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भाग 2: दरवाज़े के उस पार
TheHauntedWriter · Jinn & Spirits · 18 मिनट
ठक।
ठक।
ठक।
दस्तक फिर हुई।
देव अपने कमरे के फ़र्श पर घुटनों के बल बैठा था, दीवार पर लिखी उस आखिरी लाइन को घूरता हुआ, जिसकी स्याही अब भी धीरे-धीरे नीचे बह रही थी। उसका दिमाग़ कह रहा था उठो, भागो, खिड़की से कूद जाओ, पड़ोसियों को आवाज़ दो। लेकिन उसका शरीर पत्थर हो चुका था।
"देवू..."
आवाज़ नीचे से आ रही थी। मुख्य दरवाज़े के उस पार से। धीमी, थकी हुई, और इतनी जानी-पहचानी कि देव के सीने में कुछ टूटने लगा।
"देवू, बेटा, सो रहे हो क्या? चाबी भूल गया हूँ।"
चाबी भूल गया हूँ।
पंद्रह साल पहले, हर तीसरे-चौथे दिन, उसके पिता यही कहते थे। प्रोफ़ेसर रघुनाथ सक्सेना दुनिया का कोई भी पुराना शिलालेख पढ़ लेते थे, लेकिन अपनी जेब में घर की चाबी रखना उन्हें कभी याद नहीं रहता था। माँ हर बार चिढ़ती थीं। और देव, जो तब उन्नीस साल का था, हर बार दौड़कर दरवाज़ा खोलता था।
यह बात कोई नहीं जानता था।
कोई बाहर वाला नहीं।
देव उठा। उसे पता भी नहीं चला कब। उसके पैर अपने आप सीढ़ियों की तरफ़ बढ़ने लगे। एक कदम। दूसरा। जैसे उसका शरीर पंद्रह साल पुरानी आदत को याद कर रहा हो।
रेलिंग पकड़ते ही उसकी मुट्ठी में दबा ताबीज़ अचानक गर्म हो गया।
इतना गर्म कि देव की हथेली जल गई। उसने चीखकर हाथ खोला। चाँदी का ताबीज़ लाल हो रहा था, जैसे भट्टी से निकाला गया हो। वो फ़र्श पर गिरा और ठन्न की आवाज़ के साथ सीढ़ी पर लुढ़कता हुआ नीचे जाकर रुका।
ठीक मुख्य दरवाज़े के सामने।
और जिस पल ताबीज़ वहाँ रुका, बाहर से दस्तक बंद हो गई।
सन्नाटा।
देव ने अपनी जली हुई हथेली को सीने से लगाया और साँस रोककर खड़ा रहा।
कुछ नहीं।
कोई आवाज़ नहीं।
फिर, बहुत धीरे, दरवाज़े के उस पार से, किसी के लंबी साँस खींचने की आवाज़ आई। जैसे कोई कुत्ता किसी चीज़ को सूँघ रहा हो। दरवाज़े की दरार के पास। नीचे, फ़र्श के बिल्कुल करीब।
सूँ... सूँ... सूँ...
और फिर वो आवाज़, अब बदली हुई। उसमें पिता की गर्माहट नहीं थी। अब वो सपाट थी। खोखली। जैसे किसी ने एक मुखौटा उतार दिया हो और अब उसे पहनने की परवाह न हो।
"वो बूढ़ा तुम्हें बचा नहीं पाएगा।"
देव सीढ़ियों पर जम गया।
"उसके दादा भी नहीं बचा पाए थे।"
देव को नहीं पता था कि वो कितनी देर वहाँ खड़ा रहा।
पाँच मिनट। दस मिनट। शायद आधा घंटा।
बाहर से कोई आवाज़ नहीं आई। धीरे-धीरे गली की सामान्य आवाज़ें लौटने लगीं। सब्ज़ी वाले की पुकार। किसी स्कूटर का हॉर्न। सामने वाले घर में प्रेशर कुकर की सीटी।
ज़िंदगी। आम, बेरंग, सुरक्षित ज़िंदगी।
देव धीरे-धीरे नीचे उतरा। उसने ताबीज़ उठाया। अब वो ठंडा हो चुका था। लेकिन उसकी सतह पर, जहाँ पहले कोई निशान नहीं था, अब एक बारीक लकीर उभर आई थी। एक दरार। जैसे किसी ने उसे अंदर से तोड़ने की कोशिश की हो।
उसने दरवाज़े के पास जाकर उसके छेद में आँख लगाई।
बाहर का बरामदा खाली था।
धूप में चमकती गीली ज़मीन। गेट पर लिपटी बोगनवेलिया की बेल। सब कुछ सामान्य।
उसने दरवाज़े की चिटकनी पर हाथ रखा।
फिर रुक गया।
कुछ भी तुम्हें दिखाए, उसकी बात का यकीन मत करना।
उसने दोबारा छेद से देखा। इस बार ज़्यादा ध्यान से।
बरामदे का फ़र्श गीला था। बारिश से। लेकिन दरवाज़े के ठीक सामने, एक सूखा हिस्सा था। दो पैरों के आकार का। जैसे कोई वहाँ बहुत देर तक खड़ा रहा हो और बारिश उस जगह तक पहुँच ही न पाई हो।
और उन दो सूखे निशानों के चारों तरफ़, गीले फ़र्श पर, कुछ काली बूँदें थीं।
स्याही की बूँदें।
देव पीछे हट गया।
तभी दरवाज़े की घंटी बजी।
उसका दिल उछलकर गले तक आ गया। वो चीखते-चीखते रुका। उसने फिर छेद से देखा।
बाहर सामने वाले घर की शर्मा आंटी खड़ी थीं। हाथ में स्टील का डिब्बा। माथे पर बड़ी सी बिंदी।
देव ने एक लंबी साँस ली, अपने चेहरे पर हाथ फेरा और दरवाज़ा खोला।
"अरे देव बेटा! सो रहे थे क्या? तीन बार घंटी बजाई।"
"नहीं आंटी, बस... नहा रहा था।"
शर्मा आंटी ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा। उसके बिखरे बाल। पसीने से भीगी बनियान। काली उँगलियाँ।
"ये हाथ में क्या लगा लिया?"
देव ने जल्दी से हाथ पीछे कर लिया। "स्याही। काम की वजह से।"
"हम्म।" आंटी ने डिब्बा आगे बढ़ाया। "गुड़ वाली खीर बनाई थी। सोचा तुम अकेले हो, थोड़ी दे आऊँ।"
"शुक्रिया आंटी।"
वो मुड़ने लगीं, फिर रुककर बोलीं, "और हाँ, वो तुम्हारे जो रिश्तेदार आए थे, उनसे कहना कि गली में ऐसे खड़े न रहा करें। बच्चे डर गए।"
देव के हाथ से डिब्बा लगभग छूट गया।
"कौन रिश्तेदार?"
"अरे वही, भूरे स्वेटर वाले। सुबह छह बजे से तुम्हारे दरवाज़े पर खड़े थे। मैंने छत से देखा। बिल्कुल सीधे खड़े थे, न हिले न डुले। मैंने आवाज़ भी दी, 'भाईसाहब, देव सो रहा होगा, घंटी बजाइए।' पर उन्होंने मुड़कर देखा तक नहीं।"
देव की आवाज़ बहुत मुश्किल से निकली। "आंटी... आपने उनका चेहरा देखा?"
शर्मा आंटी कुछ पल सोचती रहीं। उनके माथे पर बल पड़ गए।
"अजीब बात है," उन्होंने धीमे से कहा। "मैंने देखा तो था। पर अब याद नहीं आ रहा। जैसे... जैसे चेहरा था ही नहीं। बस स्वेटर याद है। कोहनी पर पैबंद लगा था।"
देव ने खीर का डिब्बा रसोई में रखा, जल्दी से कपड़े बदले, और किताब को काले कपड़े में लपेटकर अपने बैग में डाल लिया।
वो उसे घर में अकेला नहीं छोड़ सकता था।
और वो खुद भी उस घर में अकेला नहीं रह सकता था।
बाहर निकलते वक्त उसने अपने कमरे की तरफ़ देखा। दीवार पर लिखे अक्षर दिन की रोशनी में और भी डरावने लग रहे थे। अँधेरे में डर की वजह होती है। उजाले में कोई बहाना नहीं बचता।
उसने दरवाज़ा बंद किया, दो बार ताला लगाया, और तेज़ी से गली से बाहर निकल गया।
ऑटो में बैठकर उसने अपनी काली उँगलियाँ देखीं। स्याही अब नाखूनों से ऊपर, उँगलियों के दूसरे पोर तक फैल चुकी थी। सुबह वो सिर्फ़ सिरों पर थी।
वो फैल रही थी।
उसने अपनी उँगलियाँ मुट्ठी में बंद कर लीं और खिड़की से बाहर देखने लगा।
लखनऊ की सड़कें अपनी रफ़्तार से भाग रही थीं। हज़रतगंज की भीड़, चौराहों पर ट्रैफ़िक, रिक्शे वालों की बहस। हज़ारों लोग, जिनमें से किसी को नहीं पता था कि इस ऑटो में बैठे आदमी के बैग में क्या है।
एक लाल बत्ती पर ऑटो रुका।
देव ने बगल वाली गाड़ी की तरफ़ देखा। एक सफ़ेद कार। उसकी पिछली सीट पर एक छोटी बच्ची बैठी थी, पाँच-छह साल की, गुलाबी फ़्रॉक में। वो शीशे से चिपककर देव को देख रही थी।
देव ने हल्के से मुस्कुराने की कोशिश की।
बच्ची नहीं मुस्कुराई।
उसने अपनी छोटी सी उँगली उठाई और कार के धुंधले शीशे पर कुछ लिखने लगी। धीरे-धीरे। एक-एक अक्षर।
देव ने पढ़ा।
९८
फिर बच्ची ने उसे मिटाया और दोबारा लिखा।
९७
फिर मिटाया।
९६
बत्ती हरी हुई। कार आगे बढ़ गई। देव ने मुड़कर देखा। बच्ची अब भी शीशे से चिपकी उसे देख रही थी। उसके होंठ हिल रहे थे। जैसे वो कुछ गिन रही हो।
बाकी अट्ठानवे गिन रहे हैं।
शाह मंज़िल पुस्तकालय के सामने पुलिस की दो गाड़ियाँ खड़ी थीं।
और एक एंबुलेंस।
देव का पेट मुड़ गया। उसने ऑटो वाले को पैसे पकड़ाए और भागता हुआ अंदर गया। गेट पर भीड़ थी। मोहल्ले के लोग, कुछ स्टाफ़, कुछ तमाशबीन। सब आपस में फुसफुसा रहे थे।
"क्या हुआ?" देव ने एक चपरासी से पूछा।
चपरासी ने उसे देखा और उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया। "देव सर... रहमत चाचा..."
देव ने आगे सुना नहीं। वो भीड़ को चीरता हुआ अंदर गया। मुख्य हॉल से होता हुआ, गलियारे से होता हुआ, वहाँ तक जहाँ एक कांस्टेबल रस्सी बाँध रहा था।
तहखाने की सीढ़ियों के ऊपर।
और रस्सी के उस पार, सफ़ेद चादर से ढका एक शरीर।
चादर के नीचे से एक हाथ बाहर निकला हुआ था। बूढ़ा, झुर्रियों वाला हाथ।
उसकी उँगलियाँ काली थीं।
कलाई तक।
"आप कौन हैं?" एक इंस्पेक्टर ने देव को रोका। लंबा, मूँछों वाला आदमी, जिसकी वर्दी पर नाम की पट्टी लगी थी: आर. के. तिवारी।
"मैं... मैं यहाँ काम करता हूँ। देव सक्सेना। अभिलेखपाल।"
इंस्पेक्टर तिवारी की आँखें सिकुड़ गईं। "आप ही कल रात यहाँ थे?"
"हाँ। ग्यारह से करीब डेढ़ बजे तक।"
"मृतक को आखिरी बार कब देखा?"
"एक बजे के आसपास। जब मैं जा रहा था। वो यहीं खड़े थे। बिल्कुल ठीक थे।"
तिवारी ने अपनी नोटबुक में कुछ लिखा। फिर बोला, "अजीब बात है। डॉक्टर कह रहे हैं मौत रात तीन बजे के आसपास हुई। दिल का दौरा लगता है। लेकिन..."
"लेकिन?"
इंस्पेक्टर ने चादर की तरफ़ इशारा किया। "आँखें खुली थीं। और बूढ़े के हाथ में कुछ था, जो उसने इतनी कसकर पकड़ा था कि हमें उँगलियाँ तोड़नी पड़ीं।"
"क्या?"
तिवारी ने एक प्लास्टिक की पारदर्शी थैली उठाई। उसमें कागज़ का एक छोटा सा टुकड़ा था। पीला, पुराना। उसका एक किनारा सीधा था, जैसे किसी किताब की जिल्द से फाड़ा गया हो।
उस पर काली स्याही से कुछ लिखा था।
लेकिन देव उसे पढ़ नहीं पाया। क्योंकि अक्षर इतने छोटे थे, और इतने घने, कि एक काले धब्बे जैसे लग रहे थे।
"पता नहीं क्या है," तिवारी ने कंधे उचकाए। "शायद कोई पुराना कागज़। बूढ़े चौकीदार सनकी होते हैं। फ़ॉरेंसिक में भेज रहे हैं।"
देव उस कागज़ को देखता रहा।
किताब का फटा हुआ आखिरी पन्ना?
नहीं। वो इतना छोटा नहीं हो सकता। यह तो एक टुकड़ा था। उस पन्ने का एक कोना भर।
"मौत का समय," देव ने धीमे से पूछा। "बिल्कुल कितने बजे?"
तिवारी ने अपनी नोटबुक देखी। "चौकीदार की कलाई घड़ी टूट गई थी गिरने से। उसकी सुइयाँ अटकी हैं..."
देव जानता था वो क्या कहने वाला है।
"...तीन बजकर तेरह मिनट पर।"
मिर्ज़ा साहब अपने दफ्तर में खिड़की के सामने बैठे थे। उनकी छड़ी उनके घुटनों पर थी। और उनकी आँखें लाल थीं।
देव अंदर आया और दरवाज़ा बंद कर दिया।
कुछ देर दोनों में से कोई नहीं बोला।
"पचास साल," आखिरकार मिर्ज़ा साहब बोले। "पचास साल से रहमत इस इमारत के दरवाज़े पर बैठा था। उसके दादा पचपन साल। उनके अब्बा चालीस। डेढ़ सौ साल, देव मियाँ। एक ख़ानदान ने डेढ़ सौ साल उस तहखाने के ऊपर पहरा दिया।"
पहरा।
देव के कानों में वो शब्द गूँजा।
"आपको पता था," देव ने कहा। उसकी आवाज़ में गुस्सा था, जो उसे खुद हैरान कर रहा था। "आपको पता था कि अंदर क्या है। और फिर भी आपने मुझे चाबी दी।"
मिर्ज़ा साहब मुड़े। "मुझे नहीं पता था कि अंदर क्या है। मुझे बस इतना पता था कि उसे खोला जाना है।"
"किसने कहा?"
बूढ़े ट्रस्टी ने अपनी शेरवानी की अंदरूनी जेब में हाथ डाला और एक लिफ़ाफ़ा निकाला। पुराना, पीला पड़ चुका, किनारों से फटा हुआ। उस पर किसी ने नीली स्याही से लिखा था:
"मेरे बेटे देव के लिए।
सिर्फ़ तब देना, जब वो तहखाना नंबर तीन खोल ले।"
देव ने लिखावट पहचानी।
उसका पूरा शरीर काँप गया।
उसके पिता की लिखावट।
"पंद्रह साल," मिर्ज़ा साहब बोले। "पंद्रह साल से यह मेरी तिजोरी में था। जिस दिन प्रोफ़ेसर साहब यहाँ आए थे, उन्होंने यह मुझे दिया था। मैंने पूछा था कि अगर देव कभी उस तहखाने में न जाए तो? वो मुस्कुराए थे। कहा था, 'वो जाएगा, मिर्ज़ा साहब। उसे जाना ही होगा। उसका नाम पहले से लिखा है।'"
देव ने लिफ़ाफ़ा लिया। उसके हाथ इतने काँप रहे थे कि वो उसे खोल नहीं पा रहा था।
"और एक बात," मिर्ज़ा साहब ने कहा। "जिस दिन वो आए थे, उन्होंने मुझसे पूछा था कि तहखाना कब बंद हुआ। मैंने कहा 1947 में। उन्होंने अपनी डायरी खोली, कुछ हिसाब लगाया, और बोले, 'तो अगली बार छिहत्तर साल बाद नहीं, अठत्तर साल बाद खुलेगा। दो साल की देरी। उसे बहुत भूख लगी होगी।'"
"किसे?"
मिर्ज़ा साहब ने कंधे उचकाए। "मैंने भी यही पूछा था। उन्होंने जवाब नहीं दिया। बस इतना कहा कि वो देरी उनकी वजह से होगी।"
देव ने लिफ़ाफ़ा खोल दिया।
अंदर एक मोटा कागज़ था, कई बार मोड़ा हुआ। और उसके साथ एक छोटी सी चीज़ गिरी, जो देव की गोद में आकर रुकी।
एक फ़ाउंटेन पेन की निब।
सुनहरी, पुरानी, और उसकी नोक पर सूखी हुई काली स्याही।
देव ने उसे पहचाना। यह उसके पिता के पसंदीदा पेन की निब थी। वो पेन जो उन्हें उनके गुरु ने दिया था। वो पेन जो उनकी मौत के बाद कभी नहीं मिला।
उसने काँपते हाथों से कागज़ खोला।
"देवू,
अगर तुम यह पढ़ रहे हो, तो मैं नाकाम हो गया। और तुम उस किताब को छू चुके हो।
मेरे पास ज़्यादा वक्त नहीं है, इसलिए सीधी बात लिखूँगा। जो मैं तुम्हें बताने वाला हूँ, उस पर तुम्हें यकीन नहीं होगा। मुझे भी नहीं हुआ था। लेकिन तुम्हें यकीन करना होगा, क्योंकि अब तुम्हारी ज़िंदगी इस पर टिकी है।
वो किताब किताब नहीं है। वो एक ताला है।
उसमें लिखे निन्यानवे नाम जिन्नों के नाम नहीं हैं, बेटा। वो पहरेदारों के नाम हैं। और पहरेदार किसी कैदी के लिए नहीं होते। वो किसी ऐसी चीज़ के लिए होते हैं, जिसे बाहर आने से रोकना हो।
मुझे अभी तक पूरा नहीं पता कि वो क्या है। मैं बस इतना जानता हूँ कि वो सौवाँ है। और उसका नाम उस आखिरी पन्ने पर लिखा था। जो फटा हुआ है।
मैंने वो पन्ना ढूँढने में बारह साल लगाए। और जिस दिन मुझे लगा कि मैं उसके करीब हूँ, उसी दिन मुझे समझ आया कि मैं उसे नहीं ढूँढ रहा था।
वो मुझे ढूँढ रहा था।
अब मेरी बात ध्यान से सुनो, देवू। तीन बातें।
पहली: अगर किताब में किसी जानने वाले का नाम दिखे, तो उस इंसान से दूर रहना। चाहे वो कोई भी हो।
दूसरी: किताब को कभी जलाने की कोशिश मत करना। मैंने की थी। वो नहीं जली। लेकिन उस रात तुम्हारी माँ को बुखार हो गया था, याद है? वो तीन दिन बेहोश रहीं। डॉक्टर कुछ नहीं समझ पाए थे।
और तीसरी, सबसे ज़रूरी बात।
अगर कभी मेरी आवाज़ में कोई तुम्हारे दरवाज़े पर आए, तो उसे अंदर मत आने देना।
क्योंकि मैं उस रात कभी बाहर नहीं निकला।
जिस सुबह तुम मेरे कमरे में चाय लेकर आओगे, और मुझे कुर्सी पर बैठा पाओगे, उस वक्त मैं उस कुर्सी पर नहीं होऊँगा, बेटा। मैं किताब में होऊँगा।
और जो कुर्सी पर होगा, वो सिर्फ़ उसका छोड़ा हुआ खोल होगा।
मुझे माफ़ कर देना। मैंने तुम्हें इससे बचाने की बहुत कोशिश की।
लेकिन तुम्हारा नाम उस किताब में मुझसे पहले से लिखा था।
तुम्हारा,
पापा"
देव ने कागज़ नीचे रखा।
कमरे में इतनी खामोशी थी कि उसे अपने खून के बहने की आवाज़ सुनाई दे रही थी।
जिस सुबह तुम मेरे कमरे में चाय लेकर आओगे।
यह खत उनकी मौत से तीन दिन पहले लिखा गया था।
और उसमें वो सुबह लिखी थी।
वो सुबह, जिसमें देव चाय लेकर गया था। जिसमें उसने अपने पिता को कुर्सी पर पाया था। आँखें खुली। उँगलियाँ काली।
उन्हें पता था।
तीन दिन पहले उन्हें पता था कि क्या होने वाला है। और उन्होंने किसी को नहीं बताया। न माँ को। न उसे।
"क्या लिखा है?" मिर्ज़ा साहब ने धीमे से पूछा।
देव ने जवाब नहीं दिया। उसने खत को मोड़ा और अपनी जेब में रख लिया। फिर उसने निब उठाई।
जैसे ही उसकी स्याही से सनी उँगलियों ने निब को छुआ, कुछ हुआ।
निब की नोक पर सूखी स्याही, जो पंद्रह साल से सूखी पड़ी थी, अचानक पिघलने लगी।
एक बूँद बनी। काली। चमकदार।
और वो बूँद नीचे नहीं गिरी।
वो ऊपर उठी।
हवा में। धीरे-धीरे। निब से दो इंच ऊपर। और वहाँ लटककर काँपने लगी, जैसे किसी चीज़ की तरफ़ खिंच रही हो।
देव ने उसकी दिशा देखी।
वो बूँद उसके बैग की तरफ़ झुकी हुई थी।
उस बैग की तरफ़, जिसमें काली किताब रखी थी।
मिर्ज़ा साहब ने यह देखा और उनके मुँह से एक ऐसी आवाज़ निकली जो किसी अस्सी साल के आदमी के गले से नहीं निकलनी चाहिए थी। उन्होंने कुर्सी पीछे धकेली और खड़े हो गए।
"वो यहाँ है?" उनकी आवाज़ फट गई। "तुम उसे यहाँ ले आए?"
"मैं उसे घर में छोड़ नहीं सकता था, मिर्ज़ा साहब। वहाँ कोई..."
"निकालो उसे यहाँ से!" बूढ़े ने चीखकर कहा। "अभी! इसी वक्त!"
देव ने बैग उठाया। वो भारी था। सुबह से कहीं ज़्यादा भारी। इतना भारी कि उसके कंधे में खिंचाव आ गया।
जैसे किताब में कुछ और भर गया हो।
रात भर में।
देव पुस्तकालय के पिछले बाग़ में एक पत्थर की बेंच पर बैठा था। दोपहर ढल रही थी। पेड़ों की परछाइयाँ लंबी हो रही थीं।
बैग उसकी गोद में था। बंद।
उसने बहुत देर तक उसे नहीं खोला।
पिता की पहली बात उसके दिमाग़ में घूम रही थी। अगर किताब में किसी जानने वाले का नाम दिखे, तो उस इंसान से दूर रहना।
रहमत चाचा। क्या उनका नाम दिखा था? उसने तो पूरी किताब नहीं पढ़ी थी।
उसने बैग की ज़िप खोली। काला कपड़ा हटाया। किताब को बाहर निकाला।
जिल्द अब और भी गर्म थी। और देव को पक्का यकीन था कि इस बार जो धड़कन उसकी उँगलियों के नीचे महसूस हुई, वो उसकी अपनी नहीं थी। क्योंकि उसका दिल तेज़ धड़क रहा था, और यह धड़कन धीमी थी। बहुत धीमी। जैसे कोई गहरी नींद में हो।
या जैसे कोई बस जाग रहा हो।
उसने किताब खोली। पहला पन्ना। चेतावनी।
फिर दूसरा। ज़ुहाल।
उसने पन्ने पलटने शुरू किए। तेज़ी से। हर नाम पर नज़र डालता हुआ, किसी जानी-पहचानी चीज़ को ढूँढता हुआ।
तीसरा। चौथा। दसवाँ। बीसवाँ।
कुछ नहीं। सिर्फ़ अजनबी नाम।
तीसवाँ। चालीसवाँ।
फिर इकसठवें पन्ने पर उसकी उँगली रुक गई।
क्योंकि इकसठवें पन्ने पर दो नाम थे।
सबसे ऊपर, बड़े अक्षरों में, एक जिन्न का नाम, जैसे बाकी सब पन्नों पर था:
क़ैमूस
"इकसठवाँ पहरेदार। दरवाज़ों का रखवाला। जो उसे पार करता है, वो उसके साथ लौटता है।"
लेकिन उसके नीचे, पन्ने के निचले कोने में, बहुत छोटे अक्षरों में, एक और नाम लिखा था।
ऐसी स्याही में जो अभी भी हल्की गीली थी।
ऐसी लिखावट में जो बाकी किताब से बिल्कुल अलग थी।
रहमत अली
"पहरा पूरा हुआ।"
देव का हाथ काँपा और किताब उसकी गोद से फिसलते-फिसलते बची।
रहमत चाचा का नाम।
किताब में।
उनकी मौत के बाद।
पहरा पूरा हुआ।
उसने अगला पन्ना पलटा। फिर अगला। अपनी साँसें रोककर। अगर रहमत चाचा का नाम आ सकता था, तो...
बासठवाँ। तिरसठवाँ। कुछ नहीं।
सत्तरवाँ। अस्सीवाँ।
नब्बेवाँ।
निन्यानवेवाँ।
और फिर वो फटा हुआ पन्ना। सिर्फ़ उसका किनारा।
देव ने राहत की साँस ली। बस रहमत चाचा का। और किसी का नहीं।
उसने किताब बंद करने के लिए उसे उठाया।
और तब उसने देखा।
पिछली जिल्द के अंदर की तरफ़। जहाँ कल रात कुछ नहीं था। जहाँ सिर्फ़ खाली, काला चमड़ा था।
अब वहाँ एक नाम उभर रहा था।
स्याही में नहीं।
चमड़े के अंदर से। जैसे किसी ने उसे त्वचा के नीचे गोद दिया हो। धीरे-धीरे। अक्षर दर अक्षर। अभी भी बनते हुए। देव की आँखों के सामने।
र...
रघु...
रघुनाथ...
रघुनाथ सक्सेना
उसके पिता का नाम।
और नाम पूरा होते ही, उसके नीचे, एक शब्द उभरने लगा।
देव ने साँस रोककर उसे बनते देखा।
"प्रतीक्षारत"
सूरज डूब चुका था जब देव निशातगंज की अपनी गली में पहुँचा।
उसने तय कर लिया था कि वो आज रात घर में नहीं रुकेगा। बस कुछ कपड़े, अपना लैपटॉप, और पिताजी के पुराने रिसर्च नोट्स जो स्टडी रूम में रखे थे, ये लेकर वो किसी होटल में चला जाएगा। या किसी दोस्त के यहाँ।
कहीं भी। बस उस घर में नहीं।
गली में अँधेरा था। स्ट्रीट लाइट फिर से ख़राब थी। सिर्फ़ घरों की खिड़कियों से आती पीली रोशनी, और कहीं दूर से किसी टीवी सीरियल की आवाज़।
शर्मा आंटी के घर की बत्तियाँ बंद थीं। अजीब बात थी। वो हमेशा देर रात तक जागती थीं।
देव अपने घर के गेट तक पहुँचा।
और रुक गया।
मुख्य दरवाज़ा खुला था।
पूरा खुला। अंदर की तरफ़।
देव ने सुबह दो ताले लगाए थे। उसे अच्छी तरह याद था। उसने दोनों बार चाबी घुमाई थी, फिर हैंडल खींचकर भी देखा था।
ताले फ़र्श पर पड़े थे। खुले हुए। टूटे नहीं।
खुले हुए।
बिल्कुल वैसे, जैसे तहखाने के संदूक पर बँधे ताले थे।
देव ने अपने बैग का पट्टा कसकर पकड़ा। उसकी जेब में रहमत चाचा का दरार पड़ा ताबीज़ था। दूसरी जेब में पिता का खत। और उसकी मुट्ठी में वो सुनहरी निब।
उसे अंदर नहीं जाना चाहिए था।
हर समझदार आवाज़ उसके अंदर चीख रही थी कि मुड़ो और भाग जाओ।
लेकिन तभी उसने देखा।
दरवाज़े की दहलीज़ से अंदर, घर के फ़र्श पर, कुछ निशान थे।
पैरों के निशान।
गीली, काली स्याही से बने।
नंगे पैरों के।
वो निशान दरवाज़े से शुरू होकर बैठक से गुज़रते थे। सीढ़ियों तक जाते थे। सीढ़ियों पर चढ़ते थे।
ऊपर।
देव ने अपनी नज़रें उन निशानों पर ऊपर की तरफ़ उठाईं।
वो निशान सीढ़ियों के ऊपर, गलियारे में मुड़ते थे, और एक दरवाज़े के सामने जाकर रुकते थे।
स्टडी रूम का दरवाज़ा।
जो अब थोड़ा सा खुला था।
और उसके अंदर से टेबल लैंप की पीली रोशनी बाहर आ रही थी।
वो लैंप जो देव ने सुबह बंद कर दिया था।
और उस खामोश घर में, उस पीली रोशनी के साथ, एक आवाज़ भी बाहर आ रही थी। बहुत हल्की। बहुत धीमी। ठहरी हुई। जानी-पहचानी।
कलम के कागज़ पर चलने की आवाज़।
खर्र... खर्र... खर्र...
कोई उसके पिता की कुर्सी पर बैठा था।
और लिख रहा था।
(भाग 2 समाप्त)
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- TheHauntedWriter
- Story
- काली किताब का आखिरी जिन्न
- Chapter
- 2 of 7
- Category
- Jinn & Spirits
- Reading time
- 18 min
- Words
- 3487
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
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