Pretika › Jinn & Spirits › काली किताब का आखिरी जिन्न
भाग 4: सच, जो कोई सुनना नहीं चाहता
TheHauntedWriter · Jinn & Spirits · 17 मिनट
देव ने फ़ोन कान से लगाया।
पहले कुछ नहीं आया।
कोई साँस नहीं। कोई आवाज़ नहीं। सिर्फ़ एक अजीब सी खरखराहट, जैसे किसी बहुत पुराने रेडियो में स्टेशन पकड़ने की कोशिश हो रही हो। और उस खरखराहट के नीचे, बहुत हल्का, बहुत दूर, एक लगातार चलती आवाज़।
सरर्र... सरर्र... सरर्र...
पन्ने। हज़ारों पन्ने, जो किसी अनंत हवा में लगातार पलट रहे थे।
"हैलो?" देव ने फुसफुसाया।
खरखराहट थोड़ी कम हुई।
और फिर, उस शोर के बीच से, एक आवाज़ आई।
इस बार वो गर्म नहीं थी। प्यार भरी नहीं थी। वो थकी हुई थी। टूटी हुई। ऐसे आदमी की आवाज़, जो बहुत लंबे समय से चिल्ला रहा हो और अब उसके गले में सिर्फ़ फुसफुसाहट बची हो।
"...दे...वू..."
देव की आँखें भर आईं। लेकिन इस बार उसने अपने आप को रोका।
"कौन हो तुम?"
"...सुन... समय कम... वो सुन रहा है..."
"मैं तुम्हारी बात का यकीन क्यों करूँ?" देव की आवाज़ काँप रही थी। "आज रात तुम्हारी शक्ल में एक चीज़ मेरे घर में बैठी थी। उसने मुझसे मेरे पिता की आवाज़ में बात की। मेरे बचपन की बातें की।"
"...हमज़ार..."
देव रुक गया। "क्या?"
"...तेरहवाँ... वो जो पढ़ने वाले के साथ पढ़ता है... वो नकल करता है, देवू... वो तुम्हारी यादें पढ़ता है... और उनसे मुझे बनाता है..."
तेरहवाँ पहरेदार। हमज़ार। देव को किताब का वो पन्ना याद आया, जो कल रात अपने आप खुल गया था। "जब तुम लिखते हो, वो गिनता है। जब तुम रुकते हो, वो इंतज़ार करता है।"
"साबित करो," देव ने कहा। "एक सवाल। अगर तुम सच में मेरे पिता हो, तो बताओ। तुम्हारे पैर की वो उँगली टेढ़ी क्यों है?"
खरखराहट के बीच कुछ पल सन्नाटा रहा।
फिर एक आवाज़ आई जिसने देव का दिल चीर दिया।
हँसी।
छोटी सी, थकी हुई, लेकिन असली हँसी। वो हँसी जो पिता तब हँसते थे जब देव कोई बहुत बेवकूफ़ाना सवाल पूछता था।
"...तुम्हारी माँ..." आवाज़ आई। "...सिलबट्टा... बासठ नंबर वाले घर में... उसने चटनी पीसने के बाद उसे ऊपर अलमारी पर रखा था... और वो मेरे पैर पर गिर गया... मैंने तुम्हें कभी नहीं बताया क्योंकि... क्योंकि उसे बहुत बुरा लगता था... वो रोई थी... पूरी रात..."
देव का हाथ अपने मुँह पर चला गया।
बनारस का घाट नहीं। कोई रहस्यमयी साधु नहीं। कोई भविष्यवाणी नहीं।
एक सिलबट्टा। एक रसोई। माँ के आँसू।
बहुत छोटा सच। बहुत मामूली सच।
और उसे पता था कि यही सच है, क्योंकि अब उसे याद आ रहा था। बहुत धुंधला। वो चार-पाँच साल का था। रात को माँ के रोने की आवाज़। पिता का धीमे से कहना, "अरे पगली, बस हड्डी है, जुड़ जाएगी।"
वो याद उसके अंदर कहीं दबी पड़ी थी। इतनी गहरी कि वो खुद उसे भूल चुका था।
उसकी बात का यकीन मत करना। वो सच नहीं बोलती। वो बस वो बोलती है, जो तुम सुनना चाहते हो।
रहमत चाचा सही थे।
उस चीज़ ने उसे एक रहस्यमयी कहानी सुनाई थी, क्योंकि देव, इतिहासकार देव, पुरानी पांडुलिपियों में डूबा देव, एक रहस्यमयी कहानी ही सुनना चाहता था। एक साधु। एक घाट। एक भविष्यवाणी।
सच इतना साधारण था कि कोई जिन्न उसे गढ़ ही नहीं सकता था।
"पापा," देव ने कहा, और इस बार उसकी आवाज़ टूट गई। "पापा, आप कहाँ हैं?"
"...अंदर..."
"किताब के अंदर?"
"...पन्ना निन्यानवे... और सौ के बीच... जहाँ पन्ना फटा है... वहाँ एक जगह है... एक दरार... मैं उसमें फँसा हूँ... पंद्रह साल से... देवू, यहाँ समय नहीं चलता... यहाँ बस पढ़ा जाता है... हर पल... कोई मुझे पढ़ रहा है..."
पीछे का शोर बढ़ने लगा। पन्नों की आवाज़ तेज़ हो गई। जैसे कोई तूफ़ान आ रहा हो।
"...सुनो... ज़रूरी... फटा पन्ना... हरिनाथ ने फाड़ा था... उसे छुपाया... काशी में... वो जगह जहाँ आग कभी नहीं बुझती..."
"मणिकर्णिका?"
"...उसके नीचे... एक और पुस्तकालय... जो जलती चिताओं के नीचे है... वहाँ..."
खरखराहट इतनी तेज़ हुई कि देव ने फ़ोन कान से थोड़ा दूर कर लिया।
"...और देवू... एक बात... जब किताब तुम्हें कोई नाम दे... कोई भी नाम... उसे स्वीकार मत करना... चाहे वो कितना भी सच लगे... उसे मत मानना... वरना तुम..."
और फिर आवाज़ बदल गई।
बीच वाक्य में। बिना किसी चेतावनी के।
अब फ़ोन से जो आवाज़ आ रही थी, वो पिता की नहीं थी। वो किसी की नहीं थी। वो बहुत सारी आवाज़ें थीं, एक साथ, थोड़ी आगे-पीछे, जैसे निन्यानवे गले एक ही शब्द बोल रहे हों।
"वरना तुम घर आ जाओगे।"
और फिर हँसी। वो हँसी जो किसी इंसान की नहीं थी।
कॉल कट गई।
देव फ़ोन को घूरता रहा।
स्क्रीन पर कॉल हिस्ट्री खुली थी। और इस बार, कॉल रिकॉर्ड हुई थी।
पापा — इनकमिंग — 4 मिनट 13 सेकेंड
चार मिनट तेरह सेकेंड।
तेरह।
"क्या कहा उन्होंने?" नूर ने पूछा। वो इतनी देर से उसकी कलाई पकड़े बैठी थी कि उसकी उँगलियों के निशान देव की त्वचा पर पड़ गए थे।
देव ने उसे सब बताया। सिलबट्टे की कहानी। पन्ना निन्यानवे और सौ के बीच की दरार। काशी। मणिकर्णिका। जलती चिताओं के नीचे का पुस्तकालय।
और आखिरी चेतावनी।
जब किताब तुम्हें कोई नाम दे, उसे स्वीकार मत करना।
नूर बहुत देर चुप रही। फिर उसने अपने दादा का रजिस्टर उठाया और उसके आखिरी, अधूरे वाक्य पर उँगली रखी।
"जिसे वो अपना पिता समझ रहा है, वो रघुनाथ नहीं है। रघुनाथ तो अभी भी..."
"अभी भी किताब में है," नूर ने धीरे से वाक्य पूरा किया। "दादाजी यही कहना चाहते थे। जो चीज़ तुम्हारे घर में बैठी थी, वो नकल थी। असली रघुनाथ जी अभी भी अंदर हैं। ज़िंदा। या जो कुछ भी उस हालत को कहते हों।"
"पंद्रह साल से," देव ने कहा। "पंद्रह साल से वो वहाँ चीख रहे हैं। और मैं हर साल उनकी बरसी पर अगरबत्ती जलाता रहा।"
उसकी आवाज़ टूट गई और वो चुप हो गया।
नूर ने कुछ नहीं कहा। उसने बस उठकर रसोई से पानी का गिलास लाकर उसके हाथ में रख दिया।
रात के साढ़े तीन बजे नूर ने ज़िद की कि देव कुछ देर सो ले।
"मैं जाग रही हूँ," उसने कहा। "दादाजी की तरह। पहरा दूँगी।"
देव आँगन की तरफ़ खुलने वाले छोटे कमरे में एक चटाई पर लेट गया। बैग उसके सिरहाने था। उसे उसे अपने से दूर रखने का कोई मतलब नहीं लगा। वो वापस आ ही जाता।
कमरे के कोने में एक बाल्टी रखी थी। पानी से भरी। वही बाल्टी जिसमें उसने अपने पैर धोए थे। नूर ने उसे वहीं छोड़ दिया था।
देव ने आँखें बंद कीं।
नींद नहीं आई।
उसे बार-बार वो आवाज़ सुनाई दे रही थी। पंद्रह साल से... यहाँ समय नहीं चलता... यहाँ बस पढ़ा जाता है...
उसने करवट ली।
और बाल्टी के पानी पर उसकी नज़र पड़ी।
पानी बिल्कुल स्थिर था। आँगन से आती चाँद की हल्की रोशनी उस पर एक धुंधला सा आईना बना रही थी, जिसमें कमरे की छत दिख रही थी। छत का पंखा। दीवार का कोना।
और कोने में खड़ा कोई।
देव का पूरा शरीर अकड़ गया।
उसने धीरे से अपनी नज़र बाल्टी से हटाकर असली कोने की तरफ़ देखी।
कोना खाली था।
सिर्फ़ दीवार। उखड़ा हुआ चूना। एक मकड़ी का जाला।
उसने वापस बाल्टी की तरफ़ देखा।
पानी में, उस कोने में, कोई खड़ा था।
लंबा। पतला। सिर झुका हुआ। उसकी बाँहें शरीर से बहुत लंबी थीं, घुटनों से नीचे तक लटकती हुईं। और उसका चेहरा...
पानी में उसका चेहरा नहीं दिख रहा था। बस एक धुंधलापन था।
"इकतालीसवाँ पहरेदार। उसे पानी में देखा जा सकता है, लेकिन सिर्फ़ तब, जब तुम पानी में नहीं देख रहे हो।"
देव को यह लाइन याद थी। उसकी दीवार पर लिखी थी।
लेकिन वो तो पानी में देख रहा था।
तो फिर...
उसे समझ आया, और उसके पेट में बर्फ़ उतर गई।
वो पानी में देख रहा था। हाँ। लेकिन जो चीज़ उसे दिख रही थी, वो इकतालीसवाँ नहीं था।
इकतालीसवाँ वो था जो उसे तब दिखता, जब वो पानी में नहीं देख रहा होता।
यानी अभी।
जब वो पानी की तरफ़ देख रहा था, और उसकी आँखें बाल्टी पर टिकी थीं, तब उसके पीछे...
देव ने अपनी साँस रोक ली।
उसने हिलने की हिम्मत नहीं की।
और तभी उसकी गर्दन के पीछे, बहुत पास, किसी की ठंडी साँस लगी।
"देव!"
नूर की आवाज़।
देव झटके से उठ बैठा।
कमरे में बत्ती जल रही थी। नूर दरवाज़े पर खड़ी थी, हाथ में लालटेन। उसका चेहरा सफ़ेद था।
"तुम ठीक हो?"
देव ने घूमकर अपने पीछे देखा। दीवार। सिर्फ़ दीवार।
उसने बाल्टी की तरफ़ देखा। पानी हिल रहा था। हल्की-हल्की लहरें। जैसे किसी ने अभी-अभी उसमें हाथ डाला हो।
"तुम्हारे पीछे," नूर ने फुसफुसाया। "जब मैं दरवाज़े पर आई। तुम्हारे पीछे कोई बैठा था। तुम्हारे ऊपर झुका हुआ। उसका मुँह तुम्हारी गर्दन के पास था। जैसे... जैसे वो तुम्हें सूँघ रहा हो।"
देव ने अपनी गर्दन छुई। ठंडी थी। गीली।
और जब उसने अपना हाथ देखा, तो उसकी उँगलियों पर पानी नहीं था।
स्याही थी।
"मैंने चिल्लाया तो वो गायब हो गया," नूर ने कहा। "पर गायब होने से पहले उसने मेरी तरफ़ देखा, देव। उसका कोई चेहरा नहीं था। पर मुझे पता है उसने मेरी तरफ़ देखा।"
उस रात बाकी समय दोनों में से कोई नहीं सोया।
वो दोनों आँगन में तुलसी के पौधे के पास बैठे रहे। नूर ने सरसों के तेल का एक दीया जला दिया। उसने बताया कि उसकी दादी कहती थीं, तुलसी के पास दीया जलाओ तो बुरी चीज़ें आँगन में नहीं आतीं।
देव नहीं जानता था कि यह सच है या नहीं।
लेकिन सुबह तक वो दीया जलता रहा। और कुछ आँगन में नहीं आया।
कम से कम उन्हें ऐसा लगा।
सुबह सात बजे देव का फ़ोन फिर बजा।
इस बार नंबर सामान्य था।
"देव सक्सेना?" एक भारी, आधिकारिक आवाज़। "इंस्पेक्टर तिवारी बोल रहा हूँ। हज़रतगंज थाने से।"
देव सीधा होकर बैठ गया। "जी, इंस्पेक्टर साहब।"
"आप अभी कहाँ हैं?"
देव एक पल रुका। "एक दोस्त के यहाँ। क्यों?"
"आपको थाने आना होगा। दस बजे तक।"
"किस बारे में?"
तिवारी की आवाज़ में कुछ था। सख्ती। और उसके नीचे कुछ और। उलझन। शायद डर।
"रहमत अली की मौत के बारे में। हमने पुस्तकालय का सीसीटीवी फुटेज देखा है।"
"तो?"
"तो, सक्सेना जी, आपने कल मुझसे कहा था कि आप रात डेढ़ बजे पुस्तकालय से निकल गए थे।"
"हाँ। निकल गया था।"
"मेन गेट का कैमरा भी यही दिखाता है। एक बजकर बयालीस मिनट पर आप गेट से बाहर जाते दिख रहे हैं।"
"तो फिर..."
"तो फिर, सक्सेना जी," तिवारी ने कहा, और इस बार उसकी आवाज़ बहुत धीमी थी, "आप मुझे यह समझा दीजिए कि तीन बजकर दस मिनट पर तहखाने की सीढ़ियों वाले कैमरे में, रहमत अली के ठीक पीछे, आप क्या कर रहे थे।"
देव का मुँह खुला, लेकिन कोई आवाज़ नहीं निकली।
"सक्सेना जी?"
"यह... यह मुमकिन नहीं है। तीन बजे मैं अपने घर पर था। निशातगंज में। मैं..."
"कोई गवाह?"
देव चुप हो गया। कोई गवाह नहीं था। वो अकेला था। उस घर में। उस स्टडी रूम में। तीन बजकर तेरह मिनट पर रुकी घड़ी के साथ।
"दस बजे," तिवारी ने कहा। "और सक्सेना जी, शहर छोड़ने के बारे में सोचिएगा भी मत।"
कॉल कट गई।
हज़रतगंज थाने का कमरा छोटा था। एक मेज़, तीन कुर्सियाँ, दीवार पर गांधीजी की धूल भरी तस्वीर, और कोने में एक पुराना कंप्यूटर।
इंस्पेक्टर तिवारी मेज़ के उस पार बैठा था। उसके साथ एक और आदमी था। सादे कपड़ों में। चश्मा। हाथ में एक फ़ाइल।
"डॉक्टर मेहरा," तिवारी ने परिचय कराया। "फ़ॉरेंसिक से।"
नूर बाहर बेंच पर बैठी थी। उसने देव के साथ आने की ज़िद की थी। और बैग उसके पास था। देव उसे थाने के अंदर नहीं लाना चाहता था।
लेकिन जब वो कुर्सी पर बैठा, तो उसे अपने पैरों के पास किसी चीज़ का स्पर्श महसूस हुआ।
उसने नीचे देखा।
बैग।
उसके पैरों के पास। ज़िप बंद। जैसे वो हमेशा से वहीं रखा हो।
देव ने अपनी आँखें बंद कीं, एक लंबी साँस ली, और फिर खोलीं।
बैग अभी भी वहीं था।
"पहले फुटेज देखिए," तिवारी ने कहा और कंप्यूटर की स्क्रीन उसकी तरफ़ घुमा दी।
ब्लैक एंड व्हाइट फुटेज। दानेदार। ऊपर के कोने में तारीख़ और समय।
03:09:41
तहखाने की सीढ़ियाँ। ऊपर से लिया गया एंगल। सीढ़ियों पर एक बूढ़ा आदमी धीरे-धीरे नीचे उतर रहा था। एक हाथ से दीवार पकड़े हुए। दूसरे हाथ में टॉर्च।
रहमत चाचा।
वो सीढ़ियों के बीच में रुके। मुड़े। ऊपर की तरफ़ देखा। जैसे उन्होंने कोई आवाज़ सुनी हो।
फिर फ्रेम के ऊपर से, सीढ़ियों के ऊपरी सिरे से, एक और आकृति आई।
देव ने अपने आप को स्क्रीन पर देखा।
वही कपड़े जो उसने कल रात पहने थे। वही चश्मा। वही चलने का ढंग। कंधे थोड़े झुके हुए, जैसे हमेशा रहते थे।
वो आकृति धीरे-धीरे सीढ़ियाँ उतरने लगी। रहमत चाचा की तरफ़।
रहमत चाचा ने उसे देखा।
और उनका चेहरा, दानेदार ब्लैक एंड व्हाइट फुटेज में भी, डर से विकृत हो गया।
वो पीछे हटे। लड़खड़ाए। दीवार से टकराए।
"देव" उनकी तरफ़ बढ़ता रहा। धीरे। बहुत धीरे। बिना किसी जल्दी के।
और फिर, उनसे दो सीढ़ियाँ ऊपर, वो रुक गया।
03:13:00
रहमत चाचा का शरीर अचानक अकड़ गया। जैसे बिजली का झटका लगा हो। उनकी टॉर्च गिरी। वो दीवार के सहारे धीरे-धीरे नीचे फिसले और सीढ़ियों पर बैठ गए। फिर लुढ़क गए।
"देव" वहीं खड़ा रहा।
देखता रहा।
"बस यहीं तक," तिवारी ने कहा। "इसके बाद..."
"रुकिए," देव ने कहा। उसकी आवाज़ सूखी थी। "आगे चलाइए।"
तिवारी ने उसकी तरफ़ अजीब नज़रों से देखा, फिर फुटेज आगे बढ़ाया।
03:13:30
रहमत चाचा का शरीर सीढ़ियों पर पड़ा था। "देव" अभी भी उनके ऊपर खड़ा था।
फिर उसका सिर धीरे-धीरे ऊपर उठा।
कैमरे की तरफ़।
सीधा कैमरे की तरफ़।
और देव ने देखा कि स्क्रीन पर उसका अपना चेहरा मुस्कुरा रहा था।
वो मुस्कान उसकी नहीं थी। वो बहुत चौड़ी थी। इतनी चौड़ी कि होंठों के कोने कानों की तरफ़ खिंच गए थे। और उसकी आँखें... आँखें बंद थीं। पूरी तरह बंद। जैसे उसे देखने की ज़रूरत ही नहीं थी।
"पहला पहरेदार। उसकी आँखें नहीं हैं, क्योंकि उसे देखने की ज़रूरत नहीं।"
फिर स्क्रीन पर "देव" के होंठ हिलने लगे।
कोई आवाज़ नहीं थी। सीसीटीवी में आवाज़ रिकॉर्ड नहीं होती। लेकिन देव ने होंठों को पढ़ लिया। उसे करना ही था। वो अपने ही होंठ थे।
"बयासी।"
"इक्यासी।"
"अस्सी।"
तिवारी ने वीडियो रोक दिया।
कमरे में सन्नाटा था।
"यह आप हैं, सक्सेना जी," तिवारी ने कहा। लेकिन उसकी आवाज़ में अब वो यकीन नहीं था जो फ़ोन पर था। "है ना?"
देव ने कुछ नहीं कहा।
"मैंने यह फुटेज सौ बार देखा है," तिवारी बोला, और अब वो फुसफुसा रहा था। "और हर बार, मुझे एक बात परेशान करती है।"
"क्या?"
तिवारी ने वीडियो को कुछ सेकेंड पीछे किया। उस पल पर रोका जब "देव" सीढ़ियाँ उतर रहा था। फिर उसने स्क्रीन पर एक जगह उँगली रखी।
सीढ़ियों पर। "देव" के पैरों के नीचे।
"परछाई," तिवारी ने कहा। "सीढ़ियों के ऊपर बल्ब लगा है। रहमत अली की परछाई सीढ़ियों पर साफ़ दिख रही है। लंबी, आगे की तरफ़।"
उसने अपनी उँगली "देव" के पैरों के पास ले जाकर रोकी।
"आपकी परछाई नहीं है।"
देव ने देखा।
सच में नहीं थी।
"और इससे भी अजीब बात," डॉक्टर मेहरा पहली बार बोले, अपनी फ़ाइल खोलते हुए, "वो कागज़ का टुकड़ा, जो मृतक की मुट्ठी में मिला था।"
उन्होंने एक फ़ोटो मेज़ पर रखी। बड़ा किया हुआ। उस छोटे से पीले टुकड़े का।
"हमने इसकी जाँच की। सक्सेना जी, यह कागज़ नहीं है।"
"तो क्या है?"
डॉक्टर मेहरा ने अपना चश्मा उतारा और आँखें मलीं। जैसे उन्हें खुद अपनी बात पर यकीन न हो।
"यह इंसानी त्वचा है। बहुत पुरानी। हमारे शुरुआती अनुमान के मुताबिक़ कम से कम डेढ़-दो सौ साल। किसी तरह से संरक्षित की गई, सुखाई गई, पतली की गई। और जिस स्याही से इस पर लिखा गया है..."
वो रुके।
"उसमें खून है। इंसानी खून। और कुछ और, जो हम अभी तक पहचान नहीं पाए। कुछ ऐसा जो हमारी किसी भी मशीन के डेटाबेस में नहीं है।"
देव को अपने पैरों के पास रखे बैग से एक हल्की धड़कन महसूस हुई।
"और एक आखिरी बात," डॉक्टर मेहरा ने कहा। उनकी आवाज़ अब बिल्कुल धीमी थी। "जब हमें यह मिला, तो इस पर लिखे अक्षर इतने छोटे और घने थे कि पढ़ना नामुमकिन था। सिर्फ़ एक काला धब्बा। लेकिन कल रात, जब हम इसे माइक्रोस्कोप के नीचे रखने वाले थे..."
उन्होंने एक और फ़ोटो रखी। आज सुबह की।
कागज़ का वही टुकड़ा। लेकिन अब काला धब्बा गायब था। स्याही जैसे अपने आप सिमट गई थी, सिकुड़ गई थी, और अब उस पर सिर्फ़ एक शब्द लिखा था।
साफ़। बड़े अक्षरों में। देवनागरी में।
"देव"
तिवारी ने उसे जाने दिया।
उसके पास देव को गिरफ़्तार करने का कोई ठोस आधार नहीं था। एक वीडियो, जिसमें आदमी की परछाई नहीं थी। एक कागज़, जो कागज़ नहीं था। और एक मौत, जिसे डॉक्टर अभी भी दिल का दौरा कह रहे थे।
लेकिन जाते वक्त तिवारी ने उसे दरवाज़े पर रोका।
"सक्सेना जी।" उसकी आवाज़ अब पुलिस वाले की नहीं थी। एक आम आदमी की थी। डरे हुए आदमी की। "मैं बीस साल से पुलिस में हूँ। मैंने बहुत कुछ देखा है। लेकिन कल रात, जब मैं यह फुटेज देखकर घर गया, तो मेरी बेटी ने मुझसे एक बात पूछी।"
"क्या?"
"वो आठ साल की है। सो रही थी। मैं उसके कमरे में गया तो वो नींद में बोली, 'पापा, वो अंकल गिनती क्यों कर रहे हैं?'"
देव की साँस रुक गई।
"मैंने पूछा, 'कौन से अंकल, बेटा?' उसने आँखें खोले बिना कहा, 'चश्मे वाले। जो आपकी फ़ाइल में हैं। वो उल्टी गिनती कर रहे हैं। और जब वो शून्य पर पहुँचेंगे, तो सबको पढ़ लिया जाएगा।'"
तिवारी ने देव की आँखों में देखा।
"मेरी बेटी ने आपकी तस्वीर कभी नहीं देखी, सक्सेना जी। मैंने फ़ाइल घर नहीं ले गया था।"
रात फिर आ गई।
देव और नूर वापस नूर के घर पर थे। आँगन में तुलसी के पास दीया फिर जल रहा था।
वो दोनों अंदर के कमरे में बैठे थे। बीच में, एक चटाई पर, काली किताब रखी थी। खुली नहीं। बस रखी थी।
"हमें इसे पढ़ना होगा," देव ने कहा। "पूरा। ध्यान से। पापा ने कहा था कि फटा पन्ना छुपा है, फटा नहीं है। अगर कोई सुराग है, तो वो इसके अंदर होगा।"
"और अगर पढ़ने से वो और जाग गए?"
"वो पहले ही जाग चुके हैं, नूर। अस्सी तक पहुँच गए हैं। अगर हम कुछ नहीं करेंगे, तो वो शून्य तक पहुँच जाएँगे। और फिर..."
और फिर सबको पढ़ लिया जाएगा।
नूर ने सिर हिलाया।
देव ने किताब खोली।
पहला पन्ना। चेतावनी। वैसी ही।
दूसरा। ज़ुहाल। वैसा ही।
लेकिन तीसरे पन्ने पर पहुँचते ही देव रुक गया।
कल रात तीसरे पन्ने पर एक नाम था। आज वहाँ नाम के नीचे की लाइनें बदल चुकी थीं। पहले वहाँ लिखा था, "दूसरा पहरेदार, जो नींद में रहता है।"
अब लिखा था:
"दूसरा पहरेदार। जाग गया।"
देव ने तेज़ी से पन्ने पलटे।
चौथा: "जाग गया।"
पाँचवाँ: "जाग गया।"
दसवाँ। पंद्रहवाँ। बीसवाँ।
"जाग गया।" "जाग गया।" "जाग गया।"
हर नाम के नीचे। एक-एक करके।
उन्नीसवाँ पन्ना, बीसवाँ पन्ना...
उन्नीस नामों के नीचे "जाग गया" लिखा था।
उन्नीस।
निन्यानवे में से उन्नीस। सौ से उल्टी गिनती करो, तो अस्सी।
ठीक वहीं, जहाँ सीसीटीवी में "देव" के होंठ रुके थे।
"यह किताब," नूर ने फुसफुसाया, "हिसाब रख रही है।"
देव पन्ने पलटता रहा। इकसठवें पन्ने तक पहुँचा। रहमत अली का नाम अभी भी वहाँ था। "पहरा पूरा हुआ।"
वो आगे बढ़ा। पन्ना निन्यानवे तक।
फिर वो फटा हुआ किनारा।
और पिछली जिल्द।
रघुनाथ सक्सेना। प्रतीक्षारत।
वो नाम अभी भी वहाँ था। चमड़े के अंदर से उभरा हुआ।
लेकिन अब उसके नीचे, उसी तरह, चमड़े के अंदर से, कुछ और उभर रहा था।
देव ने लालटेन पास खींची।
नूर उसके कंधे के ऊपर से झुकी।
दोनों ने साँस रोककर देखा।
अक्षर धीरे-धीरे बन रहे थे। जैसे कोई अंदर से, त्वचा के नीचे, बहुत ध्यान से, एक-एक रेखा खींच रहा हो।
दे...
देव...
देव सक्सेना
देव के शरीर का हर रोआँ खड़ा हो गया।
उसका नाम।
उसके पिता के नाम के ठीक नीचे।
और नाम पूरा होते ही, उसके सामने, एक और शब्द बनने लगा। धीरे। बहुत धीरे। जैसे लिखने वाला उस शब्द का पूरा मज़ा ले रहा हो।
देव जानता था उसे यह नहीं देखना चाहिए।
जब किताब तुम्हें कोई नाम दे, उसे स्वीकार मत करना।
लेकिन वो अपनी आँखें हटा नहीं पाया।
मा...
मालि...
"मालिक।"
और जिस पल वो शब्द पूरा हुआ, नूर के घर की हर बत्ती बुझ गई। लालटेन की लौ नीली पड़ गई। आँगन में तुलसी के पास जलता दीया एक झटके में बुझ गया।
और पूरे लखनऊ शहर में, उस रात, ठीक उसी पल, हज़ारों घरों में सोए हुए बच्चे एक साथ नींद में बोल पड़े।
एक ही शब्द।
एक ही आवाज़ में।
"उन्यासी।"
(भाग 4 समाप्त)
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- 3377
- Language
- Hindi (हिंदी)
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