Pretika › Jinn & Spirits › जिसने नाम पुकारा

एपिसोड 9: यह मैं नहीं हूँ

firoj saifi · Jinn & Spirits · 17 मिनट

कुछ साँसें। रमेश ने कहा था, सिर्फ़ कुछ साँसें।

फ़िरोज़ ने उन्हें गिनना शुरू किया, जैसे कोई डूबता हुआ आदमी सतह के ऊपर खुली हवा गिनता है। एक। काँच की ठंडी सतह उसकी हथेली के नीचे नर्म पड़ रही थी, पानी में घुलती हुई बर्फ़ की तरह। दो। उसके पार, कमरे की धुँधली आकृतियाँ और साफ़ हुईं: धूल जमा फ़र्श, टूटी खिड़की से आती चाँदनी, और बीच में, लालटेन की पीली रोशनी में, एक लड़की।

तीन। मीरा।

उसने दुपट्टा सिर पर कस रखा था, चोटी कंधे से आगे डली हुई थी, और उसकी आँखें, वे तेज़, थकी, सब कुछ देख चुकी आँखें, काँच के उस पार से सीधे उसकी आँखों में देख रही थीं। उसे देख नहीं सकती थी, फ़िरोज़ जानता था। उसे वह सिर्फ़ अपना अक्स दिखता होगा। पर वह देख रही थी जैसे किसी को पुकार रही हो।

चार।

"पापा?" उसकी आवाज़ आई। धीमी, फटी हुई, और इतनी साफ़ कि फ़िरोज़ को लगा आवाज़ उसके अपने गले में बोली है।

फ़िरोज़ ने बग़ल में देखा। रमेश दीवार से पीठ सटाए खड़ा था, उसके हाथ कंधों से लटके हुए, उसके होंठ हिल रहे थे, पर आवाज़ नहीं निकल रही थी। बीस साल से दबा हुआ शब्द, जो अब गले में आकर अटक गया था, जैसे किसी ने ताला लगाकर चाबी निगल ली हो।

"बोलिए," फ़िरोज़ ने फुसफुसाकर कहा। "रमेश जी। बोलिए। वक़्त नहीं है।"

रमेश ने सिर हिलाया, एक बार, दो बार। उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे, पर होंठ से सिर्फ़ हवा निकल रही थी। पाँच साँसें। छह।

फ़िरोज़ ने आख़िरी फ़ैसला किया। वह रमेश के सामने से हटा और सीधे काँच की सतह के सामने खड़ा हो गया, इतना क़रीब कि उसकी साँस से सतह पर हल्की धुंध उठ गई। उसने अपना मुँह खोला, और बोलने के लिए वही शब्द चुने जो सबसे ज़्यादा ज़रूरी थे, सबसे सीधे, बिना किसी तंज़ के, बिना किसी सजावट के।

**"मीरा। यह मैं नहीं हूँ।"**

आवाज़ आईने की सतह से टकराई और बाहर कमरे में फैल गई। फ़िरोज़ ने देखा कि लड़की की पीठ सीधी हो गई, जैसे किसी ने उसके रीढ़ में बिजली दौड़ा दी हो। उसके हाथ से नीला पेन छूटकर फ़र्श पर गिर पड़ा और लुढ़कता हुआ आईने के पाये तक चला गया।

"फ़िरोज़?" उसने कहा, और उसकी आवाज़ में अविश्वास, डर और एक लपकती हुई राहत थी, सब एक साथ। "फ़िरोज़, तुम… तुम सुन सकते हो मुझे?"

"जो बाहर घूम रहा है," फ़िरोज़ ने तेज़ी से बोलना शुरू किया, हर शब्द को पकड़कर, जैसे कोई गिरती हुई चीज़ को थामे, "वह मैं नहीं हूँ। वह…"

उसकी आवाज़ अचानक गड़गड़ाहट में घुल गई। आईने की सतह पर ज़ोर की लहर उठी, फ़िरोज़ की हथेली के नीचे काँच फिर सख़्त होने लगा। सात साँसें। आठ।

"पापा," मीरा ने कहा, और आईने की ओर एक क़दम बढ़ी, "पापा, अगर आप वहाँ हैं, अगर आप सुन सकते हैं…"

रमेश ने अपनी पूरी ताक़त इकट्ठी की। फ़िरोज़ ने देखा, उसकी गर्दन की नसें उभर आईं, उसकी मुट्ठियाँ कस गईं, उसका सारा शरीर जैसे बीस साल का बोझ उठाकर एक शब्द के लिए ज़ोर लगा रहा था।

और तब एक फटी हुई, कर्कश, बहुत पुरानी, मुश्किल से पहचानी जा सकने वाली आवाज़ उसके गले से निकली:

**"…मीरा…"**

कमरा सुन्न हो गया।

मीरा की हथेलियाँ उसके मुँह पर गईं। उसके घुटने मुड़े और वह फ़र्श पर बैठ गई, आईने के सामने, घुटनों के बल, जैसे किसी देवता के सामने। उसके कंधे काँपने लगे। उसने एक शब्द बोलना चाहा, फिर दूसरा, पर उसके होंठों से सिर्फ़ एक नन्ही, टूटी हुई आवाज़ निकली, जिसे सुनकर फ़िरोज़ को लगा कि उसने अपनी ज़िंदगी में कभी किसी को इस तरह रोते नहीं सुना।

"पापा…" उसने कहा।

"…बिटिया…" रमेश की आवाज़ टुकड़ों में निकल रही थी, जैसे कोई ज़ंग लगी मशीन पहली बार चल रही हो। "…तू… बड़ी… हो गई…"

नौ साँसें। दस।

और तब फ़िरोज़ को अपने पीछे कुछ हलचल महसूस हुई।

उसने सिर घुमाया। गलियारे के उस पार, जहाँ पहरेदार दीवार से टेक लगाए बैठा था, उसका सिर घुटनों के बीच से धीरे-धीरे उठ रहा था। उसकी लंबी, गाँठदार उँगलियाँ ज़मीन पर बढ़ीं। उसने साँस खींची, एक लंबी, सूँघती हुई साँस, जैसे हवा में कोई जानी-पहचानी महक आ गई हो।

"रमेश जी," फ़िरोज़ ने फुसफुसाया। "वह जाग रहा है।"

रमेश ने नहीं सुना। वह आईने से चिपका खड़ा था, उसके हाथ काँच पर थे, और उसके चेहरे पर आँसुओं और मुस्कान का वह मिलाजुला भाव था जो किसी ने बीस साल तक जिया हो और अब अपनी आँखों से देखा हो।

"रमेश जी!"

तभी एक छोटा-सा हाथ फ़िरोज़ की कलाई पर कस गया। गुड्डी, जो चुपचाप गलियारे के मोड़ पर खड़ी थी, फ़िरोज़ को पीछे की ओर खींचने लगी। उसकी भूरी आँखें डर से बड़ी थीं।

"वह जाग गया," उसने सलीक़े से फुसफुसाया, "और अब वह हमें सूँघ चुका है। चलो। अभी।"

"पर रमेश जी…"

"वह अपनी बेटी को देख रहे हैं। उन्हें खींचना मत। चलो!"

पहरेदार उठ खड़ा हुआ। उसका सिर छत की कड़ियों को लगभग छू रहा था। उसकी आँखें नहीं थीं, उनकी जगह दो गहरे, खोखले गड्ढे थे, जिनमें कोई चीज़ घूम रही थी, और वह सीधे आईने की ओर देख रहा था। उसने धीमे-धीमे चलना शुरू किया।

फ़िरोज़ ने आख़िरी बार काँच की तरफ़ देखा। बाहर मीरा अब भी घुटनों के बल बैठी थी, उसके आँसू लालटेन की रोशनी में चमक रहे थे। काँच फिर से सख़्त हो रहा था। रमेश ने अपनी हथेली को आख़िरी बार उसके चेहरे के सामने रखा, जैसे उसके गाल को छू रहा हो, और फुसफुसाया: "…मैं यहीं हूँ… मैं हमेशा यहीं था…"

और फिर गुड्डी ने फ़िरोज़ को खींचकर काँच के सामने से हटा दिया।

---

गलियारे में पहरेदार उनके और सीढ़ियों के बीच खड़ा था।

वह इतना बड़ा था कि उसके कंधों से गलियारे की दोनों दीवारें लगभग छू रही थीं। उसके खोखले गड्ढों वाले चेहरे पर कोई भाव नहीं था, बस एक अंधी, पैनी भूख थी, जो फ़िरोज़ की त्वचा पर ऐसे रेंग रही थी जैसे चींटियाँ चल रही हों। उसने एक क़दम बढ़ाया। फ़र्श की लकड़ी बिना आवाज़ के झुकी, और आवाज़ आधा सेकंड बाद आई, जैसे हर आहट अपने ही साये से पिछड़ रही हो।

"भागो मत," गुड्डी ने बहुत धीमे से कहा। उसके नन्हे पाँव में अकेला जूता ज़मीन से चिपका हुआ था। "यह उसकी चाल है। जो भागता है, उसे वह सुन लेता है। जो चुप रहता है, उसे सूँघना पड़ता है। और मुझे सूँघना उसे मुश्किल लगता है।"

"क्यों?"

"क्योंकि मैं बहुत पुरानी हूँ। पुरानी चीज़ों की महक मिट्टी जैसी होती है।"

फ़िरोज़ ने अपनी साँस रोक ली। पहरेदार एक क़दम और आगे आया। अब वह इतना पास था कि फ़िरोज़ को उसके कुर्ते से आती वह खटास महसूस हो रही थी, बासी दूध और ज़ंग लगे लोहे जैसी। उसकी लंबी उँगली हवा में बढ़ी और फ़िरोज़ के कंधे से एक बित्ता दूर आकर रुक गई।

तब गुड्डी ने गुनगुनाना शुरू किया।

बहुत हल्का, बहुत धीमा, बिना किसी जल्दबाज़ी के। वही आधी उलटी लोरी, जो फ़िरोज़ ने उस पहली शाम को दूर से सुनी थी। सुर इतने पुराने थे कि उनके नीचे कोई भाषा नहीं बची थी, सिर्फ़ एक धुन, जो पूरी दुनिया में हर माँ ने कभी न कभी किसी बच्चे के कान में सरकाई होगी। *"…सो जा, मेरी चिड़िया… सो जा, मेरे चाँद… कल सुबह फिर खिड़की खुलेगी… कल सुबह फिर आना…"*

पहरेदार की उँगली हवा में थम गई।

उसने सिर टेढ़ा किया। जैसे कोई कुत्ता किसी बहुत पुरानी, जानी-पहचानी आवाज़ को सुन रहा हो। उसके खोखले गड्ढों में घूमती चीज़ धीमी पड़ी। उसने एक क़दम पीछे लिया, फिर एक और। और बिना कुछ किए, बिना कोई आवाज़ किए, वह धीरे-धीरे नीचे की ओर झुकने लगा। घुटने मुड़े, कंधे गिरे, और वह फिर उसी जगह दीवार से पीठ टिकाकर बैठ गया, जहाँ वह पहले था। उसकी गर्दन फिर घुटनों के बीच झुक गई।

उसकी साँस फिर गहरी और धीमी हो गई।

गुड्डी ने गुनगुनाना बंद नहीं किया। वह फ़िरोज़ का हाथ थामे धीरे-धीरे पीछे हटती रही, पंजों के बल, एक-एक क़दम, उसकी आँखें पहरेदार पर टिकी हुई। गलियारे के मोड़ पर पहुँचकर ही उसने गाना रोका और एक लंबी साँस छोड़ी, इतनी लंबी कि लगा वह इतने बरसों की साँस थी।

"यह तो…" फ़िरोज़ ने फुसफुसाया। "यह तुमने कैसे किया?"

"मुझे नहीं पता," गुड्डी ने कहा, और अपनी चोटी का खुला रिबन उँगली पर लपेटने लगी। "बस जब वह पास आता है, मुझे यह गाना याद आ जाता है। और वह सुनता है। वह इसे सुनकर हमेशा रुक जाता है।"

"क्यों?"

"मुझे नहीं पता," उसने फिर दोहराया। फिर, धीमे से, जैसे ख़ुद से कह रही हो: "शायद क्योंकि यह उसे भी कोई याद दिलाता है।"

फ़िरोज़ ने कुछ नहीं कहा। उसके भीतर का पत्रकार एक और सुराग़ अपने ज़ेहन की उस नोटबुक में लिख रहा था, जो अब सिर्फ़ यादों में बची थी: *जिन्न का पहरेदार एक लोरी पर रुकता है। लोरी गुड्डी की माँ की है। जिन्न को कुछ याद आता है।*

वे हवेली के पिछवाड़े वाले रास्ते से गुज़रते हुए हॉल के किनारे पहुँचे। वहाँ परछाइयाँ वैसे ही मेज़ के चारों ओर झुकी खड़ी थीं, पर अब उनकी फुसफुसाहट बदल गई थी। *"…नाम… किसी ने बोला… ऊपर किसी ने नाम बोला…"* वे एक साथ छत की ओर सिर उठाए हुए थीं, जैसे कोई भूखी भीड़ ऊपर की मंज़िल से गिरे किसी निवाले की गंध सूँघ रही हो।

"वे जानती हैं," गुड्डी ने फुसफुसाया। "जब भी बाहर से कोई नाम पुकारता है, उन्हें पता चल जाता है। वे उसे सुन लेती हैं और बहुत दिनों तक भूलती नहीं।"

"तो मीरा…"

"वह भी अब उनकी सूची में है।" गुड्डी की आवाज़ बहुत छोटी हो गई थी। "इसीलिए मैं कहती हूँ, नाम बोलना बहुत महँगा सौदा है।"

फ़िरोज़ का सिर घूम गया। उसने अपना हाथ ऊपर उठाया, और तब उसने देखा। उसकी उँगलियों के पोरों के रंग में एक अजीब-सा फीकापन आ गया था, जैसे किसी ने उन्हें हल्का-सा पानी से धो दिया हो। जिस हाथ से उसने आईने की सतह को छुआ था, उसकी उँगलियाँ अब पारदर्शी हो रही थीं। उनके पार, दीवार की नक़्क़ाशी धुँधली-सी झलक रही थी।

"यह क्या…"

"यह क़ीमत है," गुड्डी ने कहा। "तुमने आवाज़ बाहर भेजी। हर बार जब आवाज़ बाहर जाती है, तुम्हारा थोड़ा-सा हिस्सा उसके साथ चला जाता है। जब तक तुम्हारा नाम याद है, यह वापस भर जाएगा। पर बहुत बार मत करना।"

फ़िरोज़ ने मुट्ठी बंद की। वह पारदर्शी हाथ अब भी उसका अपना था, पर उसे लगा जैसे वह उसे किसी और की चीज़ की तरह देख रहा है, जो उधार ली गई हो। उसने ख़ुद से कहा: *फ़िरोज़ ख़ान। अट्ठाईस साल। पत्रकार। ज़ोया का भाई।* और तब जाकर उँगलियों में फिर हल्का-सा रंग लौट आया।

---

कोठरी में रमेश काफ़ी देर बाद लौटा।

उसका चेहरा आँसुओं से तर था, पर उसके होंठों पर एक छोटी, हैरान मुस्कान थी, ऐसी जैसी किसी ने बहुत सालों बाद अचानक धूप देखी हो। वह दीवार के पास गया, कंकड़ उठाया, और बहुत धीरे से, बहुत सावधानी से, एक नई लकीर खींची। पर वह लकीर बाक़ी हज़ारों लकीरों से अलग थी। उसने उसके नीचे एक छोटा-सा गोला भी बनाया, जैसे किसी ने तारीख़ पर निशान लगाया हो।

"आज का दिन," उसने कहा, और उसकी आवाज़ अब भी भर्राई हुई थी, पर उसमें एक नई, काँपती हुई ताक़त थी, "इस पूरी दीवार पर सबसे ख़ास दिन है।"

"आपने उसे सुना," फ़िरोज़ ने कहा।

"मैंने उसे देखा," रमेश ने कहा। "वह बहुत बड़ी हो गई है। उसने अपनी माँ की तरह चोटी आगे डाली थी। और वह रो रही थी, पर उसने सीधी रीढ़ से रोया। जैसे उसे पता हो कि रोना भी लड़ाई का हिस्सा है।" उसने चश्मा उतारा और आँखें मलीं। "मैंने उससे कुछ ज़्यादा नहीं कहा। सिर्फ़ दो शब्द। बीस साल सोचता रहा था कि मैं उससे क्या कहूँगा। और फिर, जब मौक़ा मिला, मुँह से सिर्फ़ दो शब्द निकले।"

"वे सबसे ज़रूरी दो शब्द थे," फ़िरोज़ ने कहा।

रमेश हँसा, एक छोटी-सी, टूटी हुई हँसी। फिर उसने फ़िरोज़ की तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में पहली बार कोई ठोस, पक्का इरादा दिखा। "सुन, फ़िरोज़। अब मैं यहाँ बैठा इंतज़ार करने वाला नहीं हूँ। बीस साल मैंने बस इसलिए जिया कि मेरा नाम न खोए। अब मैं इसलिए जिऊँगा कि उसे यहाँ से निकाल सकूँ, और इस सबको ख़त्म कर सकूँ।"

फ़िरोज़ ने सिर हिलाया। उसने रमेश के कंधे पर हाथ रखा। उसकी अपनी उँगलियाँ, जो कुछ देर पहले पारदर्शी थीं, अब पूरी तरह लौट आई थीं।

"चलिए," उसने कहा। "तो शुरू करते हैं।"

---

बाहर कमरे में, लालटेन की रोशनी में, मीरा आईने के सामने बैठी रही।

सतह फिर से धूल से ढक गई थी। उसमें अब सिर्फ़ उसका अपना अक्स दिख रहा था, पीला, भीगे गालों वाला, आँखों के नीचे बीस साल की थकान लिए। उसने काँपते हाथ से आईने की सतह को छुआ। ठंडी, सख़्त, चुप।

*"…तू बड़ी हो गई…"*

उसके कानों में अब भी वही शब्द गूँज रहे थे। उसने बीस साल इस आवाज़ को याद करने की कोशिश की थी। बचपन की धुँधली स्मृतियों में, जहाँ पिता की गोद थी, चश्मे की खनक थी, और रात को सुनाई गई कहानियों की गर्म गूँज। वह आवाज़ धीरे-धीरे उसकी याद से घिसती जा रही थी। हर साल थोड़ी और धुँधली। उसे डर था कि एक दिन वह पूरी तरह भूल जाएगी कि पापा की आवाज़ कैसी थी।

अब नहीं भूलेगी। अब वह उसे हमेशा याद रखेगी, यहाँ, कमरे के बीचोबीच, जहाँ उसने उसे आख़िरी बार सुना था।

"पापा," उसने कहा। "मैं आऊँगी। मैं आपको निकाल लूँगी। चाहे कुछ भी हो जाए।"

कोई जवाब नहीं आया। कमरे में सिर्फ़ चुप्पी थी।

फिर पीछे से किसी ने बहुत धीरे से कहा:

"मीरा?"

मीरा का पूरा शरीर जम गया।

वह आवाज़ दरवाज़े पर से आई थी। आवाज़ फ़िरोज़ की थी, वही नरम, वही थकी हुई, वही परिचित, पर अब उसमें कुछ और भी था। एक सावधानी। एक बहुत धीमी, सधी हुई चौकसी।

उसने बहुत धीरे से सिर घुमाया।

दरवाज़े की चौखट पर वह खड़ा था। उसके हाथ में एक छोटी-सी लालटेन थी, जिसकी लौ नीली पड़ रही थी। उसके चेहरे पर वही मुस्कान थी, पर बहुत हल्की, जैसे किसी ने मुस्कान को बहुत धीरे से पहन रखा हो, ताकि वह टूट न जाए।

"तुम यहाँ क्या कर रही हो?" उसने पूछा। आवाज़ नर्म थी। चिंता से भरी हुई। "इतनी रात गए, अकेली, यहाँ ऊपर?"

मीरा ने ख़ुद को सँभाला। यह कैसे हुआ, उसे ख़ुद नहीं पता, पर उसके अंदर से कोई पुराना, बहुत पुराना हिस्सा बाहर आ गया। वह जिसने बीस साल तक सबकी आँखों में आँखें डालकर यह कहना सीखा था कि *"मैं ठीक हूँ।"* उसने अपने आँसू हथेली के पीछे पोंछे और उठकर खड़ी हो गई।

"नींद नहीं आ रही थी," उसने कहा। उसकी आवाज़ ठहरी हुई थी। "मैं… मैं सोच रही थी कि तुम्हारी तबियत कैसी है। फिर लगा कि तुम शायद यहीं होगे। दरवाज़ा खुला था तो ऊपर आ गई।"

"ऊपर आना ख़तरनाक है।"

"मुझे पता है। मैं बस…" उसने आईने की ओर इशारा किया, और बड़े सहज ढंग से, जैसे कोई कहानी का आख़िरी सिरा बाँध रहा हो, बोली: "…मैं देखना चाहती थी। कि जिस चीज़ ने तुम्हें इतना डराया, वह कैसी है। पापा के बारे में भी सोच रही थी। शायद… शायद यहाँ आकर उनके कुछ क़रीब होने का एहसास हुआ।"

वह चुपचाप खड़ा रहा। उसकी आँखों में अँधेरा था, इतना कि लालटेन की नीली लौ भी उसमें जाकर गुम हो जाती थी। उसने सिर थोड़ा तिरछा किया।

"वह तुम्हारे बहुत क़रीब थे," उसने कहा। "यह मैं जानता हूँ।"

मीरा की मुट्ठी बंद हो गई। उसके नाख़ून हथेली में गड़ गए, पर चेहरे पर उसने कुछ नहीं आने दिया।

"चलो," उसने कहा। "अब चलें। रात बहुत हो गई है।"

मीरा ने पीछे मुड़कर कमरे को एक आख़िरी बार देखा, और उसकी साँस थम गई। नीला पेन आईने के पाये के पास पड़ा था, लालटेन की रोशनी में चमकता हुआ। उसे उठाना ही था, पर उसके पाँव जैसे फ़र्श में जम गए। अगर वह झुककर उठाती, तो आईने की ओर एक बार और देखना पड़ता। और अगर नहीं उठाती…

"यह तुम्हारा है?"

वह पहले ही उसके पास से गुज़रकर आईने तक पहुँच चुका था। उसने झुककर पेन उठाया, ग़ौर से देखा, टोपी की उस बारीक दरार को अँगूठे से सहलाया, जो बरसों पुरानी थी। उसके चेहरे पर एक भाव आया, जो ठीक से पढ़ा नहीं जा सकता था। शायद श्रद्धा। शायद ईर्ष्या। शायद कुछ ऐसा जिसका कोई नाम उसकी भाषा में नहीं था।

"बहुत पुराना है," उसने कहा।

"हाँ।"

"किसी ने तोहफ़े में दिया था?"

मीरा ने उसके हाथ से पेन ले लिया। उसकी उँगलियाँ उसकी उँगलियों से छुईं, गर्म, नर्म, जीवित। "मेरे पापा ने," उसने कहा। इस बार उसकी आवाज़ में कोई काँप नहीं थी, क्योंकि कुछ सच इतने सरल होते हैं कि डर के सामने भी सीधे खड़े रहते हैं। "जब मैं पहली क्लास में गई थी।"

"वह तुम्हें बहुत चाहते थे।"

"हाँ।"

"वह अब भी चाहते हैं," उसने कहा, और मीरा को लगा कि इस वाक्य के नीचे कोई दूसरा वाक्य दबा है, जो उसे सुनाई नहीं दे रहा, पर जिसे वह महसूस कर सकती है। *दो बार सुनना,* दादी ने कहा था। उसने इसे अपने भीतर दोहराया। *"वह अब भी चाहते हैं।"* एक बार, जैसे वह बोला। और दूसरी बार, जैसे वह चाहता था कि वह समझे: *"वह अब भी वहीं हैं, जहाँ मैं उन्हें पहुँचा सकता हूँ।"*

मीरा की रीढ़ में ठंडक दौड़ गई।

---

वे दोनों साथ नीचे उतरे।

नवाब की तस्वीर की आँखें उन्हें जाते हुए देखती रहीं। हर सीढ़ी पर "फ़िरोज़" उससे एक क़दम आगे चलता रहा, मानो उसे रास्ता दिखा रहा हो, मानो वह उसकी रक्षा कर रहा हो। उसने सीढ़ियों के नीचे पहुँचकर पलटकर उसका हाथ पकड़कर सहारा दिया, ताकि उसका पैर न फिसले।

मीरा ने उसका हाथ पकड़ा। उसकी हथेली गर्म थी, किसी जीवित आदमी की तरह, और यही सबसे भयानक बात थी।

आँगन में चाँदनी फैली थी। चाँद बस एक पतली-सी फाँक था, नए चाँद की, एक दरार की तरह आसमान पर टिका। नीम की पत्तियाँ हल्के-हल्के खड़क रही थीं।

"मुझे तुमसे कुछ कहना है," आँगन के बीचोबीच, सूखे हौज़ के पास रुककर उसने कहा।

मीरा रुकी। उसने साँस ली, एक लंबी, गहरी साँस। "क्या?"

"आज दोपहर मैंने तुम्हें एक कंचा दिया था।" उसने जेब से हाथ निकालकर दिखाया, उसकी हथेली पर वही नीला कंचा था, जिसमें बादल क़ैद था। "तुमने उसे ले लिया, पर मुझे लगा कि तुम्हें पसंद नहीं आया। तुम बहुत ख़ामोश हो गई थीं।"

"मुझे पसंद आया था।"

"क्या सच में?"

"हाँ।"

"मीरा," उसने बहुत नरमी से कहा, और एक क़दम आगे आया। चाँदनी उसके चेहरे पर पड़ी, और उसकी मुस्कान, इतनी चौड़ी, इतनी नरम, बहुत धीरे-धीरे उसके चेहरे पर और फैल गई। "मैं सच बोलने वाला हूँ। मैं हमेशा सच बोलता हूँ। मैं झूठ नहीं बोलता। झूठ बोलना तो इंसानों का काम है।"

मीरा के भीतर दादी की आवाज़ गूँजी: *"जिन्न झूठ नहीं बोलता। वह सच को मरोड़ता है। हर लफ़्ज़ को दो बार सुनना।"* उसने अपने चेहरे को पत्थर कर लिया।

"मैं जानता हूँ कि तुम ऊपर क्यों गई थीं," उसने कहा।

"मैंने बताया न…"

"तुमने जो बताया वह सच भी था और झूठ भी।" उसकी आँखें उसकी आँखों में गड़ चुकी थीं, और उसने पलकें एक बार भी नहीं झपकाईं। एक पल, दो पल, तीन। मीरा को लगा कि वह उसकी आँखों में नहीं, किसी गहरे कुएँ में झाँक रही है, जिसकी तली में कोई बैठा है और उसे पुकार रहा है। "तुम अपने पिता से मिलने गई थीं।"

हवा थम गई। नीम की पत्तियाँ एक साथ ख़ामोश हो गईं।

"तुम्हारे पिता का नाम रमेश था न?" उसने बहुत धीरे, बहुत मुलायम आवाज़ में पूछा। "रमेश वर्मा। जो बीस साल पहले एक रात इसी आँगन में खड़े होकर मुझे ललकार बैठे थे?"

मीरा के होंठ काँपे।

*(अगले एपिसोड में जारी…)*

Writer
firoj saifi
Story
जिसने नाम पुकारा
Chapter
9 of 10
Category
Jinn & Spirits
Reading time
17 min
Words
3224
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

← पिछला भाग  ·  अगला भाग →

जिसने नाम पुकारा · सभी भाग →

और कहानियाँ · More stories