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एपिसोड 6: उलटी दुनिया
firoj saifi · Jinn & Spirits · 20 मिनट
सबसे पहले ठंड आई।
वह ठंड नहीं जो दिसंबर की सुबह में रज़ाई से बाहर निकलते वक़्त लगती है। यह कोई और ही ठंड थी, जो हड्डियों के अंदर से उठती थी, जैसे किसी ने फ़िरोज़ के सीने में बर्फ़ का एक टुकड़ा रखकर उसे सीकर बंद कर दिया हो। उसने साँस लेनी चाही, और साँस आई तो सही, मगर उसमें हवा का कोई स्वाद नहीं था। न मिट्टी की महक, न पुरानी लकड़ी की, न बारिश की। बस एक सपाट, बेजान ख़ालीपन।
उसने आँखें खोलीं।
सामने छत थी। लकड़ी की कड़ियाँ, जिन पर बरसों की धूल और मकड़ियों के जाले थे। फ़िरोज़ को एक पल के लिए तसल्ली हुई। "चलो, सपना ही था," उसने सोचा। "यही कड़ियाँ तो मेरे कमरे की छत पर थीं। मैं अपने बिस्तर पर हूँ। बस एक बुरा ख़्वाब, ज़्यादा चाय और कम नींद का नतीजा।"
पर वह बिस्तर पर नहीं था। उसकी पीठ के नीचे ठंडा, सख़्त फ़र्श था, और उस फ़र्श पर धूल की एक पतली-सी परत जमी थी, जो उसके कुर्ते की आस्तीन से चिपक गई थी।
वह उठकर बैठा। सिर में हल्का-सा चक्कर आया। उसने अपना गला टटोला, फिर चेहरा, फिर सीना। सब कुछ वहीं था। दो हाथ, दस उँगलियाँ, धड़कता हुआ दिल। "ज़िंदा हूँ," उसने बुदबुदाकर कहा। उसकी आवाज़ कमरे में गूँजी, मगर गूँज ऐसी थी जैसे किसी ने उसे रिकॉर्ड करके उलटा चला दिया हो। एक पल को शब्द जैसे अपने ही होंठों से बाद में निकले।
"ज़िंदा हूँ," उसने फिर कहा, इस बार ज़ोर से, और इस बार आवाज़ ठीक सुनाई दी। उसने राहत की साँस ली। "देखा, फ़िरोज़। थकान है, और कुछ नहीं।"
तभी उसकी नज़र कमरे पर पड़ी, और राहत की वह साँस उसके गले में ही अटक गई।
यह हवेली का ऊपर वाला कमरा था, वही जहाँ उसने हफ़्ते भर पहले काला आईना देखा था। वही ऊँची छत, वही मोटी दीवारें, वही टूटी हुई खिड़की। मगर सब कुछ ग़लत था। हल्का-सा ग़लत, इतना कि एक पल में पकड़ में न आए, और जब पकड़ में आए तो पेट के अंदर कुछ मरोड़ खा जाए।
दरवाज़ा दाईं तरफ़ था। उसे अच्छी तरह याद था कि दरवाज़ा बाईं तरफ़ था। खिड़की जो पहले उसके पीछे थी, अब सामने थी। दीवार पर वह पुरानी दरार, जो ऊपर से नीचे बाईं ओर झुकती हुई जाती थी, अब दाईं ओर झुकी हुई थी, जैसे किसी ने पूरे कमरे की तस्वीर को आईने में देख लिया हो।
फ़िरोज़ ने बहुत धीरे से कहा, "आईने में देख लिया हो..."
और तब उसे सब कुछ याद आया। पूरा सच, एक ही साँस में, जैसे सिर पर किसी ने ठंडा पानी उँडेल दिया हो। काला हाथ। चौथी रात, पाँचवीं, छठी। वह लंबी, जलती आँखों वाली परछाईं। उसकी अपनी आवाज़, जो उसके होंठों से निकल रही थी और उसकी अपनी नहीं थी। और आख़िरी शाम, जब उसने ज़ोया को टूटी-फूटी, बिना आवाज़ वाली आवाज़ में फ़ोन किया था। "तू बहुत अच्छी है... वह कंचा मैंने ख़ुशी से दिया था..." उसके बाद आईने की सतह का पानी बन जाना, और उसके हाथों का उसमें डूब जाना।
वह झटके से खड़ा हुआ और खिड़की की तरफ़ दौड़ा। घुटनों में जान नहीं थी, पर वह दौड़ा।
खिड़की के बाहर धुंधलपुर था।
यानी वह धुंधलपुर जैसा होना चाहिए था। बरगद का पुराना पेड़ वहीं खड़ा था, पर उसकी जटाएँ ऊपर की तरफ़ उठी हुई थीं, जैसे पेड़ उलटा लटका हो और ज़मीन में जड़ों की जगह शाखाएँ धँसी हों। गाँव की कच्ची गलियाँ थीं, मगर बाईं ओर मुड़ने की जगह दाईं ओर मुड़ती थीं। दूर रहीम चाचा की चाय की टपरी का टिन का छप्पर चमक रहा था, पर उसकी चिमनी से धुआँ नीचे की ओर बह रहा था, ज़मीन की ओर, जैसे आसमान उसे सोख न पा रहा हो।
और आसमान।
आसमान में न सूरज था, न चाँद, न तारे। बस एक एकसार, मटमैला भूरा-सलेटी रंग, जैसे पुरानी तस्वीर का नेगेटिव, जिसमें से सारी रोशनी निचोड़ ली गई हो। बादल थे, मगर वे हिलते नहीं थे। हवा नहीं चलती थी। पेड़ों की पत्तियाँ ऐसे लटकी थीं जैसे किसी ने उन्हें काँच में मढ़ दिया हो।
"नहीं," फ़िरोज़ ने कहा। "नहीं, नहीं, नहीं। यह नहीं हो सकता। यह... यह कोई हैल्युसिनेशन है। मुझे ज़रूर कुछ दे दिया गया है। गाँव में कोई चाय में कुछ... नहीं, नहीं, मैंने तो चाय भी..."
उसने अपनी कलाई पर नज़र डाली, वह कलाई जिस पर काली छाप पड़ी थी। छाप अब भी थी, पर अब वह सिर्फ़ छाप नहीं रही थी। वह पाँच उँगलियों का निशान था, और हर उँगली के सिरे पर बहुत बारीक, चाँदी जैसी रेखाएँ चमक रही थीं, मानो काँच में दरार पड़ी हो।
फिर उसकी नज़र घड़ी पर गई।
वह घड़ी ज़ोया ने उसकी पहली तनख़्वाह पर तोहफ़े में दी थी। सस्ती-सी, स्टील की, जिसका काँच बाईं तरफ़ से ज़रा-सा खुरचा हुआ था। उस घड़ी की सेकंड वाली सुई उलटी चल रही थी। टिक, टिक, टिक, घड़ी की दिशा में नहीं, उसके उलट। 12 से 11, 11 से 10। और घड़ी का डायल, उसने ग़ौर से देखा, उसके अंक भी उलटे थे। 3 की जगह एक अजीब-सा गोल मुड़ा हुआ निशान था जो 3 का आईना-अक्स था। और 9 की जगह 9 का उलटा रूप।
"ठीक है," फ़िरोज़ ने ख़ुद से कहा, और उसकी आवाज़ काँप रही थी, पर वह फिर भी चुटकी ली गई। "ठीक है। रिपोर्टर की तरह सोचो। फ़ैक्ट्स। मैं एक कमरे में हूँ जो मेरे कमरे जैसा है पर उलटा है। मेरी घड़ी उलटी चल रही है। आसमान नेगेटिव है। यानी या तो मैं पागल हो गया हूँ, या कोमा में हूँ, या मर गया हूँ। तीनों में से कोई भी अच्छा विकल्प नहीं। बेहतर है पहला वाला चुन लूँ, क्योंकि पागलों का इलाज होता है।"
उसने ख़ुद को चिकोटी काटी। दर्द हुआ। असली, तीखा दर्द।
"ओके। तो पागल भी नहीं। बढ़िया।"
वह हँसा। हँसी बीच में टूट गई।
कमरे के कोने में, जहाँ पहले वह काला आईना रखा था, अब कुछ नहीं था। दीवार थी, सपाट, और दीवार पर कोई निशान तक नहीं था। यही सबसे ज़्यादा डरावना था। जिस आईने की वजह से वह यहाँ था, वह आईना यहाँ से ग़ायब था। जैसे अब वह ख़ुद ही आईने के अंदर था और आईना बाक़ी दुनिया का एक हिस्सा, जो बाहर से देखा जाता है।
उसने दरवाज़े की ओर देखा। दाईं तरफ़। उस दरवाज़े का हैंडल, वही पीतल का पुराना हैंडल, अब बाहर की तरफ़ नहीं, अंदर की तरफ़ घूम रहा था। फ़िरोज़ ने पकड़ा। हैंडल ठंडा था, बर्फ़ जैसा ठंडा। उसने उसे घुमाया, और दरवाज़ा बिना किसी आवाज़ के खुल गया।
हर चीज़ में आवाज़ की कमी थी। यह उसने तब नोटिस किया। उसके क़दम फ़र्श पर पड़ते थे, पर आवाज़ नहीं आती थी। या आती थी, तो आधा सेकंड देर से, जैसे ध्वनि को पहुँचने में वक़्त लगता हो।
सीढ़ियाँ उतरते हुए उसने गिनती की। सोलह सीढ़ियाँ थीं ऊपर जाने के लिए, उसे याद था। अब सीढ़ियाँ उतरते हुए वह गिनता गया, और सोलह पर भी ज़मीन नहीं आई। सत्रह, अठारह, उन्नीस। वह रुक गया। पीछे मुड़कर देखा। सीढ़ियाँ ऊपर तक जा रही थीं, पर ऊपर का दरवाज़ा अब दिखाई नहीं दे रहा था। जैसे वह बहुत दूर हो गया हो।
"वाह," उसने कहा। "मतलब आर्किटेक्चर भी मुझसे मज़ाक कर रहा है।"
बीसवीं सीढ़ी पर ज़मीन आ गई।
नीचे का बड़ा हॉल वैसा ही था जैसा उसने पहली बार देखा था। ऊँचे खंभे, मोटे पर्दे जो सड़कर लटक रहे थे, टूटी झाड़-फ़ानूस, और बीच में एक विशाल मेज़ जिस पर उसने पहले दिन अपना बैग रखा था। बैग अब वहाँ नहीं था। मेज़ पर कुछ नहीं था। मगर मेज़ के चारों ओर लोग खड़े थे।
फ़िरोज़ का क़दम सीढ़ी के आख़िरी पायदान पर ही रुक गया।
वे लोग नहीं थे। कम से कम इंसान तो नहीं। वे धुएँ से बने आकार थे, इंसानी क़द-काठी के, लंबे, पतले, सिर झुकाए हुए, ठीक उस तरह जैसे दोपहर की धूप में किसी दीवार पर परछाईं पड़ती है। फ़र्क़ बस इतना था कि इन परछाइयों को डालने वाला कोई नहीं था। वे अपने-आप में खड़ी थीं, बिना शरीर के, बिना चेहरे के, और उनमें से हर एक का सिर उसी दिशा में झुका था। मेज़ की तरफ़, जैसे किसी भोज में बैठे हों और खाने का इंतज़ार कर रहे हों।
एक-दो नहीं, बीस-पच्चीस। शायद उससे भी ज़्यादा।
फ़िरोज़ ने साँस रोक ली। वह पीछे सरकने लगा।
तभी सबसे नज़दीक वाली परछाईं ने सिर उठाया। उसके पास चेहरा नहीं था, पर फ़िरोज़ को साफ़ महसूस हुआ कि वह उसे देख रही है। उस ख़ाली, काली जगह से, जहाँ चेहरा होना चाहिए था, एक बहुत धीमी आवाज़ निकली, कराह जैसी:
"नाम... "
फ़िरोज़ के रोंगटे खड़े हो गए।
"नाम... नाम..." एक और आवाज़, फिर एक और। पूरा हॉल एक साथ फुसफुसाने लगा। "नाम... नाम... किसी का नाम... कोई नाम दो..."
"मैं... मैं कुछ नहीं जानता," फ़िरोज़ ने गला साफ़ करके कहा। "मैं तो बस... मैं तो रास्ता ढूँढ़ रहा हूँ।"
परछाइयाँ उसकी ओर झुकीं। हवा में एक अजीब-सी हलचल हुई, जैसे किसी ने बहुत से पन्ने एक साथ पलटे हों। और तब फ़िरोज़ ने देखा कि वे उसके पैरों की तरफ़ देख रही हैं।
उसने नीचे देखा।
हॉल के फ़र्श पर, जहाँ खिड़की से वह सलेटी रोशनी पड़ रही थी, उसकी अपनी परछाईं नहीं थी। यह बात उसे चौथे दिन ही पता चल चुकी थी, जब छोटू चीख़ा था। पर यहाँ, इस जगह, बिना परछाईं का होना जैसे एक निशान था। एक घोषणा। परछाइयाँ उसकी ग़ैर-मौजूद परछाईं को सूँघ रही थीं, और उनकी फुसफुसाहट तेज़ होती जा रही थी।
"नया... नया... नया है..."
"भागो," फ़िरोज़ के अंदर किसी ने कहा। उसका पत्रकार वाला दिमाग़ नहीं, उसका पुराना, डरा हुआ, बच्चे जैसा हिस्सा। "भागो, फ़िरोज़!"
वह मुड़ा और सीढ़ियों की तरफ़ दौड़ा, पर पीछे से कुछ ठंडा उसकी कलाई से लिपट गया। वही कलाई, छाप वाली। उसने पूरी ताक़त से झटका दिया। एक परछाईं का धुआँ उसकी उँगलियों के बीच से बह गया, जैसे ठंडा पानी। और तभी, ठीक उसी पल, किसी ने पीछे से उसका कंधा पकड़ा, एक असली हाथ, गर्म, खुरदुरा, इंसानी, और फ़िरोज़ को दीवार के एक अँधेरे गलियारे में खींच लिया।
"चुप!" एक भारी, थकी हुई, फुसफुसाती आवाज़ ने कहा। "ज़रा-सा भी मत हिलना। साँस भी धीरे ले।"
फ़िरोज़ ने अपने मुँह पर किसी की हथेली महसूस की। उसने छटपटाना चाहा, पर वह हाथ मज़बूत था। गलियारे के अँधेरे में उसे सिर्फ़ एक लंबा-सा साया दिखा, जिसके कंधे झुके हुए थे। और साँसें। असली साँसें, गर्म, जिनमें बीड़ी की बहुत पुरानी, बासी महक थी।
कुछ पल तक दोनों दीवार से सटे खड़े रहे। हॉल से परछाइयों की सरसराहट आती रही। फिर वह धीरे-धीरे दूर होती गई, जैसे हवा के साथ कोई ख़ुश्क पत्ते उड़ा ले जाए। आख़िर में सन्नाटा रह गया।
हाथ उसके मुँह से हटा।
"अब चल," आवाज़ ने कहा। "पर बिना शोर किए। यहाँ दीवारें भी सुनती हैं।"
* * *
वह उसे हवेली के पिछवाड़े में बने एक छोटे, तंग कमरे में ले गया। कमरा शायद कभी नौकरों के रहने की जगह रहा होगा। एक छोटी-सी कोठरी, जिसमें एक टूटी खाट थी, एक मिट्टी का घड़ा, कोने में पुराने अख़बारों का ढेर, और दीवार पर, फ़िरोज़ ने ग़ौर किया, बहुत सारी लकीरें खुरची हुई थीं। हज़ारों लकीरें, छोटी-छोटी, पाँच-पाँच के गुच्छों में, जो छत तक चढ़ गई थीं। कुछ लकीरों पर धूल जमी थी, कुछ पर ताज़ा खुरचन के निशान।
कमरे में एक दीया भी था, मिट्टी का, जिसकी लौ बिना हिले-डुले सीधी खड़ी थी, और उस लौ का रंग पीला नहीं, हल्का नीला था।
वह आदमी दरवाज़े का पर्दा गिराकर मुड़ा, और पहली बार फ़िरोज़ ने उसे ठीक से देखा।
वह पचास के आसपास का लगता था, पर शायद उम्र उससे कम ही थी, बस चेहरे पर थकान ने सब कुछ बूढ़ा कर दिया था। लंबा क़द, पर कमर झुकी हुई। बाल बेतरतीब, आधे सफ़ेद, दाढ़ी बढ़ी हुई और उलझी हुई। उसने एक पुराना कुर्ता-पायजामा पहन रखा था, जिसका रंग कभी नीला रहा होगा, अब धुल-धुलकर सलेटी हो गया था। नाक पर एक टूटा हुआ चश्मा था, जिसकी एक कमानी धागे से बँधी थी। और हाथों में, जो बहुत ज़्यादा काम करने से खुरदुरे हो गए थे, एक कंकड़ पकड़े था जिससे शायद वह रोज़ लकीरें खुरचता था।
उसने कंकड़ एक तरफ़ रखा और फ़िरोज़ को ऊपर से नीचे तक देखा। वह नज़र ऐसी थी जैसे कोई बहुत दिनों बाद अपना ही चेहरा आईने में देख रहा हो, हैरानी, डर और एक अजीब-सी उम्मीद के साथ।
"तू... ज़िंदा है," उसने आख़िर में कहा। "मतलब, अभी तक पूरा है। परछाईं नहीं बना। अच्छा।"
"आप कौन हैं?" फ़िरोज़ ने कहा। उसकी आवाज़ ख़ुद उसे अजनबी लगी, ख़ुश्क और फटी हुई। "यह जगह कौन-सी है? मैं... मुझे यहाँ से बाहर जाना है। मेरी बहन... मुझे अपनी बहन को फ़ोन करना है।"
आदमी के चेहरे पर एक कड़वी-सी मुस्कान आई। "फ़ोन," उसने दोहराया। "बहुत दिन हो गए यह शब्द सुने हुए। बैठ जा, बेटा। खड़े-खड़े गिर जाएगा।"
"मैं बैठने नहीं आया। मुझे जानना है..."
"बैठ जा," आदमी ने कहा, और इस बार उसकी आवाज़ में कोई ऐसी बात थी जो फ़िरोज़ ने मान ली। वह टूटी खाट के कोने पर टिक गया। खाट चरमराई, पर आवाज़ बाद में आई।
"पहले पानी पी," आदमी ने घड़े की ओर इशारा किया। "यह पानी असली नहीं है, पर प्यास बुझा देता है। यहाँ की हर चीज़ ऐसी ही है। असली नहीं, पर काम चलाऊ। जैसे नक़ल की भी नक़ल।"
फ़िरोज़ ने झिझककर घड़े से पानी लिया, एक मिट्टी के कटोरे में। पानी का रंग हल्का भूरा-सा था, और उसमें उसे अपनी परछाईं या अक्स नहीं दिखा। जब उसने पिया, तो उसमें कोई स्वाद नहीं था, पर हलक की जलन थम गई।
"बाबूजी," उसने कहा, "देखिए, मैं सीधी बात करूँगा। मैं एक पत्रकार हूँ, या था। मैं अफ़वाहों और चमत्कारों पर यक़ीन नहीं करता। मैंने पिछले पूरे हफ़्ते में जो कुछ देखा है, उसका कोई सीधा-सपाट वैज्ञानिक कारण होगा, मैं जानता हूँ। पर अभी मेरे पास कोई कारण नहीं है। तो आप मुझे सीधे बताइए। मैं कहाँ हूँ?"
आदमी चुपचाप उसे देखता रहा। फिर वह दीवार की लकीरों की तरफ़ मुड़ा और उन्हें अपनी उँगलियों से छूने लगा, जैसे कोई माला के दाने गिन रहा हो।
"तू पत्रकार है," उसने धीरे से कहा। "मैं भी कभी कुछ और था। यहीं के डाकघर का पोस्टमास्टर। चिट्ठियाँ बाँटता था, लोगों के नाम पहचानता था। ख़ैर, वह बात छोड़। तू पूछ रहा है तू कहाँ है। तो सुन। तू वहीं है जहाँ तू गया था। उसी हवेली में, उसी कमरे में। बस, तू अब आईने के उस पार है।"
"आईने..."
"वह काला आईना, जो ऊपर के कमरे में था। याद है? तूने उसमें अपना चेहरा देखा था। उसने तुझे देखा था। और फिर..." आदमी ने बात अधूरी छोड़ दी, फिर हल्के से सिर हिलाया। "तू जानता है फिर क्या हुआ। तू वहाँ से आया है। मैं जानता हूँ। नए लोग हमेशा उसी तरह आँखें फाड़ते हैं।"
फ़िरोज़ ने गले में थूक निगला। "अगर यह आईने के अंदर है," उसने कहा, और तर्क की बारीक डोरी को पकड़कर बैठा रहा, "तो फिर मेरा शरीर कहाँ है? बाहर? मैं तो यहाँ खड़ा हूँ। मेरे हाथ हैं। मुझे प्यास लगती है।"
"तेरा शरीर तेरे साथ ही है। पर बाहर," आदमी ने खिड़की की तरफ़ इशारा किया जहाँ से सलेटी रोशनी आ रही थी, "बाहर, उसी शरीर में अब कोई और घूम रहा है। तेरी शक्ल पहने हुए, तेरी आवाज़ बोलता हुआ। जब तू तीन रात बाद तक दरवाज़े पर खड़ा रहा, याद है? तेरे सामने एक हाथ तेरी तरफ़ बढ़ा था, और तूने..."
"मैंने उसे पकड़ लिया," फ़िरोज़ ने धीरे-से कहा। उसे याद आया। तीसरी रात ही वह हाथ आईने की सतह से बाहर निकला था, और उसने चीख़ते-चीख़ते भी उसे थाम लिया था, क्योंकि वह हाथ उसकी अपनी कलाई को खींच रहा था, और वह छुड़ाने की कोशिश में उलझ गया था। फिर चौथी, पाँचवीं, छठी रात, हर रात थोड़ा और पास। जैसे कोई धीरे-धीरे दरवाज़ा खोल रहा हो। और सातवीं रात...
"सातवीं रात," वह फुसफुसाया, "उसने कहा था, 'अब तेरी बारी'।"
"हाँ," आदमी ने कहा। "सबसे यही कहता है, सात रातें, फिर तेरी बारी। थोड़ा और सलीक़े से, थोड़ा और मीठे से। पर मतलब वही होता है।"
फ़िरोज़ ने अपना माथा हाथों में दबा लिया। कुछ देर तक वह चुप बैठा रहा। बाहर, कहीं बहुत दूर, कोई बच्ची हल्की-सी आवाज़ में कुछ गुनगुना रही थी। एक लोरी जैसी धुन, पर उसके सुर आधे उलटे थे, जैसे धुन पीछे की ओर बह रही हो।
"यह कौन है?" उसने सिर उठाया।
आदमी के चेहरे पर पहली बार नर्मी-सी आई। "वह गुड्डी है," उसने कहा। "छोटी है। बहुत छोटी। वह यहाँ मुझसे भी पहले से है। मैंने कभी उसे ठीक से देखा नहीं, बस आवाज़ सुनता हूँ। कभी-कभी हवेली के गलियारों में वह गाती है, और मैं सोचता हूँ कि... कि मेरे घर में भी कभी कोई ऐसे गाती थी।" उसने एकदम से बात बदल दी, जैसे ख़ुद को रोक लिया हो। "अब तू बता, तू कौन है? दिल्ली का है? तेरे कपड़े, तेरी बोली..."
"फ़िरोज़," उसने कहा। "फ़िरोज़ ख़ान।"
आदमी का चेहरा एकदम बदल गया। वह तेज़ी से आगे बढ़ा और अपनी खुरदुरी हथेली फिर से फ़िरोज़ के मुँह पर रख दी। "बेवक़ूफ़!" उसने भयभीत फुसफुसाहट में कहा। "अपना नाम ऐसे खुलेआम मत बोल! कभी नहीं! सुन रहा है तू? कभी नहीं, जब तक पक्का न हो कि सुनने वाला कौन है।"
फ़िरोज़ ने उसका हाथ हटाया। "पर आपने तो पूछा था..."
"मैंने पूछा, पर तुझे जवाब नहीं देना चाहिए था। यहाँ हर नाम की क़ीमत है। किसी को भी नहीं पता कि कौन-सी दीवार कब सुन ले, कौन-सी परछाईं कब तेरा नाम चबा जाए।" उसने काँपती उँगलियों से चश्मा ठीक किया और बहुत देर तक कोठरी के दरवाज़े की तरफ़ देखता रहा। कोई आवाज़ नहीं आई। उसने धीरे-धीरे हाथ नीचे किया।
"माफ़ कर," उसने कहा। "बीस साल हो गए। मैं इतना डरपोक नहीं था। पर यहाँ बीस साल, बीस साल जैसे नहीं होते। यहाँ वक़्त..." उसने कलाई उठाकर दिखाई, जहाँ एक पुरानी, पीली पड़ चुकी घड़ी बँधी थी। उसकी सुइयाँ भी उलटी चल रही थीं। "यहाँ वक़्त धीमे चलता है। और कभी-कभी रुक जाता है। मैंने अपनी घड़ी से एक चीज़ सीखी: असली वक़्त बाहर बहता है, उसे यहाँ से नापा नहीं जा सकता।"
"बीस साल," फ़िरोज़ ने दोहराया। "आप बीस साल से यहाँ हैं?"
"बीस साल, चार महीने, कुछ दिन। दीवार पर देख ले।" आदमी ने लकीरों की ओर इशारा किया। "सात हज़ार से ऊपर लकीरें हैं। शुरू में रोज़ खींचता था। फिर कुछ साल बाद समझ नहीं आता था कि दिन ख़त्म कब होता है। फिर भी खींचता रहा। गिनती ही तो आख़िरी चीज़ है जो आदमी को आदमी बनाए रखती है।"
फ़िरोज़ दीवार की तरफ़ देखता रहा। सात हज़ार लकीरें। एक-एक लकीर एक दिन। उसके अंदर कुछ चटका। वह इतने दिनों से तर्क और मज़ाक की जिस दीवार के पीछे छुपा बैठा था, उसमें पहली दरार पड़ी। वह जान रहा था, बहुत गहराई से, कि यह कोई सपना नहीं है। कोई ख़्वाब सात हज़ार लकीरें नहीं खुरचता।
"मेरी बहन," उसने कहा, और आवाज़ टूट गई। "मेरी बहन ज़ोया है। वह दिल्ली में है। वह रोज़ मुझे फ़ोन करती है। अगर वह फ़ोन करेगी और मैं... और वह..." उसका गला बैठ गया। "वह जो बाहर है, वह मेरी जगह पर, मेरी आवाज़ में, उससे बात करेगा।"
"हाँ," आदमी ने बहुत धीमे से कहा।
"और ज़ोया समझ नहीं पाएगी?"
"शायद नहीं," आदमी ने कहा। "शुरू में कोई नहीं समझता। जिन्न अच्छा नक़्क़ाल होता है। पर..." उसने एक पल रुककर जोड़ा, "...पर पूरा नहीं। कुछ छोटी बात हमेशा रह जाती है। मुस्कान ज़्यादा खिंची हुई, पलकें कम झपकती हुईं। जिसे आदमी से सच्चा प्यार हो, वह देख लेता है। बस बात इतनी है कि वह देख ले, और उसे यक़ीन भी आए, और यक़ीन आने के बाद वह कुछ कर भी सके। यही तीन बातें मुश्किल हैं।"
फ़िरोज़ ने अपने घुटनों पर कोहनियाँ टिकाईं और सिर झुका लिया। बहुत देर तक कमरे में बस दीये की नीली, बेआवाज़ लौ का साया रहा।
* * *
"आप लकीरें खींचते हैं," फ़िरोज़ ने बाद में कहा, "तो पक्का आपको पता है यहाँ कितने लोग हैं, कौन क्या है। मुझे सब बता दीजिए, शुरू से। मुझे समझना है। समझ में आए तो मैं कम डरता हूँ। यह मेरी आदत है।"
आदमी ने हल्की-सी, थकी हुई हँसी हँसी। "अच्छी आदत है। मेरी भी यही थी। पर अभी नहीं।" उसने फ़िरोज़ के कंधे पर हाथ रखा। "पहले तुझे कुछ खाना चाहिए, आराम चाहिए। नया आदमी पहले कुछ घंटे बहुत बेचैन होता है। उसकी साँसें ठीक नहीं रहतीं, और परछाइयाँ यह सूँघ लेती हैं। तू कुछ देर मेरे पास रहेगा। और सुन, मैं तुझे यहाँ के तीन छोटे उसूल बता देता हूँ, ताकि आज के लिए बच जाए।"
उसने उँगलियों पर गिनना शुरू किया।
"एक। हॉल की तरफ़ अकेला मत जा। वहाँ परछाइयाँ रहती हैं, जो अपना नाम खो चुकी हैं और नया नाम ढूँढ़ती हैं। उनके सामने जो भी नाम बोलेगा, उसका नाम उन्हें मिल जाएगा।
"दो। दीवार की जो सतह चमकती दिखे, उसमें झाँककर मत देखना। कुछ जगह खिड़की-सी होती हैं, बाहर की तरफ़। पर वह खिड़की दोनों तरफ़ खुलती है।
"तीन। अगर कोई बच्ची की आवाज़ में तेरा नाम पुकारे, तो पलटकर मत देखना। चाहे कितनी भी मासूम आवाज़ हो। गुड्डी ऐसा कभी नहीं करती, पर कोई और कर सकता है, उसकी आवाज़ पहनकर।"
"कोई और?"
"यहाँ बहुत चीज़ें हैं, बेटा, जो आवाज़ें चुराती हैं।"
फ़िरोज़ ने सिर हिलाया। वह सब याद कर रहा था, एक-एक बात। यह उसका पुराना तरीक़ा था। जब डर बेक़ाबू हो जाए, तो उसे नोट्स में बदल दो। उसने मन ही मन इसे सुर्ख़ी की तरह लिखा: "आईने के पार: तीन उसूल।"
"आप रमेश..." उसने बात शुरू की, फिर रुक गया। उसे ख़ुद भी नहीं पता था कि उसने यह नाम कहाँ से लिया। उसने तो अभी तक आदमी का नाम पूछा ही नहीं था।
आदमी ने सिर उठाया। उसकी आँखें चौड़ी हो गईं। "तूने क्या कहा?"
"मैंने... मुझे नहीं पता। मुझे ऐसा लगा कि..." फ़िरोज़ ने सिर पकड़ लिया। "शायद गाँव में, किसी ने बताया था। मीरा... नहीं, मौलवी साहब का इशारा... कोई 'रमेश वर्मा' के बारे में..."
"किसने बताया?" आदमी ने उसकी कलाई पकड़ ली, और उसकी पकड़ में अब डर नहीं, तड़प थी। "बता! किसने?"
फ़िरोज़ को याद आया, चौथे दिन की सुबह, मीरा का छोटा-सा कमरा, दीवार पर टँगी वह तस्वीर, और उसकी आँखों में वह पुराना, घाव जैसा दर्द। उसने कहा था, "मेरे पिता भी उसी हवेली में..." और फिर उसकी आवाज़ बैठ गई थी।
"एक लड़की ने," फ़िरोज़ ने धीरे से कहा। "गाँव में। वह स्कूल में पढ़ाती है। उसके पिता बीस साल पहले हवेली में... लापता हो गए थे। उसने बताया कि उसके पिता का नाम..."
"वह मेरा नाम है," आदमी ने कहा। उसकी आवाज़ बहुत धीमी थी, मानो वह ख़ुद उस पर यक़ीन नहीं कर पा रहा हो। "रमेश वर्मा।"
फ़िरोज़ को लगा जैसे कमरे की हवा भारी हो गई हो।
"आप..." उसने कहा, "...मीरा के पापा हैं?"
पर रमेश ने जवाब नहीं दिया। वह खड़ा हुआ और खिड़की के पास गया, जहाँ से बाहर की सलेटी रोशनी की एक पतली लकीर अंदर आ रही थी। उसका चेहरा आधा अँधेरे में था, आधा उस सलेटी रोशनी में। उसकी पीठ फ़िरोज़ की ओर थी, और कंधे हल्के-हल्के काँप रहे थे। चुपचाप, बिना आवाज़ के।
बहुत देर बाद उसने पूछा, और आवाज़ में सारी बीस साल की थकान एक साथ उतर आई थी:
"वह कैसी है? क्या वह... उसने शादी...? उसका नाम... उसका..." वह रुका, फिर मुड़ा, और फ़िरोज़ की आँखों में देखा। उसकी आँखें गीली थीं, पर उनमें उम्मीद की एक छोटी, डरी हुई, सहमी हुई लौ जल रही थी। एक ऐसा आदमी, जिसने बीस साल एक ही सवाल को छाती में दबाए रखा हो और अब उसे बोलने से डर रहा हो कि कहीं जवाब सुनकर टूट न जाए।
"मेरी बेटी का नाम मीरा है," उसने कहा। "क्या तुम उसे जानते हो?"
- Writer
- firoj saifi
- Story
- जिसने नाम पुकारा
- Chapter
- 6 of 10
- Category
- Jinn & Spirits
- Reading time
- 20 min
- Words
- 3898
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
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