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एपिसोड 4: परछाईं का हिसाब

firoj saifi · Jinn & Spirits · 17 मिनट

सुबह की पहली चीज़ जो फ़िरोज़ ने सुनी, वह चिड़िया की आवाज़ थी, और उसे यक़ीन ही नहीं हुआ कि चिड़िया अब भी कहीं गा सकती है।

वह चौराहे के कुएँ की मुँडेर पर बैठा था, कमीज़ आधी बाहर निकली हुई, नंगे पैर, जिन पर कीचड़ और खरोंचें थीं। रात के किसी पहर, फाटक से निकलकर, वह बिना सोचे भागता रहा था और जब पैरों ने जवाब दे दिया तो इस कुएँ तक पहुँचकर गिर गया था। उसे याद नहीं था कि कब आँख लगी। याद सिर्फ़ इतना था कि जब पूरब की तरफ़ पहली धूसर लकीर खिंची, तब भी उसकी बाईं कलाई जल रही थी।

उसने कलाई उठाकर देखी।

पाँच लंबी उँगलियों के निशान अब भी वहाँ थे। गहरे, स्याह, जैसे किसी ने कोयले से खींचे हों। और बीच में वह छोटा, अंडाकार निशान, जिसे उसने रात की घबराहट में नाम गोदने जैसा समझा था। दिन की रोशनी में वह नाम नहीं लग रहा था। वह एक आँख जैसा लग रहा था, बंद आँख, जिसकी पलकें किसी भी पल खुल सकती थीं।

"एलर्जी," फ़िरोज़ ने बुदबुदाकर कहा, और उसकी अपनी आवाज़ उसे इतनी खोखली लगी कि वह चुप हो गया।

छोटू का दिया नीला धागा अब भी कलाई पर बँधा था, पर ताँबे का छल्ला बीच से टूटकर दो अर्धचंद्रों में बँट चुका था। धागा जला हुआ-सा, किनारों पर मुड़ा हुआ।

"उठ गया?"

रहीम चाचा टपरी का तख़्ता खोल रहे थे। उन्होंने कुएँ की तरफ़ बिना देखे पूछा था, जैसे उन्हें पहले से पता था कि वहाँ कौन बैठा है। केतली चूल्हे पर चढ़ चुकी थी और लकड़ी के धुएँ की महक चौराहे में फैल रही थी।

"चाचा…"

"चाय पी। फिर बात करेंगे।"

फ़िरोज़ ने गिलास थामा। उसकी उँगलियाँ इतनी काँप रही थीं कि चाय छलक गई। चाचा ने चुपचाप उसकी हथेली को अपने दोनों हाथों के बीच दबाकर गिलास सीधा किया। उनके हाथ खुरदरे थे, पर गरम।

"कितनी रातें हुईं?" चाचा ने पूछा।

"तीन।"

"और उसने क्या कहा?"

फ़िरोज़ ने सिर उठाकर उन्हें देखा। "आपको कैसे पता कि उसने कुछ कहा?"

"क्योंकि तेरे चेहरे पर वही लिखा है जो रमेश बाबू के चेहरे पर लिखा था, जब वह तीसरी सुबह इसी कुएँ पर बैठा मिला था।" चाचा ने नज़रें हटा लीं। "तू कलाई दिखा।"

फ़िरोज़ ने आस्तीन ऊपर की। चाचा ने निशान को एक पल देखा, और फिर आँखें बंद करके कुछ बुदबुदाने लगे, कोई पुरानी दुआ जो फ़िरोज़ ने पहले नहीं सुनी थी। फिर उन्होंने आँखें खोलीं। "सात रातें कहीं?"

"हाँ। तीन बीत गईं, चार बाक़ी।"

"तो आज चौथी।" चाचा ने केतली की तरफ़ देखा, जैसे उसमें कोई जवाब उबल रहा हो। "बेटा, मैं तुझे रोक नहीं सकता, मेरी हैसियत नहीं। पर एक आदमी है जो तुझे बता सकती है कि यह क्या है। स्कूल वाली मास्टरनी। मीरा बिटिया।"

"मीरा?"

"रमेश बाबू की बेटी।"

गाँव का सरकारी स्कूल एक पुरानी पंचायत इमारत में चलता था, जिसकी दीवारों पर बच्चों ने गेरू और कोयले से तस्वीरें बनाई थीं। सूरज चढ़ चुका था, और स्कूल के आँगन में टाट की पट्टियाँ बिछी थीं, जिन पर बीस-पच्चीस बच्चे बैठे पहाड़े रट रहे थे। उनके सामने एक लड़की खड़ी थी, सत्ताईस-अट्ठाईस साल की, साधारण सूती सलवार-कुर्ते में, बालों की एक मोटी चोटी कंधे पर आगे डाले हुए। हाथ में बेंत नहीं, चॉक थी।

वह ब्लैकबोर्ड पर कुछ लिख रही थी, और फ़िरोज़ की परछाईं दरवाज़े पर पड़ी तो उसने बिना पलटे कहा: "बच्चो, एक मिनट रुको। कोई आया है।"

फिर वह घूमी।

फ़िरोज़ ने सोचा था कि एक देहाती स्कूल-टीचर उसे संदेह या डर से देखेगी, जैसे बाक़ी गाँव ने देखा था। पर मीरा की नज़र अलग थी। वह तेज़ थी, नापने-तौलने वाली, और उसकी आँखों में डर कम और थकान ज़्यादा थी, उस इंसान की थकान जो एक चीज़ का इंतज़ार बहुत सालों से कर रहा हो।

"आप हवेली वाले हैं," उसने कहा।

"फ़िरोज़। दिल्ली से…"

"जानती हूँ।" मीरा ने बच्चों की तरफ़ पलटकर कहा, "आज आधी छुट्टी जल्दी। सब बाहर खेलो। जाओ।"

बच्चे ख़ुशी से चिल्लाते हुए बाहर दौड़ गए। आँगन ख़ाली होते ही मीरा ने चॉक मेज़ पर रखी, हाथ झाड़े, और फ़िरोज़ के सामने आकर खड़ी हो गई।

"कलाई दिखाइए।"

फ़िरोज़ ठिठक गया। "आपको कैसे…"

"दिखाइए।"

उसने आस्तीन उठाई।

मीरा ने निशान को देखा। उसके चेहरे का रंग हल्का-सा उतरा, पर आँखें स्थिर रहीं। उसने अपना दायाँ हाथ आगे बढ़ाकर निशान के पास रखा, छुआ नहीं, बस हवा में रोके रखा, जैसे उसकी गर्मी माप रही हो।

"तीन रात?" उसने पूछा।

"तीन।"

"तो उसने आपको छू लिया।" वह सीधी हुई। "आइए, अंदर बैठते हैं। यहाँ बच्चे लौट आएँगे।"

स्कूल के पीछे उसका छोटा-सा कमरा था। एक चारपाई, एक लकड़ी की अलमारी, किताबों का ढेर, और दीवार पर एक पुरानी, फीकी तस्वीर टँगी थी। फ़िरोज़ ने उस तस्वीर को देखा। एक आदमी, चालीस के आसपास, चश्मा, खिचड़ी-सी मूँछें, गोद में एक सात-आठ साल की बच्ची को बिठाए हुए, दोनों हँस रहे थे।

"मेरे पिता हैं," मीरा ने कहा। "रमेश वर्मा। यहीं के सरकारी डाकघर में पोस्टमास्टर थे। और यह मैं हूँ।"

उसने चाय का पानी चूल्हे पर चढ़ाया और बात इस तरह शुरू की, जैसे कोई कई बार दोहराया हुआ सबक़ सुना रहा हो, बिना भावना के, ताकि भावना बीच में आकर बात न बिगाड़े।

"बीस साल पहले, मेरे पिता भी आपकी तरह तर्कवादी थे। वो अंधविश्वास पर किताब लिख रहे थे, गाँव वालों से कहते थे कि हवेली में कुछ नहीं है। एक दिन शर्त लग गई। ठाकुर साहब के कुछ लोगों से। उन्होंने कहा कि अगर वे एक रात हवेली में रहकर दिखा दें, तो पंचायत उनकी किताब छपवाएगी।" मीरा ने चूल्हे की लौ को देखा। "वे गए। पहली रात आराम से लौटे। दूसरी रात भी। तीसरी रात वे कुएँ पर मिले, आधे पागल, कलाई पर यही निशान, और मुझसे कहते थे कि 'मीरा, आईने में कोई मुस्कुरा रहा है'।"

फ़िरोज़ ने धीमे से पूछा: "और फिर?"

"सातवीं रात के बाद मैं सुबह उठी तो वे नहीं थे। बिस्तर वैसा ही बिछा था। उनके जूते वहीं थे। चश्मा मेज़ पर रखा था। और हवेली के ऊपर वाले कमरे की खिड़की में…" मीरा ने साँस ली, "…किसी ने उनकी वही नीली शर्ट टाँग दी थी। जो उन्होंने पहन रखी थी।"

कमरे में चूल्हे की चटक के अलावा कुछ नहीं था।

"मैं सात साल की थी। मुझे बताया गया कि वे शहर चले गए हैं, काम से। जब मैं बारह साल की हुई, तब दादी अमीना बी ने मुझे सच बताया। फिर मैंने अपने तरीक़े से पता लगाना शुरू किया। गाँव की हर बुज़ुर्ग से, हर पुरानी चिट्ठी से। मैं यहाँ टीचर इसलिए बनी हूँ, क्योंकि यह जगह मेरे पिता के आख़िरी निशान के सबसे क़रीब है।"

"और आपने पता क्या लगाया?"

मीरा ने चाय छानी और एक गिलास उसे थमाया। "कि हर बार यही होता है। कोई बाहर से आता है। मज़ाक में, ग़ुस्से में, ज़िद में, कुछ कहता है, कोई ऐसा वाक्य जिसमें चुनौती हो। और उसके बाद सात रातें।"

"और सातवीं रात?"

"फिर वह आदमी… वहाँ नहीं रहता।" उसने सीधे उसकी आँखों में देखा। "पर मैं यह भी जानती हूँ कि वह कहीं जाता नहीं। वह इसी हवेली में रहता है। बस दिखता नहीं।"

फ़िरोज़ ने अपना सिर हाथों में थाम लिया। वह तीन दिन से जो ख़ुद को बता रहा था, कि यह बस अंधविश्वास है, कि कोई तर्कसंगत वजह है, कि वह होशियार है, इस छोटे-से कमरे में, इस साधारण-सी लड़की के सामने, भरभराकर गिर पड़ा।

"मैंने सत्रह जगहों पर यही साबित किया था," उसने फुसफुसाकर कहा। "सत्रह बार। हर बार कोई वजह थी। चमगादड़, मेंढक, पाइप…"

"और अठारहवीं बार?"

"अठारहवीं बार मैंने आईने में देखा, और उसने मुझे देखकर मुस्कुराया।"

मीरा ने आँखें बंद कर लीं। फिर खोलकर बोली: "आपका क्या नाम था, जब आपने पहली रात कुछ कहा था?"

"मेरा नाम?"

"आपने ख़ुद अपना नाम बोला था?"

फ़िरोज़ ने सोचा। पहली रात, फिर दूसरी रात। उसने दीवार पर थप्पड़ मारकर कहा था, कोई है तो सामने आ जाए। नाम नहीं लिया था। पर कल रात, कैमरे के सामने रिकॉर्डिंग करते वक़्त…

"मैंने रिकॉर्डिंग में कहा था, मैं फ़िरोज़ ख़ान…" उसकी आवाज़ बैठ गई।

"वही बात है," मीरा ने धीमे कहा। "उसने जब पुकार सुनी, तभी सुन लिया था। जब आपने अपना नाम ख़ुद बोला, उसने उसे थाम लिया। जिन्न, बुलाने वाले का नाम सुनते ही उसे अपने हाथ में ले लेता है, जैसे कोई मछुआरा काँटे में मछली को बाँध ले।"

"जिन्न," फ़िरोज़ ने दोहराया। यह शब्द कल रात उसके लिए डरावना था, आज पहली बार वह उसे एक सीधे-सादे तथ्य की तरह सुन पा रहा था, और यही सबसे डरावनी बात थी।

"मौलवी क़ासिम से बात कीजिए," मीरा ने कहा। "उनके पास बाबा हुसैनी की कुछ चीज़ें हैं। मैं उनसे पिछले दस साल से पूछ रही हूँ, पर वे कहते हैं कि अभी समय नहीं आया। शायद आपको देखकर वे बोलें। क्योंकि आप तीन रात पार कर चुके हैं, और आज तक किसी के निशान पर उनके हाथ नहीं रुके।"

"बाबा हुसैनी?"

"जिन्होंने उसे पहली बार क़ैद किया था। सौ साल पहले।"

मस्जिद गाँव के पूर्वी छोर पर थी। छोटी, सफ़ेद चूने की, एक बाग़ीचे वाली, जहाँ अनार और अमरूद के पेड़ लगे थे। पीछे की ओर एक कमरा था, जिसके दरवाज़े पर पुरानी, उखड़ी हुई नीली चौखट थी।

मौलवी क़ासिम सत्तर के पार थे। सफ़ेद दाढ़ी, ऊँची नाक, और वे आँखें जो बहुत कुछ देख चुकी हों और अब कुछ भी देखकर चौंकती नहीं। वे एक तख़्त पर बैठे क़ुरान की एक पुरानी जिल्द सँवार रहे थे, जब मीरा के साथ फ़िरोज़ दहलीज़ पर आकर रुका।

"आओ, मीरा बेटी। और यह वही है?"

"जी, मौलवी साहब।"

मौलवी ने जिल्द नीचे रखी। उनकी नज़र फ़िरोज़ पर पड़ी, पर चेहरे पर नहीं, कलाई पर। "बाँह खोलो, बेटा।"

फ़िरोज़ ने आस्तीन ऊपर की। इस बार निशान पहले से ज़्यादा काला था, और उसके किनारे जैसे साँस ले रहे थे, धीरे-धीरे फैलते और सिकुड़ते।

मौलवी ने उसे देखा, और उनके होंठों पर एक बेहद थकी हुई मुस्कान उभरी। "तो यह फिर आया।" उन्होंने सिर हिलाया। "बैठो। बहुत कम वक़्त है, और मैं बहुत देर से इस दिन का इंतज़ार कर रहा हूँ।"

वे उठकर अंदर वाले कमरे में गए और लौटे तो उनके हाथ में एक चमड़े की जिल्द वाली, पीली पड़ चुकी पतली-सी किताब थी। उसकी सीवन खुल रही थी और किनारे कीड़ों ने खा लिए थे।

"यह मेरे दादा के दादा को बाबा सैयद हुसैनी ने दी थी। उनकी डायरी। सारा पन्ना मेरे पास नहीं है। बाक़ी हिस्से…" मौलवी ने पन्ने पलटे, "…ठाकुर ख़ानदान के पास हैं, या शायद उस आईने के अंदर।"

"मुझे समझाइए," फ़िरोज़ ने कहा। "मैं पढ़ा-लिखा हूँ, पर मैं यह नहीं समझ पा रहा कि कोई आईना, कोई जिन्न, कोई सात रातें…"

"सात रातें, इसलिए कि सात आसमान हैं और सात ज़मीनें," मौलवी ने सरल लहजे में कहा, जैसे बच्चे को पहेली समझा रहे हों। "जिन्न जब किसी का नाम पकड़ लेता है, तो उसे सात रातों में अपनी जगह देने के लिए खींचता है। पहली रात बुलावा, दूसरी रात आहट, तीसरी रात दर्शन। चौथी रात से वह इंसान की परछाईं को ढीला करना शुरू करता है। पाँचवीं रात आवाज़ छीनता है। छठी रात यादें। और सातवीं रात…"

"सातवीं रात?"

"सातवीं रात बुलाने वाला आईने के भीतर होता है, और जिन्न बाहर। बाहर आकर वह तुम्हारे चेहरे, तुम्हारी आवाज़, तुम्हारी हर याद को पहन लेता है। उसके और तुम्हारे बीच फ़र्क़ बस इतना रह जाता है कि वह मुस्कुराता कुछ ज़्यादा है, और पलकें कम झपकाता है।"

फ़िरोज़ के कानों में कल रात का वह चौड़ा, झूठा, खिंचा हुआ अक्स गूँज गया।

"क्या कोई रास्ता नहीं?"

"रास्ता है," मौलवी ने डायरी का एक पन्ना खोलकर उसके सामने रखा। उस पर कोई अरबी-सी लिपि में एक नक़्शा बना था, तीन गोले, एक-दूसरे को काटते हुए। "बाबा ने उसे बाँधने के लिए तीन नामों का इस्तेमाल किया था। जिन्न का असली नाम। उसे क़ैद करने वाले का नाम। और बुलाने वाले का अपना नाम। पर तीनों नाम एक साथ, एक ही साँस में, पूरे चाँद की रात, मूल आईने के सामने, और बोलने वाला…" वे ज़रा ठहरे, "…जो ऐसा हो जो अपने अक्स का सौदा करने को तैयार हो।"

मीरा ने तुरंत पूछा: "यानी क्या?"

"यानी जो उसे बाँधे, उसे अपनी शक्ल की क़ीमत देनी होगी। इसकी बारीकियाँ मुझे नहीं पता। डायरी का वह हिस्सा मेरे पास नहीं।"

"और जिन्न का असली नाम?" फ़िरोज़ ने पूछा। "वह क्या है?"

मौलवी ने डायरी बंद कर दी। कमरे में एकदम ख़ामोशी हो गई। फिर उन्होंने बहुत धीमे से कहा: "मैं वह नाम नहीं ले सकता। मैंने इस उम्र तक उसे अपनी ज़बान पर नहीं आने दिया। जो नाम लेता है, वह उसके बुलाने वालों में गिना जाता है।"

"तो कैसे…"

"दो और बातें हैं," मौलवी ने दोनों के बीच नज़र डाली। "पहली, उसका नाम पूरा किसी एक के पास नहीं। बाबा ने उसे दो हिस्सों में बाँटकर छिपाया था। एक हिस्सा इस डायरी में, दूसरा ठाकुर ख़ानदान के पास।"

"ठाकुर?" मीरा के चेहरे पर बिजली-सी कौंधी। "भानुप्रताप सिंह के पास?"

"उनके दादा, भानुदत्त सिंह, उस रात बाबा के साथ थे। उन्होंने नाम का दूसरा हिस्सा अपने पास रखा। और दूसरी बात…" मौलवी ने फ़िरोज़ की ओर देखा, "…जो भी तुम्हारे पास बचा हुआ है, चार रातें, उन्हें समझदारी से ख़र्च करो। चौथी रात से तुम्हारी परछाईं हल्की होने लगेगी। जब वह पूरी तरह ग़ायब हो जाए, तब तुम्हारे बचने की उम्मीद आधी रह जाती है।"

"मैं भाग सकता हूँ।"

"कोशिश कर लो," मौलवी ने कहा, और उनकी आवाज़ में कोई ताना नहीं था। "रमेश ने भी की थी।"

शाम चार बजे तक फ़िरोज़ ने अपना सारा सामान समेट लिया। वह हवेली नहीं गया। रहीम चाचा से उसने क़र्ज़ लेकर एक झोला ख़रीदा, कुछ कपड़े, ज़रूरी चीज़ें, बाक़ी सब उसने वहीं छोड़ दिया: लैपटॉप, रिकॉर्डर, वह सब जो उसके पेशे की पहचान था। उसने ज़ोया को फ़ोन किया, तो पहली घंटी पर ही उठ गया।

"भाई!"

"सुन, मैं आज रात दिल्ली लौट रहा हूँ।" उसकी आवाज़ ख़ुद उसे अजनबी लगी, बहुत समतल। "बस, घर ख़ाली करके चलता हूँ। यहाँ का काम नहीं बन रहा।"

"आज रात?" ज़ोया की आवाज़ में राहत और उलझन एक साथ थी। "मैं स्टेशन आ जाऊँगी!"

"नहीं, पहुँचकर बताऊँगा। तू बस…" वह रुका। "ज़ोया, एक बात। अगर मैं किसी दिन तुझे फ़ोन करूँ, और मेरी आवाज़ में कुछ अजीब लगे, तो एक सवाल पूछना।"

"कौन-सा?"

"कि तूने पाँचवीं क्लास में सबसे प्यारी चीज़ मुझसे क्या माँगी थी। जवाब सिर्फ़ मुझे और तुझे पता है।"

"भाई, यह क्या…"

"बस याद रखना।" उसने फ़ोन काट दिया, उसका गला भर आया था। उसे लगा कि वह कुछ ऐसा कर रहा है जो कभी लौटकर नहीं आएगा, कि यह फ़ोन कॉल एक विदाई है, उस बहन से जो उसकी पूरी दुनिया थी।

रहीम चाचा ने झोले में दो रोटियाँ और अचार बाँध दिया। चाचा की आँखें गीली थीं। "रमेश भी इसी सड़क पर गया था," उन्होंने कहा। "पर मैं तुझसे नहीं कहूँगा कि मत जा। जा, और अगर निकल गया तो पलटकर मत देखना।"

फ़िरोज़ ने उनके पाँव छुए। चाचा ने उसके सिर पर हाथ फेरा।

सूरज ढल रहा था। सड़क पर वह तेज़-तेज़ क़दमों से चला। गाँव का आख़िरी घर पीछे छूटा। दोनों तरफ़ वही बबूल की झाड़ियाँ और कटे हुए खेत। उसने बस के मोड़ का रास्ता पकड़ा, वह मोड़ जहाँ से तीन दिन पहले उतरा था।

पाँच मिनट। दस मिनट। पन्द्रह।

सड़क सीधी थी, चौड़ी। हाईवे का बोर्ड दूर चमक रहा था, आधा मिटा हुआ: "धुं…लपुर, 2 कि.मी."

फ़िरोज़ ठिठक गया। वह बोर्ड उसे पहले नज़र आया था, जब वह बस से उतरा था। और जब वह गाँव में घुसा था, तब बोर्ड पीछे रह गया था। अब वह बोर्ड उसके आगे था। 2 कि.मी.

उसने दौड़ना शुरू किया।

बोर्ड पास आया, फिर और पास, फिर उसके बराबर से निकल गया, और उसके ठीक बाद सड़क एक मोड़ ले गई। मोड़ के पार, हाईवे के बजाय, उसे दिखे कच्चे मकानों की छतें, और उनके पीछे एक विशाल बरगद का पेड़।

"नहीं," उसने फुसफुसाया।

उसने पीछे घूमकर देखा। सड़क पीछे भी वैसी ही थी, सीधी, ख़ाली। उसने दूसरी दिशा पकड़ी, खेतों के बीच से, पगडंडी पर, मगर खेत एक के बाद एक पार होते रहे और हर बार आख़िर में वही बबूल, वही कटी ज़मीन, और दूर वही बरगद।

साँस फूलने लगी। हर क़दम पर उसे अपने कंधे के पीछे किसी के पैरों की आहट महसूस हो रही थी, पर जब भी वह घूमता, पीछे कोई नहीं होता।

"…बुलाने वाला कहीं नहीं जाता…"

यह किसी ने नहीं कहा था। यह उसकी अपनी याद थी।

वह घुटनों पर हाथ रखकर हाँफता हुआ रुका। साँझ गहरी हो चुकी थी। आसमान बैंगनी से स्याह की तरफ़ बढ़ रहा था। दूर गाँव की इक्का-दुक्का बत्तियाँ टिमटिमा रही थीं।

वह फिर से बरगद के सामने खड़ा था।

हवेली उसके पीछे थी। गुंबद के नीचे की छोटी गोल खिड़की में हल्की-सी चमक थी, मानो कोई वहाँ से इंतज़ार कर रहा हो।

"हार गया," फ़िरोज़ ने कहा, और उसके शब्द भारी थे, जैसे पत्थर। "हार गया।"

पैरों की आहट सुनकर वह चौंका। गाँव की तरफ़ से कोई दौड़ता आ रहा था, जल्दी-जल्दी, हाँफता हुआ। बरगद की छाया से निकलकर जो आकृति सामने आई, वह मीरा थी, चोटी खुली, आँचल कंधे से ढलका हुआ, और उसके हाथ में एक लालटेन।

"मौलवी साहब ने कहा था तुम्हें कोई नहीं रोक सकता," उसने हाँफते हुए कहा। "पर मैंने सोचा, कम से कम तुम्हें अकेले नहीं लौटने दूँगी।"

"मैं भाग नहीं पाया।"

"मुझे पता है।" मीरा ने उसके बग़ल में आकर लालटेन ऊँची की। "मैंने भी अपने पिता को…" उसने बात अधूरी छोड़ दी। फिर उसकी नज़र ज़मीन पर पड़ी, और वह बात बीच में ही रुक गई।

"फ़िरोज़," उसने बहुत धीरे से कहा।

"क्या?"

"अपने पैरों के पास देखो।"

फ़िरोज़ ने नीचे देखा।

लालटेन की पीली रोशनी में मीरा की परछाईं ज़मीन पर साफ़ पड़ी थी, लंबी और गहरी। उसकी अपनी परछाईं, उसके पैरों के नीचे से शुरू होती हुई, बहुत हल्की थी। इतनी हल्की कि उसकी आकृति के भीतर से सूखी घास की नोकें दिख रही थीं, जैसे पानी पर तेल की पतली-सी परत। और जैसे-जैसे वह देखता रहा, वह और फीकी होती गई।

"यह… यह रोशनी की वजह से…"

"नहीं।" मीरा ने लालटेन उसके दाईं ओर करके देखा, फिर बाईं ओर। परछाईं हर बार हल्की ही थी। फिर, जैसे किसी ने धीरे से हाथ से उसे पोंछ दिया हो, वह किनारों से मिटने लगी। पहले हाथ, फिर पैर, फिर सिर। एक पल को उसकी बिना बाँहों वाली, धुँधली-सी आकृति ज़मीन पर काँपी, और फिर बिलकुल ग़ायब हो गई।

फ़िरोज़ के पैरों के नीचे सिर्फ़ सूखी मिट्टी थी।

उसने घबराकर इधर-उधर पैर मारे। लालटेन की रोशनी में मीरा की परछाईं नाच रही थी, पर उसके पास खड़े आदमी की परछाईं कहीं नहीं थी। जैसे वह वहाँ था ही नहीं।

उसी पल पीछे से एक नन्हा, फटा हुआ, डर से भरा हुआ चीख़ने का स्वर गूँजा।

"भैया!"

छोटू बरगद की जटाओं के पास खड़ा था, दोनों हाथ अपने मुँह पर रखे हुए, आँखें पूरी चौड़ी। वह काँप रहा था, और उसकी हर साँस के साथ उसकी पतली छाती धौंकनी की तरह उठ-गिर रही थी।

"भैया, आपकी परछाईं…" उसकी आवाज़ टूट गई, "…वो ले गया! मैंने देखा! वह ऊपर से उतरा, आपके पैरों से खींचकर ले गया… वह काला आदमी… वह आदमी हँस रहा था!"

फ़िरोज़ ने सिर उठाकर हवेली की ओर देखा।

गुंबद की उस छोटी, गोल खिड़की में, जहाँ अभी तक हल्की-सी चमक थी, अब कुछ और था। एक आकृति, जिसका सिर्फ़ ऊपरी हिस्सा दिखाई दे रहा था। और उसके हाथ में, काँच के पीछे से पकड़कर हवा में लहराई गई, एक लंबी, पतली, गहरी काली चीज़ थी, जो किसी इंसान की परछाईं जैसी दिख रही थी।

आकृति ने उसे ऊपर उठाया, जैसे कोई जीती हुई ट्रॉफ़ी दिखाता है। और फिर, धीरे से, उसे अपने कंधे पर डाल लिया, जैसे कोई चोग़ा।

खिड़की के पीछे दो जलते हुए अंगारे एक पल को चमके, और फिर बुझ गए।

(अगले एपिसोड में जारी…)

Writer
firoj saifi
Story
जिसने नाम पुकारा
Chapter
4 of 10
Category
Jinn & Spirits
Reading time
17 min
Words
3242
Language
Hindi (हिंदी)
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