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भाग 5: मालिक

TheHauntedWriter · Jinn & Spirits · 16 मिनट

अँधेरा।
पूरा, गाढ़ा, साँस रोक देने वाला अँधेरा। सिर्फ़ लालटेन की नीली पड़ चुकी लौ, जो इतनी कमज़ोर थी कि अपने काँच से बाहर तक रोशनी नहीं फेंक पा रही थी। बस एक नीला धब्बा, जो हवा में तैरता लग रहा था।
और उस नीली रोशनी में, देव की गोद में रखी किताब।
उसके पन्ने पलट रहे थे।
अपने आप। धीरे-धीरे। एक-एक करके। जैसे कोई अदृश्य उँगली उन्हें बड़े आदर से, बड़े प्यार से पलट रही हो।
सरर्र...
सरर्र...
और हर पन्ने के पलटने के साथ, कमरे के अँधेरे में कहीं से एक फुसफुसाहट आती थी।
"मालिक।"
पन्ना पलटा।
"मालिक।"
अलग आवाज़। अलग कोने से।
"मालिक।"
छत से।
"मालिक।"
फ़र्श के नीचे से।
"मालिक।"
देव के ठीक कान के पास से।
"देव..." नूर की आवाज़ काँप रही थी। वो कहीं उसके पास थी, लेकिन देव उसे देख नहीं पा रहा था। "देव, किताब बंद करो।"
देव ने किताब बंद करने के लिए हाथ बढ़ाया।
और रुक गया।
क्योंकि उसे कुछ महसूस हो रहा था।
उसकी उँगलियों से, जहाँ स्याही उसकी त्वचा में समा चुकी थी, एक गर्माहट ऊपर चढ़ रही थी। कलाई से। कोहनी तक। कंधे तक। गर्दन तक। जैसे उसकी नसों में किसी ने गुनगुना शहद भर दिया हो।
यह दर्द नहीं था।
यह अच्छा लग रहा था।
बहुत अच्छा।
चौंतीस साल में उसने ऐसा कभी महसूस नहीं किया था। ऐसी ताक़त। ऐसा भरोसा। जैसे पूरी दुनिया एक किताब हो, और वो उसका हर पन्ना पढ़ सकता हो। जैसे वो चाहे, तो हर पन्ना बदल भी सकता हो।
"मालिक," आवाज़ें फुसफुसाईं, और अब वो सब एक साथ बोल रही थीं, एक लय में, एक प्रार्थना की तरह। "हुक्म दीजिए।"
देव ने अपने हाथ देखे। नीली रोशनी में उसकी त्वचा के नीचे स्याही की नसें चमक रही थीं। काली रेखाएँ, जो धीरे-धीरे धड़क रही थीं। किताब की धड़कन के साथ।
"बस एक बार कहिए। बस एक बार 'हाँ' कहिए। और हम झुक जाएँगे। सब झुक जाएँगे। आप जो चाहें, वो होगा।"
"जो मैं चाहूँ?" देव ने धीरे से कहा। उसकी अपनी आवाज़ उसे अजनबी लगी।
"जो आप चाहें।"
"आपके पिता वापस आ जाएँगे।"
"आपकी माँ फिर से हँसेंगी।"
"वो रात कभी नहीं हुई होगी।"
"वो सुबह कभी नहीं हुई होगी।"
"वो चाय का कप कभी नहीं गिरा होगा।"
चाय का कप।
देव को याद आया। वो सुबह। वो अपने पिता के कमरे में गया था। उन्हें कुर्सी पर बैठे देखा था। और उसके हाथ से चाय का कप छूटकर फ़र्श पर गिरा था। टूट गया था। चाय उसके पैरों पर गिरी थी, गर्म, जलाती हुई, और उसे महसूस तक नहीं हुआ था।
उसने यह बात किसी को नहीं बताई थी।
कभी नहीं।
"सब ठीक हो जाएगा, मालिक। बस 'हाँ' कहिए।"
"देव!"
किसी ने उसका चेहरा अपने दोनों हाथों में पकड़ा। ज़ोर से। नूर। उसका चेहरा नीली रोशनी में बिल्कुल सफ़ेद लग रहा था। और उसकी आँखों में ऐसा डर था जो देव ने किसी इंसान की आँखों में पहले नहीं देखा था।
"तुम्हारी आँखें," उसने फुसफुसाया। "देव, तुम्हारी आँखें।"
"क्या हुआ मेरी आँखों को?"
नूर ने अपनी जेब से फ़ोन निकाला। उसकी स्क्रीन बंद थी, काली, एक धुंधले आईने जैसी। उसने उसे देव के चेहरे के सामने किया।
देव ने अपना प्रतिबिंब देखा।
उसकी आँखों में सफ़ेदी नहीं बची थी।
पूरी आँख काली थी। पुतली से लेकर किनारों तक। गीली, चमकदार, गहरी काली। जैसे किसी ने उसकी आँखों में स्याही की दवात उड़ेल दी हो।
और उस काले में, बहुत गहराई में, कुछ हिल रहा था।
अक्षर।
छोटे-छोटे अक्षर, जो उसकी आँखों के अंदर तैर रहे थे।
"हाँ कहिए, मालिक।"
और उसी पल, देव के दिमाग़ में एक और आवाज़ गूँजी। धीमी। थकी हुई। फ़ोन की खरखराहट में से आती हुई।
"जब किताब तुम्हें कोई नाम दे... कोई भी नाम... उसे स्वीकार मत करना... चाहे वो कितना भी सच लगे..."
पापा।
असली पापा।
जो पंद्रह साल से एक दरार में फँसे थे। जिन्हें हर पल कोई पढ़ रहा था।
अगर यह चीज़ सच में उन्हें वापस ला सकती, तो उसने उन्हें पंद्रह साल से वहाँ क्यों रखा था?
वो सच नहीं बोलती। वो बस वो बोलती है, जो तुम सुनना चाहते हो।
देव ने अपनी आँखें बंद कर लीं।
"नहीं," उसने कहा।
कमरे में सन्नाटा छा गया।
फुसफुसाहटें बंद हो गईं। पन्नों का पलटना बंद हो गया। सब कुछ रुक गया। जैसे पूरा कमरा साँस रोककर सुन रहा हो।
देव ने अपनी आँखें खोलीं। और ज़ोर से, साफ़, हर शब्द पर ज़ोर देते हुए कहा:
"मैं मालिक नहीं हूँ।"
दर्द।
जैसे किसी ने उसकी हर नस में पिघला हुआ लोहा भर दिया हो।
देव चीखा और पीछे की तरफ़ गिरा। उसका शरीर अकड़ गया। उसकी पीठ फ़र्श से ऊपर उठ गई, एक धनुष की तरह, और उसके मुँह से एक ऐसी आवाज़ निकली जो इंसानी नहीं थी।
किताब उसकी गोद से गिरी।
और ज़मीन पर गिरते ही, उसके खुले पन्नों से कुछ बहने लगा।
स्याही।
नहीं।
खून।
गाढ़ा, काला-लाल, जो पन्नों से रिसकर चटाई पर फैलने लगा। और किताब से एक आवाज़ आई। चीख नहीं। रोना। जैसे कोई बहुत छोटा बच्चा बहुत गहरी चोट से रो रहा हो।
नूर ने देव को पकड़ा। उसके कंधे दबाए। उसका नाम पुकारा। बार-बार।
और धीरे-धीरे, बहुत धीरे, दर्द कम होने लगा।
देव की पीठ फ़र्श पर लौटी। उसकी साँसें टूटी-टूटी थीं। पसीने से उसका पूरा शरीर भीगा था।
लालटेन की लौ नीले से पीली हो गई।
फिर बत्तियाँ लौट आईं।
देव ने अपने हाथ उठाए और उन्हें देखा।
स्याही अभी भी थी। लेकिन अब वो कलाई तक नहीं थी। वो पीछे हट गई थी। वापस उँगलियों के पोरों तक।
"तुम्हारी आँखें ठीक हैं," नूर ने कहा। उसकी आवाज़ रोने के करीब थी। "ठीक हैं।"
देव ने सिर घुमाकर किताब की तरफ़ देखा।
वो बंद पड़ी थी। चटाई पर। उसके चारों तरफ़ खून का एक छोटा सा तालाब, जो अब धीरे-धीरे सूख रहा था। और किताब की धड़कन... बहुत धीमी थी। जैसे वो थक गई हो।
या जैसे वो नाराज़ हो।
"हमने उसे चोट पहुँचाई," देव ने फुसफुसाया।
"तुमने," नूर ने कहा।
और फिर दोनों ने एक साथ उसे देखा।
कमरे के कोने में।
कोई बैठा था।
घुटनों के बल। सिर झुका हुआ। माथा ज़मीन से लगभग छूता हुआ। जैसे कोई सजदे में हो। या जैसे कोई गुलाम अपने मालिक के सामने झुका हो।
उसका शरीर धुंधला था। जैसे वो धुएँ से बना हो। या जैसे कोई तस्वीर हो जो पूरी तरह फ़ोकस में न आई हो।
लेकिन उसके चेहरे की जगह, जहाँ आँखें होनी चाहिए थीं, वहाँ कुछ नहीं था। सिर्फ़ चिकनी त्वचा।
पहला पहरेदार। उसकी आँखें नहीं हैं।
ज़ुहाल।
वो हिला नहीं। बोला नहीं। बस वहाँ झुका रहा।
देव और नूर ने साँस तक नहीं ली।
फिर, बहुत धीरे, बिना सिर उठाए, ज़ुहाल ने एक बात कही। उसकी आवाज़ में कोई ग़ुस्सा नहीं था। कोई धमकी नहीं थी। सिर्फ़ एक अजीब सी, गहरी, प्राचीन उदासी।
"इनकार भी एक हुक्म है, मालिक।"
और वो धुएँ की तरह बिखर गया।
अगली सुबह लखनऊ जागा तो किसी को समझ नहीं आ रहा था कि क्या हुआ।
व्हाट्सएप ग्रुप भरे हुए थे। फ़ेसबुक पर वीडियो वायरल हो रहे थे। बच्चों के, सोते हुए, नींद में एक ही शब्द बोलते हुए। माँ-बाप ने रिकॉर्ड किए थे। कुछ हँसते हुए। कुछ डरे हुए।
"उन्यासी।"
हर वीडियो में वही शब्द। वही वक्त। रात दस बजकर सत्रह मिनट।
न्यूज़ चैनलों ने उठा लिया। "लखनऊ में रहस्यमयी नींद की बीमारी?" "क्या यह कोई सामूहिक हिस्टीरिया है?" "डॉक्टरों ने कहा, घबराने की कोई बात नहीं।"
एक चैनल ने एक बाल मनोवैज्ञानिक को बुलाया था। वो समझा रहे थे कि बच्चे अक्सर सोशल मीडिया से शब्द उठा लेते हैं, और एक बच्चे का वीडियो वायरल होने पर बाकी बच्चे भी...
"लेकिन सर," एंकर ने टोका, "ये सारे वीडियो एक ही मिनट के हैं। बच्चे सो रहे थे। उन्होंने कोई वीडियो नहीं देखा था।"
मनोवैज्ञानिक के पास कोई जवाब नहीं था।
देव नूर के घर की छोटी सी रसोई में बैठा फ़ोन पर ये ख़बरें देख रहा था। उसके सामने चाय का गिलास ठंडा हो रहा था।
"सबको सुनाई दे रहा है," उसने कहा। "सिर्फ़ बच्चों को नहीं। वो बस इसलिए बोल रहे हैं क्योंकि उनके दिमाग़ अभी खुले हैं। उनके पास अभी वो दीवारें नहीं हैं जो बड़ों के पास होती हैं।"
"तुम्हें कैसे पता?" नूर ने पूछा।
देव ने उसकी तरफ़ देखा।
"क्योंकि मुझे भी सुनाई दे रहा है। अभी भी। बहुत हल्का। जैसे कोई दूसरे कमरे में रेडियो चल रहा हो।"
उसने अपना सिर एक तरफ़ झुकाया। जैसे सुनने की कोशिश कर रहा हो।
"वो अभी भी गिन रहे हैं। लेकिन बहुत धीरे अब। जैसे कल रात के बाद उन्हें... उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा।"
"क्योंकि तुमने इनकार कर दिया।"
"इनकार भी एक हुक्म है," देव ने ज़ुहाल के शब्द दोहराए। "मुझे नहीं पता इसका क्या मतलब है। लेकिन मुझे डर है कि मैंने कल रात कुछ बहुत गलत कर दिया।"
तभी उसका फ़ोन बजा।
मिर्ज़ा साहब।
मिर्ज़ा साहब की आवाज़ इतनी कमज़ोर थी कि देव को फ़ोन कान से कसकर दबाना पड़ा।
"देव मियाँ... कल रात... तुम कहाँ थे?"
"नूर के घर। रहमत चाचा की पोती।"
"हम्म।" एक लंबी, घरघराती साँस। "कल रात दस बजकर सत्रह मिनट पर... मेरे घर की हर किताब... अलमारियों से गिर गई। हर एक। ढाई हज़ार किताबें। सब एक साथ। और सबकी सब... खुली हुई गिरीं। एक ही पन्ने पर।"
"कौन सा पन्ना?"
"उन्यासी।"
देव ने आँखें बंद कर लीं।
"लेकिन मैंने तुम्हें इसलिए फ़ोन नहीं किया," मिर्ज़ा साहब बोले। "मुझे एक चीज़ मिली है। रात भर उन गिरी हुई किताबों के बीच बैठा रहा। और उनमें से एक... मेरे वालिद की डायरी थी। जो मुझे पचास साल से नहीं मिली थी। मुझे लगा था वो खो गई।"
"क्या लिखा है उसमें?"
"1947 के बारे में।" मिर्ज़ा साहब कुछ पल रुके। "देव मियाँ, तुम्हें पता है तहखाना 1947 में क्यों बंद किया गया?"
"आपने कहा था, आपको वजह नहीं पता।"
"मुझे नहीं पता था। अब पता है।" उनकी आवाज़ और धीमी हो गई। "उस साल, अगस्त में, जब शहर में दंगे हो रहे थे, जब लोग एक-दूसरे का गला काट रहे थे, एक रात भीड़ पुस्तकालय में घुस आई। आग लगाने। मेरे वालिद और रहमत के दादा ने उन्हें रोकने की कोशिश की। लेकिन वो नहीं रुके। वो तहखानों तक पहुँच गए। और उनमें से एक ने... तीसरे तहखाने का संदूक तोड़ दिया।"
"फिर?"
"फिर उसने किताब खोली। और ज़ोर से, हँसते हुए, नाम पढ़ने शुरू कर दिए। एक के बाद एक। मज़ाक उड़ाते हुए।"
देव का गला सूख गया। "कितने?"
"उन्नीस।"
उन्नीस।
ठीक उतने, जितने अब जाग चुके थे।
"मेरे वालिद लिखते हैं कि उन्नीसवाँ नाम पढ़ते ही वो आदमी चुप हो गया। उसके साथी हँस रहे थे, उसे आगे पढ़ने को कह रहे थे। लेकिन वो चुप खड़ा रहा। और फिर उसने अपने साथियों की तरफ़ देखा। और..."
मिर्ज़ा साहब की आवाज़ टूट गई।
"और क्या, मिर्ज़ा साहब?"
"वालिद ने लिखा है, 'उसकी आँखें काली थीं। पूरी काली। और जब उसने बोलना शुरू किया, तो वो उन्नीस आवाज़ों में बोल रहा था।' उस रात उस तहखाने में ग्यारह लोग घुसे थे, देव मियाँ। सुबह सिर्फ़ मेरे वालिद और रहमत के दादा बाहर आए।"
"और बाकी?"
"पुलिस ने दंगों में मरा हुआ मान लिया। शहर में उस रात सैकड़ों मरे थे। ग्यारह और किसे याद रहते?"
देव ने अपना माथा अपने हाथ पर टिका दिया।
"लेकिन असली बात यह नहीं है," मिर्ज़ा साहब बोले। "असली बात इसके बाद लिखी है। उस रात, जब सब ख़त्म हो गया, मेरे वालिद ने किताब उठाई ताकि उसे वापस संदूक में रख सकें। और उन्होंने देखा कि पिछली जिल्द पर, अंदर की तरफ़, एक नाम उभर आया था।"
देव की साँस रुक गई।
"उनका अपना नाम। मिर्ज़ा असदुल्लाह बेग। और उसके सामने एक शब्द।"
"मालिक," देव ने फुसफुसाया।
सन्नाटा।
"तुम्हें कैसे पता?"
"क्योंकि कल रात मेरे नाम के सामने भी वही लिखा आया।"
फ़ोन के उस पार बहुत देर तक कुछ नहीं आया। फिर मिर्ज़ा साहब की आवाज़, बहुत भारी, बहुत थकी हुई:
"मेरे वालिद ने इनकार कर दिया था। डायरी में लिखा है। उन्होंने कहा था, 'मैं मालिक नहीं हूँ।' और उसी पल..."
"उसी पल क्या?"
"उसी पल उनकी आँखों की रोशनी चली गई। हमेशा के लिए। देव मियाँ, मैंने अपने वालिद को कभी देखते हुए नहीं देखा। मैं छह साल का था। मुझे बताया गया था कि दंगों में किसी ने उनकी आँखों पर तेज़ाब फेंक दिया।"
देव ने अपनी आँखें छुईं। अनजाने में।
"इनकार की कीमत होती है," मिर्ज़ा साहब बोले। "किताब कुछ न कुछ लेती है। मेरे वालिद से उसने आँखें लीं। तुमसे वो क्या लेगी, मुझे नहीं पता।"
"शायद अभी कुछ नहीं लिया।"
"या शायद," मिर्ज़ा साहब ने कहा, "उसने ले लिया है, और तुम्हें अभी पता नहीं चला।"
उस दोपहर देव और नूर ने तय किया कि वो काशी जाएँगे।
"इंस्पेक्टर तिवारी ने शहर छोड़ने से मना किया है," नूर ने याद दिलाया।
"मुझे पता है।"
"अगर तुम गए, तो वो तुम्हें भगोड़ा मान लेंगे।"
"मुझे पता है, नूर।" देव ने बैग अपने कंधे पर डाला। किताब अंदर थी। उसे अंदर रखने की ज़रूरत नहीं थी, वो खुद आ जाती। लेकिन उसे अपने हाथों से रखना, किसी तरह का नियंत्रण होने का भ्रम देता था। "लेकिन अगर हम नहीं गए, तो वो गिनती शून्य तक पहुँचेगी। और फिर कोई तिवारी, कोई थाना, कोई शहर नहीं बचेगा।"
नूर ने कुछ पल उसे देखा। फिर अपने दादा का आखिरी रजिस्टर अपने थैले में रखा, दुपट्टा सिर पर ठीक किया और कहा, "मैं भी चल रही हूँ।"
"नूर, तुम्हें..."
"मेरे ख़ानदान ने डेढ़ सौ साल इस किताब का पहरा दिया है, देव। मेरे दादा कल रात इसके लिए मरे। मैं तुम्हें अकेला नहीं छोड़ूँगी।" उसने एक पल रुककर कहा, "पंडित हरिनाथ ने करीम बख्श से यही कहा था ना? 'उसे अकेला मत छोड़ना।'"
शाम सात बजे की ट्रेन थी। लखनऊ से वाराणसी। रात भर का सफ़र।
चारबाग़ स्टेशन पर भीड़ थी। कुली, चायवाले, बच्चों को खींचती माँएँ, फ़ोन पर चिल्लाते लोग। देव को यह भीड़ अच्छी लगी। इतने लोगों के बीच, इतने शोर के बीच, वो फुसफुसाहटें लगभग सुनाई नहीं दे रही थीं।
लगभग।
ट्रेन आई। स्लीपर कोच। एस-सात।
उनकी बर्थ नंबर तेरह और चौदह थी।
देव ने बर्थ नंबर देखकर कुछ नहीं कहा। उसने अब इन संयोगों पर चौंकना छोड़ दिया था।
वो बैठ गए। ट्रेन चली।
लखनऊ की बत्तियाँ पीछे छूटने लगीं। खिड़की के बाहर अँधेरे खेत, कभी-कभी कोई गाँव, कोई अकेला पेड़, कोई टूटा मंदिर।
नूर ऊपर की बर्थ पर चढ़ गई और रजिस्टर पढ़ने लगी। देव नीचे बैठा खिड़की से बाहर देखता रहा।
डिब्बे में धीरे-धीरे बत्तियाँ बंद होने लगीं। लोग सोने लगे। कोई खर्राटे ले रहा था। कहीं कोई बच्चा रो रहा था और उसकी माँ उसे धीमे से लोरी सुना रही थी।
रात के ग्यारह बजे टीटीई आया।
एक अधेड़ आदमी। काला कोट। हाथ में चार्ट। आँखें नींद से भारी।
"टिकट।"
देव ने फ़ोन पर टिकट दिखाया।
टीटीई ने चार्ट देखा। अपनी उँगली नामों पर फिराई। फिर रुका।
"देव सक्सेना?"
"जी।"
"नूर अली?"
"ऊपर हैं।"
टीटीई ने सिर हिलाया। फिर उसने चार्ट पर दोबारा देखा। उसकी भौंहें सिकुड़ गईं।
"और तीसरा?"
"तीसरा कौन?"
"आपके पीएनआर पर तीन यात्री हैं।" उसने चार्ट देव की तरफ़ घुमाया और एक लाइन पर उँगली रखी। "बर्थ बारह। साइड लोअर।"
देव ने चार्ट देखा।
छपे हुए अक्षरों में, कंप्यूटर के प्रिंटर से निकले, बाकी सैकड़ों नामों की तरह साधारण:
रघुनाथ सक्सेना — पु — 67
सड़सठ।
अगर उसके पिता आज ज़िंदा होते, तो वो सड़सठ साल के होते।
"मैंने... मैंने यह टिकट नहीं बुक किया," देव ने कहा। उसकी आवाज़ बहुत दूर से आती लगी।
टीटीई ने कंधे उचकाए। "पीएनआर एक है। बुकिंग एक साथ हुई है। हो सकता है आपसे गलती से..." उसने साइड लोअर बर्थ की तरफ़ देखा। "वैसे वो तो आ गए हैं। सो रहे हैं।"
देव ने धीरे से सिर घुमाया।
साइड लोअर बर्थ। बारह नंबर। देव ने ट्रेन में चढ़ते वक्त उसे देखा था। खाली था।
अब उस पर कोई लेटा था।
पूरी तरह एक सफ़ेद चादर से ढका हुआ। सिर से पैर तक। जैसे कोई लाश हो।
सिर्फ़ चादर के नीचे से, पैरों की तरफ़ से, स्वेटर की एक भूरी आस्तीन बाहर लटक रही थी।
कोहनी पर पैबंद।
टीटीई ने अपने चार्ट पर टिक लगाया और आगे बढ़ गया। "उठ जाएँ तो टिकट दिखा दीजिएगा।"
देव वहीं बैठा रहा।
चादर हिल रही थी। ऊपर-नीचे। ऊपर-नीचे। जैसे नीचे लेटा कोई साँस ले रहा हो।
धीमी, गहरी, नींद वाली साँसें।
"नूर," देव ने फुसफुसाया।
कोई जवाब नहीं।
उसने ऊपर देखा। नूर अपनी बर्थ पर सो चुकी थी। रजिस्टर उसकी छाती पर खुला पड़ा था। उसकी आँखें बंद थीं।
लेकिन उसके होंठ हिल रहे थे।
बिना आवाज़ के।
उन्यासी। उन्यासी। उन्यासी।
देव ने वापस साइड बर्थ की तरफ़ देखा।
उसने पूरे डिब्बे में नज़र घुमाई। हर बर्थ पर लोग सो रहे थे। मद्धम नीली नाइट-लाइट में उनके चेहरे दिख रहे थे।
और सबके होंठ हिल रहे थे।
एक साथ।
एक लय में।
ट्रेन की पटरियों की खट-खट के साथ।
उन्यासी। उन्यासी। उन्यासी।
सिवाय एक के।
साइड लोअर बर्थ पर चादर के नीचे जो लेटा था, उसकी साँसें चल रही थीं, लेकिन वो गिनती नहीं कर रहा था।
वो बस साँस ले रहा था। और इंतज़ार कर रहा था।
देव उठा।
उसे पता था कि उसे नहीं उठना चाहिए। उसे पता था कि हर डरावनी कहानी में यही वो पल होता है जब किरदार गलती करता है। लेकिन अगर उस चादर के नीचे उसके पिता थे, असली पिता, किसी तरह किताब की दरार से बाहर निकले हुए...
और अगर नहीं थे...
तो उसे पता होना चाहिए था कि उसके साथ इस डिब्बे में क्या सफ़र कर रहा है।
वो साइड बर्थ के पास गया।
चादर ऊपर-नीचे हो रही थी।
देव ने अपना काँपता हाथ उसके सिरे पर रखा। जहाँ सिर होना चाहिए था।
चादर गर्म थी।
उसने एक लंबी साँस ली।
और चादर खींच दी।
बर्थ पर एक आदमी लेटा था।
सीधा। पीठ के बल। हाथ छाती पर बँधे हुए, जैसे लाशों के बाँधे जाते हैं।
भूरा स्वेटर।
कोहनी पर पैबंद।
लेकिन वो चेहरा उसके पिता का नहीं था।
वो देव का चेहरा था।
उसका अपना चेहरा। उसका चश्मा। उसकी ठोड़ी पर वो छोटा सा निशान, जो बचपन में साइकिल से गिरने से पड़ा था। उसके बिखरे बाल।
बर्थ पर, उसके पिता के कपड़ों में, देव सक्सेना खुद लेटा था।
आँखें बंद।
चेहरा शांत।
जैसे बहुत गहरी नींद में हो।
देव का हाथ, अभी भी चादर पकड़े, हवा में जम गया।
उसके दिमाग़ में मिर्ज़ा साहब की आवाज़ गूँजी।
"या शायद उसने ले लिया है, और तुम्हें अभी पता नहीं चला।"
बर्थ पर लेटे देव की छाती ऊपर-नीचे हो रही थी।
फिर रुक गई।
और उसके होंठ, जो अब तक बंद थे, बहुत धीरे से खुले।
एक मुस्कान में।
वही मुस्कान।
बहुत चौड़ी। होंठों के कोने कानों की तरफ़ खिंचे हुए।
सीसीटीवी वाली मुस्कान।
और फिर, उसकी बंद आँखों की पलकें, बहुत धीरे से, काँपने लगीं।
जैसे वो खुलने वाली हों।
ट्रेन एक सुरंग में घुसी। डिब्बे की नीली नाइट-लाइट बुझ गई।
और अँधेरे में, बिल्कुल पास से, देव के अपने चेहरे से, उसकी अपनी आवाज़ आई:
"तुमने मुझे इनकार में छोड़ दिया, देव।"
"अब मैं तुम्हारी जगह जागूँगा।"
(भाग 5 समाप्त)

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TheHauntedWriter
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काली किताब का आखिरी जिन्न
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5 of 7
Category
Jinn & Spirits
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16 min
Words
3121
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Hindi (हिंदी)
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