। हवेली में बहुत कुछ है, पर सबसे ख़तरनाक चीज़ वह है जिसमें तू अपना चेहरा देखता है।"

फ़िरोज़ ने ठंडी साँस ली। "अम्मा, आप बहुत प्यारी हैं। और आपकी कहानी भी बहुत अच्छी है। लेकिन आईने में चेहरा देखने से अगर ख़तरा होता तो आधी दुनिया की औरतें मर चुकी होतीं।"

दादी हँस दी, इस बार कुछ ज़्यादा सूखी, कुछ ज़्यादा थकी हुई। "तू वैसा ही है। जिसने भी बुलाया, वह यही कहकर हँसा था। पर सुन, एक बात याद रख। जो आईने में हँसे, वह तू नहीं।"

"मतलब?"

"जिस दिन तेरा अक्स तुझसे पहले हँसे, समझ जाना कि उसने तेरी जगह ले ली।"

फ़िरोज़ को लगा कि उसकी रीढ़ में कोई बर्फ़ की सुई चुभी। वह ज़ोर से हँस पड़ा, शायद ज़्यादा ज़ोर से। "अम्मा, मैं आपकी बात नोट कर लूँगा। आपको पता है, आप एक बहुत अच्छा हॉरर उपन्यास लिख सकती हैं।"

उसने उठने की कोशिश की, पर दादी ने उसकी कलाई नहीं छोड़ी। "बेटा," उसने इस बार बहुत धीमे, लगभग अपने आप से कहा, "तीन रातें होती हैं। पहली रात बुलावा। दूसरी रात जवाब। तीसरी रात..."

उसने बात अधूरी छोड़ दी। उसकी बादली आँखें दूर कहीं देखती रहीं, फिर होंठ भींचकर उसने कलाई छोड़ दी।

"जा। जा अपने घर।"

"अम्मा..."

"जा!" उसने लाठी ज़मीन पर पटक दी।

फ़िरोज़ ने चुपचाप सलाम किया और वहाँ से हट गया। जब वह मुड़ा तो उसे लगा कि दादी ने पीछे से कुछ बुदबुदाया। दो शब्द। बहुत हल्के।

*"अल्लाह रहम करे।"*

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बाक़ी दिन उसने पास के एक छोटे-से सरकारी स्कूल के पीछे वाले पेड़ के नीचे बैठकर बिताया, जहाँ फ़ोन में नेटवर्क की दो लकीरें मिल जाती थीं। उसने अपना ईमेल चेक किया, तीन पुराने संपादकों को काम माँगते हुए संदेश भेजे और एक पुरानी वेबसाइट के लिए सात सौ शब्दों का एक लेख लिख डाला: *गाँव, जो शहर से नाराज़ है।* काम करते हुए उसे अच्छा लगा। शब्दों की चहल-पहल में उसे अपनी पुरानी दुनिया लौटती महसूस हुई।

शाम ढलने से पहले वह वापस हवेली की ओर चला। रास्ते में उसने जान-बूझकर टपरी का मोड़ नहीं लिया। बरगद के पास पहुँचते-पहुँचते अँधेरा गिरने लगा था। आकाश के पश्चिमी छोर पर एक पतली, ताँबे जैसी लकीर बची थी। पेड़ की जटाएँ हवा में हल्की-हल्की झूल रही थीं।

उसके क़दम अपने आप तेज़ हो गए। उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

वह फाटक के अंदर घुसा, उसे पीछे से बंद किया, कुंडी चढ़ाई। फिर आँगन में पहुँचकर साँस छोड़ी। "ठीक है। यह दूसरी रात है।" वह ख़ुद से बोलता रहा, "कल की तरह चूहे, ठंडी हवा, और शायद कुछ क़दमों की आवाज़। पर आज मैं तैयार हूँ।"

उसने रसोई में जाकर खिचड़ी चढ़ा दी। नमक-हल्दी के अलावा उसके पास कुछ नहीं था, पर बशीर ने कुछ आलू और प्याज़ छोड़ दिए थे। खिचड़ी की ख़ुशबू रसोई में भरी तो उसे थोड़ी राहत मिली। उसने थाली में खिचड़ी परोसी, ऊपर से अचार की एक फाँक रखी, और कमरे में आकर मेज़ पर रख दी।

नौ बजे ज़ोया का फ़ोन आया। इस बार उसने ख़ुद को शांत रखा। उसने आराम से बात की, गाँव के पराठों की तारीफ़ की, रहीम चाचा की चाय का ज़िक्र किया। ठाकुर, दादी, छोटू की बातें उसने छोड़ दीं।

"भाई, तुम आज कुछ बदले-बदले लग रहे हो।"

"कैसे?"

"कुछ ज़्यादा ही हँस रहे हो। और कुछ बातें टाल रहे हो।"

"मैं बहुत दिनों बाद शांति महसूस कर रहा हूँ, इसलिए। चल, तू बता, तेरे हॉस्टल में आज भी वही लड़की रात को तीन बजे गाना गाती है?"

ज़ोया ने अपनी बातें बताईं, और फ़िरोज़ सुनता रहा। उस आवाज़ में कुछ ऐसा था जो उसे बाँधे रखता था। एक ऐसा रिश्ता, जो बिना शोर के पूरी दुनिया थामे रहता है। जब कॉल कटी तो वह कुछ देर फ़ोन को हथेली में लिए बैठा रहा।

फिर उसने अपने आप से कहा: "ऊपर चलकर देखना चाहिए।"

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वह जानता था कि यह मूर्खता थी। वह यह भी जानता था कि पत्रकार का सबसे बड़ा दुश्मन उसकी अपनी जिज्ञासा होती है। पर इस बात ने उसे सुबह से परेशान कर रखा था: रात को जो क़दम की आवाज़ें आई थीं, उनके पीछे कोई वजह होनी चाहिए। और अगर वजह ऊपर वाले कमरे में है, तो उसे अपनी आँखों से देखना होगा। वरना दादी की बातें, ठाकुर की चेतावनियाँ और छोटू की परछाई वाली बात उसके दिमाग़ में बढ़ती जाएँगी, जंगली घास की तरह।

उसने फ़ोन की टॉर्च जलाई और चाबी का गुच्छा उठाया। बशीर ने उसे केवल कमरे की चाबी दी थी, पर गुच्छा उस पर कोई पाबंदी नहीं लगा गया था, वह रसोई की अलमारी में पड़ा मिला था, शायद जल्दी में भूल गया था। गुच्छे में आठ-दस चाबियाँ थीं और उनमें एक बड़ी, काली, भारी चाबी, जिसकी मूठ पर एक अजीब आकृति उकेरी गई थी: एक गोल घेरा, जिसके भीतर एक आधा चाँद।

वह आँगन से होता हुआ कोने की सीढ़ियों तक पहुँचा।

सीढ़ियाँ लकड़ी की थीं, काली पड़ चुकीं, हर सीढ़ी का किनारा घिसा हुआ। पहला क़दम रखते ही चर्र की आवाज़ हुई, जैसे पूरे मकान ने साँस खींची हो। उसने वज़न दूसरे पैर पर डाला, दूसरे क़दम पर भी वैसी ही कराह निकली। रेलिंग पर हाथ रखा तो उँगलियों के नीचे धूल की मोटी परत महसूस हुई।

वह ऊपर बढ़ता रहा। टॉर्च की रोशनी सीढ़ियों पर काँप रही थी। दाएँ-बाएँ की दीवारों पर कुछ पुराने चित्र टँगे थे, काली फ़्रेमों में जड़े, काँच टूटा हुआ। एक चित्र में दाढ़ी वाला रौबदार आदमी, सिर पर पगड़ी, आँखों में अकड़। उसके नीचे धुँधले अक्षरों में खुदा था: *नवाब जहाँगीर अली, ख़ुदा का बंदा*।

"ख़ुदा का बंदा," फ़िरोज़ ने फुसफुसाकर कहा। "फिर इस घर में इतना ख़ौफ़ किसका है?" उसकी नज़र नवाब के पास टँगे दूसरे चित्र पर पड़ी, जिसमें कोई चेहरा ही नहीं था, सिर्फ़ काली कालिख़ पुती हुई थी।

वह तेज़ी से आगे बढ़ा।

सबसे ऊपर पहुँचकर वह उस दरवाज़े के सामने खड़ा हुआ। आँगन से यह दरवाज़ा जितना भारी लगता था, पास से उससे कहीं ज़्यादा भारी निकला। मोटी, काली लकड़ी, जिस पर कुछ अजीब-सी लकीरें उकेरी गई थीं। फ़िरोज़ ने टॉर्च क़रीब की। वे लकीरें कोई लिपि थीं, पर किसी ऐसी भाषा की जो उसने कभी नहीं देखी थी। अरबी-जैसी, पर उलटी। जैसे किसी ने शीशे के सामने रखकर लिखी हो।

दरवाज़े के बीचों-बीच कुंडी पर लटका ताला इतना बड़ा और इतना पुराना था कि वह किसी क़िले का लगता था। उसके छेद में चाबी के लिए एक आधे चाँद-सी आकृति बनी थी।

फ़िरोज़ ने चाबी उठाई और देखा। आधे चाँद की आकृति मिल रही थी।

"अरे वाह," उसने फुसफुसाया। "तो यह बशीर वाली चाबी नहीं, कोई और ही है। या फिर बशीर को पता था कि मैं ऊपर आऊँगा।"

उसके मन में कहीं एक छोटी आवाज़ ने कहा: *मत खोल।*

उसने अपने आपको जवाब दिया: "तू डर रहा है, फ़िरोज़? पूरी रात ख़ुद दीवार पर हाथ मारकर ललकारने वाला फ़िरोज़?"

*मत खोल।*

"चुप रह।"

उसने चाबी घुमाई। पहले कुछ नहीं हुआ। फिर भीतर कहीं जंग लगी कोई चीज़ खिसकी, खट। खट। खट। ताला एक भारी, थकी हुई आवाज़ के साथ खुल गया।

फ़िरोज़ ने उसे कुंडी से निकाला। दरवाज़े पर हाथ रखा और धकेला।

दरवाज़ा बिना आवाज़ किए खुल गया। इतने सालों के बाद किसी दरवाज़े का बिना चरमराए खुलना ही अजीब था।

कमरे से धूल की गंध आई, पर साथ में कुछ और भी। एक पुरानी, फीकी ख़ुशबू, जैसे किसी ने बहुत साल पहले लोबान जलाया हो और उसकी महक दीवारों में बस गई हो। और उसके नीचे कुछ और, एक हल्की, मीठी-सी सड़न, जैसे सूखे फूल।

उसने टॉर्च अंदर घुमाई।

कमरा गोल था। गुंबद के नीचे का कमरा, जिसकी छत ऊपर की ओर उठती हुई एक नुकीले बिंदु पर मिलती थी। दीवारों पर गहरे नीले-हरे रंग की पुरानी नक़्क़ाशी थी, आधी झड़ चुकी। फ़र्श पर पत्थर के चौकोर टुकड़े जड़े थे, और उन पर धूल की इतनी मोटी परत थी कि पैर रखने पर उँगली भर गहरे निशान बनते थे।

कमरे में फ़र्नीचर कुछ नहीं था। न चारपाई, न कुर्सी, न कोई संदूक़। सिर्फ़ एक छोटी गोल खिड़की, वही जो उसने बाहर से देखी थी, और ठीक उसके सामने की दीवार पर एक बड़ी, ऊँची, कपड़े से ढकी आकृति।

फ़िरोज़ ने क़दम रखा। उसके जूतों के नीचे धूल चरमराई।

वह आकृति क़रीब सात फ़ुट ऊँची थी और चार-पाँच फ़ुट चौड़ी। ऊपर से नीचे तक एक काली मख़मली चादर से ढकी, जिस पर वर्षों की धूल जमकर उसे भूरा कर चुकी थी। चादर के नीचे से कहीं-कहीं पर एक काली लकड़ी का फ़्रेम झाँक रहा था, जिस पर महीन नक़्क़ाशी थी: साँप जैसी बेलें, तारे और चाँद, और उन सबके बीच कुछ छोटी-छोटी आँखें, जो लकड़ी में ही उकेरी गई थीं।

उसके पैर अपने आप रुक गए।

"यह तो आईना है," उसने धीमे कहा, और उसकी आवाज़ गुंबद में तैरती हुई ऊपर चढ़ गई और कई बार लौटकर आई: आईना... आईना... आईना...

उसे दादी का वाक्य याद आया: *आईने से दूर रहना, बेटा।*

"बकवास," उसने कहा, पर इस बार फुसफुसाकर।

वह आगे बढ़ा और चादर के किनारे पर हाथ रखा। मख़मल उसके हाथ के नीचे ठंडी और थोड़ी गीली लगी, जैसे किसी ने उसे अभी-अभी पानी में डुबोया हो। उसने उसे खींचने के लिए उँगलियाँ कसीं।

तभी उसके पीछे दरवाज़े के पास से धम्म की आवाज़ आई।

फ़िरोज़ झटके से मुड़ा। टॉर्च की रोशनी दरवाज़े पर पड़ी। दरवाज़ा अब भी खुला था। सीढ़ियाँ अँधेरी थीं। कोई नहीं।

"हवा," उसने कहा। "बस हवा।"

पर उसे पता था कि कमरे में हवा नहीं थी। गुंबद की एकमात्र खिड़की बंद थी, और दरवाज़ा खुला होने पर भी बाहर से हवा आने का कोई निशान नहीं था। मोमबत्ती होती तो उसकी लौ सीधी खड़ी रहती।

उसने धीरे-धीरे अपनी टॉर्च वापस आईने की तरफ़ की और फिर एक झटके में चादर को नीचे खींच दिया।

धूल का बादल उठा। वह खाँसते हुए पीछे हट गया। चादर नीचे गिरकर उसके पैरों के पास सिकुड़ गई। टॉर्च की रोशनी के घेरे में धूल धीरे-धीरे नीचे बैठने लगी, और उस धुंध के पीछे से वह चीज़ धीरे-धीरे उभर आई।

वह आईना था। मगर आईना नहीं, कुछ और। उसका काँच काला था। दर्पण जैसा चमकदार नहीं, गहरा, गाढ़ा काला, जैसे बिना तारों की रात किसी चौखट में जड

Writer
firoj saifi
Story
जिसने नाम पुकारा
Chapter
2 of 10
Category
Jinn & Spirits
Reading time
21 min
Words
4098
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

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