Pretika › Jinn & Spirits › जिसने नाम पुकारा
एपिसोड 3: तीसरी रात
firoj saifi · Jinn & Spirits · 23 मिनट
फ़िरोज़ को याद नहीं रहा कि वह सीढ़ियाँ कैसे उतरा।
बस इतना याद रहा कि उसके पैर लकड़ी की हर पायदान पर ऐसे पड़ रहे थे जैसे कोई किसी जलते हुए तवे पर भाग रहा हो, कि टॉर्च की रोशनी उसके हाथ में पागलों की तरह नाच रही थी, और कि पूरे रास्ते उसके पीछे, ठीक पीछे, किसी की धीमी, सधी हुई साँस चलती रही थी, जो हर पायदान पर उसके साथ उतर रही थी, न एक क़दम आगे, न एक क़दम पीछे।
आँगन में पहुँचकर वह घुटनों पर हाथ रखकर झुक गया और हाँफने लगा। नीम की सूखी पत्तियाँ हवा में सरसरा रही थीं। आसमान में तारे थे, चाँद अब भी नहीं निकला था। दूर बरगद की काली आकृति बिलकुल शांत खड़ी थी।
उसने ऊपर देखा।
गुंबद के नीचे वाला दरवाज़ा खुला था। अँधेरे का एक चौकोर टुकड़ा, जैसे दीवार में किसी ने मुँह खोल दिया हो।
"ताला," उसने हाँफते हुए कहा। "ताला लगाना होगा।"
यह बात उसके अपने कानों को भी बेतुकी लगी। वह कमरा, जिसमें से वह अभी-अभी भागकर निकला था, और वह अपने हाथों से उस पर ताला लगाने की सोच रहा था। पर उसके भीतर के पत्रकार ने, जिसने बरसों तक हर डर को किसी सूचीबद्ध तथ्य में बदलकर सँभाला था, पहली बार सहज हुक्म दिया: दरवाज़ा बंद कर। जो अंदर है, उसे अंदर रख।
उसने सीढ़ियाँ फिर चढ़ीं। हर क़दम पर उसका दिल सीने से बाहर निकलने को हो रहा था। दरवाज़े तक पहुँचकर उसने हाथ बढ़ाया, और ठीक तब देखा कि दरवाज़ा अपने आप धीरे-धीरे बंद हो रहा है, बिना हवा के, बिना आवाज़ के, किसी अदृश्य हाथ के सहारे। आख़िरी पल में, पल्लों के बीच की सँकरी दरार में, उसे कमरे का अंदर का हिस्सा दिखा: काला आईना, और उसके सामने धूल पर बनी वे छह लंबी लकीरें।
छह नहीं। सात।
पल्ले आपस में मिल गए। एक धीमी, तसल्ली-भरी खट के साथ।
फ़िरोज़ ने काँपते हाथ से कुंडी चढ़ाई, ताला उठाया और भीतर चाबी घुमाई। ताला बंद हो गया। उसने चाबी निकाली और मुट्ठी में भींच ली। फिर बिना पीछे देखे नीचे भागा।
उस रात उसने अपने कमरे की सारी बत्तियाँ जलाकर रखीं, सिर्फ़ एक बल्ब था जो कभी-कभी झिलमिला जाता, पर उसने मोमबत्तियाँ भी जला लीं। चारपाई को दरवाज़े के सामने खींचकर लगा दिया। खिड़की की सिटकनी तीन बार जाँची। फिर वह चारपाई पर पालथी मारकर बैठ गया और अपना नोटबुक खोल लिया, वही काली नोटबुक जिसमें उसने पंद्रह साल की रिपोर्टिंग का हर तथ्य लिखा था।
पहले पन्ने पर उसने बड़े अक्षरों में लिखा: तथ्य।
फिर नीचे:
1. हवेली के ऊपर गुंबद वाला कमरा, ताला बंद, चाबी बशीर के गुच्छे में थी (बशीर को पता था?)।
2. कमरे में एक काला आईना। सात फ़ुट ऊँचा। काँच नहीं लगता, कुछ और है।
3. आईने में मेरा अक्स बाएँ हाथ से टॉर्च पकड़े था। (नोट: सामान्य आईने में दायाँ-बायाँ उलटता है, पर मेरी टॉर्च की जगह नहीं बदलती। यह ग़लत है।)
4. आईने के नीचे धूल में उँगलियों के निशान। लंबी। अंदर से बाहर की ओर।
5. जब मैं निकला, निशान छह से सात हो गए।
उसने क़लम रोक ली। फिर नीचे जोड़ा: 6. जो भी था, उसने मुझे जाने दिया।
वह इस आख़िरी वाक्य को देर तक घूरता रहा। यह तथ्य नहीं था। यह एक एहसास था, और एहसास पर पत्रकार भरोसा नहीं करता। पर यह उसकी हड्डियों में बैठा था: जो भी था, उसने मुझे जाने दिया। जैसे कोई बिल्ली किसी चूहे को पंजे से निकल जाने देती है, यह जानते हुए कि चूहा कहाँ जाएगा।
रात के आख़िरी पहर तक वह जागता रहा। कुछ नहीं हुआ। न क़दमों की आवाज़, न ठंडी हवा, न ताले की खनखनाहट। सन्नाटा इतना ठहरा हुआ था कि फ़िरोज़ को लगने लगा कि हवेली ख़ुद उसकी जासूसी कर रही है। और जब पूरब की ओर खिड़की के काँच पर पहली भूरी रोशनी चढ़ी, तब जाकर उसकी आँखें बंद हुईं।
वह दोपहर के बाद उठा, और उठते ही उसने सबसे पहले अपनी कलाई देखी। बायाँ हाथ। घड़ी के नीचे। वहाँ कुछ नहीं था, सादा त्वचा, ज़रा-सी पसीने से नम। उसने साँस छोड़ी और ख़ुद पर हँसा। कलाई पर क्या होता? अभी तो किसी ने पकड़ा भी नहीं।
अभी तो।
इस शब्द ने उसके भीतर एक पुरानी, बहुत धीमी घंटी बजाई।
उसने हाथ-मुँह धोया, कपड़े बदले, और तय किया कि आज वह गाँव जाएगा, बशीर को ढूँढेगा, और उससे सीधे पूछेगा कि चाबी उसके गुच्छे में कैसे थी। अगर बशीर को पता था कि ऊपर एक कमरा है जिसमें कोई बड़ा आईना रखा है, तो उसने बताया क्यों नहीं? और अगर वह चाबी भूलकर चला गया था, तो इतना घबराया हुआ क्यों था?
हवेली से निकलते वक़्त उसने फाटक पर ताला डाला। फिर उसकी नज़र गुंबद की उस छोटी, गोल खिड़की पर गई, जो ढलती धूप में हल्के-हल्के चमक रही थी। उसे वह चमक पसंद नहीं आई। जैसे कोई दूर से, बहुत धैर्य के साथ, उसे जाते देख रहा हो।
गाँव में बशीर का घर ढूँढना मुश्किल नहीं था। चौराहे से दाईं गली में तीसरा मकान, मिट्टी की दीवारों वाला, बाहर नीले रंग का दरवाज़ा। फ़िरोज़ ने कुंडी खटखटाई। भीतर से एक औरत की आवाज़ आई, "कौन?"
"फ़िरोज़। दिल्ली से आया हूँ। बशीर भाई से मिलना था।"
दरवाज़ा थोड़ा-सा खुला। एक पतली, सँवलाई औरत ने सिर पर पल्लू खींचे हुए झाँका। उसकी आँखें लाल थीं, जैसे रातभर रोई हो।
"वो घर पर नहीं हैं।"
"कब आएँगे? मुझे बस दो मिनट की बात करनी थी। चाबी के बारे में।"
औरत ने घबराकर गली के दोनों ओर देखा। फिर बहुत धीमे बोली: "वो आज सुबह तड़के निकल गए। ससुराल गए हैं। उनके साले के यहाँ। कह गए हैं कि हफ़्ते भर बाद लौटेंगे।"
"अचानक?"
"हाँ।" औरत की आवाज़ टूटी। "रात को सोए नहीं थे। रातभर बड़बड़ाते रहे। कहते थे, मैंने आपको मना किया था, मैंने मना किया था, मैंने ऊपर वाली चाबी नहीं दी थी... फिर सुबह चुपचाप थैला उठाकर चले गए।"
फ़िरोज़ ने भौंहें सिकोड़ीं। "चाबी नहीं दी थी? पर गुच्छा तो रसोई में मिला था।"
औरत ने अपने दुपट्टे के कोने को होंठों के बीच दबा लिया। कुछ पल चुप रही, फिर बोली: "भैया, आप शहर के पढ़े-लिखे हैं। मेरी बात बुरी न लगे तो एक बात कहूँ? आज रात हवेली में मत सोइए। कहीं और सो जाइए। हमारे यहाँ भी जगह है, बैठक ख़ाली है। चाहे तो मैं खाना..."
"भाभी जी, शुक्रिया। मगर मुझे बात समझ नहीं आ रही। सब लोग मुझे हवेली से दूर रहने को क्यों कह रहे हैं? कोई साफ़-साफ़ क्यों नहीं बताता?"
"क्योंकि साफ़-साफ़ बोलने से..." औरत रुक गई। "...बात सुन ली जाती है।"
यह वही बात थी जो रहीम चाचा ने भी कही थी। वहाँ तो हवा भी सुनती है।
"अच्छा," फ़िरोज़ ने कहा, और अपनी आवाज़ में ज़बरदस्ती हँसी भर दी। "ठीक है। भाई साहब लौटें तो कहना कि फ़िरोज़ ने चाबी का शुक्रिया कहलवाया है।"
वह मुड़ा और चल पड़ा। पीछे से किवाड़ बंद होने की आवाज़ आई, जैसे किसी ने जान छुड़ाई हो।
टपरी पर आज रहीम चाचा अकेले थे। न बेंच पर कोई बैठा, न कोई गुटर-गूँ। चाय की केतली भाप छोड़ रही थी और चाचा के चेहरे पर थकान की गहरी लकीरें थीं।
"आ गया?" उन्होंने बिना देखे कहा।
"जी।"
"कल रात सोया?"
"थोड़ी देर।"
रहीम चाचा ने सिर उठाकर उसे देखा। एक पल को उनकी आँखें फ़िरोज़ के चेहरे पर टिकीं, फिर नीचे, उसके गले की तरफ़, फिर और नीचे, उसकी कलाई पर। उनके चेहरे पर एक अजीब राहत फैल गई, जो तुरंत ही चिंता में बदल गई।
"क्या हुआ चाचा?"
"कुछ नहीं। बैठ।" चाचा ने गिलास में चाय उँडेली। "ले। पी ले।"
फ़िरोज़ बैठ गया। चाय गरम थी, और इस बार उसने महसूस किया कि उसके हाथ हल्के-हल्के काँप रहे हैं। उसने गिलास दोनों हथेलियों से थाम लिया।
"चाचा," उसने बहुत धीरे से कहा, "मैं आपसे एक सवाल पूछना चाहता हूँ, और मैं चाहता हूँ कि आप पत्रकार या शहरी या मज़ाक़ वाला सब भूलकर मुझे सीधा जवाब दें। कल रात मैं हवेली के ऊपर गया था। गुंबद वाले कमरे में।"
चाय की केतली के पीछे चाचा के हाथ से छलनी गिर पड़ी।
"तूने…"
"मैंने एक आईना देखा। बहुत बड़ा। काला। वह आईना क्या है, चाचा?"
रहीम चाचा ने पहले कुछ नहीं कहा। उनके होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली। फिर उन्होंने आस-पास देखा, चौराहा ख़ाली था, पर उन्होंने फिर भी अपनी आवाज़ दबाकर कहा: "हमारे दादा कहते थे कि उस आईने के भीतर कोई रहता है।"
"कौन?"
"वो नाम नहीं लेते थे। कहते थे, उसे नाम से मत बुलाओ। उसे 'वो' कहो। 'उस पार वाला' कहो। पर उसका नाम लेने पर वह सुनता है।" चाचा ने आँखें बंद कर लीं। "बेटा, तूने कहा था न, कोई है तो सामने आ जाए? तू नहीं जानता कि उस मकान में यह वाक्य कितनी बार कहा गया है। हर बार कोई बुलाता है, हर बार कोई ग़ायब हो जाता है।"
"रमेश बाबू?"
"रमेश बाबू भी। उससे पहले एक अंग्रेज़ अफ़सर के बारे में सुना था। उससे पहले एक डाक्टर साहब। और उनसे भी पहले..." चाचा ने सिर हिलाया। "मेरी उम्र साठ है, बेटा। मेरे दादा सौ साल जिए थे। उनके दादा ने भी यही कहानी सुनाई थी।"
"तो आप लोग उसे रोकते क्यों नहीं?"
चाचा के चेहरे पर एक कड़वी, थकी हुई हँसी उभरी। "रोकने की कोशिश नहीं हुई, ऐसा सोचता है तू? पंडित ने हवन किया, मौलवी साहब ने तावीज़ बाँधे। ठाकुर साहब के पुरखे हर साल हवेली पर चादर चढ़ाते थे। सब कुछ आज़माया गया। पर वो हर बार लौट आता है, जब कोई उसे बुलाता है।"
"अगर किसी ने बुलाया ही न हो?"
"तो वो सोता रहता है।"
फ़िरोज़ ने गिलास नीचे रख दिया। हाथ की कपकपाहट रुक नहीं रही थी। उसे अपने ही शब्द कड़वे लगे, पर वह उन्हें रोक नहीं पाया: "तो मैंने उसे जगाया है।"
रहीम चाचा ने जवाब नहीं दिया। बस उनकी आँखें बहुत उदास हो गईं।
तभी किसी ने उसकी कुर्ती का किनारा खींचा।
छोटू खड़ा था। उसका चेहरा बिलकुल सफ़ेद था, जैसे कोई बहुत लंबा सफ़र तय करके आया हो। उसके छोटे-से हाथ में एक नीला धागा था, जिसमें एक ताँबे का छोटा-सा गोल छल्ला पिरोया था।
"भैया, यह लो।"
"यह क्या है, छोटू?"
"मेरी अम्मी का है। कहती थीं, इसे पहनकर कोई बुरी चीज़ पास नहीं आती।" लड़के ने फुसफुसाकर कहा। "आप आज रात इसे पहन लेना।"
"और तेरी अम्मी?"
छोटू की आँखें भर आईं। "अम्मी ऊपर चली गई हैं। उनके पास अब ज़रूरत नहीं है।"
फ़िरोज़ का गला रुँध गया। उसने धागा छोटू के हाथ से लिया और अपनी कलाई पर बाँध लिया। ताँबे का छल्ला ठंडा था। "शुक्रिया, पहलवान।"
"भैया," छोटू ने कहा, और उसकी आवाज़ और धीमी हो गई। "वह आपके नाम का इंतज़ार कर रहा है। जब वह आपका नाम ले लेगा, फिर वह आपको भूल नहीं पाएगा।"
"क्या मतलब, मेरा नाम?"
"मुझे नहीं पता," छोटू ने सिर झुका लिया। "पर आज सुबह मैंने सपना देखा। एक काला आदमी आपके पीछे खड़ा है और आपके कान में कुछ कह रहा है। आपको सुनाई नहीं दे रहा, पर मुझे सुनाई दे रहा है।"
"क्या कह रहा है?"
छोटू ने जवाब नहीं दिया। वह भागकर टपरी के पीछे चला गया।
रहीम चाचा ने गहरी साँस ली। "बच्चा सपने कहता है, बेटा। मत सुनना।"
पर फ़िरोज़ को याद आया कि जब वह कल आया था, छोटू ने उसकी परछाईं देखकर गिलास गिरा दिया था। और जब उसने दादी अमीना बी से बात की थी, तो उसने कहा था: तेरी पुकार ने ख़ुद एक नाम ढूँढ लिया होगा।
सब कुछ एक ही तरफ़ इशारा कर रहा था, और फ़िरोज़ किसी और तरफ़ देखने की भरसक कोशिश कर रहा था।
वह शाम तक गाँव में ही रहा। पास के स्कूल के पीछे वाले पेड़ के नीचे बैठकर उसने एक लेख लिखने की कोशिश की, पर शब्द नहीं बने। जब भी वह कोई वाक्य टाइप करता, उसे लगता कि कोई उसके कंधे के पीछे झुककर पढ़ रहा है। एक बार उसने पलटकर भी देखा। पेड़ के तने के पीछे सिर्फ़ धूप थी।
फिर उसने ख़ुद को एक ठंडा, तर्कसंगत हिसाब दिया।
मैं यहाँ से जा सकता हूँ। रात की बस नौ बजे हाईवे से गुज़रती है। मैं बैग उठाऊँ, किराया लौटाने का झंझट छोड़ दूँ, और दिल्ली लौट जाऊँ। पर वहाँ कौन-सा ठिकाना है? बाईस दिन की मोहलत पर जो फ़्लैट छोड़ा था, उसका किराया चढ़ चुका है। चार लाख बारह हज़ार का क़र्ज़ कौन-सी हवेली के डर से कम होगा? बशीर को तीन हज़ार रुपये एडवांस दे चुका हूँ। और ज़ोया की फ़ीस की अगली क़िस्त बीस दिन में है।
उसने अपने आप से बहस की, और पहली बार उसे समझ आया कि डर और ग़रीबी का रिश्ता कितना पुराना है। जब पैसे की कमी हो, आदमी वहीं टिक जाता है जहाँ उसे नहीं टिकना चाहिए।
उसने अपना फ़ैसला सुनाया: आज की रात मैं हवेली में रहूँगा। पर अपनी शर्तों पर।
उसने दुकान से दो बड़ी टॉर्च, एक सेल वाला रेडियो, और छह मोमबत्तियाँ ख़रीदीं। रहीम चाचा से एक बोतल ज़मज़म का पानी माँगा, जो उनके पास था, और चाचा ने बिना कुछ कहे उसे दे दिया, साथ में एक पुराना तावीज़ भी, जो फ़िरोज़ ने बग़ैर बहस किए जेब में रख लिया।
वापसी के रास्ते में उसने ज़ोया को फ़ोन किया। नेटवर्क एक लकीर पर काँप रहा था। ज़ोया ने पहली घंटी पर ही उठा लिया।
"भाई! मैं कल रात से तुम्हें ढूँढ रही थी। नौ बजे फ़ोन क्यों नहीं उठाया?"
"अरे, कल रात मैं सो गया था, यार। थक गया था। तुझे मैसेज करना चाहिए था।" उसने झूठ बोला और उस झूठ से उसे अपने भीतर कोई चीज़ चुभती महसूस हुई। "सब ठीक है।"
"भाई, तुम्हारी आवाज़ बदली-बदली है।"
"ग़लतफ़हमी है।"
"नहीं," ज़ोया ने ज़िद से कहा। "तुम कुछ छिपा रहे हो। जब तुम बचपन में कुछ छिपाते थे तो ऐसे ही हँसते थे, ज़्यादा और ज़रा-सा ऊँचे सुर में।"
फ़िरोज़ चुप हो गया। वह बहन की इस तेज़ याददाश्त को कभी हरा नहीं पाया था।
"ज़ोया," उसने धीरे से कहा, "सुन। अगर कभी तुझे लगे कि मैं कुछ अजीब बोल रहा हूँ, या मेरा मज़ाक़ मेरे जैसा नहीं है..."
"क्या मतलब?"
"कुछ नहीं। बस एक बात याद रखना। मैं तेरा भाई हूँ। और मैंने तुझसे एक वादा किया था। चाहे कुछ भी हो जाए।"
"कौन-सा वादा?"
"कि तू अकेली नहीं रहेगी।"
दूसरी तरफ़ ख़ामोशी हो गई। फिर ज़ोया की आवाज़ बहुत नन्ही हो गई। "भाई, तुम मुझे डरा रहे हो।"
"मज़ाक़ कर रहा हूँ, बुद्धू। चल, रख। रात को बात करूँगा। नौ बजे। पक्का।"
फ़ोन कट गया। फ़िरोज़ ने उसे जेब में रखा, सिर उठाया, और बरगद के पास खड़ी हवेली को देखा। सूरज डूब चुका था, और उसकी आख़िरी लालिमा गुंबद के सोने जैसे मटमैले रंग पर ठहरी हुई थी।
तीसरी रात शुरू होने वाली थी।
उसने अपनी तैयारी किसी रिपोर्टर की तरह की। लैपटॉप को चारपाई के सामने की मेज़ पर रखा और उसका कैमरा ऑन करके रिकॉर्डिंग शुरू कर दी। फ़ोन को तिपाई जैसा बनाकर खिड़की की सिल पर टिका दिया, ताकि दरवाज़ा फ़्रेम में रहे। दोनों रिकॉर्डिंग चालू। छत की बत्ती जली रखी। कमरे के चारों कोनों में एक-एक मोमबत्ती जलाई। रहीम चाचा का तावीज़ तकिए के नीचे रखा। छोटू का धागा कलाई पर बँधा रहा।
फिर उसने अपनी रिकॉर्डिंग के सामने बैठकर, आत्मविश्वास का नक़ाब चेहरे पर चढ़ाकर कहा: "तारीख़ अक्टूबर की, रात के दस बजे। मैं फ़िरोज़ ख़ान, हवेली नूर-ए-मंज़िल में तीसरी रात दर्ज कर रहा हूँ। पिछली दो रातों में मैंने कुछ असामान्य घटनाओं का अनुभव किया है। ठंडी हवा, क़दमों की आवाज़, एक काला आईना। मेरी राय में इन सबके तार्किक कारण हैं। यह रिकॉर्डिंग उन्हें साबित करेगी। अगर कुछ और हुआ तो रिकॉर्डिंग उसे भी दर्ज करेगी।"
उसने आख़िरी वाक्य पर ज़रा रुककर कहा, मानो किसी दर्शक को पुकार रहा हो। "और अगर कोई है, तो मैं इस बार उसे सामने आने को नहीं कहूँगा। मैं बस सुनूँगा। इतनी सभ्यता है मुझमें।"
उसने कैमरा बंद नहीं किया।
फिर वह चारपाई पर बैठा, अपनी पीठ दीवार से टिकाकर, रेडियो चालू किया, और धीमी आवाज़ में कोई पुराना गाना सुनने लगा। तलत महमूद की आवाज़ कमरे में तैर रही थी: "जाएँ तो जाएँ कहाँ…"
उसे हँसी आ गई। "वाह। क्या चुनाव है।"
रात ग्यारह बजे ज़ोया को उसने मैसेज किया: "सब ठीक। सोने जा रहा हूँ। गुड नाइट।" जवाब में उसने बहन का भेजा हुआ एक दिल देखा, और उस छोटे लाल निशान को देर तक देखता रहा।
बारह बजे रेडियो पर सिग्नल बिगड़ने लगा। गाना बीच में कट गया, फिर सरसराहट, फिर एक बच्चे की हँसी जैसी कोई आवाज़। फ़िरोज़ ने तुरंत रेडियो बंद कर दिया।
एक बजे उसकी पलकें भारी हो गईं। उसने ख़ुद को कुहनी चुभोकर जगाया। दो बजे तक वह पानी पीता रहा, कमरे में टहलता रहा, और बार-बार अपनी उँगलियों से ताँबे के छल्ले को टटोलता रहा।
ढाई बजे के आसपास उसे महसूस हुआ कि चारपाई गर्म हो रही है। ख़ुद उसे नींद में खिंचने का एहसास हुआ, जैसे किसी ने उसके दिमाग़ में धीरे-धीरे ठंडा पानी उँडेलना शुरू कर दिया हो, पर इसके उलट शरीर में एक अजीब गुनगुना आराम फैल रहा हो।
नहीं, उसने ख़ुद से कहा। सोना नहीं है। सोना नहीं है।
तीन बजने से ठीक पहले, उसकी पलकें एक आख़िरी बार झपकीं।
"…फ़िरोज़…"
आवाज़ बहुत नरम थी, इतनी नरम कि उसे लगा कोई सपने में बोल रहा है।
"…फ़िरोज़… उठ जा…"
वह चौंककर उठा।
कमरा अँधेरा था।
सारी मोमबत्तियाँ बुझी हुई थीं। छत का बल्ब बंद था। मेज़ पर रखे लैपटॉप की स्क्रीन भी काली थी। खिड़की की सिल पर रखा फ़ोन गायब था। चारपाई उसकी जगह पर नहीं थी, वह कमरे के बीच में खिसकी हुई थी और दरवाज़े का रास्ता ख़ाली था।
और दरवाज़ा खुला था।
फ़िरोज़ ने अपने हाथ-पैरों को टटोला। वह अपनी चारपाई पर नहीं था। वह खड़ा था।
वह कमरे के बाहर, बरामदे में, नंगे पैर खड़ा था।
उसके पैरों के नीचे पत्थर का फ़र्श बर्फ़ की तरह ठंडा था। आँगन चाँदनी में नहाया हुआ था, पर चाँद आसमान में कहीं नहीं था। रोशनी जैसे ज़मीन से ऊपर उठ रही थी।
"…ऊपर आ…" आवाज़ ने कहा।
"नहीं," फ़िरोज़ ने कहा, पर उसकी आवाज़ किसी और की लग रही थी, बहुत दूर की, पानी के नीचे से आती हुई। उसने अपने पैर रोकने की कोशिश की। पैर नहीं रुके। वह बरामदे से होता हुआ आँगन में उतरा, आँगन पार किया, और कोने की सीढ़ियों के सामने खड़ा हो गया।
मैं नींद में चल रहा हूँ, उसके भीतर के तर्कवादी ने बड़ी तेज़ी से चीख़कर बताया। स्लीपवॉकिंग। यह एक जाना-पहचाना न्यूरोलॉजिकल इवेंट है। मैं जागूँगा। बस एक झटके की ज़रूरत है।
उसने अपनी जीभ ज़ोर से काट ली। मुँह में लोहे जैसा, नमकीन स्वाद भर गया। दर्द हुआ, तेज़, असली।
मतलब वह जाग रहा था।
उसके पैर फिर भी सीढ़ियाँ चढ़ने लगे।
पहली सीढ़ी, चर्र।
दूसरी, चर्र।
हर पायदान की चीख़ अब एक तरह की लय बन गई थी, जैसे कोई ढोलक पर धीमी ताल दे रहा हो। उसके कानों में एक और आवाज़ उसकी अपनी धड़कन के साथ मिल गई। एक दूसरी धड़कन, उससे ज़रा देर से, ज़रा धीमी।
उसने सीढ़ियों की दीवार पर टँगी तस्वीरों की ओर देखा। नवाब जहाँगीर अली की आँखों में अब अकड़ नहीं थी। उसके चेहरे पर बेहद भय था, मुँह खुला हुआ, जैसे वह चीख़ रहा हो, पर कोई आवाज़ न निकल रही हो। और उसके बग़ल वाली काली कालिख़ से पुती तस्वीर में अब कालिख़ के बीच से दो छोटे, धुँधले, सुनहरे-से बिंदु झाँक रहे थे।
आँखें।
वे आँखें उसे देख रही थीं।
"मुझे जाने दो," फ़िरोज़ ने फुसफुसाया। "मैंने… मैं माफ़ी माँगता हूँ। मैं माफ़ी माँगता हूँ।"
"…तू ने कुछ ग़लत नहीं किया…" आवाज़ ने कहा, और अब वह साफ़ थी, बिलकुल साफ़, उसके अपने दिमाग़ के भीतर। "…तू ने बस बुलाया…"
वह ऊपर पहुँच गया।
गुंबद वाला दरवाज़ा सामने था। बंद। उसके ताले को उसने ख़ुद अपने हाथ से बंद किया था, और चाबी वह अपनी जेब में लेकर सोया था।
उसने जेब में हाथ डाला। चाबी वहाँ नहीं थी।
ताला कुंडी पर झूल रहा था, खुला।
दरवाज़ा अपने आप धीरे-धीरे खुला। बिना आवाज़, बिना कराह।
भीतर से एक नीली, ठंडी, बर्फ़ीली-सी रोशनी बाहर आई।
फ़िरोज़ ने पूरी ताक़त से ख़ुद को रोकना चाहा। उसकी हथेलियाँ चौखट की लकड़ी पर कस गईं। पर उसके पैर आगे बढ़ते रहे, एक-एक अंगुल।
कमरे के बीचोबीच वह खड़ा था।
काला आईना।
उस पर अब धूल नहीं थी। उसकी सतह पूरी तरह साफ़ थी, जैसे किसी ने अभी-अभी हाथ से पोंछा हो, और उसमें से वही नीली रोशनी आ रही थी, जो कमरे के पत्थरों पर काँप रही थी। आईना बहुत गहरा था, अथाह, पर इस बार उसमें फ़िरोज़ का अक्स साफ़ दिख रहा था। नंगे पाँव, पसीने से भीगी कमीज़, चेहरे पर पसरा हुआ डर।
सब कुछ वैसा ही था।
पर फिर उसने देखा।
अक्स मुस्कुरा रहा था।
फ़िरोज़ के होंठ सीधे थे, कसकर भिंचे हुए, काँपते हुए। पर आईने वाले फ़िरोज़ के होंठ ऊपर की ओर खिंचे थे, धीरे-धीरे, ऐसे जैसे कोई बहुत दिनों बाद अपनी पसंद की चीज़ देख रहा हो। यह मुस्कान किसी इंसान की मुस्कान जैसी नहीं थी। यह बहुत ज़्यादा चौड़ी थी, कान की तरफ़ बढ़ती हुई, और उसमें गर्मजोशी का एक झूठा-सा खिंचाव था।
फ़िरोज़ ने पलकें झपकाईं।
अक्स ने नहीं झपकाईं।
उसके सीने से एक ठंडी चीख़ ऊपर उठने लगी, मगर गले तक आकर अटक गई।
"…अब तुम पहचान गए…" आवाज़ ने कहा।
फिर अक्स ने धीरे से अपना दायाँ हाथ उठाया, और आईने के अंदर से अपनी एक लंबी, सूखी, पतली उँगली से इशारा किया। फ़िरोज़ की तरफ़ नहीं, फ़िरोज़ के पीछे की तरफ़।
उसके गले में कुछ अटका। उसने साँस नहीं ली। उसकी गर्दन के पीछे, ठीक बालों की जड़ों के पास, एक नर्म, ठंडी, भारी साँस ने उसे छुआ। इतने पास कि उसे अपनी रीढ़ के नीचे तक सिहरन उतरती महसूस हुई।
वह घूमा।
कमरा ख़ाली था।
सिर्फ़ गोल दीवार, ऊँची गुंबदनुमा छत, और खिड़की से आती नीली किरण। पीछे कोई नहीं था। कोई भी नहीं।
फ़िरोज़ ने ज़ोर की साँस छोड़ी, और अपनी ही हँसी, एक घबराई हुई, पागल-सी हँसी, उसके मुँह से निकल पड़ी। "ख़ाली। ख़ाली है। कुछ नहीं है। सब मेरे दिमाग़ में है।"
वह वापस आईने की ओर मुड़ा।
आईने में अब उसका अक्स नहीं था।
कमरे की पूरी तस्वीर वैसी ही थी, गोल दीवार, खिड़की, फ़र्श। मगर बीच में, जहाँ फ़िरोज़ खड़ा होना चाहिए था, एक ख़ाली जगह थी। और उस ख़ालीपन के ठीक पीछे, कमरे की गहराई में, एक आकृति खड़ी थी।
बहुत लंबी। इतनी कि उसका सिर कमरे की नुकीली छत को छू रहा था। पूरी तरह काली, किसी धुएँ और अँधेरे के मेल से बनी हुई, जिसके किनारे हर पल काँप रहे थे। और उसके चेहरे की जगह दो आँखें थीं।
दो जलते हुए अंगारे। लाल, फिर नारंगी, फिर सुनहरे। जैसे भट्टी के भीतर के कोयले, जो साँस खींचने पर तेज़ हो जाते हैं।
वे आँखें फ़िरोज़ पर टिकी थीं।
"…सौ बरस…" जिन्न ने कहा, और इस बार आवाज़ सिर्फ़ आईने से नहीं आई। वह फ़िरोज़ के कानों के भीतर से भी आ रही थी, उसकी खोपड़ी के भीतर बजती हुई। "…सौ बरस से ज़्यादा… इस काँच के पीछे… और आज… तूने मुझे पुकारा…"
"मैंने…" फ़िरोज़ के होंठ मुश्किल से हिले, "मैंने कुछ नहीं… मैं तो मज़ाक़… मैंने किसी को नहीं बुलाया।"
"…तू ने कहा… कोई है तो सामने आ जाए…" आकृति ने हल्की, मंद, सरसराती आवाज़ में दोहराया, और फ़िरोज़ ने अपने ही शब्द दूसरे की ज़बान से सुने, ठीक उसी लहजे में, उसी तंज़ के साथ, उसकी अपनी आवाज़ में। "…मैं आ गया हूँ…"
फ़िरोज़ के घुटने जवाब दे गए। वह पीछे की ओर लड़खड़ाया और दीवार से जा टकराया। उसके कंधे के पीछे पत्थर की ठंडक उतरी।
"तुम… तुम क्या हो?" उसने किसी तरह पूछा।
आकृति ने सिर थोड़ा तिरछा किया। आँखों की चमक बदली, जैसे कोई मुस्कुराया हो।
"…जिन्होंने मुझे बनाया… उन्होंने मुझे जिन्न कहा…"
"जिन्न?" फ़िरोज़ के होंठों से एक सूखी, काँपती हँसी निकल गई, "जिन्न? असली? तुम… किसी आईने के अंदर… यह सब…"
"…असली…" आवाज़ ने कहा, "…और भूखा…"
एक पल को कमरा सन्नाटे में डूब गया। फिर आईने की सतह में, उस ठंडे, नीले, काले काँच के भीतर, जैसे पानी में कंकड़ फेंका गया हो, लहरें उठने लगीं। एक के बाद एक, गोल, धीमी, फैलती हुई। और उन लहरों के बीच से, आईने की सतह को तोड़ता हुआ, एक हाथ बाहर आया।
लंबा। पतला। काला। उँगलियाँ इंसान की उँगलियों से दुगनी लंबी, हर जोड़ पर एक अतिरिक्त गाँठ। हाथ बहुत धीरे-धीरे, किसी साँप की सहजता से, बाहर निकला और हवा में, फ़िरोज़ की तरफ़, खुला रहा।
"…क़रीब आ…"
"नहीं…" फ़िरोज़ ने सिर हिलाया। उसकी साँसें टूट रही थीं। "नहीं… नहीं… मैं… मैं जा रहा हूँ… मैं यहाँ से…"
वह दीवार से सटकर दरवाज़े की तरफ़ सरकने लगा। उसका हर क़दम बर्फ़ पर उतरने जैसा था। उसकी हथेलियाँ दीवार पर फिसल रही थीं।
"…तू जा नहीं सकता…" जिन्न ने कहा। उसकी आवाज़ में कोई ग़ुस्सा नहीं था। बस एक थकी हुई, बहुत पुरानी तसल्ली। "…बुलाने वाला कहीं नहीं जाता…"
फ़िरोज़ दरवाज़े से बस तीन क़दम दूर था। दो। एक।
उसकी हथेली चौखट पर पड़ी।
और ठीक उसी पल उसकी कलाई, उसकी बाईं कलाई, जिस पर छोटू का नीला धागा बँधा था, किसी ने पकड़ ली।
पीछे से।
वह हाथ बर्फ़ से भी ठंडा था। इतना ठंडा कि छूते ही उसकी त्वचा जलने लगी, जैसे जमी हुई लोहे की पट्टी उसकी नसों पर रख दी गई हो। उँगलियाँ उसकी कलाई के चारों ओर पूरी तरह लिपट गईं, एक बार, दो बार, तीन बार, इतनी लंबी कि अपनी ही सिरे पर आकर मिल गईं। और हर उँगली की नोक उसकी नब्ज़ पर टिकी थी, जैसे धड़कन गिन रही हो।
ताँबे का छल्ला एक सूखी चटक के साथ दरक गया।
"…सात रातें…" आवाज़ ने उसके कान के पास फुसफुसाया, ऐसे जैसे कोई किसी बच्चे को सुलाते हुए लोरी गा रहा हो। "…तीन बीत गईं… चार बाक़ी हैं… फिर… तेरी बारी…"
फ़िरोज़ ने अपने गले से वह चीख़ निकाली जो आधे घंटे से भीतर क़ैद थी। चीख़ गुंबद के भीतर गूँजकर कई गुना होकर लौटी। उसने पूरा बदन झटका दिया। उसकी कलाई छूटी नहीं, पर उसने ज़ोर लगाया, इतना कि लगा उसकी हड्डी चटक जाएगी। और अचानक पकड़ ढीली पड़ गई।
वह दरवाज़े से बाहर लुढ़का, लकड़ी की सीढ़ियों पर गिरा, फिर उठा, फिर गिरा, और पूरी रफ़्तार से नीचे भागा। पीछे से किसी की हँसी आ रही थी। वही बच्चे जैसी, बूढ़ी, सरसराती हँसी, जो सीढ़ियों की हर पायदान पर उसके साथ-साथ उतर रही थी।
आँगन में पहुँचकर उसने ख़ुद को रोकने की कोशिश नहीं की। वह भागता गया, फाटक की तरफ़, और फाटक की कुंडी खोलने के लिए कलाई उठाई।
कलाई पर, घड़ी के ठीक नीचे, गहरे काले रंग की एक छाप उभर आई थी।
पाँच लंबी उँगलियों के निशान। और उन पाँचों के बीच, कलाई के ठीक बीचोबीच, एक छोटा-सा, अंडाकार, जलता हुआ-सा काला निशान, जैसे किसी ने गर्म सुई से कोई नाम गोदा हो।
फ़िरोज़ ने फाटक की कुंडी खींची और बाहर भाग गया।
पीछे हवेली की ऊपरी मंज़िल से, खुले हुए दरवाज़े के पार, जैसे हवा में लिपटा हुआ, एक धीमा, बहुत धीमा, नरम वाक्य आँगन में उतरा:
"…चार रातें बाक़ी हैं… अपनी चीज़ें बाँध लेना, फ़िरोज़…"
(अगले एपिसोड में जारी…)
- Writer
- firoj saifi
- Story
- जिसने नाम पुकारा
- Chapter
- 3 of 10
- Category
- Jinn & Spirits
- Reading time
- 23 min
- Words
- 4439
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
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