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भाग 1: तहखाना नंबर तीन
TheHauntedWriter · Jinn & Spirits · 24 मिनट
भाग 1: तहखाना नंबर तीन
लखनऊ में उस रात बारिश ऐसे गिर रही थी जैसे आसमान किसी बात से नाराज़ हो।
पुराने शहर की तंग गलियों के बीच, जहाँ आज भी कुछ इमारतें अपने आप को अंग्रेज़ों के ज़माने का समझती हैं, एक लाल पत्थर की ऊँची इमारत खड़ी थी। उसके दरवाज़े पर पीतल की एक पुरानी तख्ती लगी थी, जिसके अक्षर अब आधे मिट चुके थे:
"शाह मंज़िल पुस्तकालय — स्थापना 1881"
एक सौ पैंतालीस साल पुरानी इमारत। एक सौ पैंतालीस साल पुरानी किताबें। और एक सौ पैंतालीस साल पुरानी खामोशी।
देव सक्सेना को यह खामोशी पसंद थी।
चौंतीस साल का देव इस पुस्तकालय में पिछले छह साल से इतिहासकार और अभिलेखपाल का काम कर रहा था। दुबला शरीर, आँखों पर मोटा चश्मा, और उँगलियों पर हमेशा किसी न किसी पुरानी किताब की धूल। उसके दोस्त कहते थे कि देव इंसानों से ज़्यादा मरे हुए लोगों की लिखावट से बात करता है।
देव हँसकर जवाब देता था, "मरे हुए लोग झूठ नहीं बोलते। वो जो लिख गए, वही रह जाता है।"
उसे नहीं पता था कि बहुत जल्द उसे अपनी इस बात पर पछताना पड़ेगा।
उस शाम पुस्तकालय के ट्रस्टी, मिर्ज़ा साहब, ने उसे अपने दफ्तर में बुलाया था।
मिर्ज़ा साहब अस्सी के करीब थे। सफ़ेद शेरवानी, हाथ में चाँदी की मूठ वाली छड़ी, और आवाज़ में वह ठहराव जो सिर्फ़ उन लोगों में होता है जिन्होंने बहुत कुछ देखा हो और बहुत कम कहा हो।
"देव मियाँ," उन्होंने कहा, "सरकार की तरफ़ से नोटिस आया है। पुस्तकालय की हर किताब, हर दस्तावेज़ का डिजिटल रिकॉर्ड बनाना है। तीन महीने के अंदर।"
"जी, मुझे पता है। ऊपर की तीनों मंज़िलें लगभग पूरी हो चुकी हैं।"
मिर्ज़ा साहब कुछ देर चुप रहे। फिर उन्होंने अपनी मेज़ की दराज़ खोली और उसमें से लोहे की एक भारी, काली पड़ चुकी चाबी निकाली। चाबी इतनी पुरानी थी कि उसके दाँते घिसकर गोल हो गए थे।
"और तहखाने?"
देव ने चाबी की तरफ़ देखा। "तहखाना एक और दो तो मैंने पिछले साल ही..."
"तहखाना नंबर तीन।"
कमरे में अचानक कुछ बदल गया। देव को समझ नहीं आया क्या, लेकिन उसे लगा जैसे दीवार घड़ी की टिक-टिक एक पल के लिए धीमी हो गई हो।
"तहखाना नंबर तीन?" देव ने दोहराया। "मुझे तो लगा था वो बस स्टोर रूम है। उसका दरवाज़ा तो ईंटों से..."
"1947 में बंद किया गया था," मिर्ज़ा साहब ने उसकी बात काटी। "बँटवारे वाले साल। मेरे वालिद ने बंद करवाया था। उस वक्त मैं छह साल का था।"
"क्यों?"
मिर्ज़ा साहब ने चाबी मेज़ पर रख दी। उन्होंने उसे देव की तरफ़ धकेला नहीं। बस रख दी। जैसे वो चाहते हों कि देव खुद उठाए, ताकि बाद में कोई यह न कह सके कि उन्होंने दी थी।
"मेरे वालिद ने कभी वजह नहीं बताई," उन्होंने धीमे से कहा। "बस इतना कहा था कि उस कमरे में जो रखा है, वो किताब नहीं है।"
देव मुस्कुराया। "मिर्ज़ा साहब, पुस्तकालय में जो रखा है, वो किताब ही होगी।"
बूढ़े ट्रस्टी ने पहली बार सीधे उसकी आँखों में देखा।
"तुम्हारे अब्बा भी यही कहते थे।"
देव की मुस्कान वहीं जम गई।
"आप... आप मेरे पिताजी को जानते थे?"
"प्रोफ़ेसर रघुनाथ सक्सेना को कौन नहीं जानता था? पंद्रह साल पहले वो यहाँ आए थे। इसी तहखाने के बारे में पूछने।"
देव की उँगलियाँ अपने आप मुट्ठी में बंद हो गईं।
पंद्रह साल पहले।
वही साल, जब उसके पिता अपने स्टडी रूम में मृत पाए गए थे। कुर्सी पर बैठे हुए। आँखें खुली हुईं। और दाहिने हाथ की उँगलियाँ काली स्याही में डूबी हुईं, जैसे वो आखिरी पल तक कुछ लिख रहे हों।
लेकिन उनकी मेज़ पर कोई कागज़ नहीं था।
कोई कलम नहीं थी।
पुलिस ने इसे दिल का दौरा कहा था। डॉक्टरों ने भी। लेकिन देव को आज तक एक बात समझ नहीं आई थी।
वो स्याही कहाँ से आई थी?
"आपने उन्हें अंदर जाने दिया था?" देव ने पूछा।
"नहीं," मिर्ज़ा साहब बोले। "मैंने मना कर दिया था। और वो चले गए। तीन दिन बाद ख़बर आई कि..."
वो चुप हो गए।
देव ने चाबी उठा ली। वो बर्फ़ जैसी ठंडी थी। इतनी ठंडी कि उसकी हथेली में हल्की सी जलन हुई।
"मैं कल सुबह से शुरू कर दूँगा।"
"नहीं," मिर्ज़ा साहब बोले। "आज रात।"
"रात को क्यों?"
बूढ़े ने अपनी छड़ी उठाई और खिड़की की तरफ़ मुँह कर लिया, जहाँ बारिश शीशे पर लकीरें खींच रही थी।
"क्योंकि मेरे वालिद ने कहा था, अगर कभी वो दरवाज़ा खोलना पड़े, तो रात को खोलना। दिन में वो कमरा जागता है।"
रात के साढ़े ग्यारह बज चुके थे।
पुस्तकालय में अब सिर्फ़ दो लोग बचे थे। देव, और बूढ़ा चौकीदार रहमत चाचा।
रहमत चाचा सत्तर साल के थे और पचास साल से इस इमारत की रखवाली कर रहे थे। उनके दादा भी यहीं चौकीदार थे। और उनके दादा के अब्बा भी। लोग मज़ाक में कहते थे कि शाह मंज़िल की दीवारों में ईंटें कम और रहमत चाचा के ख़ानदान की हड्डियाँ ज़्यादा लगी हैं।
जब देव ने उन्हें बताया कि वो तहखाना नंबर तीन खोलने जा रहा है, तो रहमत चाचा के हाथ से चाय का गिलास छूटकर फ़र्श पर गिर गया।
काँच के टुकड़े चारों तरफ़ बिखर गए।
"नहीं बेटा," उन्होंने काँपती आवाज़ में कहा। "वो कमरा मत खोलो।"
"चाचा, सरकारी आदेश है। रिकॉर्ड बनाना ज़रूरी है।"
"सरकार को क्या पता उस कमरे में क्या है?"
"तो आप बता दीजिए।"
रहमत चाचा ने अपने सीने पर हाथ रखा, जहाँ उनकी कमीज़ के नीचे एक काला धागा बँधा रहता था। देव ने उसे हमेशा देखा था पर कभी पूछा नहीं था।
"मेरे दादा ने उस दरवाज़े पर ईंटें चिनी थीं," रहमत चाचा बोले। "अपने हाथों से। मिर्ज़ा साहब के वालिद के कहने पर। और जब वो आखिरी ईंट रख रहे थे, तब उन्होंने अंदर से एक आवाज़ सुनी थी।"
"कैसी आवाज़?"
रहमत चाचा ने एक पल के लिए अपनी आँखें बंद कीं।
"पन्ने पलटने की आवाज़।"
देव कुछ नहीं बोला।
"बंद कमरे में, बेटा। जहाँ कोई इंसान नहीं था। जहाँ कोई खिड़की नहीं थी। हवा तक नहीं जा सकती थी। वहाँ कोई पन्ने पलट रहा था। धीरे... धीरे... जैसे कोई बहुत ध्यान से कुछ पढ़ रहा हो।"
बाहर बिजली कड़की और पूरी इमारत की बत्तियाँ एक पल के लिए झपकीं।
देव ने अपना गला साफ़ किया। "चाचा, पुरानी इमारतों में चूहे होते हैं। हवा के दबाव से आवाज़ें होती हैं। मैं इतिहास पढ़ता हूँ, और इतिहास में ऐसी सैकड़ों कहानियाँ..."
"तुम्हारे अब्बा भी इतिहास पढ़ते थे।"
दूसरी बार। एक ही रात में दूसरी बार किसी ने उसे उसके पिता की याद दिलाई थी।
देव ने टॉर्च उठाई और सीढ़ियों की तरफ़ बढ़ गया।
पीछे से रहमत चाचा की आवाज़ आई, धीमी, लगभग फुसफुसाहट जैसी।
"अगर अंदर कोई किताब मिले, तो उसे खोलना मत। और अगर खोल लो, तो पढ़ना मत। और अगर पढ़ लो..."
देव रुक गया। "तो?"
बूढ़े ने जवाब नहीं दिया।
देव ने मुड़कर देखा।
रहमत चाचा वहाँ खड़े नहीं थे।
गलियारा खाली था। सिर्फ़ फ़र्श पर काँच के टुकड़े थे, और टूटे गिलास के पास चाय का एक छोटा सा तालाब, जिसमें छत का बल्ब काँपता हुआ दिख रहा था।
"चाचा?"
कोई जवाब नहीं।
देव ने खुद को समझाया कि बूढ़े आदमी शायद दूसरे कमरे में चले गए होंगे। इतनी जल्दी, बिना आवाज़ किए। सत्तर साल के घुटनों के साथ।
उसने खुद को समझा लिया।
इंसान अक्सर ऐसा ही करता है। जब तक डर उसकी गर्दन पर साँस न लेने लगे, वो खुद को समझाता रहता है।
तहखाने की सीढ़ियाँ पत्थर की थीं, बीच से घिसी हुईं, जैसे सदियों से लोग उन पर उतरते आए हों। लेकिन देव जानता था कि यहाँ अठत्तर साल से कोई नहीं उतरा था।
तो फिर ये सीढ़ियाँ इतनी घिसी हुई क्यों थीं?
पहले तहखाने को पार करके, फिर दूसरे को पार करके, वो उस गलियारे के आखिरी सिरे तक पहुँचा जहाँ दीवार में ईंटों से भरा एक मेहराब था। ईंटों के बीच का गारा काला पड़ चुका था। और ईंटों पर, लाल रंग से, एक लाइन लिखी थी, जो इतने सालों में भी पूरी तरह मिटी नहीं थी:
"जो अंदर है, उसे अंदर ही पढ़ा जाए।"
देव ने अपने बैग से हथौड़ी और छेनी निकाली। मिर्ज़ा साहब ने दोपहर में ही मज़दूर भेजकर ईंटें ढीली करवा दी थीं, बस आखिरी परत बाकी थी।
पहली चोट।
आवाज़ पूरे तहखाने में गूँजी और देर तक गूँजती रही। बहुत देर तक। इतनी देर तक, जितनी देर किसी आवाज़ को नहीं गूँजना चाहिए।
दूसरी चोट।
एक ईंट अंदर की तरफ़ गिरी।
और देव ने उसे गिरते हुए सुना। धप्प।
फिर एक और आवाज़।
सरसराहट।
बहुत हल्की। जैसे किसी ने कागज़ की एक शीट को उँगली से छुआ हो।
देव का हाथ हवा में रुक गया।
उसने अपनी साँस रोकी और सुनने की कोशिश की। बाहर बारिश की आवाज़ यहाँ तक नहीं पहुँचती थी। ऊपर की कोई आवाज़ नहीं आती थी। सिर्फ़ उसके अपने दिल की धड़कन, जो अचानक बहुत तेज़ हो गई थी।
कुछ नहीं।
कोई आवाज़ नहीं।
"चूहा," उसने ज़ोर से कहा, जैसे अपनी ही आवाज़ सुनकर हिम्मत मिल जाएगी। "बस एक चूहा।"
अठत्तर साल से बंद कमरे में एक चूहा।
उसने बाकी ईंटें हटाईं।
अंदर का कमरा छोटा था। मुश्किल से दस बाई बारह फ़ुट। दीवारों के साथ लकड़ी की तीन अलमारियाँ थीं, जिनके दरवाज़े दीमक खा चुकी थी। अलमारियों में कुछ पुराने रजिस्टर थे, कुछ बंडल, कुछ लपेटे हुए नक्शे।
हवा भारी थी। बासी। उसमें सीलन की गंध थी, पुराने कागज़ की गंध थी, और कुछ और भी।
कुछ ऐसा जिसे देव तुरंत पहचान नहीं पाया।
फिर उसे याद आया।
यह गंध उसने पंद्रह साल पहले सूँघी थी। अपने पिता के स्टडी रूम में। उस सुबह, जब वो उनके लिए चाय लेकर गया था और कुर्सी पर बैठे उस आदमी ने न सिर उठाया था, न पलकें झपकाई थीं।
ताज़ी स्याही की गंध।
देव ने टॉर्च की रोशनी कमरे के बीचोंबीच घुमाई।
वहाँ, फ़र्श पर, लोहे का एक संदूक रखा था।
संदूक के चारों तरफ़ फ़र्श पर किसी सफ़ेद चीज़ से एक घेरा बनाया गया था। देव झुका और उसे छुआ। राख। बारीक, सफ़ेद राख। और घेरे के अंदर, संदूक के ढक्कन पर, तीन मोटी ज़ंजीरें लिपटी थीं।
तीनों ज़ंजीरों पर ताले थे।
और तीनों ताले खुले हुए थे।
देव बहुत देर तक उन्हें देखता रहा।
किसी ने ये ताले खोले थे। लेकिन कमरा बंद था। ईंटें सही सलामत थीं। अठत्तर साल से।
तो किसने?
अंदर से?
उसने अपने मन में उठ रहे सवाल को दबा दिया और ज़ंजीरें हटाने लगा। लोहे की ज़ंजीरें भारी थीं और उनके छल्लों पर जंग लगी थी, लेकिन वो आसानी से खिसक गईं। जैसे वो खुद हटना चाहती हों।
संदूक का ढक्कन उठाने से पहले देव ने अपनी हथेली उस पर रखी।
संदूक गर्म था।
बर्फ़ीले, सीलन भरे तहखाने में, लोहे का संदूक गर्म था। जैसे किसी के शरीर की गर्मी। जैसे उसके अंदर कुछ साँस ले रहा हो।
देव ने ढक्कन उठा दिया।
अंदर काले मखमल का एक कपड़ा था, जो किसी चीज़ के चारों तरफ़ लिपटा हुआ था। कपड़े पर लाल धागे से अरबी जैसी किसी लिपि में कुछ कढ़ा था। देव ने कई लिपियाँ पढ़ी थीं, फ़ारसी, उर्दू, पुरानी अरबी, ब्राह्मी, शारदा। लेकिन यह लिपि उनमें से कोई नहीं थी।
फिर भी, उसे अजीब सा लगा कि अगर वो थोड़ी देर और देखता रहे, तो शायद पढ़ लेगा।
उसने कपड़ा खोला।
अंदर एक किताब थी।
काली।
पूरी तरह काली। ऐसा काला रंग जो टॉर्च की रोशनी को पी जाता था। उस पर रोशनी पड़ती थी पर वापस नहीं लौटती थी। कोई शीर्षक नहीं, कोई नाम नहीं, कोई निशान नहीं। उसकी जिल्द चमड़े की लगती थी, लेकिन किसी जानवर के चमड़े जैसी नहीं। वो बहुत मुलायम थी। बहुत चिकनी।
बहुत ज़्यादा इंसानी त्वचा जैसी।
देव ने खुद को याद दिलाया कि वो एक इतिहासकार है। वैज्ञानिक सोच वाला आदमी। उसने दस्ताने पहने और किताब को दोनों हाथों से उठाया।
किताब का वज़न उसकी उम्मीद से कम था। बहुत कम। जैसे उसके अंदर पन्ने नहीं, हवा भरी हो।
और फिर उसे वो महसूस हुआ।
एक धड़कन।
बहुत हल्की। उसकी उँगलियों के नीचे। जिल्द के अंदर से।
देव ने किताब लगभग गिरा दी।
उसने उसे फिर से देखा। कुछ नहीं। किताब बिल्कुल स्थिर थी। उसने सोचा, शायद यह उसकी अपनी नब्ज़ थी। उसके हाथ काँप रहे थे, दिल तेज़ धड़क रहा था, ज़ाहिर है उसे अपनी ही धड़कन महसूस हुई होगी।
ज़ाहिर है।
उसने पहला पन्ना खोला।
कागज़ पीला था, पुराना, लेकिन बिल्कुल भी भुरभुरा नहीं। स्याही गहरी काली थी, और पहले पन्ने के बीचोंबीच, सुंदर, घुमावदार अक्षरों में, देवनागरी में लिखा था:
"इनमें से किसी का नाम मत पढ़ना।
आखिरी नाम पढ़ लिया, तो किताब तुम्हें पढ़ना शुरू कर देगी।"
देव ने उस वाक्य को दो बार पढ़ा।
देवनागरी।
कपड़े पर कोई अनजानी लिपि थी, लेकिन किताब के अंदर की चेतावनी देवनागरी में थी। और वो भी ऐसी हिंदी में, जो सौ-डेढ़ सौ साल पुरानी नहीं, बल्कि आज की लगती थी।
जैसे यह लाइन उसके लिए लिखी गई हो।
सिर्फ़ उसके लिए।
उसने अगला पन्ना पलटा।
यहाँ से नाम शुरू होते थे।
हर पन्ने पर एक नाम। बड़े अक्षरों में। और उसके नीचे दो-तीन लाइनें छोटे अक्षरों में, जैसे उस नाम का परिचय हो।
पहला नाम था:
ज़ुहाल
उसके नीचे लिखा था:
"पहला पहरेदार। वो जो दरवाज़े के बाहर बैठता है। उसकी आँखें नहीं हैं, क्योंकि उसे देखने की ज़रूरत नहीं। वो सुनता है।"
देव ने अपने होंठ भींच लिए। उसने नाम को मन में पढ़ा था, ज़ुबान से नहीं। यह फ़र्क उसे उस वक्त ज़रूरी लगा, हालाँकि वो खुद नहीं जानता था क्यों।
उसने पन्ने पलटने शुरू किए।
दूसरा नाम। तीसरा। चौथा।
हर नाम अजीब था। कुछ अरबी जैसे, कुछ संस्कृत जैसे, कुछ ऐसे जिनकी आवाज़ किसी भी भाषा में नहीं बैठती थी। हर नाम के नीचे कुछ लाइनें। "दूसरा पहरेदार, जो नींद में रहता है।" "सातवाँ पहरेदार, जिसके पास आवाज़ नहीं, सिर्फ़ इंतज़ार है।" "उन्नीसवाँ, जो आईनों के पीछे गिनता है।"
पहरेदार।
हर नाम के साथ यही शब्द।
देव की भौंहें सिकुड़ गईं। जिन्नों की किताबों के बारे में उसने पढ़ा था। पुराने अमलियात, सुलैमानी किताबें, कैद किए गए जिन्नों की सूचियाँ। उन सबमें जिन्नों को "कैदी" या "गुलाम" कहा जाता था।
लेकिन यहाँ हर एक को पहरेदार कहा गया था।
पहरेदार किसके?
उसने गिनती की। एक-एक पन्ना पलटते हुए। निन्यानवे नाम।
ठीक निन्यानवे।
और फिर आखिरी पन्ना।
जो फटा हुआ था।
देव ने टॉर्च पास लाकर देखा। पन्ना जिल्द के पास से फाड़ा गया था। उसका सिर्फ़ एक पतला किनारा बचा था, जिस पर किसी अक्षर का बहुत छोटा सा हिस्सा दिख रहा था, एक घुमावदार रेखा, जो किसी भी अक्षर की हो सकती थी।
लेकिन जिस चीज़ ने देव की रीढ़ में ठंडक भर दी, वो कुछ और थी।
फटे हुए किनारे पर स्याही थी।
और वो स्याही गीली थी।
उसने दस्ताने वाली उँगली उस पर फिराई। उँगली के सिरे पर काला धब्बा आ गया।
अठत्तर साल से बंद कमरे में। तीन ज़ंजीरों में बँधे संदूक के अंदर। एक किताब के फटे पन्ने पर।
ताज़ी, गीली स्याही।
जैसे किसी ने यह पन्ना कुछ मिनट पहले फाड़ा हो।
देव ने किताब बंद कर दी।
और जैसे ही किताब बंद हुई, पूरे तहखाने में एक आवाज़ गूँजी।
एक लंबी, धीमी साँस।
जैसे किसी ने बहुत, बहुत लंबे समय बाद राहत की साँस ली हो।
देव तीन-तीन सीढ़ियाँ एक साथ चढ़ता हुआ ऊपर आया।
उसकी साँस फूल रही थी। किताब उसकी छाती से दबी हुई थी, काले कपड़े में लिपटी। उसे नहीं पता था कि वो उसे क्यों लेकर आया। उसने सोचा था कि वो उसे वहीं छोड़ देगा, फ़ोटो खींच लेगा, सुबह मिर्ज़ा साहब को बता देगा।
लेकिन उसके हाथों ने उसे छोड़ा नहीं।
ऊपर के गलियारे में रहमत चाचा खड़े थे।
वहीं, उसी जगह, जहाँ से वो गायब हुए थे। टूटे गिलास के पास। जैसे वो कभी कहीं गए ही नहीं थे।
"चाचा! आप कहाँ चले गए थे?"
रहमत चाचा ने कोई जवाब नहीं दिया। उनकी आँखें देव के चेहरे पर नहीं थीं। वो उसकी छाती पर टिकी थीं। उस काले कपड़े पर।
"तुम उसे बाहर ले आए," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ में डर नहीं था। उसमें कुछ और था। कुछ ऐसा जो देव ने पहले कभी किसी की आवाज़ में नहीं सुना था।
शोक।
जैसे वो किसी मरे हुए आदमी से बात कर रहे हों।
"चाचा, यह बस एक पुरानी पांडुलिपि है। मुझे इसे स्टडी करना है। इसकी उम्र, इसकी स्याही, इसकी..."
"तुमने उसे पढ़ा?"
देव चुप रहा।
"बोलो बेटा, तुमने उसे पढ़ा?"
"मैंने बस पन्ने पलटे। नाम... नाम देखे। ज़ोर से नहीं पढ़े।"
रहमत चाचा ने अपनी कमीज़ के अंदर हाथ डाला और वो काला धागा बाहर निकाला। धागे में एक छोटा सा ताबीज़ बँधा था, चाँदी का, पुराना, घिसा हुआ। उन्होंने उसे गले से उतारा और देव की तरफ़ बढ़ाया।
"इसे रख लो।"
"चाचा, मैं ऐसी चीज़ों में..."
"रख लो!"
बूढ़े की आवाज़ इतनी तेज़ थी कि गलियारे में गूँज गई। देव ने चुपचाप ताबीज़ ले लिया।
"मेरे दादा ने यह उस दिन पहना था जिस दिन उन्होंने दीवार चिनी थी," रहमत चाचा बोले। "उन्होंने मुझसे कहा था, जिस दिन वो किताब बाहर आएगी, उस दिन इसकी ज़रूरत पड़ेगी। मैंने सोचा था वो दिन कभी नहीं आएगा।"
उन्होंने देव के कंधे पर हाथ रखा। उनका हाथ बहुत ठंडा था।
"एक बात याद रखना, बेटा। किताब तुम्हें कुछ भी दिखाए, कुछ भी बताए, उसकी बात का यकीन मत करना। वो सच नहीं बोलती। वो बस वो बोलती है, जो तुम सुनना चाहते हो।"
"और अगर वो सच बोले तो?"
रहमत चाचा ने एक लंबी साँस ली।
"तो वो और भी बुरा होगा।"
देव का घर पुस्तकालय से बीस मिनट की दूरी पर था। निशातगंज की एक पुरानी गली में, दो मंज़िला मकान, जो उसके पिता ने चालीस साल पहले बनवाया था।
पिता की मौत के बाद माँ यहाँ नहीं रह पाईं। वो कानपुर में अपनी बहन के पास चली गईं। देव ने घर बेचने से इनकार कर दिया था। उसने अपने पिता का स्टडी रूम वैसा ही रखा था, जैसा वो उस सुबह था। वही कुर्सी, वही मेज़, वही किताबों की अलमारियाँ।
वो कभी उस कमरे में बैठता नहीं था। बस कभी-कभी दरवाज़े पर खड़ा होकर देखता था।
उस रात, बारह बजकर चालीस मिनट पर, पहली बार पंद्रह साल में, देव उस कुर्सी पर बैठा।
उसे खुद नहीं पता था क्यों। वो सीधे अपने कमरे में जाने वाला था। लेकिन घर में घुसते ही उसके पैर अपने आप स्टडी रूम की तरफ़ मुड़ गए। जैसे किसी ने उसे वहाँ बुलाया हो।
उसने किताब मेज़ पर रखी। काला कपड़ा हटाया। टेबल लैंप जलाया।
पीली रोशनी में किताब और भी काली लग रही थी।
उसने अपनी नोटबुक निकाली, अपना फ़ाउंटेन पेन निकाला और काम शुरू कर दिया। यही उसका तरीका था। जब कुछ समझ न आए, तो उसे लिखो। उसकी सूची बनाओ। उसे तोड़ो, टुकड़ों में बाँटो, समझो।
डर को कागज़ पर उतार दो, तो वो छोटा हो जाता है।
कम से कम वो यही सोचता था।
पहले नाम का लिप्यंतरण। ज़ुहाल। उसके नीचे की पंक्तियाँ। फिर उसकी संभावित जड़। अरबी में "ज़ुहल" का मतलब शनि होता है। शनि, जो सबसे बाहरी ग्रह माना जाता था पुराने ज़माने में। सबसे दूर। जो दरवाज़े पर बैठता है।
देव का पेन तेज़ी से चल रहा था। उसे अजीब सा उत्साह महसूस हो रहा था, वो जो किसी बड़ी खोज के वक्त होता है।
दूसरा नाम। तीसरा। चौथा।
रात गहराती गई।
घर में सन्नाटा था। सिर्फ़ उसकी कलम की खरोंच, और दीवार घड़ी की टिक-टिक।
टिक।
टिक।
टिक।
और फिर देव को एहसास हुआ कि उसकी कलम की आवाज़ और घड़ी की आवाज़ एक साथ चल रही हैं। एक ही ताल पर। जैसे दोनों एक-दूसरे का इंतज़ार कर रही हों।
उसने लिखना बंद किया।
घड़ी भी बंद हो गई।
देव ने धीरे से सिर उठाया और दीवार की तरफ़ देखा।
घड़ी की सुइयाँ तीन बजकर तेरह मिनट पर रुकी हुई थीं।
उसने अपना फ़ोन देखा। रात के एक बजकर बावन मिनट।
घड़ी गलत समय पर रुकी थी। या शायद...
देव ने अपना सिर झटका। "बैटरी," उसने खुद से कहा। "पुरानी घड़ी है।"
उसने फिर से लिखना शुरू किया।
टिक।
घड़ी फिर से चल पड़ी।
देव का पेन हवा में रुक गया। घड़ी भी रुक गई।
उसने पेन कागज़ पर रखा।
टिक।
उसने पेन उठाया। सन्नाटा।
रखा। टिक।
उठाया। सन्नाटा।
देव की हथेलियों में पसीना आ गया। उसने पेन बहुत धीरे से मेज़ पर रख दिया और उसे घूरता रहा। घड़ी की सुइयाँ तीन तेरह पर अटकी रहीं।
फिर, बिना किसी के छुए, मेज़ पर रखी काली किताब का एक पन्ना पलट गया।
अपने आप।
देव कुर्सी से उछलकर खड़ा हो गया। कुर्सी पीछे दीवार से टकराई।
कमरे में कोई हवा नहीं थी। खिड़कियाँ बंद थीं। पंखा बंद था।
किताब अब उस पन्ने पर खुली थी, जहाँ उसने अभी तक पढ़ा नहीं था। तेरहवाँ नाम।
और उस पन्ने पर, नाम के नीचे की स्याही चमक रही थी। गीली। जैसे अभी-अभी लिखी गई हो।
देव ने खुद को मजबूर किया कि वो झुककर देखे।
तेरहवाँ नाम था:
हमज़ार
और उसके नीचे:
"तेरहवाँ पहरेदार। वो जो पढ़ने वाले के साथ पढ़ता है। जब तुम लिखते हो, वो गिनता है। जब तुम रुकते हो, वो इंतज़ार करता है।"
देव ने दीवार घड़ी की तरफ़ देखा।
तीन बजकर तेरह मिनट।
तेरहवाँ।
"संयोग," उसकी ज़ुबान से निकला। लेकिन इस बार उसकी आवाज़ में वो भरोसा नहीं था।
तभी उसका फ़ोन बजा।
सन्नाटे में फ़ोन की घंटी इतनी तेज़ लगी कि देव का दिल एक धड़कन चूक गया।
स्क्रीन पर कोई नंबर नहीं था। सिर्फ़ लिखा था: "अज्ञात"।
रात के दो बजे।
उसने फ़ोन उठाया। "हैलो?"
दूसरी तरफ़ सन्नाटा।
"हैलो? कौन है?"
फिर उसे आवाज़ सुनाई दी। साँसों की आवाज़। धीमी, लंबी, घरघराती साँसें। जैसे किसी के फेफड़ों में पानी भरा हो। जैसे कोई बहुत गहराई से साँस खींच रहा हो।
"कौन है?" देव ने ज़ोर से पूछा।
साँसें रुक गईं।
और फिर एक आवाज़ आई। न मर्द की, न औरत की। न बूढ़ी, न जवान। एक ऐसी आवाज़, जैसे बहुत सारी आवाज़ें एक साथ, एक ही शब्द बोल रही हों, थोड़ा आगे-पीछे।
"इनमें से किसी का नाम मत पढ़ना।"
देव का पूरा शरीर सुन्न पड़ गया।
"आखिरी नाम पढ़ लिया..."
देव ने फ़ोन कान से हटा लिया। उसे देखा। कॉल अभी भी चल रही थी। सेकेंड बढ़ रहे थे। 00:47... 00:48...
स्पीकर से आवाज़ आती रही, अब धीमी, लेकिन बिल्कुल साफ़:
"...तो किताब तुम्हें पढ़ना शुरू कर देगी।"
देव ने कॉल काट दी।
फ़ोन उसके हाथ में काँप रहा था। उसने कॉल हिस्ट्री खोली।
आखिरी कॉल... कोई नहीं।
कोई कॉल रिकॉर्ड ही नहीं हुई थी।
देव को याद नहीं कि वो कब सोया।
उसे बस इतना याद था कि उसने किताब को काले कपड़े में लपेटा, स्टडी रूम का दरवाज़ा बाहर से बंद किया, रहमत चाचा का ताबीज़ अपनी मुट्ठी में भींचा, और अपने कमरे में जाकर बिस्तर पर लेट गया। सारी बत्तियाँ जलाकर।
उसने खुद से कहा कि वो पूरी रात जागेगा।
लेकिन नींद आई। भारी, काली, बेहोशी जैसी नींद।
और नींद में उसने एक सपना देखा।
वो एक बहुत बड़े पुस्तकालय में खड़ा था। इतना बड़ा कि उसकी अलमारियाँ आसमान तक जाती थीं, और आसमान था ही नहीं, सिर्फ़ अंधेरा था। हर अलमारी में किताबें थीं। काली किताबें। लाखों। करोड़ों।
और हर किताब धीरे-धीरे साँस ले रही थी।
अलमारियों के बीच एक गलियारा था। देव उसमें चल रहा था। उसके पैरों की आवाज़ नहीं आ रही थी। आ रही थी तो सिर्फ़ एक आवाज़। पन्ने पलटने की।
सरर्र... सरर्र... सरर्र...
गलियारे के आखिर में एक मेज़ थी। और मेज़ पर कोई बैठा था। पीठ उसकी तरफ़ करके। झुका हुआ। कुछ लिखता हुआ।
देव ने उस पीठ को पहचाना।
वो कंधे। वो भूरा स्वेटर, जिसकी कोहनी पर माँ ने पैबंद लगाया था। वो सफ़ेद होते बाल।
"पापा?"
लिखने वाला रुक गया।
लेकिन मुड़ा नहीं।
"पापा, आप... आप यहाँ क्या लिख रहे हैं?"
बहुत देर तक कोई जवाब नहीं आया। फिर, बिना मुड़े, उसके पिता की आवाज़ आई। लेकिन वो आवाज़ गलत थी। उसमें कुछ गलत था। जैसे कोई उनकी आवाज़ की नकल कर रहा हो, और नकल लगभग सही हो, लगभग।
"मैं लिख नहीं रहा, देवू।"
देवू। यह नाम सिर्फ़ उसके पिता उसे बुलाते थे। पंद्रह साल से किसी ने उसे देवू नहीं कहा था।
"मैं लिखा जा रहा हूँ।"
और फिर उसके पिता का सिर धीरे-धीरे घूमने लगा।
लेकिन उनका शरीर नहीं घूमा।
सिर्फ़ सिर। पीछे की तरफ़। हड्डियों के चटकने की आवाज़ के साथ। धीरे... धीरे...
देव चीखा।
और उसकी आँख खुल गई।
सुबह हो चुकी थी।
कमरे में धूप आ रही थी। बारिश थम चुकी थी। बाहर किसी पेड़ पर एक कोयल बोल रही थी। सब कुछ बहुत सामान्य था।
देव कुछ देर लेटा रहा, अपनी साँसें ठीक करता हुआ। उसका पूरा शरीर पसीने से भीगा था। उसकी मुट्ठी अभी भी बंद थी, और उसके अंदर रहमत चाचा का ताबीज़ इतनी कसकर दबा था कि उसकी हथेली में लाल निशान पड़ गया था।
"सपना," उसने छत की तरफ़ देखते हुए कहा। "बस एक सपना।"
उसने करवट ली।
और उसकी साँस वहीं अटक गई।
उसके बिस्तर के ठीक सामने वाली दीवार पर, जो कल रात तक बिल्कुल सफ़ेद थी, कुछ लिखा हुआ था।
काली स्याही से।
ऊपर से नीचे तक। कोने से कोने तक। पूरी दीवार भरी हुई थी। छोटे-छोटे, घने अक्षरों में, लाइन के बाद लाइन, बिना किसी जगह के।
देव धीरे से उठा। उसके पैर ठंडे फ़र्श पर पड़े। वो दीवार के पास गया।
और उसने लिखावट पहचानी।
यह उसकी अपनी लिखावट थी।
उसके अपने अक्षर। उसका अपना "र" का घुमाव, जो वो बचपन से थोड़ा टेढ़ा लिखता था। उसका अपना "क्ष", जिसे वो हमेशा जल्दबाज़ी में लिखता था।
उसने पढ़ना शुरू किया।
"अट्ठाईसवाँ पहरेदार। वो जो सोने वालों के पैरों के पास बैठता है और उनकी गिनती करता है..."
"इकतालीसवाँ पहरेदार। उसे पानी में देखा जा सकता है, लेकिन सिर्फ़ तब, जब तुम पानी में नहीं देख रहे हो..."
"बावनवाँ पहरेदार, जिसका कोई चेहरा नहीं, क्योंकि उसने अपना चेहरा उसे दे दिया जिसकी वो रखवाली करता है..."
देव पीछे हट गया।
उसने ये पन्ने नहीं पढ़े थे।
रात में वो सिर्फ़ तेरहवें नाम तक पहुँचा था। अट्ठाईसवाँ, इकतालीसवाँ, बावनवाँ, इनमें से किसी को उसने देखा तक नहीं था।
तो उसकी लिखावट में, उसकी दीवार पर, ये बातें कैसे आईं?
उसने अपने हाथ देखे।
उसकी दाहिनी हथेली की उँगलियाँ काली थीं।
स्याही से।
नाखूनों के अंदर तक। जैसे उसने रात भर लिखा हो। बिना कलम के। अपनी उँगलियों से।
देव के मुँह से एक आवाज़ निकली, जो चीख और सिसकी के बीच कुछ थी। उसने बाथरूम की तरफ़ दौड़कर नल खोला और अपने हाथ रगड़ने लगा। साबुन। फिर साबुन। फिर नाखूनों से खुरचना। पानी काला होकर नाली में बहता रहा।
लेकिन स्याही नहीं उतरी।
वो उसकी त्वचा पर नहीं थी।
वो उसकी त्वचा के अंदर थी।
स्टडी रूम का दरवाज़ा अभी भी बाहर से बंद था। ताला वैसा ही लगा था जैसा उसने रात को लगाया था।
देव ने काँपते हाथों से उसे खोला।
किताब मेज़ पर थी। काले कपड़े में लिपटी हुई। ठीक वैसी, जैसी उसने छोड़ी थी।
उसने कपड़ा हटाया और किताब खोली। अट्ठाईसवाँ पन्ना।
वही शब्द। हू-ब-हू। "अट्ठाईसवाँ पहरेदार। वो जो सोने वालों के पैरों के पास बैठता है और उनकी गिनती करता है।"
इकतालीसवाँ। वही।
बावनवाँ। वही।
उसकी दीवार पर वही लिखा था जो इस किताब में था। उसके पढ़ने से पहले।
किताब ने उसे वो पढ़वाया था जो उसने पढ़ा नहीं था। या फिर...
देव के दिमाग़ में चेतावनी गूँजी।
"किताब तुम्हें पढ़ना शुरू कर देगी।"
अगर किताब उसे पढ़ रही थी, तो क्या वो दीवार पर लिखे शब्द किताब के थे?
या उसके?
वो वापस अपने कमरे में आया। दीवार के सामने खड़ा हुआ। और इस बार उसने ध्यान से पूरी दीवार पढ़ी। ऊपर से नीचे तक। हर लाइन।
ज़्यादातर पंक्तियाँ किताब से थीं। पहरेदारों के नाम और उनके परिचय।
लेकिन सबसे नीचे, फ़र्श से बस एक फ़ुट ऊपर, जहाँ लिखावट बहुत टेढ़ी-मेढ़ी हो गई थी, जैसे लिखने वाला घुटनों के बल बैठकर, थकान में, या किसी और के हाथों मजबूर होकर लिख रहा हो, वहाँ दो लाइनें थीं जो किताब में कहीं नहीं थीं।
देव घुटनों के बल बैठ गया और उन्हें पढ़ा।
"पहला पहरेदार जाग गया है।
बाकी अट्ठानवे गिन रहे हैं।"
और उसके नीचे, सबसे आखिर में, स्याही अभी भी गीली थी। अभी भी चमक रही थी। उसकी एक बूँद धीरे-धीरे नीचे फ़र्श की तरफ़ बह रही थी।
"देवू, दरवाज़ा खोलो। मैं बाहर खड़ा हूँ।"
देव की साँस थम गई।
ठीक उसी पल, नीचे, घर के मुख्य दरवाज़े पर दस्तक हुई।
ठक।
ठक।
ठक।
तीन बार। धीमी। ठहरी हुई।
ठीक वैसे ही, जैसे उसके पिता हर शाम कॉलेज से लौटकर दरवाज़ा खटखटाते थे।
और फिर, दरवाज़े के उस पार से, एक आवाज़ आई। वही आवाज़। लगभग सही। लगभग।
"देवू... बेटा... दरवाज़ा खोलो। बाहर बहुत ठंड है।"
(भाग 1 समाप्त)
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- Writer
- TheHauntedWriter
- Story
- काली किताब का आखिरी जिन्न
- Chapter
- 1 of 7
- Category
- Jinn & Spirits
- Reading time
- 24 min
- Words
- 4693
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
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