Pretika › Real Experiences › भानपुरा की बावड़ी - चालीस सीढ़ियाँ
भाग 1 — पहली सीढ़ी
Piyashi Atma · Real Experiences · 27 मिनट
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- भानपुरा की बावड़ी - चालीस सीढ़ियाँ
- Chapter
- 1 of 31
- Category
- Real Experiences
- Reading time
- 27 min
- Words
- 5359
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
कुछ जगहें ऐसी होती हैं जिन्हें आपको याद नहीं रखना पड़ता।
वो ख़ुद आपको याद रखती हैं।
आप शहर बदल लीजिए, नाम बदल लीजिए, सत्रह साल तक उस गाँव की तरफ़ मुँह भी मत कीजिए... फिर भी किसी रात, बिना किसी वजह के, आपकी नींद टूटेगी और आपको लगेगा कि कहीं बहुत दूर, किसी अँधेरे में, कोई धीरे-धीरे आपका नाम गिन रहा है।
मेरा नाम विक्रम है। उम्र उनतीस साल। दिल्ली में फ़ोटोग्राफ़र हूँ — शादियाँ, प्रोडक्ट शूट, कभी-कभी किसी मैगज़ीन के लिए पुरानी इमारतें। कैमरे के पीछे खड़े रहने की आदत है मुझे। कैमरा एक दीवार की तरह होता है — आप दुनिया को देखते हैं, पर दुनिया आपको नहीं देखती।
उस रात के बाद मुझे पता चला कि ये बात कितनी ग़लत है।
फ़ोन रात के दो बजकर सैंतालीस मिनट पर आया था।
मुझे वक़्त इसलिए याद है क्योंकि स्क्रीन की रोशनी से आँखें चौंधिया गई थीं और मैंने सबसे पहले घड़ी ही देखी थी। नंबर अनजाना नहीं था — "रघु चाचा"। पर रघु चाचा ने मुझे आख़िरी बार फ़ोन पाँच साल पहले किया था, जब चाची के ऑपरेशन के लिए पैसे चाहिए थे।
"हैलो?"
दूसरी तरफ़ से कुछ देर तक कोई आवाज़ नहीं आई। सिर्फ़ एक अजीब-सी सरसराहट... जैसे कोई बहुत दूर, किसी गहरे कुएँ के पास खड़ा होकर बोल रहा हो। फिर चाचा की आवाज़ आई, भारी और टूटी हुई।
"विक्की... बाबूजी नहीं रहे।"
दादाजी।
मैं बिस्तर पर उठकर बैठ गया। अजीब बात ये थी कि मुझे दुख से पहले कुछ और महसूस हुआ था। एक ठंडक। जैसे किसी ने गर्दन के पीछे गीला हाथ रख दिया हो।
"कब? कैसे?"
"आज सुबह... मतलब कल सुबह। पता नहीं, बेटा। दिल का दौरा होगा। तू... तू आ सकता है?"
"हाँ, हाँ, मैं निकलता हूँ। अंतिम संस्कार कब है?"
फिर वही चुप्पी। वही सरसराहट।
"वो... हो गया। आज शाम ही कर दिया।"
"शाम को ही? चाचा, मेरा इंतज़ार तो कर लेते—"
"रुक नहीं सकते थे, विक्की।" उनकी आवाज़ अचानक बहुत धीमी हो गई, जैसे वो नहीं चाहते हों कि कोई और सुन ले। "गाँव वाले नहीं माने। बाबूजी को जिस हालत में मिले थे... उस हालत में उन्हें रात भर घर में नहीं रख सकते थे।"
"किस हालत में?"
लाइन कट गई।
मैंने वापस फ़ोन किया। "आपके द्वारा डायल किया गया नंबर अभी पहुँच से बाहर है।" तीन बार। चार बार।
मैं उस रात सो नहीं पाया। पूरी रात मैं अँधेरे कमरे में बैठा रहा और एक बात सोचता रहा जो मैंने सत्रह साल से नहीं सोची थी।
भानपुरा की बावड़ी।
भानपुरा बुंदेलखंड के उस हिस्से में है जहाँ सड़कें नक़्शे पर तो दिखती हैं, ज़मीन पर नहीं। दिल्ली से झाँसी तक ट्रेन, झाँसी से एक खटारा बस जो हर गड्ढे में ऐसे गिरती है जैसे उसने ज़िंदगी से हार मान ली हो, और फिर आख़िरी बाईस किलोमीटर — एक टेम्पो, अगर क़िस्मत अच्छी हो।
मैं बारह साल की उम्र में आख़िरी बार वहाँ गया था।
उस गर्मी के बारे में मुझे बहुत कम याद है। डॉक्टर कहते हैं कि कभी-कभी दिमाग़ कुछ चीज़ों को ख़ुद ही मिटा देता है, बचाने के लिए। मुझे बस इतना याद है कि मैं और मेरा ममेरा भाई छोटू — असली नाम कन्हैया — पूरी गर्मी साथ खेलते थे। आम के बाग़ में, तालाब के किनारे, और... कहीं और भी। किसी ऐसी जगह जहाँ जाने को मना किया गया था।
और फिर एक दिन छोटू नहीं मिला।
पुलिस आई थी। पूरे गाँव ने खेत, कुएँ, तालाब, जंगल — सब छान मारा। छोटू कभी नहीं मिला। और मुझे बुख़ार हो गया था — इतना तेज़ कि तीन दिन तक मैं होश में नहीं आया। जब आँख खुली तो मैं झाँसी के अस्पताल में था, और मम्मी रो रही थीं, और पापा ने फ़ैसला सुना दिया था कि अब हम कभी भानपुरा नहीं जाएँगे।
मुझे सिर्फ़ एक चीज़ याद है उस बुख़ार से। एक आवाज़। बहुत धीमी, बहुत गीली, जैसे पानी के अंदर से कोई बोल रहा हो।
"...सत्रह... अठारह... उन्नीस..."
झाँसी से बस पकड़ते-पकड़ते दोपहर हो गई और भानपुरा वाले मोड़ पर पहुँचते-पहुँचते सूरज पेड़ों के पीछे उतरने लगा था। मोड़ पर एक चाय की टपरी थी, और उसके बगल में एक पीला टेम्पो खड़ा था जिसके पीछे लिखा था — "बुरी नज़र वाले तेरा मुँह काला"।
"भानपुरा चलोगे?"
टेम्पो वाला पैंतालीस-पचास साल का आदमी था, पान से लाल दाँत, आँखों में एक ऐसी थकान जो सिर्फ़ नींद की कमी से नहीं आती। उसने मुझे ऊपर से नीचे तक देखा — मेरा बैग, मेरा कैमरा, मेरे शहरी जूते।
"भानपुरा में किसके यहाँ?"
"पंडित रामेश्वर जी के यहाँ। मैं उनका पोता हूँ।"
उसके चेहरे का रंग बदल गया। मैंने सोचा था शायद वो अफ़सोस जताएगा, कहेगा कि बड़े भले आदमी थे। पर उसने ऐसा कुछ नहीं कहा। उसने चाय वाले की तरफ़ देखा, और चाय वाले ने चुपचाप अपना सिर नीचे कर लिया।
"चलेंगे," उसने आख़िर में कहा। "पर पीपल तक। उसके आगे नहीं।"
"पीपल?"
"गाँव से डेढ़ किलोमीटर पहले एक पीपल है। वहाँ तक छोड़ देंगे। आगे पैदल चले जाना। सीधी सड़क है।"
"क्यों? आगे क्या है?"
उसने इंजन स्टार्ट किया। "अँधेरा होने वाला है, भैया।"
बस इतना। जैसे ये अपने आप में पूरा जवाब हो।
रास्ते भर वो कुछ नहीं बोला। सड़क के दोनों ओर सूखे खेत थे — पिछले तीन साल से यहाँ बारिश ठीक से नहीं हुई थी, ऐसा मैंने अख़बार में पढ़ा था। ज़मीन फटी हुई थी, जैसे किसी बूढ़े की हथेली। कहीं-कहीं बबूल के काँटेदार पेड़ खड़े थे, और उन पर बैठे कौवे हमें गुज़रते हुए ऐसे देख रहे थे जैसे हिसाब लगा रहे हों।
फिर पीपल आया।
मैंने बहुत पीपल देखे हैं, पर ऐसा नहीं। वो इतना बड़ा था कि उसकी जड़ें ज़मीन से बाहर निकलकर सड़क के आधे हिस्से तक फैल गई थीं, जैसे कोई विशाल हाथ मिट्टी को पकड़ने की कोशिश कर रहा हो। उसकी डालियों पर सैकड़ों लाल धागे बँधे थे। और हर धागे के सिरे पर कुछ लटक रहा था — किसी पर चूड़ी का टूटा टुकड़ा, किसी पर छोटी-सी घंटी, किसी पर... मैंने ध्यान से देखा... बच्चों के बाल की लटें।
हवा नहीं चल रही थी। फिर भी घंटियाँ हल्के-हल्के बज रही थीं।
टेम्पो रुका। "बस यहीं तक।"
मैंने पैसे दिए। उसने गिने भी नहीं। फिर, जब मैं उतरकर बैग कंधे पर डाल रहा था, उसने अचानक मेरी कलाई पकड़ ली। उसकी उँगलियाँ पसीने से भीगी थीं।
"भैया, एक बात मानोगे?"
"बोलो।"
"रास्ते में बाईं तरफ़ एक पुरानी बावड़ी पड़ेगी। टीन से ढकी हुई। उधर मत देखना।" उसने थूक निगला। "और अगर कोई आवाज़ आए... कोई गिनती करता सुनाई दे... तो रुकना मत। और साथ में गिनना तो बिल्कुल मत।"
इससे पहले कि मैं कुछ पूछता, उसने टेम्पो घुमाया और धूल उड़ाता चला गया। इतनी तेज़ी से, जैसे कोई उसका पीछा कर रहा हो।
मैं पीपल के नीचे अकेला खड़ा था। घंटियाँ बजती रहीं।
सूरज डूब चुका था पर अँधेरा पूरी तरह नहीं हुआ था। वो वक़्त जिसे दादी "गोधूलि" कहती थीं — जब दिन और रात दोनों एक-दूसरे को पहचानने की कोशिश करते हैं और कोई भी पूरी तरह हावी नहीं होता। दादी ये भी कहती थीं कि इसी वक़्त दरवाज़े खुलते हैं। कौन से दरवाज़े, ये वो कभी नहीं बताती थीं।
मैं चलने लगा।
सड़क सच में सीधी थी। दोनों तरफ़ झाड़ियाँ, और झाड़ियों के पीछे सूखे खेत। कहीं कोई झींगुर नहीं बोल रहा था। कोई कुत्ता नहीं भौंक रहा था। गाँव के इतने पास इतनी ख़ामोशी... मुझे बेचैनी होने लगी। मैंने कैमरा निकाला, बस यूँ ही, हाथ को कुछ करने के लिए। शहर की आदत।
और तब मुझे वो दिखी।
बाईं तरफ़, सड़क से कोई बीस क़दम दूर, पत्थरों की एक नीची मुंडेर। उसके ऊपर जंग लगी टीन की चादरें बिछी थीं, एक के ऊपर एक, और उन्हें एक मोटी लोहे की ज़ंजीर से बाँधा गया था। ज़ंजीर पर एक ताला लटका था — पुराना, पीतल का, जिस पर हरा रंग चढ़ गया था। मुंडेर के चारों ओर सिंदूर से एक घेरा बना था, और घेरे के अंदर-बाहर दर्जनों मिट्टी के दीये उल्टे रखे थे।
उल्टे दीये। मुझे याद आया — गाँव में उल्टा दीया सिर्फ़ एक ही जगह रखते हैं। वहाँ, जहाँ रोशनी को अंदर नहीं जाने देना होता।
भानपुरा की बावड़ी।
मुझे टेम्पो वाले की बात याद आई। उधर मत देखना। पर मैं देख चुका था। और अब मैं नज़र हटा नहीं पा रहा था।
मैंने कैमरा उठाया। मुझे नहीं पता क्यों। शायद इसलिए कि कैमरे के पीछे मुझे हमेशा सुरक्षित महसूस होता है। व्यूफ़ाइंडर में बावड़ी छोटी और मामूली लग रही थी। बस एक पुरानी, ढकी हुई संरचना। मैंने शटर दबाया।
क्लिक।
और उसी पल, टीन की चादरों के नीचे से एक आवाज़ आई।
टप।
पानी की एक बूँद। किसी गहरे, बंद जगह में गिरती हुई, जिसकी गूँज ऊपर तक आई।
मैं जम गया।
तीन साल से बारिश नहीं हुई थी। गाँव के कुएँ सूख गए थे — चाचा ने ख़ुद पिछले साल फ़ोन पर बताया था कि पानी का टैंकर आता है। तो इस बावड़ी में, जो न जाने कितने दशकों से बंद है, पानी कहाँ से आया?
टप।
टप।
और फिर, बहुत हल्की — इतनी हल्की कि मुझे लगा शायद मेरा वहम है — एक आवाज़। किसी बच्चे की। खिलखिलाहट नहीं, रोना नहीं। बस एक शब्द, बड़े ध्यान से बोला गया, जैसे कोई बच्चा पहली बार गिनती सीख रहा हो।
"...एक..."
मैंने कैमरा नीचे किया और चलने लगा। तेज़। फिर और तेज़। मैं भागा नहीं — मुझे लगा कि अगर मैं भागा तो कुछ ऐसा हो जाएगा जो अभी तक नहीं हुआ है। मैं बस चलता रहा, और मेरे पीछे, हर क़दम के साथ, वो बूँदें गिरती रहीं।
टप। टप। टप।
जैसे वो मेरे क़दम गिन रही हों।
गाँव की पहली लालटेन देखकर मेरी साँस में साँस आई।
भानपुरा बदला नहीं था। वही कच्चे-पक्के घर, वही गोबर से लिपे आँगन, वही नीम के पेड़ के नीचे बना छोटा-सा शिव मंदिर। पर लोग बदल गए थे। या शायद लोग वही थे और मैं बदल गया था। जिस भी घर के सामने से गुज़रता, दरवाज़ा धीरे से बंद हो जाता। खिड़कियों के पीछे चेहरे दिखते, फिर गायब हो जाते।
एक बुढ़िया अपने चबूतरे पर बैठी थी, हाथ में माला। सफ़ेद धोती, झुर्रियों से भरा चेहरा, और आँखें — एक आँख पर मोतियाबिंद की सफ़ेद परत थी, दूसरी काली और बहुत तेज़। उसने मुझे देखा और उसकी माला रुक गई।
"रमेसर पंडित का नाती?"
"जी, अम्मा। विक्रम।"
उसने मुझे बहुत देर तक देखा। फिर पूछा, "पीपल वाले रास्ते से आया?"
"जी।"
"बावड़ी के पास से गुज़रा?"
मैं चुप रहा। उसने मेरी चुप्पी में जवाब पढ़ लिया।
"कुछ सुना?"
"नहीं, अम्मा," मैंने झूठ बोला।
उसकी काली आँख सिकुड़ गई। वो मेरे पैरों की तरफ़ देख रही थी। मैंने भी नीचे देखा।
मेरे जूते गीले थे।
सिर्फ़ नीचे से नहीं — पूरे। जैसे मैं टख़नों तक पानी में चलकर आया हूँ। और उन पर हरी काई के कुछ धागे चिपके थे, वही काई जो पुराने कुओं की दीवारों पर उगती है।
पूरी सड़क सूखी थी। धूल से भरी।
बुढ़िया ने माला फिर से फेरनी शुरू की, पर अब उसके होंठ तेज़ी से हिल रहे थे। मैंने बस इतना सुना — "...हे बजरंगी... फिर से... सत्रह बरस बाद फिर से..."
मैं आगे बढ़ गया। मेरे पीछे उसने दरवाज़ा बंद किया और मैंने कुंडी चढ़ने की आवाज़ सुनी।
दादाजी का घर गाँव के आख़िरी छोर पर था — दो मंज़िला, पुराना, पत्थर का बना। आँगन में तुलसी का चौरा, और दरवाज़े पर आम के पत्तों की सूखी हुई बंदनवार जो शायद किसी त्योहार पर लगाई गई थी और फिर किसी ने उतारी नहीं।
आज दरवाज़े पर कोई बंदनवार नहीं थी। उसकी जगह एक काला धागा बँधा था, और धागे पर नींबू और सात हरी मिर्चें।
दरवाज़ा चाची ने खोला। उन्होंने मुझे गले लगाया और रोने लगीं। मैं भी रोना चाहता था, पर जो आँसू आने चाहिए थे वो कहीं अटक गए थे। चाची का शरीर बहुत ठंडा था, जैसे वो बहुत देर से किसी ठंडी जगह पर बैठी हों।
"रघु चाचा कहाँ हैं?"
"श्मशान से लौटे नहीं अभी। गाँव वालों के साथ... कुछ करना था वहाँ।" उन्होंने आँचल से आँखें पोंछीं। "तू भूखा होगा। हाथ-मुँह धो ले।"
"चाची," मैंने उनका हाथ पकड़ा। "दादाजी को क्या हुआ था? चाचा ने फ़ोन पर कहा कि वो किसी 'हालत' में मिले थे।"
उनका हाथ मेरे हाथ में काँपा।
"अंदर चल।"
रसोई में चूल्हे की आग जल रही थी पर कमरा फिर भी ठंडा था। चाची ने मेरे सामने दाल-रोटी की थाली रखी और ख़ुद ज़मीन पर बैठ गईं, दरवाज़े की तरफ़ पीठ करके नहीं — मैंने देखा — बल्कि इस तरह कि दरवाज़ा उन्हें हर वक़्त दिखता रहे।
"परसों रात," उन्होंने धीरे से कहना शुरू किया, "बाबूजी बहुत बेचैन थे। पिछले कई दिनों से थे। रात को सोते नहीं थे। अपने कमरे में बैठकर कुछ लिखते रहते थे। कभी-कभी खिड़की के पास खड़े होकर बाहर देखते रहते थे — पीपल वाली सड़क की तरफ़।"
"बावड़ी की तरफ़," मैंने कहा।
उन्होंने मुझे चौंककर देखा, फिर सिर हिलाया।
"परसों रात उन्होंने मुझसे कहा, 'बहू, विक्रम को बुला ले।' मैंने कहा, 'बाबूजी, सुबह फ़ोन कर देंगे।' वो बोले, 'सुबह बहुत देर हो जाएगी।' फिर वो अपने कमरे में चले गए और दरवाज़ा अंदर से बंद कर लिया।"
वो रुकीं। चूल्हे में एक लकड़ी चटकी और हम दोनों उछल पड़े।
"रात को मेरी नींद खुली। तीन बजे के आसपास। मुझे लगा कोई बाहर गिनती कर रहा है। बहुत धीरे-धीरे। मैंने सोचा बाबूजी होंगे — वो कभी-कभी माला पर गिनती करते थे। पर आवाज़ उनके कमरे से नहीं आ रही थी। बाहर से आ रही थी। दूर से। पीपल वाली सड़क से।"
"क्या गिन रहे थे?"
"अड़तीस," उन्होंने फुसफुसाकर कहा। "मुझे साफ़ सुनाई दिया था। 'छत्तीस... सैंतीस... अड़तीस...' और फिर रुक गई। बहुत देर तक कुछ नहीं। मैं वापस सो गई।"
"और सुबह?"
चाची की आँखें भर आईं। "सुबह बाबूजी का कमरा खाली था। दरवाज़ा अब भी अंदर से बंद था, विक्की। हमें तोड़ना पड़ा। खिड़की में लोहे की सलाखें हैं, उनमें से बिल्ली भी नहीं निकल सकती। पर बाबूजी कमरे में नहीं थे।"
मुझे लगा कमरे का तापमान और गिर गया है।
"वो कहाँ मिले?"
"बावड़ी पर।" उनकी आवाज़ टूट गई। "रामप्यारी अम्मा ने देखा था, सुबह-सुबह। बाबूजी बावड़ी की मुंडेर पर बैठे थे, टीन के ऊपर। पैर नीचे लटकाए हुए। आँखें खुली थीं। होंठ ऐसे खुले थे जैसे कुछ बोल रहे हों। और उनके... उनके पैर..."
"क्या पैर?"
"गीले थे, विक्की। घुटनों तक। पानी से तर। और उन पर काई लगी थी। और उनके टख़नों पर..." वो रुक गईं, जैसे आगे के शब्द मुँह में आने से डर रहे हों। "उँगलियों के निशान थे। नीले पड़ गए थे। छोटे-छोटे निशान। किसी बच्चे की उँगलियों जैसे। जैसे किसी ने उन्हें नीचे खींचने की कोशिश की हो।"
मैंने अपनी थाली की तरफ़ देखा। मैं एक कौर भी नहीं खा पाया था।
"और एक बात," चाची ने कहा, अब लगभग सुनाई न देने वाली आवाज़ में। "उनके दाहिने हाथ की उँगलियाँ मुड़ी हुई थीं। जैसे कोई गिनती करते वक़्त मोड़ता है। अकड़ गई थीं, सीधी नहीं हुईं। पंडित जी ने बहुत कोशिश की। चिता पर भी वो वैसे ही थीं।"
"कितनी उँगलियाँ मुड़ी थीं?"
चाची ने मेरी तरफ़ देखा। "सब। दोनों हाथों की। और फिर पंडित जी ने देखा — उनके पैरों की उँगलियाँ भी मुड़ी थीं।"
दस और दस। बीस।
और गाँव वालों ने बताया था कि उनके होंठ हिल रहे थे।
"चाची, दादाजी का ताला... बावड़ी का ताला... उसकी चाबी किसके पास है?"
"तेरे चाचा के पास। हमेशा से।" उन्होंने कहा। "और परसों रात वो चाबी तेरे चाचा के तकिये के नीचे थी। मैंने ख़ुद देखी थी सुबह।"
"तो ताला खुला हुआ था?"
"नहीं।" चाची ने कहा। "ताला बंद था। ज़ंजीर बँधी थी। टीन अपनी जगह पर थी। बाबूजी बाहर बैठे थे, ऊपर। पर उनके पैर... उनके पैर ऐसे भीगे थे जैसे वो अंदर से निकलकर आए हों।"
रघु चाचा रात साढ़े नौ बजे लौटे। उन्हें देखकर मुझे झटका लगा। पाँच साल में वो बीस साल बूढ़े हो गए थे। बाल सफ़ेद, आँखें धँसी हुई, और एक अजीब आदत — वो हर कुछ सेकंड में अपने पीछे मुड़कर देखते थे।
उन्होंने मुझे गले लगाया, पर बहुत थोड़ी देर के लिए। फिर उन्होंने अपनी जेब से एक चाबी निकाली — छोटी, लोहे की, जंग लगी हुई — और मेरे हाथ में रख दी।
"बाबूजी के कमरे में एक टीन का बक्सा है। उन्होंने कहा था कि विक्रम आए तो ये चाबी उसी को देना। किसी और को नहीं। हमें भी नहीं।" उन्होंने चाबी वाली मेरी मुट्ठी अपने दोनों हाथों से बंद कर दी। "पर बेटा, एक बात सुन। उस बक्से में जो भी है, उसे रात को मत खोलना। सुबह खोलना। धूप में।"
"क्यों, चाचा?"
उन्होंने कुछ नहीं कहा। बस फिर से पीछे मुड़कर देखा।
दादाजी का कमरा ऊपर था, सीढ़ियों के आख़िर में। मैंने सीढ़ियाँ चढ़ते हुए ध्यान नहीं दिया — बाद में दिया — कि मैं उन्हें मन ही मन गिन रहा था। ये मेरी पुरानी आदत है। बचपन से। मुझे याद नहीं ये आदत कब शुरू हुई।
बारह सीढ़ियाँ।
कमरा वैसा ही था जैसा मुझे बचपन से याद था — और बिल्कुल वैसा नहीं भी था। वही लकड़ी का पलंग, वही दीवार पर हनुमान जी की तस्वीर, वही किताबों से भरी अलमारी। पर अब हनुमान जी की तस्वीर उल्टी टँगी थी। और खिड़की के पास, ज़मीन पर, सैकड़ों छोटे-छोटे निशान थे जो किसी ने चॉक से बनाए थे। लकीरें। चार खड़ी, एक आड़ी। चार खड़ी, एक आड़ी। जैसे जेल में क़ैदी दिन गिनते हैं।
मैंने गिनने की कोशिश की, फिर रुक गया। कुछ था जिसने मुझे रोक दिया। एक डर जिसकी वजह मुझे नहीं पता थी।
बिजली चली गई।
चाची ने नीचे से आवाज़ दी, "लालटेन पलंग के पास है, विक्की!"
मैंने टटोलकर लालटेन जलाई। पीली, काँपती रोशनी में कमरा और छोटा लगने लगा। दीवारें पास आ गईं। कोने गहरे हो गए।
पलंग के नीचे बक्सा था। हरे रंग का टीन का बक्सा, जिसके ढक्कन पर सफ़ेद पेंट से लिखा था — रा. प्र. मिश्र, 1971।
चाचा ने कहा था सुबह खोलना। धूप में।
मैंने घड़ी देखी। दस बजकर चार मिनट।
मैंने बक्सा खोल दिया।
मैं आज भी सोचता हूँ कि अगर उस रात मैंने चाचा की बात मान ली होती तो क्या होता। शायद कुछ नहीं बदलता। शायद सब कुछ बदल जाता। पर उस वक़्त मुझे बस इतना लगा कि मेरे दादाजी मरने से पहले मुझसे कुछ कहना चाहते थे, और मैं उसे सुनने के लिए बारह घंटे और इंतज़ार नहीं कर सकता।
बक्से के अंदर तीन चीज़ें थीं।
पहली — एक पीतल का लोटा। पुराना, काला पड़ा हुआ। मैंने उसे उठाया तो वो भारी लगा। अंदर पानी था। हरा, गँदला पानी, जिसमें से सड़ी हुई मिट्टी और पुरानी काई की गंध आ रही थी। और वो पानी ठंडा था। बर्फ़ जैसा ठंडा। एक बंद बक्से में, एक गर्म कमरे में।
मैंने लोटा जल्दी से नीचे रख दिया। पानी हिला, और एक पल के लिए मुझे लगा कि उसकी सतह पर मेरा चेहरा नहीं, किसी और का चेहरा दिखा। छोटा। गोल। मैंने दोबारा देखा — सिर्फ़ लालटेन की रोशनी थी।
दूसरी चीज़ — एक तस्वीर। ब्लैक एंड व्हाइट नहीं, पुराने रंगीन रील वाली, जिसके किनारे पीले पड़ गए थे। तस्वीर में दो लड़के थे, दोनों बारह-तेरह साल के, नंगे पैर, हाफ़ पैंट में। एक मैं था। मैंने ख़ुद को तुरंत पहचान लिया — वही टेढ़ा दाँत, वही माथे पर चोट का निशान।
दूसरा छोटू था।
पर मुझे छोटू का चेहरा नहीं दिखा। किसी ने तस्वीर में उसका चेहरा खुरच दिया था। किसी नुकीली चीज़ से, बार-बार, इतनी ज़ोर से कि वहाँ काग़ज़ फट गया था और पीछे से सिर्फ़ सफ़ेदी झाँक रही थी।
और हम दोनों कहाँ खड़े थे?
बावड़ी की सीढ़ियों पर।
टीन नहीं थी। ज़ंजीर नहीं थी। बावड़ी खुली थी, और उसकी पत्थर की सीढ़ियाँ नीचे अँधेरे में उतरती जा रही थीं। मैं पहली सीढ़ी पर खड़ा था, मुस्कुराता हुआ। छोटू मुझसे तीन सीढ़ी नीचे था।
और उसके पीछे, नीचे के अँधेरे में, कैमरे की फ़्लैश जहाँ तक पहुँची थी उसके ठीक बाहर... मुझे लगा... कुछ था। एक धुंधला-सा आकार। जैसे कोई और भी सीढ़ियों पर खड़ा हो। बहुत नीचे। ऊपर देखता हुआ।
मैंने तस्वीर पलटी। पीछे दादाजी की लिखावट में, नीली स्याही से:
"जून 2009। तस्वीर मैंने ली थी। मुझे नहीं पता था। भगवान मुझे माफ़ करे, मुझे नहीं पता था।"
तीसरी चीज़ एक डायरी थी।
मोटी, भूरे चमड़े की जिल्द वाली, जिसके पन्ने नमी से फूल गए थे। मैंने उसे खोला। पहले पन्ने पर, बड़े अक्षरों में, लाल स्याही से — या जो भी वो थी, जो सूखकर भूरी हो गई थी — एक ही वाक्य लिखा था:
"जो सीढ़ियाँ गिनता है, बावड़ी उसे गिनती है।"
मैंने पन्ना पलटा।
डायरी तारीख़ों में बँटी हुई थी, पर वो तारीख़ें लगातार नहीं थीं। बड़े-बड़े फ़ासले थे।
"आषाढ़, 1975। आज फिर पानी आया। सूखे में। बापू कहते हैं ये अच्छा संकेत नहीं। कहते हैं उनके बचपन में भी ऐसा हुआ था, और तब गाँव के मुखिया का बेटा..."
आगे का हिस्सा पानी से धुल गया था।
"सावन, 1992। सत्रह साल। ठीक सत्रह साल। मैंने हिसाब लगाया है। 1958, 1975, 1992। हर सत्रह साल में वो जागती है। हर बार कोई न कोई गिनती शुरू करता है। और जो गिनती शुरू करता है, उसे पूरी करनी पड़ती है। चालीस तक। अगर वो ख़ुद पूरी नहीं करता, तो बावड़ी उसके बदले किसी और को ले लेती है।"
"ज्येष्ठ, 2009। मेरी ग़लती। मेरी ग़लती। मैंने बच्चों को वहाँ जाने दिया। मैंने सोचा था अभी सत्रह साल पूरे नहीं हुए। मैंने ग़लत गिना था। विक्रम ने सीढ़ियाँ गिनीं। खेल-खेल में। मैंने ख़ुद सुना — उसने उन्नीस तक गिना। और फिर छोटू ने उसका हाथ छुड़ाया और नीचे उतर गया। और फिर..."
इस पन्ने का बाक़ी हिस्सा काली स्याही से पूरी तरह रंगा हुआ था। जैसे दादाजी ने लिखने के बाद उसे मिटाने की कोशिश की हो। या छिपाने की।
मेरे हाथ काँप रहे थे।
विक्रम ने सीढ़ियाँ गिनीं।
मैं। मैंने गिनी थीं। उस गर्मी में। और मुझे याद नहीं।
मैंने तेज़ी से आगे के पन्ने पलटे। 2009 के बाद कुछ नहीं। ख़ाली पन्ने। ख़ाली। ख़ाली। और फिर, डायरी के आख़िरी हिस्से में, पिछले महीने की तारीख़ें। दादाजी की लिखावट अब बदली हुई थी — काँपती हुई, टेढ़ी, जैसे लिखते वक़्त उनका हाथ कोई और पकड़े हो।
"अगस्त 2026। सत्रह साल पूरे हुए। वो जाग गई है। कल रात उसने मेरा नाम लिया। मैंने तय किया है — विक्रम की गिनती मैं पूरी करूँगा। उन्नीस उसने गिनी थीं। बाक़ी इक्कीस मैं उतर जाऊँगा। शायद वो मान जाए। शायद बच्चे का बदला बूढ़ा ले ले।"
"आज रात बीस।"
"आज रात सत्ताईस। पानी अब घुटनों तक आता है। नीचे कोई है। मुझसे पहले उतरा हुआ। वो ऊपर नहीं देखता। वो सिर्फ़ इंतज़ार करता है।"
"आज रात पैंतीस। वो मेरा नहीं है। मुझे समझ आ गया है। वो गिनती मेरी नहीं थी। वो उसकी है जिसने शुरू की थी। मैं उतर तो सकता हूँ, पर पूरी नहीं कर सकता। चालीसवीं पर मेरे पैर नहीं टिकते। वो मुझे वापस ऊपर धकेल देती है।"
और फिर आख़िरी प्रविष्टि। परसों की तारीख़। स्याही फैली हुई थी, जैसे उस पर पानी की बूँदें गिरी हों।
"आज अड़तीसवीं। मैं आगे नहीं जा सकता। वो मुझे अब नहीं छोड़ेगी। मैंने रघु से कह दिया है विक्रम को बुलाए। मुझे माफ़ करना बेटा। मुझे माफ़ करना। तुझे बुलाना नहीं चाहता था, पर अगर तू नहीं आया तो वो ख़ुद तुझे लेने जाएगी — दिल्ली तक, जहाँ भी तू हो। पानी हर जगह पहुँचता है।
याद रखना: 1. रात को उसकी गिनती का जवाब मत देना। 2. उसके साथ मत गिनना। चाहे आवाज़ किसी की भी हो। चाहे मेरी हो। 3. अगर सुबह तू ख़ुद को सीढ़ियों पर पाए, तो नीचे मत देखना। 4. और छोटू को... अगर वो बुलाए... उसे जवाब मत देना। वो अब छोटू नहीं है।"
डायरी मेरे हाथ से फिसलकर गिर गई।
मुझे नहीं पता मैं कितनी देर तक वहाँ बैठा रहा। लालटेन की लौ धीमी होती गई। नीचे चाचा-चाची के कमरे की बत्ती बहुत पहले बुझ चुकी थी। पूरे घर में सन्नाटा था। पूरे गाँव में।
और फिर वो सन्नाटा टूटा।
बहुत दूर से। पीपल वाली सड़क की तरफ़ से।
एक आवाज़।
बूढ़ी, भारी, जानी-पहचानी। वो आवाज़ जो मुझे बचपन में कहानियाँ सुनाती थी, जो मुझे "विक्कू" बुलाती थी, जो हर सुबह हनुमान चालीसा पढ़ती थी।
दादाजी की आवाज़।
"...छत्तीस..."
मैं खिड़की की तरफ़ नहीं गया। मैं हिल भी नहीं पाया।
"...सैंतीस..."
आवाज़ पास आ रही थी। हर गिनती के साथ। जैसे हर संख्या एक क़दम हो।
"...अड़तीस..."
अब वो गाँव के अंदर थी। मुझे कुत्तों के रोने की आवाज़ सुनाई दी — भौंकने की नहीं, रोने की। एक के बाद एक, जैसे वो आवाज़ हर घर के सामने से गुज़र रही हो।
"...उनतालीस..."
और फिर वो रुक गई।
बिल्कुल ठीक मेरी खिड़की के नीचे।
मैंने साँस रोक ली। लालटेन की लौ एक पल के लिए नीली हो गई, फिर वापस पीली। कमरे में एक गंध भर गई — गीली मिट्टी, सड़ी हुई काई, और बहुत पुराना, ठहरा हुआ पानी।
बहुत देर तक कुछ नहीं हुआ।
फिर खिड़की के ठीक बाहर से, इतने पास से कि मुझे लगा बोलने वाले के होंठ सलाखों से सटे हैं, दादाजी की आवाज़ में, पर बहुत गीली, जैसे मुँह पानी से भरा हो, किसी ने फुसफुसाया:
"विक्कू... चालीस तू बोल दे, बेटा। बस एक बार बोल दे। फिर मैं सो जाऊँगा।"
मेरे होंठ खुले। मुझे नहीं पता क्यों। मेरा गला अपने आप हिला, जैसे शब्द मेरे अंदर से नहीं, कहीं और से ऊपर आ रहे हों। "चा—"
मैंने अपने मुँह पर दोनों हाथ रख दिए। इतनी ज़ोर से कि दाँत होंठों में गड़ गए और मुझे ख़ून का स्वाद आया।
नियम दो। उसके साथ मत गिनना। चाहे आवाज़ मेरी हो।
बाहर एक लंबी, धीमी साँस छोड़ने की आवाज़ आई। निराशा की? या धैर्य की?
और फिर, दादाजी की आवाज़ बदल गई। वो पतली होती गई। ऊँची। छोटी। जब तक कि वो किसी बूढ़े की नहीं, किसी बच्चे की आवाज़ नहीं बन गई। बारह साल के बच्चे की।
"कोई बात नहीं, विक्की भैया।"
छोटू।
"शुरू से करते हैं। तुम्हें याद है न, हम कैसे खेलते थे? तुम गिनते थे, मैं उतरता था।"
एक छोटी-सी हँसी। पानी में बुलबुलों जैसी।
"एक।"
उसके बाद मुझे कुछ याद नहीं।
मुझे याद है कि दरवाज़े के नीचे से पानी अंदर आने लगा था। पहले एक पतली लकीर, फिर एक फैलता हुआ धब्बा, काला और चमकता हुआ, लालटेन की रोशनी में। वो मेरे पैरों की तरफ़ बढ़ रहा था — धीरे-धीरे, सोच-समझकर, जैसे पानी नहीं, कोई जीव हो जो रास्ता पहचानता हो।
मुझे याद है कि वो पानी मेरे पैरों को छू गया था और वो इतना ठंडा था कि मेरी चीख गले में जम गई।
और फिर अँधेरा।
मेरी आँख खुली तो सबसे पहले ठंड महसूस हुई। फिर पत्थर।
मैं खड़ा था।
लेटा नहीं था — खड़ा था। नंगे पैर। मेरे पैरों के नीचे खुरदुरा, गीला, काई से ढका पत्थर था। आसमान धूसर था — सुबह होने से ठीक पहले का वो रंग जिसमें कुछ भी साफ़ नहीं दिखता। मेरे चारों ओर पत्थर की ऊँची दीवारें थीं, और ऊपर, बहुत ऊपर, एक आयताकार टुकड़ा आसमान का।
मेरी नज़र सामने गई।
टीन की एक चादर हटी हुई थी। ज़ंजीर ढीली लटकी थी। ताला अब भी बंद था — मैंने साफ़ देखा, वो बंद था — पर ज़ंजीर उसमें से ऐसे निकली हुई थी जैसे लोहे ने ख़ुद रास्ता दे दिया हो।
मैं बावड़ी के अंदर था।
पहली सीढ़ी पर।
पानी मेरे टख़नों तक था। काला, हिलता हुआ, और बर्फ़ की तरह ठंडा। मैं उसे महसूस कर सकता था — वो सिर्फ़ ठंडा नहीं था, वो हल्का-हल्का खिंच रहा था। जैसे नीचे कोई धीरे से साँस अंदर ले रहा हो, और हर साँस के साथ पानी मेरे पैरों को नीचे की तरफ़ खींच रहा हो।
नियम तीन। अगर सुबह तू ख़ुद को सीढ़ियों पर पाए, तो नीचे मत देखना।
मैंने ऊपर देखा। आसमान। मुंडेर। टीन। मैंने आँखें ऊपर गड़ाए रखीं।
पर कान नीचे की तरफ़ थे।
और नीचे से, उन्तालीस सीढ़ियों के अँधेरे से, एक आवाज़ आई।
पानी के हिलने की। ज़ोर से नहीं। धीरे से। वैसे ही जैसे तब होती है जब कोई पानी में बहुत देर तक बैठा रहा हो और अब, आख़िरकार, उठ रहा हो।
छप।
छप।
और फिर — ये सबसे बुरा था — पानी के अंदर से किसी के पत्थर पर पैर रखने की आवाज़। एक सीढ़ी ऊपर चढ़ने की।
मेरी गर्दन की हर नस चीख रही थी कि मैं नीचे देखूँ। बस एक बार। बस ये जानने के लिए कि वो कितना पास है। मेरी आँखें धीरे-धीरे, मेरी मर्ज़ी के ख़िलाफ़, नीचे की तरफ़ सरकने लगीं—
"विक्की!"
ऊपर से एक चीख। रघु चाचा। मुंडेर पर, झुके हुए, उनका चेहरा सफ़ेद पड़ा हुआ। उनके पीछे रामप्यारी अम्मा, हाथ में जलता हुआ दीया — सीधा दीया — ऊपर उठाए हुए।
"हाथ दे! ऊपर मत देख, नीचे मत देख, बस मेरी तरफ़ हाथ बढ़ा!"
मैंने हाथ बढ़ाया। चाचा ने उसे पकड़ा और खींचा। मेरे पैर पानी से निकले — और एक पल के लिए, सिर्फ़ एक पल के लिए, मुझे लगा कि पानी ने उन्हें छोड़ने से मना किया। जैसे किसी ने मेरे टख़ने को पकड़ा हो। फिर पकड़ ढीली हुई, और मैं मुंडेर के ऊपर, धूल में, चाचा के ऊपर गिरा।
रामप्यारी अम्मा ने तुरंत दीया टीन के खुले हिस्से के ऊपर रखा और कुछ बुदबुदाने लगीं। चाचा ने काँपते हाथों से टीन वापस खींची।
नीचे से, टीन बंद होने से ठीक पहले, मुझे एक आवाज़ सुनाई दी। बहुत धीमी। निराश नहीं। संतुष्ट।
"एक हो गई।"
"ताला मेरे पास था," रघु चाचा ने घर लौटते हुए दसवीं बार कहा। उनकी आवाज़ में अब डर नहीं, एक थकी हुई हार थी। "चाबी मेरे तकिये के नीचे थी। मैं रात भर जागा था, विक्की। मैंने तुझे सीढ़ियों से उतरते नहीं देखा। दरवाज़ा अंदर से बंद था। तू निकला कैसे?"
मेरे पास कोई जवाब नहीं था।
रामप्यारी अम्मा ने घर के दरवाज़े पर रुककर मेरी तरफ़ देखा। अपनी उस एक काली, तेज़ आँख से।
"इसने गिनती शुरू नहीं की," उन्होंने चाचा से कहा, जैसे मैं वहाँ हूँ ही नहीं। "इसने सत्रह साल पहले शुरू की थी। अब बस वो इसे याद दिला रही है कि गिनती अधूरी है।"
"अम्मा, कोई रास्ता—"
"रमेसर ने रास्ता ढूँढने में सत्रह साल लगाए, रघु। और देख, कहाँ पहुँचा।" उन्होंने अपनी माला मेरी कलाई पर लपेट दी। रुद्राक्ष के दाने ठंडे थे। "इसे उतारना मत, बच्चा। ये तुझे बचाएगी नहीं। पर शायद थोड़ा वक़्त दिला दे।"
"कितना वक़्त?"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, और पहली बार उनकी आँख में मुझे दया दिखी।
"उनतालीस रातें," उन्होंने कहा। "अगर तू हर रात एक सीढ़ी उतरा।"
मैं अपने कमरे में लौटा। दादाजी के कमरे में। धूप अब खिड़की से अंदर आ रही थी, और दिन की रोशनी में सब कुछ इतना सामान्य लग रहा था कि मुझे लगा शायद मैंने सब सपने में देखा हो।
फिर मैंने ज़मीन देखी।
रात का पानी सूख चुका था। पर जहाँ से वो आया था — दरवाज़े से पलंग तक — वहाँ पत्थर के फ़र्श पर एक गीली, हरी लकीर रह गई थी। और उस लकीर में पैरों के निशान थे।
छोटे। नंगे। किसी बच्चे के।
दरवाज़े से पलंग की तरफ़ आते हुए।
और फिर पलंग के पास आकर... रुकते हुए। और वहीं... खड़े रहते हुए। दो पैरों के निशान, एक-दूसरे के बगल में, पलंग की तरफ़ मुँह किए हुए। जैसे कोई रात भर वहाँ खड़ा रहा हो।
मुझे सोते हुए देखता हुआ।
मैं पलंग पर बैठ गया। मेरी नज़र डायरी पर गई, जो अब भी ज़मीन पर पड़ी थी, वहीं जहाँ मेरे हाथ से गिरी थी। वो खुली थी — आख़िरी पन्ने पर। दादाजी की आख़िरी प्रविष्टि पर।
पर अब उसके नीचे एक और पंक्ति थी।
जो रात को नहीं थी। मुझे पक्का पता है। मैंने वो पन्ना दस बार पढ़ा था।
स्याही गीली थी। गहरी हरी, काई के रंग की। और उसमें से वही सड़े पानी की गंध आ रही थी। लिखावट दादाजी की थी — बिल्कुल उनकी, वही गोल "ब", वही लंबी "ई" की मात्रा।
पर दादाजी को मरे तीन दिन हो चुके थे।
"पहली सीढ़ी मुबारक हो, विक्कू। मैंने कहा था न — जो गिनती शुरू करता है, पूरी भी वही करता है। आज रात दूसरी। मैं इंतज़ार करूँगा। हम दोनों करेंगे।
— दादाजी और छोटू"
मैंने धीरे से अपना पैर उठाया और अपने टख़ने को देखा।
वहाँ चार छोटे, नीले निशान थे। और एक थोड़ा अलग, अंगूठे का।
किसी बच्चे की उँगलियाँ।
और जब मैंने अपना हाथ उन निशानों पर रखा, तो वो ठंडे थे। बर्फ़ जैसे ठंडे। जैसे वो हाथ अभी भी वहीं हो।
जैसे उसने मुझे छोड़ा ही न हो।
भाग 1 समाप्त।
अगले भाग में — "दूसरी सीढ़ी": विक्रम तय करता है कि वो आज रात सोएगा ही नहीं। पर बावड़ी को नींद की ज़रूरत नहीं होती। और गाँव में कोई और भी है जिसके पैर सुबह गीले मिले हैं...
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