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भाग 6: बिना परछाईं का आदमी

TheHauntedWriter · Jinn & Spirits · 18 मिनट

सुरंग का अँधेरा लंबा था।
ट्रेन की खट-खट दीवारों से टकराकर दुगुनी होकर लौट रही थी। हवा में कोयले और सीलन की गंध थी। और उस अँधेरे में देव कुछ नहीं देख पा रहा था।
लेकिन वो महसूस कर पा रहा था।
एक हाथ। उसकी कलाई पर। ठंडा।
बर्फ़ जैसा नहीं। मुर्दे जैसा नहीं। बस ठंडा। जैसे किसी ने बहुत देर तक पानी में हाथ डुबोए रखा हो।
और देव उस हाथ को पहचानता था।
वो उसका अपना हाथ था।
वही लंबी उँगलियाँ। वही अँगूठे के पास का घट्टा, जो सालों तक कलम पकड़ने से बना था। वही नाखून, जिन्हें वो घबराहट में चबाता था।
बस उन उँगलियों पर स्याही नहीं थी।
"डरो मत," उसकी अपनी आवाज़ उसके कान के बिल्कुल पास फुसफुसाई। "मैं तुम्हें नुकसान नहीं पहुँचाऊँगा। अभी नहीं। तुम्हारी ज़रूरत है।"
"कौन हो तुम?" देव ने फुसफुसाया। उसकी आवाज़ इतनी काँप रही थी कि शब्द टूट रहे थे।
हल्की सी हँसी। उसकी अपनी हँसी। बस थोड़ी सी गलत। जैसे किसी ने उसकी रिकॉर्डिंग को ज़रा धीमा करके बजाया हो।
"मैं वो हूँ जो तुमने ठुकराया, देव। कल रात। उस छोटे से कमरे में। जब किताब ने तुम्हें एक नाम दिया।"
"मालिक।"
"मालिक।" दूसरे देव ने वो शब्द ऐसे बोला जैसे उसका स्वाद ले रहा हो। "तुम्हें लगा कि तुमने 'नहीं' कहा और बात ख़त्म हो गई? किताब कोई दुकानदार नहीं है, जो तुम्हारे मना करने पर सामान वापस रख ले। जब किताब किसी को कोई नाम देती है, तो वो नाम सच हो जाता है। अगर तुम उसे नहीं पहनोगे, तो वो अपने लिए कोई और शरीर ढूँढ लेगा।"
ठंडी उँगलियाँ उसकी कलाई पर और कस गईं।
"और उसने ढूँढ लिया। तुम्हारा। तुम्हारे इनकार से बना। तुम्हारी आधी साँस से। तुम्हारे आधे दिल से।"
"मिर्ज़ा साहब के वालिद..." देव ने कहा। "उन्होंने भी इनकार किया था। उनकी आँखें चली गईं।"
"उन्होंने अपनी आँखें दे दीं," दूसरे देव ने कहा। "किताब ने पूछा था, 'तुम क्या दोगे?' और उन्होंने आँखें दीं। तुमसे भी पूछा गया था, देव। तुमने सुना नहीं। तुम बहुत ज़ोर से चीख रहे थे।"
"मुझसे क्या लिया?"
अँधेरे में एक लंबा सन्नाटा।
फिर उसके कान के बिल्कुल पास, होंठ उसकी त्वचा को छूते हुए:
"सुबह देख लेना।"
ट्रेन सुरंग से बाहर निकली।
नीली नाइट-लाइट फिर से जल उठी।
देव की कलाई पर कोई हाथ नहीं था।
साइड लोअर बर्थ खाली थी।
सिर्फ़ उस पर, करीने से तह किया हुआ, एक भूरा स्वेटर रखा था। कोहनी पर पैबंद। और स्वेटर के ऊपर, एक छोटा सा पीला कागज़ का टुकड़ा।
ट्रेन का टिकट।
पीएनआर वही था। लेकिन उस पर अब सिर्फ़ एक यात्री का नाम छपा था।
देव सक्सेना — पु — 34
और बर्थ नंबर: बारह।
उसकी अपनी बर्थ, तेरह, टिकट से गायब हो चुकी थी।
"देव?"
ऊपर से नूर की नींद भरी आवाज़। वो आँखें मल रही थी।
"क्या हुआ? तुम खड़े क्यों हो?"
देव ने ऊपर देखा। नूर के होंठ अब हिल नहीं रहे थे। उसने डिब्बे में चारों तरफ़ देखा। सब लोग सो रहे थे। सामान्य नींद। किसी के होंठ नहीं हिल रहे थे। कोई गिनती नहीं कर रहा था।
जैसे कुछ हुआ ही न हो।
"कुछ नहीं," उसने कहा। उसे नहीं पता था कि नूर को कैसे बताए। या क्या बताए। "बस... पानी पीने उठा था।"
नूर ने उसे शक भरी नज़रों से देखा, फिर करवट लेकर वापस सो गई।
देव अपनी बर्थ पर बैठा रहा। उसके हाथ में वो टिकट था। उसकी गोद में वो स्वेटर। उसने उसे सूँघा। पुरानी किताबों की गंध। और उसके नीचे, बहुत हल्की, उसके पिता की वो आफ़्टरशेव, जो बाज़ार में अब मिलती भी नहीं थी।
"बाबू।"
देव उछल पड़ा।
सामने वाली लोअर बर्थ पर एक बूढ़ी औरत बैठी थी। देव ने उसे पहले नहीं देखा था। या शायद देखा था, लेकिन ध्यान नहीं दिया था। सफ़ेद धोती। सिर मुँडा हुआ। गले में रुद्राक्ष की मोटी माला। और माथे पर राख की तीन लकीरें।
उसकी आँखें खुली थीं। पूरी तरह जागी हुई। और वो देव को सीधे देख रही थीं।
"आप जाग रही थीं?" देव ने पूछा।
"सत्तर साल से रात को नहीं सोई, बाबू।" बुढ़िया की आवाज़ खुरदुरी थी, जैसे बरसों तक धुएँ में साँस ली हो। "मेरे काम में रात को सोना मना है।"
"कौन सा काम?"
वो मुस्कुराई। उसके आधे दाँत नहीं थे।
"मैंने सब देखा," उसने देव के सवाल का जवाब दिए बिना कहा। "वो जो चादर में लेटा था। वो जो तुम्हारे कान में बोल रहा था। सब।"
देव ने कुछ नहीं कहा।
"पर उससे भी ज़रूरी एक बात है, बाबू।" बुढ़िया ने अपनी झुर्रियों भरी उँगली उठाई और देव के पैरों के पास इशारा किया। "तुम्हारी परछाईं कहाँ है?"
देव ने नीचे देखा।
डिब्बे की नीली नाइट-लाइट उसके ठीक ऊपर थी। उसकी रोशनी फ़र्श पर पड़ रही थी। बर्थ की परछाईं थी। उस पर रखे बैग की परछाईं थी। बूढ़ी औरत की परछाईं थी, जो पीछे की दीवार पर लंबी होकर फैली थी।
देव की कोई परछाईं नहीं थी।
उसने अपना हाथ रोशनी के सामने उठाया। हिलाया। घुमाया।
कुछ नहीं।
रोशनी उसके हाथ से ऐसे गुज़र रही थी जैसे वो वहाँ हो ही नहीं।
सुबह देख लेना।
सीसीटीवी फुटेज। तहखाने की सीढ़ियाँ। "देव" के पैरों के नीचे कोई परछाईं नहीं थी।
क्योंकि उस वक्त तक, उसकी परछाईं देव के पास थी।
अब नहीं थी।
अब वो उसके पास थी।
"उसने तुम्हारी परछाईं ले ली, बाबू," बुढ़िया ने धीरे से कहा। "जानते हो काशी में बिना परछाईं वाले आदमी को क्या कहते हैं?"
देव ने सिर हिलाया।
"अधमरा।" उसने रुद्राक्ष की माला पर अपनी उँगलियाँ फिराईं। "न ज़िंदों में, न मुर्दों में। ऐसा आदमी जिसका आधा हिस्सा पहले ही घाट पर पहुँच चुका है और बाकी आधे का इंतज़ार कर रहा है।"
बुढ़िया का नाम कमला था।
कमला डोम।
उसने यह बात ऐसे बताई जैसे कोई अपना गोत्र बताता है। सीधे, बिना झिझक, और एक हल्के से गर्व के साथ।
"मणिकर्णिका," उसने कहा। "पंद्रह पीढ़ियों से हमारा ख़ानदान वहाँ आग रखता है। वो आग जो कभी नहीं बुझती। हज़ारों साल से नहीं बुझी। हर मुर्दा उसी आग से जलता है। राजा हो या भिखारी।"
अब तक नूर भी जाग चुकी थी। वो नीचे उतर आई थी और देव के बगल में बैठकर बुढ़िया की बातें सुन रही थी। देव ने उसे सब बता दिया था। चादर। दूसरा देव। परछाईं।
नूर ने कुछ नहीं कहा था। उसने बस फ़र्श पर देव के पैरों के पास देखा था, जहाँ परछाईं होनी चाहिए थी, और उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया था।
"आप लखनऊ क्यों गई थीं?" नूर ने बुढ़िया से पूछा।
"एक भतीजी की शादी थी।" कमला दादी ने कंधे उचकाए। "पर असल में मुझे वहाँ जाना था, बेटी। चार दिन पहले, रात को, आग से एक आवाज़ आई थी।"
"आग से?"
"मणिकर्णिका की आग बोलती है। जो सुनना जानता है, उससे बोलती है। मेरी दादी सुनती थीं। उनकी दादी सुनती थीं। अब मैं सुनती हूँ।" उसने अपनी आँखें बंद कीं। "चार दिन पहले आग ने कहा, 'उत्तर में किताब जाग रही है। उसका पढ़ने वाला आ रहा है। उसे घाट तक ले आओ।'"
देव और नूर ने एक-दूसरे को देखा।
चार दिन पहले। मिर्ज़ा साहब ने उसे चाबी दी थी, उससे भी एक दिन पहले।
"आपको पता था कि मैं इस ट्रेन में मिलूँगा?"
"नहीं, बाबू। मुझे सिर्फ़ इतना पता था कि आज की रात मुझे इस डिब्बे में होना है।" उसने अपना टिकट दिखाया। एस-सात। बर्थ ग्यारह। "मैंने ये टिकट नहीं लिया था। मेरे भतीजे ने लिया। और जब मैंने पूछा कि ये डिब्बा क्यों, तो उसने कहा कि यही बचा था।"
बारह और तेरह के बीच सिर्फ़ एक नंबर का फ़ासला।
"आपकी ख़ानदान वाली आग," देव ने धीरे से कहा, "क्या उसने कभी किसी किताब के बारे में बात की? एक फटे पन्ने के बारे में?"
कमला दादी ने अपनी आँखें खोलीं।
बहुत देर तक वो कुछ नहीं बोलीं। उनकी उँगलियाँ रुद्राक्ष पर रुक गईं।
"राख-घर," उन्होंने आखिरकार कहा। बहुत धीमे से। जैसे यह शब्द ज़ोर से बोलना मना हो।
"राख-घर?"
"मेरी दादी की दादी के ज़माने में, एक पंडित आए थे। सफ़ेद दाढ़ी वाले। माथे पर त्रिपुंड। उनके हाथ में एक पन्ना था। बस एक पन्ना। कपड़े में लिपटा हुआ।"
देव की साँस रुक गई। हरिनाथ सक्सेना।
"उन्होंने हमारे उस वक्त के मुखिया, भैरो डोम से कहा कि यह पन्ना वहाँ छुपाना है, जहाँ कोई इसे कभी न पढ़ सके। भैरो ने कहा, 'काशी में ऐसी जगह कहाँ है, पंडित जी? यहाँ तो हर पत्थर पर कुछ लिखा है।' तब पंडित ने कहा, 'चिता के नीचे। जहाँ आग हो। जहाँ हर रोज़ सैकड़ों लोग जलते हों। जहाँ इतनी आत्माएँ गुज़रती हों कि कोई एक आवाज़ सुनाई न दे।'"
"और भैरो डोम मान गए?"
"मान गए। पर एक शर्त पर।" कमला दादी ने देव की तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में कुछ था जिसने देव के पेट में ठंडक भर दी। "शर्त ये कि जिस दिन पंडित के ख़ानदान से कोई वो पन्ना लेने आएगा, उसे नीचे अकेले जाना होगा। और अगर वो वापस नहीं आया..."
"तो?"
"तो उसकी राख भी उसी आग में जाएगी। ताकि वो पन्ने के साथ हमेशा वहीं रहे। पहरेदार बनकर।"
ट्रेन ने एक लंबी सीटी मारी।
खिड़की के बाहर आसमान का रंग बदलने लगा था। काले से गहरा नीला। गहरे नीले से हल्का धूसर।
सुबह हो रही थी।
वाराणसी।
सुबह के साढ़े पाँच बजे शहर जाग रहा था। मंदिरों की घंटियाँ। गलियों में गाय। पान की दुकानों के शटर उठते हुए। और हर तरफ़ से आती एक गंध, जो फूलों की थी, धूप की थी, गंगा की थी।
और धुएँ की।
कमला दादी उन्हें गलियों से ले गईं। ऐसी गलियाँ जो इतनी तंग थीं कि दो लोग साथ नहीं चल सकते थे। ऐसी गलियाँ जो किसी नक्शे में नहीं थीं। जो मुड़ती थीं, फिर मुड़ती थीं, फिर ऐसी जगह खुलती थीं जहाँ अचानक सामने गंगा होती थी।
देव ने रास्ते भर अपने पैरों को देखा।
सुबह की धूप तिरछी पड़ रही थी। हर इंसान की, हर गाय की, हर खंभे की लंबी परछाईं गली की दीवारों पर पड़ रही थी।
उसकी नहीं।
एक चायवाले ने उसे देखा। फिर उसके पैरों के पास देखा। उसका चेहरा सख्त हो गया और उसने जल्दी से अपनी दुकान के अंदर रखी एक छोटी सी मूर्ति के सामने हाथ जोड़ लिए।
एक साधु ने उसे देखा और ज़मीन पर थूक दिया।
एक छोटा बच्चा उसे देखकर रोने लगा।
"काशी में लोग जानते हैं," कमला दादी ने बिना मुड़े कहा। "यहाँ मौत रोज़ की बात है, बाबू। लोग उसे पहचानते हैं।"
फिर गली ख़त्म हुई।
और सामने मणिकर्णिका थी।
देव ने इतिहास की किताबों में इस घाट के बारे में सैकड़ों बार पढ़ा था। उसने तस्वीरें देखी थीं। डॉक्यूमेंट्री देखी थीं।
कुछ भी उसे इसके लिए तैयार नहीं कर पाया था।
घाट की सीढ़ियाँ नदी तक उतरती थीं, और उन सीढ़ियों पर, चबूतरों पर, हर जगह चिताएँ जल रही थीं। दस। पंद्रह। बीस। कुछ अभी सजाई जा रही थीं, कुछ पूरे ज़ोर से जल रही थीं, कुछ बस राख और अंगारे बची थीं।
हवा में धुआँ था। इतना गाढ़ा कि सूरज की रोशनी उसमें नारंगी हो जाती थी। लकड़ी के ढेर। राम नाम सत्य है की आवाज़ें। रोते हुए परिवार। और बीच में, अपने काम में डूबे, लंबे बाँस लिए डोम, जो चिताओं को ठीक कर रहे थे, लकड़ियाँ खिसका रहे थे, इतनी सहजता से जैसे कोई रसोई में चूल्हा ठीक करता है।
और इन सबके बीच, ऊपर एक ऊँचे चबूतरे पर, एक छोटे से मंदिर जैसे ढाँचे के अंदर, एक आग जल रही थी।
बड़ी नहीं। बस एक मध्यम सी लौ। लेकिन उसमें कुछ अलग था। उसका रंग बाकी आग जैसा नारंगी नहीं था। वो लाल था। गहरा, लगभग काला लाल।
"वो है," कमला दादी ने कहा। उनकी आवाज़ में श्रद्धा थी। "अखंड आग। हज़ारों साल से।"
देव ने उस आग की तरफ़ देखा।
और उसे लगा कि आग ने उसकी तरफ़ देखा।
उसकी लौ झुकी। हवा नहीं चल रही थी। लेकिन लौ झुकी। देव की तरफ़। जैसे कोई सिर झुकाकर किसी को सलाम करता है।
या जैसे कोई कुत्ता किसी अजनबी को सूँघता है।
उसके बैग के अंदर, किताब एक बार ज़ोर से धड़की।
और बंद हो गई।
पूरी तरह। कोई धड़कन नहीं। जैसे वो डर गई हो। या जैसे वो साँस रोककर छुप गई हो।
"वो इस आग को जानती है," नूर ने फुसफुसाया।
"या आग उसे जानती है," देव ने कहा।
कमला दादी का भतीजा भीमा था। चालीस-पैंतालीस साल का। मज़बूत शरीर। धुएँ से काला पड़ा चेहरा। और आँखें, जो पत्थर की तरह सख्त थीं।
जब कमला दादी ने उसे बताया कि देव कौन है और क्यों आया है, तो भीमा ने बाँस ज़मीन पर पटक दिया।
"नहीं।"
"भीमा..."
"नहीं, बुआ।" उसने देव की तरफ़ देखा। फिर उसके पैरों की तरफ़। जहाँ परछाईं नहीं थी। उसके चेहरे पर एक पल के लिए डर आया, फिर ग़ुस्सा। "हमारे ख़ानदान में तीन लोग नीचे गए हैं। तीन। डेढ़ सौ साल में। जब-जब आग ने कहा कि नीचे कुछ गड़बड़ है। तीनों में से एक भी वापस नहीं आया।"
"ये पंडित हरिनाथ के ख़ानदान से है," कमला दादी ने कहा। "भैरो बाबा ने वचन दिया था।"
"भैरो बाबा को मरे एक सौ चालीस साल हो गए।" भीमा ने देव पर उँगली उठाई। "और यह आदमी आधा मरा हुआ है, बुआ। देखो इसे। इसकी परछाईं तक नहीं है। इसे नीचे भेजा, तो जो नीचे है वो सीधा इसे खा जाएगा। और फिर ऊपर आएगा। हमारे पास।"
"मेरे पिता नीचे हैं," देव ने कहा।
भीमा चुप हो गया।
"मेरे पिता पंद्रह साल से एक किताब के अंदर फँसे हैं। उन्होंने मुझसे कहा है कि उस फटे पन्ने में वो चीज़ है जो उन्हें बाहर निकाल सकती है। या फिर..." देव ने अपना बैग कसकर पकड़ा। "या फिर उस चीज़ को रोक सकती है जो इस किताब से बाहर आना चाहती है। लखनऊ में बच्चे नींद में गिनती कर रहे हैं, भीमा जी। उल्टी गिनती। अठहत्तर तक पहुँच चुकी है। जब शून्य आएगा, तो मुझे नहीं पता क्या होगा। लेकिन मुझे डर है कि सिर्फ़ लखनऊ नहीं बचेगा।"
भीमा बहुत देर तक उसे देखता रहा।
फिर उसने अखंड आग की तरफ़ देखा। जिसकी लौ अभी भी झुकी हुई थी। देव की तरफ़।
"आज रात," उसने आखिरकार कहा। "आधी रात के बाद। जब आखिरी चिता बुझ जाए और घाट खाली हो।" उसने देव के सीने पर अपनी उँगली रखी। "और अगर सुबह तक तुम ऊपर नहीं आए, बाबू, तो मैं अपने हाथों से तुम्हें इस आग में डालूँगा। चाहे तुम्हारा जो भी बचा हो।"
दिन लंबा था।
कमला दादी उन्हें घाट के पास अपने छोटे से घर में ले गईं। एक कमरा। मिट्टी का फ़र्श। दीवार पर शिव की एक पुरानी तस्वीर और उसके सामने जलता एक दीया।
नूर रजिस्टर पढ़ती रही। देव खिड़की के पास बैठकर गंगा को देखता रहा।
दोपहर के करीब तीन बजे थे, जब उसने उसे देखा।
नदी के उस पार। रेती पर। जहाँ गंगा के दूसरे किनारे पर रेत का एक लंबा, सुनसान मैदान फैला था, जहाँ कोई नहीं जाता था।
वहाँ कोई खड़ा था।
अकेला। बिल्कुल सीधा।
इतनी दूर से चेहरा नहीं दिख रहा था। लेकिन देव ने कपड़े पहचाने। वही कपड़े जो उसने पहने थे। वही चश्मा, जो धूप में चमक रहा था।
और उसके पैरों के पास, रेत पर, एक लंबी, काली परछाईं।
उसकी परछाईं।
दूसरा देव उसकी तरफ़ देख रहा था।
फिर उसने अपना हाथ उठाया।
और हिलाया।
धीरे-धीरे। बाएँ-दाएँ। जैसे कोई दूर खड़े दोस्त को बाय कहता है।
और फिर वो मुड़ा और रेती पर चलता हुआ दूर जाने लगा। उसकी परछाईं उसके पीछे-पीछे घिसटती रही।
लेकिन देव ने देखा कि वो परछाईं उसके चलने के साथ नहीं चल रही थी।
वो थोड़ी देर से चल रही थी।
जैसे वो उसके पीछे जाना नहीं चाहती हो।
जैसे वो मुड़कर देव की तरफ़ देख रही हो।
शाम छह बजे नूर का फ़ोन बजा।
वो एक अनजाना नंबर था। लखनऊ का।
नूर ने उठाया। "हैलो?"
देव ने देखा कि नूर का चेहरा बदलने लगा। पहले उलझन। फिर हैरानी। फिर डर। उसने फ़ोन स्पीकर पर डाल दिया।
"...दोबारा पूछ रहा हूँ, मिस अली। देव सक्सेना कहाँ है?"
इंस्पेक्टर तिवारी की आवाज़।
"मुझे... मुझे नहीं पता," नूर ने कहा। देव ने उसे इशारा किया था।
"मिस अली, मैं आपको कुछ बताता हूँ। फिर आप तय कीजिए कि आपको पता है या नहीं।" तिवारी की आवाज़ थकी हुई थी। सख्त। और उसके नीचे कुछ टूटा हुआ। "आज सुबह छह बजकर बीस मिनट पर, मिर्ज़ा अब्दुल हमीद बेग के घर के नौकर ने पुलिस को फ़ोन किया। मिर्ज़ा साहब अपनी लाइब्रेरी में मरे हुए मिले।"
नूर का हाथ अपने मुँह पर चला गया।
देव का पूरा शरीर सुन्न पड़ गया।
"उनकी आँखें," तिवारी ने कहा, और उसकी आवाज़ एक पल के लिए डगमगाई, "उनकी आँखें निकाल ली गई थीं। और उनकी जगह... उनकी जगह किसी ने स्याही भर दी थी।"
"हे भगवान," नूर ने फुसफुसाया।
"नौकर ने बताया कि सुबह छह बजे एक आदमी आया था। चश्मे वाला। दुबला। उसने कहा कि वो देव सक्सेना है, पुस्तकालय से। मिर्ज़ा साहब ने उसे खुद अंदर बुलाया। नौकर ने बताया कि मिर्ज़ा साहब उसे देखकर बहुत ख़ुश हुए थे। बोले थे, 'आ गए देव मियाँ, मैं रात भर तुम्हारा इंतज़ार कर रहा था।'"
सुबह छह बजे।
सुबह छह बजे देव वाराणसी की गलियों में था। कमला दादी के साथ। सैकड़ों लोगों ने उसे देखा था।
उसकी परछाईं के बिना।
"घर के गेट का कैमरा," तिवारी बोला, "उस आदमी को अंदर जाते दिखाता है। और बीस मिनट बाद बाहर आते। मिस अली, मैंने वो फुटेज देखा है। वो देव सक्सेना है। कोई शक नहीं।"
"इंस्पेक्टर साहब..."
"और इस बार," तिवारी ने उसकी बात काट दी, "इस बार उसकी परछाईं थी। साफ़। लंबी। सुबह की धूप में।"
सन्नाटा।
"मैं नहीं जानता यहाँ क्या हो रहा है, मिस अली," तिवारी ने कहा, और अब वो पुलिस वाला नहीं, एक डरा हुआ बाप लग रहा था। "पर मेरी बेटी कल रात फिर नींद में बोली। उसने कहा, 'पापा, चश्मे वाले अंकल अब दो हैं। एक के पास परछाईं है, एक के पास नहीं। और जिसके पास परछाईं है, वो बहुत भूखा है।'"
कॉल कट गई।
आधी रात।
मणिकर्णिका ख़ाली थी।
आखिरी चिता एक घंटे पहले बुझी थी। अब सिर्फ़ राख के ढेर थे, जिनमें कहीं-कहीं अंगारे अभी भी लाल चमक रहे थे। हवा में धुएँ की गंध। नदी की गंध। और बहुत दूर से आती किसी कुत्ते के रोने की आवाज़।
सिर्फ़ अखंड आग जल रही थी। गहरी लाल।
भीमा उन्हें घाट के सबसे पुराने चबूतरे तक ले गया। पत्थर का एक चौकोर मंच, जिसकी सतह इतनी जली हुई थी कि काली पड़ चुकी थी। सदियों की आग ने उसे काला कर दिया था।
भीमा ने अपने बाँस से उसकी एक कोने वाली पत्थर की पटिया पर तीन बार ठोका।
ठक। ठक। ठक।
कुछ नहीं हुआ।
फिर उसने अखंड आग की तरफ़ देखा और कुछ बुदबुदाया। ऐसी भाषा में, जो देव ने पहले कभी नहीं सुनी थी।
आग की लौ ऊपर उठी। फिर झुकी। चबूतरे की तरफ़।
और पत्थर की पटिया अपने आप खिसक गई।
नीचे सीढ़ियाँ थीं।
पत्थर की नहीं। राख की।
संकरी, गहरी, अँधेरे में उतरती सीढ़ियाँ, जो पूरी तरह राख से बनी लगती थीं। सलेटी, नर्म, सदियों से दबी हुई राख। और उनसे एक गर्म हवा ऊपर आ रही थी। जैसे नीचे कोई बहुत बड़ा जानवर साँस ले रहा हो।
"मैं भी चलूँगी," नूर ने कहा।
"नहीं," भीमा ने कहा। "वचन था। सिर्फ़ पंडित के ख़ानदान वाला।"
"नूर," देव ने उसका हाथ पकड़ा। "अगर मैं सुबह तक वापस नहीं आया..."
"चुप रहो।" नूर की आँखों में आँसू थे। "तुम वापस आओगे।"
कमला दादी आगे आईं। उन्होंने देव के माथे पर अखंड आग की राख से तीन लकीरें खींचीं।
"नीचे जो भी मिले, बाबू," उन्होंने कहा, "उसका नाम मत पूछना। और अपना नाम मत बताना। वहाँ नाम ही सब कुछ है।"
देव ने सिर हिलाया।
उसने बैग अपने कंधे पर ठीक किया। टॉर्च जलाई।
और पहली सीढ़ी पर पैर रखा।
राख उसके पैर के नीचे दब गई। नर्म। गर्म। जैसे किसी जानवर की खाल।
दूसरी सीढ़ी। तीसरी।
ऊपर की रोशनी छोटी होती गई। नूर का चेहरा। कमला दादी की राख वाली आँखें। भीमा का सख्त चेहरा।
फिर वो चौकोर रोशनी बस एक छोटा सा तारा बनकर रह गई।
और फिर देव अँधेरे में था।
सीढ़ियाँ ख़त्म नहीं हो रही थीं। वो उतरता गया। उतरता गया। पचास सीढ़ियाँ। सौ। उसने गिनना छोड़ दिया।
हवा गर्म होती गई। राख की गंध गाढ़ी होती गई।
और फिर, आखिरकार, उसके पैर समतल ज़मीन पर पड़े।
उसने टॉर्च सामने की तरफ़ घुमाई।
एक दरवाज़ा था।
लकड़ी का। बहुत पुराना। काला पड़ चुका। उस पर लोहे की पट्टियाँ। और बीच में, लकड़ी में खुदे हुए अक्षर। देवनागरी में।
देव ने उन्हें पढ़ा।
और उसका दिल रुक गया।
"स्वागत है, देव सक्सेना।
तुम पहले भी यहाँ आ चुके हो।"
पहले भी?
वो कभी काशी नहीं आया था। कभी नहीं। चौंतीस साल में एक बार भी नहीं।
उसने टॉर्च नीचे की।
और दरवाज़े के सामने, राख की नर्म ज़मीन पर, उसने पैरों के निशान देखे।
ताज़ा। बिल्कुल ताज़ा। राख अभी भी उनके किनारों से गिर रही थी।
जूतों के निशान।
उसने अपने पैर उठाकर अपने जूते का तला देखा। फिर उन निशानों को।
एक जैसे। हू-ब-हू। वही ब्रांड का निशान। वही बाएँ जूते की एड़ी पर घिसा हुआ हिस्सा।
निशान दरवाज़े तक जाते थे।
और अंदर।
दरवाज़ा थोड़ा सा खुला था।
और अंदर से, बहुत हल्की, बहुत धीमी, एक आवाज़ आ रही थी।
देव की अपनी आवाज़।
गिनती करती हुई।
"सतहत्तर।"
"छिहत्तर।"
"पचहत्तर..."
दूसरा देव उससे पहले यहाँ पहुँच चुका था।
(भाग 6 समाप्त)

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काली किताब का आखिरी जिन्न
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