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भाग दो... बिना बादल की बरसात

Pretika · Village Horror · 4 मिनट

नौ दिन तक सब ठीक रहा। या शायद... मुझे ठीक लगा।
दसवीं रात मैं ब्लॉक बाईस पर था। रात के करीब पौने चार बजे होंगे। वॉशिंग मशीन की मोटर की आवाज़, पानी की फुहार, और पैनलों पर पड़ती हेडलाइट की चमक। तभी मेरी जेब में फ़ोन वाइब्रेट हुआ।
कविता का मैसेज था।
"फिर चले गए? कम से कम बताकर तो जाया करो... और इतना पसीना क्यों था तुम्हें आज? और वो खुशबू... कौन सा इत्र लगाते हो आजकल?"
मैं वहीं खड़ा रह गया। हाथ में फ़ोन। सामने रमेश, जो पाइप पकड़े मुझे घूर रहा था।
मैंने तुरंत कविता को फ़ोन लगाया। चार रिंग के बाद उसने उठाया। आवाज़ नींद में डूबी हुई थी।
"हम्म...?"
"कविता... कौन था अभी?"
"क्या मज़ाक है देव... अभी तो गए हो। दरवाज़े से। मैंने कुंडी लगाई तुम्हारे पीछे..."
मैंने रमेश को पाइप थमाया और बाइक भगा दी। रास्ते भर एक ही बात दिमाग में घूम रही थी... कोई है। कोई और आदमी। मेरे घर में... मेरे बिस्तर पर...
चार बजकर दस मिनट पर मैं घर के दरवाज़े पर था।
दरवाज़ा अंदर से बंद था। कुंडी लगी हुई।
मैंने खटखटाया। कविता ने खोला। उसने सिर्फ़ एक पतली सी चादर लपेटी हुई थी। उसकी आँखें भारी थीं, होंठ सूजे हुए। और जैसे ही दरवाज़ा खुला...
वो खुशबू मेरे चेहरे से टकराई।
पहली बारिश की खुशबू। तपती ज़मीन पर गिरी पहली बूँदों वाली। इतनी तेज़... जैसे कमरे के अंदर अभी-अभी बादल फटा हो।
मैं कविता को धकेलकर अंदर घुसा। अलमारी, पलंग के नीचे, रसोई। खिड़की की ग्रिल... जिसके बीच से बिल्ली भी न निकले। छत का दरवाज़ा अंदर से बंद।
कोई नहीं था।
बस बिस्तर पर फिर वही लाल रेत। और कविता की पीठ पर, जहाँ चादर सरक गई थी... रेत की पतली-पतली लकीरें। जैसे रेत से सनी उँगलियाँ... धीरे-धीरे... उसकी रीढ़ पर नीचे तक फेरी गई हों।
"कौन था?" मैंने पूछा। मेरी आवाज़ काँप रही थी।
कविता ने मुझे ऐसे देखा जैसे मैं पागल हो गया हूँ।
"तुम थे देव। तुम।"
"मैं ब्लॉक बाईस पर था! बीस आदमी गवाह हैं!"
वो पलंग के किनारे बैठ गई। काफ़ी देर चुप रही। फिर बहुत धीरे से बोली... जैसे खुद से बात कर रही हो।
"दो बजे के आसपास दरवाज़े पर दस्तक हुई। वही... तीन धीमी, एक ज़ोर से। जैसे तुम करते हो। मैंने पूछा कौन... तो तुमने कहा, कव्वो, मैं हूँ।"
वो रुकी।
"तुमने उसके बाद कुछ नहीं बोला। बत्ती भी नहीं जलाने दी। तुम्हारे हाथ बहुत ठंडे थे... जैसे रात की रेत होती है। और देव... एक बात बहुत अजीब थी। मैंने तुम्हारे सीने पर सिर रखा था। वहाँ धड़कन नहीं थी। बस एक धीमी सी आवाज़ थी... जैसे अंदर कहीं... रेत खिसक रही हो।"
उसने नज़रें झुका लीं।
"फिर भी तुम्हें मेरा सब कुछ याद था। जैसे तुमने मुझे बहुत पहले से... बहुत ध्यान से देखा हो। तुमने मेरे कान के पीछे वाले तिल को चूमा। और जब मैंने लालटेन की लौ ज़रा सी ऊँची की... तो तुम्हारी आँखें खुली थीं। मुझे देख रही थीं। और देव... पूरी रात... तुमने एक बार भी पलक नहीं झपकाई।"
कान के पीछे का तिल।
दोस्तों, वो तिल... मेरे अलावा इस दुनिया में कोई नहीं जानता।
मैं उसके सामने ज़मीन पर बैठ गया। अंदर गुस्सा था, डर था, और एक बेनाम सी जलन। क्योंकि उसके चेहरे पर जो चमक थी... वो मैंने बहुत दिनों से नहीं देखी थी।
मेरे साथ नहीं।
"कविता... सच बता। कोई और है?"
उसकी आँखों में आँसू आ गए। पर वो रोई नहीं। उसने बस एक लाइन कही... जो आज तक मेरे कानों में गूँजती है।
"दो साल से जिस आदमी के साथ सो रही हूँ... उसे नहीं पहचानूँगी मैं?"
उस सुबह हम दोनों में से कोई नहीं सोया। वो पलंग पर, मैं बाहर चबूतरे पर। और जब सूरज की पहली किरण धोरों पर पड़ी... तो मैंने देखा, भूरी काकी अपनी खाट पर बैठी... मेरी तरफ़ ही देख रही थीं।
उन्होंने हाथ के इशारे से मुझे बुलाया।

Writer
Pretika
Story
छलावा — मेरी परछाईं ने मेरी बीवी को चुना
Chapter
2 of 2
Category
Village Horror
Reading time
4 min
Words
640
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

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