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भाग 3: कुर्सी पर बैठा आदमी

TheHauntedWriter · Jinn & Spirits · 19 मिनट

खर्र... खर्र... खर्र...
कलम की आवाज़ रुकी नहीं।
देव दहलीज़ पर खड़ा था। उसके पैरों के ठीक आगे स्याही का पहला निशान था। एक नंगा पैर। पाँचों उँगलियाँ साफ़ दिख रही थीं। अँगूठे के पास वाली उँगली थोड़ी टेढ़ी थी।
देव ने वो टेढ़ी उँगली पहचानी।
बचपन में वो अपने पिता के पैर दबाता था, जब वो कॉलेज से थककर लौटते थे। और हर बार वो उस टेढ़ी उँगली को छूकर पूछता था, "पापा, ये ऐसी क्यों है?" और हर बार पिता हँसकर एक नई कहानी सुनाते थे। कभी कहते, एक शेर ने काट लिया था। कभी कहते, एक राजा की तलवार पर पैर पड़ गया था।
असल वजह कभी नहीं बताई।
देव ने अंदर कदम रखा।
उसे खुद नहीं पता था क्यों। शायद इसलिए कि भागना अब बेमानी लग रहा था। किताब उसके बैग में थी। स्याही उसकी उँगलियों में थी। उसका नाम, उसके पिता के खत के मुताबिक, पहले से कहीं लिखा था। भागकर वो कहाँ जाता?
या शायद इसलिए, कि ऊपर उस कमरे में जो भी बैठा था, उसके पैर की उँगली टेढ़ी थी।
और पंद्रह साल से देव उस उँगली को एक बार फिर छूना चाहता था।
सीढ़ियाँ चढ़ते हुए उसने हर निशान से बचने की कोशिश की। वो दीवार के सहारे चल रहा था, सीढ़ियों के किनारों पर पैर रखते हुए।
बारह सीढ़ियाँ। वो उन्हें बचपन से गिनता आया था।
आज वो तेरह थीं।
देव तीसरी बार गिनती करते-करते रुक गया। उसने पीछे मुड़कर देखा। नीचे बैठक में अँधेरा था। सिर्फ़ खुले दरवाज़े से बाहर गली की धुंधली रोशनी आ रही थी।
और उस रोशनी में, दरवाज़े के ठीक बाहर, गेट के पास, कोई खड़ा था।
एक छोटी सी आकृति। गुलाबी फ़्रॉक।
वो बच्ची।
लाल बत्ती वाली कार की बच्ची।
वो बिल्कुल स्थिर खड़ी थी। उसके हाथ दोनों तरफ़ लटके हुए थे। और उसका सिर थोड़ा सा एक तरफ़ झुका था, जैसे वो कुछ सुन रही हो।
देव ने पलकें झपकाईं।
गेट खाली था।
उसका गला सूख गया। उसने खुद को ऊपर की तरफ़ धकेला। तेरहवीं सीढ़ी। गलियारा।
स्टडी रूम का दरवाज़ा अब और खुला था। उतना, जितना एक इंसान के अंदर जाने के लिए काफ़ी हो।
जैसे किसी ने उसके लिए खोला हो।
खर्र... खर्र...
देव ने दरवाज़े को उँगलियों से धकेला। वो बिना आवाज़ के खुल गया।
कमरा वैसा ही था जैसा पंद्रह साल से था। दीवारों पर किताबों की अलमारियाँ। खिड़की पर भूरे पर्दे। कोने में पुराना ग्लोब। और बीच में, पिता की बड़ी, भारी, शीशम की मेज़।
मेज़ के पीछे कुर्सी।
और कुर्सी पर कोई बैठा था।
पीठ दरवाज़े की तरफ़ नहीं थी। कुर्सी मेज़ की तरफ़ मुँह किए थी, जैसा हमेशा रहती थी। देव उस आदमी को बगल से देख पा रहा था। झुका हुआ सिर। भूरा स्वेटर। कोहनी पर पैबंद।
वो लिख रहा था।
लेकिन उसके हाथ में कोई कलम नहीं थी।
वो अपनी उँगली से लिख रहा था। सीधे मेज़ की लकड़ी पर। और जहाँ-जहाँ उसकी उँगली जाती, वहाँ काले अक्षर उभरते जाते। जैसे उसकी उँगली से स्याही रिस रही हो। जैसे उसके अंदर खून की जगह स्याही बह रही हो।
खर्र... खर्र...
देव की आँखें उसके चेहरे तक गईं।
लैंप की रोशनी आदमी के पीछे थी, इसलिए उसका चेहरा परछाईं में था। देव को सिर्फ़ एक आकार दिख रहा था। माथा। नाक की रेखा। ठोड़ी। वो सब उसके पिता जैसा था।
लगभग।
"पापा?"
आवाज़ उसके गले से टूटकर निकली।
उँगली रुक गई।
आदमी हिला नहीं। मुड़ा नहीं। बस रुक गया। जैसे कोई तस्वीर अचानक जम गई हो।
फिर उसकी आवाज़ आई। वही आवाज़ जो सुबह दरवाज़े के बाहर थी। गर्म। थकी हुई। प्यार भरी।
"आ गए, देवू? बैठो। बहुत देर से इंतज़ार कर रहा था।"
देव दरवाज़े से हिला नहीं।
"आप... आप यहाँ कैसे..."
"मैं हमेशा से यहीं था, बेटा। तुमने कभी इस कमरे में बैठकर देखा ही नहीं। हर बार दरवाज़े पर खड़े होकर लौट जाते थे। मैं आवाज़ देता था। तुम सुनते नहीं थे।"
देव की आँखों में आँसू आ गए। उसे पता था यह गलत है। उसे पता था कि उसके पिता ने खत में क्या लिखा था। लेकिन वो आवाज़...
पंद्रह साल।
"कल रात तुमने इस कुर्सी पर बैठकर काम किया," आदमी ने कहा। "मुझे बहुत अच्छा लगा। बिल्कुल मेरी तरह लिखते हो। वही झुकाव। वही 'र' का टेढ़ापन।"
"दीवार पर," देव फुसफुसाया। "मेरे कमरे की दीवार पर किसने लिखा?"
"तुमने, बेटा। मैंने बस तुम्हारा हाथ पकड़ा था। जैसे बचपन में पकड़ता था, जब तुम पहली बार 'अ' लिखना सीख रहे थे। याद है?"
देव को याद था।
पाँच साल का देव। स्लेट। चॉक। और पीछे से उसका छोटा सा हाथ पकड़े पिता का बड़ा, गर्म हाथ।
"अब मेरी बारी है, देवू," आदमी ने कहा। उसकी आवाज़ अब और धीमी थी। और पास लग रही थी, हालाँकि वो कुर्सी से हिला नहीं था। "मुझे तुम्हारी मदद चाहिए। बस एक छोटी सी मदद।"
"क्या?"
"वो किताब मुझे दो। और आखिरी पन्ने पर जो नाम लिखा है, वो पढ़ दो।"
"आखिरी पन्ना फटा हुआ है।"
"नहीं, बेटा।" और अब आदमी की आवाज़ में मुस्कान थी। "वो फटा नहीं है। वो छुपा है। और वो सिर्फ़ उसे दिखेगा, जिसे किताब ने चुना है। तुम्हें। तुम बस एक बार उसे ज़ोर से पढ़ दो, और मैं आज़ाद हो जाऊँगा। मैं वापस आ जाऊँगा। तुम्हारी माँ के पास। तुम्हारे पास।"
देव के हाथ बैग की ज़िप पर थे। उसे पता भी नहीं चला कि कब।
ज़िप आधी खुल चुकी थी।
अगर कभी मेरी आवाज़ में कोई तुम्हारे दरवाज़े पर आए, तो उसे अंदर मत आने देना।
देव का हाथ रुका।
"पापा," उसने कहा, और अपनी आवाज़ को स्थिर रखने की पूरी कोशिश की। "आपके पैर की वो उँगली। वो टेढ़ी क्यों है?"
कुछ पल सन्नाटा रहा।
फिर आदमी हँसा। हल्की, प्यार भरी हँसी। "अरे, वो तो शेर ने काट लिया था।"
देव ने साँस छोड़ी। वो जवाब तो कोई भी दे सकता था जिसने उसकी यादें पढ़ी हों।
"असली वजह," देव ने कहा। "आपने कभी असली वजह नहीं बताई। अब बताइए।"
इस बार सन्नाटा लंबा था।
बहुत लंबा।
टेबल लैंप की रोशनी हल्की सी काँपी।
फिर आदमी बोला, और इस बार उसकी आवाज़ में कुछ बदल गया था। जैसे एक ही वक्त में दो आवाज़ें बोल रही हों, और दोनों में ज़रा सा फ़ासला हो।
"क्योंकि उन्नीस सौ अस्सी में, जब मैं बाईस साल का था, मैंने बनारस के एक घाट पर एक बूढ़े साधु से एक सवाल पूछा था। उसने जवाब देने से पहले मेरा पैर अपने पैर से कुचल दिया। हड्डी टूट गई। और उसने कहा था..."
देव का खून जम गया।
यह कहानी उसने कभी नहीं सुनी थी। किसी ने कभी नहीं सुनी थी। उसकी माँ ने भी नहीं।
तो या तो यह सच था...
"...उसने कहा था, 'यह निशान इसलिए, ताकि जब तुम्हारा बेटा तुमसे यह सवाल पूछे, तो उसे पता हो कि जवाब कौन दे रहा है।'"
आदमी का सिर धीरे-धीरे घूमने लगा।
देव की तरफ़।
"और अब तुम्हें पता है, देवू।"
लैंप की रोशनी उसके चेहरे पर पड़ी।
उसके पास चेहरा नहीं था।
जहाँ चेहरा होना चाहिए था, वहाँ एक पन्ना था। पीला, पुराना कागज़, जो उसके सिर के आकार में फैला हुआ था। और उस पन्ने पर, देव की आँखों के सामने, स्याही से एक चेहरा लिखा जा रहा था। आँखों की जगह "आँख" शब्द। नाक की जगह "नाक"। होंठों की जगह "होंठ"। हर शब्द अपनी जगह पर। हज़ारों छोटे-छोटे अक्षर, जो मिलकर उसके पिता के चेहरे का नक्शा बना रहे थे।
और वो अक्षर हिल रहे थे।
रेंग रहे थे।
"होंठ" शब्द चौड़ा हुआ।
मुस्कुराया।
"बैठो, देवू। अब तुम्हारी बारी है।"
देव पीछे की तरफ़ गिरा। उसकी पीठ दरवाज़े की चौखट से टकराई। उसके हाथ ने जेब में जाकर ताबीज़ ढूँढा।
वो चीज़ कुर्सी से उठी।
वो उठी नहीं, खुल गई। जैसे कोई किताब खुलती है। उसका शरीर बीच से दो हिस्सों में बँटा और फिर से जुड़ा, और अब वो सीधा खड़ा था। लंबा। बहुत लंबा। उसका सिर छत को छू रहा था। स्वेटर अभी भी उसके शरीर पर था, लेकिन अब वो फट रहा था, क्योंकि उसके नीचे का शरीर कपड़े के लिए बहुत बड़ा था।
और उसके शरीर पर कोई त्वचा नहीं थी।
सिर्फ़ पन्ने।
एक के ऊपर एक। सैकड़ों पीले पन्ने, जो साँस के साथ फड़फड़ा रहे थे।
सरर्र... सरर्र...
वही आवाज़। रहमत चाचा के दादा ने अठत्तर साल पहले बंद दीवार के उस पार जो आवाज़ सुनी थी।
देव ने ताबीज़ निकाला और उसकी तरफ़ फेंक दिया।
ताबीज़ हवा में घूमा, चाँदी लैंप की रोशनी में चमकी, और उस चीज़ की छाती से टकराया।
एक चीख।
ऐसी चीख जो कानों से नहीं, हड्डियों से सुनाई देती है। देव के दाँत उस आवाज़ से हिल गए। खिड़की का शीशा चटका। अलमारियों से किताबें गिरने लगीं। और वो चीज़ पीछे की तरफ़ लड़खड़ाई।
उसकी छाती पर, जहाँ ताबीज़ लगा था, पन्ने जल रहे थे। बिना आग के। बस काले पड़ते जा रहे थे, सिकुड़ते जा रहे थे, राख बनते जा रहे थे।
और ताबीज़, फ़र्श पर गिरकर, दो टुकड़ों में टूट गया।
कमरे की बत्ती बुझ गई।
पूरा अँधेरा।
देव को कुछ नहीं दिख रहा था। अपना हाथ तक नहीं। उसने फ़ोन निकालने की कोशिश की, लेकिन उसकी उँगलियाँ इतनी काँप रही थीं कि फ़ोन फिसलकर कहीं गिर गया।
अँधेरे में, कमरे के कोने से, एक आवाज़ आई।
बच्ची की आवाज़।
"पंचानवे।"
फिर दूसरे कोने से। एक बूढ़े आदमी की आवाज़।
"चौरानवे।"
फिर छत से। एक औरत की।
"तिरानवे।"
फिर खिड़की से। दरवाज़े के पीछे से। मेज़ के नीचे से। अलमारी के अंदर से। हर तरफ़ से। अलग-अलग आवाज़ें, एक के बाद एक, गिनती करती हुई, उल्टी।
"बानवे। इक्यानवे। नब्बे। नवासी..."
वो तेज़ होती जा रही थीं। पास आती जा रही थीं।
"अट्ठासी। सत्तासी। छियासी..."
देव ने अपने कान बंद कर लिए। इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ा। आवाज़ें उसके सिर के अंदर थीं।
"पचासी। चौरासी..."
वो रेंगता हुआ आगे बढ़ा। हाथों से फ़र्श टटोलता हुआ। उसकी उँगलियाँ किसी गीली चीज़ से टकराईं। स्याही। उसने हाथ हटाया और दूसरी तरफ़ टटोला।
फ़ोन।
उसने उसे उठाया और टॉर्च जलाई।
रोशनी का घेरा कमरे में घूमा।
कमरा खाली था।
कोई नहीं था। न वो पन्नों वाली चीज़, न कोई बच्ची, न कोई बूढ़ा। सिर्फ़ फ़र्श पर गिरी किताबें। टूटा हुआ ताबीज़। और मेज़ पर लिखे काले अक्षर।
गिनती रुक चुकी थी।
देव ने काँपते हुए टॉर्च मेज़ की तरफ़ घुमाई।
पूरी मेज़ पर एक ही वाक्य लिखा था। बार-बार। सैकड़ों बार। छोटे-बड़े अक्षरों में। हर दिशा में।
"तुम्हारी बारी है। तुम्हारी बारी है। तुम्हारी बारी है।"
और मेज़ के बीचोंबीच, बाकी सबसे बड़े अक्षरों में, एक संख्या।
८३
तिरासी।
गिनती वहीं रुकी थी।
सोलह पहरेदार गिन चुके थे।
देव को याद नहीं कि वो सीढ़ियों से कैसे उतरा।
उसे बस इतना याद था कि वो भाग रहा था। बैग उसके कंधे पर। फ़ोन की टॉर्च उसके हाथ में काँपती हुई। स्याही के निशानों पर पैर पड़ते हुए। और फिर वो दरवाज़े से बाहर था, गली में, नंगे पैर, साँस के लिए हाँफता हुआ।
और वो किसी से टकरा गया।
ज़ोर से।
दोनों ज़मीन पर गिरे।
"या अल्लाह!" एक औरत की आवाज़।
देव ने खुद को सँभाला और पीछे हटा, अपने हाथ आगे करके, जैसे बचाव कर रहा हो।
सामने एक लड़की थी। पच्चीस-छब्बीस साल की। सलवार-कमीज़, सिर पर हल्का दुपट्टा, जो गिरने से कंधों पर आ गया था। उसके हाथ में एक कपड़े का थैला था, जिसमें से कुछ पुराने रजिस्टर बाहर गिर गए थे।
वो भी डरी हुई थी। लेकिन उसकी आँखें देव पर नहीं थीं।
वो घर के खुले दरवाज़े को देख रही थीं।
"आप देव सक्सेना हैं?" उसने पूछा।
"तुम कौन हो?"
लड़की ने अपने गिरे हुए रजिस्टर समेटे और खड़ी हो गई। "नूर। नूर अली। रहमत अली मेरे दादा थे।"
देव ने उसे गौर से देखा। अब उसे वो समानता दिखी। वही गहरी आँखें। वही ठोड़ी।
"मुझे... मुझे अफ़सोस है," देव ने कहा। "तुम्हारे दादा के बारे में।"
"मुझे पता है।" नूर की आवाज़ स्थिर थी, लेकिन उसकी आँखें लाल थीं। "पुलिस ने सुबह बताया। और फिर, दोपहर को, जब मैं उनके कमरे में उनकी चीज़ें समेट रही थी, मुझे ये मिला।"
उसने थैले से एक छोटा सा कागज़ निकाला। मुड़ा हुआ। उस पर किसी ने काँपते हाथों से लिखा था:
"नूर, अगर मुझे कुछ हो जाए, तो रजिस्टर लेकर देव सक्सेना के पास जाना। उसी रात। देर मत करना। वो बच्चा नहीं जानता कि वो कौन है।"
देव ने कागज़ पढ़ा। फिर लड़की को देखा।
"कौन से रजिस्टर?"
नूर ने थैला थोड़ा ऊपर उठाया। "पहरेदारों के।"
वो देव के घर में वापस नहीं गए।
नूर ने ज़ोर दिया कि वो उसके घर चलें। पुराने लखनऊ में, चौक के पास, एक तंग गली में बना एक छोटा सा मकान, जहाँ वो अपने दादा के साथ रहती थी। अब अकेली।
रास्ते भर नूर ने कुछ नहीं कहा। ई-रिक्शा में बैठे दोनों बस बाहर देखते रहे।
देव ने अपने पैर देखे। नंगे। गंदे। स्याही के धब्बों से भरे।
और फिर उसने अपना बैग देखा।
और उसके अंदर एक ठंडी लहर दौड़ गई।
उसे साफ़ याद था। स्टडी रूम में, जब वो चीज़ उसकी तरफ़ बढ़ी थी, जब उसने ताबीज़ फेंका था, तब बैग उसके कंधे से फिसलकर गिर गया था। वो मेज़ के पास गिरा था। और भागते वक्त उसने उसे उठाया नहीं था।
उसे पूरा यकीन था। उसने बैग नहीं उठाया था।
फिर भी बैग उसके कंधे पर था।
और उसके अंदर, काले कपड़े में लिपटी, किताब धीरे-धीरे धड़क रही थी।
नूर ने उसकी तरफ़ देखा। फिर बैग की तरफ़। और उसने बहुत धीमे से कहा, "वो साथ आ गई?"
देव ने सिर हिलाया।
"दादाजी कहते थे, वो कभी पीछे नहीं छूटती। उसे दफ़ना दो, वो सुबह तुम्हारे तकिए के नीचे मिलेगी। उसे नदी में फेंक दो, वो तुम्हारे जूतों में मिलेगी।" नूर ने अपना दुपट्टा कसकर लपेट लिया। "मैं बचपन में सोचती थी वो कहानियाँ सुनाते हैं।"
नूर का घर छोटा था। दो कमरे, एक आँगन, और आँगन में एक तुलसी का पौधा, जो देव को किसी मुस्लिम घर में देखकर हैरानी हुई।
"दादी हिंदू थीं," नूर ने उसकी नज़र देखकर कहा। "उनका लगाया हुआ है। चालीस साल से।"
उसने देव को एक पुराना तौलिया और पानी की बाल्टी दी। देव ने अपने पैर धोए। स्याही उतर गई। लेकिन उसकी उँगलियों की स्याही नहीं उतरी। अब वो कलाई तक पहुँच चुकी थी।
नूर ने यह देखा और कुछ नहीं कहा।
अंदर के कमरे में, एक लालटेन की रोशनी में, उसने थैले से रजिस्टर निकाले। पाँच रजिस्टर। मोटे, चमड़े की जिल्द वाले, पुराने। सबसे ऊपर वाला इतना पुराना था कि उसकी जिल्द पर दीमक के छेद थे।
"ये हमारे ख़ानदान के हैं," नूर ने कहा। "हर पीढ़ी में एक इंसान इन्हें लिखता था। जो उस वक्त तहखाने का पहरा देता था। दादाजी ने आखिरी रजिस्टर लिखा।"
"तुमने इन्हें पढ़ा है?"
"कभी नहीं। दादाजी ने कसम दिलाई थी। आज पहली बार खोलूँगी।"
उसने सबसे पुराना रजिस्टर उठाया और पहला पन्ना खोला।
उर्दू में लिखा था। नस्तालीक़ में। नूर ने उसे धीरे-धीरे पढ़ना शुरू किया, हिंदी में अनुवाद करते हुए।
"सन अठारह सौ इक्यासी। माह रबी-उल-अव्वल। मैं, करीम बख्श, इस बात की गवाही देता हूँ कि आज शाह मंज़िल की बुनियाद रखी गई। और बुनियाद के नीचे, तीसरे तहखाने की जगह, वो चीज़ रखी गई जो मुझे पहरे के लिए सौंपी गई।
उसे यहाँ एक हिंदू पंडित लाए थे। बनारस से। उन्होंने कहा कि किताब को उस जगह रखना है जहाँ हज़ारों किताबें हों। क्योंकि किताब अकेली हो, तो वो अपने पढ़ने वाले को ढूँढने निकल पड़ती है। लेकिन हज़ारों किताबों के बीच वो भ्रम में रहती है। सोती रहती है।
मुझसे कहा गया कि हर रात दरवाज़े पर बैठना है। और अगर कभी अंदर से पन्ने पलटने की आवाज़ आए, तो कुरान की आयतें नहीं पढ़नी हैं। वो उसे और जगाएँगी। बस उसके निन्यानवे पहरेदारों के नाम उल्टे क्रम में फुसफुसाने हैं, ताकि वो फिर से सो जाएँ।"
नूर रुकी। उसने देव की तरफ़ देखा।
"उल्टे क्रम में," देव ने धीरे से कहा। "आज रात उस कमरे में आवाज़ें उल्टी गिनती कर रही थीं। पंचानवे से। तिरासी तक।"
नूर का चेहरा पीला पड़ गया। "तो वो खुद को जगा रहे हैं। उल्टी गिनती उन्हें सुलाती है। लेकिन अगर वो खुद गिनें..."
"तो वो किसी चीज़ की तरफ़ बढ़ रहे हैं।"
"शून्य की तरफ़।"
कमरे में लालटेन की लौ काँपी।
नूर ने वापस रजिस्टर पर ध्यान दिया। उसने पन्ना पलटा और आगे पढ़ने लगी। फिर अचानक रुक गई।
"क्या हुआ?"
नूर ने बिना कुछ कहे रजिस्टर उसकी तरफ़ घुमा दिया और एक लाइन पर उँगली रखी। उर्दू में एक नाम लिखा था। लेकिन उस नाम के नीचे, किसी ने बाद में, देवनागरी में भी वही नाम लिखा था। शायद पंडित ने खुद।
"वो पंडित जो किताब लाए, उनका नाम था:
पंडित हरिनाथ सक्सेना
उन्होंने कहा कि किताब उनके ख़ानदान की अमानत है। और एक दिन, जब वक्त आएगा, उनके ख़ानदान का कोई इसे वापस लेने आएगा।
मैंने पूछा, 'तब हम क्या करें?'
पंडित जी ने कहा, 'तब उसे रोकना मत। लेकिन उसे अकेला भी मत छोड़ना।'"
देव ने वो नाम कई बार पढ़ा।
हरिनाथ सक्सेना।
उसे वो नाम पता था। उसकी दादी के घर के पूजा वाले कमरे में एक पुरानी तस्वीर लगी थी। फीकी, भूरी, किनारों से फटी हुई। एक बूढ़ा आदमी, लंबी सफ़ेद दाढ़ी, माथे पर त्रिपुंड, आँखें कैमरे की तरफ़ नहीं, उसके पार कहीं देखती हुईं।
दादी कहती थीं, ये तुम्हारे परदादा के पिताजी हैं। बहुत बड़े विद्वान थे। काशी में पढ़ाते थे।
और फिर एक दिन, बिना किसी को बताए, घर छोड़कर चले गए। कभी वापस नहीं आए।
"ये किताब," देव ने बहुत धीमी आवाज़ में कहा, "मेरे ख़ानदान से आई है।"
"और तुम उसे वापस लेने आए," नूर ने कहा। "एक सौ पैंतालीस साल बाद। ठीक वैसे ही, जैसे लिखा था।"
रात के ढाई बज चुके थे।
नूर सबसे नया रजिस्टर पढ़ रही थी। अपने दादा का। उसकी आवाज़ बार-बार रुक जाती थी, जब कोई लाइन उसके दादा की किसी आदत की याद दिलाती।
ज़्यादातर पन्नों पर रोज़मर्रा की बातें थीं। "आज रात शांति रही।" "बारिश की वजह से तहखाने में सीलन।" "मिर्ज़ा साहब बीमार हैं।"
फिर पंद्रह साल पहले की एक एंट्री आई।
"आज प्रोफ़ेसर रघुनाथ सक्सेना आए। मिर्ज़ा साहब ने उन्हें मना कर दिया। लेकिन जाते वक्त वो मेरे पास रुके और बोले, 'रहमत भाई, तुम्हारा ख़ानदान बहुत अच्छा पहरेदार है। लेकिन तुम्हें पता है तुम किसका पहरा दे रहे हो?' मैंने कहा, 'एक बुरी किताब का।' वो हँसे। बोले, 'नहीं। तुम किताब का पहरा नहीं दे रहे। तुम उस चीज़ का पहरा दे रहे हो जिसने यह दुनिया बनाई थी। और अब वो अपनी चीज़ वापस माँग रही है।'
मुझे उनकी बात समझ नहीं आई। मुझे बस इतना समझ आया कि उनकी आँखों में डर था। ऐसा डर जो सिर्फ़ उस आदमी की आँखों में होता है जिसे पता हो कि उसकी मौत किस तारीख़ को लिखी है।"
देव ने अपनी आँखें बंद कर लीं।
जिसने यह दुनिया बनाई थी।
नूर ने पन्ने पलटे। तेज़ी से। आखिरी एंट्री तक पहुँचने के लिए।
और फिर वो रुक गई।
आखिरी पन्ना।
लिखावट रहमत चाचा की ही थी, लेकिन बुरी तरह टेढ़ी-मेढ़ी। जल्दबाज़ी में लिखी हुई। और उसके ऊपर तारीख़ थी।
कल की।
और वक्त।
रात 3:10
उनकी मौत से तीन मिनट पहले।
नूर ने काँपती आवाज़ में पढ़ा:
"वो बाहर आ गई। देव उसे ले गया। मैंने उसे ताबीज़ दे दिया। अब मेरे पास कुछ नहीं बचा।
पन्ने पलट रहे हैं। तहखाने में नहीं। मेरे अंदर।
नूर, अगर तुम यह पढ़ रही हो, तो देव को एक बात बताना। सबसे ज़रूरी बात। मुझे आज रात ही पता चली। तहखाने में, जब मैं उस संदूक के पास गया, तो उसकी तली में कुछ और लिखा था। जो डेढ़ सौ साल से कोई नहीं देख पाया।
देव को बताना कि जिसे वो अपना पिता समझ रहा है, वो रघुनाथ नहीं है।
रघुनाथ तो अभी भी..."
वाक्य वहीं ख़त्म होता था।
उसके बाद सिर्फ़ एक लंबी, घसीटी हुई स्याही की लकीर थी, जो पन्ने के कोने तक जाती थी। जैसे लिखने वाले का हाथ किसी ने अचानक खींच लिया हो।
और उस लकीर के आखिर में, एक छोटा सा, बिल्कुल गोल धब्बा।
जैसे किसी ने अपनी उँगली वहाँ दबाई हो।
एक काली उँगली।
"अभी भी क्या?" देव ने लगभग चीखकर कहा। "अभी भी क्या, नूर?"
नूर ने पन्ना पलटा। अगला पन्ना खाली था। उसके बाद वाला भी।
"इसके आगे कुछ नहीं है," उसने फुसफुसाया।
देव उठ खड़ा हुआ। वो कमरे में इधर-उधर चलने लगा। उसका दिमाग़ घूम रहा था।
रघुनाथ तो अभी भी...
ज़िंदा है?
किताब में है?
कहीं कैद है?
उसका इंतज़ार कर रहा है?
किताब की जिल्द पर उभरा वो शब्द उसकी आँखों के सामने तैर गया।
प्रतीक्षारत।
तभी, बैग के पास ज़मीन पर रखा देव का फ़ोन बजा।
दोनों उछल पड़े।
रात के दो बजकर अड़तीस मिनट।
देव ने फ़ोन उठाया।
और स्क्रीन देखकर उसकी उँगलियाँ बर्फ़ हो गईं।
उसने यह नंबर कभी डिलीट नहीं किया था। पंद्रह साल से उसके फ़ोन बदलते रहे, लेकिन यह कॉन्टैक्ट हर बार साथ आता रहा। वो कभी इस पर कॉल नहीं करता था। बस कभी-कभी उसे खोलकर देखता था।
यह नंबर पंद्रह साल पहले बंद हो चुका था।
कंपनी ने इसे किसी और को भी नहीं दिया था। उसने एक बार चेक किया था।
स्क्रीन पर, कॉल करने वाले के नाम की जगह, चमक रहा था:
पापा
फ़ोन बजता रहा।
नूर ने उसकी कलाई पकड़ ली। "मत उठाओ।"
देव ने स्क्रीन को देखा।
रघुनाथ तो अभी भी...
"अगर यह वो है जो दरवाज़े पर आया था," नूर ने कहा, "तो यह तुम्हें फिर से धोखा देगा।"
"और अगर नहीं है?" देव ने कहा। उसकी आवाज़ टूट रही थी। "अगर रहमत चाचा यही कहना चाहते थे? कि असली पापा अभी भी कहीं हैं? और ये वो हैं?"
फ़ोन बजता रहा।
पाँचवीं घंटी। छठी।
आँगन में तुलसी के पौधे की पत्तियाँ अचानक सरसराईं, हालाँकि कोई हवा नहीं चल रही थी।
सातवीं घंटी।
देव का अँगूठा हरे बटन की तरफ़ बढ़ा।
और ठीक उसी पल, बैग के अंदर से, काली किताब की धड़कन तेज़ हो गई।
धक-धक। धक-धक। धक-धक।
जैसे वो भी इंतज़ार कर रही हो।
जैसे उसे पता हो कि फ़ोन के उस पार कौन है।
देव ने कॉल उठा ली।
(भाग 3 समाप्त)

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TheHauntedWriter
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काली किताब का आखिरी जिन्न
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