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भाग 7: राख-घर

TheHauntedWriter · Jinn & Spirits · 15 मिनट

"चौहत्तर।"
"तिहत्तर।"
देव ने दरवाज़े को धकेला।
वो बिना आवाज़ के खुला। जैसे उसके कब्ज़ों में तेल नहीं, राख भरी हो।
अंदर की हवा इतनी गर्म थी कि देव की आँखों में पानी आ गया। और गंध... जली हुई लकड़ी, जला हुआ घी, जले हुए फूल। और उन सबके नीचे, वो गंध जिसे वो पहचानना नहीं चाहता था, लेकिन जो दिन भर घाट पर उसकी साँसों में भरती रही थी।
जला हुआ इंसानी माँस।
उसने टॉर्च उठाई।
और जो उसने देखा, उसने उसके पैरों को वहीं जमा दिया।
एक पुस्तकालय।
लेकिन ऐसा पुस्तकालय, जिसकी कल्पना किसी इंसान के दिमाग़ ने नहीं की होगी।
अलमारियाँ। इतनी ऊँची कि टॉर्च की रोशनी उनके सिरे तक नहीं पहुँचती थी। इतनी लंबी कि वो अँधेरे में खो जाती थीं। एक के बाद एक। कतार दर कतार। जैसे कोई जंगल हो, जिसके पेड़ लकड़ी के नहीं, किताबों के बने हों।
और हर अलमारी में किताबें थीं।
सलेटी। धूसर। पूरी तरह राख की बनी हुई।
देव पास गया। एक किताब के पास टॉर्च ले गया। उसकी जिल्द राख की थी, लेकिन उसमें एक आकार था, एक ठोसपन, जैसे किसी ने राख को दबाकर, गूँथकर, किताब बना दिया हो। उस पर कोई नाम नहीं था। कोई शीर्षक नहीं।
उसने अपना हाथ बढ़ाया।
फिर रुक गया।
कमला दादी ने कुछ नहीं कहा था किताबें छूने के बारे में। लेकिन देव को कुछ महसूस हो रहा था। उस किताब से। एक हल्का सा कंपन। एक गुनगुनाहट।
उसने अपना कान उसके पास लगाया।
और उसने सुना।
एक औरत की आवाज़। बहुत हल्की। बहुत धीमी। जैसे बहुत दूर से आ रही हो।
"...मुन्नी को बोलना, अचार वाला डिब्बा ऊपर वाली अलमारी में है... और उसके बापू को बोलना कि मैं नाराज़ नहीं थी... कभी नहीं थी..."
देव पीछे हट गया।
उसने दूसरी किताब के पास कान लगाया।
एक बूढ़े आदमी की आवाज़। "...मैंने वो ज़मीन बेच दी थी... किसी को नहीं बताया... रामू को माफ़ कर देना..."
तीसरी। एक बच्चे की। "...माँ, अँधेरा है... माँ, कहाँ हो..."
देव ने अपने कान बंद कर लिए।
उसे समझ आ गया था।
हर वो इंसान जो पिछले हज़ारों सालों में मणिकर्णिका पर जला था, उसका आखिरी विचार, आखिरी अनकही बात, जो उसके होंठों तक आई थी पर बाहर नहीं निकल पाई थी, वो यहाँ थी। राख बनकर। किताब बनकर।
करोड़ों अनकही बातें।
करोड़ों आखिरी शब्द।
और वो सब, एक साथ, बहुत धीमे से, फुसफुसा रहे थे। देव ने अब तक ध्यान नहीं दिया था, लेकिन अब, जब उसने सुन लिया था, वो उसे हर तरफ़ से सुनाई दे रही थीं। एक अंतहीन, धीमी, अनगिनत आवाज़ों की लहर।
चिता के नीचे। जहाँ इतनी आत्माएँ गुज़रती हों कि कोई एक आवाज़ सुनाई न दे।
पंडित हरिनाथ ने यह जगह इसीलिए चुनी थी।
इतनी आवाज़ों के बीच, एक पन्ने की आवाज़ कोई नहीं सुन सकता था।
"बहत्तर।"
लेकिन उस एक आवाज़ को देव सुन सकता था। क्योंकि वो उसकी अपनी थी।
वो उसकी तरफ़ बढ़ा।
अलमारियों के बीच के गलियारे भूल-भुलैया जैसे थे। देव जिधर मुड़ता, वहाँ नया गलियारा होता। हर गलियारा एक जैसा। राख की किताबें। अँधेरा। गर्मी।
वो अपने पैरों के निशानों को देखकर चल रहा था। दूसरे देव के निशान। ज़मीन की राख पर साफ़ छपे हुए।
एक मोड़। दूसरा। तीसरा।
और फिर वो रुक गया।
क्योंकि गलियारे के बीच में कोई खड़ा था।
देव की टॉर्च की रोशनी उस पर पड़ी।
एक आदमी। लंबा। मज़बूत कद-काठी। धोती पहने। हाथ में एक लंबा बाँस। बिल्कुल वैसा ही जैसा भीमा के पास था।
लेकिन उसका शरीर राख का बना था।
सिर से पैर तक। सलेटी। उसकी त्वचा पर दरारें थीं, जिनमें से अंगारों की हल्की लाल चमक बाहर आ रही थी। जैसे उसके अंदर अभी भी आग सुलग रही हो।
और उसका चेहरा...
चेहरे पर कोई भाव नहीं था। आँखों की जगह दो गड्ढे, जिनमें अंगारे सुलग रहे थे।
हमारे ख़ानदान में तीन लोग नीचे गए हैं। तीनों में से एक भी वापस नहीं आया।
राख का आदमी धीरे-धीरे उसकी तरफ़ मुड़ा।
उसके होंठ हिले। उनसे राख झड़ी।
"नाम?"
आवाज़ ऐसी थी जैसे सूखी लकड़ी चटक रही हो।
देव ने अपने होंठ भींच लिए।
उसका नाम मत पूछना। और अपना नाम मत बताना।
"नाम?" राख वाले ने फिर पूछा। एक कदम आगे बढ़ा। उसके पैर के नीचे की राख नहीं दबी। जैसे उसका कोई वज़न ही न हो।
देव ने कुछ नहीं कहा।
राख वाला उसके बिल्कुल पास आ गया। इतने पास कि देव को उसके अंदर सुलगते अंगारों की गर्मी अपने चेहरे पर महसूस हो रही थी। उसने अपना सिर झुकाया। देव के चेहरे के पास। जैसे उसे सूँघ रहा हो।
फिर उसने अपना सिर उसके माथे की तरफ़ घुमाया। जहाँ कमला दादी ने अखंड आग की राख से तीन लकीरें खींची थीं।
अंगारे वाली आँखें एक पल के लिए चमकीं।
और राख वाला पीछे हट गया। उसने अपना बाँस ज़मीन पर ठोका। एक बार। और एक तरफ़ हट गया।
रास्ता दे दिया।
देव उसके पास से गुज़रा। उसकी पीठ में ठंडक दौड़ रही थी, गर्मी के बावजूद। उसे लग रहा था कि राख वाला अभी भी उसे देख रहा है।
वो दस कदम आगे गया।
फिर उसके पीछे से एक आवाज़ आई।
राख वाले की आवाज़ नहीं।
एक औरत की। नरम। प्यार भरी। जानी-पहचानी।
"देवू?"
देव के कदम रुक गए।
माँ।
माँ की आवाज़। ठीक वैसी, जैसी वो फ़ोन पर बोलती थीं, जब वो कई दिनों तक कानपुर फ़ोन नहीं करता था। थोड़ी शिकायत, थोड़ा प्यार।
"देवू, बेटा, तुम यहाँ क्या कर रहे हो? चलो घर चलो। मैंने तुम्हारे लिए आलू के पराँठे बनाए हैं।"
देव का गला भर आया।
उसके होंठ खुले। "माँ" शब्द उसकी ज़ुबान की नोक पर था।
उसका नाम मत पूछना। और अपना नाम मत बताना। वहाँ नाम ही सब कुछ है।
अगर वो पलटकर "माँ" कहता, तो वो जवाब होता। वो स्वीकार होता कि वो "देवू" है।
उसने अपनी मुट्ठियाँ भींच लीं। इतनी ज़ोर से कि उसके नाखून हथेलियों में गड़ गए।
"देवू? सुन रहे हो? माँ से भी नाराज़ हो?"
वो आगे बढ़ा।
बिना मुड़े।
"देवू!"
आवाज़ अब तेज़ थी। चिढ़ी हुई।
"देवू!!"
अब चीख। गुस्से भरी।
"देव सक्सेना!!!"
और अब वो आवाज़ माँ की नहीं थी। वो राख की चटकती लकड़ी जैसी थी। सैकड़ों आवाज़ें। ग़ुस्से से भरी। भूखी।
देव भागने लगा।
उसके पीछे राख उड़ने लगी। एक तूफ़ान की तरह। अलमारियों से किताबें गिरने लगीं। ज़मीन पर गिरते ही वो बिखर जाती थीं, और उनसे आवाज़ें निकलती थीं। चीखें। रोना। आखिरी शब्द।
देव भागता रहा। अपने पैरों के निशानों के पीछे।
"इकहत्तर।"
आवाज़ पास थी। बहुत पास।
वो एक आखिरी मोड़ पर मुड़ा।
और अचानक गलियारा ख़त्म हो गया।
वो एक गोल कमरे में खड़ा था।
अलमारियाँ यहाँ भी थीं, दीवारों के साथ, एक घेरे में। लेकिन कमरे का बीच का हिस्सा ख़ाली था।
सिवाय एक चीज़ के।
बीचोंबीच, पत्थर के एक चबूतरे पर, एक कटोरा रखा था। काँसे का। बड़ा। और उसमें आग जल रही थी।
वही गहरी, काली-लाल आग, जो ऊपर अखंड आग में थी।
और उस आग के बीच में, लौ के अंदर, हवा में तैरता हुआ, एक पन्ना था।
पीला। पुराना। उसका एक किनारा सीधा, जैसे किसी जिल्द से फाड़ा गया हो। बाकी तीन किनारे घिसे हुए।
आग उसके चारों तरफ़ लिपटी थी। लेकिन उसे जला नहीं रही थी। वो उसे थामे हुए थी। जैसे कोई माँ अपने बच्चे को गोद में थामती है।
फटा हुआ पन्ना।
सौवाँ पन्ना।
और उसके सामने, चबूतरे के पास, पीठ देव की तरफ़ करके, कोई खड़ा था।
देव के कपड़ों में।
उसकी परछाईं, पीछे की दीवार पर, आग की रोशनी में काँपती हुई, बहुत लंबी।
"सत्तर," दूसरे देव ने कहा।
और मुड़ा।
उसे अपना चेहरा इस तरह देखना, किसी आईने में नहीं, किसी फ़ोटो में नहीं, बल्कि सामने, ज़िंदा, साँस लेते हुए, देव के लिए ऐसा था जैसे कोई उसकी छाती में हाथ डालकर उसका दिल पकड़ ले।
वो चेहरा उसका था। हर लकीर। हर निशान।
लेकिन उसमें कुछ ऐसा था जो देव के चेहरे में कभी नहीं था।
यकीन।
एक गहरा, ठंडा, बेपरवाह यकीन। जैसे इस चेहरे के मालिक ने कभी डर महसूस नहीं किया हो। कभी शक नहीं किया हो। कभी रात को जागकर ये न सोचा हो कि उसकी ज़िंदगी में कुछ मायने भी है या नहीं।
"आ गए," दूसरे देव ने मुस्कुराते हुए कहा। इस बार वो चौड़ी, डरावनी मुस्कान नहीं थी। बस एक आम मुस्कान। देव की मुस्कान। और यही सबसे डरावना था। "मुझे पता था तुम आओगे। तुम हमेशा आते हो।"
"मिर्ज़ा साहब," देव ने कहा। उसकी आवाज़ ग़ुस्से से काँप रही थी। "तुमने मिर्ज़ा साहब को मारा।"
दूसरे देव ने कंधे उचकाए। "उनके वालिद ने किताब को आँखें दी थीं। मैंने बस बाकी हिसाब पूरा किया। आँखें हमेशा जोड़े में अच्छी लगती हैं।"
"तुम..."
"मैं क्या?" दूसरा देव एक कदम आगे आया। "राक्षस? शैतान? जिन्न?" वो हँसा। "मैं तुम हूँ, देव। तुम्हारा वो हिस्सा, जो तुम्हें हमेशा से था, लेकिन तुम मानने से डरते थे। वो हिस्सा जो मिर्ज़ा साहब पर ग़ुस्सा था, क्योंकि उन्होंने पंद्रह साल तक तुम्हारे पिता का खत छुपाकर रखा। वो हिस्सा जो रहमत अली से चिढ़ता था, क्योंकि उनके ख़ानदान ने डेढ़ सौ साल तक वो सच छुपाया जो तुम्हारे पिता को बचा सकता था। वो हिस्सा जो पूरी दुनिया से नाराज़ है, क्योंकि जिस सुबह तुम चाय लेकर उस कमरे में गए थे, उस सुबह किसी ने तुम्हें नहीं बचाया।"
हर शब्द एक सुई की तरह देव के अंदर उतर रहा था।
क्योंकि हर शब्द सच था।
"तुमने इनकार किया, और किताब ने वो हिस्सा तुमसे अलग कर दिया," दूसरे देव ने कहा। "अब मैं वो सब कर सकता हूँ, जो तुम कभी नहीं कर पाए। बिना डर के। बिना शर्म के। बिना 'लेकिन' और 'शायद' के।"
"तो फिर," देव ने पन्ने की तरफ़ इशारा किया, "तुम उसे ले क्यों नहीं लेते? तुम मुझसे पहले यहाँ पहुँच गए थे। वो तुम्हारे सामने है।"
दूसरे देव की मुस्कान थोड़ी फीकी पड़ी।
उसने अपना दाहिना हाथ उठाया। और देव ने देखा।
उसकी उँगलियाँ जली हुई थीं।
बुरी तरह। काली। छाले पड़े हुए। कुछ जगह से त्वचा उतर चुकी थी।
"आग मुझे पहचानती नहीं," दूसरे देव ने धीमे से कहा। "मैं अधूरा हूँ। सिर्फ़ इनकार से बना। किताब को दिया गया नाम मेरे पास है, मालिक का नाम, लेकिन किताब का पढ़ने वाला... वो तुम हो। स्याही तुम्हारी उँगलियों में है। मेरी में नहीं।"
उसने देव की स्याही से सनी उँगलियों की तरफ़ देखा। भूख से।
"पन्ना सिर्फ़ उसे उठाने देगा, जो पूरा हो। पढ़ने वाला भी, और मालिक भी।" उसने अपना जला हुआ हाथ देव की तरफ़ बढ़ाया। "हम दोनों को एक होना होगा, देव। जैसे पहले थे। फिर हम पन्ना उठाएँगे। फिर हम सौवाँ नाम पढ़ेंगे। और फिर..."
"और फिर क्या?"
"और फिर पापा घर आ जाएँगे।"
देव ने उस जले हुए हाथ को देखा।
उसके पीछे पन्ना आग में तैर रहा था।
उसके अंदर एक हिस्सा, एक बहुत छोटा, बहुत थका हुआ हिस्सा, उस हाथ को पकड़ना चाहता था। बस पकड़ लेना चाहता था। ताकि यह सब ख़त्म हो जाए। ताकि डर ख़त्म हो जाए। ताकि कोई और फ़ैसला न लेना पड़े।
"तुम्हें पता है," देव ने धीरे से कहा, "रहमत चाचा ने मुझसे क्या कहा था? किताब सच नहीं बोलती। वो बस वो बोलती है, जो तुम सुनना चाहते हो।"
दूसरे देव का हाथ हवा में रुक गया।
"तुम कह रहे हो पापा घर आ जाएँगे," देव ने कहा। "क्योंकि मैं यही सुनना चाहता हूँ। पंद्रह साल से यही सुनना चाहता हूँ।" उसने गहरी साँस ली। "इसलिए मुझे पता है कि यह झूठ है।"
दूसरे देव का चेहरा बदल गया।
यकीन गायब हो गया। उसकी जगह कुछ और आया। कुछ भूखा। कुछ ठंडा।
"ठीक है," उसने कहा। "तो फिर मुश्किल तरीक़े से।"
उसने छलाँग लगाई।
देव पर नहीं।
पन्ने पर।
आग में अपना जला हुआ हाथ डालते हुए, चीखते हुए, उसका हाथ फिर से जलता हुआ, उसकी उँगलियाँ पन्ने के एक कोने की तरफ़ बढ़ती हुई।
देव ने बिना सोचे अपना हाथ भी आग में डाल दिया।
उसे दर्द की उम्मीद थी।
दर्द नहीं हुआ।
आग उसके हाथ के चारों तरफ़ लिपटी, जैसे किसी पुराने दोस्त से मिल रही हो। गर्म थी। बहुत गर्म। लेकिन जला नहीं रही थी। उसकी स्याही वाली उँगलियाँ चमकने लगीं। काली रोशनी से।
और उसकी उँगलियों ने पन्ने के दूसरे कोने को छुआ।
दोनों ने एक ही पल में पन्ना पकड़ा।
एक तरफ़ से देव। दूसरी तरफ़ से दूसरा देव।
और फिर एक आवाज़ आई।
चर्र्र्र्र्र।
कागज़ फटने की आवाज़।
पन्ना बीच से फट गया।
ऊपर से नीचे तक। एक टेढ़ी-मेढ़ी लकीर में।
देव पीछे की तरफ़ गिरा। उसके हाथ में पन्ने का आधा हिस्सा था। दूसरा देव भी पीछे गिरा। उसके जले हुए, धुआँ उगलते हाथ में दूसरा आधा।
कमरे में एक पल के लिए पूरा सन्नाटा छा गया।
राख की करोड़ों किताबों की फुसफुसाहट रुक गई।
आग का कटोरा बुझ गया।
और फिर, पूरा राख-घर काँपने लगा।
अलमारियाँ हिलने लगीं। किताबें गिरने लगीं। राख बारिश की तरह ऊपर से बरसने लगी। और हर गिरती किताब से एक चीख निकल रही थी।
देव अपने पैरों पर खड़ा हुआ। उसने आधे पन्ने को अपनी छाती से चिपका लिया।
दूसरा देव भी खड़ा था। कमरे के उस पार। उसका जला हुआ हाथ अपने आधे पन्ने को पकड़े हुए।
उसने देव की तरफ़ देखा।
और मुस्कुराया।
"अब हम दोनों के पास आधा-आधा है," उसने कहा। राख के तूफ़ान के बीच उसकी आवाज़ बिल्कुल साफ़ सुनाई दी। "अब हमें एक-दूसरे की ज़रूरत है, देव। चाहे तुम चाहो या न चाहो।"
और वो पीछे की तरफ़ मुड़ा, अलमारियों के बीच के एक अँधेरे गलियारे में।
और गायब हो गया।
उसकी परछाईं, दीवार पर, एक पल के लिए पीछे रह गई। देव की तरफ़ मुड़ी। जैसे कुछ कहना चाहती हो।
फिर वो भी अँधेरे में खिंच गई।
देव भागा।
उसे नहीं पता था किस तरफ़। राख इतनी घनी थी कि टॉर्च की रोशनी दो फ़ुट से आगे नहीं जा रही थी। हर तरफ़ से चीखें आ रही थीं। अलमारियाँ गिर रही थीं।
वो एक गलियारे में मुड़ा।
और वहाँ वो तीनों खड़े थे।
तीन राख वाले आदमी। बाँस लिए। अंगारे वाली आँखें। रास्ता रोके हुए।
"नाम," तीनों ने एक साथ कहा।
देव पीछे हटा।
उसके पीछे भी एक खड़ा था। चौथा।
नहीं। चौथा नहीं था। भीमा ने तीन बताए थे।
यह वाला अलग था। बाकी तीन से बूढ़ा। झुका हुआ। उसकी राख इतनी पुरानी थी कि वो लगभग सफ़ेद हो चुकी थी। और उसकी आँखों में अंगारे नहीं थे।
उसकी आँखों में ठंडी, शांत, नीली रोशनी थी।
बूढ़े राख वाले ने देव को देखा। फिर उसके हाथ में पकड़े आधे पन्ने को।
फिर उसने बाकी तीनों की तरफ़ देखा।
और अपना बाँस ज़मीन पर ठोका।
एक बार।
तीनों राख वाले, एक साथ, घुटनों के बल बैठ गए। सिर झुकाकर।
बूढ़े राख वाले ने देव की तरफ़ मुड़कर एक गलियारे की तरफ़ इशारा किया।
देव ने समझ लिया। "आप..." उसने शुरू किया।
बूढ़े ने अपनी राख वाली उँगली अपने होंठों पर रख दी।
नाम मत पूछो।
लेकिन उसकी आँखें मुस्कुरा रही थीं।
और जब देव उसके पास से गुज़रा, तो बूढ़े ने बहुत धीमे से, सूखी लकड़ी जैसी आवाज़ में, सिर्फ़ इतना कहा:
"वचन पूरा हुआ, पंडित जी।"
देव रुक गया। "मैं पंडित नहीं हूँ।"
बूढ़े राख वाले ने उसे देखा। बहुत देर तक। फिर उसने सिर हिलाया। धीरे से। जैसे वो कुछ जानता हो जो देव नहीं जानता।
"तुम्हारी लिखावट नहीं बदली।"
और वो राख में बिखर गया।
देव सीढ़ियाँ चढ़ रहा था।
राख की सीढ़ियाँ अब उसके पैरों के नीचे ढह रही थीं। हर कदम के साथ वो धँसता जा रहा था। लेकिन वो चढ़ता रहा। चढ़ता रहा।
ऊपर रोशनी दिखी। एक छोटा सा चौकोर तारा।
नीला। सुबह का नीला।
वो आखिरी कुछ सीढ़ियाँ रेंगते हुए चढ़ा।
और बाहर निकला।
ठंडी हवा। गंगा की गंध। सुबह की पहली किरणें।
वो चबूतरे पर गिर पड़ा। राख से पूरी तरह ढका हुआ। हाँफता हुआ। उसके हाथ में अभी भी वो आधा पन्ना था।
"देव!"
नूर दौड़ती हुई आई। उसने उसे पकड़ा, उसके चेहरे से राख पोंछी। वो रो रही थी।
कमला दादी ने अपनी माला पकड़ी और आँखें बंद कर लीं।
और भीमा।
भीमा उसके सामने खड़ा था। हाथ में बाँस। चेहरा पत्थर।
"सुबह हो गई, बाबू," उसने कहा। "और तुम लौट आए।" उसने अखंड आग की तरफ़ देखा। "लेकिन मैंने कहा था, जो भी बचा हो..."
वो रुक गया।
उसकी आँखें देव के पैरों के पास गईं।
और भीमा का चेहरा, जो अब तक पत्थर जैसा सख्त था, पूरी तरह सफ़ेद पड़ गया।
उसके हाथ से बाँस छूट गया।
"बुआ," उसने फुसफुसाया। "देखो।"
कमला दादी ने आँखें खोलीं। और देखा।
नूर ने देखा।
और फिर देव ने नीचे देखा।
सुबह का सूरज, गंगा के उस पार, रेती के ऊपर से निकल रहा था। उसकी तिरछी किरणें घाट पर पड़ रही थीं। हर चीज़ की लंबी परछाईं बन रही थी।
और देव की भी।
उसकी परछाईं लौट आई थी।
लंबी। काली। चबूतरे पर फैली हुई।
लेकिन वो उसकी नहीं थी।
देव दुबला था। सीधे बाल। कोई दाढ़ी नहीं।
ज़मीन पर जो परछाईं थी, वो एक बूढ़े आदमी की थी।
थोड़ा झुका हुआ शरीर। सिर पर शिखा। और ठोड़ी से नीचे छाती तक लटकती, एक लंबी, घनी दाढ़ी।
देव ने अपना हाथ उठाया।
परछाईं ने भी हाथ उठाया।
लेकिन परछाईं के हाथ में कुछ था, जो देव के हाथ में नहीं था।
एक कलम।
और उस परछाईं का सिर, धीरे-धीरे, बहुत धीरे, घूमा।
देव की तरफ़ नहीं।
ऊपर। देव के चेहरे की तरफ़।
जैसे परछाईं उसे देख रही हो।
जैसे उसे सब याद हो।
कमला दादी ने काँपते हाथों से अपनी माला भींची और वो नाम फुसफुसाया जो उनके ख़ानदान ने एक सौ पैंतालीस साल से संभालकर रखा था।
"पंडित हरिनाथ..."
(भाग 7 समाप्त)

Writer
TheHauntedWriter
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काली किताब का आखिरी जिन्न
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Jinn & Spirits
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15 min
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2881
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