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एपिसोड 8: शीशे की खिड़की
firoj saifi · Jinn & Spirits · 17 मिनट
धुंधलपुर में वह दोपहर अजीब तरह से अच्छी थी।
बारिश थम चुकी थी। मिट्टी से सोंधी गंध उठ रही थी, छप्परों से बूँदें टपक रही थीं, और गलियों में बच्चे कीचड़ में नंगे पैर छपाक-छपाक दौड़ रहे थे। औरतें भीगे कपड़े आँगन में फैलाते हुए एक-दूसरे को आवाज़ें दे रही थीं। नीम की पत्तियाँ धुलकर हरी चमक रही थीं। ऐसी दोपहर में किसी को डर नहीं लगना चाहिए था।
और पूरे गाँव में सबसे ज़्यादा ख़ुश दिखाई दे रहा था दिल्ली से आया वह पत्रकार।
वह सुबह से गाँव में घूम रहा था। एक बूढ़े किसान के साथ उसने पूरे दस मिनट खड़े होकर गेहूँ की क़िस्मों पर बात की, और बात करते हुए इतने ग़ौर से सुनता रहा कि किसान ख़ुद हैरान हो गया। एक औरत के आँगन में चूल्हे पर चढ़ी गुड़ की चाशनी को उसने झुककर सूँघा और आँखें मूँदकर कहा, "यह तो अमृत है।" औरत हँस पड़ी, उसने एक डली तोड़कर उसकी हथेली पर रख दी। उसने डली मुँह में डाली और बच्चों की तरह चुप होकर देर तक चूसता रहा। फिर उसने औरत से पूछा, "आप रोज़ यह चखती हैं?" औरत ने कहा, "रोज़ कहाँ भैया, तीज-त्योहार पर।" और उसने बहुत गंभीरता से सिर हिलाया, जैसे दुनिया का कोई बड़ा राज़ सुन लिया हो।
पर औरतें दो-दो बातों पर ग़ौर करने लगी थीं।
एक, कि वह बात करते हुए किसी की आँखों में बहुत देर तक देखता है, बिना हटे, बिना पलक झपकाए।
दो, कि जब वह धूप में खड़ा होता है, तो ज़मीन पर उसके साथ कुछ नहीं चलता।
पहली बात पर कुछ ने सोचा कि शहरी लोग ऐसे ही होते हैं। दूसरी बात पर किसी ने कुछ नहीं कहा, पर चौराहे की चर्चा में एक बात दबे स्वर में घूमने लगी। जैसे सूखे पत्तों के बीच कोई चूहा चल रहा हो और आप उसे देख न पाएँ, पर आवाज़ सुनाई दे।
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छोटू ने उसे दूर से देखकर रास्ता बदल लिया था।
वह रहीम चाचा की टपरी के पीछे पानी भर रहा था, जब उसने गली के मोड़ से आते उस आदमी को देखा। उसका हाथ काँपा और बाल्टी का पानी छलक गया। वह बाल्टी वहीं छोड़कर दीवार के सहारे सरक गया और पीछे की ओर से निकलकर एक पुराने, टूटे बैलगाड़ी के पहिये के पीछे जा छिपा।
"छोटू!"
आवाज़ बहुत नरम थी। बहुत परिचित। फ़िरोज़ की आवाज़।
"पहलवान, कहाँ छुप गया? मैं देख रहा हूँ तुझे।"
छोटू ने दोनों हाथ अपने मुँह पर दबा लिए। उसका दिल इतनी ज़ोर से धड़क रहा था कि उसे लगा कि आवाज़ बाहर तक सुनाई दे रही होगी।
क़दमों की आहट आई। धीमी, बेफ़िक्र। फिर पहिये के पास रुक गई। एक पल के लिए सब कुछ ख़ामोश रहा। फिर आदमी घुटनों के बल नीचे बैठा, ठीक पहिये की दूसरी तरफ़, और अपना चेहरा तीलियों के बीच से झुकाकर बोला:
"मिल गया।"
छोटू ने चीख़ने की कोशिश की, पर गले से सिर्फ़ एक तीखी साँस निकली।
"अरे, अरे। डर गया?" फ़िरोज़ की मुस्कान तीलियों के बीच से उसके चेहरे पर पड़ रही थी, कटी हुई, टुकड़ों में। "मैंने तेरे लिए यह लाया था।"
उसने अपनी जेब से हाथ निकाला। उसकी हथेली पर गुड़ की एक डली थी, बहुत सुनहरी, चमकती हुई।
"तुझे यह पसंद है न? तेरे दादा ने बताया था।"
"मैं नहीं खाऊँगा," छोटू ने फुसफुसाकर कहा।
"क्यों?"
"क्योंकि आप भैया नहीं हो।"
पहिये के उस पार का चेहरा बिलकुल स्थिर हो गया। मुस्कान अपनी जगह रही, पर आँखों में कुछ बदल गया। जैसे झील की सतह पर हवा चलना बंद हो जाए और तली दिखने लगे।
"तू तो बहुत होशियार है, पहलवान," उसने कहा, और उसने फिर वही शब्द कहा, वही नाम जिससे फ़िरोज़ उसे पुकारता था। पहलवान। "मैं तुझे चोट नहीं पहुँचाऊँगा। मैं तो बस जानना चाहता था कि तू मुझसे इतना डरता क्यों है।"
"क्योंकि आपकी परछाईं…"
"मेरी परछाईं?"
"आपकी परछाईं नहीं है," छोटू ने कहा, और उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। "भैया की परछाईं आपके पास नहीं, आपके पीछे घसीटती है। मैंने देखा है। जब आप चलते हो, कुछ आपके पीछे घिसटता है। वह रोता है।"
यह झूठ था। फ़िरोज़ की परछाईं गुंबद के आईने के पास पड़ी थी। पर छोटू की आँखों ने जो देखा था, वह उसके लिए झूठ नहीं था।
आदमी ने कुछ देर उसे देखा। फिर उसकी मुस्कान धीरे-धीरे कुछ और कोमल हो गई, ऐसी कोमलता जो किसी के चेहरे पर तब आती है जब वह अपनी सबसे गहरी बात छुपाकर रखना चाहता हो पर कोई उसे पकड़ ले।
"वह रोता है," उसने दोहराया। "हाँ। शायद रोता है।" फिर वह उठ खड़ा हुआ और गुड़ की डली को ज़मीन पर, पहिये के पास रख दिया। "इसे रख। जब मन करे खा लेना। मैं बुरा नहीं हूँ, छोटू। मैं सच में बुरा नहीं हूँ। बस बहुत दिनों बाद बाहर आया हूँ।"
वह चला गया। छोटू देर तक वहीं बैठा रहा, काँपता हुआ। गुड़ की डली धूप में चमकती रही। उसने उसे हाथ नहीं लगाया। पर बहुत देर बाद उसने पाया कि वह उसे घूर रहा था, और उसके मुँह में पानी आ गया था। और उसे अपने आप पर इतना ग़ुस्सा आया कि वह उठकर भाग गया।
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मीरा के स्कूल में उस दिन बच्चे कम थे। बारिश के बाद आधा गाँव खेतों में था।
आख़िरी घंटी बजने के बाद, जब वह बरामदे में बैठी कॉपियाँ जाँच रही थी, उसके सामने किसी की परछाईं पड़ी, और फिर उसे याद आया कि जो परछाईं उसके सामने पड़ी है, वह किसी की नहीं हो सकती। उसने सिर उठाया।
फ़िरोज़ खड़ा था।
वह अपने सबसे अच्छे रूप में था। कपड़े साफ़, बाल सलीक़े से सँवरे हुए, चेहरे पर थकान की जगह एक तरह की ताज़गी। उसके हाथ में एक छोटा काग़ज़ का पैकेट था।
"मीरा," उसने कहा। "मैं तुम्हें कल रात के लिए शुक्रिया कहने आया था। उस रात तुम सबने मेरा बहुत साथ दिया। मैं बहुत डर गया था, और तुम लोग वहाँ थे। मुझे नहीं पता कि तुम सबके बिना मैं…" उसने बात अधूरी छोड़ दी।
मीरा का हाथ कॉपी पर रुका रहा। उसने कलम नीचे रखी। "बैठिए।"
"यह तुम्हारे लिए है।" उसने पैकेट आगे बढ़ाया। मीरा ने खोला। उसमें दो मीठे बताशे थे, और एक छोटी, चमकीली-सी चीज़, एक नीला काँच का कंचा।
मीरा की साँस रुक गई। उसकी उँगलियाँ अपने ब्लाउज़ की उस जगह पर चली गईं, जहाँ फ़िरोज़ का लिखा तह किया हुआ काग़ज़ रखा था।
"यह मुझे बाज़ार में मिला," आदमी ने कहा। उसकी आवाज़ में कोई ख़ास बात नहीं थी। वह बस एक आदमी की आवाज़ थी जो किसी को तोहफ़ा दे रहा हो। "मुझे लगा तुम्हें पसंद आएगा। बादल जैसा लगता है, देखो।"
उसने कंचा हथेली पर रखकर उठाया, धूप की तरफ़। कंचे के भीतर एक सफ़ेद-सा धुँधला बादल घूम रहा था।
"तुम्हें पसंद आया?"
मीरा ने उसकी आँखों में देखा। उसकी आँखों में कुछ नहीं था। न चालाकी, न धमकी। बस जिज्ञासा। एक बच्चे की जिज्ञासा, जो देखता है कि उसकी चाल सफल हुई या नहीं।
*यह जानता है।* मीरा के भीतर किसी ने कहा। *यह जानता है कि फ़िरोज़ ने कंचे वाली बात किसी को बताई है।*
पर कैसे? उसने तो यह बात सिर्फ़ मुझसे कही थी, काग़ज़ पर।
और तब उसने समझा। यह आदमी फ़िरोज़ की याद में था। उसकी हर याद, उसकी हर बात इसके पास थी। जिन्न ने फ़िरोज़ का चेहरा नहीं पहना था। उसने फ़िरोज़ के *भीतर* जाकर उसे पहना था। वह कंचा किसी बाज़ार से नहीं आया था। वह जिन्न ने ख़ुद बनाया था, फ़िरोज़ की याद में से।
"बहुत सुंदर है," मीरा ने कहा। उसके हाथ काँप नहीं रहे थे। बरसों की आदत ने उसे सिखाया था कि डर के आगे अपना चेहरा सपाट कैसे रखा जाता है। "शुक्रिया।"
"मुझे ख़ुशी हुई कि तुम्हें अच्छा लगा।"
वह कुछ देर चुप रहा। बरामदे के बाहर एक चिड़िया पानी में नहा रही थी। उसने उसे देखा। वह चिड़िया देखता रहा, और मीरा ने देखा कि उसकी पलकें एक बार भी नहीं झपकीं। एक मिनट। दो मिनट।
"तुम्हारे पिता…" उसने अचानक कहा, चिड़िया की तरफ़ देखते हुए। "वह तुम्हारी तस्वीर में बहुत ख़ुश लगते हैं।"
मीरा के भीतर कुछ ठंडा हो गया। "आपने मेरे कमरे की तस्वीर देखी थी।"
"हाँ। कल।" उसने पलटकर उसकी ओर देखा, और मुस्कुराया। "मैंने उन्हें देखा था। बहुत दिनों से देख रहा था, दरअसल।"
मीरा ने अपनी साँस सँभाली। "कहाँ से?"
"बस। दूर से।"
उसका जवाब इतना सहज था कि मीरा को एक पल को शक हुआ कि वह वही फ़िरोज़ है, बस थका हुआ, बस उलझा हुआ। फिर उसकी नज़र उसकी कलाई पर गई। घड़ी वहीं थी। पर कलाई पर कोई काला निशान नहीं था। उँगलियों का कोई निशान नहीं था। सादी, साफ़ त्वचा।
निशान इसके पास नहीं था। क्योंकि निशान असली फ़िरोज़ के साथ गया था।
"अच्छा, मैं चलता हूँ," उसने कहा और खड़ा हो गया। "रात को फ़ुरसत मिले तो चाय पर आना। रहीम चाचा की टपरी पर। मैं सबके साथ बैठना चाहता हूँ। बहुत दिनों से किसी के साथ बैठा नहीं।"
वह धीरे-धीरे चला गया। मीरा ने उसकी पीठ देखी। उसकी चाल अब भी फ़िरोज़ जैसी थी, पर जैसे किसी ने फ़िरोज़ को एक मंच पर चलते देखकर उसकी नक़ल सीख ली हो।
उसने कंचा मेज़ पर रखा। फिर सोचकर उसे उठाया, और अपने दुपट्टे में लपेटकर अलमारी में सबसे ऊपरी ताक पर रख दिया। फिर उसने लंबी साँस ली, और पहली बार सोचा कि शायद जिन्न बुरा होने से ज़्यादा ख़तरनाक कुछ और है। वह *अधूरा* है। और जो अधूरा होता है, वह हर चीज़ से पूरा होने की कोशिश करता है।
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शाम को रहीम चाचा की टपरी पर भीड़ थी, जितनी कई हफ़्तों में नहीं हुई थी। लोग चाय के बहाने आए थे, पर असल में वे उसे देखने आए थे।
वह बाँस की बेंच के किनारे बैठा था, हाथ में चाय का गिलास, चेहरे पर वही शांत, ख़ुश-सी मुस्कान। उसके आसपास चार-पाँच आदमी बैठे थे, जिनमें से दो वही ताश खेलने वाले थे जो पहले दिन उसे देखकर चुप हो गए थे। कोई कुछ बोल नहीं रहा था। बस गिलासों की खनक थी और चूल्हे की चटक।
"चाचा," उसने अचानक कहा, "आप लोगों के गाँव में बाबा हुसैनी का नाम सब जानते हैं न?"
पत्ते हवा में थम गए।
रहीम चाचा का हाथ केतली पर रुक गया। "कौन बाबा?"
"सैयद हुसैनी। वही फ़क़ीर, जिन्होंने सौ साल पहले हवेली में…" उसने वाक्य अधूरा छोड़ दिया और चाय का घूँट लिया। "मैंने सुना है, उनकी क़ब्र कहीं यहीं है।"
"क़ब्र नहीं है, बेटा," रहीम चाचा ने बहुत धीमे से कहा। "कहते हैं वे ख़ुद आईने में चले गए थे।"
"अच्छा?" फ़िरोज़ की आँखें चमकीं, इतनी कि पास बैठे आदमी ने बेचैनी से पहलू बदला। "और उनका पूरा नाम? असली नाम? सिर्फ़ 'बाबा हुसैनी' तो उपाधि हुई न? जैसे किसी को 'पंडित जी' कहते हैं।"
"हम बुज़ुर्गों के नाम नहीं तोलते," रहीम चाचा ने कहा, और उनकी आवाज़ में पहली बार सख़्ती थी। "जो नाम पूरा याद है, वह भी नहीं लेते। और जो आधा याद है, उसे तो हरगिज़ नहीं।"
फ़िरोज़ ने एक पल उन्हें देखा। फिर वह खिलखिलाकर हँस पड़ा, और उसकी हँसी में न कोई बनावट थी, न कोई तंज़। "मैं मज़ाक कर रहा था, चाचा। मैं तो बस देख रहा था कि आप लोग कितना डरते हैं। आप सबको देखकर मुझे बहुत अच्छा लगता है। इतने डरे हुए, और फिर भी हर रोज़ चाय बनाते हैं, हर रोज़ चौक में बैठते हैं। यह कितनी सुंदर चीज़ है।"
कोई नहीं हँसा।
तभी उसकी जेब में फ़ोन की स्क्रीन जगमगाई। उसने उसे बाहर निकाला, पढ़ा। रहीम चाचा, जो पास ही खड़े थे, ने कनखियों से स्क्रीन की झलक देखी। ऊपर नाम था: **ज़ोया**। और संदेश का एक टुकड़ा: *"…मैं आ रही हूँ। मना मत करना। सुबह की गाड़ी से…"*
फ़िरोज़ ने संदेश बहुत देर तक पढ़ा। उसके चेहरे का भाव बदला नहीं, पर उसकी उँगली ने स्क्रीन को हल्के से सहलाया, जैसे किसी बहुत नाज़ुक चीज़ को छुआ जाए। फिर उसने फ़ोन उलटकर बेंच पर रख दिया और बहुत धीमे, किसी से नहीं, बस अपने आप से कहा:
"गिलहरी, तू बहुत ज़िद्दी है।"
रहीम चाचा के हाथ का गिलास हल्का-सा काँपा। इस वाक्य में दर्द था, असली दर्द, और वह उस चेहरे से बिलकुल मेल नहीं खा रहा था जो पूरी शाम हँसता रहा था। जैसे जिन्न के भीतर कहीं कोई दूसरी चीज़ भी पल रही हो, जो फ़िरोज़ से उधार ली गई थी और अब ख़ुद उसके सीने में जड़ें पकड़ रही थी।
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अक्स-नगरी में फ़िरोज़ ने उस दिन पहली बार बाहर का दरवाज़ा देखा।
रमेश उसे एक संकरे गलियारे में ले आया था, जो हवेली के उस हिस्से की तरफ़ जाता था जो बाहर की असली हवेली में कभी नहीं था। यहाँ दीवारें अजीब ढंग से चिकनी थीं। कोई चूना नहीं, कोई ईंट नहीं। बस एक ठंडी, काली-सी सतह, जिसमें दूर कहीं एक धुँधली रोशनी चलती दिखती थी।
"यह दीवार देख," रमेश ने कहा, "इसे काँच की दीवार समझ। यह उसी आईने का एक हिस्सा है, जिसके अंदर हम हैं। बाहर वाले को यह सादी दीवार दिखती है। हमें यह खिड़की है।"
"खिड़की किस तरफ़ खुलती है?"
"बाहर। पर खुलती तभी है जब कोई बाहर से आईने के सामने खड़ा होकर अपना नाम पुकारे। जिस नाम को वह पुकारता है, वह उसका अपना होना चाहिए। उसकी आवाज़ आईने की सतह से टकराती है, और वह सतह एक पल के लिए पतली हो जाती है।"
"पतली?"
"जैसे गरम पानी पर जमी मलाई। कोई फूँक मारे तो हिल जाती है।" रमेश ने दीवार पर हथेली रखी, और फ़िरोज़ ने देखा कि उसकी उँगलियों के पोरों के नीचे काँच बहुत हल्के-से काँप रहा है। "पर हर बार नहीं। बीस साल में मैंने गिनकर चार बार बाहर की झलक देखी है। और चार में से सिर्फ़ दो बार किसी को देख पाया।"
"किसे?"
रमेश ने जवाब नहीं दिया। बस उसकी आँखों में वही पुरानी, दबी हुई चमक आई।
"फ़िरोज़," उसने कहा। "तू समझ रहा है न? हमारे लिए यही एक रास्ता है। बाहर के किसी को भरोसा दिलाने का, अपनी बात पहुँचाने का, कि जो बाहर घूम रहा है वह तू नहीं है।"
"पर नाम पुकारने के लिए मुझे क्या करना होगा? मेरे पास तो…"
"तुझे कुछ नहीं करना। जो पुकारता है, जो खड़ा होता है, वही दरवाज़ा खोलता है। हम सिर्फ़ इंतज़ार कर सकते हैं कि कोई आए। और वह कोई वही होगा जो तुझे जानता है, तुझ पर भरोसा करता है और अपना नाम तेरे सामने पुकारने की हिम्मत रखता है।"
"और अगर वह आ जाए," फ़िरोज़ ने पूछा, "तो हम यहाँ सुरक्षित रहेंगे?"
"पूरी तरह नहीं।" रमेश ने गलियारे के उस सिरे की ओर इशारा किया, जहाँ अँधेरा सबसे गाढ़ा था। "वहाँ जिन्न का पहरेदार बैठता है। उसका ही एक हिस्सा, जो यहाँ छोड़ा गया है। आम तौर पर सोया रहता है, पर जब बाहर कोई नाम पुकारता है तो जाग जाता है, और नए आदमी की बू सूँघ लेता है। उसे बैठाए रखने का एक ही तरीक़ा है, गुड्डी की लोरी। इसलिए वह हमारे साथ आई है।"
गलियारे के मोड़ पर गुड्डी चुपचाप खड़ी थी, अपने अकेले जूते की नोक से फ़र्श को सहलाती हुई। उसने फ़िरोज़ की नज़र महसूस करके सिर उठाया और बहुत गंभीरता से सिर हिला दिया, जैसे कोई ज़िम्मेदारी सँभाल ली हो।
"मीरा।" फ़िरोज़ ने धीरे से कहा। "वह आएगी।"
रमेश ने चौंककर देखा। "तुझे कैसे पता?"
"क्योंकि मैं उसे जानता हूँ।" फ़िरोज़ ने काँच की ठंडी सतह पर हथेली टिका दी। उसे अपनी ही परछाईं नहीं दिख रही थी, पर उसने कल्पना की कि वह काँच के उस पार कुछ देख रहा है, गाँव की गली, स्कूल का आँगन, बारिश के बाद की धुली हुई धूप। "वह बीस साल से इंतज़ार कर रही है कि कोई दरवाज़ा खटखटाए।"
रमेश ने कुछ नहीं कहा। पर वह फ़िरोज़ के पास खड़ा रहा, और उसने भी अपनी हथेली उसी काँच पर टिका दी।
काँच के उस पार कोई चीज़ बहुत धीमे-धीमे चल रही थी, जैसे धुंध में कोई चलता है। फ़िरोज़ को लगा कि वह जो देख रहा है, वह बाहर का आँगन है, और उसमें एक छोटी-सी लालटेन की रोशनी दूर से इस ओर बढ़ रही है। उसने साँस रोक ली। रोशनी रुक गई। फिर मुड़कर दूसरी तरफ़ चली गई। रमेश के कंधे ढीले पड़ गए।
"कोई और होगा," उसने धीमे से कहा।
"या वह आएगी, पर थोड़ी देर बाद," फ़िरोज़ ने कहा। "मीरा को हिम्मत इकट्ठी करनी पड़ेगी। वह आसान लड़की नहीं है।"
"तू उसे कितने दिन से जानता है?"
"चार दिन।"
"और इतना भरोसा?"
फ़िरोज़ हँसा, एक छोटी, थकी हुई हँसी। "पत्रकार हूँ, रमेश जी। मैंने सात साल तक झूठ पकड़े हैं। सच पहचानना भी सीख लेता है आदमी। वह सच है। सिर से पाँव तक।"
वे दोनों काफ़ी देर तक वहीं खड़े रहे। इंतज़ार करते हुए। बाहर शाम उतर रही थी, उन्हें पता नहीं था। यहाँ शाम नहीं होती थी। पर काँच के पीछे की धुँधली रोशनी थोड़ी-थोड़ी लाल पड़ने लगी थी।
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मीरा रात को हवेली नहीं जाना चाहती थी। उसने तय किया था कि नहीं जाएगी। पर शाम होते-होते उसके पाँव अपने आप गाँव के पिछवाड़े की पगडंडी की तरफ़ मुड़ गए।
वह जानती थी कि यह ग़लत है। मौलवी क़ासिम ने साफ़ कहा था, अकेले मत जाना। रहीम चाचा ने उसके हाथ पकड़कर मनाही की थी। पर कल की रात जो उसने सुनी थी, "फ़िरोज़" के मुँह से निकला वह मीठा वाक्य जो उसके पिता का ज़िक्र लेकर आया था, वह उसके भीतर किसी काँटे की तरह धँसा था।
और अगर *वह* आईने में हैं? पिताजी? अगर फ़िरोज़ वहाँ है? और अगर कोई एक भी तरीक़ा हो…
वह बरगद के पास पहुँची तो रात उतर चुकी थी। बरगद की छाया में एक अलग तरह का अँधेरा था, घना और भारी। हवेली सामने खड़ी थी। फाटक खुला हुआ था, किसी ने नहीं खोला, वह बस खुला था, जैसे उसे आने वाले का इंतज़ार हो।
मीरा ने लालटेन ऊँची की। आँगन ख़ाली था। नीम की सूखी पत्तियाँ हवा में सरसरा रही थीं। सीढ़ियों के पास, ऊपर, गुंबद के नीचे वाला दरवाज़ा खुला था और भीतर से एक बहुत हल्की, बहुत फीकी नीली रोशनी बाहर आ रही थी।
उसने अपने भीतर के सारे डर को एक जगह इकट्ठा किया और उसे अपनी मुट्ठी में भींच लिया। फिर उसने सीढ़ियाँ चढ़ना शुरू किया।
हर पायदान की चर्र उसके पिता के पाँव की चर्र से मिलती थी। वह इसी सीढ़ी पर बीस साल पहले चढ़े होंगे, इसी तरह मन में सब कुछ झेलते हुए। मीरा को लगा कि लकड़ी में कोई याद बाक़ी है।
दरवाज़ा पार करके वह कमरे में आई।
कमरा बड़ा था, गोल, ऊँची गुंबदनुमा छत वाला। बीच में वह खड़ा था।
काला आईना।
वह सात फ़ुट ऊँचा था, काले लकड़ी के फ्रेम में जड़ा हुआ, जिस पर नक़्क़ाशी के कुछ लहरदार निशान थे, मानो बेलें हों, या कोई पुरानी लिपि। उसकी सतह धूल से भरी थी, पर कुछ जगहों पर साफ़ थी, जहाँ किसी ने हथेली से पोंछा हो। और उस साफ़ जगह के पीछे गहराई थी। अथाह, काली, जिसमें लालटेन की रोशनी जाकर खो जाती थी।
मीरा ने लालटेन ज़मीन पर रखी। उसके हाथ में पसीना आ गया था। उसने दुपट्टा सिर पर कस लिया।
"पापा," उसने बहुत धीमे से कहा।
कोई जवाब नहीं आया।
उसने आईने के क़रीब जाकर, सतह को ग़ौर से देखा। उसमें उसका अपना चेहरा दिख रहा था। पीला, थका हुआ, आँखों में बीस साल की नींद की कमी। पर उसके पीछे, कमरे की गहराई में, उसे कुछ हिलता दिखा। एक पतली, लंबी-सी परछाईं।
उसने एक गहरी साँस ली।
"मेरा नाम मीरा है," उसने कहा, और उसकी आवाज़ पूरे कमरे में फैल गई। "मैं मीरा वर्मा हूँ। मैं रमेश वर्मा की बेटी हूँ। मैं धुंधलपुर की मीरा हूँ।"
आईने की सतह ने जवाब दिया।
सबसे पहले हल्की-सी सिहरन उठी, जैसे पानी पर हवा का पहला झोंका। फिर सतह की काली गहराई में एक पतली-सी दरार चमकी, चाँदी की लकीर जैसी। और दरार के पीछे से, बहुत दूर, बहुत धीमे, किसी के हाँफने की आवाज़ आई।
मीरा की साँस थम गई।
*(अगले एपिसोड में जारी…)*
- Writer
- firoj saifi
- Story
- जिसने नाम पुकारा
- Chapter
- 8 of 10
- Category
- Jinn & Spirits
- Reading time
- 17 min
- Words
- 3263
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
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