Pretika › Real Experiences › भानपुरा की बावड़ी - चालीस सीढ़ियाँ
भाग 2 — दूसरी सीढ़ी
Piyashi Atma · Real Experiences · 24 मिनट
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- भानपुरा की बावड़ी - चालीस सीढ़ियाँ
- Chapter
- 2 of 31
- Category
- Real Experiences
- Reading time
- 24 min
- Words
- 4795
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
लोग सोचते हैं कि नींद एक दरवाज़ा है।
कि अगर आप सोएँगे नहीं, तो वो दरवाज़ा खुलेगा ही नहीं। कि जो चीज़ें अँधेरे में आती हैं, वो सिर्फ़ बंद आँखों के पीछे आती हैं। कि जागते रहना एक पहरा है।
मैंने भी यही सोचा था।
उस दूसरी रात मैंने पूरी तैयारी की थी। मैंने चाय की तीन केतलियाँ बनवाई थीं। मैंने लालटेन में इतना तेल भरा था कि वो सुबह तक जले। मैंने अपने टख़ने को एक मोटी रस्सी से पलंग के पाये से बाँधा था — तीन गाँठें, कसकर। मैंने रघु चाचा को अपने साथ कमरे में बिठाया था।
मैं एक पल के लिए भी नहीं सोया।
और फिर भी, सुबह, मैं दूसरी सीढ़ी पर खड़ा था।
पर मैं आगे की बात पहले कर रहा हूँ। मुझे शुरू से बताना चाहिए। क्योंकि उस दिन बहुत कुछ हुआ था जो तब मुझे मामूली लगा था, और बाद में समझ आया कि कुछ भी मामूली नहीं था।
सुबह के नौ बजे थे, पर गाँव में अब भी वही ख़ामोशी थी।
मैं दादाजी के कमरे की खिड़की के पास बैठा था, डायरी गोद में, और अपने टख़ने के नीले निशानों को देख रहा था। रात भर में वो और गहरे हो गए थे। अब वो नीले नहीं, लगभग काले थे। और उनके चारों ओर की चमड़ी हल्की-सी झुर्रीदार हो गई थी — वैसी, जैसी बहुत देर तक पानी में रहने पर उँगलियों के पोरों की हो जाती है।
मैंने उन पर गर्म पानी डाला। साबुन लगाया। चाची ने हल्दी का लेप लगाया।
वो नहीं गए।
और सबसे अजीब बात — वो दर्द नहीं करते थे। बस ठंडे थे। हर वक़्त। जैसे मेरी चमड़ी के नीचे एक छोटा-सा बर्फ़ का टुकड़ा दबा हो जो पिघलता ही नहीं।
मेरा कैमरा मेज़ पर पड़ा था। उसमें कल शाम की तस्वीर थी — बावड़ी की, जो मैंने पीपल वाली सड़क से ली थी। मैं कई बार उसे उठाने के लिए हाथ बढ़ा चुका था। और हर बार रुक गया था।
मुझे नहीं पता क्यों। शायद इसलिए कि मैं फ़ोटोग्राफ़र हूँ, और मुझे पता है कि कैमरा वो देखता है जो आँख नहीं देखती। और उस सुबह, मैं ये जानने के लिए तैयार नहीं था कि कल शाम, जब मैं उस सड़क पर अकेला खड़ा था, तब मेरे व्यूफ़ाइंडर में और कौन था।
मैंने कैमरे को उसके बैग में डाला, ज़िप बंद की, और बैग अलमारी में रख दिया।
"सूरज की दुकान पर चला जा," चाची ने नाश्ते के वक़्त कहा। "दूध ख़त्म हो गया है, और माचिस भी चाहिए। तेरे चाचा आज फिर श्मशान जाएँगे — तेरहवीं तक का सामान लाना है।"
"सूरज?"
"भूल गया? सूरज, भोला हलवाई का लड़का। तेरी ही उमर का है। बचपन में तुम तीनों — तू, छोटू और सूरज — दिन भर साथ घूमते थे।"
मैंने चम्मच नीचे रख दिया।
तुम तीनों।
मुझे सूरज याद नहीं था। बिल्कुल भी नहीं। उस गर्मी की मेरी याद में सिर्फ़ मैं था और छोटू। आम के बाग़, तालाब, और वो तस्वीर जिसमें हम दोनों बावड़ी की सीढ़ियों पर खड़े थे।
पर अगर हम तीन थे... तो वो तस्वीर किसने ली थी?
दादाजी ने। तस्वीर के पीछे लिखा था। "तस्वीर मैंने ली थी।"
तो सूरज कहाँ था?
सूरज की किराने की दुकान मंदिर के बगल में थी। छोटी-सी, टीन की छत वाली, जिसके सामने प्लास्टिक के डिब्बों में टॉफ़ियाँ और बिस्कुट के पैकेट लटके थे। दुकान के काउंटर के पीछे एक आदमी बैठा था — मेरी उम्र का, भारी बदन, घनी मूँछें, गले में सोने की पतली चेन। वो मोबाइल पर कोई वीडियो देख रहा था और उसकी हँसी पूरी गली में गूँज रही थी।
फिर उसने ऊपर देखा, मुझे देखा, और उसकी हँसी ऐसे रुकी जैसे किसी ने बिजली का तार काट दिया हो।
"विक्की?"
"सूरज?"
वो उठा, काउंटर घूमकर बाहर आया, और मुझे गले लगा लिया। ज़ोर से। पीठ पर तीन बार थपकी। "अबे! सत्रह साल! सत्रह साल बाद आया है तू! पहचाना भी नहीं जाता। शहरी बाबू बन गया, हाँ?"
उसकी आवाज़ में गर्मजोशी थी। उसकी हँसी सच्ची लग रही थी। पर जब उसने मुझे छोड़ा, तो मैंने उसके हाथ देखे।
वो काँप रहे थे।
"दादाजी का सुनकर बहुत बुरा लगा, यार," उसने कहा, और नज़रें चुराते हुए वापस काउंटर के पीछे चला गया। "बहुत भले आदमी थे। हम सबको टॉफ़ी देते थे। याद है?"
"सूरज, मुझे... मुझे बचपन का बहुत कुछ याद नहीं है।"
"हाँ, हाँ, वो बुख़ार के बाद।" उसने सिर हिलाया, जैसे ये बात पूरा गाँव जानता हो। "वैसे भी क्या याद रखना, यार। बचपन था। मिट्टी में खेलते थे, पेड़ों पर चढ़ते थे।" उसने दूध के पैकेट और माचिस काउंटर पर रखीं। "और कुछ?"
"तू उस दिन कहाँ था?"
उसके हाथ रुक गए।
"किस दिन?"
"जिस दिन छोटू गायब हुआ।"
दुकान में अचानक बहुत गर्मी लगने लगी। टीन की छत के नीचे हवा ठहर गई थी। कहीं एक मक्खी भिनभिना रही थी। सूरज ने अपनी मूँछों पर हाथ फेरा — एक बार, दो बार, तीन बार।
"घर पे था," उसने आख़िर में कहा। "बुख़ार था मुझे भी। उस दिन मैं खेलने आया ही नहीं था।"
वो झूठ बोल रहा था। मुझे पता था। उसी तरह जैसे आप किसी तस्वीर में देखते ही जान जाते हैं कि मुस्कान नक़ली है — आँखें होंठों का साथ नहीं देतीं।
"सूरज—"
"चालीस रुपये हुए।"
मैंने पैसे दिए। उसने गल्ले में डाले। और जब मैं मुड़कर जाने लगा, तो उसने पीछे से धीमी आवाज़ में कहा — इतनी धीमी कि मुझे लगा शायद वो ख़ुद से बात कर रहा है:
"रात को सुना था मैंने। गिनती।"
मैं मुड़ा। वो मेरी तरफ़ नहीं देख रहा था। वो गल्ले में पड़े सिक्कों को देख रहा था, और उसकी उँगलियाँ उन्हें एक-एक करके अलग कर रही थीं।
"पूरे गाँव ने सुना था, विक्की। पर किसी ने कुछ नहीं कहा। कोई कुछ नहीं कहता। सत्रह साल पहले भी किसी ने कुछ नहीं कहा था।"
"तो तुझे याद है। उस गर्मी का।"
उसने सिक्के गिनने बंद किए। फिर उसने ऊपर देखा, और पहली बार उसकी आँखों में वो हँसी नहीं थी। सिर्फ़ डर था। बहुत पुराना डर, जो सत्रह साल से कहीं दबा पड़ा था और अब ऊपर तैरने लगा था।
"मुझे सब याद है, भाई," उसने कहा। "इसीलिए मैं कभी पीपल वाली सड़क से नहीं गुज़रता। सत्रह साल से। एक बार भी नहीं।"
"बता मुझे। क्या हुआ था?"
उसने दुकान के बाहर देखा। गली ख़ाली थी। धूप कड़ी थी। फिर भी उसने अपनी आवाज़ और नीचे कर ली।
"रात को नहीं। रात को उसका नाम मत लेना, उसकी बात मत करना। कल... कल दिन में आना। दोपहर को। जब धूप सबसे तेज़ हो। तब बताऊँगा।"
"सूरज, मेरे पास वक़्त नहीं है। आज रात दूसरी—"
"मुझे पता है!" वो लगभग चीख पड़ा, फिर ख़ुद ही चौंककर चुप हो गया। उसकी आँखें भर आई थीं। "मुझे पता है, विक्की। इसीलिए कह रहा हूँ। आज रात... बस आज रात कुछ भी हो, जवाब मत देना। और अगर कोई और जवाब दे..."
"कोई और?"
"...तो भगवान उसकी मदद करे।"
दोपहर को मैं रामप्यारी अम्मा के घर गया।
उनका घर गाँव के बीच में था, एक छोटा-सा कच्चा घर जिसकी दीवारों पर गोबर से हाथ के छापे बने थे। सैकड़ों छापे। बड़े, छोटे, कुछ इतने छोटे कि किसी शिशु के लगते थे। दरवाज़े की चौखट पर लोहे की कीलें ठुकी थीं — ऊपर की ओर नुकीली।
अम्मा आँगन में बैठी थीं, एक पीतल की थाली में चावल के दाने बीन रही थीं। उन्होंने मुझे देखा और बिना कुछ कहे अपने बगल में एक चटाई बिछा दी।
"मैं आज रात जागूँगा, अम्मा," मैंने बैठते ही कहा। "पूरी रात। अगर मैं सोऊँगा नहीं, तो वो मुझे ले नहीं जा पाएगी।"
अम्मा के हाथ चावल बीनते रहे। "किसने कहा वो नींद में ले जाती है?"
"पर कल रात... मुझे याद नहीं मैं कैसे वहाँ पहुँचा। मैं बेहोश था, या सो गया था—"
"तू बेहोश नहीं था, बच्चा।" उन्होंने एक काला दाना निकालकर फेंका। "तू चलकर गया था। अपने पैरों से। सीढ़ियाँ उतरकर, दरवाज़ा खोलकर, गाँव की गली से होकर, पीपल वाली सड़क पर। रघु की आँखों के सामने से। और रघु ने तुझे नहीं देखा, क्योंकि तू उस वक़्त यहाँ नहीं था।"
"मतलब?"
अम्मा ने थाली नीचे रखी और मेरी तरफ़ मुड़ीं। उनकी सफ़ेद, मोतियाबिंद वाली आँख धूप में चमक रही थी — और मुझे पहली बार लगा कि वो आँख अंधी नहीं है। कि वो कुछ देखती है। बस वो नहीं जो हम देखते हैं।
"बावड़ी का अपना एक वक़्त होता है," उन्होंने धीरे से कहा। "जब वो बुलाती है, तो तू उसके वक़्त में चला जाता है। हमारे वक़्त में एक पल भी नहीं गुज़रता। घड़ी की सुई एक बार टिक करती है, और उस एक टिक के बीच में तू पूरा रास्ता तय कर लेता है। जागा हो या सोया, कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता।"
"तो कोई रास्ता नहीं है? मैं कुछ नहीं कर सकता?"
"एक ही चीज़ तेरे बस में है।" अम्मा ने मेरी कलाई पर बँधी अपनी रुद्राक्ष की माला को छुआ। "जवाब मत देना। वो हर रात तुझसे अगली गिनती बुलवाने की कोशिश करेगी। अगर तूने नहीं बोला, तो तू सिर्फ़ एक सीढ़ी उतरेगा। अगर तूने बोल दिया..."
"तो?"
"तो उस रात तू उतना उतरेगा जितना तूने गिना।"
मेरी रीढ़ में ठंडक दौड़ गई। कल रात, जब दादाजी की आवाज़ ने कहा था "चालीस तू बोल दे" — अगर मैंने वो शब्द पूरा बोल दिया होता...
"एक ही रात में," मैंने फुसफुसाकर कहा। "चालीस सीढ़ियाँ।"
अम्मा ने कुछ नहीं कहा। उन्होंने बस फिर से चावल बीनने शुरू कर दिए।
"अम्मा... सूरज ने कहा कि अगर कोई और जवाब दे..."
उनके हाथ फिर रुके। इस बार बहुत देर तक।
"सूरज से मिला तू?"
"हाँ।"
"उसने क्या बताया?"
"कुछ नहीं। कल दोपहर को बताएगा।"
अम्मा ने एक लंबी साँस ली। उस साँस में इतनी थकान थी जैसे उन्होंने पूरी ज़िंदगी यही साँस रोककर रखी हो।
"बावड़ी लालची होती है, बच्चा," उन्होंने कहा। "वो एक गिनने वाले से कभी संतुष्ट नहीं होती। अगर रात को उसकी गिनती का जवाब कोई और दे दे — कोई भी, गाँव में कोई भी, जो उस वक़्त जाग रहा हो और जिसके अंदर पहले से उसका कोई धागा बँधा हो — तो वो भी गिनने वाला बन जाता है। उसकी भी सीढ़ियाँ शुरू हो जाती हैं।"
"और... जिसके अंदर पहले से धागा बँधा हो, उसका क्या मतलब?"
अम्मा ने मेरी तरफ़ देखा। और उस पल, उस तेज़ दोपहरी की धूप में, मुझे समझ आ गया कि वो क्या कहना चाह रही थीं।
जो उस दिन वहाँ था।
शाम ढलते-ढलते मैंने अपनी तैयारी पूरी कर ली।
रघु चाचा ने पहले मना किया। फिर उन्होंने मेरे टख़ने के निशान देखे, और बिना कुछ कहे अपनी चारपाई उठाकर मेरे कमरे में ले आए। चाची ने तीन केतली चाय बनाई और एक बड़े थर्मस में भर दी। उन्होंने हनुमान जी की तस्वीर, जो उल्टी टँगी थी, उतारकर सीधी करने की कोशिश की।
वो कील से गिर गई। ज़मीन पर, मुँह के बल।
चाची ने उसे उठाया। शीशे में एक बारीक दरार पड़ गई थी — सीधी, ऊपर से नीचे, हनुमान जी के चेहरे के ठीक बीच से।
"रहने दो, चाची," मैंने कहा। "उसे वैसे ही रहने दो।"
उन्होंने तस्वीर वापस उल्टी टाँग दी। बिना कुछ बोले। और मैंने देखा कि उनके होंठ काँप रहे थे।
मैंने रस्सी ख़ुद बाँधी।
एक सिरा पलंग के मोटे पाये पर — शीशम का पाया, जो दादाजी के दादाजी के ज़माने का था और जिसे चार लोग मिलकर भी नहीं हिला सकते थे। दूसरा सिरा मेरे बाएँ टख़ने पर, उन नीले निशानों के ठीक ऊपर। तीन गाँठें। हर गाँठ पर चाचा ने ज़ोर लगाकर देखा।
"ये नहीं खुलेगी," उन्होंने कहा। "ये तो मैं भी नहीं खोल पाऊँगा।"
"अगर मैं उठकर जाने की कोशिश करूँ, तो रोक लेना।"
"अगर तू उठा," चाचा ने कहा, "तो मुझे पता चल जाएगा।"
पर अम्मा की बात मेरे कानों में गूँज रही थी। घड़ी की सुई एक बार टिक करती है, और उस एक टिक के बीच में तू पूरा रास्ता तय कर लेता है।
मैंने मेज़ पर अपनी कलाई घड़ी उतारकर रखी, जहाँ लालटेन की रोशनी में उसकी सुइयाँ साफ़ दिखें। फिर अपना फ़ोन उसके बगल में रखा। फिर दादाजी की दीवार घड़ी को देखा, जो पलंग के सामने टँगी थी — पुरानी, पेंडुलम वाली, जिसकी टिक-टिक पूरे कमरे में सुनाई देती थी।
तीन घड़ियाँ। अगर वक़्त रुका, तो मुझे पता चलेगा।
रात के नौ बजे।
हमने इंतज़ार शुरू किया।
पहले दो घंटे सबसे आसान थे।
चाचा ने मुझे दादाजी की पुरानी कहानियाँ सुनाईं — कैसे वो जवानी में पैदल बनारस गए थे, कैसे उन्होंने गाँव का पहला स्कूल खुलवाया था, कैसे एक बार उन्होंने एक पागल साँड़ को सिर्फ़ घूरकर शांत कर दिया था। हम हँसे। थोड़ा। वैसी हँसी जो डर के ऊपर बिछी चादर जैसी होती है — पतली, और नीचे की हर चीज़ की शक्ल दिखाती हुई।
ग्यारह बजे चाची भी ऊपर आ गईं। "नीचे अकेले डर लगता है," उन्होंने कहा, और कमरे के कोने में एक दरी बिछाकर बैठ गईं, हाथ में माला।
बारह बजे बाहर का सन्नाटा और गहरा हो गया। कुत्ते चुप हो गए। झींगुर, जो शाम को थोड़ी देर के लिए बोले थे, अब बिल्कुल ख़ामोश थे। सिर्फ़ दीवार घड़ी की टिक-टिक थी।
टिक। टिक। टिक।
मुझे अचानक एहसास हुआ कि वो आवाज़ कितनी मिलती-जुलती थी। कल शाम बावड़ी से आती उन बूँदों से।
टप। टप। टप।
एक बजे चाची को झपकी आने लगी। उनकी माला धीमी होती गई, फिर रुक गई। उनका सिर दीवार से टिक गया। मैंने उन्हें उठाया नहीं। उनकी साँसें धीमी और गहरी थीं।
डेढ़ बजे चाचा ने तीसरी बार थर्मस से चाय निकाली। उनकी आँखें लाल थीं।
"तू सो जा थोड़ी देर," उन्होंने कहा। "मैं जाग रहा हूँ।"
"नहीं।"
"विक्की, अम्मा ने कहा न, सोने-जागने से फ़र्क़ नहीं—"
"नहीं, चाचा।"
वो चुप हो गए।
दो बजे मुझे अपने टख़ने में एक हल्का-सा खिंचाव महसूस हुआ।
मैंने नीचे देखा। रस्सी वैसे ही बँधी थी। ढीली, पलंग के पाये से मेरे पैर तक, फ़र्श पर पड़ी हुई।
पर खिंचाव फिर भी था। रस्सी में नहीं — मेरे टख़ने के अंदर। उन निशानों में। जैसे वो छोटी-छोटी उँगलियाँ, जो मेरी चमड़ी में धँसी थीं, धीरे-धीरे कस रही हों।
मैंने कुछ नहीं कहा। चाचा को भी नहीं बताया।
दो बजकर चालीस मिनट।
चाचा ऊँघ रहे थे। उनकी ठोड़ी सीने पर गिरती, फिर वो झटके से उठते, मेरी तरफ़ देखते, और फिर धीरे-धीरे उनकी आँखें फिर बंद होने लगतीं। मैंने उन्हें जगाने की कोशिश नहीं की। मैं ख़ुद इतना थका था कि मेरी पलकें रेत की बोरियों जैसी भारी लग रही थीं।
पर मैं जाग रहा था। मैं पूरी तरह जाग रहा था। मैं इस बात की क़सम खा सकता हूँ।
दो बजकर पैंतालीस।
मैंने तीनों घड़ियों को देखा। कलाई घड़ी — 2:45। फ़ोन — 2:45। दीवार घड़ी — 2:45।
टिक। टिक।
दो बजकर छियालीस।
दो बजकर सैंतालीस।
वही वक़्त। जब परसों रात रघु चाचा का फ़ोन आया था।
और फिर दीवार घड़ी का पेंडुलम रुक गया।
धीरे से नहीं। झटके से। जैसे किसी अदृश्य हाथ ने उसे बीच हवा में पकड़ लिया हो। वो एक तरफ़ झुका हुआ, तिरछा, बिल्कुल स्थिर लटका था।
मैंने कलाई घड़ी देखी। सेकंड की सुई — जो हमेशा घूमती रहती है — बारह के ठीक ऊपर जमी थी।
फ़ोन की स्क्रीन पर 2:47 लिखा था। और स्क्रीन की रोशनी, जो आमतौर पर तीस सेकंड में बुझ जाती है, जलती रही। जलती रही। जलती रही।
मैंने चाचा की तरफ़ देखा। उनकी आँखें आधी खुली थीं, उनका हाथ चाय के कप की तरफ़ बढ़ा हुआ था, और वो... हिल नहीं रहे थे। पलक भी नहीं झपक रहे थे। चाय के कप से उठती भाप हवा में जमी थी — एक पतली, सफ़ेद, घुमावदार लकीर, बिल्कुल स्थिर, जैसे किसी तस्वीर में।
चाची दीवार से टिकी थीं, मुँह थोड़ा खुला, साँस अधूरी।
पूरा कमरा रुक गया था।
सिवाय मेरे।
और लालटेन की लौ के — जो धीरे-धीरे, बहुत धीरे-धीरे, नीली होती जा रही थी।
"विक्की?"
आवाज़ नीचे से आई। रसोई से।
चाची की आवाज़।
"विक्की, बेटा, नीचे आ जा। अदरक वाली चाय बनाई है, गरम-गरम। ऊपर ठंड लग रही होगी।"
मैंने कोने की तरफ़ देखा। चाची वहीं थीं। दीवार से टिकी हुई, जमी हुई, आँखें बंद, माला उनकी गोद में।
और नीचे से उनकी आवाज़ फिर आई। बिल्कुल उनकी। वही लहजा, वही "बेटा" कहने का प्यार भरा अंदाज़, वही बुंदेली मिठास।
"आ जा न, विक्की। देख, मैंने तेरे लिए पकौड़े भी बनाए हैं। तुझे बचपन से पसंद हैं न। छोटू को भी बहुत पसंद थे।"
मैंने दोनों हाथ अपने घुटनों पर दबा लिए। मेरी हथेलियाँ पसीने से भीगी थीं, पर मेरी उँगलियाँ बर्फ़ जैसी ठंडी थीं।
"विक्की?"
अब आवाज़ सीढ़ियों पर थी। नीचे की पहली सीढ़ी पर।
मुझे सुनाई दिया — पैरों की आवाज़। नंगे पैर। गीले पत्थर पर पड़ते हुए।
छप।
"एक," चाची की आवाज़ ने कहा।
छप।
"दो। ऊपर आ रही हूँ, बेटा।"
मैंने घर की सीढ़ियाँ कल ही गिनी थीं। बारह। बारह सीढ़ियाँ।
छप। "तीन।"
छप। "चार।"
हर क़दम के साथ आवाज़ बदल रही थी। चाची की मीठी आवाज़ में कुछ और घुलने लगा था। कुछ भारी। कुछ गीला। जैसे बोलने वाले के गले में पानी भरता जा रहा हो।
छप। "पाँच..."
छप। "छह..."
अब वो आवाज़ चाची की नहीं रही थी। अब वो कई आवाज़ें थीं, एक साथ। एक बूढ़ी — दादाजी की। एक औरत की। एक मर्द की, जिसे मैं नहीं पहचानता था। और उन सबके नीचे, सबसे पतली, सबसे साफ़ — एक बच्चे की।
छप। "सात..."
छप। "आठ..."
मेरे कमरे का दरवाज़ा बंद था। मैंने ख़ुद उसकी कुंडी लगाई थी।
दरवाज़े के नीचे की दरार से पानी अंदर आने लगा।
छप। "नौ..."
छप। "दस..."
छप। "ग्यारह..."
और फिर वो रुक गई।
बारहवीं सीढ़ी पर। दरवाज़े के ठीक बाहर।
बहुत देर तक कुछ नहीं हुआ। कमरे में वो जमी हुई ख़ामोशी थी — ऐसी ख़ामोशी जो सिर्फ़ तब होती है जब वक़्त ख़ुद साँस रोक ले। लालटेन की नीली लौ बिना हिले जल रही थी। चाय की भाप हवा में टँगी थी।
और फिर, दरवाज़े के उस पार से, एक खिलखिलाहट आई। बच्चे की।
"विक्की भैया... बारहवीं सीढ़ी पर तो मैं भी रुका था। याद है? जब तुमने मेरा हाथ छोड़ा था?"
मैं कुछ नहीं बोला।
"तुमने मेरा हाथ छोड़ा था, भैया। मैंने नहीं। तुमने।"
मेरी आँखों में आँसू आ गए। मुझे नहीं पता क्यों। मुझे याद नहीं था। मुझे कुछ भी याद नहीं था। पर मेरे अंदर कहीं, बहुत गहरे, कोई चीज़ चीख उठी थी — एक बारह साल के लड़के की चीख, जो सत्रह साल से किसी बंद कमरे में क़ैद थी।
"कोई बात नहीं," छोटू की आवाज़ ने कहा। "मैं नाराज़ नहीं हूँ। सच्ची। बस तुम खेल पूरा कर दो। कल हमने एक तक खेला था। आज..."
एक छोटा-सा ठहराव।
"एक..."
और फिर वो इंतज़ार करने लगी।
मुझे पता था वो क्या चाहती थी। मुझे पता था कि अगला शब्द कौन-सा था। वो शब्द मेरे गले में उठ रहा था, मेरी ज़ुबान पर आ रहा था, मेरे होंठों को धकेल रहा था। दो। बस एक शब्द। इतना छोटा। इतना आसान। बचपन की सबसे पहली चीज़ें जो हम सीखते हैं।
मैंने अपनी ज़ुबान को दाँतों के बीच दबा लिया। इतनी ज़ोर से कि मुँह में ख़ून भर गया।
दरवाज़े के बाहर इंतज़ार चलता रहा।
"...एक..." छोटू ने फिर कहा। इस बार धीरे से। मनाते हुए।
मैं कुछ नहीं बोला।
और फिर मैंने अपने टख़ने में खिंचाव महसूस किया।
इस बार वो उँगलियों के निशानों में नहीं था। इस बार वो रस्सी में था।
मैंने नीचे देखा।
रस्सी, जो अब तक ढीली फ़र्श पर पड़ी थी, धीरे-धीरे कसने लगी थी। पर पलंग की तरफ़ नहीं। दरवाज़े की तरफ़। जैसे पलंग के पाये से बँधा सिरा अब पलंग से नहीं, किसी और चीज़ से बँधा हो। जैसे कोई दरवाज़े के उस पार खड़ा होकर उसे धीरे-धीरे अपनी ओर खींच रहा हो — बंद दरवाज़े के आर-पार, पानी में से होकर।
मेरा पैर फ़र्श पर एक इंच सरका।
मैंने पलंग की पाटी पकड़ ली। दोनों हाथों से।
रस्सी और कसी। मेरे टख़ने की हड्डी में दर्द की एक लहर दौड़ी। मेरा पैर एक और इंच सरका — पलंग से दूर, दरवाज़े की ओर, उस काले पानी की ओर जो अब पूरे फ़र्श पर फैल चुका था और मेरे तलवों को छू रहा था।
"...एक..."
मैं चुप रहा। मैंने आँखें बंद कर लीं और मन ही मन हनुमान चालीसा पढ़ने लगा। शब्द उलझ रहे थे। मुझे आधी चौपाइयाँ याद नहीं थीं।
"जय हनुमान ज्ञान गुन सागर..."
रस्सी खिंची।
"जय कपीस तिहुँ लोक उजागर..."
"...एक..."
और तब — बहुत दूर से, गाँव के दूसरे छोर से, इतनी धीमी कि अगर वो जमी हुई ख़ामोशी न होती तो मैं कभी न सुन पाता — किसी और की आवाज़ आई।
एक मर्द की आवाज़। नींद में डूबी हुई। भारी। जैसे कोई गहरी नींद में, किसी सपने में, किसी बच्चे के सवाल का जवाब दे रहा हो।
"...दो।"
मेरी आँखें खुल गईं।
दरवाज़े के बाहर एक लंबी, संतुष्ट साँस सुनाई दी। जैसे किसी भूखे ने पहला कौर खाया हो।
"हो गया," छोटू ने ख़ुशी से फुसफुसाया। "देखा, भैया? तुमने नहीं बोला, तो किसी और ने बोल दिया। किसी न किसी को तो बोलना ही था।"
रस्सी एक झटके में खिंची।
और मेरे चारों ओर का कमरा ग़ायब हो गया।
ठंड।
पत्थर।
पानी।
मैं खड़ा था। फिर से। नंगे पैर। टीन की हटी हुई चादर के नीचे, धूसर आसमान के एक टुकड़े के नीचे, पत्थर की ऊँची दीवारों के बीच।
इस बार पानी मेरी पिंडलियों तक था।
मैं दूसरी सीढ़ी पर खड़ा था।
मुझे ये पता था बिना देखे। मेरे पैरों को पता था। पहली सीढ़ी का पत्थर खुरदुरा था, टूटा हुआ, जिस पर काई की मोटी परत थी। ये पत्थर चिकना था। बहुत चिकना। जैसे सदियों से हज़ारों पैरों ने इसे घिसा हो। और उसके बीच में एक हल्का-सा गड्ढा था — ठीक पैर के आकार का — जिसमें मेरा बायाँ पैर ऐसे फ़िट बैठा था जैसे वो गड्ढा मेरे लिए ही बना हो।
और मेरे बाएँ टख़ने पर रस्सी अब भी बँधी थी।
तीन गाँठें। कसी हुई। बिल्कुल वैसी जैसी चाचा ने जाँची थीं।
मैंने रस्सी के साथ अपनी नज़रें आगे बढ़ाईं — बहुत सावधानी से, बिना सिर झुकाए, सिर्फ़ आँखों के कोने से।
रस्सी का दूसरा सिरा पलंग के पाये से बँधा नहीं था।
वो मेरे पैर से निकलकर सीधा पानी में जा रहा था। नीचे। अँधेरे में। तीसरी सीढ़ी, चौथी सीढ़ी, और उसके आगे, जहाँ पानी काला और गाढ़ा था और जहाँ सुबह की धुँधली रोशनी भी नहीं पहुँचती थी।
और रस्सी तनी हुई थी।
किसी ने नीचे से उसका सिरा पकड़ा हुआ था।
नियम तीन। अगर सुबह तू ख़ुद को सीढ़ियों पर पाए, तो नीचे मत देखना।
मैंने अपनी आँखें ऊपर उठाईं और आसमान के उस धूसर टुकड़े पर गड़ा दीं। और मेरे हाथ — बिना देखे, सिर्फ़ छूकर — मेरे टख़ने की तरफ़ बढ़े।
पहली गाँठ। पानी में भीगकर वो और कस गई थी। मेरे नाख़ून उसके रेशों में धँसे। मैंने खींचा। कुछ नहीं। फिर से। मेरा एक नाख़ून उखड़ गया। मुझे दर्द महसूस नहीं हुआ। ठंड ने सब कुछ सुन्न कर दिया था।
रस्सी नीचे से खिंची। एक बार। हल्के से। जैसे कोई याद दिला रहा हो कि वो अभी भी वहाँ है।
मेरा दायाँ पैर फिसला। तीसरी सीढ़ी की तरफ़।
मैंने अपना पूरा वज़न पीछे फेंका, और मेरी पीठ पत्थर की दीवार से टकराई। मेरी कोहनी छिल गई। पर मेरा पैर दूसरी सीढ़ी पर वापस आ गया।
पहली गाँठ खुली।
रस्सी फिर खिंची। अब ज़ोर से। मेरी टख़ने की हड्डी चरमराई।
नीचे से, पानी के अंदर से, एक आवाज़ आई। बुलबुलों जैसी। हँसी जैसी।
दूसरी गाँठ। मेरी उँगलियाँ अब सिर्फ़ काँप रही थीं। मैं उन्हें महसूस भी नहीं कर पा रहा था। मैंने दाँतों से अपना होंठ काटा — कल का ज़ख़्म फिर से खुल गया — और उस दर्द ने मुझे एक पल का होश दिया। मैंने गाँठ में उँगली फँसाई और पूरी ताक़त से खींचा।
खुल गई।
तीसरी गाँठ—
पानी हिला।
मेरे ठीक सामने। तीसरी सीढ़ी पर। इतने पास कि लहरें मेरे घुटनों से टकराईं।
कोई उठ रहा था। पानी में से। मुझे आँखें ऊपर रखे हुए भी दिख रहा था — आँखों के सबसे निचले कोने में, धुँधला-सा — एक आकार। छोटा। सिर पहले निकला। गीले, काले, सपाट बाल, जो चेहरे पर चिपके थे।
मैंने अपनी नज़र आसमान पर जमाए रखी। आँसू मेरे गालों पर बह रहे थे।
मत देख। मत देख। मत देख।
एक गीली, ठंडी, बहुत छोटी उँगली ने मेरे घुटने को छुआ।
तीसरी गाँठ खुली।
मैंने रस्सी को अपने पैर से झटका — और वो पानी में गिरी, और एक पल में अँधेरे में खिंच गई, जैसे किसी ने उसे निगल लिया हो। और मैं मुड़ा — ऊपर की तरफ़ — और पहली सीढ़ी पर पैर रखा, और मुंडेर के किनारे को पकड़ा, और अपने आप को ऊपर खींचा, और धूल में गिरा, और हाँफता रहा, हाँफता रहा, हाँफता रहा।
मेरे पीछे, बावड़ी के अंदर से, एक आवाज़ आई। निराश नहीं। छोटू की आवाज़। शांत। लगभग प्यार भरी।
"कोई बात नहीं, भैया। कल फिर खेलेंगे।"
मैं मुंडेर के किनारे पड़ा था, आसमान की तरफ़ मुँह किए, जब मुझे दूसरी आवाज़ सुनाई दी।
किसी की साँसों की। मुंडेर के दूसरी तरफ़ से। तेज़, टूटी हुई, हिचकियों से भरी।
मैं उठा और घूमकर देखा।
बावड़ी के दूसरे छोर पर, टीन की उस चादर के बगल में जो अब भी अपनी जगह पर थी, कोई बैठा था। घुटने सीने से सटाए, बाँहें उनके चारों ओर लपेटे, आगे-पीछे झूलता हुआ।
सफ़ेद बनियान। घनी मूँछें। गले में सोने की पतली चेन।
सूरज।
उसके पैर घुटनों तक भीगे थे। उसके पायजामे से पानी टपक रहा था। और उसके पैरों के पास, धूल में, हरी काई के धागे बिखरे थे।
"सूरज!" मैं उसकी तरफ़ भागा।
उसने ऊपर नहीं देखा। उसकी आँखें खुली थीं, पर वो किसी चीज़ को नहीं देख रही थीं। उसके होंठ हिल रहे थे।
"...मैंने नहीं बोला... मैंने नहीं बोला... मैं सो रहा था... मैं सपने में था... छोटू पूछ रहा था... वो बस पूछ रहा था, एक के बाद क्या आता है... मैंने बस बताया... मैंने बस बताया..."
मैंने उसके कंधे पकड़े और हिलाया। "सूरज! सूरज, मेरी तरफ़ देख!"
उसकी नज़रें धीरे-धीरे मेरे चेहरे पर आईं। पहचान उनमें लौटी, और साथ में वो डर, जो मैंने कल उसकी दुकान में देखा था — पर अब वो डर नहीं रहा था। अब वो कुछ और था। एक हार। एक स्वीकार।
"विक्की," उसने फुसफुसाकर कहा। "मैं दूसरी सीढ़ी पर था। तेरे बगल में। तूने मुझे नहीं देखा।"
मुझे ठंड लगी। उस बर्फ़ीले पानी से भी ज़्यादा।
"मैं तेरे ठीक बगल में था, और तू बस ऊपर देख रहा था। और मैं... मैंने..." उसकी आवाज़ टूट गई।
"तूने नीचे देखा," मैंने कहा।
उसने सिर हिलाया। एक बार। उसके आँसू उसकी मूँछों में उलझ गए।
"क्या दिखा, सूरज?"
वो बहुत देर तक चुप रहा। सूरज की पहली किरण पीपल के पेड़ के ऊपर से निकल रही थी, और उसकी रोशनी में बावड़ी की टीन सुनहरी लग रही थी। घंटियाँ बजने लगी थीं। हवा अब भी नहीं चल रही थी।
"वो बड़ा नहीं हुआ, विक्की," सूरज ने आख़िर में कहा। "सत्रह साल में वो ज़रा भी बड़ा नहीं हुआ। वही हाफ़ पैंट। वही नीली कमीज़, जिसकी जेब फटी हुई थी। वही चेहरा।"
उसने मेरी तरफ़ देखा।
"पर उसकी आँखें... उसकी आँखें अब उसकी नहीं हैं। वो किसी और की आँखें हैं। बहुत पुरानी। बहुत भूखी। और वो ऊपर देख रहा था। सीधे मेरी तरफ़।"
"उसने कुछ कहा?"
सूरज ने अपने पैरों की तरफ़ देखा। अपने भीगे हुए, काई से सने पैरों की तरफ़। और फिर उसने अपना दाहिना टख़ना मेरी तरफ़ मोड़ा।
उस पर पाँच नीले निशान थे। छोटे-छोटे। एक बच्चे की उँगलियों के।
"उसने कहा," सूरज ने बहुत धीमी आवाज़ में कहा, "'अच्छा हुआ सूरज, तुम भी आ गए। उस दिन तुम भाग गए थे। इस बार पूरा खेल खेलेंगे। तीनों साथ में।'"
उस सुबह, घर लौटकर, मैंने डायरी खोली।
मुझे पता था कि मैं क्या पाऊँगा। फिर भी मेरे हाथ काँप रहे थे।
कल की हरी स्याही वाली पंक्ति के नीचे, अब एक नई पंक्ति थी। वही लिखावट। वही सड़े पानी की गंध। स्याही अब भी गीली, अब भी चमकती हुई।
पर इस बार लिखावट दादाजी की नहीं थी।
इस बार वो टेढ़े-मेढ़े, बड़े-बड़े अक्षर थे। जैसे किसी ऐसे बच्चे ने लिखे हों जिसने अभी-अभी लिखना सीखा हो। कुछ अक्षर उल्टे थे। मात्राएँ ग़लत जगह पर थीं।
"दो हो गई। अब तुम दो हो। सूरज भी गिनेगा। पर सूरज बीच में से शुरू करेगा। सूरज को याद है वो उस दिन कहाँ तक गया था। सूरज को बताओ, भैया। वरना मैं बता दूँगा।"
और उसके नीचे, पन्ने के बिल्कुल आख़िर में, एक बच्चे के हाथ का छापा था।
गीला। हरा। पाँच छोटी उँगलियाँ।
और मैंने अपना हाथ उसके पास रखा — तो वो छापा मेरे हाथ से छोटा था, बहुत छोटा, जैसा होना चाहिए था।
पर उसकी उँगलियाँ बहुत लंबी थीं।
किसी बच्चे की उँगलियों से कहीं ज़्यादा लंबी। पतली। जोड़ों पर अजीब तरह से मुड़ी हुई।
जैसे किसी ने बच्चे के हाथ को ओढ़ रखा हो — किसी दस्ताने की तरह — और उसके अंदर से असली उँगलियाँ बाहर निकल आई हों।
भाग 2 समाप्त।
अगले भाग में — "तीसरी सीढ़ी": विक्रम आख़िरकार अपना कैमरा खोलता है। पहली शाम की उस तस्वीर में बावड़ी की मुंडेर पर कोई बैठा है। और सूरज, जिसे "बीच में से शुरू" करना है, आज रात कितनी सीढ़ियाँ उतरेगा — ये कोई नहीं जानता...
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