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एपिसोड 10: सौदा
firoj saifi · Jinn & Spirits · 17 मिनट
मीरा ने जवाब देने में एक पल लिया।
वह एक पल बहुत लंबा था। उसमें रात का पूरा सन्नाटा था, नीम की सूखी पत्तियों की सरसराहट थी, और उसकी अपनी धड़कन, जो इतनी तेज़ थी कि उसे लगा आँगन के पत्थर तक उसे सुन रहे होंगे। उसने अपने भीतर दादी की आवाज़ को पुकारा, *"हर लफ़्ज़ को दो बार सुनना,"* और फिर बहुत सहज ढंग से, जैसे कोई मौसम की बात कर रहा हो, कहा:
"हाँ। रमेश वर्मा। मेरे पिता का नाम यही था।"
"था," उसने दोहराया। "तुमने कहा, था।"
"बीस साल हो गए।"
"और अगर मैं कहूँ कि वह *हैं*?"
मीरा ने उसकी आँखों में देखा। उन आँखों में चाँदनी की एक पतली-सी लकीर चमक रही थी, और उसके पीछे अँधेरा, इतना गहरा कि उसमें पूरा आँगन समा जाए। "तो मैं पूछूँगी कि इस 'हैं' के बदले आप क्या चाहते हैं।"
वह मुस्कुराया, और यह मुस्कान पूरी ख़ुशी से खिली थी, जैसे कोई बच्चा जिसे उसका मनचाहा सवाल पूछ लिया गया हो।
"तुम बहुत समझदार हो, मीरा। यह मुझे सबसे अच्छा लगता है। इंसानों में समझदार होना बहुत दुर्लभ है।" वह एक क़दम पीछे हटा, और हौज़ के सूखे किनारे पर बैठ गया, जैसे किसी पुराने दोस्त के साथ बातचीत करने बैठा हो। "सुनो। मैं तुम्हारे साथ खेल नहीं खेलूँगा। मैं झूठ बोलता नहीं, तुमने सुना ही होगा, तुम्हारी दादी अमीना बी ने मुझे अच्छी तरह पहचान लिया था, बहुत पहले।"
"मैंने कुछ नहीं सुना।"
"बेशक सुना है।" उसकी मुस्कान और गहरी हो गई। "ख़ैर। मेरी बात सीधी है। तुम्हारे पिता ज़िंदा हैं। और मैं उन्हें बाहर आने दे सकता हूँ।"
मीरा का दिल एक बार को रुक गया। उसने अपनी हथेली को कुर्ते के पल्लू में छिपा लिया, ताकि वह काँपती न दिखे।
"और बदले में?"
"बहुत थोड़ा।" उसने आराम से कहा। "एक रात। सिर्फ़ एक रात। तुम मुझे अपनी एक रात दे दो।"
"मतलब?"
"मतलब कुछ नहीं, बस एक रात के लिए तुम्हारा नाम मेरे पास रहेगा। फिर सुबह होते ही तुम्हारे पिता बाहर होंगे, अपनी चारपाई पर, अपने पुराने घर में, जैसे कभी गए ही न हों।"
*"एक रात के लिए तुम्हारा नाम मेरे पास रहेगा।"*
मीरा ने इसे अपने मन में दो बार दोहराया। पहली बार, जैसे वह बोला था: एक छोटा-सा सौदा, एक रात, एक नाम, एक पिता। दूसरी बार, जैसे वह चाहता था कि वह समझे: *जिसका नाम मेरे पास होगा, वही आईने के अंदर होगा।*
"और मैं?" उसने पूछा, और उसकी आवाज़ उसे ख़ुद दूर से आती लगी। "सुबह मैं कहाँ होऊँगी?"
"तुम वहीं होगी जहाँ रात बीतने के बाद हर कोई होता है।" उसने सिर झुकाकर कहा, और उसकी आँखों की नीली चमक बहुत नर्म हो गई। "तुम सुरक्षित रहोगी। मैं तुम्हें चोट नहीं पहुँचाऊँगा। मुझे चोट पहुँचाना पसंद नहीं। मैं बस अकेला हूँ, मीरा। मैं बहुत सालों से अकेला हूँ।"
यह आख़िरी वाक्य बिलकुल सच था। मीरा ने उसे सुना और उसके भीतर कुछ अजीब-सा हिला। उसे याद आया, रात की पहली बात: *"वे अकेले होते हैं,"* बच्चे ने कहा था, और उसने पूरी गंभीरता से जवाब दिया था। वह झूठ नहीं बोल रहा था। जिन्न सचमुच अकेला था। और यही सबसे ख़तरनाक बात थी, क्योंकि अकेला आदमी कुछ भी कर सकता है।
"मुझे सोचने के लिए वक़्त चाहिए," उसने कहा।
"बेशक।" वह तुरंत उठ खड़ा हुआ, जैसे उसने इसी जवाब का इंतज़ार किया हो। "तुम जितना चाहो सोचो। मैं जल्दबाज़ी नहीं करता। मैंने सौ साल इंतज़ार किया है, चौदह रातें और सही।"
"चौदह रातें?"
उसने ऊपर आसमान की ओर इशारा किया, जहाँ नए चाँद की बारीक फाँक टिकी थी। "जब यह चाँद पूरा हो जाए, मेरा सौदा बंद हो जाता है। तब या तो तुम्हारी हाँ, या फिर…" वह रुका, और उसके चेहरे पर पहली बार ऐसा भाव आया जो मीरा पढ़ नहीं सकी, उदासी थी, या शायद कोई दबा हुआ ग़ुस्सा, "…या फिर कोई और सौदा।"
"कौन-सा?"
"वह मुझे नहीं पता," उसने कहा, और इस बार वह सच नहीं बोल रहा था, मीरा ने उसे समझ लिया। "चलो। मैं तुम्हें गाँव तक छोड़ दूँ।"
"नहीं," मीरा ने कहा, पहली बार उसके स्वर में दृढ़ता थी। "मैं अकेली जा सकती हूँ।"
वह कुछ पल उसे देखता रहा। फिर सिर हिलाया, और एक क़दम पीछे हट गया। "जैसी तुम्हारी मर्ज़ी।"
वह फाटक की ओर चली, पीठ सीधी, क़दम बराबर। बरगद के नीचे पहुँचकर ही उसने पीछे मुड़कर देखा। आँगन ख़ाली था। पर ऊपर, गुंबद की छोटी, गोल खिड़की में, दो अंगारे जैसी आँखें एक पल के लिए चमकीं, फिर बुझ गईं।
और तब, पहली बार, मीरा ने हवेली के अँधेरे में कोई बहुत हल्की-सी आवाज़ सुनी, जो हवा के साथ आई थी और हवा के साथ चली गई। एक लोरी की आख़िरी पंक्ति, उलटे सुरों में, बच्ची की आवाज़ में।
अपने कमरे तक पहुँचकर उसने दरवाज़ा भीतर से बंद किया, कुंडी चढ़ाई, फिर नमक की एक मोटी लकीर चौखट पर खींची, जैसे उस रात फ़िरोज़ के लिए खींची थी। फिर वह चारपाई के किनारे बैठ गई और बहुत देर तक कुछ नहीं कर सकी। सिर्फ़ अपनी हथेलियों को देखती रही, जिन्होंने अभी-अभी आईने की सतह को छुआ था और अब भी ठंडी थीं।
फिर उसने अलमारी के ऊपरी ताक पर हाथ डाला और दुपट्टे में लिपटा वह कंचा निकाला, जो "फ़िरोज़" ने तोहफ़े में दिया था। उसने उसे लालटेन की लौ के सामने किया। नीला काँच, उसके भीतर बादल जैसी एक सफ़ेद-सी धुँध।
धुँध हिल रही थी।
मीरा की साँस रुक गई। उसने कंचे को हथेली पर रखा और पास झुककर देखा। बादल धीरे-धीरे घूम रहा था, गोल-गोल, किसी भँवर की तरह, और उसके बीच कभी-कभी एक बारीक काली लकीर उभरती, एक आँख की पुतली जैसी, जो उसे देखती और फिर ओझल हो जाती।
उसने कंचा दुपट्टे में लपेटकर, बिना देखे, अलमारी के सबसे गहरे कोने में फेंक दिया। फिर उसने अपने ब्लाउज़ से वह तह किया हुआ काग़ज़ निकाला, जिस पर फ़िरोज़ ने सही जवाब लिखा था, और सीने से लगाकर बैठ गई। उस रात उसे नींद नहीं आई।
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सुबह मौलवी क़ासिम की मस्जिद के पीछे वाले कमरे में पाँच लोग बैठे थे।
मीरा, रहीम चाचा, छोटू, और दादी अमीना बी, जिन्हें उनकी बहू लाठी थामकर ले आई थी। और मौलवी साहब, जिनके सामने बाबा हुसैनी की डायरी की हाथ से उतारी हुई नक़ल खुली पड़ी थी। असली डायरी तो उस रात फ़िरोज़ के हाथ से छूटकर आईने के पास ही रह गई थी। नक़ल के साथ चाय के पाँच गिलास, जिन्हें किसी ने छुआ तक नहीं था।
मीरा ने सब कुछ बता दिया। आईने की खिड़की। फ़िरोज़ की आवाज़। पिता का एक शब्द। रमेश की ज़िंदा होने की बात, और जिन्न का सौदा। उसने बताते हुए बहुत कोशिश की कि उसकी आवाज़ न काँपे, पर "बिटिया" शब्द पर आकर वह अटक गई। कमरे में ख़ामोशी रही। रहीम चाचा ने अपना गमछा आँखों पर रख लिया। छोटू ने उसका हाथ पकड़ लिया।
"वह सच बोल रहा है," आख़िर में दादी अमीना बी ने कहा। उनकी बादली आँखें किसी अदृश्य बिंदु पर टिकी थीं। "कि रमेश ज़िंदा है। मैंने भी महसूस किया था। पर बात उसके सच में नहीं, उसके छोड़े हुए शब्दों में है।"
"एक रात के लिए तुम्हारा नाम मेरे पास रहेगा," मीरा ने दोहराया।
"मतलब?" रहीम चाचा ने पूछा।
"मतलब अगर मैं हाँ कहूँ, तो मेरा नाम उसके हाथ में चला जाएगा। जैसे फ़िरोज़ का गया।"
"और फिर सात रातें?"
"नहीं," मौलवी साहब ने कहा, और नक़ल का एक पन्ना पलटकर देखा। "बात उससे भी बुरी है। फ़िरोज़ की तरह कोई ख़ुद अपना नाम पुकारे, तो सात रातों का रास्ता बनता है। पर जब कोई ख़ुद अपनी मर्ज़ी से नाम दे दे, बिना बुलाए, बिना पुकारे, तो वह उसकी मियाद नहीं गिनता। वह नाम सीधे उसके हाथ में चला जाता है। और जिसका नाम हाथ में चला जाए…" मौलवी साहब ने डायरी बंद कर दी, "…वह सात रातों का इंतज़ार नहीं करता। एक रात बहुत है।"
कमरे में ठंडक सी उतर आई।
"तो उसने सच कहा था," मीरा ने धीमे से कहा। "एक रात। सिर्फ़ एक रात।"
"और पिता की रिहाई का वादा?" दादी ने कहा, "वह भी सच होगा। वह रमेश को बाहर निकाल देगा। बाहर, जहाँ मीरा कभी नहीं मिलेगी।"
"क्योंकि मैं अंदर होऊँगी।"
"और जिन्न बाहर दो-दो चेहरे पहनकर घूमेगा। एक फ़िरोज़ का। एक तुम्हारा।"
छोटू ने अचानक सिर उठाया। "दीदी," उसने कहा, "क्या आप हाँ कहेंगी?"
मीरा ने उसके बाल सहलाए। "नहीं, पहलवान।"
"पर आप तो बाबा को बचाना चाहती हैं।"
"हाँ। बहुत।" उसने मुस्कुराने की कोशिश की, और वह मुस्कान अधूरी रह गई। "पर किसी को बचाने के लिए किसी और को बेच नहीं सकते। ख़ासकर ख़ुद को। बाबा ने मुझे यही सिखाया था।"
मौलवी क़ासिम ने सिर उठाकर उसे देखा, और उनकी थकी हुई, बूढ़ी आँखों में एक पल के लिए गर्व झलका। "तुम्हारे पिता को तुम पर नाज़ होगा, बेटी।"
"और चौदह रातें?" रहीम चाचा ने पूछा।
"चौदह रातें हमारे पास हैं," मीरा ने कहा। उसकी आवाज़ अब पक्की थी, जैसे उसने कोई फ़ैसला कर लिया हो। "चौदह रातों में हमें तीन नाम चाहिए, ठाकुर ख़ानदान का आधा हिस्सा, और कोई ऐसा जो अपना अक्स खोने को तैयार हो। और एक बात…"
"क्या?"
"वह लड़की, ज़ोया। फ़िरोज़ की बहन। उसका मैसेज रहीम चाचा ने देखा था। आज सुबह की गाड़ी से वह आ रही है।" मीरा ने बाक़ी सबको देखा। "उसे सबसे पहले सच बताना होगा। इससे पहले कि जिन्न उससे बात करे।"
"और अगर उसने यक़ीन नहीं किया?" रहीम चाचा ने पूछा।
"तो मेरे पास फ़िरोज़ का लिखा हुआ एक जवाब है," मीरा ने कहा, और अपने कुर्ते की जेब से तह किया हुआ वह पन्ना निकाला, जिस पर फ़िरोज़ की टूटी, काँपती लिखावट में एक वाक्य लिखा था। *"नीला काँच का कंचा। जिसमें बादल क़ैद लगता था।"*
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अक्स-नगरी में उस रात, अगर उसे रात कहा जा सकता था, फ़िरोज़ और रमेश बहुत देर तक कोठरी में बैठकर हिसाब लगाते रहे।
"तीन नाम," फ़िरोज़ ने कहा। वह दीवार पर कंकड़ से उन्हें गिन रहा था, हर नाम के लिए एक आड़ी लकीर। "जिन्न का असली नाम। उसे क़ैद करने वाले का नाम। और बुलाने वाले का नाम।"
"बुलाने वाला तू है," रमेश ने कहा।
"और क़ैद करने वाला बाबा हुसैनी। मौलवी साहब ने डायरी में उनका नाम पढ़ा होगा।" फ़िरोज़ ने तीसरी लकीर पर कंकड़ ठहरा दिया। "बाक़ी रहा जिन्न का नाम। और वह आधा डायरी में, आधा ठाकुर के पास।"
"अगर ठाकुर के पास है तो वह अपनी जान देकर भी नहीं देगा।"
"जान नहीं देगा, पर शायद डर देगा।" फ़िरोज़ ने कंकड़ नीचे रखा। "रमेश जी, आप बीस साल से यहाँ हैं। आपने कभी इस जगह की सबसे पुरानी चीज़ को नहीं ढूँढा? जो जिन्न से भी पहले की हो?"
रमेश कुछ देर सोचता रहा। "बाबा की परछाईं। पर वह किसी से बात नहीं करती। मैंने कई बार जाना चाहा। हर बार वह मुझे दरवाज़े से लौटा देती थी, बिना बोले। जैसे वह मेरे लिए नहीं बैठी है।"
"मेरे लिए?" फ़िरोज़ ने मुस्कुराकर कहा। "यह तो बड़ी ख़ुशफ़हमी होगी।"
"तू नया आदमी है। तू तीसरी रात में जिन्न के सामने खड़ा रहा और सवाल पूछ बैठा। मैंने ऐसा बीस सालों में नहीं देखा।" रमेश ने चश्मा ठीक किया। "तू जा। गुड्डी तुझे ले जाएगी। मैं यहाँ रहूँगा और अपना नाम दोहराता रहूँगा। एक नाम का भी बहुत मतलब होता है यहाँ।"
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अक्स-नगरी का सबसे पुराना कोना हवेली के उस हिस्से में था जहाँ असली दुनिया में कभी कोई नहीं गया था।
गुड्डी फ़िरोज़ को सँकरी, ढलानदार सीढ़ियों से नीचे ले जा रही थी। रमेश पीछे रुक गया था, उसने कहा, *"वह मुझसे नहीं मिलती। मैंने बीस साल कोशिश की। पर तू नया है, शायद वह तुझे मिले।"* हर सीढ़ी के साथ हवा ठंडी होती जा रही थी, और उसके साथ एक अजीब-सी गंध भी आ रही थी। जली हुई लकड़ी की, पुराने लोबान की, और ज़ंग खाए लोहे की।
सीढ़ियाँ एक लंबे, तंग गलियारे में ख़त्म हुईं, जिसके अंत में एक ऊँचा, मेहराबदार दरवाज़ा था। दरवाज़े की लकड़ी जली हुई थी, पर पूरी तरह जली नहीं, कोयले जैसी काली और चटकी हुई, जैसे किसी ने सैकड़ों साल पहले इसे आग में झोंक दिया हो और फिर बुझा दिया हो। उसके ऊपर पत्थर की एक तख़्ती थी, जिस पर अरबी में कुछ लिखा था। फ़िरोज़ ने पढ़ने की कोशिश की, पर शब्द उसकी आँखों के सामने घूम गए।
"यह इबादत-ख़ाना था," गुड्डी ने कहा। "नवाब के दादा ने बनवाया था। बाद में बाबा आए। यहीं बैठा करते थे।"
"अब?"
"अब भी बैठे हैं।"
फ़िरोज़ ने दरवाज़ा धकेला। वह चरमराए बिना खुल गया।
भीतर एक गोल कमरा था। फ़र्श पर काले पत्थर जड़े थे, जिन पर किसी ने बहुत पहले एक बड़ा गोला जला दिया था। गोले के भीतर लोहे की बारीक सलाइयाँ ज़मीन में गड़ी थीं, एक घेरे में, सात की संख्या में, जिन पर काले धागे लिपटे थे। और घेरे के ठीक बीचोबीच, कोई बैठा था।
पहली नज़र में वह कोई इंसानी आकृति नहीं लगा। वह धुएँ का ढेर था, जिसका आधा हिस्सा किसी ने नोच लिया था। पर ग़ौर से देखने पर फ़िरोज़ को एक आदमी की रूपरेखा समझ में आई, पालथी मारे, सीधी पीठ, गोद में हाथ। सिर पर पगड़ी जैसा कुछ। लंबी दाढ़ी। उसका दायाँ कंधा, पूरा दायाँ बाज़ू और आधा चेहरा ग़ायब था, जैसे किसी ने तस्वीर के उस हिस्से पर तेज़ाब डाल दिया हो। बचा हुआ हिस्सा जला हुआ था, किनारों पर सिकुड़ा हुआ, काला और भूरा, और उस पर चाँदी जैसी बारीक दरारें थीं, वैसी ही जैसी फ़िरोज़ की कलाई के निशान में थीं।
"बाबा," गुड्डी ने बहुत धीमे से कहा, और उसकी आवाज़ में वही सलीक़ा था जो वह सिर्फ़ बहुत इज़्ज़त की चीज़ों के लिए बचाकर रखती थी। "यह नया आया है।"
आकृति ने सिर नहीं उठाया।
कई पल तक कमरे में कोई आवाज़ नहीं हुई। फ़िरोज़ को अपनी ही साँसों की गूँज सुनाई देती रही। फिर, बहुत धीरे से, जैसे किसी ने सदियों पुराना ताला खोला हो, उस जली हुई परछाईं से एक आवाज़ आई। बहुत पतली, बहुत थकी हुई, पर हर शब्द में एक ऐसी ताक़त थी जो राख के नीचे भी बुझी नहीं थी।
*"…आ गया…"*
फ़िरोज़ का गला सूख गया। "आप… आप बाबा सैयद हुसैनी हैं?"
*"…मैं वह हूँ जो बचा है…"* आवाज़ ने कहा। *"…बाबा हुसैनी तो… बहुत पहले आईने के बाहर रह गए…"*
"मैं फ़िरोज़ हूँ। फ़िरोज़ ख़ान। दिल्ली से…"
*"…नाम मत बोल…"* आवाज़ ने कहा, पर उसमें डर नहीं, सिर्फ़ एक पुरानी थकान थी। *"…यहाँ मुझे बोल सकता है… मैं सुनने वालों में नहीं… मैं तो सुनाने वाला था… पर जिसका नाम इन दीवारों पर पड़ जाए… उसे ये दीवारें याद रखती हैं…"*
जली हुई परछाईं ने धीरे-धीरे सिर उठाया। उसका चेहरा जला हुआ था, आधा, पर जो आँख बची थी, बाईं आँख, वह बहुत साफ़ थी। गहरी, पुरानी, भूरी, जैसे किसी ने पूरी सदी के आँसू उसमें जमा कर रखे हों। उस आँख ने फ़िरोज़ को देखा, उसके चेहरे को, उसकी कलाई को, उसकी हथेली की हल्की पारदर्शिता को। देर तक देखा।
*"…तू बहुत देर से आया…"* आख़िर में उसने कहा। *"…और बहुत जल्दी…"*
"मैं समझा नहीं।"
*"…समझ जाएगा…"* परछाईं ने कहा। उसका बचा हुआ बायाँ हाथ गोद में था, उँगलियाँ आपस में उलझी हुईं, जैसे वे किसी तस्बीह के दाने खोज रही हों जो अब वहाँ नहीं थे।
फ़िरोज़ ने चारों ओर देखा। सात लोहे की सलाइयाँ, उन पर लिपटे काले धागे, फ़र्श पर जला हुआ गोला। "यह घेरा क्या है? और आप क्यों…" उसने उसके आधे जले चेहरे की ओर इशारा किया, "…यह सब क्या हुआ?"
*"…यह मेरा क़ैदख़ाना है…"* बाबा ने शांति से कहा। *"…मैंने जिन्न को आईने में बाँधा, और उसे बाँधने के लिए ख़ुद को इस घेरे में बाँध लिया… सात सलाइयाँ सात आसमान के लिए… सात धागे सात दरवाज़ों के लिए… जो भी जिन्न की क़ैद तोड़ने की कोशिश करे, पहले मुझे तोड़ना होगा… इसलिए हर बार जब वह बाहर किसी को खींचता है, मुझे जलना पड़ता है… मेरा आधा हिस्सा उसकी हर पुकार का ईंधन है…"*
"तो यह जला हुआ हिस्सा…"
*"…उसकी भूख है…"* बाबा ने कहा। *"…और मेरी ग़लती…"*
"आपकी ग़लती?"
बाबा हुसैनी की आँख एक पल के लिए बंद हुई, और जब खुली तो उसमें कोई पुराना, कभी न भरा घाव दिख रहा था। *"…सौ बरस पहले, मैंने एक वादा किया था… उस रात जब वह बाँधा गया… वह चीख़ा नहीं, बच्चे… वह रोया… और मैंने उसे वचन दिया… कि मैं उसे अकेला नहीं छोड़ूँगा… सुन रहा है… मैंने उसे अकेला न छोड़ने का वादा किया… और फिर मैंने उसे सौ साल तक अकेला रखा…"*
फ़िरोज़ का सिर घूमा। *तुम अकेले हो?* उसने जिन्न से पूछा था, और जिन्न ने कहा था, *तू पहला है जिसने पूछा।*
"वह वादा…" उसने धीरे से कहा। "दादी अमीना बी ने कहा था कि आपने उससे कोई वादा किया था। क्या वही?"
*"…दादी अमीना को सब पता है…"* बाबा की आवाज़ में एक नर्मी आई। *"…वह उस रात बच्ची थी… वह खिड़की से देख रही थी… इस गाँव में कुछ लोग हमेशा देखते हैं…"*
फ़िरोज़ ने मुड़कर दरवाज़े पर खड़ी गुड्डी को देखा। वह चौखट के भीतर नहीं आई थी, बस अपने एक जूते की नोक से फ़र्श पर किसी अदृश्य लकीर को सहला रही थी। "और यह बच्ची?" उसने धीमे से पूछा। "यह किसकी है?"
बाबा की आँख गुड्डी की ओर मुड़ी, और उसमें एक अलग ही नर्मी उतर आई, जो फ़िरोज़ ने अब तक उसमें नहीं देखी थी। *"…वह इस हवेली की सबसे पुरानी रौशनी है…"* उन्होंने कहा। *"…उसकी लोरी इस कमरे के जले हुए पत्थर को भी ठंडा कर देती है…"*
गुड्डी ने जैसे यह सुन लिया हो। उसने फ़िरोज़ की ओर देखे बिना बहुत धीमे से गुनगुनाना शुरू किया, वही उलटी लोरी, *"…सो जा, मेरे चाँद… कल सुबह फिर खिड़की खुलेगी…"* और उसी पल बाबा की जली हुई परछाईं के किनारे, जहाँ राख और दरारें थीं, हल्के से सुनहरे पड़ने लगे। जैसे बुझी हुई लकड़ी के भीतर कोई चिंगारी ज़रा-सी साँस ले ले। फ़िरोज़ ने देखा कि बाबा का बायाँ हाथ, जो अब तक काँप रहा था, ठहर गया।
*"…बस,"* बाबा ने कहा, और गुड्डी चुप हो गई। *"…बहुत हुआ, बेटी… तुझे थकान हो जाएगी…"*
"आप इसे जानते हैं," फ़िरोज़ ने कहा। "और यह आपको। तो फिर इसने किसी को बताया क्यों नहीं कि आप यहाँ हैं?"
*"…क्योंकि वह भूल जाती है… नाम भूलने का सिलसिला इसी से शुरू हुआ था…"* बाबा की आवाज़ बहुत दूर चली गई। *"…पर मैं तुझे उसकी बात आज नहीं बताऊँगा… आज तू वही सुन जो तुझे ज़िंदा रखेगा…"*
*"…मैंने सौ बरस से इंतज़ार किया है… कि कोई आए जो इस आईने का पूरा सच सुनने लायक हो… मेरा वक़्त कम है, बच्चे… मेरी परछाईं रोज़ थोड़ी-थोड़ी घिसती है… मैं चाहता हूँ कि तू पहले एक बात जान ले… जो सबसे ज़रूरी है…"*
फ़िरोज़ ने आगे झुककर उसकी तरफ़ कान किया।
*"…तू सोचता है कि तू पहला है जिसे जिन्न ने पकड़ा… या दूसरा… या कोई यूँ ही ग़लती से आया हुआ…"* जली हुई परछाईं ने कहा। उसकी आवाज़ की ठंडक में एक दबी हुई हल्की गूँज थी, जैसे किसी बहुत गहरे कुएँ की तह में कोई बोल रहा हो। *"…पर तू ग़लती से नहीं आया… तू उस सिलसिले की तीसरी कड़ी है…"*
"कौन-सा सिलसिला?"
*"…जिन्न को आज तक सिर्फ़ तीन ने सच में बुलाया है… बाक़ी जो आए, वे या तो भेजे गए थे… या ग़लती से फँसे…"* बाबा हुसैनी की इकलौती आँख ठहर गई। *"…पहला बुलाने वाला लालच से बुलाया गया… दूसरा अकेलेपन से… और तीसरा…"*
उसने पल भर के लिए आँख बंद की। फिर खोली, और उस आँख में ऐसी गहरी, थकी हुई करुणा थी कि फ़िरोज़ का गला भर आया।
*"…तीसरा तू है, बेटा… तू मज़ाक़ में बुलाने वाला… तुम तीसरे बुलाने वाले हो… और पहले दोनों… अब भी यहीं हैं…"*
*(अगले एपिसोड में जारी…)*
- Writer
- firoj saifi
- Story
- जिसने नाम पुकारा
- Chapter
- 10 of 10
- Category
- Jinn & Spirits
- Reading time
- 17 min
- Words
- 3215
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
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