Pretika › Village Horror › छलावा — मेरी परछाईं ने मेरी बीवी को चुना

भाग एक... रात की शिफ़्ट

Pretika · Village Horror · 4 मिनट

मेरा नाम देव है। उम्र इकतीस साल। मैं पश्चिमी राजस्थान के एक बहुत बड़े सोलर प्लांट में काम करता हूँ। प्लांट का नाम नहीं बताऊँगा... बस इतना समझ लीजिए कि दूर-दूर तक सिर्फ़ धोरे हैं... रेत के टीले... और उनके बीच लाखों सोलर पैनल, जो दिन में सूरज की तरह चमकते हैं और रात में... काले शीशे की तरह पड़े रहते हैं।
बहुत लोगों को नहीं पता... पर सोलर पैनल दिन में नहीं धोए जाते। तपते शीशे पर पानी डालो तो शीशा चटक जाता है। इसलिए पैनल रात में धुलते हैं। और मैं उसी रात वाली टीम का सुपरवाइज़र हूँ। मेरी शिफ़्ट रात दस बजे शुरू होती है... और सुबह छह बजे खत्म।
प्लांट से करीब बीस मिनट दूर एक छोटी सी ढाणी है... भीमसर। मैं वहीं किराए के एक पक्के मकान में रहता हूँ। दो कमरे, एक रसोई, बाहर से छत पर जाने वाली सीढ़ी। मकान ढाणी के बिल्कुल आख़िरी सिरे पर है। उसके पीछे... कुछ नहीं। बस धोरे। रात को इतनी खामोशी होती है कि अपनी ही साँस किसी और की लगती है।
दो साल पहले मेरी शादी हुई थी। कविता से। वो बीकानेर शहर की लड़की है... छब्बीस साल की। गोरी नहीं, पर ऐसी साँवली कि आँखें हट न पाएँ। उसके कान के पीछे एक छोटा सा तिल है... जिसे सिर्फ़ मैं जानता हूँ। मैं उसे अकेले में कव्वो बुलाता हूँ। और वो मुझे... सुणो जी।
कविता को ढाणी पसंद नहीं थी। वो कहती थी... देव, यहाँ की रातें बोलती नहीं, घूरती हैं। मैं हँस देता था। मुझे क्या पता था कि वो सही कह रही थी।
हमारे घर के सामने भूरी काकी रहती हैं। उम्र अस्सी के पार। आँखों में मोतियाबिंद, कमर झुकी हुई, और दिन भर अपनी खाट पर बैठी रहती हैं। जिस दिन मैं इस मकान में आया था, उन्होंने मेरा हाथ पकड़कर कहा था... बेटा, रात नै धोरां री हवा सूं बात मत करज्यो। और अगर कभी बिना बादल के बरसात री बास आवे... तो दरवाज़ो मत खोलज्यो।
मैंने सोचा... बूढ़ी औरत है, कुछ भी बोलती है।
फिर... वो सुबह आई।
मार्च का महीना था। रात भर हमने ब्लॉक चौदह के पैनल धोए। सुबह साढ़े छह बजे मैं घर पहुँचा। आमतौर पर कविता उस वक़्त तक उठकर चाय चढ़ा चुकी होती है। पर उस दिन... घर में सन्नाटा था।
मैंने कमरे का दरवाज़ा खोला।
कविता सो रही थी। बिस्तर की चादर ऐसे उलझी हुई थी... जैसे रात भर किसी ने करवटें नहीं, किसी ने कुश्ती लड़ी हो। उसके बाल तकिए पर बिखरे थे। और उसके चेहरे पर एक ऐसी थकी हुई सी मुस्कान थी... जो मैंने शादी के शुरुआती दिनों के बाद... कभी नहीं देखी थी।
मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा। उसने आँखें खोलीं। मुझे देखा। और शर्माकर चादर अपने ऊपर खींच ली।
"फिर से आ गए?" उसने धीरे से कहा।
"फिर से?"
"हाँ... रात को दो बजे आए थे ना। फिर बिना बताए चुपचाप चले गए। मुझे लगा शिफ़्ट पे कुछ ज़रूरी काम आ गया होगा।"
मैं हँस पड़ा। "कव्वो... मैं रात भर ब्लॉक चौदह पर था। रमेश से पूछ लो। सपना देखा होगा तुमने।"
उसकी मुस्कान एकदम से गायब हो गई।
"सपना?" उसने कहा। "ये सपना था?"
उसने अपना कंधा मेरी तरफ़ घुमाया। वहाँ... गर्दन के ठीक नीचे... एक हल्का सा लाल निशान था। जैसे किसी ने बहुत देर तक... होंठ रखे हों।
और तकिए पर... बारीक, लाल रेत।
लाल रेत, दोस्तों। हमारे इलाके की रेत सुनहरी होती है। पीली। लाल रेत पूरे इलाके में बस एक ही जगह मिलती है... प्लांट के पीछे, तीन किलोमीटर दूर, एक पुराना टीला है। लोग उसे लाल टीबा कहते हैं। वहाँ कोई नहीं जाता। चरवाहे भी अपनी बकरियाँ उस तरफ़ नहीं ले जाते।
मैंने उस वक़्त ज़्यादा नहीं सोचा। रेत तो रेत है... हवा कहीं से भी ले आती है। निशान... शायद मच्छर, शायद कुछ और। मैंने कविता के माथे को चूमा और कहा... "पगली... थक गई होगी, सो जा।"
वो कुछ नहीं बोली। बस मुझे देखती रही। ऐसे... जैसे पहली बार देख रही हो।
उस दिन मैंने गौर नहीं किया। पर अब सोचता हूँ... तो याद आता है। उस सुबह कमरे में एक खुशबू थी। गीली मिट्टी की। पहली बारिश की।
और हमारे इलाके में... पिछले आठ महीने से एक बूँद पानी नहीं गिरा था।

Writer
Pretika
Story
छलावा — मेरी परछाईं ने मेरी बीवी को चुना
Chapter
1 of 2
Category
Village Horror
Reading time
4 min
Words
693
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

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