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एपिसोड 7: नाम की क़ीमत

firoj saifi · Jinn & Spirits · 20 मिनट

रमेश वर्मा के सवाल का जवाब देने में फ़िरोज़ को बहुत देर लगी।

वह इसलिए नहीं कि उसके पास जवाब नहीं था। जवाब उसके पास था, बल्कि बहुत ज़्यादा था। मीरा के बारे में वह इतना कुछ जानता था कि एक सुर्ख़ी में समेटना मुश्किल था। पर पत्रकारिता के पूरे दस साल में उसने कभी किसी को ऐसे देखा नहीं था। एक बाप, जो बीस साल से एक नाम सीने में दबाए बैठा है, और अब उस नाम का जवाब सुनने से डर रहा है।

"हाँ," आख़िर में उसने कहा। "मैं उसे जानता हूँ।"

रमेश ने आँखें बंद कर लीं। उसके होंठ हिले, बिना आवाज़ के, शायद किसी दुआ में, या शायद सिर्फ़ उसी नाम को दोहराते हुए।

"वह ठीक है?" उसने पूछा। "बस इतना बता दे, ठीक है न?"

"वह ठीक है," फ़िरोज़ ने कहा, और फिर, क्योंकि झूठ बोलना उसे यहाँ बेईमानी लगा, उसने जोड़ा: "ठीक है, पर उदास रहती है। बहुत मज़बूत है, पर उदास। वह गाँव के सरकारी स्कूल में बच्चों को पढ़ाती है। तीसरी से पाँचवीं तक की क्लास। सारे बच्चे उसे 'मीरा दीदी' कहते हैं, मैडम नहीं। मैंने ख़ुद सुना है।"

"मीरा दीदी," रमेश ने दोहराया, और उसकी दाढ़ी के बीच एक मुस्कान उभरी, कमज़ोर, टूटी हुई, पर असली। "वह बचपन में भी सब बच्चों को लाइन में खड़ा करके स्कूल-स्कूल खेलती थी। मैं उसकी तख़्ती बनाता था, लकड़ी की। उसके पास एक छोटी-सी तख़्ती थी जिस पर वह कोयले से लिखती थी। मैंने उसे एक पेन भी दिलाया था, पहली बार जब वह पहली क्लास में गई। नीला पेन, फ़ाउंटेन वाला। कहती थी कि वह उसे कभी नहीं खोएगी।"

फ़िरोज़ को अचानक कुछ याद आया। चौथे दिन की सुबह, मीरा के कमरे में, उसके हाथ में एक पुराना नीला पेन था। वह बातें करते-करते उसे अपनी उँगलियों में घुमाती जा रही थी, और जब उसने अपने पिता का ज़िक्र किया था तो उसकी मुट्ठी उस पेन के ऊपर कस गई थी।

"उसके पास एक नीला पेन है," फ़िरोज़ ने कहा। "पुराना। उसकी टोपी पर एक छोटी-सी दरार है।"

रमेश का चेहरा उसी पल पिघल गया। वह खाट के पास घुटनों के बल बैठ गया और दोनों हाथों से अपना मुँह ढक लिया। उसके कंधे हिलने लगे। इस बार आवाज़ के साथ।

फ़िरोज़ चुप बैठा रहा। उसकी ज़िंदगी में कभी कोई ऐसा पल नहीं आया था जहाँ उसे कुछ कहने के बजाय चुप रहना ज़्यादा सही लगा हो। वह बात बनाने, बात टालने, बात घुमाने का आदमी था। पर इस पल उसने कुछ नहीं कहा। उसने बस उठकर घड़े से पानी का कटोरा भरा और रमेश के पास रख दिया।

थोड़ी देर बाद रमेश ने सिर उठाया, आँखें पोंछीं, और बोला, "ग़लती हो गई। इतने साल बाद कोई आया है जो उसे जानता है, और मैं रो पड़ा। तू मुझे कमज़ोर समझ रहा होगा।"

"मैं तो अभी ख़ुद एक घंटे पहले एक परछाईं से डरकर सीढ़ियों पर गिरा था," फ़िरोज़ ने कहा। "मैं किसी को कमज़ोर कहने की हालत में नहीं हूँ।"

रमेश हँस पड़ा। छोटी-सी हँसी, पर इतने बरसों में पहली बार शायद। "तू बात अच्छी करता है," उसने कहा। "वह भी ऐसे ही बात करती थी। डर के सामने मज़ाक करती थी।"

* * *

उस दिन, अगर यहाँ दिन जैसी कोई चीज़ थी, रमेश ने फ़िरोज़ को वह सब कुछ बताना शुरू किया जो उसने बीस साल में सीखा था।

वे दोनों खाट पर आमने-सामने बैठे थे। नीला दीया बीच में था। रमेश ने कंकड़ को हाथ में घुमाते हुए, एक-एक बात धीरे-धीरे समझाई, जैसे कोई पुराना मास्टर किसी नए बच्चे को पहाड़ा सिखाता हो।

"सबसे पहले तो यह समझ," उसने कहा, "कि यह जगह मरने के बाद की जगह नहीं है। यहाँ कोई मरा नहीं है। इसलिए यहाँ न स्वर्ग है, न नरक। यह बीच की जगह है। एक अटका हुआ आईना, जिसमें सब कुछ वैसा ही है जैसा बाहर था, पर पलटा हुआ और ख़ाली। लोग भी हैं, पर कम। चीज़ें भी हैं, पर नक़ली।"

"नक़ली मतलब?" फ़िरोज़ ने पूछा।

"मतलब वह पानी तूने पिया। उससे प्यास बुझी, पर पेट नहीं भरा। रोटी मिलेगी, उससे पेट भरेगा, पर स्वाद नहीं आएगा। नींद आएगी, पर सपने नहीं आएँगे। यहाँ सब कुछ उतना ही है जितना ज़िंदा रहने के लिए ज़रूरी है, और उससे ज़्यादा नहीं। जिन्न चाहता है कि हम ज़िंदा रहें, क्योंकि जब तक हम ज़िंदा हैं, वह बाहर टिका रह सकता है।"

"क्या मतलब? हमारे ज़िंदा रहने से उसका क्या संबंध?"

रमेश ने सिर हिलाया। "वह बात बाद में। पहले नियम। जो सबसे ज़रूरी है, वह है नाम।"

उसने कंकड़ से ज़मीन पर एक छोटा-सा गोला खींचा।

"यहाँ तेरा नाम तेरी जान है। यह मैं मज़ाक में नहीं कह रहा। बाहर की दुनिया में नाम बस एक पुकार है, जो माँ-बाप रख देते हैं। यहाँ नाम वह धागा है जो तुझे तेरी असली शक्ल से जोड़कर रखता है। जब तक तुझे अपना नाम याद है, तू तू है। जिस दिन तू अपना नाम भूल गया, उसी दिन तेरी परछाईं तुझसे अलग हो जाएगी, और तू भी धीरे-धीरे परछाईं बन जाएगा। तू हॉल में जो भीड़ देखकर आया है, वे सब यही हैं।"

फ़िरोज़ ने अनायास ही अपनी पीठ सीधी की। "वे सब... पहले इंसान थे?"

"पहले इंसान थे, हाँ। कुछ नवाब के नौकर, कुछ गाँव के लोग जो पिछली सदी में कभी ख़ुराक बने, कुछ वे जो सिर्फ़ ग़लत रात ग़लत जगह पर थे। उन्होंने पहले अपना नाम खोया। नाम खोना ऐसे नहीं होता कि कोई चुरा ले। यह धीरे-धीरे होता है। पहले तू भूलता है कि तेरे पिता का नाम क्या था। फिर भूलता है कि तेरा गाँव कौन-सा था। फिर एक दिन किसी ने तुझे पुकारा, और तुझे लगा कि वह किसी और को पुकार रहा है। उसी दिन तू गया।"

"और परछाईं बनने के बाद? कोई वापसी नहीं?"

रमेश ने लंबी साँस ली। "मैंने कभी किसी को लौटते नहीं देखा। पर यहाँ मैं सब कुछ नहीं देख पाता।" उसने दीवार की उन हज़ारों लकीरों की तरफ़ इशारा किया। "देख, मैं हर रात सोने से पहले अपना पूरा परिचय बोलता हूँ। एक बार, धीरे। 'मैं रमेश वर्मा हूँ। धुंधलपुर के डाकघर का पोस्टमास्टर। मेरी बेटी का नाम मीरा है।' सिर्फ़ इतना। पर रोज़। बीस साल से रोज़। एक रात नहीं छोड़ी। जिस दिन छोड़ूँगा, उस दिन हार जाऊँगा।"

फ़िरोज़ की आँखों के सामने अचानक वह दृश्य उभरा। एक अकेला आदमी, एक सलेटी कोठरी, एक नीला दीया, और सात हज़ार रातों तक वही तीन वाक्य। उसने सोचा, किसी युद्ध में इससे बड़ी बहादुरी क्या होगी।

"और मैं?" उसने पूछा। उसका गला ख़ुश्क था। "मैं कितने दिन में..."

"तेरा नाम अभी ताज़ा है। तुझे पकड़ा हुआ ज़्यादा समय नहीं हुआ। और जिन्न ने तेरा चेहरा, तेरी आवाज़ पहन ली है। यह एक अजीब बात है। वह तेरा नाम लेकर बाहर घूम रहा है। रोज़ हर किसी के सामने तेरा नाम पुकारा जाएगा, और हर बार वह नाम उसके पास थोड़ा और खिंचेगा। तू जितना यह नाम पकड़कर रख सकता है, रख। बाक़ी हम देख लेंगे।"

"खिंचेगा?" फ़िरोज़ ने भौंहें चढ़ाईं। "क्या मतलब, मेरा नाम वह इस्तेमाल करेगा तो मैं कमज़ोर हो जाऊँगा?"

रमेश ने कुछ पल उसे देखा। "तू तेज़ है। हाँ। जितनी बार तेरा नाम बाहर बोला जाएगा, तेरी पकड़ उस पर कम होती जाएगी जो बाहर तेरी जगह है। और उसकी पकड़ तुझ पर बढ़ती जाएगी। यह बात मुझे बाबा की परछाईं ने बताई थी।"

"बाबा?"

"बाबा सैयद हुसैनी। जिन्होंने इसे क़ैद किया था। उनकी परछाईं भी यहीं है, एक तरफ़, बहुत दूर। वह जली हुई है, आधी। उसके बारे में मैं बाद में बताऊँगा, वह अभी तुझसे नहीं मिलेगी। वह बहुत कम किसी के सामने आती है।"

फ़िरोज़ ने अपने दिमाग़ में एक-एक नाम जोड़ना शुरू किया। जैसे कोई जासूस दीवार पर तस्वीरें टाँगता है। रमेश वर्मा। गुड्डी। बाबा हुसैनी की परछाईं। हवेली। जिन्न। काला आईना। ठाकुर। गाँव। एक पूरी कहानी, जिसके सिरे हर तरफ़ उलझे थे।

"एक सवाल," उसने कहा। "आप बीस साल से यहाँ हैं, और आप पहली बार मुझे बता रहे हैं कि बाहर की दुनिया को देखा जा सकता है। मेरा मतलब, आपने मुझे खिड़की से बाहर देखने की बात कही थी। आपने बाहर कभी किसी को देखा?"

रमेश की नज़र झुक गई। "कभी-कभी," उसने कहा। "बहुत कम। जब कोई आईने के सामने अपना नाम पुकारता है, तब एक पल के लिए दीवार पारदर्शी-सी हो जाती है। पर ऐसा सालों में दो-चार बार हुआ। एक बार मैंने अपने घर के बरामदे की झलक देखी थी। वहाँ कोई नहीं था। एक बार मैंने मीरा की आवाज़..." उसकी आवाज़ बैठ गई। "...शायद मीरा की आवाज़ सुनी थी। या शायद मेरा वहम था।"

"नाम पुकारने से झलक मिलती है," फ़िरोज़ ने धीरे-धीरे कहा। उसका दिमाग़ चल रहा था। "तो मतलब, अगर किसी को पता हो..."

"वह बाद की बात है," रमेश ने बीच में ही रोक दिया। "पहले तू सो। तू बहुत थका है। इस जगह पर नींद ऐसी चीज़ है जो देर से आती है, पर जब आती है तो पक्की आती है।"

* * *

बाहर, धुंधलपुर में, उस सुबह बारिश हो रही थी।

रहीम चाचा अपनी टपरी के आगे बैठे गीली लकड़ियाँ चूल्हे में डालने की नाकाम कोशिश कर रहे थे। छप्पर के कोने से पानी टपक रहा था, और छोटू एक पुरानी बोरी सिर पर ओढ़े दरवाज़े के पास उकड़ूँ बैठा था, उसकी आँखें गली की तरफ़ टिकी थीं।

"चाचा," उसने धीमे से कहा। "आज कोई चाय पीने नहीं आएगा।"

"बारिश में ही तो आता है," रहीम ने कहा, "जिसे गरम चाय की ज़रूरत हो।"

तभी गली के मोड़ पर एक साया दिखाई दिया। बिना छतरी के, बिना कुछ ओढ़े, एक आदमी पैदल चला आ रहा था, बारिश में भीगता हुआ, पर बिल्कुल बेपरवाह। उसके बाल चिपके हुए थे, कुर्ता पूरी तरह भीग चुका था, और वह ऊपर आसमान की तरफ़ मुँह उठाए, मुस्कुराता हुआ चल रहा था, जैसे बारिश कोई तोहफ़ा हो।

रहीम की आँखें सिकुड़ीं। "वह फ़िरोज़ बाबू नहीं?"

छोटू का शरीर कड़ा हो गया। वह बोरी के नीचे सिकुड़ गया, और उसने धीमे से, बहुत धीमे से कहा, "चाचा... अंदर चलो।"

"क्यों?"

"चलो अंदर।"

"अरे बच्चे, बारिश में भीगकर कहाँ..."

"चाचा!"

मगर तब तक फ़िरोज़ टपरी के नीचे पहुँच चुका था। वह वहीं खड़ा हो गया, छप्पर के किनारे पर, ठीक उस जगह जहाँ पानी की धार नीचे गिर रही थी, और उसने दोनों हाथ आगे बढ़ाकर उस धार को अपनी हथेलियों पर लिया। पानी उसकी उँगलियों से बहकर गिरता रहा। और वह उसे देखता रहा, ऐसे जैसे कोई पहली बार जादू देख रहा हो।

"क्या बात है, फ़िरोज़ बाबू?" रहीम ने कहा। "आज बड़े ख़ुश लग रहे हैं।"

फ़िरोज़ ने मुड़कर देखा। उसकी मुस्कान चौड़ी थी, ज़रा ज़्यादा चौड़ी। "रहीम चाचा," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में एक अजीब-सी नर्मी थी, जो पहले कभी नहीं थी, "आपने कभी बारिश को... महसूस किया है? मेरा मतलब, सच में?"

"बारिश को महसूस?" रहीम हँसा। "भाई, हम तो खेती-बाड़ी के लोग हैं। बारिश आती है तो ख़ुश होते हैं, नहीं आती तो रोते हैं। इससे ज़्यादा क्या महसूस करना?"

"इससे बहुत ज़्यादा," फ़िरोज़ ने कहा। उसने अपना सिर पीछे किया और चेहरे पर पानी गिरने दिया। कुछ देर तक आँखें बंद किए रहा। उसके चेहरे पर एक ऐसी शांति थी, जैसी रहीम ने किसी के चेहरे पर कभी नहीं देखी थी। एक बहुत पुरानी, बहुत गहरी प्यास के बुझने की शांति।

"एक चाय," उसने कहा। "एक चाय, चाचा। अदरक वाली। और ख़ूब चीनी डालिए।"

रहीम को थोड़ी हैरानी हुई। उसे अच्छे से याद था कि इस लड़के ने पहले दिन कहा था, "चाचा, बिना चीनी, मेरे यहाँ शुगर वाली चाय को लोग पाप समझते हैं।" पर उसने कुछ नहीं कहा। उसने केतली चढ़ाई।

छोटू बोरी के नीचे से एकटक फ़िरोज़ को देख रहा था। उसने एक काम किया। उसने ज़मीन पर देखा। फ़िरोज़ के पैरों के नीचे, ठीक उसके जूतों के नीचे, जहाँ छप्पर की बारिश वाली धुँधली रोशनी पड़ रही थी, कोई परछाईं नहीं थी। जबकि रहीम की परछाईं पास की दीवार पर थी, लंबी और पतली। टपरी के खंभे की परछाईं भी थी। केतली की भी। बस फ़िरोज़ की नहीं।

छोटू की साँस रुक गई।

चाय बनी। रहीम ने पहला गिलास फ़िरोज़ को दिया। फ़िरोज़ ने उसे दोनों हाथों से पकड़ा, जैसे कोई पवित्र चीज़ हो, और उसकी भाप को सूँघा। फिर एक घूँट लिया।

उसकी आँखें बंद हो गईं। उसके चेहरे पर एक ऐसी तृप्ति आई कि रहीम को लगा जैसे उसने किसी बच्चे को पहली बार मिठाई चखते देखा हो। फिर फ़िरोज़ ने दूसरा घूँट लिया, फिर तीसरा। और फिर, बिना किसी वजह के, वह हँस पड़ा। ज़ोर से। खुलकर। जैसे यह दुनिया का सबसे मज़ेदार चुटकुला हो।

"ग़ज़ब," उसने कहा। "ग़ज़ब है। मीठा। गर्म। भीगा हुआ। क्या-क्या है इस दुनिया में!"

रहीम का हाथ केतली पर रुक गया। वह अपने जीवन में बहुत से लोगों को चाय पिलाता आया था, पर किसी को चाय पर इतना ख़ुश नहीं देखा। उसे ख़ुशी होनी चाहिए थी। पर ठंडी-सी एक बेचैनी उसकी रीढ़ से उतरने लगी।

"बाबूजी," उसने कहा, "आप ठीक हैं न?"

"मैं बिल्कुल ठीक हूँ," फ़िरोज़ ने कहा। "बहुत दिनों बाद ऐसा ठीक।"

उसने रहीम की तरफ़ देखा, और उसकी आँखें एक पल के लिए नहीं झपकीं। एक पल, दो पल, तीन पल। रहीम ने ग़ौर किया कि वह पलकें झपकाना जैसे भूल गया हो। फिर, जैसे किसी को याद आ जाए, उसने जल्दी-जल्दी दो बार पलकें झपकाईं। फिर मुस्कुरा दिया।

"आपकी चाय, चाचा, मेरी ज़िंदगी की सबसे अच्छी चाय है।"

* * *

अक्स-नगरी में रमेश ने फ़िरोज़ को सोने दिया।

नींद आई, पर आधी-अधूरी, जैसे कोई पानी की सतह पर तैर रहा हो। फ़िरोज़ को लगा कि वह बहुत देर तक सोया, फिर आँख खुली तो दीया वैसा ही जल रहा था और रमेश दीवार के पास बैठा कुछ खुरच रहा था। नई लकीर।

"मैं कितनी देर सोया?" फ़िरोज़ ने पूछा।

"बाहर की घड़ी में शायद तीन-चार घंटे। यहाँ का हिसाब अलग है।" रमेश ने कंकड़ रखा। "उठ गया तो चल, कुछ खा ले। फिर मैं तुझे किसी से मिलवाता हूँ।"

"किससे?"

"गुड्डी से। वह मुझसे बात नहीं करती, पर अगर तू आया है तो शायद दिख जाए। नए लोगों में उसकी दिलचस्पी रहती है। वह भी कुछ याद करने की कोशिश करती है, मुझे लगता है।"

वे दोनों कोठरी से बाहर निकले। रमेश आगे था, फ़िरोज़ पीछे। गलियारे संकरे थे, और इस बार फ़िरोज़ ने ग़ौर किया कि दीवारों पर पुराने चित्र टँगे थे, तस्वीरों के फ़्रेम, जिनमें लोग तो थे पर उनके चेहरे धुँधले थे, जैसे किसी ने पानी से पोंछ दिया हो। जहाँ कोई तस्वीर थी, वहाँ का फ़्रेम उलटा टँगा था।

वे एक बड़े कमरे में पहुँचे जो शायद कभी नवाब की दावतों का कमरा था। फ़र्श पर लंबे-लंबे क़ालीन, जिनके रंग उड़ चुके थे। कोने में टूटे हुए खिलौने पड़े थे। एक लकड़ी का घोड़ा, एक मिट्टी की गुड़िया, एक पुरानी चरखी। और बीच में, फ़र्श पर पालथी मारे, एक छोटी बच्ची बैठी थी।

वह शायद सात-आठ साल की थी। उसने एक पुराने ढंग की फ्रॉक पहन रखी थी, घुटनों तक लंबी, जिसकी बाँहें फूली हुई थीं। उसके बाल दो चोटियों में गुँथे थे, और एक चोटी का रिबन खुल चुका था। उसके पैरों में एक ही जूता था, बाएँ पैर में। दाएँ पैर में कुछ नहीं। और उसके सामने फ़र्श पर वह धूल में उँगली से कुछ बना रही थी।

फ़िरोज़ रुक गया। इस सारे ख़ौफ़ के बीच, इन सारी परछाइयों और उलटी दुनिया के बीच, एक छोटी बच्ची को ऐसे खेलते देखना सबसे ज़्यादा अजीब था। वह मन ही मन एक पल के लिए ख़ुद को समझाना चाहता था कि वह भी एक परछाईं है, पर वह परछाईं नहीं थी। उसके पास पूरा चेहरा था, छोटी नाक, भरे हुए गाल, बड़ी-बड़ी भूरी आँखें।

रमेश ने धीमे से कहा, "वह गुड्डी है।"

लड़की ने सिर उठाया। उसने फ़िरोज़ को देखा, पर उसकी नज़र में कोई डर नहीं था। उसने बस सिर टेढ़ा किया और बहुत गंभीरता से पूछा:

"तुम नए हो?"

उसकी आवाज़ में एक अजीब-सी बात थी। शब्द साफ़ थे, पर लहजा ऐसा था जैसे कोई बहुत पुराने ज़माने का बच्चा बोल रहा हो, इतना सधा हुआ, इतना सलीक़ेदार। जैसे उसने "नए हो" को "नवीन हो" की तरह कहा हो।

"हाँ," फ़िरोज़ ने उसके सामने उकड़ूँ बैठते हुए कहा। "आज ही आया हूँ। और तुम?"

"मैं पुरानी हूँ," गुड्डी ने कहा। "बहुत पुरानी। मुझे याद भी नहीं कितनी।"

"कितनी?"

उसने उँगलियों पर गिनना शुरू किया, फिर रुक गई और अपने हाथ को ग़ौर से देखा। "बहुत," उसने कहा। फिर, जैसे कोई ज़रूरी बात याद आई हो, उसने सामने धूल पर बनी आकृति की तरफ़ इशारा किया। "यह देखो। मैंने बनाया है।"

फ़िरोज़ ने नीचे देखा। धूल में एक छोटा-सा घर बना था, चौकोर, ऊपर छत, एक दरवाज़ा। दरवाज़े के सामने तीन-चार लकीरें, जैसे कोई खड़ा हो। और घर की खिड़की में, बहुत महीन, एक गोला, जो चेहरा हो सकता था।

"यह तुम्हारा घर है?"

"नहीं," गुड्डी ने कहा। "यह वह घर है जहाँ मुझे जाना है। मुझे याद नहीं कहाँ है। पर मुझे पता है कि इसकी खिड़की का रंग हरा था।"

"हरा?"

"हाँ। और खिड़की के पास एक औरत खड़ी रहती थी। वह मुझे बुलाती थी।" उसने एकदम से सिर झुका लिया। "मुझे उसका नाम भी याद नहीं।"

रमेश ने उसके पास बैठकर बहुत नरमी से कहा, "गुड्डी बेटा, यह फ़िरोज़ है। यह मेरा दोस्त है।"

फ़िरोज़ ने उसे कुछ कहने के लिए मुँह खोला ही था कि रमेश ने हल्के से उसका घुटना दबा दिया। वह चुप हो गया। यह तो उसे पहले ही बता दिया गया था। नाम सामने मत बोलो।

पर गुड्डी की आँखें चौड़ी हो चुकी थीं। उसने बहुत धीमे से कहा, "फ़िरोज़। यह नाम तो बहुत अच्छा है। यह किसी ने मुझे सुनाया था। एक बार।"

"किसने?" फ़िरोज़ ने पूछा।

पर गुड्डी की नज़र फ़िरोज़ से हटकर खिड़की की तरफ़ चली गई थी। उसके चेहरे पर कुछ बदल गया। वह किसी दूर की चीज़ को सुन रही थी।

"वह रो रहा है," उसने कहा।

"कौन रो रहा है?" रमेश ने पूछा।

"बाहर। कोई। मुझे आवाज़ आ रही है।"

तीनों चुप हो गए। फ़िरोज़ ने कान लगाए। उसे कुछ नहीं सुनाई दिया। पर फिर, बहुत हल्के-से, जैसे किसी कमरे के कोने से, एक ट्रिंग-ट्रिंग की आवाज़ आई। फ़ोन की घंटी।

उसका फ़ोन।

* * *

धुंधलपुर के उस पुराने कमरे में, जो अब "फ़िरोज़" का था, सेलफ़ोन मेज़ पर पड़ा बज रहा था। स्क्रीन पर नाम चमक रहा था: "ज़ोया (गिलहरी)"।

कमरे में बैठे फ़िरोज़ ने उसे कुछ देर बजने दिया। वह खिड़की के पास खड़ा था, खिड़की से बाहर हल्की होती बारिश को देख रहा था, और मुस्कुरा रहा था। उसने उसकी ओर देखा तक नहीं। जब फ़ोन चौथी बार बजकर बंद होने वाला था, तब उसने उसे उठाया।

"हेलो, गिलहरी," उसने कहा।

"भाई!" दूसरी तरफ़ से ज़ोया की आवाज़ आई, बेसब्र और राहत से भरी। "तू उठाता क्यों नहीं? मैंने तीन बार किया था! तेरा फ़ोन सुबह से बंद है, रात को भी नहीं उठाया। मैं तो घबरा गई थी। तू ठीक तो है?"

"मैं बिल्कुल ठीक हूँ," फ़िरोज़ ने कहा। "बारिश हो रही थी। चाय पी रहा था।"

"तू और चाय?" ज़ोया हँसी। "तूने तो कहा था कि गाँव की चाय गुड़ जैसी मीठी होती है, पीने के बाद दाँत में कैविटी हो जाती है।"

एक पल की चुप्पी हुई। एक बहुत छोटी, एक साँस भर की।

"हाँ," फ़िरोज़ ने कहा, और उसकी आवाज़ में कोई झिझक नहीं थी। "पर आज अच्छी लगी। बारिश के साथ सब अच्छा लगता है।"

"बारिश? तू तो बारिश से चिढ़ता है। कहता था कि कीचड़ में जूते ख़राब हो जाते हैं।"

"मैं बदल गया हूँ, गिलहरी।"

वहीं, फ़ोन के उस पार, दिल्ली के एक छोटे-से पीजी के कमरे में, ज़ोया के पेन की नोक काग़ज़ पर रुक गई। कमरे में उसकी किताबें फैली थीं, परीक्षा के नोट्स, एक आधा खाया सेब। वह खाट पर पालथी मारे बैठी थी।

"तू बदल गया?" उसने धीरे से पूछा। "एक हफ़्ते में?"

"गाँव का असर है शायद।" फ़िरोज़ की आवाज़ में हँसी थी। "तू सुना। पढ़ाई कैसी है?"

"ठीक है। भाई..."

"हाँ?"

"तू मुझे आज 'गिलहरी' क्यों बुला रहा है?"

इस बार चुप्पी थोड़ी लंबी हुई।

"क्यों?" फ़िरोज़ ने कहा। "हमेशा बुलाता हूँ।"

"नहीं," ज़ोया ने कहा, और अपनी ही आवाज़ से हैरान हुई। "नहीं भाई। तू हमेशा 'गिलहरी' नहीं बुलाता। तू मुझे 'ओए' बुलाता है, या 'कुतिया', जब प्यार आता है। 'गिलहरी' तो तू तब बोलता है जब... जब कुछ ग़लत हो और तू मुझे समझाना चाहता हो कि सब ठीक है। और तू आज पहले ही वाक्य से 'गिलहरी' बोल रहा है।"

उसने सोचा था कि भाई हँस देगा, कहेगा, "अरे पागल, तू हर बात का मतलब निकाल लेती है।" वह उसका इंतज़ार करती रही।

फ़ोन के दूसरी तरफ़ से सिर्फ़ साँस की आवाज़ आई। धीमी, एकसार, बहुत सधी हुई। फिर, एक बहुत मीठी, बहुत ही मुलायम आवाज़ ने कहा:

"मेरी गिलहरी इतनी होशियार कब से हो गई?"

और ज़ोया के हाथ से पेन गिर गया।

यह भाई की आवाज़ थी। पर यह भाई का लहजा नहीं था। भाई कभी इतना ठहर-ठहरकर नहीं बोलता था। उसके वाक्यों में हमेशा जल्दबाज़ी रहती थी, बीच में तंज़ रहते थे, अधूरे वाक्य और मज़ाक रहते थे। यह आवाज़ ऐसी थी जैसे कोई हर शब्द को पहले तौलकर, चखकर, फिर बाहर रख रहा हो। जैसे कोई किसी भाषा को किताब से सीखकर बोल रहा हो।

"भाई," उसने कहा। उसकी आवाज़ धीमी हो गई थी। "तू... मुझे एक चीज़ बता। हमारी अम्मी का दिया वह ताबीज़, जो तू गले में पहनता है, तूने उतारा तो नहीं?"

वह जानती थी कि फ़िरोज़ ने कोई ताबीज़ नहीं पहना। वह नास्तिक-सा था, ताबीज़ों का मज़ाक उड़ाता था। उसने बस एक छोटा-सा जाल बिछाया था, क्योंकि कुछ भीतर से उसे पुकार रहा था कि पूछ।

उसके पास एक और सवाल भी था, वह जो भाई ने ख़ुद उसे दिया था: *पाँचवीं क्लास में मैंने तुझसे क्या माँगा था?* पर उसने वह सवाल जीभ पर आकर भी रोक लिया। आख़िरी फ़ोन पर भाई की टूटी-फूटी, बिना आवाज़ वाली आवाज़ ने कंचे का नाम लिया था, और वह जानती थी कि अगर यह कोई और है, तो फ़ोन पर पूछने से वह सँभल जाएगा। यह सवाल आमने-सामने के लिए बचाकर रखना था, जहाँ चेहरा झूठ बोलता नज़र आए।

"नहीं उतारा," फ़िरोज़ ने तुरंत कहा। "वह तो मेरे साथ ही है।"

ज़ोया का दिल ज़ोर से धड़का। उसने कुछ नहीं कहा।

"क्या हुआ, गिलहरी?" उस तरफ़ से आवाज़ आई। "चुप क्यों हो गई?"

"कुछ नहीं," उसने कहा। उसने ख़ुद को सँभाला, बहुत मुश्किल से, जैसे कोई काँच के गिलास को बिना आवाज़ किए मेज़ पर रखता है। "बस सोच रही थी कि तू ठीक है न। मैं रात को फिर करूँगी।"

"ज़रूर करना। मैं इंतज़ार करूँगा।"

"भाई?"

"हाँ?"

"...ख़याल रखना।"

"तू भी, मेरी गिलहरी," उस आवाज़ ने कहा, और फ़ोन के बाहर भी ज़ोया को लगा कि वह मुस्कुरा रहा है। एक चौड़ी, बहुत चौड़ी मुस्कान, जो कान तक खिंची हुई थी।

फ़ोन कट गया।

ज़ोया बहुत देर तक वैसे ही बैठी रही, फ़ोन कान से लगाए, उस ख़ाली "बीप-बीप" को सुनती हुई। फिर उसने फ़ोन नीचे रखा। उसके हाथ काँप रहे थे। उसने काँपते हाथों से लैपटॉप खींचा, और ब्राउज़र की सर्च-बार में टाइप किया: "दिल्ली से धुंधलपुर, ट्रेन, आज रात।"

उसे सोचना नहीं पड़ा। उसे मालूम था। इस दुनिया में कोई भी उसके भाई की आवाज़ में बोल सकता है, पर कोई भी उसकी बहन को "कुतिया" कहने का प्यार नहीं निभा सकता।

उस रात का टिकट कन्फ़र्म नहीं हुआ। वेटिंग-लिस्ट में था। पर उसने बुकिंग कर दी। फिर वह बैग निकालकर कपड़े रखने लगी, और जब बैग की ज़िप खींच रही थी, फ़ोन फिर बजा।

स्क्रीन पर "भाई" चमक रहा था।

उसने काँपते हाथ से उठाया। "हाँ, भाई?"

वही आवाज़। वही मीठा, सधा हुआ लहजा। पर इस बार बहुत धीमे:

"गिलहरी। तू आने की सोच रही है न?"

ज़ोया के गले में आवाज़ अटक गई।

"मत आना," उस आवाज़ ने कहा। "तेरा भाई ठीक है। मैं सब सँभाल लूँगा।"

और उसने, पहली बार, सुना। बहुत दूर से, फ़ोन की लाइन के पीछे, किसी और आवाज़ का धुँधला-सा, टूटा हुआ एक टुकड़ा। जैसे कोई शीशे के पीछे से चीख़ रहा हो। एक शब्द, सिर्फ़ एक:

"ज़ोया..."

Writer
firoj saifi
Story
जिसने नाम पुकारा
Chapter
7 of 10
Category
Jinn & Spirits
Reading time
20 min
Words
3942
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

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