Pretika › Jinn & Spirits › जिसने नाम पुकारा
एपिसोड 5: अदला-बदली
firoj saifi · Jinn & Spirits · 16 मिनट
उस रात फ़िरोज़ को हवेली नहीं ले जाया गया। उसे मीरा के कमरे में ले जाया गया।
यह फ़ैसला किसी ने सोच-समझकर नहीं किया था। बरगद के नीचे, जब छोटू की चीख़ ख़त्म हुई और गुंबद की खिड़की का वह अँधेरा आकार ग़ायब हो गया, तब मीरा ने एक पल के लिए फ़िरोज़ की ओर देखा, उसके पैरों के नीचे की ख़ाली मिट्टी को देखा, और बिना कुछ कहे उसका हाथ पकड़ लिया। उसकी पकड़ मज़बूत थी, किसी ऐसे इंसान की जिसने बहुत पहले तय कर लिया था कि इस बार वह किसी को अकेला नहीं छोड़ेगी।
"चलो," उसने कहा। "आज की रात तुम मेरे यहाँ रहोगे।"
"मीरा, मैं वहाँ…"
"तुम वहाँ नहीं जाओगे। और अगर जाना भी पड़ा, तो मेरे साथ।"
रहीम चाचा भी उनके पीछे-पीछे चले आए थे, टपरी की लालटेन हाथ में, और छोटू उनके पीछे, उनकी कुर्ती को पकड़े हुए। गाँव में उस वक़्त तक ख़बर फैल चुकी थी कि दिल्ली वाले की परछाईं ग़ायब हो गई है। कुछ औरतें दरवाज़ों के पीछे से झाँक रही थीं। किसी ने जल्दी से किवाड़ बंद किया। पर एक बुढ़िया चुपचाप बाहर आई, नीम की एक डाल तोड़ी और फ़िरोज़ की चौखट के आगे रख दी, बिना कुछ बोले, और लौट गई।
मीरा के कमरे का सारा सामान वहीं था, चारपाई, अलमारी, किताबें, पर अब उसने उसमें कुछ बदलाव कर दिए। खिड़की पर गीला कपड़ा डाल दिया। दरवाज़े के नीचे नमक की मोटी लकीर खींच दी। दीवार पर टँगे छोटे-से आईने को उतारकर उलटा करके अलमारी में डाल दिया। फिर उसने फ़िरोज़ की ओर देखा।
"अपने आप को चारपाई से बँधवा लो।"
"क्या?"
"तीसरी रात तुम्हें किसने ऊपर चढ़ाया था? तुम्हारे अपने पैरों ने।" मीरा की आवाज़ सपाट थी। "मौलवी साहब ने बताया है कि चौथी रात से वह परछाईं खींचता है। परछाईं तुम्हारी वह डोर है, जिससे वह तुम्हें खींचेगा। इसलिए कोई चीज़ तुम्हें रोक कर रखे, वरना…"
फ़िरोज़ ने बिना बहस किए हाथ आगे कर दिए। रहीम चाचा ने सूती रस्सी से उसकी कलाइयाँ और पैर चारपाई के पायों से बाँध दिए। गाँठ ऐसी लगाई जैसे ख़ुद ख़ुद के बेटे के लिए लगा रहे हों। छोटू एक कोने में पालथी मारकर बैठ गया और उसने अपनी आँखें दरवाज़े पर टिका दीं।
"मैं जगा रहूँगा, भैया," उसने कहा।
"तू सो जा, पहलवान।"
"नहीं। मुझे वह दिखता है। बाक़ी लोगों को नहीं दिखता।"
वे चारों पूरी रात जागे। रहीम चाचा ने तस्बीह फेरी, मीरा ने चूल्हे पर चाय चढ़ाई, फ़िरोज़ ने बँधे हाथों से छत को देखा। रात के बारह बजे के आसपास कमरे की हवा धीरे-धीरे ठंडी होने लगी। फ़िरोज़ ने अपने पैरों की उँगलियाँ महसूस कीं, वे अपने आप खिंच रही थीं, जैसे किसी ने उन पर अदृश्य धागा बाँध दिया हो और दूर से कोई धीरे-धीरे खींच रहा हो। रस्सियाँ कस गईं। उसके कंधे चारपाई की रस्सी से रगड़ खाने लगे।
"वह खींच रहा है," उसने दाँत भींचकर कहा।
"पकड़े रहो!" मीरा ने उसके कंधे थाम लिए। "बस सुबह तक। सुबह तक!"
चार बजे के क़रीब वह खिंचाव अचानक ढीला पड़ गया। जैसे किसी ने जी भरकर कोशिश कर ली हो और फिर मुस्कुराकर छोड़ दिया हो। फ़िरोज़ ने ज़ोर की साँस छोड़ी। उसकी पीठ पसीने से भीगी हुई थी, कलाइयों पर रस्सी के गहरे निशान थे।
छोटू कोने में सिकुड़ा सो चुका था, उसका सिर घुटनों पर टिका था।
"चौथी रात गई," मीरा ने धीमे से कहा।
"तीन बाक़ी," फ़िरोज़ ने कहा। और तब उसने महसूस किया कि उसकी आवाज़ में एक हल्का-सा अंतर था। जैसे कोई वाक्य कहने के बाद, उसकी गूँज एक पल देर से लौट रही हो।
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दिन में दादी अमीना बी आईं।
वे अपनी बहू का हाथ थामे, लाठी टेकती, कमरे के दरवाज़े पर आकर रुकीं। उनकी सफ़ेद-सी आँखें फ़िरोज़ के चेहरे से ज़रा बाईं ओर ठहरी हुई थीं, पर उनकी बातों में वही तेज़ धार थी।
"मीरा, बिटिया," उन्होंने कहा, "लड़के को बैठा। और तू, ज़रा पास आ।"
फ़िरोज़ चारपाई पर बैठा था, रस्सियाँ खोली जा चुकी थीं। दादी ने उसकी हथेली अपने हाथ में ली और उँगलियाँ उसकी नब्ज़ पर रखीं, ठीक वहाँ जहाँ निशान था। वे देर तक चुप रहीं।
"आवाज़ भी लेगा," उन्होंने कहा।
"आवाज़?"
"पाँचवीं रात। फिर यादें। उसके बाद जो बचा, उस पर वह ख़ुद बैठ जाता है, जैसे कोई ख़ाली घर में बस जाए।" दादी के होंठ हिले। "बेटा, एक बात ग़ौर से सुन। जिन्न झूठ नहीं बोलता। यह बात किसी कहानी में नहीं, ख़ुद मैंने देखी है। मेरे बचपन में उसने मेरी बुआ से कहा था, *तू लौट आएगी।* और बुआ लौट आई। पर तीन दिन की लाश बनकर।"
फ़िरोज़ की रीढ़ में ठंडक दौड़ गई।
"वह झूठ नहीं बोलता। वह सच को मरोड़ता है। जो वह कहे, उसके हर लफ़्ज़ को दो बार सुनना। एक बार जैसा वह बोले, एक बार जैसा वह चाहता है कि तू समझे।"
"मैं यह कैसे…"
"जो काम कर सके, वह करना। जो न कर सके, वह दिल में रखना।" दादी ने हाथ छोड़ दिया। "मैं बूढ़ी हो चुकी हूँ। मुझे बस इतना पता है कि बाबा हुसैनी ने जब उसे क़ैद किया था, तो उन्होंने जिन्न से कुछ वादा किया था। क्या, यह किसी को पता नहीं। पर उस वादे के सहारे आज भी वह टिका हुआ है।"
"वादा?"
"चल, चल," दादी ने मुँह फेर लिया, जैसे कुछ ज़्यादा कह दिया हो। "बहू, मुझे ले चल।"
वे चली गईं, पर उनकी छाया दरवाज़े पर कुछ देर ठहरी रही।
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पाँचवीं रात को फ़िरोज़ ने मीरा के कमरे में पहली बार अपनी आवाज़ खोई।
इसकी शुरुआत सहज लगी थी। शाम को खाना खाते हुए उसने रहीम चाचा से कुछ कहा, और ख़ुद ही उसे अपना वाक्य दो बार सुनाई दिया। पहली बार जैसा वह बोला, दूसरी बार जैसे किसी और के मुँह से, ज़रा देर से, एक सेकंड पीछे। जैसे कमरे में एक और फ़िरोज़ मौजूद था, जो उसके शब्द दोहरा रहा था।
मीरा ने उसे देखा, और फ़िरोज़ ने पलकें झुका लीं।
आधी रात होते-होते वह बोल नहीं पा रहा था। उसने मुँह खोला तो होंठ हिले, जीभ हिली, गले से हवा निकली, पर आवाज़ बनी ही नहीं। जैसे किसी ने उसके गले से आवाज़ को खींचकर निकाल लिया हो और उसे किसी दूसरी जगह टाँग दिया हो।
उसने घबराकर अपना गला पकड़ा। मीरा ने तुरंत उसके सामने काग़ज़ और पेंसिल रख दी। फ़िरोज़ ने काँपते हाथों से लिखा:
*"आवाज़ चली गई।"*
"मुझे पता है," मीरा ने कहा। "हम जानते थे।"
*"और कुछ?"* उसने लिखा।
"अब सिर्फ़ यादें बची हैं।" मीरा ने उसकी आँखों में देखा। "फ़िरोज़, मैं तुमसे वादा करती हूँ। जो होगा, उसे मैं याद रखूँगी, तुम्हारी तरफ़ से। मैं सब लिख लूँगी।"
तभी दरवाज़े पर किसी ने हल्के से खटखटाया।
कमरे में सब थम गए। रहीम चाचा ने तस्बीह रोक दी। छोटू के हाथ फ़िरोज़ की क़मीज़ के किनारे पर कस गए।
खटखटाहट फिर आई। तीन बार, धीमे, विनम्र।
और फिर दरवाज़े के बाहर से एक आवाज़ आई।
"मीरा, दरवाज़ा खोलो। मैं हूँ। फ़िरोज़।"
वह फ़िरोज़ की आवाज़ थी। बिलकुल वैसी, जैसे उसके गले में हुआ करती थी, तंज़ और थकान के बीच की, ज़रा-सी भर्राई हुई। वही लहजा, वही रुक-रुककर बोलना। फ़िरोज़ ने अपने ही कानों पर यक़ीन करने की कोशिश की, पर उसके होंठ बंद थे, और आवाज़ बाहर से आ रही थी।
"मुझे अंदर आने दो," आवाज़ ने कहा। "वह जा चुका है। देखो, मेरी परछाईं भी लौट आई है।"
फ़िरोज़ का हाथ मीरा की कलाई पर कस गया। उसने सिर हिलाया, ज़ोर से, बार-बार।
"मैं जानती हूँ," मीरा ने दबी आवाज़ में कहा। उसके चेहरे पर पसीना था, पर आँखें साफ़ थीं। उसने ऊँची आवाज़ में दरवाज़े की ओर बोला: "फ़िरोज़, अगर तुम सच में फ़िरोज़ हो तो मुझे बताओ। हम सबने पहली बार जब चाय पी थी, तुमने क्या कहा था?"
दरवाज़े के पार कुछ पल ख़ामोशी रही। फिर वह आवाज़ आई, और अब उसमें हल्की-सी हँसी थी।
"तुम बहुत होशियार हो, मीरा। बिलकुल अपने पिता जैसी।"
मीरा का रंग उड़ गया।
"उसने भी यही सवाल पूछा था मुझसे," आवाज़ ने कहा, और यह आवाज़ अब फ़िरोज़ की नहीं रही थी। उसकी तह में कोई और बोल रहा था, कुछ पुराना, कुछ लंबा, कुछ भूखा। "बीस साल पहले।"
छोटू ने अपनी दोनों हथेलियाँ कानों पर दबा लीं और ज़ोर से चीख़ पड़ा। रहीम चाचा ज़ोर-ज़ोर से दुआ पढ़ने लगे। दरवाज़ा किसी ने अंदर से नहीं खटखटाया, पर नमक की लकीर पर, फ़र्श पर, ऐसा लगा जैसे किसी ने बिना हाथ के उँगलियाँ फेर दी हों। नमक के दाने काँपे और हल्की सफ़ेद धुंध बनकर उड़ गए।
फिर आवाज़ बंद हो गई।
कमरे में सिर्फ़ चार दिलों की धड़कन बची रही।
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छठा दिन गाँव ने सहम-सहमकर बिताया।
फ़िरोज़ ने हर वह काम किया जो एक बे-आवाज़, बे-परछाईं आदमी कर सकता था। उसने अपने काग़ज़ पर सब कुछ दर्ज किया। एक-एक तथ्य, एक-एक तारीख़, जो उसे याद था। चार पन्ने भरे, फिर आठ। मीरा उसके पास बैठी उन्हें पढ़ती और अपनी कॉपी में उतारती रही। मौलवी क़ासिम आए, उन्होंने डायरी के वे पन्ने दोबारा पढ़े और कुछ उर्दू के अक्षर मीरा को समझाए। रहीम चाचा ने गाँव के सबसे पुराने लोगों से मिलकर हर तरह की सुनी-सुनाई बातें जुटाईं।
पर फ़िरोज़ को पता था कि यह सब कुछ अधूरा है। उसके सिर में एक गहरी धुंध बन रही थी। सुबह उठने पर उसे अपने कमरे का दरवाज़ा याद नहीं आया। फिर, एक पल के लिए, उसने मीरा का नाम पूछना चाहा, पर उसके होंठ बिना आवाज़ के हिले।
आख़िर में उसने काग़ज़ पर लिखा: *"मुझे जल्दी भूलना शुरू होगा। मुझे बताओ, ज़ोया का जवाब क्या है?"*
मीरा ने भौंहें सिकोड़ीं। "कौन-सा जवाब?"
*"मैंने उससे कहा था कि अगर मेरी आवाज़ अजीब लगे तो पूछना कि पाँचवीं क्लास में उसने मुझसे क्या माँगा था। मुझे जवाब याद है। मैं तुम्हें लिखकर देता हूँ, पर जब तक मैं अपना नाम भूल जाऊँ, उसे बचाकर रखना।"*
उसने एक पन्ना फाड़ा और काँपते हाथों से लिखा।
*"नीला काँच का कंचा। जिसमें बादल क़ैद लगता था। अब्बू ने मुझे दिया था, और मैंने उसे दे दिया।"*
मीरा ने पन्ना तह करके अपने ब्लाउज़ के भीतर रखा। "मैं इसे ज़ोया को दूँगी, अगर ज़रूरत पड़ी।"
*"और उसे बताना…"* फ़िरोज़ ने लिखा, और क़लम रुक गई। उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं। उसके भीतर एक चीज़ टूट रही थी, जिसे वह पकड़ नहीं पा रहा था। *"…कि मैंने अपना वादा नहीं तोड़ा। मैं अकेला नहीं छोड़ना चाहता था। मैं बस…"*
मीरा ने क़लम उसके हाथ से ले ली। "बस।" उसने कहा। "अभी मत लिखो। तुम कहोगे तो मैं सुनूँगी, पर लिखो मत। जिस दिन तुम ख़ुद कहने लायक होगे, अपने मुँह से कहना।"
छठी रात बीती। फ़िरोज़ को अपनी बहन की शक्ल याद आई, फिर धुँधली पड़ गई। उसे अपने पिता की आवाज़ याद आई, फिर नहीं। सुबह तक उसे दिल्ली का वह फ़्लैट याद नहीं रहा जिसमें उसने छह साल बिताए थे। बस कुछ टुकड़े बचे थे: एक कंचा, एक बादल, एक हँसी।
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सातवें दिन की शाम को उसने ज़ोया को फ़ोन किया।
मीरा ने फ़ोन उसके हाथ में थमाया और कहा: "बोल नहीं पाओगे। मैं बोलूँगी।"
पर फ़िरोज़ ने सिर हिला दिया। उसने फ़ोन कान से लगाया, गला साफ़ किया, और बहुत कोशिश करके, गले की गहराई से एक पतली, काँपती हुई आवाज़ खींच ली। आवाज़ में कुछ भी नहीं था। न शब्द, न सुर। सिर्फ़ हवा की सरसराहट।
"…ज़ो…या…"
"भाई?" उधर से तुरंत आवाज़ आई। "भाई, तुम कहाँ हो? नौ बजे से तुम्हारा फ़ोन नहीं लग रहा! मैंने स्टेशन पर इंतज़ार किया! तुमने कहा था रात को निकलोगे!"
फ़िरोज़ की आँखें भर आईं।
"भाई, बोलो न। तुम्हारी आवाज़… क्या हुआ है? तुम बीमार हो? मैं आ रही हूँ। मैं आज रात ही निकल रही हूँ।"
"नहीं…" फ़िरोज़ की सरसराहट आवाज़ बनी, टूटी-टूटी। "नहीं… मत आना… पढ़…"
"भाई…"
"सुन।" उसने कहा, और उस एक शब्द में पता नहीं कहाँ से इतनी ताक़त आ गई कि ज़ोया चुप हो गई। "तू बहुत अच्छी है। मैंने कभी कहा नहीं… मैं… तुझ पर बहुत गर्व करता हूँ।"
"भाई, तुम ऐसे क्यों बोल रहे हो, जैसे…"
"और वह कंचा," फ़िरोज़ ने जैसे हँसने की कोशिश की, "वह… मैंने तुझे ख़ुशी से दिया था।"
उसने फ़ोन काट दिया। इसके बाद हाथ से फ़ोन गिर गया और वह मीरा की गोद में सिर रखकर चुपचाप रोने लगा, बिना आवाज़ के, जैसे बच्चे रोते हैं जब उन्हें पता हो कि चीख़ने से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा।
मीरा ने उसके बालों में उँगलियाँ फेरीं। उसके अपने गाल पर भी आँसू थे, पर उसने कुछ नहीं कहा।
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सातवीं रात, फ़िरोज़ ने ख़ुद फ़ैसला किया।
"नहीं," मीरा ने कहा। "मैं तुम्हें नहीं जाने दूँगी।"
*"चारपाई पर बाँधे रखोगी?"* उसने काग़ज़ पर लिखा। *"वह खींच रहा है, मीरा। आज की रात मेरी जान नहीं बचेगी, चाहे कुछ भी करो। पर अगर मैं अपने पैरों से जाऊँ, तो कम से कम मैं देख पाऊँगा कि वह मेरे साथ क्या करता है। शायद कोई रास्ता दिख जाए।"*
"तुम पागल हो।"
*"पत्रकार हूँ। फ़र्क़ बहुत कम है।"* वह मुस्कुराया। यह उसकी आख़िरी मुस्कान थी, और उसे ख़ुद इसका अंदाज़ा था।
रहीम चाचा ने उसके सिर पर हाथ रखा और दुआ पढ़ी। छोटू ने अपने गले से एक नीला धागा उतारा, पहले वाले के टुकड़े अब भी उसकी कलाई पर थे, और फ़िरोज़ के पास रख दिया। मौलवी क़ासिम ने डायरी उसके हाथ में थमाई। "इसे अपने पास रखो। यह तुम्हारे साथ जाएगी।"
*"आईने के अंदर?"*
"जहाँ तुम जाओगे, उसका हिस्सा जाएगा। बाबा की स्याही आईने के पार भी जाती है।"
वे चारों, मीरा, रहीम चाचा, मौलवी क़ासिम और छोटू, फ़िरोज़ के साथ चले। गाँव के बाहर, बरगद के नीचे, अँधेरे में, आसमान पर चाँद नहीं था। हवेली के सामने की सीढ़ियों तक सब साथ आए, पर फाटक के पार एक अदृश्य दीवार थी।
मीरा का हाथ फाटक के सामने जाकर ठहर गया, जैसे किसी काँच की दीवार से टकराया हो। उसने ज़ोर लगाया। रहीम चाचा ने ज़ोर लगाया। मौलवी साहब ने दुआ पढ़कर हाथ बढ़ाया, पर उनकी उँगलियाँ भी हवा में टिक गईं।
"सिर्फ़ तुम," मौलवी साहब ने हाँफते हुए कहा। "बुलाने वाले के अलावा आज रात कोई अंदर नहीं जा सकता।"
फ़िरोज़ ने पलटकर सबको देखा। मीरा की आँखें भरी थीं। छोटू ने पैर पटके और ज़ोर से रोने लगा। रहीम चाचा का होंठ काँप रहा था।
फ़िरोज़ ने हाथ उठाया, जैसे अलविदा कहते हैं, और फाटक के भीतर चला गया।
आँगन अँधेरा था, पर नीम की सूखी पत्तियाँ अपनी जगह पर थीं। हौज़ के सूखे किनारे पर वही गोल पत्ते बिखरे थे। ऊपर, गुंबद के नीचे, दरवाज़ा खुला था और भीतर से वही नीली, ठंडी रोशनी उतर रही थी। उसकी रोशनी में आँगन के पत्थर काँप रहे थे।
उसने सीढ़ियाँ चढ़ीं। इस बार किसी ने उसे खींचा नहीं। वह ख़ुद चढ़ा। हर पायदान की चर्र को उसने गिना, एक, दो, तीन। नवाब जहाँगीर अली की तस्वीर का चेहरा अब ख़ाली था, आँखें अंधी, जैसे किसी ने उसकी आत्मा निकाल ली हो।
गुंबद वाला कमरा। काला आईना। उसकी सतह पर वही नीली चमक।
और उसके सामने, फ़र्श पर, धूल की जगह एक नर्म, काली, घुटी हुई-सी चीज़ बिछी थी: उसकी अपनी परछाईं, जो वहाँ लेटी थी, जैसे पालतू कुत्ता अपने मालिक का इंतज़ार करता है।
*"…आ गया…"* आवाज़ ने कहा, और अब वह सिर्फ़ आईने से नहीं, पूरे कमरे से, दीवारों से, छत से आ रही थी। *"…तू बहुत बहादुर निकला, फ़िरोज़… इतना कि मुझे तुझ पर तरस आ रहा है…"*
फ़िरोज़ ने मुँह खोला, पर आवाज़ नहीं निकली। उसने डायरी छाती से चिपकाई।
*"…तुझे डर नहीं लग रहा?"* जिन्न की आवाज़ में सच्ची जिज्ञासा थी। *"…तू काँप रहा है, पर भाग नहीं रहा… लोग मुझसे डरकर या तो रोते हैं या भागते हैं…"*
फ़िरोज़ ने जेब से वही पेंसिल और काग़ज़ निकाला, और घसीटते हुए लिखा, पन्ना आईने की ओर उठाकर।
*"तुम अकेले हो?"*
कमरे में सन्नाटा छा गया।
आईने की नीली रोशनी हल्की पड़ी। जलते अंगारे जैसी आँखें, जो अब तक बहुत तेज़ चमक रही थीं, एक क्षण को धीमी हुईं। और जिन्न की आवाज़, जो अब तक भारी और मखमली थी, किसी बहुत थकी हुई, बहुत पुरानी चीज़ की तरह धीमे बोली।
*"…तू पहला है… जिसने पूछा…"*
फिर वह हँसा, और यह हँसी पहले जैसी नहीं थी। इसमें कड़वापन था, पर उसके नीचे कुछ और भी था जिसे फ़िरोज़ ने सुना और याद रखा।
*"…पर यह सवाल तुझे नहीं बचाएगा…"*
आईने की सतह पानी की तरह हिलने लगी।
वही लंबा, पतला, काला हाथ उसकी सतह को तोड़कर बाहर निकला। इस बार वह धीरे-धीरे नहीं आया। एक झटके में आगे बढ़ा और फ़िरोज़ की बाईं कलाई पकड़ ली, ठीक उसी निशान पर। निशान जल उठा।
फ़िरोज़ चीख़ा, बिना आवाज़ के। डायरी उसके हाथ से छूटकर गिरी। उसने पैर जमाए, ज़ोर लगाया, पर कोई फ़ायदा नहीं हुआ। उसके पैर फ़र्श पर घिसटते हुए आईने की ओर खिंचे। उसकी परछाईं, जो अब तक फ़र्श पर लेटी थी, उठ खड़ी हुई और आईने की ओर पहले ही चली गई, जैसे किसी हुक्म की तामील कर रही हो।
सतह उसकी हथेलियों से टकराई। वह ठंडी थी, इतनी कि जला डाले। उसने उसे धकेलने की कोशिश की, पर काँच पानी हो चुका था। उसके हाथ उसमें धँसे, फिर कंधे, फिर चेहरा। एक पल को उसने पीछे देखा, कमरे का दरवाज़ा, नीचे की सीढ़ियाँ, फाटक के पार खड़े लोग, जो सब बहुत दूर और बहुत छोटे दिखने लगे। उसने अपना नाम पुकारना चाहा, पर नाम ग़ायब हो चुका था।
फिर ठंडक उसके फेफड़ों में भर गई, और सब कुछ उलट गया।
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मीरा ने फाटक के पार देखा कि गुंबद की खिड़की की नीली रोशनी एक पल के लिए तेज़ हुई, फिर बुझ गई। अदृश्य दीवार धीरे-धीरे पिघल गई। वह पहले दौड़ी। रहीम चाचा और मौलवी साहब पीछे-पीछे चले। छोटू उन सबसे आगे निकल गया।
वे आँगन में पहुँचे ही थे कि सीढ़ियों के ऊपर से, धीरे-धीरे, भारी क़दमों की आवाज़ उतरने लगी।
ठक। ठक। ठक।
सब ठिठक गए।
ऊपर के अँधेरे से एक आकृति निकली। पैर, कंधे, फिर चेहरा। सफ़ेद कमीज़, हल्की दाढ़ी, कलाई पर स्टील की घड़ी। और उसके पीछे, लालटेन की रोशनी में, फ़र्श पर कुछ लंबा और गहरा घिसट रहा था, परछाईं जैसा, पर उसके क़दमों से ज़रा देर से चलता हुआ।
"फ़िरोज़!" मीरा चीख़ पड़ी और दौड़कर उसकी ओर बढ़ी। "तुम ठीक हो? तुम… तुम बच गए?"
आदमी ने सीढ़ियों के आख़िरी पायदान पर क़दम रखा और लालटेन की रोशनी उसके चेहरे पर पड़ी। उसकी आँखें थकी हुई थीं, पर होंठों पर एक मुस्कान थी, गर्म, मित्रवत, राहत से भरी।
"हाँ, मीरा," उसने कहा। उसकी आवाज़ बिलकुल फ़िरोज़ की आवाज़ थी, वही भर्राई हुई, वही थकान भरा तंज़। "मैं ठीक हूँ। सब ठीक है।"
मीरा की साँस छूट गई। उसने उसका हाथ पकड़ लिया। रहीम चाचा ने ठंडी साँस ली। मौलवी साहब की आँखें गीली हुईं।
पर छोटू नहीं हिला। वह आँगन के बीच में ठिठका खड़ा था, उसकी आँखें उस आदमी की परछाईं पर टिकी थीं, फिर उसके चेहरे पर। उसके होंठ धीमे-धीमे हिले, पर आवाज़ नहीं निकली।
आदमी की मुस्कान कान की ओर थोड़ी और खिंच गई।
उसने पलकें नहीं झपकाईं।
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ऊपर, गुंबद वाले कमरे में, काला आईना अब बिलकुल शांत था।
उसकी सतह पर धूल की पतली परत वापस जम रही थी। पर पूरी तरह नहीं। एक जगह वह परत नहीं थी, जहाँ किसी की दो हथेलियाँ भीतर से दबी हुई थीं। उनके पीछे एक चेहरा था, जिसकी आँखें फटी हुई थीं और होंठ पूरी ताक़त से खुले हुए थे। वह किसी को पुकार रहा था। चीख़ रहा था।
पर कमरे में कोई आवाज़ नहीं थी।
*(अगले एपिसोड में जारी…)*
- Writer
- firoj saifi
- Story
- जिसने नाम पुकारा
- Chapter
- 5 of 10
- Category
- Jinn & Spirits
- Reading time
- 16 min
- Words
- 3180
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
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